आज का सुविचार

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कामेंट्स

🌲💜राजकुमार राठोड💜🌲 Apr 15, 2019
🙏जय श्री हरि 🙏 🙏जय भोलेनाथ🙏 🙏💙जय माता दी💙🙏 #Զเधे_Զเधे ..जी.🌹🌹🌹 ❇️ 🚩जय_श्री_कृष्णा🚩❇️ 🅹

matalalratod Apr 15, 2019
ओम नमः शिवाय हर हर महादेव

Gourishankar Aharwal Apr 15, 2019
बहुत बढ़िया पोस्ट धन्यवाद नमस्कार जय माता की

💕Arjun Tiwari Ulhasnagar(MR) Apr 15, 2019
🌹हर हर महादेव जी🌹 💓इतनी कृपा तू हम पर बनाये रखना🌹जो रास्ता सही हो🌹उस पर चलाये रखना🌹दिल ना दुखे🌹 किसी का इस जग में अपने 🌹 कारण🌹ऐसी कृपा प्रभु सदा ही बनाये रखना🌹शुभ प्रभात🌹🌹जय श्रीराम जी नमस्कार🌹

Swami Lokeshanand May 20, 2019

माया, ईश्वर और जीव के संबंध में बहुत विवाद है, कोई त्रैतवादी तीनों की सत्ता स्वीकार करते हैं, कोई द्वैतवादी जीव और ब्रह्म को अनादि मानते हैं, तो अद्वैत कहता है "जीवो ब्रह्मैव ना परा:" माने ब्रह्म ही है। "माया ईस न आपु कहुँ जान कहिय सो जीव" स्वामी राजेश्वरानंद जी कहते हैं कि तुलसीदास जी के लिखे इस दोहे का अर्थ निष्ठा भेद से भिन्न भिन्न लिया गया है। त्रैतवादी बोले, जो न माया को जाने, न ईश्वर को, न अपने को, वह जीव है। माने तीनों भिन्न हैं। द्वैतवादियों ने कहा, जो माया के ईश, माने मायापति ईश्वर को न जाने, अपने को भी न जाने, वह जीव है। ऐसे ही रामानुजाचार्य कहते हैं कि जैसे हाथ शरीर से अलग नहीं है, पर हाथ शरीर नहीं है, जीव ब्रह्म से अलग नहीं है, पर जीव ब्रह्म नहीं है, ऐसा अंगअंगी न्याय है। लोकेशानन्द का अनुभव कहता है कि जो अपने को मायापति न जाने वह जीव है। है तो ईश्वर ही, पर स्वरूप की विस्मृति हो गई है, अजन्मा अविनाशी अपने को, अपने में कल्पित, मरणधर्मा देह मानने लगा है, इसीलिए जीव कहला भर रहा है, है नहीं, है तो ब्रह्म ही। बात एक ही है, जैसे कहो कि सब सोने का है, सबमें सोना है या सब सोना है, ऐसे ही, सब परमात्मा का है, सबमें परमात्मा है या सब परमात्मा है, कोई भेद नहीं है। शंकराचार्य भगवान स्पष्ट करते हैं, परमात्मा ही जगत का निमित्त-उपादान कारण है, सर्परज्जुवत् जगत का सर्वाधिष्ठान होने से, ब्रह्म ही है, अद्वैत ही है। यही हनुमानजी भी रामजी से कहते हैं, देहदृष्टि से आप स्वामी हैं, मैं दास हूँ। जीव दृष्टि से आप अंशी हैं, मैं अंश हूँ। और आत्म दृष्टि से जो आप हैं, वही मैं हूँ।

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Aechana Mishra May 20, 2019

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Aechana Mishra May 20, 2019

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Aechana Mishra May 20, 2019

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निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय,,, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे स्वभाव,, ज्ञानी पुरुष और निंदा एक व्यापारी एक नया व्यवसाय शुरू करने जा रहा था लेकिन आर्थिक रूप से मजबूत ना होने के कारण उसे एक हिस्सेदार की जरुरत थी| कुछ ही दिनों में उसे एक अनजान आदमी मिला और वह हिस्स्सेदार बनने को तैयार हो गया| व्यापारी को उसके बारे में ज्यादा कुछ मालुम नहीं था| अत: पहले वह हिस्सेदार बनाने से डर रहा था किन्तु थोड़ी पूछताछ करने के बाद उसने उस आदमी के बारें में विचार करना शुरू किया| एक दो दिन बीतने के पश्चात् व्यापारी को उसका एक मित्र मिला जो की बहुत ज्ञानी पुरुष था| हाल समाचार पूछने के बाद व्यापारी ने उस आदमी के बारें में अपने मित्र को बताया और अपना हिस्सेदार बनाने के बारें में पूछा| उसका मित्र उस आदमी को पहले से ही जानता था जो की बहुत कपटी पुरुष था वह लोगो के साथ हिस्सेदारी करता फिर उन्हें धोखा देता था| चूँकि उसका मित्र एक ज्ञानी पुरुष था| अत: उसने सोचा दूसरों की निंदा नहीं करनी चाहिए और उसने व्यापारी से कहा -" वह एक ऐसा व्यक्ति है जो आसानी से तुम्हारा विश्वास जीत लेगा|" यह सुनने के बाद व्यापारी ने उस आदमी को अपना हिस्सेदार बना लिया| दोनों ने काफी दिन तक मेहनत की और बाद में जब मुनाफे की बात आयी तो वह पूरा माल लेकर चम्पत हो गया| इस पर व्यापारी को बहुत दुःख हुआ | वह अपने मित्र से मिला और उसने सारी बात बतायी और उसके ऊपर बहुत गुस्सा हुआ इस पर उसके मित्र ने कहा मैं ठहरा शास्त्रों का ज्ञाता मैं कैसे निंदा कर सकता हूँ | व्यापारी बोला- वाह मित्र ! तुम्हारे ज्ञान ने तो मेरी लुटिया डुबो दी यदि आप के ज्ञान से किसी का अहित होता है तो किसी काम का नहीं है,, संक्षेप में,,,, अगर आपका ज्ञान किसी का अहित करता है तो फिर उस ज्ञान का कोई मतलब नहीं है,, हर हर महादेव जय शिव शंकर

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Aechana Mishra May 20, 2019

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