Meenu
Meenu Apr 16, 2021

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GOVIND CHOUHAN Apr 16, 2021
Jai Mata Di 🌷 Jai Maa Aadhyashakthi Nav Durga Devi Mata 🌷 Subh Ratri Vandan jii 👏👏 Vvvery Nice Post Jiii 👌👌👌

dhruv wadhwani Apr 19, 2021
जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी जय माता दी

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💖💓💗*हरिहर स्वरूप का क्या है रहस्य *💗💓💖 वेद में कहा गया है कि परमात्मा माया के द्वारा अनेक रूप वाला दिखाई देता है और सृष्टि-स्थिति और प्रलय की लीला के लिए ‘ब्रह्मा, विष्णु और शिव’~ इन तीन रूपों में प्रकाशित होता है। भगवान के ‘हरिहर अवतार’ में भगवान विष्णु और शिव का संयुक्त रूप देखने को मिलता है। ‘हरिहर’ शब्द दो शब्दों से मिल कर बना है। भगवान हरि (विष्णु) और हर अर्थात् महादेव। *हरि~हर स्वरूप का रहस्य* एक बार ब्रह्माजी और विष्णुजी ने देवाधिदेव महादेव जी की स्तुति की जो ‘शार्वस्तव’ के नाम से जानी जाती है। देवाधिदेव महादेव ने प्रसन्न होकर ब्रह्माजी और विष्णुजी से वर मांगने को कहा। ब्रह्माजी ने वरदान मांगा कि आप मेरे पुत्र हों। महादेव ने कहा~ ‘मैं आपकी इच्छा तब पूर्ण करुंगा, जब आपको सृष्टि-रचना में सफलता नहीं मिलेगी और आपको क्रोध हो जाएगा; तब मैं उसी क्रोध से उत्पन्न होऊंगा। तब मैं प्राणरूप ग्यारहवां रुद्र कहलाऊंगा ।’ भगवान विष्णु ने अपने लिए वरदान में केवल भक्ति मांगी । इससे देवाधिदेव महादेवजी अत्यन्त प्रसन्न हुए। महादेवजी ने अपना आधा शरीर उन्हें माना। तभी से वे ‘हरिहर’ रूप में पूजे जाते हैं । *शंख पद्म पराहस्तौ, त्रिशूल डमरु स्तथा।* *विश्वेश्वरम् वासुदेवाय हरिहर: नमोऽस्तुते।।* *भगवान हरि~हर का स्वरूप~~~* भगवान हरिहर के दाहिने भाग में रुद्र के चिह्न हैं और वाम भाग में विष्णु के। वह दाहिने हाथ में शूल तथा ऋष्टि धारण करते हैं और बायें हाथ में गदा और चक्र। दाहिनी तरफ गौरी और वाम भाग में लक्ष्मी विराजती हैं। *भगवान हरि~हर की एकता~~~* पुराणों में यह कहा गया है कि महादेव और विष्णु एक-दूसरे की अन्तरात्मा हैं और निरन्तर एक-दूसरे की पूजा, स्तुति व उपासना में संलग्न रहते हैं~ *'शिवस्य हृदये विष्णु: विष्णोश्च हृदये शिव:।'* अर्थात्~ भगवान शंकर के हृदय में विष्णु का और भगवान विष्णु के हृदय में शंकर का बहुत अधिक स्नेह है। जैसे~ महादेव श्रीहरि के अनन्य भक्त परम वैष्णव हैं। अत: उनके लिए कहा जाता है~ *’वैष्णवानां यथा शम्भु:’* अर्थात्~ वैष्णवों में अग्रणी शंकरजी। देवाधिदेव महादेव ने श्रीहरि के चरणों से निकली गंगा को अपने जटाजूट में बांध लिया और ‘गंगाधर’ कहलाए। शिव श्वेत वर्ण के (कर्पूर गौर) और विष्णु श्याम वर्ण के (मेघवर्णं) हो गए। वैष्णवों का तिलक (ऊर्ध्वपुण्ड्र) त्रिशूल का रूप है और शैवों का तिलक (त्रिपुण्ड) धनुष का रूप है। अत: महादेव व विष्णु में भेद नहीं मानना चाहिए। हरि और हर~ दोनों की प्रकृति (वास्तविक तत्त्व) एक ही है। ‘शिव सहस्त्रनाम’ में भगवान शिव के ‘चतुर्बाहु’, ‘हरि’, ‘विष्णु’ आदि नाम मिलते हैं। ’विष्णु सहस्त्रनाम’ का पाठ करने पर भगवान विष्णु के ‘शर्व’, ‘शिव’ व ‘स्थाणु’ आदि नामों का उल्लेख है जो महादेव के नाम हैं। इसीलिए अग्निपुराण में स्वयं भगवान ने कहा है~ ‘हम दोनों में निश्चय ही कोई भेद नहीं है, भेद देखने वाले नरकगामी होते हैं।’ पुराणों में भगवान हरि और हर की एकता दर्शाने वाले अनेक उदाहरण है। यहां पाठकों को समझाने के लिए कुछ ही का वर्णन किया जा रहा है~ हिरण्यकशिपु दैत्य का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप धारण किया और जब वे आवेश में अति उग्र हो गए तो उन्हें देवाधिदेव महादेव ने ही ‘शरभावतार’ लेकर शान्त किया। एक बार भक्त नरसीजी को महादेव जी ने दर्शन दिए और उनसे वरदान मांगने को कहा। तब नरसीजी ने कहा कि 'जो चीज आपको सबसे अधिक प्रिय लगती है, वही दीजिए।' देवाधिदेव महादेव ने कहा~ 'मेरे को श्रीकृष्ण सबसे अधिक प्रिय लगते हैं, अत: मैं तुम्हें उनके ही पास ले चलता हूँ।' ऐसा कहकर भगवान शंकर उनको गोलोक ले गए। शिव महिम्न~ स्तोत्र की रचना करने वाले गंधर्व पुष्पदंतजी के अनुसार~ भगवान विष्णु प्रतिदिन ‘शिव सहस्त्रनाम स्तोत्र’ का पाठ करते हुए सहस्त्र कमल-पुष्प से देवाधिदेव महादेव की पूजा करते थे। एक दिन महादेवजी ने परीक्षा करने के लिए एक कमल छिपा दिया। इस पर भगवान विष्णु ने अपना नेत्रकमल ही शंकरजी को अर्पित कर दिया। फिर क्या था ! भक्ति का उत्कृष्ट स्वरूप चक्र के रूप में परिणत हो गया जो भगवान विष्णु के हस्तकमल में रह कर जगत की रक्षा के लिए सदा सावधान है। रामचरितमानस के लंका काण्ड में तो विष्णुरूप भगवान श्रीराम ने शंकरजी से अपनी अभिन्नता बताते हुए स्पष्ट कह दिया है~~~ *सिव द्रोही मम दास कहावा।* *सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।* *संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।* *ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास।।* ब्रह्मवैवर्तपुराण में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं महादेवजी के प्रति अपने श्रद्धा-भाव को व्यक्त करते हुए कहते हैं~ ’देव ! मेरा आपसे बढ़कर कोई प्रिय नहीं है। आप मुझे अपनी आत्मा से भी अधिक प्यारे हैं।’ *भगवान हरि~हर के मिलन की कथा~~~* एक बार वैकुण्ठ में श्रीहरि ने स्वप्न में महादेवरजी को देखा तो निद्रा भंग होने पर वे लक्ष्मी सहित गरुड़ पर सवार होकर कैलाश की ओर चल दिए। इसी प्रकार कैलाश पर महादेवजी ने स्वप्न में श्रीहरि को देखा तो निद्रा भंग होने पर वे भी पार्वती सहित नन्दी पर सवार वैकुण्ठ की तरफ चल दिए। मार्ग में ही श्रीहरि और महादेवजी की भेंट हो गई। दोनों हर्षपूर्वक गले मिले। फिर श्रीहरि महादेवजी से वैकुण्ठ चलने का आग्रह करने लगे और महादेवजी श्रीविष्णुजी से कैलाश चलने का आग्रह करने लगे। बहुत देर तक दोनों एक-दूसरे से यह प्रेमानुरोध करते रहे। इतने में देवर्षि नारद वीणा बजाते, हरिगुण गाते वहां पधारे। तब पार्वतीजी ने नारदजी से इस समस्या का हल निकालने के लिए कहा। नारदजी ने हाथ जोड़कर कहा~ ‘मैं इसका क्या हल निकाल सकता हूँ। मुझे तो हरि और हर एक ही लगते हैं; जो वैकुण्ठ है वही कैलाश है।’ अंत में तय यह हुआ कि पार्वतीजी जो कह दें वही ठीक है। पार्वतीजी ने थोड़ी देर विचार करके कहा~ ‘हे नाथ ! हे नारायण ! आपके अलौकिक प्रेम को देखकर तो मुझे यही लगता है कि जो कैलास है, वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है वही कैलास है। इनमें केवल नाम में ही भेद है। आपकी भार्याएं भी एक हैं, दो नहीं। जो मैं हूँ वही श्रीलक्ष्मी हैं और जो श्रीलक्ष्मी हैं वहीं मैं हूँ। अब मेरी प्रार्थना है कि आप लोग दोनों ही अपने-अपने लोक को पधारिए। श्रीविष्णु यह समझें कि हम शिवरूप से वैकुण्ठ जा रहे हैं और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णुरूप से कैलास गमन कर रहे हैं। पार्वतीजी के वचनों को सुनकर दोनों देव हर्षित होकर अपने-अपने धामों को लौट गए। *माधवोमाधवावीशौ सर्वसिद्धिविधायिनौ।* *वन्दे परस्परात्मानौ परस्परनुतिप्रियौ।।* अर्थात्~ हम सब सिद्धियों को देने वाले, एक-दूसरे की आत्मा रूप, एक दूसरे को नमन करने वाले, सर्वसमर्थ माधव (विष्णु) और उमाधव (शिव) को साष्टांग नमन करते हैं। 💗💖💞𓆩༢࿔ྀુजय माता दी𓊗༢࿔ྀુ𓆪💞💖💓 💖´ *•.¸♥¸.•**कुमार रौनक कश्यप**•.¸♥¸.•*´💖

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[email protected] May 11, 2021

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X7skr May 11, 2021

🕉️ namah shivay 🙏 @🌞 ~ आज का हिन्दू पंचांग ~ 🌞 ⛅ दिनांक 12 मई 2021 ⛅ दिन - बुधवार ⛅ विक्रम संवत - 2078 (गुजरात - 2077) ⛅ शक संवत - 1943 ⛅ अयन - उत्तरायण ⛅ ऋतु - ग्रीष्म ⛅ मास - वैशाख ⛅ पक्ष - शुक्ल ⛅ तिथि - प्रतिपदा 13 मई रात्रि 03:05 तक तत्पश्चात द्वितीया ⛅ नक्षत्र - कृत्तिका 13 मई रात्रि 02:40 तक तत्पश्चात रोहिणी ⛅ योग - शोभन रात्रि 11:48 तक तत्पश्चात अतिगण्ड ⛅ राहुकाल - दोपहर 12:35 से दोपहर 02:13 तक ⛅ सूर्योदय - 06:03 ⛅ सूर्यास्त - 19:07 ⛅ दिशाशूल - उत्तर दिशा में ⛅ व्रत पर्व विवरण - 💥 विशेष - प्रतिपदा को कूष्माण्ड(कुम्हड़ा, पेठा) न खाये, क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) 🌞 ~ हिन्दू पंचांग ~ 🌞 🌷 अक्षय फलदायी “अक्षय तृतीया” 🌷 ➡ 14 मई 2021 शुक्रवार को अक्षय तृतीया है । 🙏🏻 वैशाख शुक्ल तृतीया की महिमा मत्स्य, स्कंद, भविष्य, नारद पुराणों व महाभारत आदि ग्रंथो में है । इस दिन किये गये पुण्यकर्म अक्षय (जिसका क्षय न हो) व अनंत फलदायी होते हैं, अत: इसे 'अक्षय तृतीया' कहते है । यह सर्व सौभाग्यप्रद है । 🙏🏻 यह युगादि तिथि यानी सतयुग व त्रेतायुग की प्रारम्भ तिथि है । श्रीविष्णु का नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी के रूप में अवतरण व महाभारत युद्ध का अंत इसी तिथि को हुआ था । 👉🏻 इस दिन बिना कोई शुभ मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ या सम्पन्न किया जा सकता है । जैसे - विवाह, गृह - प्रवेश या वस्त्र -आभूषण, घर, वाहन, भूखंड आदि की खरीददारी, कृषिकार्य का प्रारम्भ आदि सुख-समृद्धि प्रदायक है । 🌷 प्रात:स्नान, पूजन, हवन का महत्त्व 🌷 🙏🏻 इस दिन गंगा-स्नान करने से सारे तीर्थ करने का फल मिलता है । गंगाजी का सुमिरन एवं जल में आवाहन करके ब्राम्हमुहूर्त में पुण्यस्नान तो सभी कर सकते है । स्नान के पश्चात् प्रार्थना करें : 🌷 माधवे मेषगे भानौं मुरारे मधुसुदन । प्रात: स्नानेन में नाथ फलद: पापहा भव ॥ 🙏🏻 'हे मुरारे ! हे मधुसुदन ! वैशाख मास में मेष के सूर्य में हे नाथ ! इस प्रात: स्नान से मुझे फल देनेवाले हो जाओ और पापों का नाश करों ।' 👉🏻 सप्तधान्य उबटन व गोझरण मिश्रित जल से स्नान पुण्यदायी है । पुष्प, धूप-दीप, चंदनम अक्षत (साबुत चावल) आदि से लक्ष्मी-नारायण का पूजन व अक्षत से हवन अक्षय फलदायी है । 🌷 जप, उपवास व दान का महत्त्व 🌷 🙏🏻 इस दिन किया गया उपवास, जप, ध्यान, स्वाध्याय भी अक्षय फलदायी होता है । एक बार हल्का भोजन करके भी उपवास कर सकते है । 'भविष्य पुराण' में आता है कि इस दिन दिया गया दान अक्षय हो जाता है । इस दिन पानी के घड़े, पंखे, (खांड के लड्डू), पादत्राण (जूते-चप्पल), छाता, जौ, गेहूँ, चावल, गौ, वस्त्र आदि का दान पुण्यदायी है । परंतु दान सुपात्र को ही देना चाहिए । 🌷 पितृ-तर्पण का महत्त्व व विधि 🌷 🙏🏻 इस दिन पितृ-तर्पण करना अक्षय फलदायी है । पितरों के तृप्त होने पर घर में सुख-शांति-समृद्धि व दिव्य संताने आती है । 💥 विधि : इस दिन तिल एवं अक्षत लेकर र्विष्णु एवं ब्रम्हाजी को तत्त्वरूप से पधारने की प्रार्थना करें । फिर पूर्वजों का मानसिक आवाहन कर उनके चरणों में तिल, अक्षत व जल अर्पित करने की भावना करते हुए धीरे से सामग्री किसी पात्र में छोड़ दें तथा भगवान दत्तात्रेय, ब्रम्हाजी व विष्णुजी से पूर्वजों की सदगति हेतु प्रार्थना करें । 🌷 आशीर्वाद पाने का दिन 🌷 🙏🏻 इस दिन माता-पिता, गुरुजनों की सेवा कर उनकी विशेष प्रसन्नता, संतुष्टि व आशीर्वाद प्राप्त करें । इसका फल भी अक्षय होता है । 🌷 अक्षय तृतीया का तात्त्विक संदेश 🌷 🙏🏻 'अक्षय' यानी जिसका कभी नाश न हो । शरीर एवं संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान है, अविनाशी तो केवल परमात्मा ही है । यह दिन हमें आत्म विवेचन की प्रेरणा देता है । अक्षय आत्मतत्त्व पर दृष्टी रखने का दृष्टिकोण देता है । महापुरुषों व धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा और परमात्म प्राप्ति का हमारा संकल्प अटूट व अक्षय हो - यही अक्षय तृतीया का संदेश मान सकते हो । 🙏🏻 - Rishi Prasad April 2013 🌞 ~ हिन्दू पंचांग ~ 🌞

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deepika May 10, 2021

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