मायमंदिर फ़्री कुंडली
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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १४.६ . प्रश्न १ : सतोगुण विकसित करने का क्या लाभ है ? . उत्तर १ : "इस जगत् में सतोगुण विकसित करने का लाभ यह होता है कि मनुष्य अन्य बद्धजीवों की तुलना में अधिक चतुर हो जाता है | सतोगुणी पुरुष को भौतिक कष्ट उतना पीड़ित नहीं करते और उसमें भौतिक ज्ञान की प्रगति करने की सूझ होती है | इसका प्रतिनिधि ब्राह्मण है, जो सतोगुणी माना जाता है | सुख का यह भाव इस विचार के कारण है कि सतोगुण में पापकर्मों से प्रायः मुक्त रहा जाता है | वास्तव में वैदिक साहित्य में यह कहा गया है कि सतोगुण का अर्थ ही है अधिक ज्ञान तथा सुख का अधिकाधिक अनुभव |" ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: प्रश्न २. : सतोगुणी व्यक्ति को भी मुक्ति या वैकुण्ठलोक क्यों नहीं प्राप्त हो सकता ? उत्तर २ : " वास्तव में वैदिक साहित्य में यह कहा गया है कि सतोगुण का अर्थ ही है अधिक ज्ञान तथा सुख का अधिकाधिक अनुभव | . सारी कठिनाई यह है कि जब मनुष्य सतोगुण में स्थित होता है, तो उसे ऐसा अनुभव होता है कि वह ज्ञान में आगे है और अन्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ है | इस प्रकार वह बद्ध हो जाता है | इसके उदाहरण वैज्ञानिक तथा दार्शनिक हैं | इनमें से प्रत्येक को अपने ज्ञान का गर्व रहता है और चूँकि वे अपने रहन-सहन को सुधार लेते हैं, अतएव उन्हें भौतिक सुख की अनुभूति होती है | बद्ध जीवन में अधिक सुख का यह भाव उन्हें भौतिक प्रकृति के गुणों से बाँध देता है | अतएव वे सतोगुण में रहकर कर्म करने के लिए आकृष्ट होते हैं | और जब तक इस प्रकार कर्म करते रहने का आकर्षण बना रहता है, तब तक उन्हें किसी न किसी प्रकार का शरीर धारण करना होता है | इस प्रकार उनकी मुक्ति की या वैकुण्ठलोक जाने की कोई सम्भावना नहीं रह जाती | वे बारम्बार दार्शनिक, वैज्ञानिक या कवि बनते रहते हैं और बारम्बार जन्म-मृत्यु के उन्हीं दोषों में बँधते रहते हैं | लेकिन माया-मोह के कारण वे सोचते हैं कि इस प्रकार का जीवन आनन्दप्रद है |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १४.६, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १४.६ 
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प्रश्न १ : सतोगुण विकसित करने का क्या लाभ है ?
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उत्तर १ : "इस जगत् में सतोगुण विकसित करने का लाभ यह होता है कि मनुष्य अन्य बद्धजीवों की तुलना में अधिक चतुर हो जाता है | सतोगुणी पुरुष को भौतिक कष्ट उतना पीड़ित नहीं करते और उसमें भौतिक ज्ञान की प्रगति करने की सूझ होती है | इसका प्रतिनिधि ब्राह्मण है, जो सतोगुणी माना जाता है | सुख का यह भाव इस विचार के कारण है कि सतोगुण में पापकर्मों से प्रायः मुक्त रहा जाता है | वास्तव में वैदिक साहित्य में यह कहा गया है कि सतोगुण का अर्थ ही है अधिक ज्ञान तथा सुख का अधिकाधिक अनुभव |"

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प्रश्न २. : सतोगुणी व्यक्ति को भी मुक्ति या वैकुण्ठलोक क्यों नहीं प्राप्त हो सकता ?

उत्तर २ : " वास्तव में वैदिक साहित्य में यह कहा गया है कि सतोगुण का अर्थ ही है अधिक ज्ञान तथा सुख का अधिकाधिक अनुभव |
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सारी कठिनाई यह है कि जब मनुष्य सतोगुण में स्थित होता है, तो उसे ऐसा अनुभव होता है कि वह ज्ञान में आगे है और अन्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ है | इस प्रकार वह बद्ध हो जाता है | इसके उदाहरण वैज्ञानिक तथा दार्शनिक हैं | इनमें से प्रत्येक को अपने ज्ञान का गर्व रहता है और चूँकि वे अपने रहन-सहन को सुधार लेते हैं, अतएव उन्हें भौतिक सुख की अनुभूति होती है | बद्ध जीवन में अधिक सुख का यह भाव उन्हें भौतिक प्रकृति के गुणों से बाँध देता है | अतएव वे सतोगुण में रहकर कर्म करने के लिए आकृष्ट होते हैं | और जब तक इस प्रकार कर्म करते रहने का आकर्षण बना रहता है, तब तक उन्हें किसी न किसी प्रकार का शरीर धारण करना होता है | इस प्रकार उनकी मुक्ति की या वैकुण्ठलोक जाने की कोई सम्भावना नहीं रह जाती | वे बारम्बार दार्शनिक, वैज्ञानिक या कवि बनते रहते हैं और बारम्बार जन्म-मृत्यु के उन्हीं दोषों में बँधते रहते हैं | लेकिन माया-मोह के कारण वे सोचते हैं कि इस प्रकार का जीवन आनन्दप्रद है |"
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संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १४.६, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १४.८ . प्रश्न १ : सतोगुणी व्यक्ति और तमोगुणी व्यक्ति में क्या अन्तर है ? तमोगुणी व्यक्ति की क्या-क्या लक्षण इस श्लोक में बताये गये हैं ? . उत्तर १ : "सतोगुण में ज्ञान के विकास से मनुष्य यह जान सकता है कि कौन क्या है, लेकिन तमोगुण तो इसके सर्वथा विपरीत होता है | जो भी तमोगुण के फेर में पड़ता है, वह पागल हो जाता है और पागल पुरुष यह नहीं समझ पाता कि कौन क्या है | वह प्रगति करने की बजाय अधोगति को प्राप्त होता है | वैदिक साहित्य में तमोगुण की पारीभाषा इस प्रकार दी गई है - वस्तुयाथात्म्यज्ञानावरकं विपर्ययज्ञानजनकं तमः - अज्ञान से वशीभूत होने पर कोई मनुष्य किसी वस्तु को यथारूप में नहीं समझ पाता | उदाहरणार्थ, प्रत्येक व्यक्ति देखता है कि उसका बाबा मरा है, अतएव वह भी मरेगा, मनुष्य मर्त्य है | उसकी सन्तानें भी मरेंगी | अतएव मृत्यु ध्रुव है | फिर भी लोग पागल होकर धन संग्रह करते हैं और नित्य आत्मा की चिन्ता किये बिना अहर्निश कठोर श्रम करते रहते हैं | यह पागलपन ही तो है | अपने पागलपण में वे आध्यात्मिक ज्ञान में कोई उन्नति नहीं कर पाते | ऐसे लोग अत्यन्त आलसी होते हैं | जब उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान में सम्मिलित होने के लिए आमन्त्रित किया जाता है, तो वे अधिक रूचि नहीं दिखाते | वे रजोगुणी व्यक्ति की तरह भी सक्रिय नहीं रहते | अतएव तमोगुण में लिप्त व्यक्ति का एक अन्य गुण यह भी है कि वह आवश्यकता से अधिक सोता है | छह घंटे की नींद पर्याप्त है, लेकिन ऐसा व्यक्ति दिन भर में दस-बारह घंटे तक सोता है | ऐसा व्यक्ति सदैव निराश प्रतीत होता है और भौतिक द्रव्यों तथा निद्रा के प्रति व्यसनी बन जाता है | ये हैं तमोगुणी व्यक्ति के लक्षण |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १४.८, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- १४.९ अध्याय चौदह : प्रकृति के तीन गुण . . सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत | ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत || ९ || . . सत्त्वम् - सतोगुण; सुखे - सुख में; सञ्जयति - बाँधता है; रजः - रजोगुण; कर्मणि - सकाम कर्म में; भारत - हे भरतपुत्र; ज्ञानम् - ज्ञान को; आवृत्य - ढक कर; तु - लेकिन; तमः - तमोगुण; प्रमादे - पागलपन में; सञ्जयति - बाँधता है; उत - ऐसा कहा जाता है | . . हे भरतपुत्र! सतोगुण मनुष्य को सुख से बाँधता है, रजोगुण सकाम कर्म से बाँधता है और तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढक कर उसे पागलपन से बाँधता है | . . तात्पर्य: सतोगुणी पुरुष अपने कर्म या बौद्धिक वृत्ति से उसी तरह सन्तुष्ट रहता है जिस प्रकार दार्शनिक, वैज्ञानिक या शिक्षक अपनी विद्याओं में निरत रहकर सन्तुष्ट रहते हैं | रजोगुणी व्यक्ति सकाम कर्म में लग सकता है, वह यथासम्भव धन प्राप्त करके उसे उत्तम कार्यों में व्यय करता है | कभी-कभी वह अस्पताल खोलता है और धर्मार्थ संस्थाओं को दान देता है | ये लक्षण हैं, रजोगुणी व्यक्ति के, लेकिन तमोगुण तो ज्ञान को ढक देता है | तमोगुण में रहकर मनुष्य जो भी करता है, वह न तो उसके लिए, न किसी अन्य के लिए हितकर होता है | . प्रश्न १: रजोगुणी व्यक्ति के क्या लक्षण इस श्लोक में बताये गए हैं ?

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १४.७ . प्रश्न १ : रजोगुण के क्या-क्या प्रतिफल हैं ? . उत्तर १ : "रजोगुण की विशेषता है, पुरुष तथा स्त्री का पारस्परिक आकर्षण | स्त्री पुरुष के प्रति और पुरुष स्त्री के प्रति आकर्षित होता है | यह रजोगुण कहलाता है | जब इस रजोगुण में वृद्धि हो जाती है, तो मनुष्य भोग के लिए लालायित होता है | वह इन्द्रियतृप्ति चाहता है | इस इन्द्रियतृप्ति के लिए वह रजोगुणी समाज में या राष्ट्र में सम्मान चाहता है और सुन्दर सन्तान, स्त्री तथा घर सहित सुखी परिवार चाहता है | ये सब रजोगुण के प्रतिफल हैं | जब तक मनुष्य इनकी लालसा करता रहता है, तब तक उसे कठिन श्रम करना पड़ता है | अतः यहाँ पर यह स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य अपने कर्मफलों से सम्बद्ध होकर ऐसे कर्मों से बँध जाता है | अपनी स्त्री, पुत्रों तथा समाज को प्रसन्न करने तथा अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए मनुष्य को कर्म करना होता है | अतएव सारा संसार ही न्यूनाधिक रूप से रजोगुणी है |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १४.७, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप १४.८ अध्याय १४ : प्रकृति के तीन गुण. . . तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् | प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत || ८ || . . तमः - तमोगुण; तु - लेकिन; अज्ञान-जम् - अज्ञान से उत्पन्न; विद्धि - जानो; मोहनम् - मोह; सर्व-देहिनाम् - समस्त देहधारी जीवों का; प्रमाद - पागलपन;आलस्य– आलस;निद्राभिः - तथा नींद द्वारा; तत् - वह; निबध्नाति - बाँधता है; भारत - हे भरतपुत्र | . . हे भरतपुत्र! तुम जान लो कि अज्ञान से उत्पन्न तमोगुण समस्त देहधारी जीवों का मोह है | इस गुण के प्रतिफल पागलपन (प्रमाद), आलस तथा नींद हैं, जो बद्धजीव को बाँधते हैं | . . तात्पर्य: इस श्लोक में तु शब्द का प्रयोग उल्लेखनीय है | इसका अर्थ है कि तमोगुण देहधारी जीव का अत्यन्त विचित्र गुण है | यह सतोगुण के सर्वथा विपरीत है | सतोगुण में ज्ञान के विकास से मनुष्य यह जान सकता है कि कौन क्या है, लेकिन तमोगुण तो इसके सर्वथा विपरीत होता है | जो भी तमोगुण के फेर में पड़ता है, वह पागल हो जाता है और पागल पुरुष यह नहीं समझ पाता कि कौन क्या है | वह प्रगति करने की बजाय अधोगति को प्राप्त होता है | वैदिक साहित्य में तमोगुण की पारीभाषा इस प्रकार दी गई है - वस्तुयाथात्म्यज्ञानावरकं विपर्ययज्ञानजनकं तमः - अज्ञान से वशीभूत होने पर कोई मनुष्य किसी वस्तु को यथारूप में नहीं समझ पाता | उदाहरणार्थ, प्रत्येक व्यक्ति देखता है कि उसका बाबा मरा है, अतएव वह भी मरेगा, मनुष्य मर्त्य है | उसकी सन्तानें भी मरेंगी | अतएव मृत्यु ध्रुव है | फिर भी लोग पागल होकर धन संग्रह करते हैं और नित्य आत्मा की चिन्ता किये बिना अहर्निश कठोर श्रम करते रहते हैं | यह पागलपन ही तो है | अपने पागलपण में वे आध्यात्मिक ज्ञान में कोई उन्नति नहीं कर पाते | ऐसे लोग अत्यन्त आलसी होते हैं | जब उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान में सम्मिलित होने के लिए आमन्त्रित किया जाता है, तो वे अधिक रूचि नहीं दिखाते | वे रजोगुणी व्यक्ति की तरह भी सक्रिय नहीं रहते | अतएव तमोगुण में लिप्त व्यक्ति का एक अन्य गुण यह भी है कि वह आवश्यकता से अधिक सोता है | छह घंटे की नींद पर्याप्त है, लेकिन ऐसा व्यक्ति दिन भर में दस-बारह घंटे तक सोता है | ऐसा व्यक्ति सदैव निराश प्रतीत होता है और भौतिक द्रव्यों तथा निद्रा के प्रति व्यसनी बन जाता है | ये हैं तमोगुणी व्यक्ति के लक्षण | . प्रश्न १ : सतोगुणी व्यक्ति और तमोगुणी व्यक्ति में क्या अन्तर है ? तमोगुणी व्यक्ति की क्या-क्या लक्षण इस श्लोक में बताये गये हैं ?

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप १४.७ अध्याय १४ : प्रकृति के तीन गुण. . . रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् | तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् || ७ || . . रजो - रजोगुण; राग-आत्मकम् - आकांक्षा या काम से उत्पन्न; विद्धि - जानो; तृष्णा - लोभ से; सङ्ग - संगति से; समुद्भवम् - उत्पन्न;तत् - वह; निबध्नाति - बाँधता है; कौन्तेय - हे कुन्तीपुत्र; कर्म-सङ्गेन - सकाम कर्म की संगति से; देहिनम् - देहधारी को | . . हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण की उत्पत्ति असीम आकांक्षाओं तथा तृष्णाओं से होती है और इसी के कारण से यह देहधारी जीव सकाम कर्मों से बँध जाता है | . . तात्पर्य: रजोगुण की विशेषता है, पुरुष तथा स्त्री का पारस्परिक आकर्षण | स्त्री पुरुष के प्रति और पुरुष स्त्री के प्रति आकर्षित होता है | यह रजोगुण कहलाता है | जब इस रजोगुण में वृद्धि हो जाती है, तो मनुष्य भोग के लिए लालायित होता है | वह इन्द्रियतृप्ति चाहता है | इस इन्द्रियतृप्ति के लिए वह रजोगुणी समाज में या राष्ट्र में सम्मान चाहता है और सुन्दर सन्तान, स्त्री तथा घर सहित सुखी परिवार चाहता है | ये सब रजोगुण के प्रतिफल हैं | जब तक मनुष्य इनकी लालसा करता रहता है, तब तक उसे कठिन श्रम करना पड़ता है | अतः यहाँ पर यह स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य अपने कर्मफलों से सम्बद्ध होकर ऐसे कर्मों से बँध जाता है | अपनी स्त्री, पुत्रों तथा समाज को प्रसन्न करने तथा अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए मनुष्य को कर्म करना होता है | अतएव सारा संसार ही न्यूनाधिक रूप से रजोगुणी है | आधुनिक सभ्यता में रजोगुण का मानदण्ड ऊँचा है | प्राचीन काल में सतोगुण को उच्च अवस्था माना जाता था | यदि सतोगुणी लोगों को मुक्ति नहीं मिल पाती, तो जो रजोगुणी हैं, उनके विषय में क्या कहा जाए ? . प्रश्न १ : रजोगुण के क्या-क्या प्रतिफल हैं ?

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Jyoti Jitin Ahuja Jun 13, 2019

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S. K. Jethwa Jun 15, 2019

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