Bhagirath Bhagirath
Bhagirath Bhagirath Aug 8, 2017

जन्माष्टमी स्पेशल || कृष्णा का जन्म लेना गजब हो गया || KRISHNA KA JANAM || RAKESH KALA

#कृष्ण

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आकाश May 22, 2019

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. 🌹 "#सिन्दूरी_शिला (#गोवर्धन)" 🌹 ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ हम सब यह तो जानते हैं कि विवाहित स्त्री मांग में सिन्दूर लगाती है। लेकिन यहाँ एक स्थान पर कुँआरी लड़कियां भी सिन्दूर लगाती हैं। है न अचरज की बात, लेकिन सत्य है। पूरे देश से लड़कियां सिन्दूर लगाने आती हैं। गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में सिन्दूरी शिलामथुरा के गोवर्धन पर्वत पर परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले प्रत्येक स्थान से कृष्ण की कथाएँ जुड़ी हैं। मार्ग में एक विशालकाय शिला पड़ती है। यह कोई साधारण शिला नहीं है। इसका नाम सिन्दूरी शिला है। यह कृष्ण कालीन शिला है। राधा को भरनी थी माँग, शिला को बनाया सिन्दूरी पद्म पुराण में कहा गया है कि समस्त गोपियों में राधाजी, श्री कृष्ण को सर्वाधिक प्रिय हैं। वे उनकी प्राणवल्लभा हैं। गोवर्धन मार्ग पर श्रीकृष्ण के साथ श्री राधिका अपनी सखियों के साथ रास रचाने के लिए आतुर थीं। वे बरसाना से सोलह श्रृंगार करके कन्हैया के पास आई। राधा रानी बोलीं, प्रभु बताओ तो मेरा श्रृंगार कैसा लग रहा है। तब भगवान ने कहा, "हे राधे ! तुम अपनी मांग में सिन्दूर भरके नहीं आई हो।" तब राधा जी ने कहा- "हे प्रभु ! अब मैं बरसाना वापस जाऊँगी तो लौट कर आने में विलम्ब हो जायेगा। ऐसे में मांग कैसे भरूं ?" तब श्रीकृष्ण ने राधाजी से कहा- "हे राधे ! तुम जिस शिला को श्री कृष्णा शरणम् नमः कह कर रगड़ोगी, वही शिला सिन्दूरी हो जाएगी।" ऐसा ही हुआ। राधाजी ने जिस शिला को रगड़कर अपनी मांग भरी, उस शिला का नाम सिन्दूरी शिला पड़ गया। सिन्दूरी शिला को आज भी घिसते हैं तो सिन्दूर निकलता है। इसी सिन्दूर को सुहागिनें अपनी मांग में भरती हैं। कुंआरी लड़कियां बिन्दी के रूप में लगाती हैं। ऐसा माना जाता है कि सिन्दूर लगाने से महिला अखंड सौभाग्यवती हो जाती है। कुँआरी लड़कियां इस सिन्दूर की बिंदी अपने माथे पर इसलिए लगाती हैं कि राधा और कृष्ण के प्रेम का प्रतीक यह सिन्दूर आने वाले जीवन को खुशियों से भर दे। "जय जय श्री राधे राधे" 🌹🌹🌹🌹🌹

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ययाति : चंद्रवंशी पुरुरवा प्रपौत्र, नहुष पुत्र..👑👑 #ययाति, चन्द्रवंशी वंश के राजा नहुष के छः पुत्रों याति, ययाति, सयाति, अयाति, वियाति तथा कृति में से एक थे। नहुष, #बुधदेव पुत्र प्रसिद्ध चंद्रवंशी राजा पुरुरवा का पौत्र व पुरुरवा के पुत्र आयु का पुत्र था। भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानन्दन #पुरूरवा का जन्म हुआ। पुरूरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष के छः पुत्रों याति, ययाति, सयाति, अयाति, वियाति तथा कृति उत्पन्न हुए। नहुष ने स्वर्ग पर भी राज किया था। नहुष के ज्येष्ठ पुत्र याति राज्य, अर्थ आदि से विरक्त रहते थे इसलिये राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्यभिषेक करवा दिया। ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री #देवयानी के साथ हुआ। शुक्राचार्य जी की पत्नी का नाम #जयंती था, जयंती के पिता का नाम शचि था। ऋषि #भुगु के पुत्र थे #शुक्राचार्य : महर्षि भृगु के पुत्र और भक्त प्रहल्लद के भानजे शुक्राचार्य। महर्षि भृगु की पहली पत्नी का नाम ख्याति था, जो उनके भाई दक्ष की कन्या थी। ख्याति से भृगु को दो पुत्र दाता और विधाता मिले और एक बेटी लक्ष्मी का जन्म हुआ। लक्ष्मी का विवाह उन्होंने भगवान विष्णु से कर दिया था। भृगु के और भी पुत्र थे जैसे उशना, च्यवन आदि। माना जाता है कि उशना ही आगे चलकर शुक्राचार्य कहलाए। एक अन्य मान्यता अनुसार वे भृगु ऋषि तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या के पुत्र थे। शुक्र नीति के प्रवर्तक : शुक्राचार्य महान ज्ञानी के साथ-साथ एक अच्छे नीतिकार भी थे। शुक्राचार्य की कही गई नीतियां आज भी बहुत महत्व रखती हैं। आचार्य शुक्राचार्य शुक्र नीति शास्त्र के प्रवर्तक थे। इनकी शुक्र नीति अब भी लोक में महत्वपूर्ण मानी जाती है। शुक्राचार्य की कन्या का नाम देवयानी तथा पुत्र का नाम शंद और अमर्क था। इनके पुत्र शंद और अमर्क हिरण्यकशिपु के यहां नीतिशास्त्र का अध्यापन करते थे। ऋग्वेद में भृगुवंशी ऋषियों द्वारा रचित अनेक मंत्रों का वर्णन मिलता है जिसमें वेन, सोमाहुति, स्यूमरश्मि, भार्गव, आर्वि आदि का नाम आता है। ययाति राजा नहुष के पुत्र थे जिनका विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ था। संजीवनी विद्या के ज्ञाता शुक्राचार्य दैत्यराज वृषपर्वा के गुरु थे। एक बार वनविहार के समय दैत्यराज #वृषपर्वा की पुत्री #शर्मिष्ठा ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ एक बड़ा अपराध कर दिया था अतः गुरु शुक्राचार्य ने दैत्यों का त्याग करने का निश्चय कर लिया था। फिर इस शर्त पर दैत्यराज के साथ रहने को तैयार हुए कि राजकुमारी शर्मिष्ठा अपनी १००० सहेलियों सहित उनकी पुत्री देवयानी की जीवन भर के लिए दासी बन जाये। नहुष और अशोकसुन्दरी (शिव-पार्वती पुत्री) के पुत्र ययाति, दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा की कहानी: एक बार की बात है कि दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी अपनी सखियों के साथ अपने उद्यान में घूम रही थी। शर्मिष्ठा अति सुन्दर राजपुत्री थी, तो देवयानी असुरों के महा गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी। दोनों एक दूसरे से सुंदरता के मामले में कम नहीं थी। वे सब की सब उस उद्यान के एक जलाशय में, अपने वस्त्र त्याग कर स्नान करने लगीं। इधर इन्द्रलोक में जब इन्द्र के राजगुरु बृहस्पति के पुत्र 'कच' मृत संजीवनी विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओं को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कच से उस विद्या को पढ़कर कृतार्थ हो गये। फि‍र सबने मिलकर इन्‍द्र से कहा- पुरन्‍दर ‘अब आपके लिये पराक्रम करने कर समय आ गया है, पृथ्वीलोक के अपने दैत्य शत्रुओं का संहार कीजिये।’ संगठित होकर आये हुए देवताओं द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर ‘बहुत अच्‍छा’ कहकर दैत्यों के पृथ्वीलोक में आ पहुँचे। वहाँ एक वन में उन्‍होंने बहुत-सी स्त्रियों को एक साथ देखा। वह वन चैत्ररथ नामक देवोद्यान के समान मनोहर था। उसमें वे कन्‍याएं एक जलाशय जलक्रीड़ा कर रही थीं। इन्‍द्र ने वायु का रूप धारण करके सारे कपड़े परस्‍पर मिला दिये। उसी समय भगवान शंकर पार्वती के साथ उस जलाशय के समीप से निकले। भगवान शंकर को आते देख वे सभी कन्याएं लज्जावश से बाहर निकल दौड़कर इन्द्र प्रपंच के कारण आपस में मिल अपने-अपने वस्त्रों को अंगीकार तो किया। परंतु अतिशीघ्रता में शर्मिष्ठा ने भूलवश देवयानी के वस्त्र पहन लिए। इस पर देवयानी अति क्रोधित होकर शर्मिष्ठा से बोली, 'रे शर्मिष्ठा! एक असुर पुत्री होकर तूने ब्राह्मण कन्या का वस्त्र धारण करने का साहस कैसे किया? तूने मेरे वस्त्र धारण करके मेरा अपमान किया है।' देवयानी के अपशब्दों को सुनकर शर्मिष्ठा अपने अपमान से तिलमिला गई और देवयानी के वस्त्र छीन कर उसे एक कुएं में धकेल दिया। वह क्रोध के आवेश में थी, अत: देवयानी की ओर देखे बिना ही घर लौट गयी। देवयानी को कुएं में धकेल कर शर्मिष्ठा के चले जाने के पश्चात् नहुष पुत्र राजा ययाति आखेट करते हुए वहां पर आ पहुंचे। उनके रथ के वाहन तथा अन्‍य घोड़े भी थक गये थे। वे एक हिंसक पशु को पकड़ने के लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्‍यास से कष्ट पा रहे थे। अपनी प्यास बुझाने के लिए वे कुएं के निकट गए और उस जल शून्‍य कूप को देखने लगे। वहाँ उन्‍हें अग्नि-शिखा के समान तेजस्विनी एक कन्‍या दिखाई दी, जो देवांगना के समान सुन्‍दरी थी। उस पर दृष्टि पड़ते ही नृपश्रेष्ठ ययाति पहले परम मधुर वचनों द्वारा शान्‍त भाव से उसे आश्‍वासन दिया और कहा- ‘तुम कौन हो? तुम्‍हारे नख लाल-लाल हैं। षोडशी जान पड़ती हो। तुम्‍हारे कानों के मणिमय कुण्‍डल अत्‍यन्‍त सुन्‍दर और चमकीले हैं। ‘तुम किसी अत्‍यन्‍त घोर चिन्‍ता में पड़ी हो, आतुर होकर शोक क्‍यों कर रही हो? तृण और लताओं से ढके हुए इस कुऐं में कैसे गिर पड़ीं? तुम किसकी पुत्री हो? सुमध्‍यमे! ठीक-ठीक बताओ’। देवयानी बोली - "जो देवताओं द्वारा मारे गये दैत्‍यों को अपनी विद्या केवल से जिलाया करते हैं, उन्‍हीं शुक्राचार्य की मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही उन्‍हें इस बात का पता नहीं होगा कि मैं इस दुरवस्‍था में पड़ी हूँ। रुप, वीर्य और बल से सम्‍पन्न तुम कौन हो, जो मेरा परिचय पूछते हो। यहाँ तुम्‍हारे आगमन का क्‍या कारण है, बताओ। मैं यह सब ठीक-ठीक सुनना चाहती हूँ।" ययाति ने कहा - "भद्रे मैं राजा नहुष का पुत्र ययाति हूँ। एक हिंसक पशु को मारने की इच्‍छा से इधर आ निकला। थका-मांदा प्‍यास बुझाने के लिये यहाँ आया और तिनकों से ढके हुए इस कूप में गिरी हुई तुम पर मेरी दृष्टि पड़ गयी।" देवयानी बोली- "महाराज! लाल नख और अंगुलियों से युक्त यह मेरा दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुऐं से मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूं, आप उत्तम कुल में उत्‍पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी मालूम है कि आप परम शान्‍त स्‍वभाव वाले, पराक्रमी तथा यशस्‍वी वीर हैं। इसलिये इस कुऐं में गिरी हुई मुझ, अबला का आप यहाँ से उद्धार कीजिये।" तदनन्‍तर नहुष पुत्र राजा ययाति ने देवयानी को ब्राह्मण कन्‍या जानकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथ में ले उसे उस कुऐं से बाहर निकाला, वेगपूर्वक कुऐं से बाहर करके राजा ययाति उससे बोले- ‘भद्रे! अब जहाँ इच्‍छा हो जाओ। तुम्‍हें कोई भय नहीं है। ‘राजा ययाति के ऐसा कहने पर देवयानी ने उन्‍हें उत्तर देते हुए कहा- तुम मुझे शीघ्र अपने साथ ले चलो; क्‍योंकि तुम मेरे प्रियतम हो। तुमने मेरा हाथ पकड़ा है, अत: तुम्‍ही मेरे पति होओगे। ‘देवयानी के ऐसा कहने पर राजा बोले- ‘भद्रे! मैं क्षत्रियकुल में उत्‍पन्न हुआ हूँ और तुम ब्राह्मण कन्‍या हो। अत: मेरे साथ तुम्‍हारा समागम नहीं होना चाहिये। कल्‍याणी! भगवान शुक्राचार्य सम्‍पूर्ण जगत के गुरु हैं और तुम उनकी पुत्री हो, अत: मुझे उनसे भी डर लगता है। तुम मुझ-जैसे तुच्‍छ पुरुष के योग्‍य कदापि नहीं हो।’ इस पर देवयानी ने प्रेमपूर्वक राजा ययाति से कहा, 'हे आर्य! आपने मेरा हाथ पकड़ा है अतः मैं आपको अपने पति रूप में स्वीकार करती हूं। हे क्षत्रियश्रेष्ठ! यद्यपि मैं ब्राह्मण पुत्री हूं किन्तु बृहस्पति के पुत्र कच के शाप के कारण मेरा विवाह ब्राह्मण कुमार के साथ नहीं हो सकता। इसलिए आप मुझे अपने प्रारब्ध का भोग समझ कर स्वीकार कीजिए।' ययाति ने प्रसन्न होकर देवयानी के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। तदनन्‍तर सुन्‍दरी देवयानी की अनुमति लेकर राजा ययाति अपने नगर को चले गये। नहुषनन्‍दन ययाति के चले जाने पर सती-साध्‍वी देवयानी आर्त-भाव से रोती हुई किसी वृक्ष का सहारा लेकर खड़ी रही। जब पुत्री के घर लौटने में विलम्‍ब हुआ, तब शुक्राचार्य ने धाय से पूछा- धाय! तू पवित्र हास्‍य वाली मेरी बेटी देवयानी को शीघ्र यहाँ बुला ला। उनके इतना कहते ही धाय तुरंत उसे बुलाने चली गयी। जहां-जहाँ देवयानी सखियों के साथ गयी थी, वहां-वहाँ उसका पदचिह्न खोजती हुई धाय गयी और उसने पूर्वोक्त रूप से श्रम पीड़ित एवं दीन होकर रोती हुई देवयानी को देखा। तब धाय ने पूछा- भद्रे! तुम्‍हारा क्‍या हाल है ? शीघ्र बताओ। तुम्‍हारे पिताजी ने तुम्‍हें बुलाया है। इस पर देवयानी ने धाय को अपने निकट बुलाकर शर्मिष्‍ठा द्वारा किये हुए अपराध को बताया। वह शोक से संतप्त हो अपने सामने आयी हुई धाय घूर्णिका से बोली। देवयानी ने कहा - "घूर्णिके तुम वेग पूर्वक जाओ और शीघ्र मेरे पिता जी से कह दो अब मैं वृषपर्वा के नगर में पैर नहीं रखूंगी।" देवयानी की बात सुनकर घूर्णिका तुरंत असुर राज के महल में गयी और वहाँ शुक्राचार्य को देखकर सम्‍भ्रमपूर्ण चित्त से वह बात बतला दी। महाभाग उसने महाप्राज्ञ शुक्राचार्य को यह बताया कि ‘वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्‍ठा के द्वारा देवयानी वन में मृततुल्‍य कर दी गयी है।’ अपनी पुत्री को शर्मिष्‍ठा द्वारा मृततुल्‍य की गयी सुनकर शुक्राचार्य बड़ी उतावली के साथ निकले और दुखी होकर उसे वन में ढूंढ़ने लगे। तदननतर वन में अपनी बेटी देवयानी को देखकर शुक्राचार्य ने दोनों भुजाओं से उठाकर उसे हृदय से लगा लिया और दुखी होकर कहा-‘बेटी सब लोग अपने ही दोष और गुणों से- अशुभ या शुभ कर्मों से दु:ख एवं सुख में पड़ते हैं। मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका बदला तुम्‍हें इस रूप में मिला है।’ देवयानी बोली - "पिताजी मुझे अपने कर्मों का फल मिले या न मिले, आप मेरी बात ध्‍यान देकर सुनिये। वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्‍ठा ने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्‍या यह सच है? वह कहती है- ‘आप भाटों की तरह दैत्‍यों के गुण गाया करते हैं। वृषपर्वा की लाड़िली शर्मिष्‍ठा क्रोध से लाल आंखे करके आज मुझसे इस प्रकार अत्‍यन्‍त तीखे कठोर वचन कह रही थी- ‘देवयानी तू स्‍तुति करने वाले, नित्‍य भीख मांगने वाले और दान लेने वाले की बेटी है और मैं तो उन महाराज की पुत्री हूं, जिनकी तुम्‍हारे पिता स्‍तुति करते हैं, जो स्‍वयं दान देते हैं और लेते एक धेला भी नहीं हैं।’ वृषपर्वा की बेटी शर्मिष्‍ठा ने आज मुझ से ऐसी बात कही है। कहते समय उसकी आंखे क्रोध से लाल हो रही थी। वह भारी घमंड से भरी हुई थी और उसने एक बार ही नहीं, अपितु बार-बार उपर्युक्त बातें दुहरायी हैं। तात यदि सचमुच मैं स्‍तुति करने वाले और दान लेने वाले की बेटी हूं, तो मैं शर्मिष्‍ठा को अपनी सेवाओं द्वारा प्रसन्न करूंगी। यह बात मैंने अपनी सखी से कह दी थी। मेरे ऐसा कहने पर भी अत्‍यन्‍त क्रोध में भरी हुई शर्मिष्‍ठा ने उस निर्जन वन में मुझे पकड़कर कूएं में ढकेल दिया, उसके बाद वह अपने घर चली गयी।" शुक्राचार्य ने कहा - "देवयानी तू स्‍तुति करने वाले, भीख मांगने वाले या दान लेने वाने की बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मण की पुत्री है, जो किसी की स्‍तुति नहीं करता और जिसकी सब लोग स्‍तुति करते हैं। इस बात को वृषपर्वा, देवराज इन्‍द्र तथा ययाति जानते हैं। निर्द्वन्‍द्व अचिन्‍त्‍य ब्रह्म ही मेरा ऐश्‍वर्य युक्त बल है। ब्रह्मा जी ने संतुष्ट होकर मुझे वरदान दिया है; उसके अनुसार इस भूतल पर, देवलोक में अथवा सब प्राणियों में जो कुछ भी है, उन सबका मैं सदा-सर्वदा स्‍वामी हूँ। मैं ही प्रजाओें के हित के लिये पानी बरसाता हूँ और मैं ही सम्‍पूर्ण ओषधियों का पोषण करता हूं, यह तुमसे सच्ची बात कह रहा हूँ।" देवयानी इस प्रकार विषाद में डूबकर क्रोध और ग्‍लानि से अत्‍यन्‍त कष्ट पा रही थी, उस समय पिता ने सुन्‍दर मधुर वचनों द्वारा उसे समझाया। शुक्राचार्य ने कहा - "बेटी मेरी विद्या द्वन्‍द्वरहित है। मेरा ऐश्‍वर्य ही उसका फल है। मुझमें दीनता, शठता, कुटिलता और अधमपूर्ण बर्ताव नहीं है। देवयानी जो मनुष्‍य सदा दूसरों के कठोर वचन (दूसरों द्वारा की हुई अपनी निन्‍दा) को सह लेता है, उसने इस सम्‍पूर्ण जगत पर विजय प्राप्‍त कर ली, ऐसा समझो। जो उभरे हुए क्रोध को घोड़े के समान वश में कर लेता है, वही सत्‍पुरुषों द्वारा सच्चा सारथि कहा गया है। किंतु जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं। देवयानी जो उत्‍पन्न हुए क्रोध को अक्रोध (क्षमाभाव) के द्वारा मन से निकाल देती है, समझ लो, उसने सम्‍पूर्ण जगत को जीत लिया। जैसे सांप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्‍य उभड़ने वाले क्रोध को यहाँ क्षमा द्वारा त्‍याग देता है, वही श्रेष्‍ठ पुरुष कहा गया है। जो क्रोध को रोक लेता है, निन्‍दा सह लेता है और दूसरे के सताने पर भी दुखी नहीं होता, वही सब पुरुषों का सुदृढ़ पात्र है। जो मनुष्‍य सौ वर्षों तक प्रत्‍येक मास में बिना किसी थकावट के निरन्‍तर यज्ञ करता है और दूसरा जो किसी पर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनो में क्रोध न करने वाला ही श्रेष्‍ठ है। क्रोधी के यज्ञ, दान और तप- सभी निष्‍फल होते हैं। अत: जो क्रोध नहीं करता, उसी पुरुष के यज्ञ, दान और तप महान फल देने वाले होते हैं। जो क्रोध के वशीभूत हो जाता है, वह कभी पवित्र नहीं होता तथा तपस्‍या भी नहीं कर सकता। उसके द्वारा यज्ञ का अनुष्‍ठान भी सम्‍भव नहीं है और वह कर्म के रहस्‍य को भी नहीं जानता। इतना ही नहीं, उसके लोक और परलोक दोनों ही नष्ट हो जाते हैं। जो स्‍वभाव से ही क्रोधी है, उसके पुत्र, भृत्‍य, सुहृद्, मित्र, पत्‍नी, धर्म और सत्‍य- ये सभी निश्चय ही उसे छोड़कर दूर चले जायंगे। अबोध बालक और बालिकाएं अज्ञान वश आपस में जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्‍यों को नहीं करना चाहिये; क्‍योंकि वे नादान बालक दूसरों के बलाबल को नहीं जानते।" देवयानी ने कहा - "पिता जी यद्यपि मैं अभी बालिका हूँ फि‍र भी धर्म-अधर्म का भी अन्‍तर समझती हूँ। क्षमा और निन्‍दा की सबलता और निर्बलता का भी मुझे ज्ञान है। परंतु जो शिष्‍य होकर भी शिष्‍योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहने वाले गुरु को उसकी धृष्‍टता क्षमा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इन संकीर्ण आचार-विचार वाले दानवों के बीच निवास करना अब मुझे अच्छा नहीं लगता। जो पुरुष दूसरों के सदाचार और कुल की निन्‍दा करते हैं, उन पाप पूर्ण विचार वाले मनुष्‍यों में कल्‍याण की इच्‍छा वाले विद्वान पुरुष को नहीं रहना चाहिये। जो लोग आचार, व्‍यवहार अथवा कुलीनता की प्रशंसा करते हों, उन साधु पुरुषों में ही निवास करना चाहिये और वही निवास श्रेष्ठ कहा जाता है। धनहीन मनुष्‍य भी यदि सदा अपने मन पर संयम रखे तो वे श्रेष्ठ हैं और धनवान भी यदि दुराचारी तथा पाप कर्मी हों, तो वे चाण्डाल के समान हैं। जो अकारण किसी के साथ द्वेष करते हैं और दूसरों की निन्‍दा करते रहते हैं, उनके बीच में सत्‍पुरुष का निवास नहीं होना चाहिये; क्‍योंकि पापियों के संग से मनुष्‍य पापात्‍मा हो जाता है। मनुष्‍य पाप अथवा पुण्‍य जिस में भी आसक्त होता है, उसी में उसकी दृढ़ प्रीति हो जाती है, इसलिये पाप कर्म में प्रीति नहीं करनी चाहिये। तात वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने जो अत्‍यन्‍त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदय को मथ रहा है, ठीक उसी तरह, जैसे अग्नि प्रकट करने की इच्‍छा वाला पुरुष अरणीकाष्ठ का मन्‍थन करता है। इससे बढ़कर महान दु:ख की बात मैं अपने लिये तीनों लोकों में और कुछ नहीं मानती हूँ। इसमें संदेह नहीं कि कटुवचन मर्मस्‍थलों को विदीर्ण करने वाला होता है। कटुवादी मनुष्‍यों से उनके सगे-सम्‍बन्‍धी और मित्र भी प्रेम नहीं करते हैं। जो श्रीहीन होकर शत्रुओं की चमकती हुई लक्ष्‍मी की उपासना करता है, उस मनुष्‍य का तो मर जाना ही अच्‍छा है; ऐसा विद्वान पुरुष अनुभव करते हैं। नीच मनुष्‍यों के संग से मनुष्‍य धीरे-धीरे अपमानित हो जाता है। मुख से कटुवचनरूपी बाण छूटते हैं, उससे आहत होकर मनुष्‍य रात-दिन शोक में डूवा रहता है। शस्त्र, विष और अग्नि से प्राप्त होने वाला दु:ख शनै:-शनै: अनुभव में आता है (परंतु कटुवचन तत्‍काल ही अत्‍यन्‍त कष्ट देने लगता है )। अत: विद्वान पुरुष को चाहिये कि वह दूसरों पर वाग्‍वाण न छोड़े। बाण से बिंधा हुआ वृक्ष और फरसे से काटा हुआ जंगल फिर पनप जाता है, परंतु वाणी द्वारा जो भयानक कटु वचन निकलता है, उससे घायल हुए हृदय का घाव फि‍र नहीं भरता।" देवयानी के मुख से शर्मिष्ठा के किए हुए कर्म पर शुक्राचार्य को अत्यन्त क्रोध आया और वे दैत्यों से विमुख हो गए। इस पर दैत्यराज वृषपर्वा अपने गुरुदेव के पास आकर अनेक प्रकार से मान-मनोन्वल करने लगे। बड़ी मुश्किल से शुक्राचार्य का क्रोध शान्त हुआ और वे बोले, 'हे दैत्यराज! मैं आपसे किसी प्रकार से रुष्ठ नहीं हूं किन्तु मेरी पुत्री देवयानी अत्यन्त रुष्ट है। यदि तुम उसे प्रसन्न कर सको तो मैं पुनः तुम्हारा साथ देने लगूंगा।' वृषपर्वा ने देवयानी को प्रसन्न करने के लिए उससे कहा, 'हे पुत्री! तुम जो कुछ भी मांगोगी मैं तुम्हें वह प्रदान करूंगा।' देवयानी बोली, 'हे दैत्यराज! मुझे आपकी पुत्री शर्मिष्ठा दासी के रूप में चाहिए।' अपने परिवार पर आए संकट को टालने के लिए शर्मिष्ठा ने देवयानी की दासी बनना स्वीकार कर लिया। शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ कर दिया। शर्मिष्ठा भी देवयानी के साथ उसकी दासी के रूप में ययाति के भवन में आ गई। देवयानी के पुत्रवती होने पर रुपवती शर्मिष्ठा ने भी पुत्र की कामना से राजा ययाति से प्रणय निवेदन किया जिसे ययाति ने स्वीकार कर लिया। राजा ययाति के देवयानी से दो पुत्र यदु तथा तुवर्सु और शर्मिष्ठा से तीन पुत्र द्रुह्यु, अनु तथा पुरु हुए। इस संदर्भ को देवयानी से छुपाकर शर्मिष्ठा एवं ययाति ने तीन वर्ष बीता दिए। शर्मिष्ठा के गर्भ से राजा ययाति को तीन पुत्र हो जाने के बाद जब ये वृतांत देवयानी को पता चला तो वह क्रोधित होकर अपने पिता के पास चली गई। शुक्राचार्य ने राजा ययाति को बुलवाकर कहा, 'रे ययाति! तू स्त्री लम्पट है। इसलिए मैं तुझे शाप देता हूं तुझे तत्काल वृद्धावस्था प्राप्त हो।' उनके शाप से भयभीत हो राजा ययाति गिड़गिड़ाते हुए बोले, 'हे दैत्य गुरु! आपकी पुत्री के साथ विषय भोग करते हुए अभी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। इस शाप के कारण तो आपकी पुत्री का भी अहित है।' तब कुछ विचार कर के शुक्रचार्य जी ने कहा, 'अच्छा! यदि कोई तुझे प्रसन्नतापूर्वक अपनी यौवनावस्था दे तो तुम उसके साथ अपनी वृद्धावस्था को बदल सकते हो।' इसके पश्चात् राजा ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र से कहा, 'वत्स यदु! तुम अपने नाना के द्वारा दी गई मेरी इस वृद्धावस्था को लेकर अपनी युवावस्था मुझे दे दो।' इस पर यदु बोला, 'हे पिताजी! असमय में आई वृद्धावस्था को लेकर मैं जीवित नहीं रहना चाहता। इसलिये मैं आपकी वृद्धावस्था को नहीं ले सकता।' ययाति ने अपने शेष पुत्रों से भी इसी प्रकार की मांग की, लेकिन सभी ने कन्नी काट ली। लेकिन सबसे छोटे पुत्र पुरु ने पिता की मांग को स्वीकार कर लिया। पुनः युवा हो जाने पर राजा ययाति ने यदु से कहा, 'तूने ज्येष्ठ पुत्र होकर भी अपने पिता के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण नहीं किया। अतः मैं तुझे राज्याधिकार से वंचित करके अपना राज्य पुरु को देता हूं। मैं तुझे शाप भी देता हूं कि तेरा वंश सदैव राजवंशियों के द्वारा बहिष्कृत रहेगा।' - वेद, पुराण पाँचो पुत्रों में पुरू सबसे छोटा था, पर पिता ने इसी को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया और स्वयं एक सहस्र वर्ष तक युवा रहकर शारीरिक सुख भोगते रहे। कहते हैं कि उनकी १०० रानियां थीं। राजा ययाति ने यौवन को प्राप्त करने के बाद सुखों को भोगना शुरू कर दिया। यौवन लौट आने पर देवयानी भी तन-मन-धन से ययाति की सेवा में लग गई। इधर ययाति अपने ईष्ट भगवान विष्णु का यजन करने लगे। उन्होंने पूरी तल्लीनता के साथ निष्काम भाव से श्रीहरि की पूजा की। सुखों के भोग और भगवान का यजन करते-करते लगभग एक हजार साल बीत चुके थे। बावजूद इसके राजा ययाति की तृष्णाओं की तृप्ति न हो सकी। श्रीमद्भागवत जी में नवम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय 'ययाति का गृह त्याग' में श्री शुकदेव जी राजा परीक्षित को बताते हैं कि "एक दिन विषय भोग की अंधड़ में खोए हुए ययाति की नजर अपने गिरते शरीर पर पड़ी।" उन्होंने देवयानी से कहा कि "मैं तुम्हारे प्रेमपाश में बंधकर दीन हो गया हूँ। तुम्हारी माया ने मुझे भुलक्कड़ बना दिया है।" "मुझे विषयों का बार बार सेवन करते करते हजार साल हो गए हैं, लेकिन मेरे अंदर भोगों की लालशा बढ़ती ही जा रही है।" तदनंतर पुरू को बुलाकर ययाति ने कहा - 'इतने दिनों तक सुख भोगने पर भी मुझे तृप्ति नहीं हुई। तुम अपना यौवन वापस ले लो, और मैं अब वाणप्रस्थ आश्रम में रहकर ही तपस्या करूँगा। ' वाणप्रस्थ में किऐ अपने घोर तपस्या से ययाति स्वर्गलोक भी पहुँच गए थे, परंतु थोड़े ही दिनों बाद इंद्र के शाप से स्वर्गभ्रष्ट भी हो गए (महाभारत, आदिपर्व, ८१-८८)। स्वर्गभ्रष्ट होकर अंतरिक्ष पथ से पृथ्वी को लौटते समय इन्हें अपने वंशज दौहित्र, अष्ट, शिवि आदि मिले और पूर्वज शीर्ष ययाति की विपत्ति को देखकर सभी ने अपने अपने पुण्य के बल से इन्हें फिर से स्वर्गलोक लौटा दिया। अपने इन वंशजों की सहायता से ही ययाति को अंत में मुक्ति प्राप्त हुई। ययाति ग्रंथि: ययाति ग्रंथि वृद्धावस्था में यौवन की तीव्र कामना की ग्रंथि मानी जाति है। किंवदंति है कि, राजा ययाति एक सहस्र वर्ष तक भोग लिप्सा में लिप्त रहे किन्तु उन्हें तृप्ति नहीं मिली। विषय वासना से तृप्ति न मिलने पर उन्हें उनसे घृणा हो गई और उन्होंने पुरु की युवावस्था वापस लौटा कर वैराग्य धारण कर लिया। ययाति को वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होने कहा- भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताःतपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।कालो न यातो वयमेव याताःतृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥ अर्थात, हमने भोग नहीं भुगते, बल्कि भोगों ने ही हमें भुगता है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैं; काल समाप्त नहीं हुआ हम ही समाप्त हो गये; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं ! इस प्रकार ययाति पुत्र पुरु भारत के चक्रवर्ती महाराजा बने और उनकी माता दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा, जो राजा ययाति की पत्नी देवयानी की दासी बन कर आयी थी , पुत्र पुरु की पितृभक्ति और उनके लिए सुखों के त्याग के कारण भारतवर्ष की राजमाता बनी। ययाति के पुत्रों तुर्वसु , द्रुहु और अनु ने ही महर्षि शुक्राचार्य के कुशल निर्देशन में वर्तमान अरब ,अफ्रीका ,एशिया और यूरोप के कई देशों को बसाया व वहां उनके उत्तराधिकारियों ने ही राज्य किया। वहां के सभी निवासी इन तीनो ययाति के पुत्रों के वंशज है। पुरु के उत्तराधिकारी पुरुवंशियों में राजा दुष्यंत के पुत्र भरत हुए, जिससे भारत वर्ष का नामाकरण हुआ। कालांतर भरत के वंश में कुरु राजा हुए जिनके वंशज कुरु "कौरव" कहलाऐ, जिनके वंश अंश भाई पांडव भी थे। ययाति सबसे बड़े पुत्र यदु के वंशज यादव के नाम से जाने गए और इसी यदु वंश में विष्णु अवतारी भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर काल में जन्म लिया था। हमें वेद-पुराणों में उल्लेखित ययाति के कुल-खानदान को याद रखना चाहिए, क्योंकि इसी से एशिया की जातियों का जन्म हुआ। ययाति से ही आगे चंद्रवंश चला जिसमें से यदुओं, तुर्वसुओं, आनवों और द्रुहुओं का वंश चला। जिस तरह बाइबल में याकूब के १२ पुत्रों से इसराइल-अरब की जाति बनी, उसी तरह ययाति के ५ पुत्रों से अखंड भारत (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, बर्मा, थाईलैंड आदि) की जातियां बनीं। हालांकि ययाति के कुल १० पुत्र थे। याकूब और ययाति की कहानी कुछ-कुछ मिलती-जुलती है। यह शोध का विषय हो सकता है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पुरुवस पुरुरवा को ऐल भी कहा जाता था। पुरुरवा का विवाह उर्वशी से हुआ जिससे उसको आयु, वनायु, शतायु, दृढ़ायु, घीमंत और अमावसु नामक पुत्र प्राप्त हुए। अमावसु एवं वसु विशेष थे। अमावसु ने कान्यकुब्ज नामक नगर की नींव डाली और वहां का राजा बना। आयु का विवाह स्वरभानु की पुत्री प्रभा से हुआ जिनसे उसके ५ पुत्र हुए- नहुष, क्षत्रवृत (वृदशर्मा), राजभ (गय), रजि, अनेना। प्रथम नहुष का विवाह विरजा से हुआ जिससे अनेक पुत्र हुए जिसमें ययाति, संयाति, अयाति, अयति और ध्रुव प्रमुख थे। इन पुत्रों में यति और ययाति प्रिय थे। ययाति के प्रमुख ५ पुत्र थे- १.यदु, २.तुर्वस, ३.अनु, ४.द्रुहु और ५. पुरु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। ययाति की कुछ बेटियां भी थीं जिनमें से एक का नाम माधवी था। माधवी की कथा बहुत ही व्यथापूर्ण है। ७,२०० ईसा पूर्व अर्थात आज से ९,२०० वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने- अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव व कालांतर कौरव वंश की स्थापना हुई। पुराणों में उल्लेख है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गया था और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य न प्राप्त होगा।- (हरिवंश पुराण)। ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहता था और उसी को उसने राज्य देने का विचार प्रकट किया, परंतु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया था।(महाभारत) ययाति ने दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु को (पंजाब से उत्तरप्रदेश तक), पश्चिम में द्रुह्मु को, दक्षिण में यदु को (आज का सिन्ध-गुजरात प्रांत) और उत्तर में अनु को मांडलिक पद पर नियुक्त किया तथा पुरु को संपूर्ण भूमंडल के राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं वन को चले गए। स्वयं यदु ने भी पुरु पक्ष का समर्थन किया और स्वयं राज्य लेने से इंकार कर दिया था। इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया और वह प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक हुआ। उसके वंशज पौरव कहलाए। अन्य चारों भाइयों को जो प्रदेश दिए गए, उनका विवरण इस प्रकार है- यदु को चर्मरावती अथवा चर्मण्वती (#चंबल), बेत्रवती (बेतवा) और शुक्तिमती (केन) का तटवर्ती प्रदेश मिला। तुर्वसु को प्रतिष्ठान के दक्षिण-पूर्व का भू-भाग मिला और द्रुहु को उत्तर-पश्चिम का। गंगा-यमुना दो-आब का उत्तरी भाग तथा उसके पूर्व का कुछ प्रदेश जिसकी सीमा अयोध्या राज्य से मिलती थी, अनु के हिस्से में आया। पुरु का वंश : पुरु वंश में कई प्रतापी राजा हुए उनमें से एक थे दुष्यंत पुत्र भरत और सुदास। भरत के वंशज कुरु थे इसी वंश में शांतनु हुए जिनके पुत्र थे भीष्म; जो कौरव कहलाऐ। पुरु के कौरव वंश अंश में ही पांडव अर्जुन पुत्र अभिमन्यु हुए। इसी वंश में आगे चलकर परीक्षित हुए जिनके पुत्र थे जन्मेजय। यदु का वंश : यदु कुल के वंशज यदुवंशी यादव कहलाए जिसमें भगवान कृष्ण हुए। तुर्वसु का वंश : तुर्वसु के वंश में भोज (यवन) हुए। ययाति के पुत्र तुर्वसु का वह्नि, वह्नि का भर्ग, भर्ग का भानुमान, भानुमान का त्रिभानु, त्रिभानु का उदारबुद्धि करंधम और करंधम का पुत्र हुआ मरूत। मरूत संतानहीन था इसलिए उसने पुरु वंशी दुष्यंत को अपना पुत्र बनाकर रखा था, परंतु दुष्यंत राज्य की कामना से अपने ही वंश में लौट गए। महाभारत के अनुसार ययाति पुत्र तुर्वसु के वंशज यवन थे। पहले ये क्षत्रिय थे, पर ब्राह्मणों से द्वेष रखने के कारण इनकी गिनती शूद्रों में होने लगी। महाभारत युद्ध में ये कौरवों के साथ थे। इससे पूर्व दिग्विजय के समय नकुल और सहदेव ने इन्हें पराजित किया था। अनु का वंश : अनु को ऋ‍ग्वेद में कहीं-कहीं आनव भी कहा गया है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह कबीला परुष्णि नदी (रावी नदी) क्षेत्र में बसा हुआ था। आगे चलकर सौवीर, कैकेय और मद्र कबीले इन्हीं आनवों से उत्पन्न हुए थे। द्रुह्मु का वंश : द्रुह्मु के वंश में राजा गांधार हुए। ये आर्यावर्त के मध्य में रहते थे। बाद में द्रुहुओं? को इक्ष्वाकु कुल के राजा मंधातरी ने मध्य एशिया की ओर खदेड़ दिया। पुराणों में द्रुह्यु राजा प्रचेतस के बाद द्रुह्युओं का कोई उल्लेख नहीं मिलता। प्रचेतस के बारे में लिखा है कि उनके १०० बेटे अफगानिस्तान से उत्तर जाकर बस गए और 'म्लेच्छ' कहलाए। ययाति के पुत्र द्रुह्यु से बभ्रु का जन्म हुआ। बभ्रु का सेतु, सेतु का आरब्ध, आरब्ध का गांधार, गांधार का धर्म, धर्म का धृत, धृत का दुर्मना और दुर्मना का पुत्र प्रचेता हुआ। प्रचेता के १०० पुत्र हुए, ये उत्तर दिशा में म्लेच्छों (अरबों) के राजा हुए। यदु और तुर्वस को दास कहा जाता था। यदु और तुर्वस के विषय में ऐसा माना जाता था कि इंद्र उन्हें बाद में लाए थे। सरस्वती दृषद्वती एवं आपया नदी के किनारे भरत कबीले के लोग बसते थे। सबसे महत्वपूर्ण कबीला भरत का था। इसके शासक वर्ग का नाम त्रित्सु था। संभवतः सृजन और क्रीवी कबीले भी उनसे संबद्ध थे। तुर्वस और द्रुह्यु से ही यवन और मलेच्छों का ‍वंश चला। इस तरह यह इतिहास सिद्ध है कि ब्रह्मा के एक पु‍त्र अत्रि के वंशजों ने ही यहुदी, यवनी और पारसी धर्म की स्थापना की थी। इन्हीं में से ईसाई और इस्लाम धर्म का जन्म हुआ। यहुदियों के जो १२ कबीले थे उनका संबंध द्रुह्मु से ही था। हालांकि यह शोध का विषय है। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,,

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