VijayKumar Bhatia
VijayKumar Bhatia Aug 9, 2017

Shri ram darbar gadhi Shri bawa lalji karmo deori asr. pb.

Shri ram darbar gadhi Shri bawa lalji karmo deori asr. pb.

#श्रीराम

+280 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 11 शेयर

कामेंट्स

आकाश May 22, 2019

+11 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Rajendra Gahlot May 22, 2019

+8 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 6 शेयर
Sita Agarwal May 22, 2019

+7 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 0 शेयर
kiran May 22, 2019

+116 प्रतिक्रिया 11 कॉमेंट्स • 18 शेयर

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 5 शेयर

+9 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 5 शेयर

महर्षि #दधीचि: महर्षि अथर्व पुत्र व पितृश्रेष्ठ पिप्पलाद शिव-अवतार..🍃🍃 भारत की रत्नगर्भा भूमि अवतारों की भूमि है। यह अपनी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत के लिए सारे संसार में प्रसिद्ध है। यहां स्वयं भगवान अवतार लेते हैं। देवभूमि भारत ऋषियों-महर्षियों की पुण्य स्थली है। इनका तप, तपस्या, अनुसंधान, त्याग, प्रेम, लोकहित की साधना में ही समर्पित रहा है। इस विशाल मणिमाला में महर्षि दधीचि का प्रमुख स्थान है, जिन्होंने विश्व के कल्याण हेतु अपने शरीर का भी बलिदान किया। महर्षि दधीचि वेदों में अथर्व वेद के रचयिता महर्षि अथर्व व भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि कर्दम की पुत्री शांति 'चित्ति' के पुत्र थे। यास्क के मतानुसार दधीचि की माता 'चित्ति' और पिता 'अथर्वा' थे, इसीलिए इनका नाम 'दधीचि' था। अन्य पुराणानुसार यह शुक्राचार्य के पुत्र थे। सारे संसार में यक्षों की प्रथा चलाने-वाले ऋषि अथर्वा ही थे। इन्हें भगवान ब्रह्मा का पुत्र भी कहा जाता है जो अग्नि को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए थे। #अथर्ववेद के रचियता श्री ऋषि #अथर्व हैं इसकी प्रमाणिकता स्वयं महादेव शिव ने की है, कि ऋषि अथर्व पिछले जन्म में एक असुर हरिन्य थे। प्रलय काल में जब ब्रह्मा निद्रा में थे तो उनके मुख से वेद निकल रहे थे तो असुर हरिन्य ने ब्रम्ह लोक जाकर वेदपान कर लिया था, यह देखकर देवताओं ने हरिन्य की हत्या करने की सोची। हरिन्य ने डरकर भगवान् महादेव की शरण ली, भगवन महादेव ने उन्हें अगले जन्म में ऋषि अथर्व बनकर एक नए वेद को लिखने का वरदान दिया था, इसी कारण अथर्ववेद के रचियता श्री ऋषि अथर्व हुए। अनेक विद्वानों का मत है कि अथर्ववेद के रचियता ऋषि अंगिरा हैं। यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः। निवसत्यपि तद्राराष्ट्रं वर्धतेनिरुपद्रवम्।। (अथर्व०-१/३२/३)। महर्षि अथर्व विवाह कुल:: स्वयंभू मनु एवं सतरूपा की एक पुत्री थी थी नाम था देवहुति और उनके चार पुत्र थे- आहुति, प्रस्तुति, प्रियव्रत एवं उत्तानपाद। देवहुति का विवाह कर्दम ऋषि से हुआ जिनसे नौ पुत्री एवं एक पुत्र कपिल मुनि हुए। कर्दम ऋषि की नौ पुत्रियों का विवाह, आर्यावर्त के समकालीन सर्वश्रेष्ट ऋषि मुनियों से हुआ। जिनके वंशजो ने आगे चलकर आर्यावर्त में आर्यों के इतिहास का निर्माण किया। इसी वंश के अगस्त्य ऋषि ने वृहत्तर आर्यावर्त को आयाम दिया जिसकी सीमा विन्ध्याचल पर्वत को लाँघ कर द्रविण देश होते समुद्र पर बाली - जावा से लेकर श्याम तक फैली थी। आज भी कृतग्य आर्य पित्रपक्ष का प्रथम तर्पण ऋषि अगस्त्य को ही अर्पित करता है। #कर्दम ऋषि की पुत्रियों का विवाह : - १.प्रथम पुत्री कला का विवाह मरीचि ऋषि से हुआ जिनके पुत्र कश्यप ऋषि हुए। २. द्वितीय पुत्री अनसूया का विवाह अत्री ऋषि से हुआ जिनके तीन पुत्र हुए - दुत्तामेय,दुर्वासा और चन्द्रमा। ३. तृतीय पुत्री श्रृद्धा का विवाह अंगीरा ऋषि से हुआ जिनके दो पुत्र उत्ति एवं बृहस्पति और चार पुत्रिया हुई। ४. च्चातुर्थ पुत्री हविर्भू का विवाह पुलस्त्य ऋषि से हुआ जिनके दो पुत्र हुए - अगस्त्य एवं विश्रवा। रावण इन्ही विश्रवा मुनि का पुत्र था। ५. पांचवी पुत्री गति का विवाह पुलह मुनि से हुआ। ६. छठी पुत्री क्रिया का विवाह्क्रतु ऋषि से हुआ जिनसे वृहत ऋषि उत्पन्न हुए। ७. सातवी पुत्री अरूंधती का विवाह मुनि वशिष्ठ से हुआ जिनसे सात ब्राह्मर्शी उत्पन्न हुए। ८. आठवी पुत्री शांति का विवाह अथर्व ऋषि से हुआ जिनके पुत्र दधिची हुए। ९. नौवी पुत्री ख्याति का विवाह भृगु ऋषि से हुआ। इन्ही के वंश में आगे चलकर शुक्राचार्य एवं ऋचिक ऋषि व इनके पुत्र जमदग्नि उत्पन्न हुए। जमदग्नि के पुत्र भगवान परशुराम थे। महर्षि अथर्व पुत्र महर्षि दधीचि प्राचीन काल के परम तपस्वी और ख्यातिप्राप्त महर्षि थे। वे तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति और वैराग्य में इनकी जन्म से ही निष्ठा थी। इनकी पत्नी का नाम वेदवती 'गभस्तिनी' था। महर्षि दधीचि वेद शास्त्रों आदि के पूर्ण ज्ञाता और स्वभाव के बड़े ही दयालु थे। अहंकार तो उन्हें छू तक नहीं पाया था। वे सदा दूसरों का हित करना अपना परम धर्म समझते थे। उनके व्यवहार से उस वन के पशु-पक्षी तक संतुष्ट थे, जहाँ वे रहते थे। गंगा के तट पर ही उनका आश्रम था। जो भी अतिथि महर्षि दधीचि के आश्रम पर आता, स्वयं महर्षि तथा उनकी पत्नी अतिथि की पूर्ण श्रद्धा भाव से सेवा करते थे। यूँ तो 'भारतीय इतिहास' में कई दानी हुए हैं, किंतु मानव कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने वाले मात्र महर्षि दधीचि ही थे। इनकी तपस्या के संबंध में भी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। परिचय लोक कल्याण के लिये आत्म-त्याग करने वालों में महर्षि दधीचि का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है। देवताओं के मुख से यह जानकर की "मात्र दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा ही असुरों का संहार किया जा सकता है", महर्षि दधीचि ने अपना शरीर त्याग कर अस्थियों का दान कर दिया। इन्हीं की हड्डियों से बने पिनाक धनुष द्वारा इंद्र ने वृत्रासुर का संहार किया था। मान्यतानुसार आधुनिक मिश्रिखतीर्थ नैमिषारण्य (सीतापुर) को इनकी तपोभूमि बताया जाता है। महर्षि दधीचि का प्राचीन नाम 'दध्यंच' भी कहा जाता है। अर्थात जिसने देश व लोकहित के लिए सब कुछ दिया वही दधीचि "दाधीच" दध्यंच कहलाया। महर्षि दधीचि का जन्म भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन हुआ था। इनका नाम ब्राह्माजी ने "दध्यंग" भी रखा था। कालांतर इनका विवाह तृणबिन्दु राजा की पुत्री वेदवती के साथ हुआ। ये त्रिवेणी संगम में अर्थव वचन में निवास करते थे। राजा क्षुव से उन्होंने युद्ध भी किया, जिसमें क्षत्रिय व ब्राह्मण में कौन श्रेष्ठ है, इसका निर्णय हुआ था। उस घमासान युद्ध में इनका शरीर पुरी तरह से विच्छिन्न हो गया, जिसे दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने अपनी मृत संजीवनी विद्या से उनके शरीर को पूर्ववत कर दिया था। इस कारण से इन्हें महर्षि शुक्राचार्य का धर्म पुत्र भी कहा जाता है। तदनोपरांत महर्षि शुक्राचार्य से ही दधीचि मुनि ने महामृत्युंजय मंत्र का ज्ञान भी सीखा था। जनकल्याण में रत रहने वाले देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों को ब्राह्म विद्या का ज्ञान महर्षि दधीचि ने ही दिया था। जब देवराज इन्द्र को मालूम पड़ा कि ब्राह्म विद्या का ज्ञान अश्विनी कुमारों को महर्षि दधीचि द्वारा दिया जा रहा है तो इन्द्र ने महर्षि दधीचि को अपने मुख से ये ज्ञान सिर्फ उसे (इन्द्र) को देने का ही वरदान प्राप्त कर लेने में सफल हो गया। लेकिन महर्षि दधीचि ने अपने सिर भाग को कटवा कर, पुनः अश्वमुख (घोड़े के मुख) द्वारा उन अश्विनी कुमारों को ब्राह्म विद्या का ज्ञान दिया और वे अश्वशिरा कहलाये। जब इन्द्र को महर्षि दधीचि के इस अश्वमुख संदर्भ ब्राह्म विद्या का भान हुआ तो वो क्रोधवश मुनिवर दधीचि का अश्वमुख पुनः शिरोच्छेदन कर दिया किन्तु ऋषि की पत्नि वेदवती के शाप के भय से इन्द्र वहाँ से भाग गया। उसके बाद अश्विनी कुमारों ने महर्षि का सुरक्षित रखा मस्तक पुन: रोपित कर दिया। महर्षि दधीचि ने दैत्य गुरु #शुक्राचार्य की प्रेरणा से भगवान विष्णु की आराधना करके ब्राह्म कवच व नारायण कवच धारण किया, जिससे उनका शरीर इच्छा-मृत्यु व बज्र स्थित्व होकर ब्राह्मतेज से विद्यमान हो गया। देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष के समय भगवान ब्राह्म, विष्णु एवं महेश की कृपा से प्राप्त दिव्यास्त्रों के द्वारा देवताओं ने दानवों को परास्त तो किया; किन्तु उसके बाद उन शस्त्रों को सुरक्षित रखने का प्रश्न एक विकट समस्या थी। देवताओं के विचार में अब उन शस्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए एक ही ब्रह्मयोगी महर्षि दधीचि ही उपयुक्त थे। सभी देव उनके आश्रम पर गये और उनसे प्रार्थना में कहा कि "हमें अटूट विश्वास है कि दिव्यास्त्रों की धरोहर आपकी अभिरक्षा में ही सुरक्षित रह सकती है अत:आप इसके न्यासी बनने की कृपा करें।" देवताओं के इस सविनय आग्रह को महर्षि दधीचि मान गए। कालान्तर; जब आसुरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा, तो इससे आश्रम की शांति में खलल पड़ने लगी। देवों के शस्त्र सम्पदा को सुरक्षित रखने के लिए यंत्र-तंत्र के ज्ञाता महर्षि दधीचि ने रसायन विधि के माध्यम से उन देव शस्त्रों को सुक्ष्म अणुओं में परिवर्तित कर दिया। महर्षि दधीचि के द्वारा निर्माण किऐ गए इस "आण्विक शक्ति संवर्धन" गुणसूत्रों के कारण, इन्हें "#अणु शक्ति" का प्रथम आविष्कारक भी माना जाता है। पुनः असुर राज #वृत्रासुर का आतंक बढ़ने के कारण देवताओं को एक बार फिर पराजित होना पड़ा। चारों तरफ त्राहि-त्राहि मच गई। सभी देवता भगवान विष्णु जी के पास गये और कहा कि अब किसी जीवित महायोगी के अस्थियों के बने शस्त्र से ही वृत्रासुर का नाश हो सकता है, इसके लिए अब आप स्वयं महर्षि दधीचि के पास जाकर याचना करें और देवराज इन्द्र अपने पुर्व कृत्यों के कारण उनसे क्षमा याचना करें। इस पर सभी देवता भगवान विष्णु व देवराज इन्द्र के साथ दधीचि के आश्रम पर गये और क्षमा याचना के साथ मुनिवर से मदद हेतु प्रार्थना भी किऐ। अपने दिव्य दृष्ट से महर्षि पूर्व ही समझ गये थे कि देवगण किस कार्य हेतु आये हैं। महर्षि ने देवगणों से कहा कि यह देह क्षणभंगुर है, यदि मेरे इस शरीर से आसुरी वृत्ति का विनाश एवं लोक कल्याण के लिए देवताओं की रक्षा होती है तो मेरा यह सौभाग्य ही है। मैं तो सशरीर अब आपके आण्विक दिव्यास्त्रों का न्यासी ही हूँ। मेरे आण्विक गुणसूत्रों से सने अस्थियों का अब अस्थिदान करने से ही मेरे न्यासी धर्म की पूर्ति होगी। महर्षि दधीचि, जिन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान भी प्राप्त था, उन्होंने अपनी अस्थियों को दान करने से पुर्व वेदभूमि भारतवर्ष के सभी तीर्थो में स्नान करने की इच्छा प्रकट की। मुनिश्रेष्ठ दधीचि को सभी तीर्थ स्थानों को जाने में समय लगता और उधर दैत्यराज वृत्रासुर का आतंक बढ़ता ही जा रहा था। यह सोचकर देवताओं ने सभी तीर्थ स्थानों के जलाशयों सरोवरों का महर्षि के आश्रम पर ही आह्वान कर दिया। इस पर भारत के सभी तीर्थो ने अपने कमंडलों में जल भरकर देवकार्य एवं दैत्यदमन में अपने जीवन का बलिदान देने वाले महर्षि दधीचि का अभिषेक किया। अभिषेक का सारा जल सरस्वती कुण्ड में एकत्रित हुआ और मिश्रित हुआ, जो दधीचि तीर्थ मिशरिख (मिश्रिख) #नैमिषारण्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में है। इसके बाद महर्षि दधीचि समाधिस्थ होकर ब्रह्मलीन हो गये। उस समय उनकी पत्नी आश्रम में नहीं थी। अब देवताओं के समक्ष ये समस्या आई कि महर्षि दधीचि के शरीर के माँस को कौन उतारे। इस कार्य के ध्यान में आते ही सभी देवता सहम गए। तब इन्द्र ने #कामधेनु गाय को बुलाया और उसे महर्षि के शरीर से मांस उतारने को कहा। कामधेनु ने अपनी जीभ से चाट-चाटकर महर्षि के शरीर का माँस उतार दिया। अब केवल अस्थियों का पिंजर रह गया था। तत्पश्चात अश्विनी कुमारों के सहयोग से देव शिल्पी विश्वकर्मा ने शेषनाग के सहयोग से मेरूदंड की अस्थियों से वज्र का निर्माण किया। उस वज्र से देवराज इन्द्र ने देवताओं के साथ वृत्रासुर से युद्ध किया। तब उसका वध किया और धर्मराज्य की स्थापना हुई। महर्षि दधीचि ने जब विश्व कल्याण के लिए अपने शरीर का त्याग कर अस्थियों को दान में दिया, उस समय उनकी पत्नी वेदवती गर्भवती थीं, वह सती होने को तैयार थी लेकिन देवताओं ने ऋषि पत्नी को स्मरण कराया कि जो गर्भ में ऋषि का तेज है, वह कुल दीपक है। उस समय एक नुकिले पत्थर प्रयुक्त शल्य क्रिया से गर्भ निकाल कर पीपल के वृक्ष को सौंपते हुए कहा कि आप उसकी रक्षा करें, कुल देवी दधीमथी अब आप इसके कुल की देखभाल करना। तत्पश्चात ऋषि पत्नी पति का ध्यान करके सती होकर शिवलोक में महर्षि से जा मिलीं। पीपल के वृक्ष के नीचे पालन के कारण उनका नाम पीप्लाद पड़ा। पिप्पलाद भी एक तपोनिष्ठ महर्षि हुए। राष्ट्र धर्म और समाज के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वालों की यशस्वी परम्परा के श्रेष्ठ अग्रदूत को आदर्श मानकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के नक्षत्र वासुदेव बलवंत फड़के ने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में यही प्रकट किया कि महर्षि दधीचि की तरह उनके शरीर का प्रत्येक अवयव नर पिशाच अंग्रेजों के विनाश के काम आये। महात्मा गांधी ने भी सन् १९२० में साबरमती के तट पर गुजरात में सम्पन्न हुए कांग्रेस अधिवेशन स्थल को दधीचि नगर नाम दिया और कहा कि यदि देशवासी महर्षि दधीचि के आदर्श को अपना सकें तो भारत की स्वतंत्रता के निकट आने में कुछ भी विलम्ब नहीं होगा। वर्तमान युग की प्रासंगिकता को देखते हुए राष्ट्रहित में महर्षि दधीचि का चरित्र चित्रण समझकर, उसे जीवन में धारण कर इस भारत को विश्व विजयी बना सकते हैं। आज पुन: हमें राष्ट्रहित में ऐसे महान त्याग की आवश्यकता है। कितनी हैरानी की बात है इतिहास के सबसे पुराने दानकर्ता को आज कोई याद भी नहीं करता इनका नाम भी बस अब पौराणिक कहानियों में ही रह गया है। पौराणिक कथाऐं लक्षणात्मक होती है। कथा के माध्यम से समाज को बोध कराना ही पुराणों की रचना का उद्देश्य है। ' इस कथा का बोध है की संस्कृति रक्षा के लिए हमारे कर्मयोगी ऋषि-मुनियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया है, संस्कृति रक्षण औऱ जतन के लिये अपनी हड्डियों का आण्विक रसायन निर्माण करके संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन किया है। ' मानव कल्याण और हित में जब भी त्याग की बात आएगी तो सबसे पहला नाम आएगा महर्षि दधीचि का जिन्होंने दानव वृत्रासुर के वध के लिए अपनी देह त्याग कर अपनी अस्थियो का दान दिया था। इसी महादान कारण महर्षि दधीचि के वंशज 'दाधीच' कहलाते हैं। महर्षि दधीचि के देहदान के पश्चात उनके पुत्र #पिप्पलाद का पालन पोषण दधीचि महर्षि की बहिन #दधिमती ने किया, बच्चा उन्हें पीपल की पेड़ की ओट में मिला इसलिए उसका नाम पिप्पलाद रखा गया था। कालांतर पिप्पलाद ने दिव्य ज्ञानों को प्राप्त किया। पिप्पलाद को भगवान शिव का अवतार भी माना जाता है, परंतु जब उसे अपने पिता महर्षि दधीचि के देहावसान कारणों का पता चला तो वो क्रोधित हो उठे और प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए तपस्या में लीन हो गए। भगवान शिव अवतारी पिप्पलाद को अब देवराज इंद्र समेत सभी देवताओ से प्रतिशोध लेना था जिसके कारण उसे अपने माता पिता के प्रेम से वंचित होना पड़ा। पिप्पलाद ने अपनी तपस्या से एक भयंकर महादानव प्राप्त किया, जिसे उसने समस्त देवताओ को समाप्त करने का आदेश दिया। अपने जान प्राण के खतरे को देख सारे देवगण महादेव भगवान शिव की शरण में गए। तब महादेव ने अपने अवतार को समझाया की प्रतिशोध से तुम्हारे माता-पिता अब वापस नही आएंगे और ऐसा करके तुम अपने पिता के त्याग का भी अपमान कर रहे हो। तब पिप्पलाद का गुस्सा शांत हुआ लेकिन ये जान कर फिर शनि देव पर क्रोधित हो गए की उनकी महादशा के कारण ही मुझे माँ के पेट से ही कष्ट उठाने पड़े। तब पिप्पलाद ने शनि देव से युद्ध कर उन्हें पराजित किया और शनि देव ने तब वरदान स्वरुप वचन दिया की वो १६ साल से छोटी उम्र के लोगों पर अपना प्रकोप नही बरसाएंगे। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,,

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर
YASHJANGIR May 21, 2019

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB