RAVI KUMAR
RAVI KUMAR Aug 11, 2017

"कैसा पड़ा मां शक्ति का नाम दुर्गा?"

"कैसा पड़ा मां शक्ति का नाम दुर्गा?"

#दुर्गा
पुरातन काल में दुर्गम नामक दैत्य हुआ था। उसने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर सभी वेदों को अपने वश में कर लिया, जिससे देवताओं का बल क्षीण हो गया। फिर दुर्गम ने देवताओं से युद्ध किया जिसमें उसने देवताओं को हरा कर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। जब देवता दुर्गम की यातनाओं से परेशान हो गए, तब उन्होंने देवी भगवती का स्मरण हुआ। देवताओं ने शुभ-निशुभ, मधु-कैटभ तथा चण्ड-मुण्ड का वध करने वाली शक्ति का आह्वान किया।
देवताओं के आह्वान पर देवी प्रकट हुईं। उन्होंने देवताओं से उन्हें बुलाने का कारण पूछा। सभी देवताओं ने एक स्वर में बताया कि दुर्गम नामक दैत्य ने सभी वेद तथा स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया है तथा हमें अनेक यातनाएं दी हैं। आप उसका वध कर दीजिए। देवताओं की परेशानी सुनकर देवी ने उन्हें दुर्गम का वध करने का आश्वासन दिया।
यह बात जब दैत्यों के राजा दुर्गम को पता चली, तो उसने देवताओं पर पुन: आक्रमण कर दिया। तब माता भगवती ने देवताओं की रक्षा की तथा दुर्गम की सेना का संहार कर दिया। सेना का संहार होते देख दुर्गम स्वयं युद्ध करने आया। तब माता भगवती ने काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला आदि कई सहायक शक्तियों का आह्वान कर उन्हें भी युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। भयंकर युद्ध में भगवती ने दुर्गम का वध कर दिया। दुर्गम नामक दैत्य का वध करने के बाद मां भगवती का नाम दुर्गा के नाम से विख्यात हुआ।

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Suman Lata Sep 18, 2020

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👉समस्याओं का समाधा न दुर्गा-सप्तशती साधना-सूत्र दुर्गा-सप्तशती साधना-सूत्र  ------------------------------------------ जो व्यक्ति दुःखी, दरिद्र और अनेक प्रकार की पीड़ाओ से ग्रस्त है और साधना मार्ग में उत्तम मार्गदर्शन के अभाव में प्रवेश नहीं कर सकता हो, वह प्रातः काल या रात्रिकाल किसी विद्वान से आज्ञा प्राप्त कर श्रद्धा-पूर्वक ' श्रीदुर्गा-सप्तशती ' के पाठ का नियम बना ले और इस नियम को तब तक न तोड़े, जब तक कि इच्छित कामना की सिद्धि न हो जाय। अगर कोई साधक निष्कामषभाव से पाठ करता है तो उसके जीवन में आकस्मिक विघ्न-बाधाएँ नहीं आएगी। यदि संस्कृत का ज्ञान न हो, तो हिन्दी में पाठ करें। किन्तु नियम पूर्वक, निश्चित समय व स्थान पर और स्थान की पवित्रता का विशेष ध्यान रखें। इस प्रकार साधक को अभीष्ट की सिद्धि अवश्य प्राप्त होगी। दुर्गति से बचने का सरल सरस मार्ग है भगवती दुर्गा की उपासना। दुर्गति नाशिनी होने के कारण ही इन्हें दुर्गा कहा गया है। इनकी प्रसन्नता ' दुर्गा-सप्तशती ' के परायण से प्राप्त होती है - इसमें सन्देह नहीं। दुर्गा-सप्तशती का अनुष्ठान इस युग में सर्व-कामना पूर्ण करने वाला है। जो साधक पूर्ण पाठ करने में असमर्थ है उनके लिए कुछ सूत्र प्रस्तुत है- 1) आत्मोन्नति के लिए दुर्गा-सप्तशती के ' तन्त्रोक्त देवी -सूक्त ' का पाठ तीन वर्ष तक नियमित करना चाहिये। 2) ' आत्म-कल्याण के निमित्त दुर्गा-सप्तशती का पूरा पाठ न करके मात्र माँ का स्तवन - रात्रि-सूक्त, शक्रादय स्तुति, नारायणी स्तुति और अन्त में देवी-सूक्त का पाठ किया जाए, तो भी भगवती की प्रसन्नता प्राप्त होती है। 3) कामना सिद्धि के लिये दुर्गा-सप्तशती का शाप-मोचन, उत्कीलन व कुञ्जिका मन्त्र स्तोत्र का जप सहित पूरा पाठ करना चाहिये। 4) कामना-पूर्ति के लिए ' तन्त्रोक्त देवी-सूक्त का पाठ ' त्रुटि ' और ' पूर्ति ' श्लोक जोड़ कर करना चाहिये। 5) दुर्गा-सप्तशती में वर्णित कवच, अर्गला और कीलक का पाठ करने से साधक ज्ञात-अज्ञात परेशानियों से मुक्त रहता है। आदि। देवी भागवत अनुसार दुर्गा सनातनी एवं भगवान् विष्णु की माया है। इन्हें नारायणी, ईशानी और सर्व-शक्ति-स्वरूपिणि कहा जाता है। ये परमात्मा श्रीकृष्ण की बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी है। सम्पूर्ण देवियाँ इन्हीं से प्रकट होती है। इन्हीं की कृपा से श्रीकृष्ण में भक्ति उत्पन्न होती है। वैष्णवों के लिए ये भगवती " वैष्णवी " है। नवरात्र वर्ष में चार बार आते है-1)चैत्र, 2)आषाढ़, 3) आश्विन और 4) माघ। देवि-भागवत में लिखा गया है - चैत्रे आश्विने तथाषाढे, माघे कार्यो महोत्सवः। नव-रात्रे महाराज ! पूजा कार्या विशेषतः।। इस प्रकार चार नवरात्र में चैत्र एवं आश्विन प्रकट और आषाढ़ एवं माघ अप्रकट यानि 'गुप्त नवरात्र ' के नाम से जानी जाती है। गुप्त इसलिए की इन नवरात्र मे गुप्त गुरु-गम्य सिद्धिया प्राप्त करने के लिये साधना-उपासना की जाती हैं। वैसे देखा जाय तो चारो नवरात्र चार ॠतुओं की सन्धि-वेला में आती है। इस काल में कितने ही लोग बीमार पड़ते हैं और अनेक प्रकार की संक्रामक बीमारियाँ भी फैल जाती है। इसलिए शक्ति अर्जित करने व व्रत-उपवास करके शारीरिक -मानसिक बल प्राप्त करने के लिए सर्व-दुःख-नाशिनी और ऐश्वर्य प्रदायिनी माँ दुर्गा या अपनी गुरु-परम्परानुसार पूजा आराधना की जाती है। दुर्गा-सप्तशती के तन्त्रों में अनेक पाठ भेद पाएँ जाते है उनमें से नौ प्रकार के परायण मुख्य रूप से किये जाते है- 1) चण्डीपाठ- प्रथम, मध्यम और उत्तम चरित्र। 2) महातन्त्र - प्रथम, उत्तम, मध्यम चरित्र। 3) महाविद्या - मध्यम, उत्तम, प्रथम चरित्र। 4) सप्तशती- मध्यम, प्रथम, उत्तम चरित्र। 5) मृत सञ्जीवनी - उत्तम, मध्यम, प्रथम। 6) महाचण्डी - उत्तम, मध्यम, प्रथम। 7) रूपचण्डी ( कुमुदिनी )- प्रत्येक श्लोक के साथ " रूपं देहि.. .. के साथ नवार्ण मन्त्र का प्रतिश्लोक जप। 8 ) योगिनी - चौसठ योगिनी के नामोच्चारण के साथ नवार्ण मन्त्र का सम्पुट। 9) पराचण्डी - " सौः " बीज मन्त्र का सम्पुट लगाकर पाठ किया जाता है। चण्डी, महातन्त्र, महाविद्या, सप्तशती, मृत सञ्जीवनी और महाचण्डी पाठ विधि में कामनानुसार सम्पुट लगाने की परम्परा है। प्रयोजनानुसार दुर्गा-सप्तशती के तीन चरित्रों का क्रम परिवर्तन करने से सृष्टि, स्थिति एवं संहार क्रम बनता है। सृष्टि क्रम ##### ' ऊँ ऐं मार्कण्डेय उवाच, सावर्णिः सूर्य-तनयो यो से प्रारम्भ करके " सूर्यात् जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः"। नव-चण्डी में इस क्रम को चण्डी-पाठ नाम से जाना जाता है। गीताप्रेस,गोरखपुर से प्रकाशित दुर्गा-सप्तशती इसी क्रम से प्रकाशित कि गई है। विवाहार्थी, सन्तानार्थी तथा शान्ति-पुष्टि के लिए इस क्रम से पाठ किया जाता है। स्थिति क्रम ###### 'ऊँ क्लीं ' ॠषिरुवाच - पुरा शुम्भ- निशुम्भाभ्यां ( उत्तम चरित्र ) से प्रारम्भ करके प्रथम, मध्यम चरित्र पर्यन्त। नव-चण्डी पाठ में यह मृत- सञ्जीवनी नामक पाठ बताया गया है। इस प्रकार पाठ करने से सभी सत् कामना पूर्ण होती है। संहार क्रम ###### तेरहवें अध्याय के अन्तिम श्लोक --' सूर्याज्जन्म समासाद्य ' से श्लोक वार उल्टे क्रम से पाठ करना होता है। जैसे तेरहवें अध्याय का अन्तिम श्लोक अट्ठाईसवाँ, सत्ताईसवाँ, छब्बीसवाँ। अध्याय भी उल्टे तेरहवॉं, बारहवॉं, ग्यारहवॉं आदि। मुक्तिकामी इसी क्रम से पाठ करते है। विलोम क्रम ###### विलोम क्रम पाठ में श्लोकों भी उल्टा पढ़ा जाता है। जैसे --'नुःम ताविभर्णिः वसा ' शेष क्रम संहार क्रम की तरह ही है। उग्र प्रयोजन के लिये यह विधि प्राप्त होती है। क्रमशः... कृपया कोई भी पाठ-क्रम अपनाने से पहले किसी विद्वान से परामर्श अवश्य ले। कोई साधक पाठ करें और अज्ञानवश दुष्परिणामों की प्रतीति हो तो इसके लिए हम उत्तरदायी नहीं होगें।

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सभी माता के भक्तों को जय माता की जय माता की सभी माता के प्रिय भक्तों आज आपको अपने दोस्त मित्र साथी ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ के द्वारा यह आरती समर्पित की जा रही है प्यार से बोलो जय माता की ब्रह्मदत्त आरती श्री दुर्गाजी अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली, तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती। तेरे भक्त जनो पर माता भीर पड़ी है भारी। दानव दल पर टूट पड़ो माँ करके सिंह सवारी॥ सौ-सौ सिहों से बलशाली, है अष्ट भुजाओं वाली, दुष्टों को तू ही ललकारती। ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥ माँ-बेटे का है इस जग में बड़ा ही निर्मल नाता। पूत-कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता॥ सब पे करूणा दर्शाने वाली, अमृत बरसाने वाली, दुखियों के दुखड़े निवारती। ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥ नहीं मांगते धन और दौलत, न चांदी न सोना। हम तो मांगें तेरे चरणों में छोटा सा कोना॥ सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली, सतियों के सत को संवारती। ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥ चरण शरण में खड़े तुम्हारी, ले पूजा की थाली। वरद हस्त सर पर रख दो माँ संकट हरने वाली। माँ भर दो भक्ति रस प्याली, अष्ट भुजाओं वाली, भक्तों के कारज तू ही सारती। ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥ ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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Amita ojha Sep 18, 2020

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Mahaveer Sep 17, 2020

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