gosto maharana
gosto maharana Feb 19, 2019

Jay Jagannath jay shree Krishna Jay mata laxmi Hey jagat ka nath Jagannath Hey mata laxmi sabhi Bhakto ko shukh samrudhi pradan karo sab kajivan khushal banado jay Jagannath aap ka din mangalmay ho

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Shiva Gaur Apr 17, 2019

🔸एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था । सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था जो भी जरुरी काम हो वह सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। . 🔹वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था । . 🔸एक दिन उस वक्त ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा भाई मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता । 🔹तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से इससे श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना । भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया . 🔸कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा । मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत , भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं । 🔹सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है । जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है । संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था । भक्त भी नहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा । . 🔸फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे ही प्रतीत हो रहे थे उसने सोचा क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ। . 🔹उसने उन सभी को उस सौ रुपए में से भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने के बाद उसे भोजन व्यवस्था में उसे कुल 98 रुपए खर्च करने पड़े । . 🔸उसके पास दो रुपए बच गए उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा । जब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा वह पैसे चढ़ा दिए । सेठ यह नहीं कहेगा 100 रुपए चढ़ाए । सेठ पूछेगा पैसे चढ़ा दीजिए। मैं बोल दूंगा कि , पैसे चढ़ा दिए । झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा । . 🔹वह भक्त श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए हुए अपने हृदय में उनको विराजमान कराया ।अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी के चरणो में चढ़ा दिए ।और बोला यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं । . 🔸उसी रात सेठ के पास स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी आए और बोले सेठ तुम्हारे 98 रुपए मुझे मिल गए हैं यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतर्ध्यान हो गए । . 🔹सेठ सोचने लगा मेरा नौकर बड़ा ईमानदार है ,पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी वह दो रुपए भगवान को कम चढ़ाया? उसने दो रुपए का क्या खा लिया ? उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी ? ऐसा विचार सेठ करता रहा । . 🔸काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस गांव आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा कि मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दी ? भक्त बोला हां मैंने पैसे चढ़ा दिए । . 🔹सेठ ने कहा पर तुमने 98 रुपए क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में प्रयोग किए । तब भक्त ने सारी बात बताई की उसने 98 रुपए से संतो को भोजन करा दिया था । और ठाकुर जी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे । . 🔸सेठ बड़ा खुश हुआ वह भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन यंही बैठे-बैठे हो गए। 🔹भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है । भगवान को वह 98 रुपए स्वीकार है जो उनके भक्तों की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए की कोई महत्व नहीं है जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए । भगवान को भक्ति प्रिय है भगवान स्वंय भक्तों की भक्ति व सेवा करते हैं व कोई और करे तो अत्यंत प्रसन्न होते है।

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Shiva Gaur Apr 17, 2019

*भगवान श्री कृष्ण*..... भगवान् *श्री कृष्ण* को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामो से जाना जाता है। * उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है। * राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है। * महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है। * उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है। * बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है। * दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है। * गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है। * असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है। * मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है। * गोविन्द या गोपाल में "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों , दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है। * श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था.. * श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था। * श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे। * श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।। * श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु । * दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था। * श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी श्री कृष्ण से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अंतर था। श्री कृष्ण ने 14 वर्ष की उम्र में वृंदावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले। * श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।। * श्री कृष्ण की कुल 125 वर्ष धरती पर रहे । उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था। * श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे। * श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था। * श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था। * श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था। * श्री कृष्ण को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था,बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए। * श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था। * श्री कृष्ण ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यु खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी। * श्री कृष्ण के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं। * श्री कृष्ण अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुयी थी। सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच-- ( भगवद् गीता अध्याय 18 ) *श्री कृष्ण* : "सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मैं सभी पापो से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा, श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव

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💕हरि ॐ नमा शिवाय🙏#हरिनाम_संकीर्तन_सदैव_मंगलकारी 🌹 नाम संकीर्तन से बढ़कर कोई और दूसरी सेवा नहीं है, नाम संकीर्तन सब प्रकार से मंगल करने वाला होता है। यदि हम किसी अत्यावश्यक कार्य से बाहर जा रहे हैं और मार्ग में कहीं नाम संकीर्तन हो रहा हो तो हमें कुछ समय रूक उसमें शामिल होना चाहिए, अब प्रश्न यह कि यदि हम वहां रूक गये तो हमारे कार्य का क्या होगा, कुछ अमंगल हो गया तो...नही यह चिंता मन से तत्काल ही निकाल देनी चाहिए क्योंकि श्री ठाकुरजी का नाम सभी प्रकार अमंगल को हरने वाला है। "मंगल करण अमंगलहारी" इस विषय में एक दृष्टांत हैं... श्री चैतन्य महाप्रभु नित्य रात्रि में श्रीवास पंडित जी के यहां नाम संकीर्तन कराते थे, बहुत से वैष्णव उसमें सम्मलित होते थे, श्रीवास पंडित जी का पुत्र कीर्तन में झांझ बजाया करता था और खुब प्रेम से नाम संकीर्तन करता था। एक सांयकाल के समय किसी भंयकर रोग के कारण उनके पुत्र की मृत्यु हो जाती है, यह देख श्रीवास पंडित जी की पत्नी की आंखों से आंसू बहने लगते हैं तो श्रीवास पंडित कहते हैं.. सावधान..!! बिल्कुल नहीं रोना, एक थोड़ी सी चित्कार भी नहीं करना। उनकी पत्नी कहती हैं मेरा पुत्र मर गया और आप ऐसा कह रहे हैं। श्रीवास पंडित कहते हैं यदि तुम्हारा पुत्र था तो मेरा भी तो कुछ लगता है। किन्तु यदि तुम रोई तो आस पास मे सबको खबर हो जायेगी कि हमारे घर में शौक हुआ है और यदि सब यहां एकत्रित हो गए तो रात्रि में महाप्रभु जी को कीर्तन कराने कही अन्यत्र जाना पड़ेगा उनको असुविधा होगी, तुम इस बालक को ले जाकर भीतर कक्ष में लेटा दो सुबह देखेंगे कि क्या करना है, उनकी पत्नी वैसा ही करती है। रात्रि में महाप्रभु जी पधारे, कीर्तन प्रारंभ हुआ, "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" तभी महाप्रभु जी पंडित जी से पुछते है, अरे! श्रीवास तेरा बालक किधर है आज दिखाई नही देता वह, श्रीवास पंडित जी झुठ नही कह सकते थे और यदि सत्य कह दिया तो महाप्रभु जी को पीङा होगी इसलिए वह केवल इतना ही बोले..भगवन् होगा " इतने में ही किसी वैष्णव का उस मृत बालक के कक्ष में जाना होता है वह तुरंत महाप्रभु जी को कहता है "महाप्रभु! पंडित जी का पुत्र कीर्तन मे कहां से आयेगा। उसकी तो संध्या को ही मृत्यु हो गई है। श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं " ये हो ही नही सकता जिसके घर में नित्य प्रभु के नाम का ऐसा मंगलकीर्तन होता है वहाँ ऐसा अमंगल हो ही नहीं सकता। श्री महाप्रभु जी गंभीर वाणी में पुकारते हैं, अरे! ओ श्रीवास पंडित के बालक कहां है तू, इधर आ, आज कीर्तन में झांझ कौन बजायेगा... इधर महाप्रभु जी का बोलना हुआ उधर वह बालक कक्ष भीतर से दौड़ा दौङा बाहर आया और कीर्तन में झांझ बजाने लगा श्री वास पंडित जी और उनकी पत्नी के नेत्रों से आंसू बहने लगते हैं वे महाप्रभु जी को बारंबार प्रणाम करते हैं। इसलिए भाई, नाम संकीर्तन से बढ़कर कोई पूंजी नही और इसके समान किसी भी समस्या की कोई कुंजी नहीं हैं। भज गोविन्दं भज गोविन्दम गोविन्दं भज मूढ़मते "अरे बोधिक मूर्खो, केवल श्री गोविन्द का भजन करो, केवल श्री गोविन्द का भजन करो, केवल श्री गोविन्द का भजन करो। तुम्हारा व्याकरण का ज्ञान और शब्द चातूरी मृत्यु के वक्त तुम्हारी रक्षा नही कर पायेगी।। सदैव जपते रहिये...जपने का सामर्थ्य नहीं तो हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

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