संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (पचासवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ललिताषष्ठी व्रत की विधि... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को यह व्रत होता है। उस दिन उत्तम रूप, सौभाग्य और संतान की इच्छा वाली स्त्री को चाहिये कि वह नदी में स्नान करे और एक नये बाँस के पात्र में बालू लेकर घर आये। फिर वस्त्र का मण्डप बनाकर उसमें दीप प्रज्वलित करे। मण्डप में वह बाँस का बालुकामय पात्र स्थापित कर उसमें बालुकामयी, तपोवन-निवासिनी भगवती ललितागौरी का ध्यानकर पूजन करे और उस दिन उपवास रहे, तदनन्तर चम्पक, करवीर, अशोक, मालती, नीलोत्पल, केतकी तथा तगर- पुष्प-इनमें से प्रत्येककी १०८ या २८ पुष्पाञ्जलि अक्षतों के साथ निम्नलिखित मन्त्र से दे ललिते ललिते देवि सौख्यसौभाग्यदायिनि। या सौभाग्यसमुत्पन्ना तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ (उत्तरपर्व ४१ । ८) इस प्रकार से पूजन करने के पश्चात् तरह-तरह के सोहाल, मोदक आदि पक्वान्न, कूष्माण्ड, ककड़ी, बिल्व, करेला, बैगन, करंज आदि फल भगवती ललिता को निवेदित करे और धूप, दीप, वस्त्राभूषण आदि भी समर्पित करे। इस विधि से पूजनकर रात्रि को जागरण करे तथा गीत-नृत्यादि उत्सव करे। दूसरे दिन प्रातः गीत-वाद्यसहित मूर्ति को नदी के समीप ले जाय। वहाँ पूजनकर पूजन-सामग्री ब्राह्मण को निवेदित कर दे और भगवती ललिता की बालुकामयी मूर्ति को नदी में विसर्जित कर दे। घर आकर हवन करे और देवता, पितर, मनुष्य तथा सुवासिनी स्त्रियों का पूजन करे। पंद्रह कुमारी कन्याओं को और उतने ही ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजनों से संतुष्ट कर दक्षिणा प्रदान करे और 'ललिता प्रीतियुक्ता अस्तु' यह कहकर उन्हें बिदा करे। जो पुरुष अथवा स्त्री इस ललिताषष्ठी व्रत को करते हैं, उन्हें संसार में कोई पदार्थ दुर्लभ नहीं रहता। व्रत करने वाली स्त्री बहुत काल पर्यन्त सुख-सौभाग्य से सम्पन्न रहकर अन्त में गौरीलोक में निवास करती है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

संक्षिप्त भविष्य पुराण  
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★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ 
(पचासवां दिन) 

ॐ श्री परमात्मने नमः 
श्री गणेशाय नमः 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 

ललिताषष्ठी व्रत की विधि...
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भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को यह व्रत होता है। उस दिन उत्तम रूप, सौभाग्य और संतान की इच्छा वाली स्त्री को चाहिये कि वह नदी में स्नान करे और एक नये बाँस के पात्र में बालू लेकर घर आये। फिर वस्त्र का मण्डप बनाकर उसमें दीप प्रज्वलित करे। मण्डप में वह बाँस का बालुकामय पात्र स्थापित कर उसमें बालुकामयी, तपोवन-निवासिनी भगवती ललितागौरी का ध्यानकर पूजन करे और उस दिन उपवास रहे, तदनन्तर चम्पक, करवीर, अशोक, मालती, नीलोत्पल, केतकी तथा तगर- पुष्प-इनमें से प्रत्येककी १०८ या २८ पुष्पाञ्जलि अक्षतों के साथ निम्नलिखित मन्त्र से दे

ललिते ललिते देवि सौख्यसौभाग्यदायिनि। 
या सौभाग्यसमुत्पन्ना तस्यै देव्यै नमो नमः ॥

(उत्तरपर्व ४१ । ८)

इस प्रकार से पूजन करने के पश्चात् तरह-तरह के सोहाल, मोदक आदि पक्वान्न, कूष्माण्ड, ककड़ी, बिल्व, करेला, बैगन, करंज आदि फल भगवती ललिता को निवेदित करे और धूप, दीप, वस्त्राभूषण आदि भी समर्पित करे। इस विधि से पूजनकर रात्रि को जागरण करे तथा गीत-नृत्यादि उत्सव करे। दूसरे दिन प्रातः गीत-वाद्यसहित मूर्ति को नदी के समीप ले जाय। वहाँ पूजनकर पूजन-सामग्री ब्राह्मण को निवेदित कर दे और भगवती ललिता की बालुकामयी मूर्ति को नदी में विसर्जित कर दे। घर आकर हवन करे और देवता, पितर, मनुष्य तथा सुवासिनी स्त्रियों का पूजन करे। पंद्रह कुमारी कन्याओं को और उतने ही ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजनों से संतुष्ट कर दक्षिणा प्रदान करे और 'ललिता प्रीतियुक्ता अस्तु' यह कहकर उन्हें बिदा करे। जो पुरुष अथवा स्त्री इस ललिताषष्ठी व्रत को करते हैं, उन्हें संसार में कोई पदार्थ दुर्लभ नहीं रहता। व्रत करने वाली स्त्री बहुत काल पर्यन्त सुख-सौभाग्य से सम्पन्न रहकर अन्त में गौरीलोक में निवास करती है।

क्रमश...
शेष अगले अंक में
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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथैकोनविंशोऽध्यायः किम्पुरुष और भारतवर्ष का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीशुक उवाच किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरण संनिकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान् सह किम्पुरुषैरविरतभक्तिरुपास्ते ॥ १॥ आष्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां परमकल्याण भर्तृभगवत्कथां समुपशृणोति स्वयं चेदं गायति ॥ २ ॥ ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम आर्यलक्षणशीलव्रताय नम उपशिक्षितात्म उपासितलोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम इति ॥ ३ ॥ यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम् । प्रत्यक् प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं ह्यनामरूपं निरहं प्रपद्ये ॥ ४ मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः। कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥५ न वै स आत्माऽऽत्मवतां सुहृत्तमः सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः । न स्त्रीकृतं कश्मलमश्रुवीत न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति ॥ ६ न जन्म नूनं महतो न सौभगं न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः । न तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस श्चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः ॥ ७ सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम् । भजे रामं मनुजाकृतिं हरि य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति ॥ ८ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन् ! किम्पुरुषवर्ष में श्रीलक्ष्मणजी के बड़े भाई, आदिपुरुष, सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीराम के चरणों की सन्निधि के रसिक परम भागवत श्रीहनुमानजी अन्य किन्नरों के सहित अविचल भक्तिभाव से उनकी उपासना करते हैं ॥ १ ॥ वहाँ अन्य गन्धर्वो के सहित आष्र्ष्टिषेण उनके स्वामी भगवान् राम की परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं। श्रीहनुमान् जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार उनकी स्तुति कर हैं ॥ २ ॥ 'हम ॐकारस्वरूप पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीराम को नमस्कार करते हैं। आपमें सत्पुरुषों के लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयतचित्त, लोकाराधनतत्पर, साधुता की परीक्षा के लिये कसौटी के समान और अत्यन्त ब्राह्मणभक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज राम को हमारा पुनः पुनः प्रणाम है' ॥ ३ ॥ 'भगवन् ! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूप के प्रकाश से गुणों के कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओं का निरास करने वाले, सर्वान्तरात्मा, परम शान्त, शुद्ध बुद्धि से ग्रहण किये जानेयोग्य, नाम-रूप से रहित और अहङ्कारशून्य हैं; मैं आपकी शरण में हूँ ॥ ४ ॥ प्रभो ! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसों के वध के लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है ! अन्यथा, अपने स्वरूप में ही रमण करने वाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्वर को सीताजी के वियोग में इतना दुःख कैसे हो सकता था ॥ ५॥ आप धीर पुरुषों के आत्मा और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकी की किसी भी वस्तु में आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीताजी के लिये मोह को ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजी का त्याग ही कर सकते हैं ॥ ६ ॥ आपके ये व्यापार केवल लोकशिक्षा के लिये ही हैं। लक्ष्मणाग्रज ! उत्तम कुल में जन्म, सुन्दरता, वाक्चातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि– इनमें से कोई भी गुण आपकी प्रसन्नता का कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखाने के लिये ही आपने इन सब गुणों से रहित हम वनवासी वानरों से मित्रता की है ।। ७ ।। देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य — कोई भी हो, उसे सब प्रकार से श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नररूप में साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े किये को भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधाम को सिधारे थे, तब समस्त उत्तरकोसल वासियों को भी अपने साथ ही ले गये थे' ॥ ८॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 8 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ च्यवन-प्रह्लाद का संवाद, प्रह्लाद का नैमिषारण्य-गमन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं- च्यवन मुनि की वाणी बड़ी मधुर थी। उसे सुनकर अनेक तीर्थो के विषय में अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रह्लाद उनसे प्रश्न करने लगे । प्रह्लाद ने पूछा- मुनिवर ! पृथ्वी पर कितने पावन तीर्थ हैं? उन्हें बतायें। साथ ही आकाश और पाताल में जो तीर्थ हों, उन्हें भी विशदरूप से बताने की कृपा करें। च्यवन जी बोले-राजन्! जिनके मन, वचन और तन शुद्ध हैं, उनके लिये पग-पग पर तीर्थ समझना चाहिये। दूषित विचारवालों के लिये गंगा भी कहीं मगध से अधिक अपवित्र हो जाती है। यदि मन पवित्र हो गया और इससे उसके सभी कलुषित विचार नष्ट हो गये तो उसके लिये सभी स्थान पावन तीर्थ बन जाते हैं। अन्यथा गंगा के तटपर सर्वत्र बहुत-से नगर बसे हुए हैं। इसके सिवा अन्य भी प्रायः सभी ग्राम, गोष्ठ और छोटे-छोटे टोले बसे हैं। दैत्येन्द्र ! निषादों, धीवरों, हूणों, वंगों एवं खस आदि म्लेच्छ जातियों की बस्ती वहाँ कायम है, परंतु निष्पाप राजन्! उनमें से किसी एक का भी अन्तःकरण पवित्र नहीं हो पाता। फिर जिसके चित्त में विविध विषय भरे हुए हैं, उसके लिये तीर्थ का क्या फल हो सकता है ? राजन्! इस विषय में मन को ही प्रधान कारण मानना चाहिये, इसके सिवा दूसरा कुछ नहीं। अतः शुद्धि की इच्छा रखने वाले पुरुष को चाहिये कि मन को परम पवित्र बना ले। यदि उसमें दूसरों को ठगने की प्रवृत्ति है। तो तीर्थवासी भी महान् पापी माना जा सकता है। तीर्थ में किये हुए पाप अनन्त कुफलरूप से सामने आते हैं। अतः कल्याणकामी पुरुष सबसे पूर्व मन को शुद्ध कर ले । मन के शुद्ध हो जाने पर द्रव्यशुद्धि स्वयं ही हो जाती है । इसमें कुछ भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार आचारशुद्धि भी आवश्यक है। फिर तो सभी पवित्र हैं- यह प्रसिद्ध बात है। अन्यथा जो कुछ किया जाता है, उसे उसी समय नष्टप्राय समझना चाहिये। तीर्थ में जाकर नीच का साथ कभी नहीं करना चाहिये। कर्म और बुद्धि से प्राणियों पर दया करनी चाहिये। राजेन्द्र! यदि पूछते हो तो और भी उत्तम तीर्थ बताऊँगा । प्रथम श्रेणी में पुण्यमय नैमिषारण्य है। चक्र तीर्थ, पुष्कर-तीर्थ तथा अन्य भी अनेकों तीर्थ धरातल पर हैं, जिनकी संख्या का निर्देश करना असम्भव है। नृपसत्तम! बहुत-से ऐसे पवित्र स्थान हैं । व्यासजी कहते हैं- च्यवन मुनि का यह वचन सुनकर राजा प्रह्लाद नैमिषारण्य जाने को तैयार हो गये। उन्होंने हर्ष के उल्लास में भरकर दैत्यों को आज्ञा दी। प्रह्लाद बोले- महाभाग दैत्यो! उठो, आज हम नैमिषारण्य चलेंगे। वहाँ कमललोचन भगवान् श्रीहरि के हमें दर्शन प्राप्त होंगे। पीताम्बर पहने हुए वे वहाँ विराजमान रहते हैं । व्यास जी कहते हैं- जब विष्णुभक्त प्रह्लादने यों कहा, तब वे सभी दानव उनके साथ अपार हर्ष मनाते हुए पाता लसे निकल पड़े, सम्पूर्ण महाबली दैत्यों और दानवों का झुंड एक साथ चला। नैमिषारण्य में पहुँचकर आनन्दपूर्वक सबने स्नान किया। फिर प्रह्लाद दैत्यों के साथ वहाँ के तीर्थों में भ्रमण करने लगे। महान् पुण्यमयी सरस्वती नदी पर उनकी दृष्टि पड़ी। उस नदी का जल बड़ा ही स्वच्छ था । राजेन्द्र ! उस पवित्र स्थान में पहुँचने पर महात्मा प्रह्लाद के मन में बड़ी प्रसन्नता उत्पन्न हुई। अतः उन्होंने सरस्वती के विमल जल में स्नान किया और दान आदि क्रियाएँ सविधि सम्पन्न कीं। वह परम पावन तीर्थ प्रह्लाद की अपार प्रसन्नता का साधन बन गया था । क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (अठहत्तरवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दशावतार व्रत कथा विधान और फल...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— राजन्! सत्ययुग के प्रारम्भ में भृगु नामक एक ऋषि हुए थे। उनकी भार्या दिव्या? अत्यन्त पतिव्रता थीं। वे आश्रम की शोभा थीं और निरन्तर गृहकार्य में संलग्न रहती थीं। वे महर्षि भृगु की आज्ञा का पालन करती थीं। भृगुजी भी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे। किसी समय देवासुर संग्राम में भगवान् विष्णु के द्वारा असुरों को महान् भय उपस्थित हुआ। तब वे सभी असुर महर्षि भृगु की शरण में आये। महर्षि भृगु अपना अग्निहोत्र आदि कार्य अपनी भार्या को सौंपकर स्वयं संजीवनी विद्या को प्राप्त करने के लिये हिमालय के उत्तर भाग में जाकर तपस्या करने लगे। वे भगवान् शंकर की आराधना कर संजीवनी-विद्या को प्राप्त कर दैत्यराज बलि को सदा विजयी करना चाहते थे। इसी समय गरुड़पर चढ़कर भगवान् विष्णु वहाँ आये और दैत्यों का वध करने लगे। क्षणभर में ही उन्होंने दैत्यों का संहार कर दिया। भृगु की पत्नी दिव्या भगवान्‌ को शाप देने के लिये उद्यत हो गयीं। उनके मुख से शाप निकलना ही चाहता था कि भगवान् विष्णु ने चक्र से उनका सिर काट दिया। इतने में भृगुमुनि भी संजीवनी-विद्या को प्राप्तकर वहाँ आ गये। उन्होंने देखा कि सभी दैत्य मारे गये हैं और ब्राह्मणी भी मार दी गयी है। क्रोधान्ध हो भृगुने भगवान् विष्णु को शाप दे दिया कि 'तुम दस बार मनुष्यलोक में जन्म लोगे।' भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- महाराज! भृगु के शाप से जगत्‌ की रक्षा के लिये मैं बार-बार अवार ग्रहण करता हूँ। जो लोग भक्तिपूर्वक मेरी अर्चना करते हैं, वे अवश्य स्वर्गगामी होते हैं। जय श्री राम क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (छतीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः शरीर और संसार की अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपता का वर्णन...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीराम ! भला, बतलाओ तो सही कि सुख-शय्यापर सोये हुए तुम जिस स्वप्न-देह से विविध दिशाओं में परिभ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह किस स्थान में स्थित है । स्वप्नों में भी जो दूसरा स्वप्न आता है, उस स्वप्न में जिस देह से बड़े-बड़े पृथिवी-तटों पर तुम परिभ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह कहाँ स्थित है ? मनोराज्य के भीतर कल्पित दूसरे मनोराज्य में बड़े-बड़े वैभवपूर्ण स्थानों में संकल्प द्वारा जिस देह से तुम भ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह कहाँ स्थित है अर्थात् कहीं नहीं । श्रीराम ! ये शरीर जिस प्रकार मानसिक संकल्प से उत्पन्न- अतएव सत् और असद्रूप हैं, ठीक उसी प्रकार यह प्रस्तुत शरीर भी मानसिक संकल्प से उत्पन्न अतएव सद्रूप और असदुप है। यह मेरा धन है, यह मेरा शरीर है, यह मेरा देश है - इस प्रकार की जो भ्रमजनित प्रतीति होती है, वह भी अज्ञान से ही होती है, क्योंकि धन आदि सब कुछ चित्तजनित संकल्प का ही कार्य है । रघुनन्दन ! इस संसार को एक तरह का दीर्घ स्वप्न, दीर्घ चित्तम या दीर्घ मनोराज्य ही समझना चाहिये । स्वप्न और संकल्पों से ( मनोराज्यों से ) जैसे एक विलक्षण बिना हुए ही जगत् की प्रतीति होती है, वैसे ही यह व्यावहारिक जगत् की स्थिति भी एक प्रकार से संकल्प जनित एवं विलक्षण ( अनिर्वचनीय ) ही है; क्योंकि वह बिना हुए ही प्रतीत होती है । श्रीराम ! पौरुष प्रयत्न से मन को अन्तर्मुख बनाने पर जब परमात्मा के तत्व का यथार्थ साक्षात्कार हो जाता है, तब यह जगदाकार संकल्प चिन्मय परमात्म रूप ही अनुभव होने लगता है; किंतु यदि उसकी विपरीत रूप से भावना की जाय तो विपरीत ही अनुभव होने लगता है ( अनुसार ही संसार है ) । क्योंकि 'यह वह है', 'यह मेरा है' और 'यह मेरा संसार है' इस प्रकार की भावना करने पर देहादि जगढ़प संकल्प जो सत्य सा प्रतीत होता है, वह केवल सुदृढ़ भावना से ही होता है। दिन के व्यवहारकाल में मनुष्य जैसा अभ्यास करता है, वैसा ही स्वप्न में उसे दिखलायी पड़ता है । उसी प्रकार बार बार जैसी भावना की जाती है, वैसा ही यह संसार दिखलायी देता है। जैसे स्वप्नकाल में थोड़ा सा समय भी अधिक समय प्रतीत होता है, वैसे ही यह संसार अल्पकालस्थायी और विनाशशील होने पर भी स्थिर प्रतीत होता है । जैसे सूर्य की किरणों से मरुभूमि में मृगतृष्णा नदी दिखायी देती है, वैसे ही ये पृथिवी आदि पदार्थ वास्तविक न होने पर भी संकल्प से सत्य-से दिखायी देते है। जिस प्रकार नेत्रों के दोष से आकाश में मोरपंख दिखायी देते हैं, वैसे ही चिना हुए ही यह जगत् मन के भ्रम से प्रतीत होता है। किंतु दोष रहित नेत्र से जैसे आकाश मोरपंख नहीं दिखायी देते, वैसे ही यथार्थ ज्ञान होने पर यह जगत् दिखलायी नहीं पड़ता। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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. गोपेश्वर महादेव एक बार शरद पूर्णिमा की शरत-उज्ज्वल चाँदनी में वंशीवट यमुना के किनारे श्याम सुंदर साक्षात मन्मथनाथ की वंशी बज उठी। श्रीकृष्ण ने छ: मास की एक रात्रि करके मन्मथ का मानमर्दन करने के लिए महारास किया था। मनमोहन की मीठी मुरली ने कैलाश पर विराजमान भगवान श्री शंकर को मोह लिया, समाधि भंग हो गयी। बाबा वृंदावन की ओर बावरे होकर चल पड़े। पार्वती जी भी मनाकर हार गयीं, किंतु त्रिपुरारि माने नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्री आसुरि मुनि, पार्वती जी, नन्दी, श्रीगणेश, श्रीकार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृंदावन के वंशीवट पर आ गये। वंशीवट जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोकवासिनी गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। पार्वती जी तो महारास में अंदर प्रवेश कर गयीं, किंतु द्वारपालिकाओं ने श्रीमहादेवजी और श्रीआसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया, बोलीं, "श्रेष्ठ जनों" श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता। श्री शिवजी बोले, "देवियों! हमें भी श्रीराधा-कृष्ण के दर्शनों की लालसा है, अत: आप ही लोग कोई उपाय बतलाइये, जिससे कि हम महाराज के दर्शन पा सकें?" ललिता नामक सखी बोली, यदि आप महारास देखना चाहते हैं तो गोपी बन जाइए। मानसरोवर में स्नान कर गोपी का रूप धारण करके महारास में प्रवेश हुआ जा सकता है। फिर क्या था, भगवान शिव अर्धनारीश्वर से पूरे नारी-रूप बन गये। श्रीयमुना जी ने षोडश श्रृंगार कर दिया, तो बाबा भोलेनाथ गोपी रूप हो गये। प्रसन्न मन से वे गोपी-वेष में महारास में प्रवेश कर गये। श्री शिवजी मोहिनी-वेष में मोहन की रासस्थली में गोपियों के मण्डल में मिलकर अतृप्त नेत्रों से विश्वमोहन की रूप-माधुरी का पान करने लगे। नटवर-वेषधारी, श्रीरासविहारी, रासेश्वरी, रसमयी श्रीराधाजी एवं गोपियों को नृत्य एवं रास करते हुए देख नटराज भोलेनाथ भी स्वयं ता-ता थैया कर नाच उठे। मोहन ने ऐसी मोहिनी वंशी बजायी कि सुधि-बुधि भूल गये भोलेनाथ। बनवारी से क्या कुछ छिपा है। मुस्कुरा उठे, पहचान लिया भोलेनाथ को। उन्होंने रासेश्वरी श्रीराधा व गोपियों को छोड़कर ब्रज-वनिताओं और लताओं के बीच में गोपी रूप धारी गौरीनाथ का हाथ पकड़ लिया और मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बड़े ही आदर-सत्कार से बोले, "आइये स्वागत है, महाराज गोपेश्वर। श्रीराधा आदि श्रीगोपीश्वर महादेव के मोहिनी गोपी के रूप को देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा, "राधे, यह कोई गोपी नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान शंकर हैं। हमारे महारास के दर्शन के लिए इन्होंने गोपी का रूप धारण किया है। तब श्रीराधा-कृष्ण ने हँसते हुए शिव जी से पूछा, "भगवन! आपने यह गोपी वेष क्यों बनाया? भगवान शंकर बोले, "प्रभो! आपकी यह दिव्य रसमयी प्रेमलीला-महारास देखने के लिए गोपी-रूप धारण किया है। इस पर प्रसन्न होकर श्रीराधाजी ने श्रीमहादेव जी से वर माँगने को कहा तो श्रीशिव जी ने यह वर माँगा "हम चाहते हैं कि यहाँ आप दोनों के चरण-कमलों में सदा ही हमारा वास हो। आप दोनों के चरण-कमलों के बिना हम कहीं अन्यत्र वास करना नहीं चाहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने `तथास्तु' कहकर कालिन्दी के निकट निकुंज के पास, वंशीवट के सम्मुख भगवान महादेवजी को `श्रीगोपेश्वर महादेव' के नाम से स्थापित कर विराजमान कर दिया। श्रीराधा-कृष्ण और गोपी-गोपियों ने उनकी पूजा की और कहा कि ब्रज-वृंदावन की यात्रा तभी पूर्ण होगी, जब व्यक्ति आपके दर्शन कर लेगा। आपके दर्शन किये बिना यात्रा अधूरी रहेगी। भगवान शंकर वृंदावन में आज भी `गोपेश्वर महादेव' के रूप में विराजमान हैं और भक्तों को अपने दिव्य गोपी-वेष में दर्शन दे रहे हैं। गर्भगृह के बाहर पार्वतीजी, श्रीगणेश, श्रीनन्दी विराजमान हैं। आज भी संध्या के समय भगवान का गोपीवेश में दिव्य श्रृंगार होता है। ----------:::×:::---------- "हर हर महादेव" *******************************************

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 7 (भाग 3) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारायण से नर की बातचीत, च्यवन-प्रह्लाद का संवाद... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सूतजी कहते हैं इस प्रकार जब राजा जनमेजय ने सत्यवतीनन्दन विप्रवर व्यासजी से पूछा, तब उन्होंने सारी बातों का विशदरूप से वर्णन आरम्भ कर दिया। व्यासजी बोले-राजन्! जब भयंकर हिरण्यकशिपु की मृत्यु हो गयी, तब उसके पुत्र प्रह्लाद को राजगद्दी पर बैठाया गया। दानवराज प्रह्लाद देवताओं और ब्राह्मणों के सच्चे उपासक थे। उनके शासनकाल में भूमण्डल के सभी नरेशों द्वारा यज्ञों में श्रद्धापूर्वक देवताओं की उपासना होती थी। तपस्या करना, धर्म का प्रचार करना और तीर्थों में जाना— यही उस समय के ब्राह्मणों का कार्य था । वैश्य अपनी व्यापार-वृत्ति में संलग्न थे। शूद्रों द्वारा सबकी सेवा होती थी। उस अवसर पर भगवान् नृसिंह ने दैत्यराज प्रह्लाद को पाताल में रहने का आदेश दे रखा था। वहीं उनकी राजधानी थी। बड़ी तत्परता के साथ वे प्रजा का पालन कर रहे थे । एक समय की बात है— महान् तपस्वी भृगुनन्दन च्यवनजी स्नान करने के विचार से नर्मदा के तटपर, जो व्याहृतीश्वर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है, गये। इतने में रेवा नामक महान् नदी पर उनकी दृष्टि पड़ गयी। वे उसके तटपर नीचे उतरने लगे, तबतक एक भयंकर विषधर सर्प ने उन्हें पकड़ लिया। मुनिवर च्यवन उसके प्रयास से पाताल में पहुँच गये। सर्प से पकड़े जाने पर उनके मन में आतंक छा गया। अतएव उन्होंने मन-ही-मन देवाधिदेव भगवान् विष्णु का स्मरण आरम्भ कर दिया। उन्होंने ज्यों ही कमललोचन भगवान् श्रीहरि का चिन्तन किया कि उस महान् विषधर सर्प का सारा विष समाप्त हो गया। तब अत्यन्त घबराये हुए एवं शंकाशील उस सर्पने च्यवन मुनि को छोड़ ये मुनि महान् तपस्वी हैं, दिया और सोचा- अतः कहीं कुपित होकर मुझे शाप न दे दें। नागकन्याएँ मुनिवर की पूजा करने में संलग्न हो गयीं। तदनन्तर च्यवनजी ने नागों और दानवों की विशाल पुरी में प्रवेश किया। एक बार की बात है भृगुनन्दन च्यवन उस श्रेष्ठ पुरी में घूम रहे थे। धर्मवत्सल दैत्यराज प्रह्लाद की उनपर दृष्टि पड़ गयी। देखकर उन्होंने मुनि की पूजा की और पूछा—'भगवन्! आप यहाँ पाताल में कैसे पधारे ? बताने की कृपा करें। इन्द्र हम दैत्यों से शत्रुता रखते हैं। हमारे राज्य का भेद लेने के लिये तो उन्होंने आपको यहाँ नहीं भेजा है ? द्विजवर ! आप सच्ची बात बतायें। च्यवन मुनि ने कहा- राजन्! मुझे इन्द्र से क्या प्रयोजन कि उनकी प्रेरणा से मैं यहाँ आऊँ और उनके दूत का काम करते हुए आपके नगर में प्रवेश करूँ। दैत्येन्द्र! आपको विदित होना चाहिये, मैं भृगु का धर्मात्मा पुत्र च्यवन हूँ। ज्ञानरूपी नेत्र मुझे सुलभ है। मैं इन्द्र का भेजा हुआ हूँ– इस विषय में आप किंचिन्मात्र भी संदेह न करें। राजेन्द्र! मैं स्नान करने के लिये नर्मदा के पावन तीर्थ में पहुँचा। नदी में पैठ रहा था, इतने में एक महान् सर्प ने मुझे पकड़ लिया। उस समय मेरे मन में भगवान् विष्णु की स्मृति जाग्रत् हो गयी। परिणामस्वरूप वह सर्प अपने भीषण विष से रहित हो गया। यों भगवान् विष्णु के चिन्तन के प्रभाव से उस सर्प से मेरा छुटकारा हो गया। राजेन्द्र ! फिर मैं यहाँ आ गया और आपके दर्शन की सुन्दर घड़ी सामने आ गयी। दैत्येन्द्र! आप भगवान् विष्णु के भक्त हैं। मेरे विषय में भी वैसी ही कल्पना कर लेनी चाहिये । क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथाअष्टादशोऽध्यायः भिन्न-भिन्न वर्षो का वर्णन...(भाग 4) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ यद्रूपमेतन्निजमाययार्पित मर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् । संख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भनात् तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ॥ ३१ जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिदं चराचरं देवर्षिपितृभूतमैन्द्रियम् । द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्र द्वीपग्रहक्षेत्यभिधेय एकः ॥ ३२ यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् । संख्या यया तत्त्वदृशान तस्मै नमः सांख्यनिदर्शनाय ते इति ॥ ३३ उत्तरेषु च कुरुषु भगवान् यज्ञपुरुषः कृतवराहरूप आस्ते तं तु देवी हैषा भूः सह कुरुभिरस्खलितभक्तियोगेनोपधावति इमां च परमामुपनिषदमावर्तयति ॥ ३४ ॥ ॐ नमो मन्त्रतत्त्वलिङ्गाय यज्ञवे महाध्वरावयवाय' महापुरुषाय नमः कर्मशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते ॥ ३५ ॥ यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो गुणेषु दारुष्विव जातवेदसम् । मनन्ति मना मनसा दिदृक्षवो गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६ द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने अन्वीक्षयाङ्गातिशयात्मबुद्धिभि निरस्तमायाकृतये नमो नमः ॥ ३७ करोति विश्वस्थितिसंयमोदयं यस्तं नेप्सितमीक्षितुर्गुणैः । माया यथायो भ्रमते तदाश्रयं ग्राव्णो नमस्ते गुणकर्मसाक्षिणे ॥ ३८ प्रमथ्य दैत्यं प्रतिवारणं मृधे यो मां रसाया' जगदादिसूकरः । कृत्वाग्रदंष्ट्रे निरगादुदन्वतः क्रीडन्निवेभः प्रणतास्मि तं विभुमिति ॥ ३९ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ भगवन्! अनेक रूपों में प्रतीत होने वाला यह दृश्यप्रपञ्च यद्यपि मिथ्या ही निश्चय होता है, इसलिये इसकी वस्तुतः कोई संख्या नहीं है; तथापि यह माया से प्रकाशित होने वाला आपका ही रूप है। ऐसे अनिर्वचनीयरूप आपको मेरा नमस्कार है ॥ ३१ ॥ एकमात्र आप ही जरायुज, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जङ्गम, स्थावर, देवता, ऋषि, पितृगण, भूत, इन्द्रिय, स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र, द्वीप, ग्रह और तारा आदि विभिन्न नामों से प्रसिद्ध हैं ॥ ३२ ॥ आप असंख्य नाम, रूप और आकृतियों से युक्त हैं; कपिलादि विद्वानों ने जो आपमें चौबीस तत्त्वों की संख्या निश्चित की है-वह जिस तत्त्वदृष्टि का उदय होने पर निवृत्त हो जाती है, वह भी वस्तुतः आपका ही स्वरूप है। ऐसे सांख्यसिद्धान्तस्वरूप आपको मेरा नमस्कार है' ॥ ३३ ॥ उत्तर कुरुवर्ष में भगवान् यज्ञपुरुष वराहमूर्ति धारण करके विराजमान हैं। वहाँ के निवासियों के सहित साक्षात् पृथ्वी देवी उनकी अविचल भक्तिभाव से उपासना करती और इस परमोत्कृष्ट मन्त्र का जप करती हुई स्तुति करती हैं ॥ ३४ ॥– 'जिनका तत्त्व मन्त्रों से जाना जाता है, जो यज्ञ और क्रतुरूप हैं तथा बड़े-बड़े यज्ञ जिनके अङ्ग हैं-उन ओङ्कारस्वरूप शुक्लकर्ममय त्रियुगमूर्ति पुरुषोत्तम भगवान् वराह को बार-बार नमस्कार है' ॥ ३५ ॥ 'ऋत्विज्गण जिस प्रकार अरणिरूप काष्ठखण्डों में छिपी हुई अग्नि को मन्थन द्वारा प्रकट करते हैं, उसी प्रकार कर्मासक्ति एवं कर्मफल की कामना से छिपे जिनके रूप को देखने की इच्छा से परमप्रवीण पण्डितजन अपने विवेकयुक्त मनरूप मन्थनकाष्ठ से शरीर एवं इन्द्रियादि को बिलो डालते । इस प्रकार मन्थन करने पर अपने स्वरूप को प्रकट करने वाले आपको नमस्कार है ॥ ३६ ॥ | विचार तथा यम-नियमादि योगाङ्गों के साधन से जिनकी बुद्धि निश्चयात्मि का हो गयी है— वे महापुरुष द्रव्य (विषय), क्रिया (इन्द्रियों के व्यापार), हेतु (इन्द्रियाधिष्ठाता देवता), अयन (शरीर), ईश, काल और कर्ता (अहङ्कार) आदि माया के कार्यों को देखकर वास्तविक स्वरूप का निश्चय करते हैं ऐसे मायिक आकृतियों से रहित आपको बार-बार नमस्कार है ।। ३७ ।। जिस प्रकार लोहा जड होने पर भी चुम्बक की सन्निधिमात्र से चलने-फिरने लगता है, उसी प्रकार जिन सर्वसाक्षी की इच्छामात्र से- जो अपने लिये नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के लिये होती है- प्रकृति अपने गुणों के द्वारा जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करती रहती है, ऐसे सम्पूर्ण गुणों एवं कर्मों के साक्षी आपको नमस्कार है ॥ ३८ ॥ आप जगत् के कारणभूत आदिसूकर हैं। जिस प्रकार एक हाथी दूसरे हाथी को पछाड़ देता है, उसी प्रकार गजराज के समान क्रीडा करते हुए आप युद्ध में अपने प्रतिद्वन्द्वी हिरण्याक्ष दैत्य को दलित करके मुझे अपनी दाढ़ों की नोक पर रखकर रसातल से प्रलयपयोधि के बाहर निकले थे। मैं आप सर्वशक्तिमान् प्रभु को बार-बार नमस्कार करती हूँ ॥ ३९ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भुवनकोशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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प्रेरणादायक कथा 〰️〰️🌼〰️〰️ एक राजा था | उसका मंत्री बहुत बुद्धिमान था | एक बार राजा ने अपने मंत्री से प्रश्न किया – “ मंत्री जी! भेड़ों और कुत्तों की पैदा होने कि दर में तो कुत्ते भेड़ों से बहुत आगे हैं, लेकिन भेड़ों के झुंड के झुंड देखने में आते हैं और कुत्ते कहीं-कहीं एक आध ही नजर आते है | इसका क्या कारण हो सकता है ?” मंत्री बोला – “ महाराज! इस प्रश्न का उत्तर आपको कल सुबह मिल जायेगा |” राजा के सामने उसी दिन शाम को मंत्री ने एक कोठे में बिस कुत्ते बंद करवा दिये और उनके बीच रोटियों से भरी एक टोकरी रखवा दी |” दूसरे कोठे में बीस भेड़े बंद करवा दी और चारे की एक टोकरी उनके बीच में रखवा दी | दोनों कोठों को बाहर से बंद करवाकर, वे दोनों लौट गये | सुबह होने पर मंत्री राजा को साथ लेकर वहां आया | उसने पहले कुत्तों वाला कोठा खुलवाया | राजा को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि बीसो कुत्ते आपस में लड़-लड़कर अपनी जान दे चुके हैं और रोटियों की टोकरी ज्यों की त्यों रखी है | कोई कुत्ता एक भी रोटी नहीं खा सका था | इसके पश्चात मंत्री राजा के साथ भेड़ों वाले कोठे में पहुंचा | कोठा खोलने के पश्चात राजा ने देखा कि बीसो भेड़े एक दूसरे के गले पर मुंह रखकर बड़े ही आराम से सो रही थी और उनकी चारे की टोकरी एकदम खाली थी | मंत्री राजा से बोला – “ महाराज! कुत्ते एक भी रोटी नहीं खा सके तथा आपस में लड़-लड़कर मर गये | उधर भेड़ों ने बड़े ही प्रेम से मिलकर चारा खाया और एक दूसरे के गले लगकर सो गयी | यही कारण है, कि भेड़ों के वंश में वृद्धि है | समृद्धि है | उधर कुत्ते हैं, जो एक-दूसरे को सहन नहीं कर सकते | जिस बिरादरी में इतनी घृणा तथा द्वेष होगा | उसकी वृद्धि भला कैसे हो सकती है |” राजा मंत्री की बात से पूरी तरह संतुष्ट हो गया | उसने उसे बहुत-सा पुरस्कार दिया | वह मान गया था, कि आपसी प्रेम तथा भाईचारे से ही वंश वृद्धि होती है | मंत्री ने इस संबंध में राजा को एक कहानी सुनायी – एक बार ब्रह्मा ने देवता तथा असुरों की एक सभा बुलवायी | सभी देवता तथा दानव ब्रह्मा के दरबार में उपस्थित हुये | ब्रह्मा ने वैसे तो दोनों ही समुदाय की बड़ी आवभगत की, लेकिन देवताओं के प्रति उनके मन में अधिक श्रद्धा तथा सम्मान था | दानवों ने इस बात को भाप लिया की, ब्रह्मा के मन में देवताओं के प्रति अधिक मान-सम्मान है | दिखाने के लिए वे बराबर का बर्ताव कर रहे हैं | दानवों ने राजा से कहा – “ ब्रह्मा जी! देखिये आप देवताओं को अधिक महत्व दे रहे हैं | उनके प्रति आपके ह्रदय में अधिक सम्मान है | अगर ऐसा ही है, तो फिर हमें यहां क्यों बुलवाया |” ब्रह्मा ने बहुत समझाया बुझाया; किंतु दानवों का क्रोध कम नहीं हुआ | अब तो ब्रह्मा ने संकल्प लिया कि दानवों को इस बात का बोध कराना ही होगा कि वे देवताओं की बराबरी नहीं कर सकते | ब्रह्मा ने असुरों के राजा से कहा – “ मुझे प्रसन्नता होगी | यदि आप देवताओं के समान बन जाये, उनसे पीछे न रहे |” “ हम तो पहले ही उनसे बहुत आगे हैं |” असुरों के राजा ने अकड़कर कहा | “ बुरा ना माने तो, मैं आपकी परीक्षा ले लूं |” ब्रह्मा ने पूछा | “ ठीक है | हो जाये परीक्षा |” दानवों के राजा ने कहा | रात के भोजन में ब्रह्मा ने देवताओं दानवो सबके हाथों पर उंगलियों तक डंडे बधवा दिये | जिससे दोनों हाथ मूड़ न सके | सबसे पहले ब्रह्मा ने असुरों के आगे लड्डूओ के बड़े-बड़े थाल परोसे और कहा कि “ जो अधिक लड्डू खायेगा | वही श्रेष्ठ होगा |” दानवों ने लड्डू उठा तो लिये; किंतु हाथ में डंडे बंधे होने के कारण वे लड्डूओं को अपने मुंह तक नहीं ले जा सके | यह एक विकट समस्या उत्पन्न हो गयी | बहुत प्रयास करने के पश्चात भी कोई भी दानव लड्डू खाने में सफल नहीं हो सका | सभी उठ गये | अब देवताओं की बारी आयी | उनके हाथ पर भी उसी प्रकार डंडे बांधे गये | उनके हाथ भी मूड नहीं सकते थे | पंक्ति में बैठे सभी देवताओं के सम्मुख लड्डू परोसे गये | देवताओं ने दो-दो जोड़ी बना ली | एक देवता दूसरे देवता को लड्डू खिला रहा था | सभी दानव यह तमाशा देख रहे थे | उन्हें मानना पड़ा कि वास्तव में देवता दानवों से श्रेष्ठ है | राजा को मंत्री की कहानी बहुत पसंद आयी | वह मान गया कि वास्तव में एकता द्वारा कुछ भी कार्य किया जा सकता है..!! जय जय श्री राधे 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (सत्तत्तरवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय उल्का नवमी व्रत का विधान और फल...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अब आप उल्का-नवमी-व्रत के विषय में सुनें। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को नदी में स्नानकर पितृदेवी की विधिपूर्वक अर्चना करे। अनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि से भैरव-प्रिया चामुण्डादेवी की पूजा करे, तदनन्तर इस मन्त्र से हाथ जोड़कर स्तुति करे – महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि। द्रव्यमारोग्यविजयौ देहि देवि नमोऽस्तु ते॥ (उत्तरपर्व ६२ । ५) इसके बाद यथाशक्ति सात, पाँच या एक कुमारी को भोजन कराकर उन्हें नीला कञ्चक, आभूषण, वस्त्र एवं दक्षिणा आदि देकर संतुष्ट करे। श्रद्धा से भगवती प्रसन्न होती हैं। अनन्तर भूमिका अभ्युक्षण करे। तदनन्तर गोबर का चौका लगाकर आसन पर बैठ जाय । सामने पात्र रखकर, जो भी भोजन बना हो सारा परोस ले, फिर एक मुट्ठी तृण और सूखे पत्तों को अनि से प्रज्वलित कर जितने समय तक प्रकाश रहे उतने समय में ही भोजन सम्पन्न कर ले। अग्निनके शान्त होते ही भोजन करना बंद कर आचमन करे। चामुण्डा का हृदय में ध्यानकर प्रसन्नतापूर्वक घर का कार्य करे। इस प्रकार प्रतिमास व्रतकर वर्ष के समाप्त होने पर कुमारी-पूजा करे तथा उन्हें वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि देकर उनसे क्षमा याचना करे । ब्राह्मण को सुवर्ण एवं गौ का दान करे। हे पार्थ! इस प्रकार जो पुरुष उल्का-नवमी का व्रत करता है, उसे शत्रु, अग्नि, राजा, चोर, भूत, प्रेत, पिशाच आदि का भय नहीं होता एवं युद्ध आदि में उसपर शस्त्रों का प्रहार नहीं लगता, देवी चामुण्डा उसकी सर्वत्र रक्षा करती हैं। इस उल्का-नवमी-व्रत को करने वाले पुरुष और स्त्री उल्का की तरह तेजस्वी हो जाते हैं। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथाअष्टादशोऽध्यायः भिन्न-भिन्न वर्षो का वर्णन...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ या तस्य ते पादसरोरुहार्हणं निकामयेत्साखिलकामलम्पटा तदेव रासीप्सितमीप्सितोऽर्चितो यद्भग्नयाच्या भगवन् प्रतप्यते ॥ २१ मत्प्राप्तयेऽजेशसुरासुरादय स्तप्यन्त उग्रं तप ऐन्द्रियेधियः । ऋते भवत्पादपरायणान्न मां विन्दन्त्यहं त्वद्धृदया यतोऽजित ॥ २२ स त्वं ममाप्यच्युत शीर्ष्णि वन्दितं कराम्बुजं यत्त्वदधायि सात्वताम् । बिभर्ष मां लक्ष्म वरेण्य मायया क ईश्वरस्येहितमूहितुं विभुरिति ॥ २३ रम्यके च भगवतः प्रियतमं मात्स्यमवताररूपं तद्वर्षपुरुषस्य मनोः प्राक्प्रदर्शितं स इदानीमपि महता भक्तियोगेनाराधयतीदं चोदाहरति ॥ २४ ॥ ॐ नमो भगवते मुख्यतमाय नमः सत्त्वाय प्राणायौजसे सहसे बलाय महामत्स्याय नम इति ॥ २५ ॥ अन्तर्बहिश्चाखिललोकपालकै दृष्टरूपो विचरस्युरुस्वनः । स ईश्वरस्त्वं य इदं वशेऽनय नाम्ना यथा दारुमयीं नरः स्त्रियम् ॥ २६ यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा हित्वा यतन्तोऽपि पृथक् समेत्य च । पातुं न शेकुर्द्विपदश्चतुष्पदः सरीसृपं स्थाणु यदत्र दृश्यते ॥ २७ भवान् युगान्तार्णव ऊर्मिमालिनि क्षोणीमिमामोषधिवीरुधां निधिम् । मया सहोरु क्रमतेऽज ओजसा तस्मै जगत्प्राणगणात्मने नम इति ॥ २८ हिरण्मयेऽपि? भगवान्निवसति कूर्मतनुं बिभ्राणस्तस्य तत्प्रियतमां तनुमर्यमा सह वर्षपुरुषैः पितृगणाधिपतिरुपधावति मन्त्रमिमं चानुजपति ॥ २९ ॥ ॐ नमो भगवते अकृपाराय सर्वसत्त्वगुणविशेषणायानुपलक्षित स्थानाय नमो वर्ष्मणे नमो भूम्ने नमो नमोऽवस्थानाय नमस्ते ।। ३० ।। श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ भगवन् ! जो स्त्री आपके चरणकमलों का पूजन ही चाहती है, और किसी वस्तु की इच्छा नहीं करती- उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं; किन्तु जो किसी एक कामना को लेकर आपकी उपासना करती है, उसे आप केवल वही वस्तु देते हैं। और जब भोग समाप्त होने पर वह नष्ट हो जाती है तो उसके लिये उसे सन्तप्त होना पड़ता है ॥ २१ ॥ अजित् ! मुझे पाने के लिये इन्द्रिय सुख के अभिलाषी ब्रह्मा और रुद्र आदि समस्त सुरासुरगण घोर तपस्या करते रहते हैं; किन्तु आपके चरणकमलों का आश्रय लेने वाले भक्त के सिवा मुझे कोई पा नहीं सकता; क्योंकि मेरा मन तो आपमें ही लगा रहता है ॥ २२ ॥ अच्युत! आप अपने जिस वन्दनीय करकमल को भक्तों के मस्तक पर रखते हैं, उसे मेरे सिर पर भी रखिये। वरेण्य ! आप मुझे केवल श्रीलाञ्छनरूप से अपने वक्षःस्थल में ही धारण करते हैं; सो आप सर्वसमर्थ हैं, आप अपनी माया से जो लीलाएँ करते हैं, उनका रहस्य कौन जान सकता है ? ॥ २३ ॥ रम्यक वर्ष में भगवान ने वहा के अधिपति मनु का पूर्वकाल में अपना परम प्रिय मत्स्यरूप दिखाया था। मनुजी इस समय भी भगवान्‌ के उसी रूप की बड़े भक्तिभाव से उपासना करते हैं और इस मन्त्र का जप करते हुए स्तुति करते हैं– 'सत्त्वप्रधान मुख्य प्राण सूत्रात्मा तथा मनोबल, इन्द्रियबल और शरीरबल ओङ्कारपद के अर्थ सर्वश्रेष्ठ भगवान् महामत्स्य को बार-बार नमस्कार है' ।। २४-२५ ।। प्रभो! नट जिस प्रकार कठपुतलियों को नचाता है, उसी प्रकार आप ब्राह्मणादि नामों की डोरी से सम्पूर्ण विश्व को अपने अधीन करके नचा रहे हैं। अतः आप ही सबके प्रेरक हैं। आपको ब्रह्मादि लोकपालगण भी नहीं देख सकते; तथापि आप समस्त प्राणियों के भीतर प्राणरूप से और बाहर वायुरूप से निरन्तर सञ्चार करते रहते हैं। वेद ही आप महान् शब्द है ॥ २६ ॥ एक बार इन्द्रादि इन्द्रियाभिमानी देवताओं को प्राणस्वरूप आपसे डाह हुआ। तब आपके अलग हो जाने पर वे अलग-अलग अथवा आपस में मिलकर भी मनुष्य, पशु, स्थावर-जङ्गम आदि जितने शरीर दिखायी देते हैं— उनमें से किसी की बहुत यत्न करने पर भी रक्षा नहीं कर सके ॥ २७ ॥ अजन्मा प्रभो ! आपने मेरे सहित समस्त औषध और लताओं की आश्रयरूपा इस पृथ्वी को लेकर बड़ी-बड़ी उत्ताल तरङ्गों से युक्त प्रलयकालीन समुद्र में बड़े उत्साह से विहार किया था। आप संसार के समस्त प्राणसमुदाय के नियन्ता हैं; मेरा आपको नमस्कार हैं ।। २८ ।। हिरण्मयवर्ष में भगवान् कच्छपरूप धारण करके रहते हैं। वहाँके निवासियों के सहित पितृराज अर्यमा भगवान् की उस प्रियतम मूर्ति की उपासना करते हैं और इस मंत्र को सम्पूर्ण निरन्तर जपते हुए स्तुति करते हैं ॥ २९ ॥ सत्त्वगुण से युक्त हैं, जल में विचरते रहने के कारण जिनके स्थान का कोई निश्चय नहीं है तथा जो काल की मर्यादा के बाहर हैं, उन ओङ्कारस्वरूप सर्वव्यापक सर्वाधार भगवान् कच्छप को बार-बार नमस्कार है' ॥ ३० ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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