Dr. Ratan Singh
Dr. Ratan Singh Mar 18, 2019

🎎🌷अर्धनारीश्वर नाम क्यों पड़ा 🌷🎎 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 🏵सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। 🎭तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदय में प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। महेश्वर शिव ने कहा- पुत्र ब्रह्मा! तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है, उससे मैं परम प्रसन्न हूं। 🍥मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने कहा.-एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाओं को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गई। 🌹इस प्रकार ब्रह्माजी को उपकृत कर तथा अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही अर्द्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया, जिसके नियामक शिवशक्ति ही हैं। 🚩🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉

🎎🌷अर्धनारीश्वर नाम क्यों पड़ा 🌷🎎
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🏵सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। 

🎭तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदय में प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। महेश्वर शिव ने कहा- पुत्र ब्रह्मा! तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है, उससे मैं परम प्रसन्न हूं। 

🍥मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने कहा.-एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाओं को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गई। 

🌹इस प्रकार ब्रह्माजी को उपकृत कर तथा अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही अर्द्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया, जिसके नियामक शिवशक्ति ही हैं।

 🚩🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩
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कामेंट्स

Malkhan Singh Mar 18, 2019
************************* *॥हरि ॐ॥*ऊँ नमः शिवाय* *श्री कृष्ण गोविँद हरे मुरारे* *हे नाथ नारायण वासुदेव* *॥हरि ॐ॥*जय श्री राम* *सपरिवार आपकी रात्रि शुभ हो* *🌹🙏हर हर महादेव🙏🌹* *************************

sunil kumar saini Mar 19, 2019
जय श्री राम जी 🙏 🙏 🌹 प्रभु राम जी की कृपा सदा आप और आपके परिवार पर बनी रहे भाई जी 🙏 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 आपका हर पल शुभ व मगंल मय हो 🌹 🌹 🌹 🌹 इसी मंगल कामना के साथ सुबह की राम राम भाई जी 🙏 🌹 🌹 सुप्रभात ☀️ ☀️ ☀️ ☀️ ☀️ राधे राधे जी 🙏 🌹 🌹 🌹 🌹

Narayan Tiwari Mar 19, 2019
शिव मंत्र :-🚩 (१)- ॐ नम: शिवाय। महामृत्युंजय मंत्र:-🚩 (२) ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥  

Manoj manu Mar 19, 2019
जय शिव शक्ति जय श्री राम जी शुभ दिन सादर सप्रेम वंदन भाई जी प्रभु श्री राम जी की अपार कृपा के साथ आप सभी का हर पल शुभ एवं मंगलमय हो जी 🌺🙏

🌼k l tiwari🌼 Mar 19, 2019
राम राम डॉ सा., शुभ सुमंगल सुप्रभातं ,,आपका हर पल मंगलमय हो जी,,🌹🙏🌹

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@859787147 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@kishanlaltiwaripmanवन्देमात 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@manojkapoor4 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@vinaysingh21 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@श्रीपीताम्बरा 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन भाई🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@sunilkumar93 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@gujrat 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@vijayyadav11 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@mksinghgkp 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन जी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

Dr. Ratan Singh Mar 19, 2019
@anjanagupta4 🙏🌋शुभसन्ध्या वन्दन दीदी🌋🙏 🎎 आज का विचार 🎎 🏵आपकी उपस्थिति मात्र से कोई व्यक्ति स्वयं के दुःख भूल जाए यही आपकी उपस्थिति की सार्थकता है🎭 **************************** 🌸आप पर श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा दृष्टि सदा बनी रहे :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: 👏आज मंगलवार का संध्याआपका शुभ शांतिमय चिंता से मुक्तऔर मंगल ही मंगल हो🙏 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 🌹🌿जय श्री राम🌿🌹 🚩🎡जय श्री हनुमान🎡🚩 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

🌼k l tiwari🌼 Mar 19, 2019
@drratansinghआदरणीय डॉ सा राम राम,, शुभ संध्या वन्दन,, श्रीराम जी की कृपा से आप सदा प्रसन्न रहें स्वस्थ रहें ,,और आपके सिद्ध हस्तकला से सभी को स्वास्थ्य लाभ मिले,,जय श्री राम ,जय महावीर हनुमानजी की,,🌹🙏🌹

सती #अनुसूया: महर्षि अत्रि पत्नि..🍀🍀 भारत में सतीत्व को शक्ति और भक्ति का समन्वय माना जाता है । इसे चारित्रिक शुचिता का चरम आदर्श भी माना जाता है। भारत में ऐसी उज्जवल चरित्र की महिलाओं की एक लंबी श्रृंखला है और इस श्रृंखला में सती अनुसूया का नाम सबसे ऊपर आता है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि #अत्रि इनके पति थे। अपनी सतत सेवा तथा प्रेम से इन्होंने महर्षि अत्रि के हृदय को जीत लिया था। सती अनुसूया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुंचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी। सती अनुसुइया की परीक्षा – जब सती के तप से त्रिदेव बन गए शिशु: एक बार माँ लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सरस्वती जी को अपने पतिव्रता होने का बड़ा अभिमान होने लगा था। उन्हें ऐसा लगता था कि जितनी एकनिष्ठ होकर वह अपने पतियों की सेवा करती हैं, उसकी बराबरी करने वाला दुनिया में कोई भी नहीं है। इनके अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान ने नारद जी के मन में प्रेरणा दी। नारद जी ने तीनों देवियों के समक्ष उपस्थिति होकर अनुसूया के पतिव्रता धर्म का गुणगान किया। त्रिदेवियों को यह प्रशंसा बहुत चुभ गई। ईर्ष्यावश त्रिदेवियों ने अपने पतियों को अनुसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने के लिए भेजा। त्रिदेव यतियों के वेष धारण कर अत्रि के आश्रम में पहुंचे और भिक्षा देने का आग्रह किया। अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें भोजन के लिए निमंत्रित किया। तभी उन यति वेशधारी त्रिदेवों ने यह शर्त रख दी कि वह नग्न स्त्री के हाथों से परोसा गया भोजन ही ग्रहण करते हैं । इससे सती के समक्ष धर्मसंकट पैदा हो गया। इस समस्या का समाधान करने हेतु सती अनुसूया ने त्रिदेवों को बालक बना दिया और उनका उचित सत्कार किया और दुग्धपान कराया। उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा और द्वार के सम्मुख खड़े होकर सिर हिलाते हुए उसने पायलों की ध्वनि की। एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम के ऊपर से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आश्रम में उतर आया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद जी और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे। नारद जी अनुसूया से बोले- “माताजी! अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर पाकर ये तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।” अनुसूया ने विनयपूर्वक तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- “माताओं! उन झूलों में सोने वाले शिशु अगर आप के पति हैं तो इनको आप ले जा सकती हैं।” तीनों देवियों ने चकित होकर एक-दूसरे की तरफ देखा। एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती संकोच करने लगीं। तब नारद ने उनसे पूछा, ”क्या आप अपने पति को पहचान नहीं सकती?” नारद जी के ऐसा कहने पर देवियों ने जल्दी-जल्दी एक-एक शिशु को उठा लिया। इसके बाद वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां लज्जित होकर दूर जा खड़ी हो गई। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश इस तरह सटकर खड़े हो गए, मानो तीनों एक ही मूर्ति के रूप में मिल गए हो । उसी समय अत्रि महर्षि अपने घर लौट आए। अपने घर त्रिमूर्तियों को पाकर हाथ जोड़ने लगे। त्रिमूर्तियों ने प्रसन्न होकर अत्रि एवं अनुसूया को वरदान दिया कि वे सभी स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे। बाद में त्रिमूर्तियों की समन्वित शक्ति का अवतरण भगवान विष्णु अवतारी भगवान #दत्तात्रेय के रूप में हुआ तो साथ ही ब्रह्मा जी के स्वरुप से #चन्दमा (सोमदेव) और भगवान शिव के स्वरूप से #दुर्वासा मुनि का आविर्भाव हुआ। सति अनुसुइया ने #सीता जी को समझाया था पति धर्म: जब राम बनवास के बाद भगवान राम की चरण पादुका लेकर लौटे अनुज भरत ने अयोध्या का राजपाठ संभाल लिया। अयोध्या की प्रजा को न्याय दिलाने के साथ ही नैतिक फैसले भी लेने लगे। इधर वन-वन भटक रहे भगवान राम जयंत की परीक्षा के साथ जब चित्रकूट से जाने लगे तभी सती अनुसुइया ने मां सीता की परीक्षा लेने के साथ ही उन्हें पतिव्रत धर्म की विस्तार से जानकारी की। इसके बाद उनका रुख पंचवटी आश्रम की ओर हो गया। कुमार रौनक कश्यप,,,,,

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Sanjeev kohli Apr 19, 2019

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Anuradha Tiwari Apr 18, 2019

परमात्मा की लाठी.... एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था कि इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबला जा रहा था, तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी। साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया। शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था। साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा। साधु कुछ खाना चाहता था। लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते। साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी। मलंग ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की फिर आगे चल दिया। साधु बाबा का पेट भर चुका था। दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था। वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहें है। एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी। बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये। उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई। इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो से पकड़ कर कहने लगा अंधा है। तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं। साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था। जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था। महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा। लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई। राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा। युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया। बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़। लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है। यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया। दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया। थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए। वह अपने घर पहुंच गए थे। वो युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था। बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी। अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा। महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके। लेकिन देर हो चुकी थी। युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी। कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है। अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है। कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया। एक युवा कहने लगा कि आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे। भगवान के भक्त मे रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता। आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें। साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया। अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया? तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है? एक युवक ने आगे बढ़कर कहा। हाँ, मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ। साधु ने अगला सवाल किया। मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था? युवा बोला नहीं, लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे। मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा। फिर युवक ने मुझे क्यों मारा? युवा कहने लगा। क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे। इसलिए उस युवक ने आपको मारा। युवा बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया। तो भगवान की क़सम मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया। लेकिन कोई है जो मुझसे प्रेम रखता है। अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है। उस परमात्मा की लाठी दिखती नही और आवाज भी नही करती। लेकिन पडती हैं तों बहुत दर्द देंती हैं। हमारें कर्म ही हमें उसकी लाठ़ी से बचातें हैं। कभी किसी को परेशान ना करो, कभी किसी का दिल ना दुखाओ। हिसाब हर चीज़ का देना पड़ता है।

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हनुमानजी की अद्भुत पराक्रम भक्ति कथा 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 जब रावण ने देखा कि हमारी पराजय निश्चित है तो उसने १००० अमर राक्षसों को बुलाकर रणभूमि में भेजने का आदेश दिया ! ये ऐसे थे जिनको काल भी नहीं खा सका था! विभीषण के गुप्तचरों से समाचार मिलने पर श्रीराम को चिंता हुई कि हम लोग इनसे कब तक लड़ेंगे ? सीता का उद्धार और विभीषण का राज तिलक कैसे होगा?क्योंकि युद्ध कि समाप्ति असंभव है ! श्रीराम कि इस स्थिति से वानरवाहिनी के साथ कपिराज सुग्रीव भी विचलित हो गए कि अब क्या होगा ? हम अनंत कल तक युद्ध तो कर सकते हैं पर विजयश्री का वरण नहीं !पूर्वोक्त दोनों कार्य असंभव हैं ! अंजनानंदन हनुमान जी आकर वानर वाहिनी के साथ श्रीराम को चिंतित देखकर बोले –प्रभो ! क्या बात है ? श्रीराम के संकेत से विभीषण जी ने सारी बात बतलाई !अब विजय असंभव है ! पवन पुत्र ने कहा –असम्भव को संभव और संभव को असम्भव कर देने का नाम ही तो हनुमान है !प्रभो! आप केवल मुझे आज्ञा दीजिए मैं अकेले ही जाकर रावण की अमर सेना को नष्ट कर दूँगा !कैसे हनुमान ? वे तो अमर हैं ! प्रभो ! इसकी चिंता आप न करें सेवक पर विश्वास करें !उधर रावण ने चलते समय राक्षसों से कहा था कि वहां हनुमान नाम का एक वानर है उससे जरा सावधान रहना ! एकाकी हनुमानजी को रणभूमि में देखकर राक्षसों ने पूछा तुम कौन हो क्या हम लोगों को देखकर भय नहीं लगता जो अकेले रणभूमि में चले आये ! मारुति –क्यों आते समय राक्षस राज रावण ने तुम लोगों को कुछ संकेत नहीं किया था जो मेरे समक्ष निर्भय खड़े हो !निशाचरों को समझते देर न लगी कि ये महाबली हनुमान हैं ! तो भी क्या ? हम अमर हैं हमारा ये क्या बिगाड़ लेंगे ! भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ पवनपुत्र कि मार से राक्षस रणभूमि में ढेर होने लगे चौथाई सेना बची थी कि पीछे से आवाज आई हनुमान हम लोग अमर हैं हमें जीतना असंभव है ! अतः अपने स्वामी के साथ लंका से लौट जावो इसी में तुम सबका कल्याण है ! आंजनेय ने कहा लौटूंगा अवश्य पर तुम्हारे कहने से नहीं !अपितु अपनी इच्छा से !हाँ तुम सब मिलकर आक्रमण करो फिर मेरा बल देखो और रावण को जाकर बताना ! राक्षसों ने जैसे ही एक साथ मिलकर हनुमानजी पर आक्रमण करना चाहां वैसे ही पवनपुत्र ने उन सबको अपनी पूंछ में लपेटकर ऊपर आकाश में फेंक दिया ! वे सब पृथ्वी कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति जहाँ तक है वहां से भी ऊपर चले गए ! चले ही जा रहे हैं चले मग जात सूखि गए गात गोस्वामी तुलसीदास ! उनका शरीर सूख गया अमर होने के कारण मर सकते नहीं ! अतः रावण को गाली देते हुए और कष्ट के कारण अपनी अमरता को कोसते हुए अभी भी जा रहे हैं ! इधर हनुमान जी ने आकर प्रभु के चरणों में शीश झुकाया !श्रीराम बोले –क्या हुआ हनुमान ! प्रभो ! उन्हें ऊपर भेजकर आ रहा हूँ ! राघव –पर वे अमर थे हनुमान!हाँ स्वामी इसलिए उन्हें जीवित ही ऊपर भेज आया हूँ अब वे कभी भी नीचे नहीं आ सकते ? रावण को अब आप शीघ्रातिशीघ्र ऊपर भेजने की कृपा करें जिससे माता जानकी का आपसे मिलन और महाराज विभीषण का राजसिंहासन हो सके ! पवनपुत्र को प्रभु ने उठाकर गले लगा लिया ! वे धन्य हो गए अविरल भक्ति का वर पाकर ! श्रीराम उनके ऋणी बन गए !और बोले – हनुमानजी—आपने जो उपकार किया है वह मेरे अंग अंग में ही जीर्ण शीर्ण हो जाय मैं उसका बदला न चुका सकूँ ,क्योकि उपकार का बदला विपत्तिकाल में ही चुकाया जाता है ! पुत्र ! तुम पर कभी कोई विपत्ति न आये !निहाल हो गए आंजनेय ! हनुमानजी की वीरता के समान साक्षात काल देवराज इन्द्र महाराज कुबेर तथा भगवान विष्णु की भी वीरता नहीं सुनी गयी –ऐसा कथन श्रीराम का है – न कालस्य न शक्रस्य न विष्णर्वित्तपस्य च ! कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमतः ! 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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अत्रि मुनि: भगवान ब्रह्मा मानस पुत्र(नेत्र) व चन्द्रवंशियों के पितामह.. 🍃🍃 मुनि अत्रि ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक थे जो ब्रह्मा जी के नेत्रों से उत्पन्न हुए थे। यह सोम (चन्द्र) के पिता थे जो इनके नेत्र से आविर्भूत हुए। इन्होंने कर्दम की पुत्री अनुसूया से विवाह किया था जो एक महान पतिव्रता के रूप में विख्यात हुईं हैं। पुत्रोत्पत्ति के लिए इन्होंने ऋक्ष पर्वत पर पत्नी अनुसूया के साथ घोर तप किया था जिस कारण इन्हें त्रिमूर्तियों की प्राप्ति हुई जिनसे त्रिदेवों के अशं रूप में दत्त (विष्णु) दुर्वासा (शिव) और सोम (ब्रह्मा) उत्पन्न हुए। इस तथ्य पर एक कथा आधारित है जो इस प्रकार है ऋषि अत्री और माता अनुसूइया अपने दाम्पत्य जीवन को बहुत सहज भाव के साथ व्यतीत कर रहे थे। देवी अनुसूइया जी की पतिव्रतता के आगे सभी के नतमस्तक हुआ करते थे। इनके जीवन को देखकर देवता भी प्रसन्न होते थे जब एक बार देवी लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को ऋषि अत्रि की पत्नि अनुसूइया के दिव्य पतिव्रत के बारे में ज्ञात होता है तो वह उनकी परीक्षा लेने का विचार करती हैं और तीनों देवियां अपने पतियों भगवान विष्णु, शंकर व ब्रह्मा को अनुसूइया के पतिव्रत की परीक्षा लेने को कहती हैं। विवश होकर त्रिदेव अपने रूप बदलकर एक साधू रूप में ऋषि अत्रि के आश्रम जाते हैं और अनुसूइया से भिक्षा की मांग करते हैं. पर वह एक शर्त रखते हैं कि भिक्षा निर्वस्त्र होकर देनी पड़ेगी इस पर देवी अनुसूइया जी धर्मसंकट में फँस जातीं हैं। यदि भिक्षा न दी तो गलत होगा और देती हैं तो पतिव्रत का अपमान होता है अत: वह उनसे कहती हैं की वह उन्हें बालक रूप में ही यह भि़क्षा दे सकती हैं तथा हाथ में जल लेकर संकल्प द्वारा वह तीनों देवों को शिशु रूप में परिवर्तित कर देती हैं और भिक्षा देती हैं। इस प्रकार तीनों देवता ऋषी अत्रि के आश्रम में बालक रूप में रहने लगते हैं और देवी अनसूइया माता की तरह उनकी देखभाल करती हैं कुछ समय पश्चात जब त्रिदेवियों को इस बात का बोध होता है तो वह अपने पतियों को पुन: प्राप्त करने हेतु ऋषि अत्रि के आश्रम में आतीं हैं और अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करती हैं। इस तरह से ऋषि अत्री के कहने पर माता अनुसूइया त्रिदेवों को मुक्त करती हैं. अपने स्वरूप में आने पर तीनों देव ऋषि अत्रि व माता अनुसूइया को वरदान देते हैं कि वह कालाम्तर में उनके घर पुत्र रूप में जन्म लेंग और त्रिदेवों के अशं रूप में दत्तात्रेय , दुर्वासा और सोम रुप में उत्पन्न हुए थे। वैदिक मन्त्रद्रष्टा: महर्षि अत्रि वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि माने गए हैं अनेक धार्मिक ग्रंथों में इनके आविर्भाव तथा चरित्र का सुन्दर वर्णन किया गया है। महर्षि अत्रि को ज्ञान, तपस्या, सदाचार, भक्ति एवं मन्त्रशक्ति के ज्ञाता रूप में व्यक्त किया जाता है। ऋषि अत्रि और श्री राम: भगवान श्री राम अपने भक्त महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया की भक्ति को सफल करने के लिए स्वयं उनके आश्रम पर पधारते हैं और माता अनुसूइया देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश भी देती हैं। उन्हें दिव्य वस्त्र एवं आभूषण प्रदान करती हैं महर्षि अत्रि तीनों गुणों सत्त्व, रजस, तमस गुणों से परे थे वह गुणातीत थे महर्षि अत्रि सदाचार का जीवन व्यतीत करते हुए चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। ऋषि अत्रि जीवन वृतांत: वेदों में वर्णित है कि ऋषि अत्रि को अश्विनीकुमारों की कृपा प्राप्त थी इस पर एक कथा भी प्राप्त होती है कि एक बार जब महर्षि अत्रि समाधिस्थ थे, तब दैत्यों ने इन्हें उठाकर शतद्वार यन्त्र में डाल देते हैं और जलाने का प्रयत्न करते हैं परंतु समाधी में होने के कारण इन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता तभी उचित समय पर अश्विनीकुमार वहाँ पहुँचकर ऋषि अत्रि को उन दैत्यों के चंगुल से बचाते हैं यही कथा ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में भी बताई गई है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में महर्षि अत्रि के तपस्या अनुष्ठान का वर्णन है एवं अश्विनीकुमारों ने इन्हें यौवन प्रदान किया इस तथ्य को व्यक्त किया गया है। ऋग्वेद के पंचम मण्डल में वसूयु, सप्तवध्रि नामक अनेक पुत्रों को ऋषि अत्रि के पुत्र कहा गया है। ऋग्वेद के पंचम ‘आत्रेय मण्डल′, ‘कल्याण सूक्त’ ऋग्वेदीय ‘स्वस्ति-सूक्त’ महर्षि अत्रि द्वारा रचित हैं यह सूक्त मांगलिक कार्यों, शुभ संस्कारों तथा पूजा, अनुष्ठानों में पठित होते हैं इन्होंने अलर्क, प्रह्लाद आदि को शिक्षा भी दी थी। महर्षि अत्रि त्याग, तपस्या और संतोष के गुणों से युक्त एक महान ऋषि हुए। अत्रि महर्षि अत्रि वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। सम्पूर्ण ऋग्वेद दस मण्डलों में प्रविभक्त है। प्रत्येक मण्डल के मन्त्रों के ऋषि अलग-अलग हैं। उनमें से ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि हैं। इसीलिये यह मण्डल 'आत्रेय मण्डल' कहलाता है। इस मण्डल में 87 सूक्त हैं। जिनमें महर्षि अत्रि द्वारा विशेष रूप से अग्नि, इन्द्र, मरूत, विश्वेदेव तथा सविता आदि देवों की महनीय स्तुतियाँ ग्रथित हैं। इन्द्र तथा अग्निदेवता के महनीय कर्मों का वर्णन है। अत्रि ब्रह्मा के पुत्र थे जो उनके नेत्रों से उत्पन्न हुए थे। ये सोम के पिता थे जो इनके नेत्र से आविर्भूत हुए थे। इन्होंने कर्दम की पुत्री अनुसूया से विवाह किया था। इन दोनों के पुत्र दत्तात्रेय थे। इन्होंने अलर्क, प्रह्लाद आदि को अन्वीक्षकी की शिक्षा दी थी। भीष्म जब शर-शैय्या पर पड़े थे, उस समय ये उनसे मिलने गये थे। परीक्षित जब प्रायोपवेश का अभ्यास कर रहे थे, तो ये उन्हें देखने गये थे। पुत्रोत्पत्ति के लिए इन्होंने ऋक्ष पर्वत पर पत्नी के साथ तप किया था। इन्होंने त्रिमूर्तियों की प्रार्थना की थी जिनसे त्रिदेवों के अशं रूप में दत्त (विष्णु) दुर्वासा (शिव) और सोम (ब्रह्मा) उत्पन्न हुए थे। इन्होंने दो बार पृथु को घोड़े चुराकर भागते हुए इन्द्र को दिखाया था तथा हत्या करने को कहा था। ये वैवस्वत युग के मुनि थे। मन्त्रकार के रूप में इन्होंने उत्तानपाद को अपने पुत्र के रूप में ग्रहण किया था। इनके ब्रह्मावादिनी नाम की कन्या थी। परशुराम जब ध्यानावस्थित रूप में थे उस समय ये उनके पास गये थे। इन्होंने श्राद्ध द्वारा पितरों की अराधना की थी और सोम की राजक्ष्मा रोग से मुक्त किया था। ब्रह्मा के द्वारा सृष्टि की रचना के लिए नियुक्त किये जाने पर इन्होंने 'अनुत्तम' तक किया था जब कि शिव इनसे मिले थे। सोम के राजसूय यज्ञ में इन्होंने होता का कार्य किया था। त्रिपुर के विनाश के लिए इन्होंने शिव की आराधना की थी। बनवास के समय राम अत्रि के आश्रम भी गये थे वैदिक मन्त्रद्रष्टा पुराणों में इनके आविर्भाव का तथा उदात्त चरित्र का बड़ा ही सुन्दर वर्णन हुआ है। वहाँ के वर्णन के अनुसार महर्षि अत्रि ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र हैं और उनके चक्षु भाग से इनका प्रादुर्भाव हुआ। सप्तर्षियों में महर्षि अत्रि का परिगणन है। साथ ही इन्हें 'प्रजापति' भी कहा गया है। महर्षि अत्रि की पत्नी अनुसूया जी हैं, जो कर्दम प्रजापति और देवहूति की पुत्री हैं। देवी अनुसूया पतिव्रताओं की आदर्शभूता और महान् दिव्यतेज से सम्पन्न हैं। महर्षि अत्रि जहाँ ज्ञान, तपस्या, सदाचार, भक्ति एवं मन्त्रशक्ति के मूर्तिमान स्वरूप हैं; वहीं देवी अनुसूया पतिव्रता धर्म एवं शील की मूर्तिमती विग्रह हैं। भगवान श्री राम अपने भक्त महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया की भक्ति को सफल करने स्वयं उनके आश्रम पर पधारे। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया। उन्होंने अपने पतिव्रत के बल पर शैव्या ब्राह्माणी के मृत पति को जीवित कराया तथा बाधित सूर्य को उदित कराकर संसार का कल्याण किया। देवी अनुसूया का नाम ही बड़े महत्त्व का है। अनुसूया नाम है परदोष-दर्शन का –गुणों में भी दोष-बुद्धि का और जो इन विकारों से रहित हो, वही 'अनुसूया' है। इसी प्रकार महर्षि अत्रि भी 'अ+त्रि' हैं अर्थात् वे तीनों गुणों (सत्त्व, रजस, तमस)- से अतीत है- गुणातीत हैं। इस प्रकार महर्षि अत्रि-दम्पति एवं विध अपने नामानुरूप जीवन यापन करते हुए सदाचार परायण हो चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। अत्रि पत्नी अनुसूया के तपोबल से ही भागीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूट में प्रविष्ट हुई और 'मंदाकिनी' नाम से प्रसिद्ध हुई। सृष्टि के प्रारम्भ में जब इन दम्पति को ब्रह्मा जी ने सृष्टिवर्धन की आज्ञा दी तो इन्होंने उस ओर उन्मुख न हो तपस्या का ही आश्रय लिया। इनकी तपस्या से ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने प्रसन्न होकर इन्हें दर्शन दिया और दम्पति की प्रार्थना पर इनका पुत्र बनना स्वीकार किया। अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में आविर्भूत हुए। वेदों में उपर्युक्त वृत्तान्त यथावत नहीं मिलता है, कहीं-कहीं नामों में अन्तर भी है। ऋग्वेद - में 'अत्रि:सांख्य:' कहा गया है। वेदों में यह स्पष्ट रूप से वर्णन है कि महर्षि अत्रि को अश्विनीकुमारों की कृपा प्राप्त थी। एक बार जब ये समाधिस्थ थे, तब दैत्यों ने इन्हें उठाकर शतद्वार यन्त्र में डाल दिया और आग लगाकर इन्हें जलाने का प्रयत्न किया, किंतु अत्रि को उसका कुछ भी ज्ञान नहीं था। उस समय अश्विनीकुमारों ने वहाँ पहुँचकर इन्हें बचाया। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 51वें तथा 112वें सूक्त में यह कथा आयी है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में महर्षि अत्रि के दीर्घ तपस्या के अनुष्ठान का वर्णन आया है और बताया गया है कि यज्ञ तथा तप आदि करते-करते जब अत्रि वृद्ध हो गये, तब अश्विनीकुमारों ने इन्हें नवयौवन प्रदान किया। ऋग्वेद के पंचम मण्डल में अत्रि के वसूयु, सप्तवध्रि नामक अनेक पुत्रों का वृत्तान्त आया है, जो अनेक मन्त्रों के द्रष्टा ऋषि रहे हैं। इसी प्रकार अत्रि के गोत्रज आत्रेयगण ऋग्वेद के बहुत से मन्त्रों के द्रष्टा हैं। ऋग्वेद के पंचम 'आत्रेय मण्डल' का 'कल्याण सूक्त' ऋग्वेदीय 'स्वस्ति-सूक्त' है, वह महर्षि अत्रि की ऋतम्भरा प्रज्ञा से ही हमें प्राप्त हो सका है यह सूक्त 'कल्याण-सूक्त', 'मंगल-सूक्त' तथा 'श्रेय-सूक्त' भी कहलाता है। जो आज भी प्रत्येक मांगलिक कार्यों, शुभ संस्कारों तथा पूजा, अनुष्ठानों में स्वस्ति-प्राप्ति, कल्याण-प्राप्ति, अभ्युदय-प्राप्ति, भगवत्कृपा-प्राप्ति तथा अमंगल के विनाश के लिये सस्वर पठित होता है। इस मांगलिक सूक्त में अश्विनी, भग, अदिति, पूषा, द्यावा, पृथिवी, बृहस्पति, आदित्य, वैश्वानर, सविता तथा मित्रा वरुण और सूर्य-चंद्रमा आदि देवताओं से प्राणिमात्र के लिये स्वस्ति की प्रार्थना की गयी है। इससे महर्षि अत्रि के उदात्त-भाव तथा लोक-कल्याण की भावना का किंचित स्थापना होता है। इसी प्रकार महर्षि अत्रि ने मण्डल की पूर्णता में भी सविता देव से यही प्रार्थना की है कि 'हे सविता देव! आप हमारे सम्पूर्ण दु:खों को-अनिष्टों को, शोक-कष्टों को दूर कर दें और हमारे लिये जो हितकर हो, कल्याणकारी हो, उसे उपलब्ध करायें'। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि महर्षि अत्रि की भावना अत्यन्त ही कल्याणकारी थी और उनमें त्याग, तपस्या, शौच, संतोष, अपरिग्रह, अनासक्ति तथा विश्व कल्याण की पराकष्ठा विद्यमान थी। एक ओर जहाँ उन्होंने वैदिक ऋचाओं का दर्शन किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपनी प्रजा को सदाचार और धर्माचरणपूर्वक एक उत्तम जीवनचर्या में प्रवृत्त होने के लिये प्रेरित किया है तथा कर्तव्या-कर्तव्य का निर्देश दिया है। इन शिक्षोपदेशों को उन्होंने अपने द्वारा निर्मित आत्रेय धर्मशास्त्र में उपनिबद्ध किया है। वहाँ इन्होंने वेदों के सूक्तों तथा मन्त्रों की अत्यन्त महिमा बतायी है। अत्रिस्मृति का छठा अध्याय वेदमन्त्रों की महिमा में ही पर्यवसित है। वहाँ अघमर्षण के मन्त्र, सूर्योपस्थान का यह 'उदु त्यं जातवेदसं0' मन्त्र, पावमानी ऋचाएँ, शतरुद्रिय, गो-सूक्त, अश्व-सूक्त एवं इन्द्र-सूक्त आदि का निर्देश कर उनकी महिमा और पाठ का फल बताया गया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि महर्षि अत्रि की वेद मन्त्रों पर कितनी दृढ़ निष्ठा थी। महर्षि अत्रि का कहना है कि वैदिक मन्त्रों के अधिकारपूर्वक जप से सभी प्रकार के पाप-क्लेशों का विनाश हो जाता है। पाठ कर्ता पवित्र हो जाता है, उसे जन्मान्तरीय ज्ञान हो जाता है- जाति-स्मरता प्राप्त हो जाती है और वह जो चाहता है, वह प्राप्त कर लेता है। अपनी स्मृति के अन्तिम 9वें अध्याय में महर्षि अत्रि ने बहुत सुन्दर बात बताते हुए कहा है कि यदि विद्वेष भाव से वैरपूर्वक भी दमघोष के पुत्र शिशुपाल की तरह भगवान का स्मरण किया जाय तो उद्धार होने में कोई संदेह नहीं; फिर यदि तत्परायण होकर अनन्य भाव से भगवदाश्रय ग्रहण कर लिया जाय तो परम कल्याण में क्या संदेह? इस प्रकार महर्षि अत्रि ने अपने द्वारा द्रष्ट मन्त्रों में, अपने धर्मसूत्रों में अथवा अपने सदाचरण से यही बात बतायी है कि व्यक्ति को सत्कर्म का ही अनुष्ठान करना चाहिये। अत्रिवंश: ब्रह्मा के पुत्र अत्रि ने ब्रह्मा पुत्र कर्दम की पुत्री अनुसूया से विवाह किया था। अनुसूया की माता का नाम देवहूति था। अत्रि को अनुसूया से एक पुत्र जन्मा जिसका नाम दत्तात्रेय था। अत्रि-दंपति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा (सोम) तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा, महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में आविर्भूत हुए। इनके ब्रह्मावादिनी नाम की कन्या भी थी। महर्षि अत्रि सत युग के ब्रह्मा के 10 पुत्रों में से थे तथा उनका आखिरी अस्तित्व चित्रकूट में सीता-अनुसूया संवाद के समय तक अस्तित्व में था। अत्रि पुत्र चन्द्रमा ने बृहस्पति की पत्नी तारा से विवाह किया जिससे उसे बुध नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बाद में क्षत्रियों के चंद्रवंश का प्रवर्तक हुआ। इस वंश के राजा खुद को चंद्रवंशी कहते थे। चूंकि चंद्र अत्रि ऋषि की संतान थे इसलिए आत्रेय भी चंद्रवंशी ही हुए। ब्राह्मणों में एक उपनाम होता है आत्रेय अर्थात अत्रि से संबंधित या अत्रि की संतान। चंद्रवंश के प्रथम राजा का नाम भी सोम (चन्द्र) माना जाता है जिसका प्रयाग पर शासन था। अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से यति, ययाति, संयाति, आयति, वियाति और कृति नामक छः महाबल-विक्रमशाली पुत्र हुए। नहुष के बड़े पुत्र यति थे, जो संन्यासी हो गए इसलिए उनके दुसरे पुत्र ययाति राजा हुए। ययाति के पुत्रों से ही समस्त वंश चले। ययाति के 5 पुत्र थे। देवयानी से यदु और तुर्वसु तथा शर्मिष्ठा से द्रुह्मु, अनु एवं पुरु हुए। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रहुयु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई। ययाति के 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुह्मु। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,

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Anuradha Tiwari Apr 18, 2019

II नवग्रह स्तोत्र II अथ नवग्रह स्तोत्र II श्री गणेशाय नमः II जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महदद्युतिम् I तमोरिंसर्वपापघ्नं प्रणतोSस्मि दिवाकरम् II १ II दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम् I नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम् II २ II धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांति समप्रभम् I कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणाम्यहम् II ३ II प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम् I सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् II ४ II देवानांच ऋषीनांच गुरुं कांचन सन्निभम् I बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् II ५ II हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् I सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् II ६ II नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् I छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् II ७ II अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनम् I सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् II ८ II पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम् I रौद्रंरौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् II ९ II इति श्रीव्यासमुखोग्दीतम् यः पठेत् सुसमाहितः I दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्न शांतिर्भविष्यति II १० II नरनारी नृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् I ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् II ११ II ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुभ्दवाः I ता सर्वाःप्रशमं यान्ति व्यासोब्रुते न संशयः II १२ II II इति श्रीव्यास विरचितम् आदित्यादी नवग्रह स्तोत्रं संपूर्णं II

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🌹हरे कृष्ण👏 भगवान श्रीकृष्ण का गोलोकधाम श्याम की चर्चा हमारा प्राण है, श्याम की चर्चा सुखों की खान है, श्याम की चर्चा हमारी शान है, श्याम की चर्चा हमारा मान है, भगवान श्रीकृष्ण के रूप, गुण और लीला जितनी अद्भुत व अलौकिक हैं, उतना ही अद्भुत, अलौकिक व अविश्वसनीय उनका गोलोकधाम है। प्रारम्भ से लेकर लीलावसान तक श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण चरित्र स्वयं भी हैरान कर देने वाला है–एक नवजात बालक अपनी षष्ठी के दिन एक राक्षसी का प्राणान्त कर दे, कुछ ही महीनों में बड़े-बड़े राक्षसों (शकटासुर, अघासुर, तृणावर्त आदि) का ‘अच्युतम् केशवम्’ (अंत) कर दे–यह सब मायापति श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं क्योंकि वे ईश्वरों के भी ईश्वर परमब्रह्म परमात्मा हैं। पुराणों में गोलोकधाम का जो वर्णन है, वह मनुष्य की सोच, विश्वास व कल्पना से परे है। वहां का सब कुछ अनिर्वचनीय (वर्णन न किया जा सके), अदृष्ट और अश्रुत (वैसा दृश्य कभी देखने व सुनने में न आया हो) है। गोलोकधाम बहुमूल्य रत्नों व मणियों के सारतत्व से बना है, वहां के घर, नदी के तट, सीढ़ियां, मार्ग, स्तम्भ, परकोटे, दर्पण, दरवाजे सभी कुछ रत्नों व मणियों से बने हैं। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपनी नीली आभा के कारण भक्तों द्वारा ‘नीलमणि’ नाम से पुकारे जाते हैं। हम यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि गोलोकधाम में कितने गोप-गोपियां है, कितने कल्पवृक्ष हैं, कितनी गौएं हैं। सब कुछ इतना अलौकिक व आश्चर्यचकित कर देने वाला है कि सहज ही उस पर विश्वास करना कठिन हो जाता है। पर भक्ति तर्क से नहीं, विश्वास से होती है। गोलोकधाम का पूरा वर्णन करना बड़े-बड़े विद्वानों के लिए भी संभव नहीं है, परन्तु श्रद्धा, भक्ति और प्रेमरूपी त्रिवेणी के द्वारा उसको समझना और मन की कल्पनाओं द्वारा उसमें प्रवेश करना संभव है, अन्यथा किसकी क्षमता है जो इस अनन्त सौंदर्य, अनन्त ऐश्वर्य और अनन्त माधुर्य को भाषा के द्वारा व्यक्त कर सके। गोलोकधाम के अनन्तान्त सौन्दर्य-ऐश्वर्य-माधुर्य की एक झलक पूर्वकाल में दैत्यों और असुर स्वभाव वाले राजाओं के भार से पीड़ित होकर पृथ्वी गौ का रूप धारणकर ब्रह्मा, शंकर और धर्म आदि देवताओं के साथ वैकुण्ठधाम गई और भगवान विष्णु से अपने कष्ट से मुक्ति के लिए याचना करने लगी। तब भगवान विष्णु ने समस्त देवताओं से कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ही समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी हैं, उनकी कृपा के बिना यह कार्य सिद्ध नहीं होगा, अत: तुम लोग उन्हीं के अविनाशी धाम को जाओ। ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु से कहा–यदि कोई दूसरा भी आपसे उत्कृष्ट परमेश्वर है, तो उसके लोक का हमें दर्शन कराइए। भगवान विष्णु ने सभी देवताओं सहित ब्रह्माजी को ब्रह्माण्ड शिखर पर स्थित गोलोकधाम का मार्ग दिखलाया। ब्रह्मादि देवताओं द्वारा 4 गोलोकधाम का दर्शन भगवान विष्णु द्वारा बताये मार्ग का अनुसरण कर देवतागण ब्रह्माण्ड के ऊपरी भाग से करोड़ों योजन ऊपर गोलोकधाम में पहुंचे। गोलोक ब्रह्माण्ड से बाहर और तीनों लोकों से ऊपर है। उससे ऊपर दूसरा कोई लोक नहीं है। ऊपर सब कुछ शून्य ही है। वहीं तक सृष्टि की अंतिम सीमा है। गोलोकधाम परमात्मा श्रीकृष्ण के समान ही नित्य है। यह भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से निर्मित है। उसका कोई बाह्य आधार नहीं है। अप्राकृत आकाश में स्थित इस श्रेष्ठ धाम को परमात्मा श्रीकृष्ण अपनी योगशक्ति से (बिना आधार के) वायु रूप से धारण करते हैं। उसकी लम्बाई-चौड़ाई तीन करोड़ योजन है। वह सब ओर मण्डलाकार फैला हुआ है। परम महान तेज ही उसका स्वरूप है। प्रलयकाल में वहां केवल श्रीकृष्ण रहते हैं और सृष्टिकाल में वह गोप-गोपियों से भरा रहता है। गोलोक के नीचे पचास करोड़ योजन दूर दक्षिण में वैकुण्ठ और वामभाग में शिवलोक है। वैकुण्ठ व शिवलोक भी गोलोक की तरह नित्य धाम हैं। इन सबकी स्थिति कृत्रिम विश्व से बाहर है, ठीक उसी तरह जैसे आत्मा, आकाश और दिशाएं कृत्रिम जगत से बाहर तथा नित्य हैं। विरजा नदी से घिरा हुआ शतश्रृंग पर्वत गोलोकधाम का परकोटा है। श्रीवृन्दावन से युक्त रासमण्डल गोलोकधाम का अलंकार है। जैसे कमल में कर्णिका होती है, उसी प्रकार इन नदी, पर्वत और वन आदि के मध्यभाग में वह मनोहर गोलोकधाम प्रतिष्ठित है। उस चिन्मय लोक की भूमि दिव्य रत्नमयी है। उसके सात दरवाजे हैं। वह सात खाइयों से घिरा हुआ है। उसके चारों ओर लाखों परकोटे हैं। रत्नों के सार से बने विचित्र खम्भे, सीढ़ियां, मणिमय दर्पणों से जड़े किवाड़ और कलश, नाना प्रकार के चित्र, दिव्य रत्नों से रचित असंख्य भवन उस धाम की शोभा को और बढ़ा देते हैं। योगियों को स्वप्न में भी इस धाम का दर्शन नहीं होता परन्तु वैष्णव भक्त भगवान की कृपा से उसको प्रत्यक्ष देखते और वहाँ जाते हैं। वहां आधि, व्याधि, जरा, मृत्यु, शोक और भय का प्रवेश नहीं है। मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार, सोलह विकार तथा महतत्त्व भी वहां प्रवेश नहीं कर सकते फिर तीनों गुणों–सत्, रज, तम के विषय में तो कहना ही क्या? वहां न काल की दाल गलती है और न ही माया का कोई वश चलता है फिर माया के बाल-बच्चे तो वहां जा ही कैसे सकते हैं। यह केवल मंगल का धाम है जो समस्त लोकों में श्रेष्ठतम है। वहां कामदेव के समान रूपलावण्यवाली, श्यामसुन्दर के समान विग्रहवाली श्रीकृष्ण की पार्षदा द्वारपालिकाओं का काम करती हैं। जब देवताओं ने गोलोकधाम में प्रवेश करना चाहा तो द्वारपालिकाओं में प्रमुख पीले वस्त्र पहने व हाथ में बेंत लिए शतचन्द्रानना सखी ने उन्हें रोक दिया और पूछा–आप सब देवता किस ब्रह्माण्ड के निवासी हैं, बताएं। यह सुनकर देवताओं को बहुत आश्चर्य हुआ कि क्या अन्य ब्रह्माण्ड भी हैं, हमने तो उन्हें कभी नहीं देखा। शतचन्द्रानना सखी ने उन्हें बताया कि यहां तो विरजा नदी में करोड़ों ब्रह्माण्ड इधर-उधर लुढ़क रहे हैं। उनमें आप जैसे ही देवता वास करते हैं। क्या आप लोग अपना नाम-गांव भी नहीं जानते? इस प्रकार उपहास का पात्र बने सभी देवता चुपचाप खड़े रहे तब भगवान विष्णु ने कहा–जिस ब्रह्माण्ड में भगवान पृश्निगर्भ का अवतार हुआ है, तथा विराट रूपधारी भगवान वामन के नख से जिस ब्रह्माण्ड में छिद्र बन गया है, हम उसी से आए हैं। तब उन देवताओं को गोलोकधाम में प्रवेश की आज्ञा मिली। मन की तीव्र गति से चलते हुए समस्त देवता विरजा नदी के तट पर जा पहुंचे। विरजा नदी–विरजा नदी का तट स्फटिकमणि के समान उज्जवल और विस्तृत था। उस तट पर कहीं तो मूंगों के अंकुर दिखाई दे रहे थे, तो कहीं पद्मरागमणि, कौस्तुभमणि, इन्द्रनीलमणि, मरकतमणि, स्यमन्तकमणि और स्वर्णमुद्राओं की खानें थीं। उस नदी में उतरने के लिए वैदूर्यमणि की सुन्दर सीढ़ियां बनी हुईं थीं। उस परम आश्चर्यजनक तट को देखकर सभी देवता नदी के उस पार गए तो उन्हें शतश्रृंग पर्वत दिखाई दिया रत्नमयशतश्रृंग पर्वत–शतश्रृंग पर्वत दिव्य पारिजात वृक्षों, कल्पवृक्षों और कामधेनुओं द्वारा सब ओर से घिरा था। यह पर्वत चहारदीवारी की तहरह गोलोक के चारों ओर फैला हुआ था। उसकी ऊंचाई एक करोड़ योजन और लम्बाई दस करोड़ योजन थी। गोलोक का यह ‘गोवर्धन’ पर्वत कल्पलताओं के समुदाय से सुशोभित था। उसी के शिखर पर गोलाकार रासमण्डल है। रासमण्डल–गोलोकधाम में दिव्य रत्नों द्वारा निर्मित चन्द्रमण्डल के समान गोलाकार रासमण्डल है, जिसका विस्तार दस हजार योजन है। वह फूलों से लदे हुए पारिजात वन से, सहस्त्रों कल्पवृक्षों से और सैंकड़ों पुष्पोद्यानों से घिरा हुआ है। उस रासमण्डल में तीन करोड़ रत्नों से बने भवन हैं, जहां रत्नमय प्रदीप प्रकाश देते हैं और नाना प्रकार की भोगसामग्री संचित है। श्वेतधान्य, विभिन्न पल्लवों, फल, दूर्वादल और मंगलद्रव्य उस रासमण्डल की शोभा बढ़ाते हैं। चंदन, अगरु, कस्तूरी और कुंकुमयुक्त जल का वहां सब ओर छिड़काव हुआ है। रेशमी सूत में गुंथे हुए चंदन के पत्तों की बंदनवारों और केले के खम्भों द्वारा वह चारों ओर से घिरा हुआ था। पीले रंग की साड़ी व रत्नमय आभूषणों से विभूषित गोपकिशोरियां उस रासमण्डल को घेरे हुए हैं। श्रीराधिका के चरणारविन्दों की सेवा में लगे रहना ही उनका मनोरथ है। रासमण्डल के सब ओर मधु की और अमृत की बाबलियां हैं। अनेक रंगों के कमलों से सुशोभित क्रीडा-सरोवर रासमण्डल को चारों ओर से घेरे हुए हैं, जिनमें असंख्य भौंरों के समूह गूंजते रहते हैं। रासमण्डल में असंख्य कुंज-कुटीर हैं जो रासमण्डल की शोभा को और बढ़ा रहे हैं। श्रीराधा की आज्ञा से असंख्य गोपसुन्दरियां रासमण्डल की रक्षा में नियुक्त रहती हैं। उस रासमण्डल को देखकर जब सब देवता उस पर्वत की सीमा से बाहर हुए तब उन्हें रमणीय वृन्दावन के दर्शन हुए। वृन्दावन–वृन्दावन श्रीराधामाधव को बहुत प्रिय है। यह युगल स्वरूप का क्रीडास्थल है। विरजा नदी के जल से भीगी हुई मंद-मंद वायु कल्पवृक्षों के समूह को छूकर कस्तूरी जैसी सुगन्धित हो जाती है। ऐसी सुगन्धित वायु का स्पर्श पाकर मोतिया, बेला, जूही, कुन्द, केतकी, माधवीलता आदि लताओं के समूह मदमस्त हो झूमते दिखाई देते हैं। सारा वन कदम्ब, मंदार, चन्दन आदि सुगन्धित पुष्पों की अलौकिक सुगंध से भरा रहता है जिन पर मधुलोभी भौंरे गुंजन करते फिरते हैं। इन भ्रमरों की गुंजार से सारा वृन्दावन मुखरित रहता है। ऐसे ही आम, नारंगी, कटहल, ताड़, नारियल, जामुन, बेर, खजूर, सुपारी, आंवला, नीबू, केला आदि के वृक्ष समूह उस वन की शोभा को और भी बढ़ा देते हैं। वृन्दावन के मध्य भाग में बत्तीस वनों से युक्त एक ‘निज निकुंज’ है जिसका आंगन अक्षयवटों से अलंकृत है। पद्मरागादि सात प्रकार की मणियों से उसकी दीवारें व फर्श बने हैं। रत्नमय अलंकारों से सजी करोड़ों गोपियां श्रीराधा की आज्ञा से उस वन की रक्षा करती हैं। साथ ही श्रीकृष्ण के समान रूप वाले व सुन्दर वस्त्र व आभूषणों से सजे-धजे गोप उस वृन्दावन में इधर-उधर विचरण कर रहे थे। वहां कोटि-कोटि पीली पूंछ वाली सवत्सा गौएं हैं जिनके सींगों पर सोना मढ़ा है व दिव्य आभूषणों, घण्टों व मंजीरों से विभूषित हैं। नाना रंगों वाली गायों में कोई उजली, कोई काली, कोई पीली, कोई लाल, कोई तांबई तो कोई चितकबरे रंग की हैं। दूध देने में समुद्र की तुलना करने वाली उन गायों के शरीर पर गोपियों के हाथों की हथेलियों के चिह्न (छापे) लगे हैं। गायों के साथ उनके छोटे-छोटे बछड़े भी हैं जो चारों तरफ हिरनों की तरह छलांगें लगा रहे हैं। गायों के झुण्ड में ही धर्मरूप सांड भी मस्ती में इधर-उधर घूम रहे थे। गौओं की रक्षा करने वाले गोपाल हाथ में बेंत व बांसुरी लिए हुए हैं व श्रीकृष्ण के समान श्यामवर्ण हैं। वे अत्यन्त मधुर स्वर में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का गान कर रहे थे। ऐसे रमणीय वृन्दावन के दर्शन करते हुए वे देवतागण गोलोकधाम में जा पहुंचे। गोलोक में कितने घर हैं, यह कौन बता सकता है? श्रीकृष्ण की सेवा में लगे रहने वाले गोपों के रत्नजटित पचास करोड़ आश्रम हैं जो विभिन्न प्रकार के भोगों से सम्पन्न हैं। श्रीकृष्ण के पार्षदों के दस करोड़ आश्रम हैं। पार्षदों में भी प्रमुख वे लोग जो श्रीकृष्ण के समान ही रूप बनाकर रहते हैं, उनके एक करोड़ आश्रम हैं। श्रीराधिका में विशुद्ध भक्ति रखने वाली गोपांगनाओं के बत्तीस करोड़ व उनकी किंकरियों के दस करोड़ आश्रम हैं। भक्तों के लिए सुलभ गोलोकधाम सैंकड़ों वर्षों की तपस्याओं से पवित्र हुए जो भक्त भूतल पर श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन हैं, सोते-जागते हर समय अपने मन को श्रीकृष्ण में लगाए रहते हैं, दिन-रात ‘राधाकृष्ण’, श्रीकृष्ण’ की रट लगाए हुए है, नाम जपते हैं, उनके कर्मबंधन नष्ट हो जाते हैं। ऐसे भक्तों के लिए गोलोक में बहुत सुन्दर निवासस्थान बने हुए हैं, जो उत्तम मणिरत्नों से निर्मित व समस्त भोगसामग्री से सम्पन्न हैं। ऐसे भवनों की संख्या सौ करोड़ है। थोड़ा आगे चलने पर देवताओं को एक अक्षयवट दिखाई दिया जिसका विस्तार पांच योजन व ऊंचाई दस योजन है। उसमें सहस्त्रों तनें और असंख्य शाखाएं थीं। लाल-लाल पके फलों से लदे उस वृक्ष के नीचे रत्नमय वेदिकाएं बनीं हुईं थी। उस वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण के समान ही पीताम्बरधारी, चंदन से अंगों को सजाये हुए व रत्नमय आभूषण पहने गोपशिशु खेल रहे थे। वहां से होते हुए देवतागण एक सुन्दर राजमार्ग से होकर चले जो लालमणियों से निर्मित था और जिसके दोनों ओर रत्नमय विश्राम-मण्डप बने थे। राजमार्ग पर कुंकुम-केसर के जल का छिड़काव किया गया था। रत्नमय मंगल कलशों व सहस्त्रों केले के खम्भों से उस पथ को दोनों ओर से सजाया गया था। झुंड-की-झुंड गोपिकाएं उस मार्ग को घेरे खड़ी थीं। कुछ दूर जाने पर देवताओं को गोपीशिरोमणि श्रीकृष्णप्राणाधिका श्रीराधा का निवासस्थान दिखाई दिया। श्रीराधा के अंत:पुर का वर्णन श्रीराधा के अंत:पुर में प्रवेश के लिए देवताओं को सोलह द्वार पार करने पड़े जोकि उत्तम रत्नों व मणियों से निर्मित थे। प्रथम द्वार की रक्षा द्वारपाल वीरभानु कर रहे थे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा लेकर ही देवताओं को प्रथम द्वार से आगे जाने दिया। दूसरे द्वार पर चन्द्रभानु हाथ में सोने का बेंत लिए पांच लाख गोपों के साथ थे, तीसरे द्वार पर सूर्यभानु हाथ में मुरली लिए नौ लाख गोपों सहित उपस्थित थे। चौथे द्वार पर हाथ में मणिमय दण्ड लिए वसुभानु नौ लाख गोपों के साथ, पांचवें द्वार पर हाथ में बेंत लिए देवभानु दस लाख गोपों के साथ, छठे द्वार पर शक्रभानु दस लाख गोपों के साथ, सातवें द्वार पर रत्नभानु बारह लाख गोपों के साथ, आठवें द्वार पर सुपार्श्व दण्ड व बारह लाख गोपों के साथ, नवें द्वार पर सुबल बारह लाख गोपों के साथ पहरा दे रहे थे। दसवें द्वार पर सुदामा नामक गोप जिनका रूप श्रीकृष्ण के ही समान था, दण्ड लिए बीस लाख गोपों के साथ प्रतिष्ठित थे। ग्यारहवें द्वार पर व्रजराज श्रीदामा करोड़ों गोपों के साथ उपस्थित थे, जिन्हें श्रीराधा अपने पुत्र के समान मानती थीं। उनकी आज्ञा लेकर जब देवेश्वर आगे गए तो आगे के तीनों द्वार स्वप्नकालिक अनुभव के समान अद्भुत, अश्रुत, अतिरमणीय व विद्वानों के द्वारा भी अवर्णनीय थे। उन तीनों द्वारों की रक्षा में कोटि-कोटि गोपांगनाएं नियुक्त थीं। वे सुन्दरियों में भी परम सुन्दरी, रूप-यौवन से सम्पन्न, रत्नाभरणों से विभूषित, सौभाग्यशालिनी व श्रीराधिका की प्रिया हैं। उन्होंने चंदन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुम से अपना श्रृंगार किया हुआ था। सोलहवां द्वार सब द्वारों में प्रधान श्रीराधा के अंत:पुर का द्वार था जिसकी रक्षा श्रीराधा की तैंतीस (33) सखियां करती थीं। उन सबके रूप-यौवन व वेशभूषा, अलंकारों व गुणों का वर्णन करना संभव नहीं है। श्रीराधा के ही समान उम्र वाली उनकी तैंतीस सखियां हैं–सुशीला, शशिकला, यमुना, माधवी, रति, कदम्बमाला, कुन्ती, जाह्नवी, स्वयंप्रभा, चन्द्रमुखी, पद्ममुखी, सावित्री, सुधामुखी, शुभा, पद्मा, पारिजाता, गौरी, सर्वमंगला, कालिका, कमला, दुर्गा, भारती, सरस्वती, गंगा, अम्बिका, मधुमती, चम्पा, अपर्णा, सुन्दरी, कृष्णप्रिया, सती, नन्दिनी, और नन्दना। श्रीराधा की सेवा में रहने वाली गोपियां भी उन्हीं की तरह हैं। वे हाथों में श्वेत चंवर लिए रहती हैं। वहां नाना प्रकार का वेश धारण किए गोपिकाओं में कोई हाथों से मृदंग बजा रही थी, तो कोई वीणा-वादन कर रही थी, कोई करताल, तो कोई रत्नमयी कांजी बजा रही थी, कुछ गोपिकाएं नुपुरों की झनकार कर रहीं थीं। श्रीराधा और श्रीकृष्ण के गुणगान सम्बन्धी पदों का संगीत वहां सब ओर सुनाई पड़ता था। किन्हीं के माथे पर जल से भरे घड़े रखे थे। कुछ नृत्य का प्रदर्शन कर रहीं थी। इन्द्रनीलमणि और सिंदूरी मणियों से बना यह द्वार पारिजात के पुष्पों से सजा था। उन्हें छूकर बहने वाली वायु से वहां सर्वत्र दिव्य सुगंध फैली हुई थी। श्रीराधा के उस आश्चर्यमय अन्त:पुर के द्वार का अवलोकन कर देवताओं के मन में श्रीराधाकृष्ण के दर्शनों की उत्कण्ठा जाग उठी। उनके शरीर में रोमांच हो आया और भक्ति के उद्रेक से आंखें भर आईं। श्रीकृष्णप्राणाधिका श्रीराधा के अंत:पुर का सब कुछ अनिर्वचनीय था। यह मनोहर भवन गोलाकार बना है और इसका विस्तार बारह कोस का है। इसमें सौ भवन बने हुए हैं। यह चारों ओर से कल्पवृक्षों से घिरा है। श्रीराधाभवन इतने बहुमूल्य रत्नों व मणियों से निर्मित है कि उनकी आभा व तेज से ही वह सदा जगमगाता रहता है। यह अमूल्य इन्द्रनीलमणि के खम्भों से सुशोभित, रत्ननिर्मित मंगल कलशों से अलंकृत और रत्नमयी वेदिकाओं से विभूषित है। विचित्र चित्रों द्वारा चित्रित, माणिक्य, मोतियों व हीरों के हारों से अलंकृत, रत्नों की सीढ़ियों से शोभित, तथा रत्नमय प्रदीपों से प्रकाशित श्रीराधा का भवन तीन खाइयों व तीन दुर्गम द्वारों से घिरा है जिसके प्रत्येक द्वार पर और भीतर सोलह लाख गोपियां श्रीराधा की सेवा में रहती हैं। श्रीराधा की किंकरियों की शोभा भी अलौकिक है जो तपाये हुए स्वर्ण के समान अंगकांति वाली, रत्नमय अलंकारों से अलंकृत व अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रों से शोभित हैं। फल, रत्न, सिन्दूर, कुंकुम, पारिजात पुष्पों की मालाओं, श्वेत चंवर, मोती-माणिक्यों की झालरें, चंदन-पल्लवों की बन्दरवार, चंदन-अगुरु-कस्तूरी जल का छिड़काव, फूलों की सुगन्ध से सुवासित वायु और ब्रह्माण्ड में जितनी भी दुर्लभ वस्तुएं है–उन सबसे उस स्थान को इतना विभूषित किया गया था कि वह सर्वथा अवर्णनीय, अनिरुपित व अकल्पनीय है। इस दिव्य निज निकुंज (अंत:पुर) के भीतर देवताओं को एक तेजपुंज दिखाई दिया। उसको प्रणाम करने पर देवताओं को उसमें हजार दल वाला एक बहुत बड़ा कमल दिखाई दिया। उसके ऊपर एक सोलह दल का कमल है तथा उसके ऊपर भी एक आठ दल वाला कमल है। उसके ऊपर कौस्तुभमणियों से जड़ित तीन सीढ़ियों वाला एक सिंहासन है, उसी पर भगवान श्रीकृष्ण श्रीराधिकाजी के साथ विराजमान हैं। ((मणि-निर्मित जगमग अति प्रांगण, पुष्प-परागों से उज्जवल। छहों उर्मियों से विरहित वह वेदी अतिशय पुण्यस्थल।। वेदी के मणिमय आंगन पर योगपीठ है एक महान। अष्टदलों के अरुण कमल का उस पर करिये सुन्दर ध्यान।। उसके मध्य विराजित सस्मित नन्द-तनय श्रीहरि सानन्द। दीप्तिमान निज दिव्य प्रभा से सविता-सम जो करुणा-कंद।। (श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार)) देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण के अत्यन्त मनोहर रूप को देखा–उनका नूतन जलधर के समान श्यामवर्ण, प्रफुल्ल लाल कमल से तिरछे नेत्र, शरत्चन्द्र के समान निर्मल मुख, दो भुजाएं, अधरों पर मन्द मुसकान, चंदन, कस्तूरी व कुंकुम से चर्चित अंग, श्रीवत्सचिह्न व कौस्तुभमणिभूषित वक्ष:स्थल, रत्नजड़ित किरीट-हार-बाजूबंद, आजानुलम्बिनी वनमाला–ये सब उनकी शोभा बढ़ाते हैं। हाथों में कंगन हैं जो घूमती हुई अग्नि (लुकारी) की शोभा बिखेर रहे हैं। श्रीअंग पर दिव्य रेशमी अत्यन्त निर्मल पीताम्बर सुशोभित है, जिसकी कान्ति तपाये हुए सुवर्ण-की-सी है। ललाट पर तिलक है जो चारों ओर चंदन से और बीच में कुंकुमबिन्दु से बनाया हुआ है। सिर में कनेर के पुष्पों के आभूषण हैं। मस्तक पर मयूरपिच्छ शोभा पा रहा है। श्रीअंगों पर श्रृंगार के रूप में रंग-बिरंगे बेल-बूटों की रचना हो रही है। वक्ष:स्थल पर कमलों की माला झूल रही है जिस पर भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। उनके चंचल नेत्र श्रीराधा की ओर लगे हैं। भगवान श्रीकृष्ण के वामभाग में विराजित श्रीराधा के कंधे पर उनकी बांयी भुजा सुशोभित है। भगवान ने अपने दाहिने पैर को टेढ़ा कर रखा है और हाथ में बांसुरी को धारण कर रखा है। वे रत्नमय सिंहासन पर विराजमान हैं जिस पर रत्नमय छत्र तना है। उनके प्रिय सखा ग्वालबाल श्वेत चंवर लिए सदा उनकी सेवा में तत्पर रहते हैं। सुन्दर वेषवाली गोपियां माला व चंदन से उनका श्रृंगार करती हैं। वे मन्द-मन्द मुस्कराते रहते हैं और वे गोपियां कटाक्षपूर्ण चितवन से उनकी ओर निहारती रहती हैं। सबके आदिकारण वे स्वेच्छामय रूपधारी भगवान सदैव नित्य किशोर हैं। कस्तूरी, कुंकुम, गन्ध, चंदन, दूर्वा, अक्षत, पारिजात पुष्प तथा विरजा के निर्मल जल से उन्हें नित्य अर्घ्य दिया जाता है। राग-रागिनियां भी मूर्तिमान होकर वाद्ययन्त्र और मुख से उन्हें मधुर संगीत सुनाती हैं। वे रासमण्डल में विराजित रासेश्वर, परमानन्ददाता, सत्य, सर्वसिद्धिस्वरूप, मंगलकारी, मंगलमय, मंगलदाता और आदिपुरुष हैं। बहुत-से नामों द्वारा उन्हीं को पुकारा जाता है। ऐसा उत्कृष्टरूप धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण वैष्णवों के परम आराध्य हैं। वे समस्त कारणों के कारण, समस्त सम्पदाओं के दाता, सर्वजीवन और सर्वेश्वर वहां श्रीराधारानी रत्नमय सिंहासन पर विराजमान होती हैं। लाखों गोपियां उनकी सेवा में रहती हैं। श्वेत चम्पा के समान उनकी गौरकान्ति है, अरुण ओष्ठ ओर अधर अपनी लालिमा से दुपहरिए के फूल की लालिमा को पराजित कर रहे थे। वे अमूल्य रत्नजटित वस्त्राभूषण पहने, बांये हाथ में रत्नमय दर्पण तथा दाहिने में सुन्दर रत्नमय कमल धारण करती हैं। उनके ललाट पर अनार के फूल की भांति लाल सिंदूर और माथे पर कस्तूरी-चंदन के सुन्दर बिन्दु उनकी शोभा को और बढ़ा रहे हैं। गालों पर विभिन्न मंगलद्रव्यों (कुंकुम, चंदन आदि) से पत्रावली की रचना की गई है। सिर पर घुंघराले बालों का जूड़ा मालती की मालाओं व वेणियों से अलंकृत है। वे उत्तम रत्नों से बनी वनमाला, पारिजात पुष्पों की माला, नुकीली नासिका में गजमुक्ता की बुलाक, हार, केयूर, कंगन आदि पहने हुए हैं। दिव्य शंख के बने हुए विचित्र रमणीय आभूषण भी उनके श्रीअंगों को विभूषित कर रहे हैं। उनके दोनों चरण कमलों की प्रभा को छीने लेते थे जिनमें उन्होंने बहुमूल्य रत्नों के बने हुए पाशक (बिछुए) पहने हुए हैं। उनके अंग-अंग से लावण्य छिटक रहा है। मन्द-मन्द मुसकराते हुए वे प्रियतम श्रीकृष्ण को तिरछी चितवन से निहार रहीं हैं। यह युगल स्वरूप आठ दिव्य सखियों व श्रीदामा आदि आठ गोपालों के द्वारा सेवित हैं। अष्ट सखी करतीं सदा सेवा परम अनन्य। श्रीराधा-माधव युगल की, कर निज जीवन धन्य।। इनके चरण-सरोज में बारम्बार प्रनाम। करुना कर दें श्रीजुगल-पद-रज-रति अभिराम। गोलोक व भगवान श्रीकृष्ण के ऐसे दिव्य दर्शन प्राप्त कर देवता आनन्द के समुद्र में गोते खाने लगे। यह गोलोकधाम अत्यन्त दुर्लभ है। इसे केवल शंकर, नारायण, अनन्त, ब्रह्मा, विष्णु, महाविराट्, पृथ्वी, गंगा, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, विष्णुमाया, सावित्री, तुलसी, गणेश, सनत्कुमार, स्कन्द, नर-नारायण ऋषि, कपिल, दक्षिणा, यज्ञ, ब्रह्मपुत्र, योगी, वायु, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य, रुद्र, अग्नि तथा कृष्णमन्त्र के उपासक वैष्णव–इन सबने ही देखा है। दूसरों ने इसे कभी नहीं देखा है। कृष्ण भक्त ही गोलोक के अधिकारी हैं क्योंकि अपने भक्तों के लिए श्रीकृष्ण अंधे की लकड़ी, निराश्रय के आश्रय, प्राणों के प्राण, निर्बल के बल, जीवन के जीवन, देवों के देव, ईश्वरों के ईश्वर यानि सर्वस्व वे हीं हैं बस। जय जय श्री राधे🙏🙏

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रसिको आइए आज हम आपको एक विशेष जानकारी देते हैं जो की हम समझते हैं बहुत ही कम लोगों को पता है , सो आपकी सेवा में प्रस्तुत है । महाभारत के युद्ध के चक्रव्यूह क्या थे ??? ●●● वज्र व्यूह ●●● महाभारत युद्ध के प्रथम दिन अर्जुन ने अपनी सेना को इस व्यूह के आकार में सजाया था... इसका आकार देखने में इन्द्रदेव के वज्र जैसा होता था अतः इस प्रकार के व्यूह को "वज्र व्यूह" कहते हैं! ●●●क्रौंच व्यूह ●●● क्रौंच एक पक्षी होता है... जिसे आधुनिक अंग्रेजी भाषा में Demoiselle Crane कहते हैं... ये सारस की एक प्रजाति है...इस व्यूह का आकार इसी पक्षी की तरह होता है... युद्ध के दूसरे दिन युधिष्ठिर ने पांचाल पुत्र को इसी क्रौंच व्यूह से पांडव सेना सजाने का सुझाव दिया था... राजा द्रुपद इस पक्षी के सर की तरफ थे, तथा कुन्तीभोज इसकीआँखों के स्थान पर थे... आर्य सात्यकि की सेना इसकी गर्दन के स्थान परथे... भीम तथा पांचाल पुत्र इसके पंखो (Wings) के स्थान पर थे... द्रोपदी के पांचो पुत्र तथा आर्य सात्यकि इसके पंखो की सुरक्षा में तैनात थे...इस तरह से हम देख सकते है की, ये व्यूह बहुत ताकतवर एवं असरदार था... पितामह भीष्म ने स्वयं इस व्यूह से अपनी कौरव सेना सजाई थी... भूरिश्रवा तथा शल्य इसके पंखो की सुरक्षा कर रहे थे... सोमदत्त, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा इस पक्षी के विभिन्न अंगों का दायित्व संभाल रहे थे... हकलाते हैं तो संस्कृत सीखें,जो व्यक्ति धाराप्रवाह बोल नहीं पाते, अटकते हैं या फिर हकलाते हैं उन्हें संस्कृत सीखना चाहिए।संस्कृत से हकलाना भी खत्म हो जाता है। ●●●अर्धचन्द्र व्यूह ●●● इसकी रचना अर्जुन ने कौरवों के गरुड़ व्यूह के प्रत्युत्तर में की थी... पांचाल पुत्र ने इस व्यूह को बनाने में अर्जुन की सहायता की थी ... इसके दाहिने तरफ भीम थे... इसकी उर्ध्व दिशा में द्रुपद तथा विराट नरेश की सेनाएं थी... उनके ठीकआगे पांचाल पुत्र, नील, धृष्टकेतु, और शिखंडी थे... युधिष्ठिर इसके मध्य में थे... सात्यकि, द्रौपदी के पांच पुत्र,अभिमन्यु, घटोत्कच, कोकय बंधु इस व्यूह के बायीं ओर थे... तथा इसके अग्र भाग पर अर्जुन स्वयं सच्चिदानंद स्वरुप भगवन श्रीकृष्ण के साथ थे! ●●●मंडल व्यूह●●● भीष्म पितामह ने युद्ध के सांतवे दिन कौरव सेना को इसी मंडल व्यूहद्वारा सजाया था... इसका गठन परिपत्र रूप में होता था... ये बेहद कठिन व्यूहों में से एक था... पर फिर भी पांडवों ने इसे वज्र व्यूह द्वारा भेद दिया था... इसके प्रत्युत्तर में भीष्म ने "औरमी व्यूह" की रचना की थी... इसका तात्पर्य होता है समुद्र... ये समुद्र की लहरों के समान प्रतीत होता था... फिर इसके प्रत्युत्तर में अर्जुन ने "श्रीन्गातका व्यूह" की रचना की थी... ये व्यूह एक भवन के समान दिखता था... हकलाते हैं तो संस्कृत सीखें,जो व्यक्ति धाराप्रवाह बोल नहीं पाते, अटकते हैं या फिर हकलाते हैं उन्हें संस्कृत सीखना चाहिए।संस्कृत से हकलाना भी खत्म हो जाता है। ●●●चक्रव्यूह●●● इसके बारे में सभी ने सुना है... इसकी रचना गुरु द्रोणाचार्य ने युद्ध के तेरहवें दिन की थी... दुर्योधन इस चक्रव्यूह के बिलकुल मध्य (Centre) में था... बाकि सात महारथी इस व्यूह की विभिन्न परतों (layers) में थे... इस व्यूह के द्वार पर जयद्रथ था... सिर्फ अभिमन्यु ही इस व्यूह को भेदने में सफल हो पाया... पर वो अंतिम द्वार को पार नहीं कर सका... तथा बाद में ७ महारथियों द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी. r 1 ●●●चक्रशकट व्यूह ●●● अभिमन्यु की हत्या के पश्चात जब अर्जुन, जयद्रथ के प्राण लेने को उद्धत हुए, तब गुरु द्रोणाचार्य ने जयद्रथ की रक्षा के लिए युद्ध के चौदहवें दिन इस व्यूह की रचना की थी!! हकलाते हैं तो संस्कृत सीखें,जो व्यक्ति धाराप्रवाह बोल नहीं पाते, अटकते हैं या फिर हकलाते हैं उन्हें संस्कृत सीखना चाहिए।संस्कृत से हकलाना भी खत्म हो जाता है। इस कारन च्र्व्युह्ह की जब रणांगन में रचना की थी , इसी कारण वह बाहर नही आ पाया था. जो चक्रव्यूह को भेद कर बहर आ सकते थेवह थे गुरु द्रोणाचार्य शिष्य अर्जुन जी, जिन्हें छल से रण में लड़ते लड़ते जयद्रथ बहुत दूर ले गये थे. इस कारण अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदन का जिम्मा उठाया था.!!! कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

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Rameshanand Guruji Apr 18, 2019

हनुमान विवाह की कथा नहीं जानते होंगे ? 🙏जय श्री हनुमान जी🙏 ;-प्रेषित;-रमेशानंद गुरूजी हनुमान जी का विवाह हुआ था, हनुमान जी और उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर “तेलंगाना में है हनुमान जी और उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर, पाराशर संहिता में भी है हनुमान विवाह की कथा “ हनुमान जी को बाल ब्रह्मचारी माना जाता है इसलिए हनुमान जी लंगोट धारण किए हर मंदिर और तस्वीरों में अकेले दिखते हैं। कभी भी अन्य देवताओं की तरह हनुमान जी को पत्नी के साथ नहीं देखा होगा। लेकिन अगर आप हनुमान के साथ उनकी पत्नी को देखना चाहते हैं तो आपको आंध्रप्रदेश जाना होगा। हनुमानजी और उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर तेलंगाना के खम्मम जिले में है यह एक प्राचीन मंदिर है। यहां हनुमानजी और उनकी पत्नी सुवर्चला की प्रतिमा विराजमान है। यहां की मान्यता है कि जो भी हनुमानजी और उनकी पत्नी के दर्शन करता है, उन भक्तों के वैवाहिक जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं और पति-पत्नी के बीच प्रेम बना रहता है। तेलंगाना के खम्मम जिले में प्रचलित मान्यता का आधार पाराशर संहिता को माना गया है। पाराशर संहिता में उल्लेख मिलता है कि हनुमानजी अविवाहित नहीं, विवाहित हैं। उनका विवाह सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से हुआ है। संहिता के अनुसार हनुमानजी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। सूर्य देव के पास 9 दिव्य विद्याएं थीं। इन सभी विद्याओं का ज्ञान बजरंग बली प्राप्त करना चाहते थे। सूर्य देव ने इन 9 में से 5 विद्याओं का ज्ञान तो हनुमानजी को दे दिया, लेकिन शेष 4 विद्याओं के लिए सूर्य के समक्ष एक संकट खड़ा हो गया। शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान सिर्फ उन्हीं शिष्यों को दिया जा सकता था जो विवाहित हों। हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे, इस कारण सूर्य देव उन्हें शेष चार विद्याओं का ज्ञान देने में असमर्थ हो गए। इस समस्या के निराकरण के लिए सूर्य देव ने हनुमानजी से विवाह करने की बात कही। पहले तो हनुमानजी विवाह के लिए राजी नहीं हुए, लेकिन उन्हें शेष 4 विद्याओं का ज्ञान पाना ही था। इस कारण अंतत: हनुमानजी ने विवाह के लिए हां कर दी। इस मंदिर में हनुमान जी के साथ उनकी पत्नी के भी दर्शन प्राप्त होते हैं। यह मंदिर इकलौता गवाह है हनुमान जी के विवाह का। ऎसी मान्यता है कि हनुमान जी जब अपने गुरु सूर्य देव से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। उस दौरान सूर्य देव ने हनुमान जी के सामने शर्त रख दी कि अब आगे कि शिक्षा तभी प्राप्त कर सकते हो जब तुम विवाह कर लो। ऎसे में आजीवन ब्रह्मचारी रहने का प्राण ले चुके हनुमान जी के लिए दुविधा की स्थिति उत्पन्न हो गई। शिष्य को दुविधा में देखकर सूर्य देव ने हनुमान जी से कहा कि तुम मेरी पुत्री सुवर्चला से विवाह कर लो। सुवर्चला तपस्विनी थी। हनुमान जी से विवाह के बाद सुवर्चला वापस तपस्या में लीन हो गई। इस तरह हनुमान जी ने विवाह की शर्त पूरी कर ली और ब्रह्मचारी रहने का व्रत भी कायम रहा। हनुमान जी के विवाह का उल्लेख पराशर संहिता में भी किया गया है। जब हनुमानजी विवाह के लिए मान गए तब उनके योग्य कन्या की तलाश की गई और यह तलाश खत्म हुई सूर्य देव की पुत्री सुवर्चला पर। सूर्य देव ने हनुमानजी से कहा कि सुवर्चला परम तपस्वी और तेजस्वी है और इसका तेज तुम ही सहन कर सकते हो। सुवर्चला से विवाह के बाद तुम इस योग्य हो जाओगे कि शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर सको। सूर्य देव ने यह भी बताया कि सुवर्चला से विवाह के बाद भी तुम सदैव बाल ब्रह्मचारी ही रहोगे, क्योंकि विवाह के बाद सुवर्चला पुन: तपस्या में लीन हो जाएगी। यह सब बातें जानने के बाद हनुमानजी और सुवर्चला का विवाह सूर्य देव ने करवा दिया। विवाह के बाद सुवर्चला तपस्या में लीन हो गईं और हनुमानजी से अपने गुरु सूर्य देव से शेष 4 विद्याओं का ज्ञान भी प्राप्त कर लिया। इस प्रकार विवाह के बाद भी हनुमानजी ब्रह्मचारी बने हुए हैं। मान्यता है कि हनुमान जी के इस मंदिर में आकर जो दंपत्ति हनुमान और उनकी पत्नी के दर्शन करते हैं उनके वैवाहिक जीवन में प्रेम और आपसी तालमेल बना रहता है। वैवाहिक जीवन में चल रही परेशानियों से मुक्ति दिलाते हैं विवाहित हनुमान जी।

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