Krishna Singh
Krishna Singh Sep 18, 2017

क्यों शुभ माना जाता है घर के अदंर शंख को स्थापित करना?

क्यों शुभ माना जाता है घर के अदंर शंख को स्थापित करना?
क्यों शुभ माना जाता है घर के अदंर शंख को स्थापित करना?
क्यों शुभ माना जाता है घर के अदंर शंख को स्थापित करना?
क्यों शुभ माना जाता है घर के अदंर शंख को स्थापित करना?

🌷शंख

आपने अकसर आरती के समय मंदिरों में शंख की आवाज सुनी होगी, प्राय: बहुत से हिन्दू घरों में भी शंख देखना बेहद आम बात है। प्राचीन काल में भी युद्ध की घोषणा या फिर किसी शुभ काम की शुरुआत शंखनाद से ही की जाती थी। कहीं ना कहीं यह प्रथा हम आज भी देखते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं शंख को रखना या शंखनाद सुनना इतना महत्वपूर्ण और शुभ क्यों माना जाता ह
🌷शंखनाद

सनातन धर्म में शंख के विभिन्न चमत्कारी गुणों का उल्लेख किया गया है। भारतीय परंपरा में शंख को विजया, समृद्धि, यश और लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, ऐसा माना जाता है जब भी किसी शुभ कार्य की शुरुआत करनी हो तो उससे पहले किया गया शंखनाद फलदायी साबित होता है।
🌷शंख की उत्पत्ति

शंख के प्रादुर्भाव के बारे में कहा जाता है की सर्वप्रथम इसकी उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी। समुद्र मंथन में जिन 14 रत्नों की उत्पत्ति हुई थी उनमें से शंख भी एक था, जिसे भगवान विष्णु ने अपने कर कमलों में धारण किया।

🌷लक्ष्मी देवी

इसके अलावा विष्णु पुराण के अनुसार यह भी माना जाता है कि विष्णु जी की अर्धांगिनी और धन की देवी माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं और शंख उनका भाई है। इसलिए यह भी माना जाता है की जहां शंख होता है लक्ष्मी भी वहीं वास करती हैं।

🌷पूजाघर में शंख रखना

शंख के विषय में यह माना जाता है की इसे घर में स्थापित करने या पूजाघर में रखने से घर की सीमा के भीतर कोई भी अनिष्ट कार्य नहीं हो पाता और परिवार के लोगों का जीवन भी बाधाओं से दूर रहता है। इतना ही नहीं, यह भी माना जाता है की ऐसा करने से सौभाग्य में भी वृद्धि होती है।

🌷शंखों के प्रकार

शंख कई प्रकार के होते हैं और सभी से जुड़े पूजा विधान भी अलग-अलग हैं। उच्चतम श्रेणी के शंख मालदीव, लक्षद्वीप, श्रीलंका, भारत, कैलाश मानसरोवर में पाए जाते हैं। हिन्दू पुराणों के अनुसार अगर अनुष्ठानों में शंख का उपयोग सही प्रकार से किया जाए तो यह साधक की हर मनोकामना को पूरा कर सकते हैं। पुराणों में तो यह भी लिखा है कि कोई मूक व्यक्ति नित्य प्रति शंख बजाए तो बोलने की शक्ति भी पा सकता है।

🌷शंख की आकृति

शंख को उसकी आकृति के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिस शंख को दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है उसे दक्षिणावृति शंख, जिसे बाएं हाथ से पकड़ा जाता है उसे वामावृति शंख और जिस शंख का मुख बीच में से खुला होता है उसे मध्यावृति शंख कहा जाता है।

🌷लक्ष्मी का वास

प्राय: दक्षिणावृति और मध्यावृत्ति शंख आसानी से उपलब्ध नहीं होते और इनके चमत्कारी गुण अन्य के मुक़ाबले काफी ज्यादा होते हैं, इसलिए इनका महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। पूजा के दौरान दक्षिणावृति शंख रखने और उसकी पूजा करने से घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।

🌷धार्मिक कार्य

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार तो बिना शंखनाद के कोई भी धार्मिक कार्य पूरा नहीं होता। इसकी आवाज से प्रेत आत्माओं और पिशाचों से मुक्ति मिलती है।

🌷विभिन्न प्रकार

इन तीन मुख्य प्रकार के शंखों के अलावा लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, गणेश शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, कामधेनु शंख, देव शंख, चक्र शंख, गरुण शंख, शनि शंख, राहु शंख आदि भी होते हैं।

🌷शंखों की खासियत

माना जाता है गणेश शंख में जल भरकर गर्भवती स्त्री को पिलाने से संतान स्वस्थ और रोग या विकार मुक्त पैदा होती है। अन्नपूर्णा शंख को रसोईघर या भंडार गृह में रखने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती, मणिपुष्पक शंख को घर में स्थापित करने से वास्तुदोष समाप्त होते हैं।

🌷शंख का स्नान

घर में जहां मंदिर की स्थापना की जाती है वहाँ शंख को रखने का भी प्रावधान है, पूजा वेदी पर शंख की स्थापना किसी भी शुभ दिन जैसे होली, दीपावली, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, आदि कभी भी की जा सकती है। जिस तरह हिन्दू घरों में भगवान को घी, दूध और गंगाजल से स्नान करवाया जाता है, वैसे ही शंख को भी स्नान करवाया जाना चाहिए।

🌷प्रयोग का तरीका

दैविक, अर्धदैविक और तांत्रिक, तीनों ही प्रकार के अनुष्ठानों में तो शंख का प्रयोग किया ही जाता है लेकिन आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र और विज्ञान में भी इसके प्रयोग का तरीका उल्लेखित है।

🌷शंख की तरंगें

वैज्ञानिकों का भी मानना है कि शंख की तरंगें वातावरण को शुद्ध करती हैं। जब भी शंखनाद होता है तो उसकी आवाज से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है और साथ ही हवा में फैले कीटाणुओं का भी नाश होता है। आयुर्वेद के अनुसार शंखोदक भस्म से पेट की बीमारियों, पथरी, पीलिया आदि जैसे रोगों से छुटकारा मिलता है।

🌷वास्तुशास्त्र

वैज्ञानिक, आयुर्वेद और धार्मिक लाभ के साथ-साथ शंख घर के वास्तुदोष को समाप्त करने के लिए भी कारगर साबित होता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार शंख के भीतर लाल गाय का दूध भरकर घर में छिड़कने से घर के वास्तुदोष समाप्त होते हैं। इसके अलावा शंख को दुकान या ऑफिस में रखने से व्यवसाय में भी लाभ प्राप्त होता है।

🌷चिकित्सीय पक्ष

होता है और सांस संबंधी रोगों से लड़ने में सहायता मिलती है। शंख में कैल्शियम, फास्फोरस, आदि जैसे गुण होते हैं, इसमें पानी रखने से पानी के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और इस पानी का सेवन करने से हड्डियाँ, दाँत आदि मजबूत होते हैं।

🌷भारतीय परंपरा की खासियत

ये बात तो है की समुद्र मंथन से निकाला शंख भारतीय संस्कृति की धरोहर है लेकिना सनातन धर्म की एक बड़ी खासियत यह भी है कि इसमें किसी भी वस्तु या मान्यताओं को यूं ही समाहित नहीं किया गया, वरन उनके धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक और सामाजिक पक्षों की ओर भी ध्यान दिया गया है।

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कामेंट्स

Nitin Kharbanda Mar 27, 2020

तुलसी कौन थी? तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था. वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी. एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा``` - स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर``` आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये। सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता । फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है। भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है? उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये। सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !

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sunita Sharma Mar 27, 2020

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Languages : | हिंदी | नेपाली | __________________________________________ प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.७ . Bhagavad Gita Multilingual . प्रश्न १ : अर्जुन ने कृष्ण के समक्ष युद्ध न करने के लिए किस प्रकार के तर्क प्रस्तुत किये ? . उत्तर १ : "बुद्धिमान् होने के कारण अर्जुन समझ गया कि पारिवारिक सदस्यों के प्रति उसका अनुराग तथा मृत्यु से उनकी रक्षा करने की उसकी इच्छा ही उसकी उलझनों का कारण है | यद्यपि वह समझ रहा था कि युद्ध करने का कर्तव्य उसकी प्रतीक्षा कर रहा था, किन्तु कृपण-दुर्बलता (कार्पण्यदोष) के कारण वह अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा था | अतः वह परम गुरु भगवान् कृष्ण से कोई निश्चित हल निकालने का अनुरोध कर रहा है | वह कृष्ण का शिष्यत्व ग्रहण करता है | वह मित्रतापूर्ण बातें बंद करना चाहता है | गुरु तथा शिष्य की बातें गम्भीर होती हैं और अब अर्जुन अपने मान्य गुरु के समक्ष गम्भीरतापूर्वक बातें करना चाहता है इसीलिए कृष्ण भगवद्गीता-ज्ञान के आदि गुरु है और अर्जुन गीता समझने वाला प्रथम शिष्य है |" :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: प्रश्न २ : बृहदारण्यक उपनिषद् से उद्धरित श्लोक का क्या अर्थ है : . यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माँल्लोकात्प्रैतिसकृपणः ? . उत्तर २ : '– “कृपण वह है जो मानव जीवन की समस्याओं को हल नहीं करता और आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान को समझे बिना कूकर-सूकर की भाँति संसार को त्यागकर चला जाता है |” जीव के लिए मनुष्य जीवन अत्यन्त मूल्यवान निधि है, जिसका उपयोग वह अपने जीवन की समस्याओं को हल करने में कर सकता है, अतः जो इस अवसर का लाभ नहीं उठाता वह कृपण है |' . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.७, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ****अब आप ये प्रश्नोत्तर हमारी एंड्राइड एप्प के माध्यम से सीधे अपने फ़ोन में भी पा सकते हैं | कृपया हमारी एप्प सबसे ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड करें | _______________________________________ प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.७ . प्रश्न १ : अर्जुनको उलझनको मुख्य कारण के थियो ? उ कुन प्रकार यसलाई निवारण गर्नको लागी इच्छुक छ ? . उत्तर १ : "अर्जुन बुद्धिमान् व्यक्त्ति थिए | पारिवारिक जनहरुप्रतिको उनको प्रेम र मृत्युबाट उनीहरुको रक्षा गर्ने चाहना नै उनको चिन्ताको कारण हो भन्ने कुरा उनी बुझ्न सक्दथे | लडाइं गर्नु उनको कर्तव्य हो र उक्त्त कर्तव्यले उनको प्रतिक्षा गरिरहेको छ भन्ने कुरा पनि उनी बुझ्दथे तर कार्पण्य दोषले गर्दा उनी आफ्नो कर्तव्यपालन गर्न सकिरहेका थिएनन् | त्यसैले, निश्चित समाधान निकाल्नका लागि उनी परमगुरु भगवान् श्रीकृष्णसँग अनुरोध गर्दैछन् | उनी शिष्य बनेर आफूलाई कृष्णमा समर्पित गर्दैछन् | उनी अब कृष्णसँग मित्रवत् होइन शिष्यवत् कुराकानी गर्न चाहन्छन् | गुरु र शिष्यबीचका कुराकानीहरु गम्भीर हुन्छन् | अहिले अर्जुन आफ्ना आदरणीय गुरु कृष्णसँग अति गम्भीरतापूर्वक कुरा गर्न चाहन्छन् | कृष्ण भागवत्गीतारुपी विज्ञानका मूल गुरु हुनुहुन्छ र अर्जुन यो गीताज्ञान बुझ्ने पहिलो शिष्य हुन् अर्थात् जसले मानवका रुपमा रहेर आफ्ना जीवनका समस्याहरुको समाधान गर्न सक्दैन र जसले आत्मासाक्षात्कारको विज्ञान नबुझीकन कुकुर बिरालाले जस्तै संसार त्याग्छ त्यो कृपण हो | जीवात्माका लागि मानिसको शरीर एउटा बहुमूल्य सम्पत्ति हो | उसले आफ्ना जीवनका समस्याको समाधान गर्ने कार्यमा यो शरीरको उपयोग गर्न सक्दछ | जसले यो अवसरको समुचित उपयोग गर्दैन त्यो कृपण हो, कञ्जुस हो |" ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: प्रश्न २ : बृहदारण्यक उपतिषद्‌बाट उद्धारीत श्लोक को अर्थ के हो : यो वा एतदक्षरे गागर्यवि दिवास्मा ल्लो कात प्रैतिस कृपण : ? . उत्तर २ : "अर्थात् जसले मानवका रुपमा रहेर आफ्ना जीवनका समस्याहरुको समाधान गर्न सक्दैन र जसले आत्मासाक्षात्कारको विज्ञान नबुझीकन कुकुर बिरालाले जस्तै संसार त्याग्छ त्यो कृपण हो | जीवात्माका लागि मानिसको शरीर एउटा बहुमूल्य सम्पत्ति हो | उसले आफ्ना जीवनका समस्याको समाधान गर्ने कार्यमा यो शरीरको उपयोग गर्न सक्दछ | जसले यो अवसरको समुचित उपयोग गर्दैन त्यो कृपण हो, कञ्जुस हो |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.७, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ***अब हाम्रो भगवद् गीता अनुप्रयोगमार्फत तपाई यी पदहरू पाउन सक्नुहुनेछ (चित्र र प्रश्नोत्तर सहित) सीधा तपाईको एन्ड्रोइड फोनमा। कृपया हाम्रो एप्प माथी दिएको लिंक बाट डाउनलोड गर्नु I ______________________________________________

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Anju Mishra Mar 27, 2020

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🌹 मत्स्य जंयती की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं मत्स्य जंयती विशेष 👇 मत्स्य जयंती का महत्व मत्स्य जयंती चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की पूजा की जाती है। विष्णु पुराण के अनुसार मत्स्य अवतार भगवान विष्णु का प्रथम अवतार माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के इस अवतार की पूजा करने से विशेष लाभ की प्राप्ति होती है। मत्स्य जयंती के दिन मत्स्य पुराण का सुनना और पढ़ना भी अधिक श्रेष्ठ माना जाता है। इस दिन मछलियों को आटें की गोली खिलाने से भी विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। मत्यस्य जयंती के दिन निर्जला व्रत किया जाता है और भोजन का दान दिया जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपने सभी पापों से मुक्ति मिलती है और उसे जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है। मत्स्य जयंती के दिन मछली को नदी या समुद्र में छोड़ने से भी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। मत्स्य जयंती शुभ मुहूर्त मत्स्य जयन्ती मुहूर्त - दोपहर 1 बजकर 40 मिनट से दोपहर 4 बजकर 08 मिनट तक तृतीया तिथि प्रारम्भ - शाम 07 बजकर 53 मिनट से (26 मार्च 2020) तृतीया तिथि समाप्त - अगले दिन रात 10 बजकर 12 मिनट तक (27 मार्च 2020)

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Shanti Pathak Mar 26, 2020

🌹🌹ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय 🌹🌹 🌹🌹शुभ गुरुवार, शुभ प्रभात जी 🌹🌹 *💥विष्णु को नारायण और हरि क्यों कहते है💥* भगवान विष्णु की पूजा हिन्दू धर्म में सबसे ज्यादा होती है | कोई उन्हें विष्णु के रूप में तो कोई उन्हें कृष्ण या राम के रूप में पूजते है | धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने कई अवतार समय समय पर धारण करके इस धरा को पाप से मुक्त करवाया है | वेद व्यास जी द्वारा रचित भविष्य पुराण में बताया गया है की कलियुग में भी विष्णु कल्कि अवतार फिर से लेंगे | "विष्णु का हरि और नारायण नाम " पालनहार भगवान विष्णु के सबसे बड़े भक्त नारद मुनि उन्हें नारायण कहकर ही बुलाते हैं | इसके अलावा उन्हें अनन्तनरायण, सत्य नारायण लक्ष्मीनारायण, शेषनारायण इन सभी नामों से भी बुलाया जाता रहा है | पर मूल बात यह है कि इन सभी नामों में नारायण जुड़ा रहा है| नारायण इसलिए कहलाते है विष्णु पौराणिक कथा के अनुसार, जल देवता वरुण भगवान विष्णु के पैरों से पैदा हुए थे साथ ही देव नदी गंगा भी विष्णु के पैरो से निकली थी जिन्हें हम विष्णुपदोदकी के नाम से भी पुकारते है | "भगवान विष्णु का जल में वास " जल का दूसरा नाम नीर और नार भी है | भगवान विष्णु का निवास (आयन ) भी समुन्द्र (नार ) में बताया गया है | इसी कारण इनका नाम जल के आधार पर नारायण पड़ा | अत: नारायण का अर्थ जल में रहने वाले देवता | विष्णु का हरि नाम कैसे पड़ा :- हरि शब्द का अर्थ है जो मन को हर ले | शास्त्रों में बताया गया है कि हरि हरति पापणि विष्णु हरते है पापो को | इनकी सबसे प्रिय तिथि एकादशी है जिसका हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्व है | इस दिन उपवास रखने से व्यक्ति के जन्मो जन्मो के पाप नष्ट होते है और हर सुख की प्राप्ति होती है | जय श्री हरि

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harsh Malhotra Mar 27, 2020

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