Shri Hari Charcha

Audio - Shri Hari Charcha

​श्रीहरिचर्चा​

17 नवम्बर , 2017 (शुक्रवार)

​आज का विषय​

" जो सुख होत गोपालहि गाये।"
-- भक्त सूरदास जी
​(भाग -1)​
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Jai shri krishna

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कामेंट्स

Manakchand Brala Nov 18, 2017
जय श्री राम जय श्री शनिदेव सुप्रभात

Soni Mishra Jan 16, 2021

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Shakti Jan 16, 2021

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प्रथमं वक्रतुंण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम । तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम ।।2।। लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च । सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम ।।3।। नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु गजाननम । एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम ।।4।। 1. वक्रतुंड- मद्रास राज्य में कन्नूर के पास 2. एकदंत- पश्चिम बंगाल में कोलकाता के पास 3. कृष्णपिंगनक्षन- मद्रास राज्य में कन्याकुमारी के पास 4. गजवक्त्र- उड़ीसा राज्य के भुवनेश्वर में 5. लम्बोदर- दो स्थानों का उल्लेख है। रत्नागिरी जिले में गणपति पुले मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास पंचमुखी गणपति 6. विकट- हिमालय में हिमालय के तल पर 7. विघ्नराजेंद्र- कुरु क्षेत्र में कौरव- पांडवों के युद्ध के मैदान के पास 8. धूम्रवर्ण - केरल राज्य के कालीकट के पास और ल्हासा से 15 मील दूर तिब्बत में एक जगह है 9. भालचंद्र- रामेश्वर के पास धनुषकोडि में मद्रास राज्य 10. विनायक- काशी क्षेत्र में अन्नपूर्णा मंदिर के पास धुंडीराज गणेश 11. गणपति- क्षिप्रा गोकरन महाबलेश्वर में द्विध्रुवीय महागणपति 12. गजानन- हिमालय के अंतिम तीर्थ स्थल पांडुकसर में मुंडकटा गणेश। गौरी कुंड के पास स्थित यह गणेश प्रतिमा शिव से रहित है। यही सभी गणेश जी के स्थान हनुमान जी के भक्त ब्रम्हचारी श्री संत रामदास स्वामी जी ने खोज निकाले हुये हैं नमस्कार शुभप्रभात वंदन जय हो 🌅 गणेश जी विनायक चतुर्थी की सभी भक्तों को हार्दिक शुभकामना ये जय श्री राम जय श्री हनुमान जी जय श्री शनि देव महाराज नमस्कार शुभ शनिवार शुभ विनायक चतुर्थी 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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. दिनांक 14.01.2021 गुरुवार को भगवान् सूर्यदेव प्रातः 08:14:01 (दिल्ली) पर मकर राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। इस दिन को सम्पूर्ण भारतवर्ष में अलग-अलग नामों के साथ, अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। जिनमें सबसे प्रचलित है:- . "मकर संक्रान्ति" सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रान्ति कहते हैं। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति के बीच का समय ही सौर मास है। वैसे तो सूर्य संक्रान्ति 12 हैं, लेकिन इनमें से चार संक्रान्ति महत्वपूर्ण हैं जिनमें मेष, कर्क, तुला, और मकर। सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश का नाम ही मकर संक्रान्ति है। धनु राशि बृहस्पति की राशि है। इसमें सूर्य के रहने पर मलमास होता है। इस राशि से मकर राशि में प्रवेश करते ही मलमास समाप्त होता है और शुभ मांगलिक कार्य हम प्रारंभ करते हैं। इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है। मकर संक्रान्ति के दिन पूर्वजों को तर्पण और तीर्थ स्नान का अपना विशेष महत्व है। इससे देव और पितृ सभी संतुष्ट रहते हैं। सूर्य पूजा से और दान से सूर्य देव की रश्मियों का शुभ प्रभाव मिलता है और अशुभ प्रभाव नष्ट होता है। इस दिन स्नान करते समय स्नान के जल में तिल, आंवला, गंगा जल डालकर स्नान करने से शुभ फल प्राप्त होता है। मकर संक्रान्ति का दूसरा नाम उत्तरायण भी है क्योंकि इसी दिन से सूर्य उत्तर की तरफ चलना प्रारंभ करते हैं। उत्तरायण के इन छः महीनों में सूर्य के मकर से मिथुन राशि में भ्रमण करने पर दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं। इस दिन विशेषतः तिल और गुड़ का दान किया जाता है। इसके अलावा खिचड़ी, तेल से बने भोज्य पदार्थ भी किसी गरीब ब्राह्मण को खिलाना चाहिए। छाता, कंबल, जूता, चप्पल, वस्त्र आदि का दान भी किसी असहाय या जरूरत मंद व्यक्ति को करना चाहिए। राजा सागर के 60,000 पुत्रों को कपिल मुनि ने किसी बात पर क्रोधित होकर भस्म कर दिया था। इसके पश्चात् इन्हें मुक्ति दिलाने के लिए गंगा अवतरण का प्रयास प्रारंभ हुआ! इसी क्रम में राजा भागीरथ ने अपनी तपस्या से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया। स्वर्ग से उतरने में गंगा का वेग अति तीव्र था इसलिए शिवजी ने इन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। फिर शिव ने अपनी जटा में से एक धारा को मुक्त किया। अब भागीरथ उनके आगे-आगे और गंगा उनके पीछे-पीछे चलने लगी। इस प्रकार गंगा गंगोत्री से प्रारंभ होकर हरिद्वार, प्रयाग होते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुँचीं यहां आकर सागर पुत्रों का उद्धार किया। यही आश्रम अब गंगा सागर तीर्थ के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही राजा भागीरथ ने अपने पुरखों का तर्पण कर तीर्थ स्नान किया था। इसी कारण गंगा सागर में मकर संक्रान्ति के दिन स्नान और दर्शन को मोक्षदायक माना है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान था इसीलिए उन्होंने शर-शैय्या पर लेटे हुए दक्षिेणायन के बीतने का इंतजार किया और उत्तरायण में अपनी देह का त्याग किया। उत्तरायण काल में ही सभी देवी-देवताओं की प्राण प्रतिष्ठा शुभ मानी जाती है। धर्म-सिंधु के अनुसार-मकर संक्रान्ति का पुण्य काल संक्रान्ति समय से 16 घटी पहले और 40 घटी बाद तक माना गया है। मुहूर्त चिंतामणि ने पूर्व और पश्चात् की 16 घटियों को ही पुण्य काल माना है। भारतीयों का प्रमुख पर्व मकर संक्रान्ति अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों में वहाँ की परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। इसी दिन से अलग-अलग राज्यों में गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है। कुंभ के पहले स्नान की शुरुआत भी इसी दिन से होती है। मकर संक्रान्ति त्योहार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। #उत्तर प्रदेश : मकर संक्रान्ति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है। सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है। #गुजरात और #राजस्थान : उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है। पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है। #आंध्रप्रदेश : संक्रान्ति के नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है। #तमिलनाडु : किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। घी में दाल-चावल की खिचड़ी पकाई और खिलाई जाती है। #महाराष्ट्र : लोग गजक और तिल के लड्डू खाते हैं और एक दूसरे को भेंट देकर शुभकामनाएं देते हैं। #पश्चिमबंगाल : हुगली नदी पर गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है। #असम: भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है। #पंजाब : एक दिन पूर्व लोहड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। धूमधाम के साथ समारोहों का आयोजन किया जाता है। मकर संक्रान्ति मुहूर्त दिल्ली के लिए पुण्य काल मुहूर्त : 08:03:07 से 12:30:00 तक अवधि: 04 घंटे 26 मिनट महापुण्य काल मुहूर्त : 08:03:07 से 08:27:07 तक अवधि : 0 घंटे 24 मिनट ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" *********************************************

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Soni Mishra Jan 16, 2021

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Bantinewspaper Jan 14, 2021

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जय श्री गुरुदेव 👣 💐 👏 🚩 नमस्कार 🙏 शुभ रात्री वंदन सदगुरुंना शरण का जावे ?  सदगुरुंना शरण का जावे ?  ते यासाठी की, सदगुरुंनी जे जाणले ते गम्य, तो सहज आकलन न होणारा आनंद गुरुकृपेने खर्‍या शिष्याला लाभतो. एकनाथ महाराज म्हणतात, गुरुंचा अशा दृष्टीने लाभलेला उपदेश  शिष्याला व्दंव्दात बांधु  शकत नाही.                    अदृष्टें देहीं वर्ततां देख । बाधूं न शके सुखासुख ।            हें गुरुगम्य अलोलिक । शिष्य श्रध्दिक पावती ॥ अदृष्ट म्हणजे जे नजरेत येत नाही. प्रारब्ध मनुष्याचे दृष्टीत येत नाही म्हणून त्याला संत अदृष्ट म्हणतात. नाथ माऊली म्हणतात, सदगुरु उपदेश करतात की, प्रारब्धाला स्वीकारले तर सुखासुख म्हणजे सुख व असुख म्हणजे दुःख मनुष्याला बांधु शकत नाहीत. जीवनात सुख व दुःख येणारच.  सुख दुःख आहे त्याचे नांवच संसार आहे. कधी सुख येते कधी दुख येते. ते अपरिहार्य आहे. दिवस व रात्र आळीपाळीने यावी तसे सुख दुःख येत राहतात. पण मनुष्य सुख मिळाले की अनंदीत होतो व दुःख आले की मनात कष्टी होतो. परंतु तुम्ही ते स्वीकारा, हे गुरुगम्य, हा गुरु उपदेश तुम्ही जाणला तर त्याचे अलौकिकत्व कळेल. पण हे तेव्हाच कळते जेव्हां शिष्य श्रध्दावान असेल. श्रध्दा असेल तरच गुरुगम्य जे आहे जाणले जाऊ शकते.  गुरुगम्य ज्याने जाणले त्याला सुख दुःख बाधु शकत नाहीत. गुरु जाणतात की, प्रारब्ध तर ब्रह्मज्ञान्यालाही चुकले नाही.         एकनाथ महाराज म्हणतात,          जरी झाले ब्रह्मज्ञान तरी ब्रह्मज्ञान्यालाही प्रारब्ध सुटत नाही. कारण मनुष्यानेच कर्मांना दिलेल्या गतीचा  प्रारब्ध परिणाम आहे. जसे कुलाल म्हणजे कुंभार चाकाला गती देतो व त्या चाकावर मातीचे भांडे हाताने आकार देवून तयार करतो व तयार झाले की उचलून घेतो. परंतु चाकाला जी गती दिली ती भांडे तयार झाले तरी थांबत नाही.  तसेच मोठे झाड जर मुळासकट उन्मळून पडले तरी क्षणात सुकत नाही. कारण झाडात जी अनेक वर्षाची संचित आर्द्रता आहे ती कायम राहते. तेव्हा गुरु उपदेश हाच असतो की, आलेल्या सुख दुःखाचे गतीला पहा, त्या चक्राला अजून गती देऊ नका. म्हणजे चक्र थांबेल. झाड सुकविण्याची घाई करु नका, तुम्ही पहा ते सुकेल. प्रारब्धाचे तसेच आहे. आपण सायकलला पॅडल मारले की, पॅडलने जी गती दिली तेवढी सायकल चालणार. म्हणून प्रारब्धाची असलेली गती थांबेपर्यंत शांत चित्ताने पाहणे जरुरी आहे. साधु संतांवर वा  विवेकवंतावर भोग आले तर ते स्वतःठायी असलेल्या शांतील धरुन वागतात. हा बोध  गुरुगम्य आहे.             श्रध्देवीण सर्वथा । गुरुगम्य न ये हाता           गुरुगम्येंवीण तत्त्वतां । द्वंद्वसमता कदा न घडे ॥ शिष्याचे मनात, भक्ताचे मनात श्रध्दा नसेल तर गुरुने दिलेला बोध हाती येत नाही, अर्थात कळत नाही.  जर बोध झाला नाही तर सुख दुःखामध्ये समतेचा,  सुख दुःखाचे स्थितीत स्थिर राहण्याची स्थिती कधीही घडून येणे नाही. म्हणून सदगुरु चरणी लागून गुरुगम्य जाणावे.           अनंतकोटी ब्रह्मांडनायक  महाराजाधिराज योगीराज परब्रह्म सच्चिदानंद समर्थ सदगुरू श्री गजानन महाराज की जय ! दत्तात्रेय महामंत्र-  'दिगंबरा-दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' बीज मंत्र  ॐ द्रां। दत्त गायत्री मंत्र 'ॐ दिगंबराय विद्महे योगीश्वराय धीमही तन्नो दत: प्रचोदयात' सदगुरु श्री एकनाथ महाराजांना श्रध्दा नमन !🙏🚩

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!! प्रारंभ !! 〰️🔸〰️ एक पुरानी कथा का स्मरण आता है, कि एक फकीर सत्य की खोज में था। उसने अपने गुरु से पूछा, कि सत्य कहां मिलेगा? उसके गुरु ने कहा, सत्य? सत्य वहां मिलेगा, जहां दुनिया का अंत होता है। तो उस दिन से वह फकीर दुनिया का अंत खोजने निकल गया। कहानी बड़ी मधुर है। वर्षों चलने के बाद, भटकने के बाद, आखिर उस जगह पहुंच गया, जहां आखिरी गांव समाप्त हो जाता है, तो उसने गांव के लोगों से पूछा कि दुनिया का अंत कितनी दूर है? उन्होंने कहा, ज्यादा दूर नहीं है। बस यह आखिरी गांव है। थोड़ी ही दूर जाकर वह पत्थर लगा है, जिस पर लिखा है कि यहां दुनिया समाप्त होती है। लेकिन गांव के लोगों ने यह भी कहा कि उधर जाओ मत, खतरा बहुत है वहां। वह फकीर हंसा। उसने कहा, हम उसी की तो खोज में निकले हैं। लोगों ने कहा, वहां बहुत भयभीत हो जाओगे। जहां दुनिया अंत होती है, उस गङ्ढ को तुम देख न सकोगे। मगर फकीर तो उसी की खोज में था, सारा जीवन गंवा दिया था। उसने कहा, हम तो उसी की खोज में हैं और गुरु ने कहा है, जब तक दुनिया के अंत को न पा लोगे, तब तक सत्य न मिलेगा। तो जाना ही पड़ेगा। कहते हैं, फकीर गया। गांव के लोगों की उसने सुनी नहीं। वह उस जगह पहुंच गया जहां आखिरी तख्ती लगी थी, कि यहां दुनिया समाप्त होती है। उसने एक आंख भरकर उस जगह को देखा, शून्य था वहां। कोई तलहटी न थी उस खड्ड में। आगे कुछ था ही नहीं। आप उसकी घबराहट समझ सकते हो। वह जो लौटकर भागा, तो जो यह यात्रा उसने पूरे जनम में पूरी की थी, वह कहते हैं, कि वापिसी में कुछ ही दिनों में पूरी हो गई। वह जो भागा, तो रुका ही नहीं। वह जाकर गुरु के चरणों में ही गिरा। तब भी वह कांप रहा था। तब भी वह बोल नहीं पा रहा था। बामुश्किल, उसको गुरु ने पूछा कि मामला क्या है? हुआ क्या? असल में वह फकीर गूंगे जैसा हो गया था। सिर्फ इशारा करता था पीछे की तरफ, क्योंकि जो देखा था,ल वह बहुत घबराने वाला था। गुरु ने कहा, नासमझ; मैं समझ गया! लगता है, तू दुनिया के अंत तक पहुंच गया था और तुझे तख्ती मिली होगी जिस पर लिखा होगा कि यहां दुनिया का अंत होता है? उसने कहा, कि बिलकुल ठीक, मिली थी वह तख्ती। तो तूने दूसरी तरफ तख्ती के देखा कि क्या लिखा था? उसने कहा कि दूसरी तरफ? उस तरफ खाली शून्य था। मैं तो उस खड्ड देखकर एक आंख और जो भागा हूं तो रुका ही नहीं कहीं। पानी के लिए भी नहीं, भूख के लिए भी नहीं। उस तरफ तो मैंने नहीं देखा, हिम्मत ही नहीं हुई। उसने कहा, बस, वही तो भूल हो गई। अगर तू दूसरी तरफ तख्ती के देख लेता, तो जहां इस तरफ लिखा था कि यहां दुनिया का अंत होता है तो उस दूसरी तरफ लिखा होगा कि यहां से परमात्मा का प्रारंभ होता है। असल में एक सीमा पूरी होती है तब दूसरी सीमा शुरू होती है। परमात्मा निराकार है। शून्य में उसी निराकार के करीब आप पहुंचोगे। यह कहानी बड़ी अच्छी है, बड़ी कीमती है। ऐसा दुनिया में कहीं है नहीं। निकल मत जाना खोजने उस जगह को जहां तख्ती लगी हो। असल में यह भीतर की बात है। जहां दुनिया समाप्त होती है, इसका मतलब, जहां राग-रंग समाप्त होता है, जहां दुनिया समाप्त होती है, इसका मतलब, जहां जीवन का खेल--खिलौने समाप्त होते हैं, आखिरी पड़ाव आ जाता है। देख लिया सब, जान लिया सब, हो गया दो कौड़ी का, कुछ सार न पाया। सब बुदबुदे टूट गए, फूट गए, सब रंग बेरंग हो गए। दुनिया के अंत होने का अर्थ है, जहां वासना समाप्त हो गई। वासना ही दुनिया है। महत्वाकांक्षा का विस्तार ही संसार है। लेकिन वहां आते ही घबड़ाहट होगी। क्योंकि वहां फिर शून्य साक्षात खड़ा हो जाता है। जहां महत्वाकांक्षा मिटती है, वहां शून्य रह जाता है। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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