*जय श्री राधे राधे*🌷🌷🌷 *श्री मद्भगवद्गीता अध्याय -११* 🔔📙 ➖➖ *अर्जुन के द्वारा विराट्रूप को देखना और उसकी स्तुति करना* ➖➖ ▶ *श्लोक :-२४* 📖 *↓↓↓↓* *नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।* *दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४॥* *क्योंकि हे विष्णो! (आपके) देदीप्यमान अनेक वर्ण हैं, आप आकाश को स्पर्श कर रहे हैं अर्थात् सब तरफ से बहुत बड़े हैं, आपका मुख फैला हुआ है, आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। (ऐसे) आपको देखकर भयभीत अन्त:करण वाला (मैं) धैर्य और शान्ति को प्राप्त नहीं हो रहा हूँ।* *[ बीसवें श्लोक में तो अर्जुन ने विराट् रूप की लम्बाई-चौड़ाई का वर्णन किया, अब यहाँ केवल लम्बाई का वर्णन करते हैं। ]* *'विष्णो’—आप साक्षात् सर्वव्यापक विष्णु हैं, जिन्होंने पृथ्वी का भार दूर करने के लिये कृष्णरूप से अवतार लिया है।* *'दीप्तमनेकवर्णम्’—आपके काले, पीले, श्याम, गौर आदि अनेक वर्ण हैं, जो बड़े ही देदीप्यमान हैं।* *'नभ:स्पृशम्’—आपका स्वरूप इतना लम्बा है कि वह आकाश को स्पर्श कर रहा है।* *वायु का गुण होने से स्पर्श वायु का ही होता है, आकाश का नहीं। फिर यहाँ आकाश को स्पर्श करने का तात्पर्य क्या है?* *मनुष्य की दृष्टि जहाँ तक जाती है, वहाँ तक तो उसको आकाश दीखता है, पर उसके आगे कालापन दिखायी देता है। कारण कि जब दृष्टि आगे नहीं जाती, थक जाती है, तब वह वहाँ से लौटती है, जिससे आगे कालापन दीखता है। यही दृष्टि का आकाश को स्पर्श करना है। ऐसे ही अर्जुन की दृष्टि जहाँ तक जाती है, वहाँ तक उनको भगवान्का विराट् रूप दिखायी देता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का विराट् रूप असीम है, जिसके सामने दिव्यदृष्टि भी सीमित ही है।* *'व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्’—जैसे कोई भयानक जन्तु किसी जन्तु को खाने के लिये अपना मुख फैलाता है, ऐसे ही मात्र विश्वको चट करने के लिये आपका मुख फैला हुआ दीख रहा है।* *आपके नेत्र बड़े ही देदीप्यमान और विशाल दीख रहे हैं।* *'दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो’—इस तरह आपको देखकर मैं भीतर से बहुत व्यथित हो रहा हूँ। मेरे को कहीं से भी धैर्य नहीं मिल रहा है और शान्ति भी नहीं मिल रही है।* *यहाँ एक शंका होती है कि अर्जुन में एक तो खुद की सामथ्र्य है और दूसरी, भगवत्प्रदत्त सामथ्र्य (दिव्यदृष्टि) है। फिर भी अर्जुन तो विश्वरूप को देखकर डर गये, पर संजय नहीं डरे। इसमें क्या कारण है?* *सन्तों से ऐसा सुना है कि भीष्म, विदुर, संजय और कुन्ती—ये चारों भगवान् श्रीकृष्ण के तत्त्व को विशेषता से जानने वाले थे। इसलिये संजय पहले से ही भगवान्के तत्त्व को, उनके प्रभाव को जानते थे, जब कि अर्जुन भगवान्के तत्त्व को उतना नहीं जानते थे। अर्जुन का विमूढ़भाव (मोह) अभी सर्वथा दूर नहीं हुआ था (गीता—ग्यारहवें अध्याय का उनचासवाँ श्लोक)।* *इस विमूढ़भाव के कारण अर्जुन भयभीत हुए। परन्तु संजय भगवान्के तत्त्व को जानते थे अर्थात् उनमें विमूढ़भाव नहीं था; अत: वे भयभीत नहीं हुए।* *उपर्युक्त विवेचन से एक बात सिद्ध होती है कि भगवान् और महापुरुषों की कृपा विशेषरूप से अयोग्य मनुष्यों पर होती है, पर उस कृपा को विशेषरूप से योग्य मनुष्य ही जानते हैं। जैसे, छोटे बच्चे पर माँका अधिक स्नेह होता है, पर बड़ा लड़का माँ को जितना जानता है, उतना छोटा बच्चा नहीं जानता। ऐसे ही भोले-भाले, सीधे-सादे व्रजवासी, ग्वालबाल, गोप-गोपी और गाय—इनपर भगवान् जितना अधिक स्नेह करते हैं, उतना स्नेह जीवन्मुक्त महापुरुषों पर नहीं करते।* *परन्तु जीवन्मुक्त महापुरुष ग्वालबाल आदि की अपेक्षा भगवान्को विशेषरूप से जानते हैं। संजय ने विश्वरूप के लिये प्रार्थना भी नहीं की और विश्वरूप को देख लिया। परन्तु विश्वरूप देखने के लिये अर्जुन को स्वयं भगवान्ने ही उत्कण्ठित किया और अपना विश्वरूप भी दिखाया; क्योंकि संजय की अपेक्षा भगवान्के तत्त्व को जानने में अर्जुन छोटे थे और भगवान्के साथ सखाभाव रखते थे। इसलिये अर्जुन पर भगवान्की कृपा अधिक थी। इस कृपा के कारण अन्त में अर्जुन का मोह नष्ट हो गया— 'नष्टो मोह: ....... त्वत्प्रसादात्’ (गीता १८। ७३)। इससे सिद्ध होता है कि कृपापात्र का मोह अन्त में नष्ट हो ही जाता है।* *परिशिष्ट भाव—यहाँ आया 'नभ:स्पृशम्’ पद विराट् रूप की अनन्तता का द्योतक है। अर्जुन की दृष्टि जहाँ तक जाती है, वहाँ तक उनको विराट् रूप ही दीखता है—'सा काष्ठा सा परा गति:’ (कठ० १। ३। ११) अर्थात् वह परमात्मा सबकी परम अवधि और परम गति है।* ⏩📖➖➖➖ *सदा जपते रहिये महामन्त्र,*📿 *हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे,*🌺 *हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे,*

*जय श्री राधे राधे*🌷🌷🌷

*श्री मद्भगवद्गीता अध्याय -११*  🔔📙
➖➖
 *अर्जुन के द्वारा विराट्रूप को देखना और उसकी स्तुति करना*
➖➖
▶ *श्लोक :-२४* 📖
*↓↓↓↓*

*नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।*

*दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४॥*

*क्योंकि हे विष्णो! (आपके) देदीप्यमान अनेक वर्ण हैं, आप आकाश को स्पर्श कर रहे हैं  अर्थात् सब तरफ से  बहुत बड़े हैं, आपका मुख फैला हुआ है, आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। (ऐसे) आपको देखकर भयभीत अन्त:करण वाला (मैं) धैर्य और शान्ति को प्राप्त नहीं हो रहा हूँ।*

*[ बीसवें श्लोक में तो अर्जुन ने विराट् रूप की लम्बाई-चौड़ाई का वर्णन किया, अब यहाँ केवल लम्बाई का वर्णन करते हैं। ]*

 *'विष्णो’—आप साक्षात् सर्वव्यापक विष्णु हैं, जिन्होंने पृथ्वी का भार दूर करने के लिये कृष्णरूप से अवतार लिया है।*

 *'दीप्तमनेकवर्णम्’—आपके काले, पीले, श्याम, गौर आदि अनेक वर्ण हैं, जो बड़े ही देदीप्यमान हैं।*

 *'नभ:स्पृशम्’—आपका स्वरूप इतना लम्बा है कि वह आकाश को स्पर्श कर रहा है।*

 *वायु का गुण होने से  स्पर्श वायु का ही होता है, आकाश का नहीं। फिर यहाँ आकाश को स्पर्श करने का तात्पर्य क्या है?*

 *मनुष्य की दृष्टि जहाँ तक जाती है, वहाँ तक तो उसको आकाश दीखता है, पर उसके आगे कालापन दिखायी देता है। कारण कि जब दृष्टि आगे नहीं जाती, थक जाती है, तब वह वहाँ से लौटती है, जिससे आगे कालापन दीखता है। यही दृष्टि का आकाश को स्पर्श करना है। ऐसे ही अर्जुन की दृष्टि जहाँ तक जाती है, वहाँ तक उनको भगवान्का विराट् रूप दिखायी देता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का विराट् रूप असीम है, जिसके सामने दिव्यदृष्टि भी सीमित ही है।*

 *'व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्’—जैसे कोई भयानक जन्तु किसी जन्तु को खाने के लिये अपना मुख फैलाता है, ऐसे ही मात्र विश्वको चट करने के लिये आपका मुख फैला हुआ दीख रहा है।*

 *आपके नेत्र बड़े ही देदीप्यमान और विशाल दीख रहे हैं।*

 *'दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो’—इस तरह आपको देखकर मैं भीतर से बहुत व्यथित हो रहा हूँ। मेरे को कहीं से भी धैर्य नहीं मिल रहा है और शान्ति भी नहीं मिल रही है।*

 *यहाँ एक शंका होती है कि अर्जुन में एक तो खुद की सामथ्र्य है और दूसरी, भगवत्प्रदत्त सामथ्र्य (दिव्यदृष्टि) है। फिर भी अर्जुन तो विश्वरूप को देखकर डर गये, पर संजय नहीं डरे। इसमें क्या कारण है?* 

*सन्तों से ऐसा सुना है कि भीष्म, विदुर, संजय और कुन्ती—ये चारों भगवान् श्रीकृष्ण के तत्त्व को विशेषता से जानने वाले थे। इसलिये संजय पहले से ही भगवान्के तत्त्व को, उनके प्रभाव को जानते थे, जब कि अर्जुन भगवान्के तत्त्व को उतना नहीं जानते थे। अर्जुन का विमूढ़भाव (मोह) अभी सर्वथा दूर नहीं हुआ था (गीता—ग्यारहवें अध्याय का उनचासवाँ श्लोक)।*

 *इस विमूढ़भाव के कारण अर्जुन भयभीत हुए। परन्तु संजय भगवान्के तत्त्व को जानते थे अर्थात् उनमें विमूढ़भाव नहीं था; अत: वे भयभीत नहीं हुए।*

 *उपर्युक्त विवेचन से एक बात सिद्ध होती है कि भगवान् और महापुरुषों की कृपा विशेषरूप से अयोग्य मनुष्यों पर होती है, पर उस कृपा को विशेषरूप से योग्य मनुष्य ही जानते हैं। जैसे, छोटे बच्चे पर माँका अधिक स्नेह होता है, पर बड़ा लड़का माँ को जितना जानता है, उतना छोटा बच्चा नहीं जानता। ऐसे ही भोले-भाले, सीधे-सादे व्रजवासी, ग्वालबाल, गोप-गोपी और गाय—इनपर भगवान् जितना अधिक स्नेह करते हैं, उतना स्नेह जीवन्मुक्त महापुरुषों पर नहीं करते।*

 *परन्तु जीवन्मुक्त महापुरुष ग्वालबाल आदि की अपेक्षा भगवान्को विशेषरूप से जानते हैं। संजय ने विश्वरूप के लिये प्रार्थना भी नहीं की और विश्वरूप को देख लिया। परन्तु विश्वरूप देखने के लिये अर्जुन को स्वयं भगवान्ने ही उत्कण्ठित किया और अपना विश्वरूप भी दिखाया; क्योंकि संजय की अपेक्षा भगवान्के तत्त्व को जानने में अर्जुन छोटे थे और भगवान्के साथ सखाभाव रखते थे। इसलिये अर्जुन पर भगवान्की कृपा अधिक थी। इस कृपा के कारण अन्त में अर्जुन का मोह नष्ट हो गया— 'नष्टो मोह: ....... त्वत्प्रसादात्’ (गीता १८। ७३)। इससे सिद्ध होता है कि कृपापात्र का मोह अन्त में नष्ट हो ही जाता है।*

 *परिशिष्ट भाव—यहाँ आया 'नभ:स्पृशम्’ पद विराट् रूप की अनन्तता का द्योतक है। अर्जुन की दृष्टि जहाँ तक जाती है, वहाँ तक उनको विराट् रूप ही दीखता है—'सा काष्ठा सा परा गति:’ (कठ० १। ३। ११) अर्थात् वह परमात्मा सबकी परम अवधि और परम गति है।*
⏩📖➖➖➖
 *सदा जपते रहिये महामन्त्र,*📿
*हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे,*🌺
*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे,*

+7 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 5 शेयर
reena tuteja Jan 25, 2020

+12 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 2 शेयर
reena tuteja Jan 24, 2020

+16 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 1 शेयर
shiv shukla Jan 26, 2020

+11 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 23 शेयर

श्री राधे राधे जी🙏🙏 यहां राधा कृष्ण का हुआ विवाह, सुनाई देती है कृष्ण की बंसी की तान.... भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के बारे में यह माना जाता है कि इन दोनों के बीच प्रेम संबंध था। जबकि असलियत यह है कि कृष्ण और राधा के बीच प्रेम से बढ़कर भी एक नाता था। यह नाता है पति-पत्नी का। लेकिन इस रिश्ते के बारे में सिर्फ तीन लोगों को पता था एक तो कृष्ण, दूसरी राधा रानी और तीसरे ब्रह्मा जी जिन्होंने कृष्ण और राधा का विवाह करवाया था। लेकिन इन तीनों में आपके कोई भी इस बात की गवाही देने नहीं आएगा। लेकिन जिस स्थान पर इन दोनों का विवाह हुआ था वहां के वृक्ष आज भी राधा कृष्ण के प्रेम और मिलन की गवाही देते हैं। तब राधा कृष्ण का विवाह संपन्न हुआ..... गर्ग संहिता के अनुसार मथुरा के पास स्थित भांडीर वन में भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा का विवाह हुआ था। इस संदर्भ में कथा है कि एक बार नंदराय जी बालक श्री कृष्ण को लेकर भांडीर वन से गुजर रहे थे। उसे समय आचानक देवी राधा प्रकट हुई। देवी राधा के दर्शन पाकर नंदराय जी ने श्री कृष्ण को राधा जी की गोद में दे दिया। श्री कृष्ण बाल रूप त्यागकर किशोर बन गए। तभी ब्रह्मा जी भी वहां उपस्थित हुए। ब्रह्मा जी ने कृष्ण का विवाह राधा से करवा दिया। कुछ समय तक कृष्ण राधा के संग इसी वन में रहे। फिर देवी राधा ने कृष्ण को उनके बाल रूप में नंदराय जी को सौंप दिया। राधा जी की मांग में सिंदूर...... भांडीर वन में श्री राधा जी और भगवान श्री कृष्ण का मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर में स्थित विग्रह अपने आप अनोखा है क्योंकि यह अकेला ऐसा विग्रह है जिसमें श्री कृष्ण भगवान राधा जी की मांग में सिंदूर भरते हुए दृश्य हैं। यहां सोमवती अमावस्या के अवसर पर मेला लगता है। किवदंती है कि भांडीर वन के भांडीर कूप में से हर सोमवती अमावस्या के दिन दूध की धारा निकलती है। मान्यता है कि इस अवसर पर यहां स्नान पूजा करने से निःसंतान दंपत्ति को संतान सुख मिलता है। आज भी सुनाई देती है बंसी की तान..... भांडीर वन के पास ही बंसीवट नामक स्थान है। कहते हैं भगवान श्री कृष्ण यहां पर गायों को चराने आया करते थे। देवी राधा यहां पर श्री कृष्ण से मिलने और बंसी की तान सुनने आया करती थी। यहां मंदिर के वट वृक्ष के विषय में मान्यता है कि अगर आप कान लगकर ध्यान से सुनेंगे तो आपको बंसी की ध्वनि सुनाई देगी । । श्री राधे......

+118 प्रतिक्रिया 25 कॉमेंट्स • 82 शेयर

+3 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 12 शेयर
Santosh Sharma Jan 26, 2020

+19 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 46 शेयर
Pankaj Khandelwal Jan 27, 2020

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB