Satish Sharma
Satish Sharma Nov 26, 2017

Naubahi Mata Mandir at Teh. Sarkaghat Ditt. Mandi. H. P.

Naubahi Mata Mandir at Teh. Sarkaghat Ditt. Mandi. H. P.

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Ravi Pandey Nov 27, 2017
jai Mata Rani jai shree Krishna radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Je

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Neeta Trivedi Apr 8, 2021

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. देवी माहात्म्य अध्याय - 02 इस अध्याय में:- (देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध) ऋषि कहते हैं- 'पूर्वकाल में देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्षों तक घोर संग्राम हुआ था। उसमें असुरों का स्वामी महिषासुर था और देवताओं के नायक इन्द्र थे। उस युद्ध में देवताओं की सेना महाबली असुरों से परास्त हो गयी। सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर महिषासुर इन्द्र बन बैठा। तब पराजित देवता प्रजापति ब्रह्माजी को आगे करके उस स्थान पर गये, जहाँ भगवान् शंकर और विष्णु विराजमान थे। देवताओं ने महिषासुर के पराक्रम तथा अपनी पराजय का यथावत् वृत्तान्त उन दोनों देवेश्वरों से विस्तार पूर्वक कह सुनाया। वे बोले- 'भगवन्! महिषासुर सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य देवताओं के भी अधिकार छीनकर स्वयं ही सबका अधिष्ठाता बना बैठा है। उस दुरात्मा महिष ने समस्त देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया है। अब वे मनुष्यों की भाँति पृथ्वी पर विचरते हैं। दैत्यों की यह सारी करतूत हमने आप लोगों से कह सुनायी। अब हम आपकी ही शरण में आये हैं। उसके वध का कोई उपाय सोचिये।' इस प्रकार देवताओं के वचन सुनकर भगवान् विष्णु और शिव ने दैत्यों पर बड़ा क्रोध किया। उनकी भौंहें तन गयीं और मुँह टेढ़ा हो गया। तब अत्यन्त कोप में भरे हुए चक्रपाणि श्रीविष्णु के मुख से एक महान् तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा, शंकर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओं के शरीर से भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब मिलकर एक हो गया। महान् तेज का वह पुंज जाज्वल्यमान पर्वत-सा जान पड़ा। देवताओं ने देखा, वहाँ उसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त हो रही थीं। सम्पूर्ण देवताओं के शरीर से प्रकट हुए उस तेज की कहीं तुलना नहीं थी, एकत्रित होने पर वह एक नारी के रूप में परिणत हो गया और अपने प्रकाश से तीनों लोकों में व्याप्त जान पड़ा। भगवान् शंकर का जो तेज था, उससे उस देवी का मुख प्रकट हुआ। यमराज के तेज से उसके सिर में बाल निकल आये। श्रीविष्णुभगवान् के तेज से उसकी भुजाएँ उत्पन्न हुईं। चन्द्रमा के तेज से दोनों स्तनों का और इन्द्र के तेज से मध्यभाग (कटिप्रदेश) का प्रादुर्भाव हुआ। वरुण के तेज से जंघा और पिंडली तथा पृथ्वी के तेज से नितम्बभाग प्रकट हुआ। ब्रह्मा के तेज से दोनों चरण और सूर्य के तेज से उसकी अँगुलियाँ हुईं। वसुओं के तेज से हाथों की अँगुलियाँ और कुबेर के तेज से नासिका प्रकट हुई। उस देवी के दाँत प्रजापति के तेज से और तीनों नेत्र अग्नि के तेज से प्रकट हुए थे। उसकी भौंहें संध्या के और कान वायु के तेज से उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार अन्यान्य देवताओं के तेज से भी उस कल्याणमयी देवी का आविर्भाव हुआ। तदनन्तर समस्त देवताओं के तेज:पुंज से प्रकट हुई देवी को देखकर महिषासुर के सताये हुए देवता बहुत प्रसन्न हुए। पिनाकधारी भगवान् शंकर ने अपने शूल से एक शूल निकालकर उन्हें दिया; फिर भगवान् विष्णु ने भी अपने चक्र से चक्र उत्पन्न करके भगवती को अर्पण किया। वरुण ने भी शंख भेंट किया, अग्नि ने उन्हें शक्ति दी और वायु ने धनुष तथा बाण से भरे हुए दो तरकस प्रदान किये। सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र ने अपने वज्र से वज्र उत्पन्न करके दिया और ऐरावत हाथी से उतारकर एक घण्टा भी प्रदान किया। यमराज ने कालदण्ड से दण्ड, वरुण ने पाश, प्रजापति ने स्फटिकाक्ष की माला तथा ब्रह्माजी ने कमण्डलु भेंट किया। सूर्य ने देवी के समस्त रोम-कूपों में अपनी किरणों का तेज भर दिया। काल ने उन्हें चमकती हुई ढाल और तलवार दी। क्षीरसमुद्र ने उज्ज्वल हार तथा कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ ही उन्होंने दिव्य चूड़ामणि, दो कुण्डल, कड़े, उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सब बाहुओं के लिये केयूर, दोनों चरणों के लिये निर्मल नूपुर, गले की सुन्दर हँसली और सब अँगुलियों में पहनने के लिये रत्नों की बनी अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यन्त निर्मल फरसा भेंट किया। साथ ही अनेक प्रकार के अस्त्र और अभेद्य कवच दिये; इनके सिवा मस्तक और वक्ष:स्थल पर धारण करने के लिये कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की मालाएँ दीं। जलधि ने उन्हें सुन्दर कमल का फूल भेंट किया। हिमालय ने सवारी के लिये सिंह तथा भाँति-भाँति के रत्न समर्पित किये। धनाध्यक्ष कुबेर ने मधु से भरा पान पात्र दिया तथा सम्पूर्ण नागों के राजा शेष ने, जो इस पृथ्वी को धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार भेंट दिया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर देवी का सम्मान किया। तत्पश्चात् उन्होंने बारंबार अट्टहास पूर्वक उच्चस्वर से गर्जना की। उनके भयंकर नाद से सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा। देवी का वह अत्यन्त उच्च स्वर से किया हुआ सिंहनाद कहीं समा न सका, आकाश उसके सामने लघु प्रतीत होने लगा। उससे बड़े जोर की प्रतिध्वनि हुई, जिससे सम्पूर्ण विश्व में हलचल मच गयी और समुद्र काँप उठे। पृथ्वी डोलने लगी और समस्त पर्वत हिलने लगे। उस समय देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्नता के साथ सिंहवाहिनी भवानी से कहा- 'देवि ! तुम्हारी जय हो।' साथ ही महर्षियों ने भक्ति भाव से विनम्र होकर उनका स्तवन किया। सम्पूर्ण त्रिलोकी को क्षोभग्रस्त देख दैत्यगण अपनी समस्त सेना को कवच आदि से सुसज्जित कर, हाथों में हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो गये। उस समय महिषासुर ने बड़े क्रोध में आकर कहा- 'आ:! यह क्या हो रहा है?' फिर वह सम्पूर्ण असुरों से घिरकर उस सिंहनाद की ओर लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने देवी को देखा, जो अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं। उनके चरणों के भार से पृथ्वी दबी जा रही थी। माथे के मुकुट से आकाश में रेखा-सी खिंच रही थी तथा वे अपने धनुष की टंकार से सातों पातालों को क्षुब्ध किये देती थीं। देवी अपनी हजारों भुजाओं से सम्पूर्ण दिशाओं को आच्छादित करके खड़ी थीं। तदनन्तर उनके साथ दैत्यों का युद्ध छिड़ गया। नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से सम्पूर्ण दिशाएँ उद्भासित होने लगीं। चिक्षुर नामक महान् असुर महिषासुर का सेनानायक था। वह देवी के साथ युद्ध करने लगा। अन्य दैत्यों की चतुरंगिणी सेना साथ लेकर चामर भी लड़ने लगा। साठ हजार रथियों के साथ आकर उदग्र नामक महादैत्य ने लोहा लिया। एक करोड़ रथियों को साथ लेकर महाहनु नामक दैत्य युद्ध करने लगा। जिसके रोएँ तलवार के समान तीखे थे, वह असिलोमा नाम का महादैत्य पाँच करोड़ रथी सैनिकों सहित युद्ध में आ डटा। साठ लाख रथियों से घिरा हुआ बाष्कल नामक दैत्य भी उस युद्ध भूमि में लड़ने लगा। परिवारित नामक राक्षस हाथी सवार और घुड़सवारों के अनेक दलों तथा एक करोड़ रथियों की सेना लेकर युद्ध करने लगा। बिडाल नामक दैत्य पाँच अरब रथियों से घिरकर लोहा लेने लगा। इनके अतिरिक्त और भी हजारों महादैत्य रथ, हाथी और घोड़ों की सेना साथ लेकर वहाँ देवी के साथ युद्ध करने लगे। स्वयं महिषासुर उस रणभूमि में कोटि-कोटि सहस्त्र रथ, हाथी और घोड़ों की सेना से घिरा हुआ खड़ा था। वे दैत्य देवी के साथ तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और पट्रिश आदि अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए युद्ध कर रहे थे। कुछ दैत्यों ने उन पर शक्ति का प्रहार किया, कुछ लोगों ने पाश फेंके। तथा कुछ दूसरे दैत्यों ने खड्गप्रहार करके देवी को मार डालने का उद्योग किया। देवी ने भी क्रोध में भरकर खेल-खेल में ही अपने अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करके दैत्यों के वे समस्त अस्त्र-शस्त्र काट डाले। उनके मुख पर परिश्रम या थकावट का रंचमात्र भी चिह्न नहीं था, देवता और ऋषि उनकी स्तुति करते थे और वे भगवती परमेश्वरी दैत्यों के शरीरों पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करती रहीं। देवी का वाहन सिंह भी क्रोध में भरकर गर्दन के बालों को हिलाता हुआ असुरों की सेना में इस प्रकार विचरने लगा, मानो वनों में दावानल फैल रहा हो। रणभूमि में दैत्यों के साथ युद्ध करती हुई अम्बिकादेवी ने जितने नि:श्वास छोड़े, वे सभी तत्काल सैकड़ों-हजारों गणों के रूप में प्रकट हो गये और परशु, भिन्दिपाल, खड्ग तथा पट्टिश आदि अस्त्रों द्वारा असुरों का सामना करने लगे। देवी की शक्ति से बढ़े हुए वे गण असुरों का नाश करते हुए नगाड़ा और शंख आदि बाजे बजाने लगे। उस संग्राम-महोत्सव में कितने ही गण मृदंग बजा रहे थे। तदनन्तर देवी ने त्रिशूल से, गदा से, शक्ति की वर्षा से और खड्ग आदि से सैकड़ों महादैत्यों का संहार कर डाला। कितनों को घण्टे के भयंकर नाद से मूर्च्छित करके मार गिराया। बहुतेरे दैत्यों को पाश से बाँध कर धरती पर घसीटा। कितने ही दैत्य उनकी तीखी तलवार की मार से दो-दो टुकड़े हो गये। कितने ही गदा की चोट से घायल हो धरती पर सो गये कितने ही मूसल की मार से अत्यन्त आहत होकर रक्त वमन करने लगे। कुछ दैत्य शूल से छाती फट जाने के कारण पृथ्वी पर ढेर हो गये। उस रणांगण में बाण समूहों की वृष्टि से कितने ही असुरों की कमर टूट गयी। बाज की तरह झपटने वाले देवपीडक दैत्यगण अपने प्राणों से हाथ धोने लगे। किन्हीं की बाँहें छिन्न-भिन्न हो गयीं। कितनों की गर्दनें कट गयीं। कितने ही दैत्यों के मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। कुछ लोगों के शरीर मध्य भाग में ही विदीर्ण हो गये कितने ही महादैत्य जाँधें कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़े। कितनों को ही देवी ने एक बाँह, एक पैर और एक नेत्र वाले करके दो टुकड़ों में चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट जाने पर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल धड़ के ही रूप में अच्छे-अच्छे हथियार हाथ में ले देवी के साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध युद्ध के बाजों की लय पर नाचते थे। कितने ही बिना सिर के धड़ हाथों में खड्ग, शक्ति और ऋष्टि लिये दौड़ते थे तथा दूसरे-दूसरे महादैत्य 'ठहरो! ठहरो!! ' यह कहते हुए देवी को युद्ध के लिये ललकारते थे। जहाँ वह घोर संग्राम हुआ था, वहाँ की धरती देवी के गिराये हुए रथ, हाथी, घोड़े और असुरों की लाशों से ऐसी पट गयी थी कि वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया था। दैत्यों की सेना में हाथी, घोड़े और असुरों के शरीरों से इतनी अधिक मात्रा में रक्तपात हुआ था कि थोड़ी ही देर में वहाँ खून की बड़ी- बड़ी नदियाँ बहने लगीं। जगदम्बा ने असुरों की विशाल सेना को क्षण भर में नष्ट कर दिया, ठीक उसी तरह, जैसे तृण और काठ के भारी ढेर को आग कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है। और वह सिंह भी गर्दन के बालों को हिला-हिलाकर जोर-जोरसे गर्जना करता हुआ दैत्यों के शरीरों से मानो उनके प्राण चुने लेता था। वहाँ देवी के गणों ने भी उन महादैत्यों के साथ ऐसा युद्ध किया, जिससे आकाश में खड़े हुए देवतागण उन पर बहुत संतुष्ट हुए और फूल बरसाने लगे। इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवी माहात्म्य में 'महिषासुर की सेना का वध' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥२॥ ----------:::×:::---------- "ॐ श्री दुर्गायै नमः" ********************************************* ✴️🌺✴️🌺✴️🌺✴️🌺✴️🌺✴️🌺✴️🌺✴️

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Anuradha Tiwari Apr 10, 2021

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Manoj manu Apr 9, 2021

🚩🏵🌿जय माता दी जय लक्ष्मी मैया 🌹🌺🙏 🌹🌹सुख ,शाँति ,समृद्धि और धन धान्य से परिपूर्ण करता है माँ लक्ष्मी का यह कनकधारा स्त्रोत :- महालक्ष्मी स्तोत्र की रचना श्री शंकराचार्य जी ने की थी।उनके इस स्तुति से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी जी ने स्वर्ण के आँवलों की वर्षा कराई थी इसलिए इसे कनकधारा स्तोत्र कहते हैं।अगर हमारी जन्मपत्रिका में दारिद्र्य योग हैं या जीवन मे लक्ष्मी का अभाव जान पड़ता है तो जरूर इसका प्रयोग करना चाहिए।धन को आकृष्ट करने की इसमें अद्भुत क्षमता है। 🌹🌹कनकधारा स्त्रोत पाठ विधि :- एक चौकी पर लाल या पीले कपड़े पर माँ कनकधारा लक्ष्मी की बैठी हुई प्रतिमा या फोटो लगायें और साथ में एक कनकधारा यंत्र स्थापित करें। रोजाना नियमित रूप से कनकधारा यंत्र के सामने धुप-बत्ती जलाये,और माता का पूजन कर गोघृत के दीपक से करें। अब इस कनकधारा स्तोत्र का नियमित पाठ करें।वैसे 16 पाठ करने को कहा गया है किन्तु एक पाठ जरूर करें। इस यंत्र की विशेषता है कि यह किसी भी प्रकार की विशेष माला, जप, पूजन, विधि-विधान की मांँग नहीं करता बल्कि सिर्फ दिन में एक बार इसको पढ़ना पर्याप्त है। 🌹🌹स्तोत्रअङ्गं हरे: पुलकभूषणमाश्रयन्तीभृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम्अंगीकृताखिलविभूतिरपांगलीलामांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया: ।।1। 🌹🌹मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे:प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि । माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले यासा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवाया:।।2।। 🌹🌹विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष –मानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोsपि। ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध –मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिराया:।।3।। 🌹🌹आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द –मानन्दकन्दमनिमेषमनंगतन्त्रम्आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रंभूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांनाया:।।4।। 🌹🌹बाह्वन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभे याहारावलीव हरिनीलमयी विभाति। कामप्रदा भगवतोsपि कटाक्षमालाकल्याणमावहतु मे कमलालयाया:।।5।। 🌹🌹कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारे –र्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव । मातु: समस्तजगतां महनीयमूर्त्ति –र्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।। 🌹🌹प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन । 🌹🌹मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धंमन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।। 🌹🌹दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा –मस्मिन्नकिंचनविहंगशिशौ विषण्णे। दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरंनारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह:।।8।। 🌹🌹इष्टा विशिष्टमतयोsपि यया दयार्द्र –दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते। दृष्टि: प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टांपुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया:।।9।। 🌹🌹गीर्देवतेति गरुड़ध्वजसुन्दरीतिशाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति। सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायैतस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै।।10।। 🌹🌹श्रुत्यै नमोsस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यैरत्यै नमोsस्तु रमणीयगुणार्णवायै। 🌹🌹शक्त्यै नमोsस्तु शतपत्रनिकेतनायैपुष्ट्यै नमोsस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै।।11।। नमोsस्तु नालीकनिभाननायैनमोsस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै। नमोsस्तु सोमामृतसोदरायैनमोsस्तु नारायणवल्लभायै।।12।। 🌹🌹नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायैनमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै । नमोऽस्तु देवादिदयापरायैनमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै।।13।। 🌹🌹नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायैनमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै । नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायैनमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै।।14।। 🌹🌹नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायैनमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै । नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायैनमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै।।15।। 🌹🌹सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानिसाम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि। त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानिमामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये।।16।। 🌹🌹यत्कटाक्षसमुपासनाविधि:सेवकस्य सकलार्थसम्पद:। संतनोति वचनांगमानसै –स्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।17।। 🌹🌹सरसिजनिलये सरोजहस्तेधवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे। भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञेत्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।।18।। 🌹🌹दिग्घस्तिभि: कनककुम्भमुखावसृष्ट –स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुतांगीम् । प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष –लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ।।19।। 🌹🌹कमले कमलाक्षवल्लभेत्वं करुणापूरतरंगितैरपांगै:। अवलोकय मामकिंचनानांप्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया:।।20।। 🌹🌹देवि प्रसीद जगदीश्वरि लोकमातःकल्याणगात्रि कमलेक्षणजीवनाथे । दारिद्र्यभीतिहृदयं शरणागतं माम्आलोकय प्रतिदिनं सदयैरपाङ्गैः।।21। 🌹🌹स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहंत्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् । गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनोभवन्ति ते भुवि बुधभाविताशया:।।22।।।। इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं कनकधारास्तोत्रं सम्पूर्णम्।। 🌹🌿🌹🌿माता लक्ष्मी जी सभी का सदा कल्याण करें सदा मंगल प्रदान करें जय माता दी 🌹🌿🌹🌿🙏

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🙏जय माता दी 🌹🙏 नमक के जैसा बनाइये अपना व्यक्तित्व,* *आपकी उपस्थिति* *भले ही पता न चले ...* *पर अनुपस्थिति का अवश्य* *अहेसास हो* ⛳⛳🙏माता वैष्णो देवी की कथा🙏⛳⛳ माता वैष्णो देवी से जुड़ी कई कथाएं हैं, पर जो कथा सबसे अधि‍क प्रचलित है. वैष्णो देवी ने अपने एक परम भक्त पंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई. माता ने पूरे जगत को अपनी महिमा का बोध कराया. तब से आज तक लोग इस तीर्थस्थल की यात्रा करते हैं और माता की कृपा पाते हैं. कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे. वे नि:संतान होने से दु:खी रहते थे. एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुंवारी कन्याओं को बुलवाया. मां वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं. पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गईं, पर मां वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं, ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ.’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस-पास के गांवों में भंडारे का संदेश पहुंचा दिया. वहां से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया. भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है, जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए जमा हुए. तब कन्या रूपी मां वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया. भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई, तब उसने कहा कि मैं तो खीर- पूड़ी की जगह मांस खाऊंगा और मदिरापान करूंगा. तब कन्या रूपी मां ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता. किंतु भैरवनाथ ने जान-बूझकर अपनी बात पर अड़ा रहा. जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकड़ना चाहा, तब मां ने उसके कपट को जान लिया. मां वायु रूप में बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चलीं. भैरवनाथ भी उनके पीछे गया. माना जाता है कि मां की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे. हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए. आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है. इसके पवित्र जल को पीने या इसमें स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं. इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की. भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया. तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे. भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी. तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं. यह गुफा आज भी अर्द्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है. अर्द्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है. यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था. गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया. माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा. फिर भी वह नहीं माना. माता गुफा के भीतर चली गईं. तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी गुफा के बाहर थे और उन्होंने भैरवनाथ से युद्ध किया. भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी. जब वीर लंगूर निढाल होने लगा, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया. भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा. उस स्थान को भैंरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है. जिस स्थान पर मां वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा अथवा भवन के नाम से प्रसिद्ध है. इसी स्थान पर मां महाकाली (दाएं), मां महासरस्वती (मध्य) और मां महालक्ष्मी (बाएं) पिंडी के रूप में गुफा में विराजमान हैं. इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही मां वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है. कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल पश्चाताप हुआ और उसने मां से क्षमादान की भीख मांगी. माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी. उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त, मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा. उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद करीब पौने तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई करके भैरवनाथ के दर्शन करने जाते हैं. इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं. इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए. वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफा के द्वार पर पहुंचे. उन्होंने कई विधियों से पिंडों की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली. देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं. वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया. तब से श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं. आज भी बारहों मास वैष्णो देवी के दरबार में भक्तों का तांता लगा रहता है. सच्चे मन से याद करने पर माता सबका बेड़ा पार लगाती हैं. !! जय माता दी!! माता गंगा गोमती माता यमुना नीर माता पर्वत चोटिया मां मन की गंभीर ⛳⛳!!जय माता दी!!⛳⛳

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