मायमंदिर फ़्री कुंडली
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Dr. Ratan Singh
Dr. Ratan Singh Mar 18, 2019

🎎🌷अर्धनारीश्वर नाम क्यों पड़ा 🌷🎎 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 🏵सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। 🎭तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदय में प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। महेश्वर शिव ने कहा- पुत्र ब्रह्मा! तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है, उससे मैं परम प्रसन्न हूं। 🍥मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने कहा.-एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाओं को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गई। 🌹इस प्रकार ब्रह्माजी को उपकृत कर तथा अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही अर्द्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया, जिसके नियामक शिवशक्ति ही हैं। 🚩🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉

🎎🌷अर्धनारीश्वर नाम क्यों पड़ा 🌷🎎
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🏵सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। 

🎭तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदय में प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। महेश्वर शिव ने कहा- पुत्र ब्रह्मा! तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है, उससे मैं परम प्रसन्न हूं। 

🍥मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने कहा.-एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाओं को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गई। 

🌹इस प्रकार ब्रह्माजी को उपकृत कर तथा अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही अर्द्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया, जिसके नियामक शिवशक्ति ही हैं।

 🚩🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩
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कामेंट्स

Malkhan Singh UP Mar 18, 2019
************************* *॥हरि ॐ॥*ऊँ नमः शिवाय* *श्री कृष्ण गोविँद हरे मुरारे* *हे नाथ नारायण वासुदेव* *॥हरि ॐ॥*जय श्री राम* *सपरिवार आपकी रात्रि शुभ हो* *🌹🙏हर हर महादेव🙏🌹* *************************

Sunil Kumar saini Mar 19, 2019
जय श्री राम जी 🙏 🙏 🌹 प्रभु राम जी की कृपा सदा आप और आपके परिवार पर बनी रहे भाई जी 🙏 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 आपका हर पल शुभ व मगंल मय हो 🌹 🌹 🌹 🌹 इसी मंगल कामना के साथ सुबह की राम राम भाई जी 🙏 🌹 🌹 सुप्रभात ☀️ ☀️ ☀️ ☀️ ☀️ राधे राधे जी 🙏 🌹 🌹 🌹 🌹

Narayan Tiwari Mar 19, 2019
शिव मंत्र :-🚩 (१)- ॐ नम: शिवाय। महामृत्युंजय मंत्र:-🚩 (२) ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥  

VINAY SINGH Mar 19, 2019
jai shree ram jai BAJRANG BALI ki good morning

Manoj manu Mar 19, 2019
जय शिव शक्ति जय श्री राम जी शुभ दिन सादर सप्रेम वंदन भाई जी प्रभु श्री राम जी की अपार कृपा के साथ आप सभी का हर पल शुभ एवं मंगलमय हो जी 🌺🙏

🌼k l tiwari🌼 Mar 19, 2019
राम राम डॉ सा., शुभ सुमंगल सुप्रभातं ,,आपका हर पल मंगलमय हो जी,,🌹🙏🌹

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@859787147 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@kishanlaltiwaripmanवन्देमात 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@manojkapoor4 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@vinaysingh21 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@श्रीपीताम्बरा 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन भाई🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@sunilkumar93 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@gujrat 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@vijayyadav11 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@mksinghgkp 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@anjanagupta4 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन दीदी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

🌼k l tiwari🌼 Mar 19, 2019
@drratansinghआदरणीय डॉ सा राम राम,, शुभ संध्या वन्दन,, श्रीराम जी की कृपा से आप सदा प्रसन्न रहें स्वस्थ रहें ,,और आपके सिद्ध हस्तकला से सभी को स्वास्थ्य लाभ मिले,,जय श्री राम ,जय महावीर हनुमानजी की,,🌹🙏🌹

Raj Jul 16, 2019

पशुपतिनाथ मंदिर मे नंदी के दर्शन नही करना चाहिए आइये जानते है क्यो? भारत सहित पूरी दुनिया में भोलेनाथ के सैकड़ो मंदिर और तीर्थ स्थान मौजूद है। जो अपने चमत्कारों और धार्मिकता के कारण विश्व प्रसिद्ध है। वैसे तो भोलेनाथ के अनेको नाम है। उन्ही में से एक नाम है पशुपति मंदिर। यह मंदिर शिव के 12 ज्योतिर्लिगों में एक माना जाता है। इस मंदिर के बारें में कहा जाता है कि आज भी यहां पर भगवान शिव विराजमान है। पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से 3 किमी उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है। यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। यह मंदिर हिन्दू धर्म के आठ सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। नेपाल में यह भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर है। जानिए इस मंदिर से जुड़े कुछ रहस्यों के बारें में। जिन्हें जानकर आप आश्चर्य चकित हो जाएगे। 1- भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित इस मंदिर में दर्शन के लिए हर साल हजारों संख्या में भक्त यहां पर आते है। इस मंदिर में भारतीय पुजारियों की सबसे अधिक संख्या है। सदियों से यह परंपरा चलती चली आ रही है कि मंदिर में चार पुजारी और एक मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में से रखे जाते हैं। 2 - पशुपति मंदिर को 12 ज्योतिर्लिगों में से एक केदारनाथ का आधा भाग माना जाता है। जिसके कारण इस मंदिर का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। साथ ही शक्ति और बढ़ जाती है। 3- इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग के पांचो मुखों के गुण अलग-अलग हैं। जो मुख दक्षिण की और है उसे अघोर मुख कहा जाता है, पश्चिम की ओर मुख को सद्योजात, पूर्व और उत्तर की ओर मुख को तत्वपुरुष और अर्धनारीश्वर कहा जाता है। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है। यह निराकार मुख है। यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख है। 4- यह शिवलिंग बहुत ही कीमती और चमत्कारी है। माना जाता है कि यह शिवलिंग पारस के पत्थर से बना है। पारस का पत्थर ऐसा होता है कि लोह को भी सोना बना देता है। 5 - पशुपति मंदिर में चारों दिशाओं में एक मुख और एक मुख ऊपर की और है। हर मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल मौजूद है। 6 - इस मंदिर में बाबा का प्रकट होने के पीछे भी पौराणिक कथा है। इसके अनुसार जब महाभारत के युद्ध में पांडवों द्वारा अपने ही रिश्तेदारों का रक्त बहाया गया तब भगवान शिव उनसे बेहद क्रोधित हो गए थे। श्रीकृष्ण के कहने पर वे भगवान शिव से मांफी मांगने के लिए निकल पड़े। गुप्त काशी में पांडवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलुप्त होकर एक अन्य स्थान पर चले गए। आज इस स्थान को केदारनाथ के नाम से जाना जाता है। 7 - शिव का पीछा करते हुए पांडव केदारनाथ भी पहुंच गए लेकिन भगवान शिव उनके आने से पहले ही भैंस का रूप लेकर वहां खड़े भैंसों के झुंड में शामिल हो गए। पांडवों ने महादेव को पहचान तो लिया लेकिन भगवान शिव भैंस के ही रूप में भूमि में समाने लगे। इस पर भीम ने अपनी ताकत के बल पर भैंस रूपी महादेव को गर्दन से पकड़कर धरती में समाने से रोक दिया। भगवान शिव को अपने असल रूप में आना पड़ा और फिर उन्होंने पांडवों को क्षमादान दे दिया। लेकिन भगवान शिव का मुख तो बाहर था लेकिन उनका देह केदारनाथ पहुंच गया था। जहां उनका देह पहुंचा वह स्थान केदारनाथ और उनके मुख वाले स्थान पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 8- इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि अगर आपने पशुपति मंदिर के दर्शन किए तो पूरा पुण्यपाने के लिए आपको केदार मंदिर में भी भोले के दर्शन करने जाना पडेगा। क्योंकि पशुपतिनाथ में भैंस के सिर और केदारनाथ में भैंस की पीठ के रूप में शिवलिंग की पूजा होती है। 9- पशुपति मंदिर को लेकर मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति यहां पर दर्शन के लिए आता है तो उसे किसी जन्म में पशु की योनि नहीं मिलती है। 10- इस मंदिर को लेकर एक दूसरी मान्यता यह भी है कि अगर आपने पशुपति के दर्शन किएं तो आप नंदी के दर्शन न करें। नहीं तो आपको दूसरे जन्म में पशु का जन्म मिलेगा। 11- इस मंदिर के बाहर एक घाट बना हुआ है जिसे आर्य घाट के नाम से जाना जाता है। इस घाट के बारें में कहा जाता है कि सिर्फ इस घाटका ही पानी मंदिर के अंदर जाता है। और किसी जगह के पानी को ले जाना वर्जित है। ।। पशुपतिनाथ की जय हो ।।

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Raj Jul 16, 2019

क्यों है ब्रह्माजी के एक ही मंदिर? हिन्दुओं में तीन प्रधान देव माने जाते है- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्मा इस संसार के रचनाकार है, विष्णु पालनहार है और महेश संहारक है। लेकिन हमारे देश में जहाँ विष्णु और महेश के अनगिनत मंदिर है वही खुद की पत्नी सावित्री के श्राप के चलते ब्रह्मा जी का पुरे भारत में एक मात्र मंदिर है जो की राजस्थान के प्रशिद्ध तीर्थ पुष्कर में स्तिथ है। आखिर क्यों दिया सावित्री ने अपने पति ब्रह्मा को ऐसा श्राप इसका वर्णन पद्म पुराण में मिलता है। हिन्दू धर्मग्रन्थ पद्म पुराण के मुताबिक एक समयधरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था। उसके बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर ब्रह्मा जी ने उसका वध किया। लेकिन वध करते वक़्त उनके हाथों से तीन जगहों पर कमल का पुष्प गिरा, इन तीनों जगहों पर तीन झीलें बनी। इसी घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा। इस घटना के बाद ब्रह्मा ने संसार की भलाई के लिए यहाँ एक यज्ञ करने का फैसला किया। ब्रह्मा जी यज्ञ करने हेतु पुष्कर पहुँच गए लेकिन किसी कारणवश सावित्री जी समय पर नहीं पहुँच सकी। यज्ञ को पूर्ण करने के लिए उनके साथ उनकी पत्नी का होना जरूरी था, लेकिन सावित्री जी के नहीं पहुँचने की वजह से उन्होंने गुर्जर समुदाय की एक कन्या ‘गायत्री’ से विवाह कर इस यज्ञ शुरू किया। उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंची और ब्रह्मा के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गईं। उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद कभी भी उनकी पूजा नहीं होगी। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना शाप वापस ले लीजिए। लेकिन उन्होंने नहीं लिया। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा। भगवान विष्णु ने भी इस काम में ब्रह्मा जी की मदद की थी। इसलिए देवी सरस्वती ने विष्णु जी को भी श्राप दिया था कि उन्हें पत्नी से विरह का कष्ट सहन करना पड़ेगा। इसी कारण राम (भगवान विष्णु का मानव अवतार) को जन्म लेना पड़ा और 14 साल के वनवास के दौरान उन्हें पत्नी से अलग रहना पड़ा था। ब्रह्मा जी के मंदिर का निर्माण कब हुआ व किसने किया इसका कोई उल्लेख नहीं है। लेकिन ऐसा कहते है की आज से तकरीबन एक हजार दो सौ साल पहले अरण्व वंश के एक शासक को एक स्वप्न आया था कि इस जगह पर एक मंदिर है जिसके सही रख रखाव की जरूरत है। तब राजा ने इस मंदिर के पुराने ढांचे को दोबारा जीवित किया। पुष्कर में सावित्री का भी मंदिर है लेकिन वो ब्रह्मा जीके पास न होकर ब्रह्मा जी के मंदिर के पीछे एक पहाड़ी पर स्तिथ है जहाँ तक पहुंचने के लिए सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। भगवान ब्रह्मा ने पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन यज्ञ किया था। यही कारण है कि हर साल अक्टूबर-नवंबर के बीच पड़ने वाले कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर मेला लगता है। मेला के दौरान ब्रह्मा जी के मंदिर में हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं। इन दिनों में भगवान ब्रह्मा की पूजा करने से विशेष लाभ मिलता है।=======प्रस्तुतकर्ता अरविंद गज्जर

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Raj Jul 16, 2019

भगवान शिव के अनेकों कथाओं में से समुद्र मंथन की कथा भी एक हैं, ये कथा शिव पुराण की कथाए हैं जो बहुत ही रोमांचक हैं : एक बार की बात है शिवजी के दर्शनों के लिए दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ कैलाश जा रहे थे। मार्ग में उन्हें देवराज इन्द्र मिले। इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। तब दुर्वासा ने इन्द्र को आशीर्वाद देकर विष्णु भगवान का पारिजात पुष्प प्रदान किया। इन्द्रासन के गर्व में चूर इन्द्र ने उस पुष्प को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। उस पुष्प का स्पर्श होते ही ऐरावत सहसा विष्णु भगवान के समान तेजस्वी हो गया। उसने इन्द्र का परित्याग कर दिया और उस दिव्य पुष्प को कुचलते हुए वन की ओर चला गया। इन्द्र द्वारा भगवान विष्णु के पुष्प का तिरस्कार होते देखकर दुर्वाषा ऋषि के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने देवराज इन्द्र को श्री (लक्ष्मी) से हीन हो जाने का शाप दे दिया। दुर्वासा मुनि के शाप के फलस्वरूप लक्ष्मी उसी क्षण स्वर्गलोक को छोड़कर अदृश्य हो गईं। लक्ष्मी के चले जाने से इन्द्र आदि देवता निर्बल और श्रीहीन हो गए। उनका वैभव लुप्त हो गया। इन्द्र को बलहीन जानकर दैत्यों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवगण को पराजित करके स्वर्ग के राज्य पर अपनी परचम फहरा दिया। तब इन्द्र देवगुरु बृहस्पति और अन्य देवताओं के साथ ब्रह्माजी की सभा में उपस्थित हुए। तब ब्रह्माजी बोले — देवेन्द्र , भगवान विष्णु के भोगरूपी पुष्प का अपमान करने के कारण रुष्ट होकर भगवती लक्ष्मी तुम्हारे पास से चली गयी हैं। उन्हें पुनः प्रसन्न करने के लिए तुम भगवान नारायण की कृपा-दृष्टि प्राप्त करो। उनके आशीर्वाद से तुम्हें खोया वैभव पुनः मिल जाएगा। इस प्रकार ब्रह्माजी ने इन्द्र को आस्वस्त किया और उन्हें लेकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। वहाँ परब्रह्म भगवान विष्णु भगवती लक्ष्मी के साथ विराजमान थे। देवगण भगवान विष्णु की स्तुति करते हुए बोले— भगवान् , आपके श्रीचरणों में हमारा बारम्बार प्रणाम। भगवान् हम सब जिस उद्देश्य से आपकी शरण में आए हैं, कृपा करके आप उसे पूरा कीजिए। दुर्वाषा ऋषि के शाप के कारण माता लक्ष्मी हमसे रूठ गई हैं और दैत्यों ने हमें पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया है। अब हम आपकी शरण में हैं, हमारी रक्षा कीजिए। भगवान विष्णु त्रिकालदर्शी हैं। वे पल भर में ही देवताओं के मन की बात जान गए। तब वे देवगण से बोले— देवगण ! मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनें, क्योंकि केवल यही तुम्हारे कल्याण का उपाय है। दैत्यों पर इस समय काल की विशेष कृपा है इसलिए जब तक तुम्हारे उत्कर्ष और दैत्यों के पतन का समय नहीं आता, तब तक तुम उनसे संधि कर लो। क्षीरसागर के गर्भ में अनेक दिव्य पदार्थों के साथ-साथ अमृत भी छिपा है। उसे पीने वाले के सामने मृत्यु भी पराजित हो जाती है। इसके लिए तुम्हें समुद्र मंथन करना होगा। यह कार्य अत्यंत दुष्कर है, अतः इस कार्य में दैत्यों से सहायता लो। कूटनीति भी यही कहती है कि आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं को भी मित्र बना लेना चाहिए। तत्पश्चात अमृत पीकर अमर हो जाओ। तब दुष्ट दैत्य भी तुम्हारा अहित नहीं कर सकेंगे। देवगण वे जो शर्त रखें, उसे स्वाकीर कर लें। यह बात याद रखें कि शांति से सभी कार्य बन जाते हैं, क्रोध करने से कुछ नहीं होता। भगवान विष्णु के परामर्श के अनुसार इन्द्रादि देवगण दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव लेकर गए और उन्हें अमृत के बारे में बताकर समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया। समुद्र मंथन के लिए समुद्र में मंदराचल को स्थापित कर वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। तत्पश्चात दोनों पक्ष अमृत-प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन करने लगे। अमृत पाने की इच्छा से सभी बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे। सहसा तभी समुद्र में से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएँ जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। उस विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे और उनकी कान्ति फीकी पड़ने लगी। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर महादेव जी उस विष को हथेली पर रख कर उसे पी गये किन्तु उसे कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया। उस कालकूट विष के प्रभाव से शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया। इसीलिये महादेव जी को नीलकण्ठ कहते हैं। उनकी हथेली से थोड़ा सा विष पृथ्वी पर टपक गया था जिसे साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया। विष को शंकर भगवान के द्वारा पान कर लेने के पश्चात् फिर से समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ। दूसरा रत्न कामधेनु गाय निकली जिसे ऋषियों ने रख लिया। फिर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला जिसे दैत्यराज बलि ने रख लिया। उसके बाद ऐरावत हाथी निकला जिसे देवराज इन्द्र ने ग्रहण किया। ऐरावत के पश्चात् कौस्तुभमणि समुद्र से निकली उसे विष्णु भगवान ने रख लिया। फिर कल्पद्रुम निकला और रम्भा नामक अप्सरा निकली। इन दोनों को देवलोक में रख लिया गया। आगे फिर समु्द्र को मथने से लक्ष्मी जी निकलीं। लक्ष्मी जी ने स्वयं ही भगवान विष्णु को वर लिया। उसके बाद कन्या के रूप में वारुणी प्रकट हई जिसे दैत्यों ने ग्रहण किया। फिर एक के पश्चात एक चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा शंख निकले और अन्त में धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये। प्रस्तुतकर्ता #अरविंद गज्जर

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Anuradha Tiwari Jul 15, 2019

क्या आप जानते हैं ? तनह लोट मंदिर बाली (इंडोनेशिया) से जुड़े रोचक तथ्य... इंडोनेशिया का यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है । ये मंदिर बाली में एक विशाल समुद्री चट्टान पर बना हुआ है। अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध यह मंदिर 16वीं शताब्दी निर्मित बताया जाता है। यह मंदिर बाली द्वीप के हिन्दुओं की आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है। इस चट्टान की चोटी पर पर्यटकों के लिए रेस्तरां बनाये गए हैं। बताया जाता है कि तट पर स्थित इस मंदिर को हजारों वर्षों के दौरान समुद्री पानी के ज्वार से हुए क्षरण के फलस्वरूप यह आकृति प्राप्त हुई है जो इस मंदिर को और भी खूबसूरत बनाए हुए है। माना जाता है पूरा तनाह लोत का निर्माण 16वीं शताब्दी में पुजारी निरर्थ ने कराया था जिसे इस स्थान की सुंदरता ने मोह लिया। स्थानीय मछुआरों ने उन्हें यह स्थान उपहार के तौर पर प्रदान किए। उन्होंने मछुआरों से इस स्थान पर बाली के समुद्री देवता के मंदिर निर्माण का आग्रह किया। यह समंदर के 7 मंदिरों में से यह एक है। ये सातों मंदिर एक के बाद एक बने हैं और बाली के दक्षिण-पश्चिम चट्टान पर एक श्रृंखला सी बनाते हैं। यह स्थान बाली का सबसे फोटोजेनिक प्लेसेज में शामिल है और हर साल यहां लाखों सैलानी आते हैं। इन मंदिरों का बाली की पौराणिक कहानियों में वर्णन मिलता है।

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Anuradha Tiwari Jul 15, 2019

माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप.... महाभारत के अनुसार माण्डव्य नाम के एक ऋषि थे। राजा ने भूलवश उन्हें चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया। तब ऋषि यमराज के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप 12 वर्ष के थे, तब आपने एक फतींगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा। तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि 12 वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण यमराज ने महात्मा विदुर के रूप में जन्म लिया।

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Anuradha Tiwari Jul 15, 2019

भगवान सूर्य के रथ में क्यों लगे होते हैं सात घोड़े? --------------------------------------------------------- भगवान सूर्य को नवग्रह का राजा कहा जाता है। उन्हें आदित्य, भानु और रवि जैसे कई नामों से पुकारा जाता है। कहते हैं कि सूर्यदेव ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो अपनी रोशनी से सारे संसार में उजाला करते हैं। इनके दर्शन भी साक्षात होते हैं साथ ही सूर्यदेव सात घोड़ों से सुशोभित सोने के रथ पर रहते हैं। इनके रथ में लगे सात घोड़ों की कमान अरुण देव के हाथ में होती है। परंतु क्या आप जानते हैं कि जिस रथ पर भगवान सूर्य सवार रहते हैं उसमें सात घोड़े ही क्यों रहते हैं? दरअसल भगवान सूर्य जिस सात घोड़े वाले रथ पर सवार रहते हैं उसके संबंध में धार्मिक ग्रंथों में कई पौराणिक प्रचलित हैं। सूर्यदेव के रथ को संभालने वाले इन सात घोड़ों के नाम - गायत्री, भ्राति, उष्निक, जगती, त्रिस्तप, अनुस्तप और पंक्ति हैं। इसके बारे में मान्यता है कि ये अलग अलग दिनों को दर्शाते हैं जो स्वयं सूर्यदेव की किरणों से उत्पन्न हुई हैं। साथ ही सूर्यदेव के इन सात घोड़ों को इंद्रधनुष के सात रंगों से जोड़कर भी देखा जाता है। अगर ध्यान से देखा जाए तो इन सातों घोड़ों के रंग एक दूसरे से अलग होते हैं और ये सभी घोड़े एक दूसरे से अलग नजर आते हैं। ये सभी घोड़े स्वयं सूर्य की रोशनी का प्रतीक हैं। भगवान सूर्य के सात घोड़े वाले रथ पर सवार होने से प्रेरणा लेकर सूर्यदेव के कई मंदिरों में उनकी मूर्तियां स्थापित की गई हैं। इसमें खास बात ये है कि उनकी सारी मूर्तियां उनके रथ के साथ ही बनाई गई हैं।

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Anuradha Tiwari Jul 15, 2019

क्या आप जानते हैं ? अंकोरवाट मंदिर (कंबोडिया) से जुड़े रोचक तथ्य.... कंबोडिया में एक मंदिर परिसर और दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है। यह मूल रूप से खमेर साम्राज्य के दौरान एक हिंदू मंदिर के रूप में बनाया गया था, जो धीरे-धीरे 12वीं शताब्दी के अंत में बौद्ध मंदिर में परिवर्तित हो गया था। यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम यशोधरपुर था। यह विष्णु मन्दिर है जबकि इसके पूर्ववर्ती शासकों ने प्रायः शिवमंदिरों का निर्माण किया था। मीकांग नदी के किनारे सिमरिप शहर में बना यह मंदिर आज भी संसार का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है जो सैकड़ों वर्ग मील में फैला हुआ है। 12वीं शताब्दी के लगभग सूर्यवर्मा द्वितीय ने अंग्कोरथोम में विष्णु का एक विशाल मंदिर बनवाया। इस मंदिर की रक्षा भी एक चतुर्दिक खाई करती है जिसकी चैड़ाई लगभग 700 फुट है। दूर से यह खाई झील के समान दृष्टिगोचर होती है। मंदिर के पश्चिम की ओर इस खाई को पार करने के लिए एक पुल बना हुआ है। पुल के दूसरी तरफ मंदिर में प्रवेश के लिए एक विशाल द्वार निर्मित है जो लगभग 1,000 फुट चैड़ा है। मंदिर बहुत विशाल है। इसकी दीवारों पर समस्त रामायण मूर्तियों में अंकित है। इस मंदिर को देखने से ज्ञात होता है कि विदेशों में जाकर भी प्रवासी कलाकारों ने भारतीय कला को जीवित रखा था। इनसे प्रकट है कि अंग्कोरथोम जिस कंबुज देश की राजधानी था उसमें विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश आदि देवताओं की पूजा प्रचलित थी। इन मंदिरों के निर्माण में जिस कला का अनुकरण हुआ है वह भारतीय गुप्त कला से प्रभावित जान पड़ती है। अंग्कोरवात के मंदिरों, तोरणद्वारों और शिखरों के अलंकरण में गुप्त कला प्रतिबिंबित है।

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VR Devotee App Jul 15, 2019

क्या आप जानते हैं कि धरती लोक पर ब्रह्माजी के मंदिर तो हैं किन्तु वहां पर भी ब्रह्माजी की पूजा करना वर्जित माना गया है। परन्तु ऐसा क्यों? इस प्रश्न का उत्तर एक पौराणिक कथा में दिया गया है। कहते हैं एक बार ब्रह्माजी के मन में धरती की भलाई के लिए यज्ञ करने का ख्याल आया। यज्ञ के लिए जगह की तलाश करनी थी। तत्पश्चात स्थान का चुनाव करने के लिए उन्होंने अपनी बांह से निकले हुए एक कमल को धरती लोक की ओर भेज दिया। कहते हैं जिस स्थान पर वह कमल गिरा वहां ही ब्रह्माजी का एक मंदिर बनाया गया है। यह स्थान है राजस्थान का पुष्कर शहर, जहां उस पुष्प का एक अंश गिरने से तालाब का निर्माण भी हुआ था। आज के युग में इस मंदिर को ‘जगत पिता ब्रह्मा’ मंदिर के नाम से जाना जाता है। जहां श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखी जा सकती हैं। लेकिन फिर भी कोई ब्रह्माजी की पूजा नहीं करता। प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर इस मंदिर के आसपास बड़े स्तर पर मेला लगता है। कथा के आगे के चरण में ऐसा कहा गया है कि ब्रह्माजी द्वारा तीन बूंदें धरती लोक पर फेंकी गई थी जिसमें से एक पुष्कर स्थान पर गिरी। अब स्थान का चुनाव करने के बाद ब्रह्माजी यज्ञ के लिए ठीक उसी स्थान पहुंचे जहां पुष्प गिरा था। लेकिन उनकी पत्नी सावित्री वक्त पर नहीं पहुंच पाईं। ह्माजी ने ध्यान दिया कि यज्ञ का समय तो निकल रहा है, यदि सही समय पर आरंभ नहीं किया तो इसका असर अच्छा कैसे होगा। परन्तु उन्हें यज्ञ के लिए एक स्त्री की आवश्यकता थी, इसलिए उन्होंने एक स्थानीय ग्वाल बाला से शादी कर ली और यज्ञ में बैठ गए। अब यज्ञ आरंभ हो चुका था, किन्तु थोड़ी ही देर बाद सावित्री वहां पहुंचीं और यज्ञ में अपनी जगह पर किसी और औरत को देखकर वे क्रोधित हो गईं। गुस्से में उन्होंने ब्रह्माजी को शाप दिया और कहा कि जाओ इस पृथ्वी लोक में तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी। यहां का जन-जीवन तुम्हें कभी याद नहीं करेगा। सावित्री के इस रूप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि कृपया अपना शाप वापस ले लीजिए। लेकिन क्रोध से पूरित सावित्री ने उनकी बात नहीं मानी। जब कुछ समय के पश्चात उनका गुस्सा ठंडा हुआ तो उन्होंने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा। Credits: hindi.speakingtree.in

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