गांडीव धनुष की गाथा ब्रह्मा से शुरू हुई, जिसने तीनों लोकों से बुरी शक्तियों को खत्म करने का हथियार बनाया। धनुष को 1000 साल तक अपने पास रखने के बाद, ब्रह्मा ने प्रजापतियों में से एक को धनुष पारित किया। प्रजापति ने एक और 1000 वर्षों तक धनुष को अपने पास रखा। जब राक्षसों के विनाश का समय आ गया था, तो प्रजापति ने इंद्र को गांडीव दिया। गांडिवा से तीरों की असंख्य रेखाओं की शूटिंग करते हुए, इंद्र ने राक्षसों को गांडिवा के साथ समाप्त कर दिया और इसे 3585 वर्षों के लिए विजय का प्रतीक माना। तब इंद्र ने अपने छोटे भाई वरुण को स्नेहपूर्वक प्रणाम किया। 100 वर्षों तक धनुष रखने के बाद, वरुण ने अर्जुन को गांडीव भेंट किया। इस प्रकार अर्जुन प्रसिद्ध धनुष का स्वामी बन गया। अर्जुन 65 वर्षों तक गांडीव धनुष के स्वामी थे। कुरुक्षेत्र युद्ध में गांडीव अर्जुन की पसंद का हथियार था। युद्ध के 36 साल बाद अर्जुन ने समुद्र में धनुष विसर्जित किया। आखिरकार गांडीव इसके पिछले मालिक वरुण के पास लौट आया।

गांडीव धनुष की गाथा ब्रह्मा से शुरू हुई, जिसने तीनों लोकों से बुरी शक्तियों को खत्म करने का हथियार बनाया। धनुष को 1000 साल तक अपने पास रखने के बाद, ब्रह्मा ने प्रजापतियों में से एक को धनुष पारित किया। प्रजापति ने एक और 1000 वर्षों तक धनुष को अपने पास रखा। जब राक्षसों के विनाश का समय आ गया था, तो प्रजापति ने इंद्र को गांडीव दिया। गांडिवा से तीरों की असंख्य रेखाओं की शूटिंग करते हुए, इंद्र ने राक्षसों को गांडिवा के साथ समाप्त कर दिया और इसे 3585 वर्षों के लिए विजय का प्रतीक माना। तब इंद्र ने अपने छोटे भाई वरुण को स्नेहपूर्वक प्रणाम किया। 100 वर्षों तक धनुष रखने के बाद, वरुण ने अर्जुन को गांडीव भेंट किया। इस प्रकार अर्जुन प्रसिद्ध धनुष का स्वामी बन गया। अर्जुन 65 वर्षों तक गांडीव धनुष के स्वामी थे। कुरुक्षेत्र युद्ध में गांडीव अर्जुन की पसंद का हथियार था। युद्ध के 36 साल बाद अर्जुन ने समुद्र में धनुष विसर्जित किया। आखिरकार गांडीव इसके पिछले मालिक वरुण के पास लौट आया।

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Babu lal purbia Nov 22, 2020
जय श्री कृष्णा राधे राधे जी

जितेन्द्र दुबे Nov 23, 2020
*🚩🌹🥀जय श्री मंगलमुर्ती गणेशाय नमः 🌺🌹💐🌺 शुभ प्रभात 🌹 राम राम जी 🚩मंदिर के सभी भाई बहनों को राम राम जी परब्रह्म परमात्मा आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें 🙏 🚩🔱🚩प्रभु भक्तो को सादर प्रणाम 🙏 🚩🔱🚩🕉️ त्रयंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् 🌺ऊँ महाकालेश्वाराय नमः🌺 ऊँ सोमेश्वाराय नमः 🌺ऊँ ओमकारेश्वर नमः🌺 ऊँ रामेश्वाराय नमः🌹 ॐ राम रामाय नमः 🌹 ॐ हं हनुमते नमःॐ हं हनुमते नमः ॐ शं शनिश्चराय नमः 🌹ऊँ महाकालेश्वाराय नमः🚩ऊँ नमः शिवाय 🚩ऊँ राधेकृष्णचंद्राय नमः🚩 भगवान भोलेनाथ की कृपा दृष्टि आप सभी पर हमेशा बनी रहे आप का हर पल मंगलमय हो 🚩जय श्री राम 🚩हर हर महादेव🚩राम राम जी🚩💐💐शुभ प्रभात स्नेह वंदन💐🌺🌻 आंवला नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🥀🌻🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏

Babulal patel Nov 23, 2020
Acharya g 🙏🙏🌷💓 Om namo Bhagvate Vashudevay namah 🌷🚩

मनुष्य देह के घटक कौन से हैं ? 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ इस लेख में हमने मनुष्य देह की रचना और उसके विविध सूक्ष्म देहों का विवरण दिया है। आधुनिक विज्ञान ने मनुष्य के स्थूल शरीर का कुछ गहराई तक अध्ययन किया है; किंतु मनुष्य के अस्तित्व के अन्य अंगों के संदर्भ में आधुनिक विज्ञान की समझ आज भी अत्यंत सीमित है। मनुष्य के मन एवं बुद्धि के संदर्भ में ज्ञान अब भी उनके स्थूल अंगों तक सीमित है। इसकी तुलना में अध्यात्मशास्त्र ने मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व का विस्तृतरूप से अध्ययन किया है। अध्यात्मशास्त्र के अनुसार मनुष्य किन घटकों से बना है ? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 👉 जीवित मनुष्य आगे दिए अनुसार विविध देहों से बना है। 👉 स्थूल शरीर अथवा स्थूलदेह 👉 चेतना (ऊर्जा) अथवा प्राणदेह 👉 मन अथवा मनोदेह 👉 बुद्धि अथवा कारणदेह 👉 सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह 👉 आत्मा अथवा हम सभी में विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व स्थूलदेह 〰️〰️〰️ आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से यह देह सर्वाधिक परिचित है। यह देह अस्थि-ढांचा, स्नायु, ऊतक, अवयव, रक्त, पंच ज्ञानेंद्रिय आदि से बनी है। चेतनामय अथवा प्राणदेह 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यह देह प्राणदेह के नाम से परिचित है । इस देह द्वारा स्थूल तथा मनोदेह के सभी कार्यों के लिए आवश्यक चेतनाशक्ति की (ऊर्जा की) आपूर्ति की जाती है । यह चेतनाशक्ति अथवा प्राण पांच प्रकार के होते हैं : प्राण :👉 श्‍वास के लिए आवश्यक ऊर्जा उदान :👉 उच्छवास तथा बोलने के लिए आवश्यक ऊर्जा समान :👉 जठर एवं आंतों के कार्य के लिए आवश्यक ऊर्जा व्यान :👉 शरीर की ऐच्छिक तथा अनैच्छिक गतिविधियों के लिए आवश्यक ऊर्जा अपान :👉 मल-मूत्र विसर्जन, वीर्यपतन, प्रसव आदि के लिए आवश्यक ऊर्जा मृत्यु के समय यह ऊर्जा पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन होती है और साथ ही सूक्ष्मदेह की यात्रा में गति प्रदान करने में सहायक होती है। मनोदेह अथवा मन 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मनोदेह अथवा मन हमारी संवेदनाएं, भावनाएं और इच्छाआें का स्थान है । इस पर हमारे वर्तमान तथा पूर्वजन्म के अनंत संस्कार होते हैं। इसके तीन भाग हैं : बाह्य (चेतन) मन👉 मन के इस भाग में हमारी वे संवेदनाएं तथा विचार होते हैं, जिनका हमें भान रहता है। अंतर्मन (अवचेतन मन)👉 इसमें वे संस्कार होते हैं, जिन्हें हमें इस जन्म में प्रारब्ध के रूप में भोगकर पूरा करना आवश्यक है । अंतर्मन के विचार किसी बाह्य संवेदना के कारण, तो कभी-कभी बिना किसी कारण भी बाह्यमन में समय-समय पर उभरते हैं । उदाहरण👉 कभी-कभी किसी के मन में अचानक ही बचपन की किसी संदिग्ध घटना के विषय में निरर्थक एवं असम्बंधित विचार उभर आते हैं । सुप्त (अचेतन) मन👉 मन के इस भाग के संदर्भ में हम पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं । इसमें हमारे संचित से संबंधित सर्व संस्कार होते हैं । अंतर्मन तथा सुप्त मन, दोनों मिलकर चित्त बनता है। कभी-कभी मनोदेह के एक भाग को हम वासनादेह भी कहते हैं। मन के इस भाग में हमारी सर्व वासनाएं संस्कारूप में होती हैं। मनोदेह से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है । बुद्धि 〰️〰️ कारणदेह अथवा बुद्धि का कार्य है निर्णय प्रक्रिया एवं तर्कक्षमता। बुद्धि से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है। सूक्ष्म अहं 〰️〰️〰️ सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह मनुष्य की अज्ञानता का अंतिम शेष भाग (अवशेष) है। मैं ईश्‍वर से अलग हूं, यह भावना ही अज्ञानता है। आत्मा 〰️〰️〰️ आत्मा हमारे भीतर का ईश्‍वरीय तत्त्व है और हमारा वास्तविक स्वरूप है । सूक्ष्मदेह का यह मुख्य घटक है, जो कि परमेश्‍वरीय तत्त्व का अंश है । इस अंश के गुण हैं – सत, चित्त और आनंद (शाश्‍वत सुख) । आत्मा पर जीवन के किसी सुख-दुःख का प्रभाव नहीं पडता और वह निरंतर आनंदावस्था में रहती है । वह जीवन के सुख-दुःखों की ओर साक्षीभाव से (तटस्थता से) देखती है। आत्मा तीन मूल सूक्ष्म-घटकों के परे है; तथापि हमारा शेष अस्तित्व स्थूलदेह एवं मनोदेह से बना होता है। सूक्ष्मदेह 〰️〰️〰️ हमारे अस्तित्व का जो भाग मृत्यु के समय हमारे स्थूल शरीर को छोड जाता है, उसे सूक्ष्मदेह कहते हैं । इसके घटक हैं – मनोदेह, कारणदेह अथवा बुद्धि, महाकारण देह अथवा सूक्ष्म अहं और आत्मा । मृत्यु के समय केवल स्थूलदेह पीछे रह जाती है । प्राणशक्ति पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है । सूक्ष्मदेह के कुछ अंग निम्नानुसार हैं । 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय👉 सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय अर्थात हमारे पंचज्ञानेंद्रियों का वह सूक्ष्म भाग जिसके द्वारा हमें सूक्ष्म विश्‍व का बोध होता है। उदाहरण👉 कोई उत्तेजक न होते हुए भी हम चमेली के फूल जैसी सूक्ष्म सुगंध अनुभव कर सकते हैं । यह भी संभव है कि एक ही कक्ष में किसी एक को इस सूक्ष्म सुगंध की अनुभूति हो और अन्य किसी को न हो । इसका विस्तृत विवरण दिया है । सूक्ष्म कर्मेंद्रिय👉 सूक्ष्म कर्मेंद्रिय अर्थात, हमारे हाथ, जिह्वा (जीभ) स्थूल कर्मेंद्रियों का सूक्ष्म भाग। सर्व क्रियाओ का प्रारंभ सूक्ष्म कर्मेंद्रियों में होता है और तदुपरांत ये क्रियाएं स्थूल स्तर पर व्यक्ति की स्थूल कर्मेंद्रियों द्वारा की जाती हैं। अज्ञान (अविद्या) 〰️〰️〰️〰️〰️ आत्मा के अतिरिक्त हमारे अस्तित्व के सभी अंग माया का ही भाग हैं । इसे अज्ञान अथवा अविद्या कहते हैं, जिसका शब्दशः अर्थ है (सत्य) ज्ञान का अभाव । अविद्या अथवा अज्ञान शब्द का उगम इस तथ्य से है कि हम अपने अस्तित्व को केवल स्थूल शरीर, मन एवं बुद्धि तक ही सीमित समझते हैं । हमारा तादात्म्य हमारे सत्य स्वरूप (आत्मा अथवा स्वयंमें विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व) के साथ नहीं होता । अज्ञान (अविद्या) ही दुःख का मूल कारण है । मनुष्य धनसंपत्ति, अपना घर, परिवार, नगर, देश आदि के प्रति आसक्त होता है । किसी व्यक्ति से अथवा वस्तु से आसक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही इस आसक्ति से दुःख निर्मिति की संभावना अधिक होती है । एक आदर्श समाज सेवक अथवा संतके भी क्रमशः समाज तथा भक्तों के प्रति आसक्त होने की संभावना रहती है । मनुष्य की सबसे अधिक आसक्ति स्वयं के प्रति अर्थात अपने ही शरीर एवं मन के प्रति होती है । अल्पसा कष्ट अथवा रोग मनुष्य को दुःखी कर सकता है । इसलिए मनुष्य को स्वयं से धीर-धीरे अनासक्त होकर अपने जीवन में आनेवाले दुःख तथा व्याधियों को स्वीकार करना चाहिए, इस आंतरिक बोध के साथ कि जीवन में सुख-दुःख प्रमुखतः हमारे प्रारब्ध के कारण ही हैं (हमारे ही पिछले कर्मों का फल हैं ।) आत्मा से तादात्म्य होने पर ही हम शाश्‍वत (चिरस्थायी) आनंद प्राप्त कर सकते हैं । आत्मा और अविद्या मिलकर जीवात्मा बनती है । जीवित मनुष्य में अविद्या के कुल बीस घटक होते हैं – स्थूल शरीर, पंचसूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय, पंचसूक्ष्म कर्मेंद्रिय, पंचप्राण, बाह्यमन, अंतर्मन, बुद्धि और अहं । सूक्ष्म देह के घटकों का कार्य निरंतर होता है, जीवात्मा का ध्यान आत्मा की अपेक्षा इन घटकों की ओर आकर्षित होता है; अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान की अपेक्षा अविद्या की ओर जाता है । 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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Guria Thakur Jan 20, 2021

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Gopal Jalan Jan 20, 2021

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Garima Gahlot Rajput Jan 20, 2021

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Garima Gahlot Rajput Jan 20, 2021

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Garima Gahlot Rajput Jan 20, 2021

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Neha Sharma, Haryana Jan 20, 2021

👉अवश्य पढ़ें श्री गुरु गोबिंद सिंह जन्मदिवस विशेष.... 🚩!! जयति जय श्री सिद्धिविनायक !!🚩 ******************************** *वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ अर्थ सहित जानिए गणेश जी के 5 महामंत्र :- मित्रों भगवान श्री गणेश जी की पूजा करने के लिए कुछ महामंत्र बताए गए हैं। जो आसान हैं और हर संस्कृत नहीं जानने वाले लोग भी इन मंत्रों को पढ़ सकते हैं। इन मंत्रों को बोलने से पूजा पूर्ण होती है और गणेश जी भी जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। अर्थ सहित जानिए गणपति जी के ऐसे ही खास मंत्र.…... 1- वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ *अर्थ :- घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर काय, करोड़ सूर्य के समान महान प्रतिभाशाली। मेरे प्रभु, हमेशा मेरे सारे कार्य बिना विघ्न के पूरे करें (करने की कृपा करें)॥ 2- विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं। नागाननाथ श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥ *अर्थ :- विघ्नेश्वर, वर देने वाले, देवताओं को प्रिय, लम्बोदर, कलाओं से परिपूर्ण, जगत् का हित करने वाले, गजके समान मुख वाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है ; हे गणनाथ ! आपको नमस्कार है । 3- अमेयाय च हेरम्ब परशुधारकाय ते । मूषक वाहनायैव विश्वेशाय नमो नमः ॥ *अर्थ :- हे हेरम्ब ! आपको किन्ही प्रमाणों द्वारा मापा नहीं जा सकता, आप परशु धारण करने वाले हैं, आपका वाहन मूषक है । आप विश्वेश्वर को बारम्बार नमस्कार है । 4- एकदन्ताय शुद्घाय सुमुखाय नमो नमः । प्रपन्न जनपालाय प्रणतार्ति विनाशिने ॥ *अर्थ :- जिनके एक दाँत और सुन्दर मुख है, जो शरणागत भक्तजनों के रक्षक तथा प्रणतजनों की पीड़ा का नाश करनेवाले हैं, उन शुद्धस्वरूप आप गणपति को बारम्बार नमस्कार है । 5- एकदंताय विद्‍महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दंती प्रचोदयात।। *अर्थ :- एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें। रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश जी आप सहपरिवार का सर्वदा मङ्गल करें। ********************** !! जय श्री गणेश !! विघ्न हरण मंगल करण काटत सकल क्लेश सबसे पहले सुमरिये गौरी पुत्र गणेश !! जय श्री गणेश !! 🚩🙏🌸🙏🚩 *श्री गुरु गोबिंद सिंह जी जन्म दिवस पौष शुक्ल सप्तमी विशेष 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ *ए नजरां नई बनिया चुकन वास्ते ए ता बनिया यारियां दे लई ते खुमारिया दे लइ दो कम्मा वास्ते साढ़े सिर बने या आरियां दे लइ या सरदारिया दे लइ। *सतगुरु श्रीगुरुगोबिंद सिंह जी जीवन परिचय..... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *गुरु गोविंद सिंह का जन्म नौवें सिख गुरु गुरु तेगबहादुर और माता गुजरी के घर पटना में 05 जनवरी 1666 को हुआ था। जब वह पैदा हुए थे उस समय उनके पिता असम में धर्मउपदेश को गये थे। उनके बचपन का नाम गोविन्द राय था। पटना में जिस घर में उनका जन्म हुआ था और जिसमें उन्होने अपने प्रथम चार वर्ष बिताये थे, वहीं पर अब तखत श्री पटना साहिब स्थित है। *1670 में उनका परिवार फिर पंजाब आ गया। मर्च 1672 में उनका परिवार हिमालय के शिवालिक पहाड़ियों में स्थित चक्क नानकी नामक स्थान पर आ गया। यहीं पर इनकी शिक्षा आरम्भ हुई। उन्होंने फारसी, संस्कृत की शिक्षा ली और एक योद्धा बनने के लिए सैन्य कौशल सीखा। चक नानकी ही आजकल आनन्दपुर साहिब कहलता है। गोविन्द राय जी नित्य प्रति आनंदपुर साहब में आध्यात्मिक आनंद बाँटते, मानव मात्र में नैतिकता, निडरता तथा आध्यात्मिक जागृति का संदेश देते थे। आनंदपुर वस्तुतः आनंदधाम ही था। यहाँ पर सभी लोग वर्ण, रंग, जाति, संप्रदाय के भेदभाव के बिना समता, समानता एवं समरसता का अलौकिक ज्ञान प्राप्त करते थे। गोविन्द जी शांति, क्षमा, सहनशीलता की मूर्ति थे। काश्मीरी पण्डितों का जबरन धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बनाये जाने के विरुद्ध शिकायत को लेकर तथा स्वयं इस्लामन स्वीकारने के कारण 11 नवम्बर 1675 को औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से उनके पिता गुरु तेग बहादुर का सिर कटवा दिया। इसके पश्चात वैशाखी के दिन 29 मार्च 1676 को गोविन्द सिंह सिखों के दसवें गुरु घोषित हुए। 10 वें गुरु बनने के बाद भी आपकी शिक्षा जारी रही। शिक्षा के अन्तर्गत लिखना-पढ़ना, घुड़सवारी तथा धनुष चलाना आदि सम्मिलित था। 1684 में उन्होने चंडी दी वार कि रचना की। 1685 तक आप यमुना नदी के किनारे पाओंटा नामक स्थान पर रहे। गुरु गोबिन्द सिंह की तीन पत्नियाँ थीं। 21जून, 1677 को 10 साल की उम्र में उनका विवाह माता जीतो के साथ आनंदपुर से 10 किलोमीटर दूर बसंतगढ़ में किया गया। उन दोनों के 3 पुत्र हुए जिनके नाम थे – जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फ़तेह सिंह। 4 अप्रैल, 1684 को 17 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह माता सुंदरी के साथ आनंदपुर में हुआ। उनका एक बेटा हुआ जिसका नाम था अजित सिंह। 15 अप्रैल, 1700 को 33 वर्ष की आयु में उन्होंने माता साहिब देवन से विवाह किया। वैसे तो उनका कोई संतान नहीं था पर सिख धर्म के पन्नों पर उनका दौर भी बहुत प्रभावशाली रहा। *खालसा पंथ की स्थापना..... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *गुरु गोबिंद सिंह जी का नेतृत्व सिख समुदाय के इतिहास में बहुत कुछ नया ले कर आया। उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है उसका निर्माण किया। सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा – "कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है"? उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राज़ी हो गया और गुरु गोबिंद सिंह उसे तम्बू में ले गए और कुछ देर बाद वापस लौटे एक खून लगे हुए तलवार के साथ। गुरु ने दोबारा उस भीड़ के लोगों से वही सवाल दोबारा पुछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राज़ी हुआ और उनके साथ गया पर वे तम्बू से जब बहार निकले तो खून से सना तलवार उनके हाथ में था। उसी प्रकार पांचवा स्वयंसेवक जब उनके साथ तम्बू के भीतर गया, कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस लौटे और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया। उसके बाद गुरु गोबिंद जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छठवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। उन्होंने पांच ककारों का महत्व खालसा के लिए समझाया और कहा – केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा। इधर 27 दिसम्बर सन्‌ 1704 को दोनों छोटे साहिबजादे और जोरावतसिंह व फतेहसिंहजी को दीवारों में चुनवा दिया गया। जब यह हाल गुरुजी को पता चला तो उन्होंने औरंगजेब को एक जफरनामा (विजय की चिट्ठी) लिखा, जिसमें उन्होंने औरगंजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है। 8 मई सन्‌ 1705 में 'मुक्तसर' नामक स्थान पर मुगलों से भयानक युद्ध हुआ, जिसमें गुरुजी की जीत हुई। अक्टूबर सन्‌ 1706 में गुरुजी दक्षिण में गए जहाँ पर आपको औरंगजेब की मृत्यु का पता लगा। औरंगजेब ने मरते समय एक शिकायत पत्र लिखा था। हैरानी की बात है कि जो सब कुछ लुटा चुका था, (गुरुजी) वो फतहनामा लिख रहे थे व जिसके पास सब कुछ था वह शिकस्त नामा लिख रहा है। इसका कारण था सच्चाई। गुरुजी ने युद्ध सदैव अत्याचार के विरुद्ध किए थे न कि अपने निजी लाभ के लिए। औरंगजेब की मृत्यु के बाद आपने बहादुरशाह को बादशाह बनाने में मदद की। गुरुजी व बहादुरशाह के संबंध अत्यंत मधुर थे। इन संबंधों को देखकर सरहद का नवाब वजीत खाँ घबरा गया। अतः उसने दो पठान गुरुजी के पीछे लगा दिए। इन पठानों ने गुरुजी पर धोखे से घातक वार किया, जिससे 7 अक्टूबर 1708 में गुरुजी (गुरु गोबिन्द सिंह जी) नांदेड साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हो गए। अंत समय आपने सिक्खों को गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानने को कहा व खुद भी माथा टेका। गुरुजी के बाद माधोदास ने, जिसे गुरुजी ने सिक्ख बनाया बंदासिंह बहादुर नाम दिया था, सरहद पर आक्रमण किया और अत्याचारियों की ईंट से ईंट बजा दी। गुरु गोविंदजी के बारे में लाला दौलतराय, जो कि कट्टर आर्य समाजी थे, लिखते हैं 'मैं चाहता तो स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, परमहंस आदि के बारे में काफी कुछ लिख सकता था, परंतु मैं उनके बारे में नहीं लिख सकता जो कि पूर्ण पुरुष नहीं हैं। मुझे पूर्ण पुरुष के सभी गुण गुरु गोविंदसिंह में मिलते हैं।' अतः लाला दौलतराय ने गुरु गोविंदसिंहजी के बारे में पूर्ण पुरुष नामक एक अच्छी पुस्तक लिखी है। इसी प्रकार मुहम्मद अब्दुल लतीफ भी लिखता है कि जब मैं गुरु गोविंदसिंहजी के व्यक्तित्व के बारे में सोचता हूँ तो मुझे समझ में नहीं आता कि उनके किस पहलू का वर्णन करूँ। वे कभी मुझे महाधिराज नजर आते हैं, कभी महादानी, कभी फकीर नजर आते हैं, कभी वे गुरु नजर आते हैं। सिखों के दस गुरू हैं। एक हत्यारे से युद्ध करते समय गुरु गोबिंद सिंह जी के छाती में दिल के ऊपर एक गहरी चोट लग गयी थी। जिसके कारण 18 अक्टूबर, 1708 को 42 वर्ष की आयु में नान्देड में उनकी मृत्यु हो गयी। *आनन्दपुर साहिब से संबंध..…. 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *अप्रैल 1685 में, सिरमौर के राजा मत प्रकाश के निमंत्रण पर गुरू गोबिंद सिंह ने अपने निवास को सिरमौर राज्य के पांवटा शहर में स्थानांतरित कर दिया। सिरमौर राज्य के गजट के अनुसार, राजा भीम चंद के साथ मतभेद के कारण गुरु जी को आनंदपुर साहिब छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था और वे वहाँ से टोका शहर चले गये। मत प्रकाश ने गुरु जी को टोका से सिरमौर की राजधानी नाहन के लिए आमंत्रित किया। नाहन से वह पांवटा के लिए रवाना हुऐ| मत प्रकाश ने गढ़वाल के राजा फतेह शाह के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से गुरु जी को अपने राज्य में आमंत्रित किया था। राजा मत प्रकाश के अनुरोध पर गुरु जी ने पांवटा में बहूत कम समय में उनके अनुयायियों की मदद से एक किले का निर्माण करवाया। गुरु जी पांवटा में लगभग तीन साल के लिए रहे और कई ग्रंथों की रचना की। *सन् 1687 में नादौन की लड़ाई में, गुरु गोबिंद सिंह, भीम चंद, और अन्य मित्र देशों की पहाड़ी राजाओं की सेनाओं ने अलिफ़ खान और उनके सहयोगियों की सेनाओ को हरा दिया था। विचित्र नाटक (गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित आत्मकथा) और भट्ट वाहिस के अनुसार, नादौन पर बने व्यास नदी के तट पर गुरु गोबिंद सिंह आठ दिनों तक रहे और विभिन्न महत्वपूर्ण सैन्य प्रमुखों का दौरा किया। भंगानी के युद्ध के कुछ दिन बाद, रानी चंपा (बिलासपुर की विधवा रानी) ने गुरु जी से आनंदपुर साहिब (या चक नानकी जो उस समय कहा जाता था) वापस लौटने का अनुरोध किया जिसे गुरु जी ने स्वीकार किया। वह नवंबर 1688 में वापस आनंदपुर साहिब पहुंच गये। 1695 में, दिलावर खान (लाहौर का मुगल मुख्य) ने अपने बेटे हुसैन खान को आनंदपुर साहिब पर हमला करने के लिए भेजा। मुगल सेना हार गई और हुसैन खान मारा गया। हुसैन की मृत्यु के बाद, दिलावर खान ने अपने आदमियों जुझार हाडा और चंदेल राय को शिवालिक भेज दिया। हालांकि, वे जसवाल के गज सिंह से हार गए थे। पहाड़ी क्षेत्र में इस तरह के घटनाक्रम मुगल सम्राट औरंगज़ेब लिए चिंता का कारण बन गए और उसने क्षेत्र में मुगल अधिकार बहाल करने के लिए सेना को अपने बेटे के साथ भेजा। *गुरुगोबिंद सिंह जी की प्रमुख रचनायें..... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *दशम ग्रन्थ की पाण्डुलिपि का प्रथम पत्र। दशम ग्रन्थ में प्राचीन भारत की सन्त-सैनिक परम्परा की कथाएँ हैं। *जाप साहिब :👉 एक निरंकार के गुणवाचक नामों का संकलन *अकाल उस्तत:👉 अकाल पुरख की अस्तुति एवं कर्म काण्ड पर भारी चोट *बचित्र नाटक :👉 गोबिन्द सिंह की सवाई जीवनी और आत्मिक वंशावली से वर्णित रचना *चण्डी चरित्र 👉 4 रचनाएँ - अरूप-आदि शक्ति चंडी की स्तुति। इसमें चंडी को शरीर औरत एवंम मूर्ती में मानी जाने वाली मान्यताओं को तोड़ा है। चंडी को परमेशर की शक्ति = हुक्म के रूप में दर्शाया है। एक रचना मार्कण्डेय पुराण पर आधारित है। *शास्त्र नाम माला :👉 अस्त्र-शस्त्रों के रूप में गुरमत का वर्णन। *अथ पख्याँ चरित्र लिख्यते :👉 बुद्धिओं के चाल चलन के ऊपर विभिन्न कहानियों का संग्रह। *ज़फ़रनामा :👉 मुगल शासक औरंगजेब के नाम पत्र। *खालसा महिमा :👉 खालसा की परिभाषा और खालसा के कृतित्व। *गुरु_गोबिंद_सिंह_जयंती राष्ट्रीय_पितृदिवस...... *गुरु तेग बहादुर के प्रिय सपूत, सिख पंथ कर १०वें गुरु, महान योद्धा, संतशिरोमणि, मार्मिक कवि, तत्त्वज्ञानी, खालसा के संस्थापक, गुरु गोबिंद सिंह जी के ३५४वें प्रकाशपर्व की शुभकामनाएं। *विगत कईं वर्षों से हम Dharma Shakti के माध्यम से गुरु गोबिंद सिंह जयंती को पितृदिवस के रूप में मना रहे हैं। एक ऐसे पिता जिन्होंने अपने चार लाल देश और धर्म के लिये बलिदान कर दिये.... जो मात्र ९ वर्ष की आयु में अपने पिता गुरु तेगबहादुर जी को धर्म के लिये बलिदान होने की प्रेरणा देते हैं.... ऐसा महान व्यक्तित्व जिन्होंने समाज को आध्यात्मिक राह तो दिखाई, परन्तु अधर्मी लोगों से लड़ने के लिये हाथ में तलवार भी उठा ली... ऐसा महापुरुष, जो लोगों को आध्यात्मिक रस तो पिलाता है, परन्तु युद्ध में अपनी तलवार से दुश्मनों के दांत भी खट्टे करता है... ऐसा प्रेरक जो कहता है कि चिड़ियों से बाज लड़ाऊं, सवा लाख से १ लड़ाऊं... ऐसा बादशाह जिसे हर प्रकार का दर्द मिला, परन्तु फिर भी जिसने धर्म न छोड़ा.... ऐसे गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों में कोटि कोटि नमन। *जून के तीसरे रविवार को father's day मनाया जाता है। परन्तु हमारे देश की परंपरा रही है कि कोई विशेष दिवस यदि मनाना हो तो उसका वैज्ञानिक कारण होना चाहिये, उस दिन का ऐतिहासिक महत्त्व होना चाहिये। यदि एक विशेष दिन पिता को समर्पित करना ही है तो यहीं दिन करना चाहिये। उनके जैसा व्यक्तित्व कोई नहीं दिखता जिन्होंने अपना सब कुछ ही कुर्बान कर दिया। *यदि देश के प्रत्येक पिता को किसी का अनुसरण करना चाहिये तो गुरू गोबिंद सिंह जी का करना चाहिये। कितने महान पिता थे वे! किसी शिक्षा अपने बच्चों को दी थी!! जिस आयु में बच्चे अपने खिलौने के लिये लड़ते रहते है, उतनी सी आयु में देश, धर्म और संस्कृति के लिये बलिदान होने वाले सपूतों के पिता के हम ऋणी हैं। नन्ही सी आयु में भी मौत के सामने निर्भय होकर सिंह के समान गर्जना करने वाले सपूत जिस पिता के हों, वो पिता देश का गौरव है। यदि भारत को विश्वगुरु के पद पर आसीन करना है तो आज देश के प्रत्येक पिता को गुरु गोबिंद सिंह जी की तरह बनना होगा। *तो आप भी इस पहल में हमारा साथ दीजिये। गुरु गोबिंद सिंह जयंती को पितृदिवस के रूप में मनाने का संकल्प लीजिये और अधिक से अधिक लोगों को यहीं करने के लिये प्रेरित कीजिये। पौष, शुक्ल सप्तमी, विक्रम संवत, २०७७ *NationalFathersDay, GuruGobindSinghJayanti *DharmaShakti...... *आप सभी को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी जन्म दिवस की शुभकामनाएं*🙏🙏 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Garima Gahlot Rajput Jan 20, 2021

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Shakti Jan 20, 2021

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