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चातुर्मास्य 🐿🐿🐿🐿चातुर्मास्य अर्थात 4 महीने क्या करें क्या।न करें 📍आज आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चातुर्मास्य रहता है । इस में अनेक पहलू एवं भाव है 🎈आज की एकादशी को देवशयनी एकादशी बोलते हैं और कार्तिक शुक्ल की एकादशी को देव उठानी एकादशी कहते हैं तो एक पहलू तो यह है कि आज से 4 महीने तक देव शयन हो जाते हैं इसीलिए लौकिक संसार में कोई भी शुभ कार्य संपन्न नहीं होता है सारे शुभ शुभ कार्य आज विश्राम ले लेते हैं 🛢🛢दसरा पहलू है स्वास्थ्य को लेकर हम 12 महीने सब कुछ खाते रहते हैं यह 4 माह विशेष रूप से स्वास्थ्य का ध्यान रखें और शरीर को एक प्रकार से फिर से 8 महीने के लिए स्वस्थ बना लें। शरीर के विकारों को निकाल दें शरीर में जो रोग आदि हो गए हैं इन 4 महीनों में हम यदि भोजन शयन आदि का ध्यान रखें तो शरीर का विकार दूर हो जाए 💧💧💧तीसरी दृष्टि है मौसम के हिसाब से इन 4 महीनों में प्राय बरसात का आक्रमण रहता है । आज तो आने जाने के साधन है । गाड़ी है बस है । कार है वायुयान विमान है । आज से 200। 400 साल पहले बरसात के कारण नदियों में बाढ़ आ जाती थी कई रास्ते बंद हो जाते थे कई गाॅव बाढ़ में आ जाते थे तो उस समय इस का एक पहलू यह भी था के व्यक्ति 4 महीने किसी भी एक स्थान पर टिका रहे। 🚶🚶 विशेषकर जो परिव्राजक साधु होते थे जो साल भर कभी कहीं कभी कहीं कभी एक वृक्ष के नीचे कभी दूसरे वृक्ष के नीचे भ्रमण करने वाले साधु 4 माह तक किसी एक स्थान पर रहते थे 🏺🏺 आवागमन बंद करना भी इस चातुर्मास्य का एक पहलू है । 4 महीने तक ना कहीं जाना ना कहीं आना । एक ही नगर या स्थान में रहकर अपने अपने लक्ष्य को प्राप्त करना ।। जहां तक भोजन का सवाल है तो 🍀☘सावन मास में अर्थात पहले महीने में हरी पत्तेदार सब्जियों का त्याग करने का आदेश है 🍚दसरी भादो में दही के त्याग का आदेश है 🐄तीसरे माह आश्विन में दूध के त्याग का आदेश है 🙊 और कार्तिक मास में दाल के त्याग का आदेश है 💪 और यह मैंने जैसा कि निवेदन किया शरीर के स्वास्थ्य और शरीर को विकार रहित बनाने के लिए है 🔔🔔एक और इसका जो पहलु है वह वैष्णवों के लिए है । आप यदि ध्यान से देखें तो इन्हीं चार महीनों में 🔔गरु पूर्णिमा 🔔झूलन 🔔राधाष्टमी 🔔जन्माष्टमी एवं अन्य भी अनेक उत्सव आते हैं कुल मिलाकर हर प्रकार से भजन पर ही केंद्रित करना होता है 🔔रक्षाबंधन भी इसी दौरान में आता है किसी भी रुप में शरीर को स्वस्थ रखते हुए उससे भजन बने यह एक वैष्णव के केंद्र में रहता है इसी चातुर्मास्य में 🔔पितृपक्ष श्राद्ध आदि भी आते हैं । इसी चातुर्मास्य में पवित्र 🔔दामोदर मास भी आता है इसी में 🔔दीपावली आती है इसी में 🔔धनतेरस आता है और इसी में 🔔अन्नकूट आता है इसी में 🔔गोपाष्टमी आती है इसी में 🔔अक्षय नवमी आती है इसी में चैतन्य महाप्रभु जी का 🔔वृंदावन आगमन उत्सव आता है आदि आदि । 🙏वैष्णव को चाहिए वह यदि परिव्राजक है अर्थात घूमता है यात्राएं करता है तो यात्रा बंद कर देनी चाहिए । एक स्थान पर आसन लगाकर शरीर को शुद्ध रखें । ब्रह्मचर्य का पालन करें । सीमित भोजन करें । जो वस्तुएं निषेध की हैं उनको निषेध करें यथासंभव भजन में चित्त को लगायें 🏃🏃 प्रचारकों को भी चाहिए कि वह 8 महीने प्रचार खूब करें लेकिन इन चार महीनों में आत्मशुद्धि आत्म कल्याण के लिए वह आचरण पर जोर दें कहीं कथा बांचने ना जाए 🙄और हम जैसे साधारण साधक इनका पालन करते हुए भजन करें । हर दिन आने वाले ठाकुर के उत्सव का आयोजन करें । आनंद से उनका पालन करें और आनंदित हो 👌👌साथ ही क्या होता है यदि 4 महीने तक लगातार हमने कुछ नियमों का पालन किया तो वह हमारी आदत में भी आ जाते हैं । आगामी कुछ महीनों तक वह आदतें हमारी संस्कार बन जाती है फिर जीवन भर चलती है ⚱⚱इस प्रकार यथासंभव अपनी परिस्थिति अपनी स्थिति अपने स्तर के अनुसार वैष्णवों को भजन पर केंद्रित होते हुए चातुर्मास व्रत का पालन करना चाहिए 🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚 🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚 🖊 लेखक दासाभास डा गिरिराज नांगिया LBW - Lives Born Works at vrindabn http://shriharinam.blogspot.in/2016/07/chaturmaasaya.html

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Gulshan Kumar Jul 12, 2019
jai Shri radhey radhey ji 🙏🕉 Lekin Shri Dham vrindavan to aa sakte hai na?

reena tuteja Jul 12, 2019
@gulshan172 जी अवश्य आ सकते हैं । यात्रा न करने के पीछे उद्देश्य यह है के साधक वैष्णव जन चातुर्मास में ठाकुर सेवा से संबंधित कुछ विशेष नियम लेते हैं; जैसे किसी मंदिर की परिक्रमा, ठाकुर जी को नित्य माला अर्पण करना विशेष भोग लगाना ग्रंथ पाठ करना बाहर का नहीं खाना भूमि पर सोना आदि आदि । इन नियमों का पालन यदि करेंगे तो यात्रा कैसे करेंगे।

Archana Mishra Jul 19, 2019

*‼ज्योतिष‼* *शयन के नियम :-* 1. *सूने तथा निर्जन* घर में अकेला नहीं सोना चाहिए। *देव मन्दिर* और *श्मशान* में भी नहीं सोना चाहिए। *(मनुस्मृति)* 2. किसी सोए हुए मनुष्य को *अचानक* नहीं जगाना चाहिए। *(विष्णुस्मृति)* 3. *विद्यार्थी, नौकर औऱ द्वारपाल*, यदि ये अधिक समय से सोए हुए हों, तो *इन्हें जगा* देना चाहिए। *(चाणक्यनीति)* 4. स्वस्थ मनुष्य को आयुरक्षा हेतु *ब्रह्ममुहुर्त* में उठना चाहिए। *(देवीभागवत)* बिल्कुल *अँधेरे* कमरे में नहीं सोना चाहिए। *(पद्मपुराण)* 5. *भीगे* पैर नहीं सोना चाहिए। *सूखे पैर* सोने से लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति होती है। *(अत्रिस्मृति)* टूटी खाट पर तथा *जूठे मुँह* सोना वर्जित है। *(महाभारत)* 6. *"नग्न होकर/निर्वस्त्र"* नहीं सोना चाहिए। *(गौतम धर्म सूत्र)* 7. पूर्व की ओर सिर करके सोने से *विद्या*, पश्चिम की ओर सिर करके सोने से *प्रबल चिन्ता*, उत्तर की ओर सिर करके सोने से *हानि व मृत्यु* तथा दक्षिण की ओर सिर करके सोने से *धन व आयु* की प्राप्ति होती है। *(आचारमय़ूख)* 8. दिन में कभी नहीं सोना चाहिए। परन्तु *ज्येष्ठ मास* में दोपहर के समय 1 मुहूर्त (48 मिनट) के लिए सोया जा सकता है। (दिन में सोने से रोग घेरते हैं तथा आयु का क्षरण होता है) 9. दिन में तथा *सूर्योदय एवं सूर्यास्त* के समय सोने वाला रोगी और दरिद्र हो जाता है। *(ब्रह्मवैवर्तपुराण)* 10. सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घण्टे) के बाद ही *शयन* करना चाहिए। 11. बायीं करवट सोना *स्वास्थ्य* के लिये हितकर है। 12. दक्षिण दिशा में *पाँव करके कभी नहीं सोना चाहिए। यम और दुष्ट देवों* का निवास रहता है। कान में हवा भरती है। *मस्तिष्क* में रक्त का संचार कम को जाता है, स्मृति- भ्रंश, मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है। 13. हृदय पर हाथ रखकर, छत के *पाट या बीम* के नीचे और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें। 14. शय्या पर बैठकर *खाना-पीना* अशुभ है। 15. सोते सोते *पढ़ना* नहीं चाहिए। *(ऐसा करने से नेत्र ज्योति घटती है )* 16. ललाट पर *तिलक* लगाकर सोना *अशुभ* है। इसलिये सोते समय तिलक हटा दें। *इन १६ नियमों का अनुकरण करने वाला यशस्वी, निरोग और दीर्घायु हो जाता है।* नोट :- यह सन्देश जन जन तक पहुँचाने का प्रयास करें। ताकि सभी लाभान्वित हों ! 🙏🚩🇮🇳🔱🏹🐚🕉

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जीवन में बुराई अवश्य हो सकती है मगर जीवन बुरा कदापि नहीं हो सकता। जीवन एक अवसर है श्रेष्ठ बनने का, श्रेष्ठ करने का, श्रेष्ठ पाने का। जीवन की दुर्लभता जिस दिन किसी की समझ में आ जाएगी उस दिन कोई भी व्यक्ति जीवन का दुरूपयोग नहीं कर सकता। जीवन वो फूल है जिसमें काँटे तो बहुत हैं मगर सौन्दर्य की भी कोई कमी नहीं। ये और बात है कुछ लोग काँटो को कोसते रहते हैं और कुछ सौन्दर्य का आनन्द लेते हैं। जीवन को बुरा सिर्फ उन लोगों के द्वारा कहा जाता है जिनकी नजर फूलों की बजाय काँटो पर ही लगी रहती है। जीवन का तिरस्कार वे ही लोग करते हैं जिनके लिए यह मूल्यहीन है। जीवन में सब कुछ पाया जा सकता है मगर सब कुछ देने पर भी जीवन को नहीं पाया जा सकता है। जीवन का तिरस्कार नहीं अपितु इससे प्यार करो। जीवन को बुरा कहने की अपेक्षा जीवन की बुराई मिटाने का प्रयास करो, यही समझदारी है।

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anita sharma Jul 18, 2019

जब नारद जी का मोह भंग करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण में तराजू में विराजे थे। एक सोने के पतरे पर तुलसी रखकर पलड़ें में रखा तब भगवान के बराबर भार बैठा!!!!!! एक बार देवर्षि नारद के मन में आया कि भगवान् के पास बहुत महल आदि है है, एक- आध हमको भी दे दें तो यहीं आराम से टिक जायें, नहीं तो इधर-उधर घूमते रहना पड़ता है। भगवान् के द्वारिका में बहुत महल थे। नारद जी ने भगवान् से कहा- भगवन ! आपके बहुत महल हैं, एक हमको दो तो हम भी आराम से रहें। आपके यहाँ खाने- पीने का इंतजाम अच्छा ही है । भगवान् ने सोचा कि यह मेरा भक्त है, विरक्त संन्यासी है। अगर यह कहीं राजसी ठाठ में रहने लगा तो थोड़े दिन में ही इसकी सारी विरक्ति भक्ति निकल जायेगी। हम अगर सीधा ना करेंगे तो यह बुरा मान जायेगा, लड़ाई झगड़ा करेगा कि इतने महल हैं और एकमहल नहीं दे रहे हैं। भगवान् ने चतुराई से काम लिया, नारद से कहा जाकर देख ले, जिस मकान में जगह खाली मिले वही तेरे नाम कर देंगे। नारद जी वहाँ चले। भगवान् की तो १६१०८ रानियाँ और प्रत्येक के ११- ११ बच्चे भी थे। यह द्वापर युग की बात है। सब जगह नारद जी घूम आये लेकिन कहीं एक कमरा भी खाली नहीं मिला, सब भरे हुए थे। आकर भगवान् से कहा वहाँ कोई जगह खाली नहीं मिली। भगवान् ने कहा फिर क्या करूँ , होता तो तेरे को दे देता। नारद जी के मन में आया कि यह तो भगवान् ने मेरे साथ धोखाधड़ी की है, नहीं तो कुछ न कुछ करके, किसी को इधर उधर शिफ्ट कराकर, खिसकाकर एक कमरा तो दे ही सकते थे। इन्होंने मेरे साथ धोखा किया है तो अब मैं भी इन्हे मजा चखाकर छोडूँगा। नारद जी रुक्मिणी जी के पास पहुँचे, रुक्मिणी जी ने नारद जी की आवभगत की, बड़े प्रेम से रखा। उन दिनों भगवान् सत्यभामा जी के यहाँ रहते थे। एक आध दिन बीता तो नारद जी ने उनको दान की कथा सुनाई, सुनाने वाले स्वयं नारद जी। दान का महत्त्व सुनाने लगे कि जिस चीज का दान करोगे वही चीज आगे तुम्हारे को मिलती है। जब नारद जी ने देखा कि यह बात रुक्मिणी जी को जम गई है तो उनसे पूछा आपको सबसे ज्यादा प्यार किससे है ? रुक्मिणी जी ने कहा यह भी कोई पूछने की बात है, भगवान् हरि से ही मेरा प्यार है। कहने लगे फिर आपकी यही इच्छा होगी कि अगले जन्म में तुम्हें वे ही मिलें। रुक्मिणी जी बोली इच्छा तो यही है। नारद जी ने कहा इच्छा है तो फिर दान करदो, नहीं तो नहीं मिलेंगे। आपकी सौतें भी बहुत है और उनमें से किसी ने पहले दान कर दिया उन्हें मिल जायेंगे। इसलिये दूसरे करें, इसके पहले आप ही कर दे। रुक्मिणी जी को बात जँच गई कि जन्म जन्म में भगवान् मिले तो दान कर देना चाहियें। रुक्मिणी से नारद जी ने संकल्प करा लिया। अब क्या था, नारद जी का काम बन गया। वहाँ से सीधे सत्यभामा जी के महल में पहुँच गये और भगवान् से कहा कि उठाओ कमण्डलु, और चलो मेरे साथ। भगवान् ने कहा कहाँ चलना है, बात क्या हुई ? नारद जी ने कहा बात कुछ नहीं, आपको मैंने दान में ले लिया है। आपने एक कोठरी भी नहीं दी तो मैं अब आपको भी बाबा बनाकर पेड़ के नीचे सुलाउँगा। सारी बात कह सुनाई। भगवान् ने कहा रुक्मिणी ने दान कर दिया है तो ठीक है। वह पटरानी है, उससे मिल तो आयें। भगवान् ने अपने सारे गहने गाँठे, रेशम के कपड़े सब खोलकर सत्यभामा जी को दे दिये और बल्कल वस्त्र पहनकर, भस्मी लगाकर और कमण्डलु लेकर वहाँ से चल दिये। उन्हें देखते ही रुक्मिणी के होश उड़ गये। पूछा हुआ क्या ? भगवान् ने कहा पता नहीं, नारद कहता है कि तूने मेरे को दान में दे दिया। रुक्मिणी ने कहा लेकिन वे कपड़े, गहने कहाँ गये, उत्तम केसर को छोड़कर यह भस्मी क्यों लगा ली ? भगवान् ने कहा जब दान दे दिया तो अब मैं उसका हो गया। इसलिये अब वे ठाठबाट नहीं चलेंगे। अब तो अपने भी बाबा जी होकर जा रहे हैं । रुक्मिणी ने कहा मैंने इसलिये थोड़े ही दिया था कि ये ले जायें। भगवान् ने कहा और काहे के लिये दिया जाता है ? इसीलिये दिया जाता है कि जिसको दो वह ले जाये । अब रुक्मिणी को होश आया कि यह तो गड़बड़ मामला हो गया। रुक्मिणी ने कहा नारद जी यह आपने मेरे से पहले नहीं कहा, अगले जन्म में तो मिलेंगे सो मिलेंगे, अब तो हाथ से ही खो रहे हैं । नारद जी ने कहा अब तो जो हो गया सो हो गया, अब मैं ले जाऊँगा। रुक्मिणी जी बहुत रोने लगी। तब तक हल्ला गुल्ला मचा तो और सब रानियाँ भी वहा इकठ्ठी हो गई। सत्यभामा, जाम्बवती सब समझदार थीं। उन्होंने कहा भगवान् एक रुक्मिणी के पति थोड़े ही हैं, इसलिये रुक्मिणी को सर्वथा दान करने का अधिकार नहीं हो सकता, हम लोगों का भी अधिकार है। नारद जी ने सोचा यह तो घपला हो गया। कहने लगे क्या भगवान् के टुकड़े कराओगे ? तब तो 16108 हिस्से होंगे। रानियों ने कहा नारद जी कुछ ढंग की बात करो। नारद जी ने विचार किया कि अपने को तो महल ही चाहिये था और यही यह दे नहीं रहे थे, अब मौका ठीक है, समझौते पर बात आ रही है। नारद जी ने कहा भगवान् का जितना वजन है, उतने का तुला दान कर देने से भी दान मान लिया जाता है । तुलादान से देह का दान माना जाता है। इसलिये भगवान् के वजन का सोना, हीरा, पन्ना दे दो। इस पर सब रानियाँ राजी हो गई। बाकी तो सब राजी हो गये लेकिन भगवान् ने सोचा कि यह फिर मोह में पड़ रहा है । इसका महल का शौक नहीं गया। भगवान् ने कहा तुलादान कर देना चाहिये, यह बात तो ठीक हे । भगवान् तराजु के एक पलड़े के अन्दर बैठ गये। दूसरे पलड़े में सारे गहने, हीरे, पन्ने रखे जाने लगे। लेकिन जो ब्रह्माण्ड को पेट में लेकर बैठा हो, उसे द्वारिका के धन से कहाँ पूरा होना है। सारा का सारा धन दूसरे पलड़े पर रख दिया लेकिन जिस पलड़े पर भगवान बैठे थे वह वैसा का वैसा नीचे लगा रहा, ऊपर नहीं हुआ । नारद जी ने कहा देख लो, तुला तो बराबर हो नहीं रहा है, अब मैं भगवान् को ले जाऊँगा । सब कहने लगे अरे कोई उपाय बताओ । नारद जी ने कहा और कोई उपाय नहीं है । अन्य सब लोगों ने भी अपने अपने हीरे पन्ने लाकर डाल दिये लेकिन उनसे क्या होना था । वे तो त्रिलोकी का भार लेकर बैठे थे। नारद जी ने सोचा अपने को अच्छा चेला मिल गया, बढ़िया काम हो गया । उधर औरते सब चीख रही थी। नारद जी प्रसन्नता के मारे इधर ऊधर टहलने लगे । भगवान् ने धीरे से रुक्मिणी को बुलाया। रुक्मिणी ने कहा कुछ तो ढंग निकालिये, आप इतना भार लेकर बैठ गये, हम लोगों का क्या हाल होगा ? भगवान् ने कहा ये सब हीरे पन्ने निकाल लो, नहीं तो बाबा जी मान नहीं रहे हैं। यह सब निकालकर तुलसी का एक पत्ता और सोने का एक छोटा सा टुकड़ा रख दो तो तुम लोगों का काम हो जायगा। रुक्मिणी ने सबसे कहा कि यह नहीं हो रहा है तो सब सामान हटाओ । सारा सामान हटा दिया गया और एक छोटे से सोने के पतरे पर तुलसी का पता रखा गया तो भगवान् के वजन के बराबर हो गया । सबने नारद जी से कहा ले जाओ तूला दान। नारद जी ने खुब हिलाडुलाकर देखा कि कहीं कोई डण्डी तो नहीं मार रहा है । नारद जी ने कहा इन्होंने फिर धोखा दिया । फिर जहाँ के तहाँ यह लेकर क्या करूँगा ? उन्होंने कहा भगवन्। यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं, केवल घरवालियों की बात सुनते हैं, मेरी तरफ देखो। भगवान् ने कहा तेरी तरफ क्या देखूँ ? तू सारे संसार के स्वरूप को समझ कर फिर मोह के रास्ते जाना चाह रहा है तो तेरी क्या बात सुनूँ। तब नारद जी ने समझ लिया कि भगवान् ने जो किया सो ठीक किया । नारद जी ने कहा एक बात मेरी मान लो। आपने मेरे को तरह तरह के नाच अनादि काल से नचाये और मैंने तरह तरह के खेल आपको दिखाये। कभी मनुष्य, कभी गाय इत्यादि पशु, कभी इन्द्र, वरुण आदि संसार में कोई ऐसा स्वरूप नहीं जो चैरासी के चक्कर में किसी न किसी समय में हर प्राणी ने नहीं भोग लिया। अनादि काल से यह चक्कर चल रहा है, सब तरह से आपको खेल दिखाया आप मेरे को ले जाते रहे और मैं खेल करता रहा । अगर आपको मेरा कोई खेल पसंद आगया हो तो आप राजा की जगह पर हैं और मैं ब्राह्मण हूँ तो मेरे को कुछ इनाम देना चाहिये । वह इनाम यही चाहता हूँ कि मेरे शोक मोह की भावना निवृत्त होकर मैं आपके परम धाम में पहुँच जाऊँ । और यदि कहो कि तूने जितने खेल किये सब बेकार है, तो भी आप राजा हैं । जब कोई बार बार खराब खेल करता है तो राजा हुक्म देता है कि इसे निकाल दो । इसी प्रकार यदि मेरा खेल आपको पसन्द नहीं आया है तो फिर आप कहो कि इसको कभी संसार की नृत्यशाला में नहीं लाना है । तो भी मेरी मुक्ति है । भगवान् बड़े प्रसन्न होकर तराजू से उठे और नारद जी को छाती से लगाया और कहा तेरी मुक्ति तो निश्चित है।

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gopal Krishna Jul 17, 2019

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MasterJi Jul 17, 2019

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gopal Krishna Jul 17, 2019

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भोले भक्त की भक्ति (कहानी) एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था। एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम में आया और बोला कि बाबा आप सब का ध्यान रखते है, मेरा इस दुनिया मेँ कोई नही है तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम में रह सकता हूँ ? बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है ? उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ। तब संत ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना। रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा। उन संत की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ रुकेगा ? संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे.! क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे। अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था। बालक रामदास संत के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ। संत ने कहा ठीक हैँ पर तुझे काम करना पड़ेगा आश्रम की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा मे कोई कमी मत रखना। रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप बता दिजिये के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है ? फिर मैँ कर दूंगा। संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार की झाँकी थी। श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी थे। संत ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है सब सिखा दिया। रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योँकि अगर रिश्ता पता चल जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा। उन संत ने बालक रामदास कहा की तू कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज से ये राम जी और सीता जी तेरे माता-पिता हैँ। रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है ? संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है। रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये। आज सेवा का पहला दिन था, रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया ,आश्रम की साफ़ सफाई की,और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया। रामदास ने श्री राम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा। रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर खायेंगे. पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी। तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिश्ता बना हैँ तो शरमा रहेँ होँगे। रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था। अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ ! और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और मैँ भूख से मर जाऊँगा..! इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा। रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब भगवान राम जी हनुमान जी को कहते हैँ हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ। हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो? रामदास कहता हैँ आप कौन ? हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ? रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहा बोल रहा था की खाना खा लो तब आये नहीँ अब क्योँ आ गये ? तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे। फिर राम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी , हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैँ। इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता। सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा घर मैँ ५ लोग हैं,सारा काम में ही अकेला करता हुँ ,बाकी लोग तो दिन भर घर में आराम करते है.मेरे माँ, बाप ,चाचा ,भाई तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ. मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा। रामदास मंदिर जाता हैँ ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।राम जी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ ? रामदास कहता हैँ की घर में मैं सबसे छोटा हुँ ,और मैं ही सब काम करता हुँ।अब से मैँ अकेले काम नहीँ करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा,आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा। राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है?रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले. और चाचा जी (लक्ष्मणजी) आप घर की साफ़ सफाई करियेगा. भैय्या जी (हनुमान जी)शरीर से मज़बूत हैं ,जाकर जंगल से लकड़ियाँ लाइयेंगे. पिता जी (रामजी) आप बाज़ार से राशन लाइए और घर पर बैठकर पत्तल बनाओँगे। सबने कहा ठीक हैँ।मैंने बहुत दिन अकेले सब काम किया अब मैं आराम करूँगा. अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ। एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो देखा आश्रम तो शीशे जैसा चमक रहा है, वो बहुत प्रसन्न हुए.मंदिर मेँ गये और देखा की मंदिर से प्रतिमाऐँ गायब हैँ. संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीँ दी ? संत ने रामदास को बुलाया और पूछा भगवान कहा गये रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता हनुमान भैया जंगल लकड़ी लाने गए होंगे,लखन चाचा झाड़ू पोछा कर रहे होंगे,पिताजी राम पत्तल बन रहे होंगे माता सीता रसोई मेँ काम कर रही होंगी. संत बोले ये क्या बोल रहा ? रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जब से आप गये हैँ ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ। वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ राम जी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये। संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तू धन्य हैँ। और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये...! रामदास जैसे भोले,निश्छल भक्तो की भक्ति से विवश होकर भगवान को भी साधारण मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने आना पड़ता है. जय श्री राम

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