नौ दिन कैसे करें कन्या-पूजन ================== नवरात्रि --बालिकाओं को प्रसन्न करने का पर्व। नवरात्रि यानी सौन्दर्य के मुखरित होने का पर्व। नवरात्रि यानी उमंग से खिल-खिल जाने का पर्व। नौ दिनों तक दैवीय शक्ति मनुष्य लोक के भ्रमण के लिए आती है। इन दिनों की गई उपासना-आराधना से देवी भक्तों पर प्रसन्न होती है। लेकिन पुराणों में वर्णित है कि मात्र श्लोक-मंत्र-उपवास और हवन से देवी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। इन दिनों २ से लेकर ५ वर्ष तक की नन्ही कन्याओं के पूजन का विशेष महत्व है। नौ दिनों तक इन नन्ही कन्याओं को सुंदर उपहार देकर इनका दिल जीता जा सकता है। इनके माध्यम से नवदुर्गा को भी प्रसन्न किया जा सकता है। पुराणों की दृष्टि से नौ दिनों तक कन्याओं को एक विशेष प्रकार की भेंट देना शुभ होता है। प्रथम दिन--- "फूल" की भेंट देना शुभ होता है। साथ में कोई एक श्रृंगार सामग्री अवश्य दें। अगर आप माँ "सरस्वती" को प्रसन्न करना चाहते है तो "श्वेत फूल" अर्पित करें। अगर आपके दिल में कोई "भौतिक कामना" है तो "लाल पुष्प"देकर इन्हें खुश करें। (उदाहरण के लिए : गुलाब, चंपा, मोगरा,गेंदा, गुड़हल) दूसरे दिन--- "फल" देकर इनका पूजन करें। यह फल भी सांसारिक कामना के लिए लाल अथवा पीला और वैराग्य की प्राप्ति के लिए केला या श्रीफल हो सकता है। याद रखें कि फल खट्टे ना हो। तीसरे दिन---- 'मिठाई" का महत्व होता है। इस दिन अगर हाथ की बनी खीर, हलवा या केशरिया चावल बना कर खिलाए जाएँ तो देवी प्रसन्न होती है। चौथे दिन----- "वस्त्र" देने का महत्व है लेकिन सामर्थ्य अनुसार रूमाल या रंग बिरंगे फीते दिए जा सकते हैं। पाँचवे दिन----- देवी से सौभाग्य और संतान प्राप्ति की मनोकामना की जाती है। अत: कन्याओं को पाँच प्रकार की श्रृंगार सामग्री देना अत्यंत शुभ होता है। इनमें बिंदिया, चूड़ी, मेहँदी, बालों के लिए कांटे सुगंधित साबुन, काजल, नाखूनी, पावडर इत्यादि हो सकते हैं। छठे दिन----- "खेल-सामग्री देना चाहिए"। आजकल बाजार में खेल सामग्री की अनेक प्रकार उपलब्ध है। पहले यह रिवाज पाँचे, रस्सी और छोटे-मोटे खिलौनों तक सीमित था। अब तो ढेर सारे विकल्प मौजूद है। सातवें दिन----- "माँ सरस्वती" के आह्वान का होता है। अत: इस दिन कन्याओं को "शिक्षण सामग्री" दी जानी चाहिए। आजकल बाजार में विभिन्न प्रकार के पेन, पेंसिल, कॉपी, ड्रॉईंग बुक्स, कंपास, वाटर बॉटल, लंच बॉक्स उपलब्ध है। आठवें दिन----- नवरात्रि का सबसे पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन अगर कन्या का अपने हाथों से श्रृंगार किया जाए तो देवी विशेष आशीर्वाद देती है। इस दिन कन्या के पैर दूध से पूजने चाहिए। पैरों पर अक्षत, फूल और कुंकुम लगाना चाहिए। इस दिन कन्या को भोजन कराना चाहिए और यथासामर्थ्य कोई भी भेंट देनी चाहिए। हर दिन कन्या-पूजन में दक्षिणा अवश्य दें। नौवें यानी नवदुर्गा के अंतिम दिन---- खीर,ग्वारफली की सब्जी और दूध में गूँथी पूरियाँ कन्या को खिलानी चाहिए। उसके पैरों में महावर और हाथों में मेहँदी लगाने से देवी पूजा संपूर्ण होती है। अगर आपने घर पर हवन का आयोजन किया है तो उनके नन्हे हाथों से उसमें समिधा अवश्य डलवाएँ। उसे इलायची और पान का सेवन कराएँ। इस परम्परा के पीछे मान्यता है कि देवी जब अपने लोक जाती है तो उसे घर की कन्या की तरह ही बिदा किया जाना चाहिए। अगर सामर्थ्य हो तो नौवें दिन लाल चुनर कन्याओं को भेंट में दें। उन्हें दुर्गा चालीसा की छोटी पुस्तकें भेंट करें। गरबा के डाँडिए और चनिया-चोली भी दिए जा सकते हैं। बालिकाओं से घर में गरबे करवाने से भी देवी प्रसन्न होती है। इन सारी रीतियों के अनुसार पूजन करने से देवी प्रसन्न होकर वर्ष भर के लिए सुख, समृद्धि, यश, वैभव, कीर्ति और सौभाग्य का वरदान देती है। नवरात्र में किस आयु की कन्या के पूजन से मिलता है कैसा फल------ पूजन के लिए सबसे पहले 9 कन्याओं पर मां का पवित्र जल छिड़कें और उनका पूजन कर भोजन कराएं। भोजन के बाद चरण स्पर्श कर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दें। प्रथम दिवस------- दो वर्ष की कन्या के पूजन से दुखों का नाश होता है। द्वितीय दिवस---- तीन वर्ष की कन्या साक्षात त्रिमूर्ति का स्वरूप है। इससे अन्न-धन में बढ़ोतरी होती है। तृतीय दिवस---- चार वर्ष की कन्या का पूजन करने से परिवार का कल्याण होता है, जीवन में शुभ समाचार मिलते हैं। चतुर्थ दिवस----- पांच वर्ष की कन्या के पूजन से रोगों से मुक्ति मिलती है। पंचम दिवस---- छह वर्ष की कन्या का पूजन साक्षात मां काली का पूजन है। इससे विद्या और यश की प्राप्ति होती है। षष्ठम दिवस---- सात वर्ष की कन्या मां चंडिका का रूप है। इससे बाधाओं का निवारण होता है। सप्तम दिवस---- आठ वर्ष की कन्या का पूजन संकट से रक्षा करता है। अष्टम दिवस---- नौ वर्ष की कन्या के पूजन से असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी सफल हो जाते हैं। नवम दिवस---- दस वर्ष की कन्या का पूजन जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है। इससे मां अपने भक्त के समस्त मनोरथ पूर्ण करती है

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श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष स्तोत्र भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं, स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम्। सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं, अनंगरंगसागरं नमामि कृष्णनागरम्॥ व्रजभूमि के एकमात्र आभूषण, समस्त पापों को नष्ट करने वाले तथा अपने भक्तों के चित्त को आनन्द देने वाले नन्दनन्दन को सदैव भजता हूँ, जिनके मस्तक पर मोरमुकुट है, हाथों में सुरीली बांसुरी है तथा जो प्रेम-तरंगों के सागर हैं, उन नटनागर श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ। मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं, विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम्। करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं, महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्ण वारणम्॥ कामदेव का मान मर्दन करने वाले, बड़े-बड़े सुन्दर चंचल नेत्रों वाले तथा व्रजगोपों का शोक हरने वाले कमलनयन भगवान को मेरा नमस्कार है, जिन्होंने अपने करकमलों पर गिरिराज को धारण किया था तथा जिनकी मुसकान और चितवन अति मनोहर है, देवराज इन्द्र का मान-मर्दन करने वाले, गजराज के सदृश मत्त श्रीकृष्ण भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ। कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं, व्रजांगनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम्। यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया, युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम्॥ जिनके कानों में कदम्बपुष्पों के कुंडल हैं, जिनके अत्यन्त सुन्दर कपोल हैं तथा व्रजबालाओं के जो एकमात्र प्राणाधार हैं, उन दुर्लभ भगवान कृष्ण को नमस्कार करता हूँ; जो गोपगण और नन्दजी के सहित अति प्रसन्न यशोदाजी से युक्त हैं और एकमात्र आनन्ददायक हैं, उन गोपनायक गोपाल को नमस्कार करता हूँ। सदैव पादपंकजं मदीय मानसे निजं, दधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम्। समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणं, समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम्॥ जिन्होंने मेरे मनरूपी सरोवर में अपने चरणकमलों को स्थापित कर रखा है, उन अति सुन्दर अलकों वाले नन्दकुमार को नमस्कार करता हूँ तथा समस्त दोषों को दूर करने वाले, समस्त लोकों का पालन करने वाले और समस्त व्रजगोपों के हृदय तथा नन्दजी की वात्सल्य लालसा के आधार श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ। भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं, यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम्। दृगन्तकान्तभंगिनं सदा सदालिसंगिनं, दिने-दिने नवं-नवं नमामि नन्दसम्भवम्।। भूमि का भार उतारने वाले, भवसागर से तारने वाले कर्णधार श्रीयशोदाकिशोर चित्तचोर को मेरा नमस्कार है। कमनीय कटाक्ष चलाने की कला में प्रवीण सर्वदा दिव्य सखियोंसे सेवित, नित्य नए-नए प्रतीत होने वाले नन्दलाल को मेरा नमस्कार है। गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरं, सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनं। नवीन गोपनागरं नवीनकेलि-लम्पटं, नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम्।। गुणों की खान और आनन्द के निधान कृपा करने वाले तथा कृपा पर कृपा करने के लिए तत्पर देवताओं के शत्रु दैत्यों का नाश करने वाले गोपनन्दन को मेरा नमस्कार है। नवीन-गोप सखा नटवर नवीन खेल खेलने के लिए लालायित, घनश्याम अंग वाले, बिजली सदृश सुन्दर पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। समस्त गोप मोहनं, हृदम्बुजैक मोदनं, नमामिकुंजमध्यगं प्रसन्न भानुशोभनम्। निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं, रसालवेणुगायकं नमामिकुंजनायकम्।।७।। समस्त गोपों को आनन्दित करने वाले, हृदयकमल को प्रफुल्लित करने वाले, निकुंज के बीच में विराजमान, प्रसन्नमन सूर्य के समान प्रकाशमान श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। सम्पूर्ण अभिलिषित कामनाओं को पूर्ण करने वाले, वाणों के समान चोट करने वाली चितवन वाले, मधुर मुरली में गीत गाने वाले, निकुंजनायक को मेरा नमस्कार है। विदग्ध गोपिकामनो मनोज्ञतल्पशायिनं, नमामि कुंजकानने प्रवृद्धवह्निपायिनम्। किशोरकान्ति रंजितं दृगंजनं सुशोभितं, गजेन्द्रमोक्षकारिणं नमामि श्रीविहारिणम्।। चतुरगोपिकाओं की मनोज्ञ तल्प पर शयन करने वाले, कुंजवन में बढ़ी हुई विरह अग्नि को पान करने वाले, किशोरावस्था की कान्ति से सुशोभित अंग वाले, अंजन लगे सुन्दर नेत्रों वाले, गजेन्द्र को ग्राह से मुक्त करने वाले, श्रीजी के साथ विहार करने वाले श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ। यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा, मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम्। प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान्, भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान।। प्रभो! मेरे ऊपर ऐसी कृपा हो कि जहां-कहीं जैसी भी परिस्थिति में रहूँ, सदा आपकी सत्कथाओं का गान करूँ। जो पुरुष इन दोनों-राधा कृपाकटाक्ष व श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष अष्टकों का पाठ या जप करेगा, वह जन्म-जन्म में नन्दनन्दन श्यामसुन्दर की भक्ति से युक्त होगा और उसको साक्षात् श्रीकृष्ण मिलते हैं।

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 6 (भाग 3) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारायण के द्वारा उर्वशी आदि की उत्पत्ति और नारायण के साथ अप्सराओं का संवाद... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं- इस प्रकार अप्सराएँ नम्रतापूर्वक प्रणाम करती हुई अपनी बात कह रही थीं। उनके वचन सुनकर मुनिवर नर और नारायण उत्तर देने में उद्यत हो गये। उस समय उन मुनिश्रेष्ठ के मुखपर प्रसन्नता छायी हुई। थी। काम और लोभ पर वे विजय प्राप्त कर चुके थे। अपनी तपस्या के प्रभाव से उनके सर्वांग की अनुपम शोभा हो रही थी। भगवान् नारायण ने कहा- कहो, हम प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें अभीष्ट वर देने को तैयार हैं । तुम सब लोग सुन्दर नेत्रवाली इस उर्वशी को साथ लेकर स्वर्ग सिधारो। यह बाला तुम्हें भेंटस्वरूप समर्पित है। अतः मन को मुग्ध करने वाली यह अप्सरा अब जाने को तैयार हो जाय। जाँघ से उत्पन्न हुई उस उर्वशी को इन्द्र के प्रसन्नतार्थ हमने उनको दे दिया है। सभी देवताओं का कल्याण हो । अब सब लोग इच्छानुसार यहाँ से पधारने की कृपा करें। अप्सराएँ बोलीं-महाभाग ! आप देवाधिदेव भगवान् नारायण हैं। परमभक्ति के साथ प्रसन्नतापूर्वक हम आपके चरणकमल पर निछावर हो चुकी हैं। अब हम कहाँ जायँ? मधुसूदन! आपकी आँखें कमलपत्र के समान विशाल हैं। प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं और अभिलषित वर देना चाहते हैं तो हम अपना मनोरथ आपके सामने रखती हैं। उत्तम तप करने वाले देवेश! आप हमारे पति बनने की कृपा करें। बस, हमारा यही वर है, जिससे देवेश्वर! हम प्रसन्नतापूर्वक आपकी सेवा करने में संलग्न हो जायँ। और आपने सुन्दर नेत्रवाली उर्वशी आदि जिन अन्य स्त्रियों को उत्पन्न किया है, वे आपकी आज्ञा मानकर स्वर्ग सिधारें। उत्तम तप करने वाले मुनियो! हम सोलह हजार पचास अप्सराएँ यहाँ रहें। हम सब आपकी समुचित सेवा करेंगी। देवेश! आप हमारी अभिलाषा पूर्ण करके अपने सत्य व्रत का पालन कीजिये । हम भाग्यवश आपके प्रेम में पगकर स्वर्ग से यहाँ आ गयीं। देवेश! हमें त्याग देना आपको शोभा नहीं देता; जगत्प्रभो! आप सर्वसमर्थ पुरुष हैं। भगवान् नारायण ने कहा- पूरे एक हजार वर्ष तक हमने यहाँ तपस्या की है। सुन्दरियो ! हमारी इन्द्रियाँ वश में हैं। फिर हम उस तप को कैसे नष्ट कर सकते हैं? काम-सम्बन्धी सुख के लिये तो हमारी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं है; क्योंकि उससे सात्त्विक सुख का सत्यानाश हो जाता है। पाशविक धर्म की तुलना करने वाले मिथुन-धर्म में बुद्धिमान् पुरुष कैसे अपने मन को रमा सकता है? शब्द आदि पाँच अप्सराएँ बोलीं- गुणों के बीच में स्पर्श आता है। इसीसे स्पर्शजनित सुखको सर्वोत्तम माना गया है। अतएव महाराज! हमें सब तरहसे स्पर्शसुख देने के लिये आप वचनबद्ध होने की कृपा करें । फिर निर्भरतापूर्वक सुख भोगकर गन्धमादन पर विचरें । क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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भगवान विष्णु के तीसरे अवतार वराह अवतार की कथा। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वराह अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से तृतीय अवतार हैं जो भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया को अवतरित हुए। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ने जब दिति के गर्भ से जुड़वां रूप में जन्म लिया, तो पृथ्वी कांप उठी। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों पैदा होते ही बड़े हो गए। और अपने अत्याचारों से धरती को कपांने लगते हैं। यद्यपि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों बलवान थे, किंतु फिर भी उन्हें संतोष नहीं था। वे संसार में अजेयता और अमरता प्राप्त करना चाहते थे। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए बहुत बड़ा तप किया। उनके तप से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए ,ब्रह्मा जी से अजेयता और अमरता का वरदान पाकर हिरण्याक्ष उद्दंड और स्वेच्छाचारी बन गया। वह तीनों लोकों में अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा। हिरण्याक्ष ने गर्वित होकर तीनों लोकों को जीतने का विचार किया। वह हाथ में गदा लेकर इन्द्रलोक में जा पहुंचा। देवताओं को जब उसके पहुंचने की ख़बर मिली, तो वे भयभीत होकर इन्द्रलोक से भाग गए। देखते ही देखते समस्त इन्द्रलोक पर हिरण्याक्ष का अधिकार स्थापित हो गया। जब इन्द्रलोक में युद्ध करने के लिए कोई नहीं मिला, तो हिरण्याक्ष वरुण की राजधानी विभावरी नगरी में जा पहुंचा। वरुण ने बड़े शांत भाव से कहा - तुम महान योद्धा और शूरवीर हो। तुमसे युद्ध करने के लिए मेरे पास शौर्य कहां? तीनों लोकों में भगवान विष्णु को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं है, जो तुमसे युद्ध कर सके। अतः उन्हीं के पास जाओ। वे ही तुम्हारी युद्ध पिपासा शांत करेंगे। वरुण का कथन सुनकर हिरण्याक्ष भगवान विष्णु की खोज में समुद्र के नीचे रसातल में जा पजुंचा। रसातल में पहुंचकर उसने एक विस्मयजनक दृश्य देखा। उसने देखा, एक वराह अपने दांतों के ऊपर धरती को उठाए हुए चला जा रहा है। हिरण्याक्ष वराह को लक्ष्य करके बोल उठा,तुम अवश्य ही भगवान विष्णु हो। धरती को रसातल से कहां लिए जा रहे हो? यह धरती तो दैत्यों के उपभोग की वस्तु है। इसे रख दो। तुम अनेक बार देवताओं के कल्याण के लिए दैत्यों को छल चुके हो। आज तुम मुझे छल नहीं सकोगे। फिर भी भगवान विष्णु शांत ही रहे। उनके मन में रंचमात्र भी क्रोध पैदा नहीं हुआ। वे वराह के रूप में अपने दांतों पर धरती को लिए हुए आगे बढ़ते रहे। हिरण्याक्ष भगवान वराह रूपी विष्णु के पीछे लग गया। उन्होंने रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया। हिरण्याक्ष उनके पीछे लगा हुआ था। अपने वचन-बाणों से उनके हृदय को बेध रहा था। भगवान विष्णु ने धरती को स्थापित करने के पश्चात हिरण्याक्ष की ओर ध्यान दिया। उन्होंने हिरण्याक्ष की ओर देखते हुए कहा,तुम तो बड़े बलवान हो। बलवान लोग कहते नहीं हैं, करके दिखाते हैं। तुम तो केवल प्रलाप कर रहे हो। मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं। तुम क्यों नहीं मुझ पर आक्रमण करते? बढ़ो आगे, मुझ पर आक्रमण करो। हिरण्याक्ष की रगों में बिजली दौड़ गई। वह हाथ में गदा लेकर भगवान विष्णु पर टूट पड़ा। भगवान के हाथों में कोई अस्त्र शस्त्र नहीं था। उन्होंने दूसरे ही क्षण हिरण्याक्ष के हाथ से गदा छीनकर दूर फेंक दी। हिरण्याक्ष क्रोध से उन्मत्त हो उठा। वह हाथ में त्रिशूल लेकर भगवान विष्णु की ओर झपटा। भगवान विष्णु ने शीघ्र ही सुदर्शन का आह्वान किया, चक्र उनके हाथों में आ गया। उन्होंने अपने चक्र से हिरण्याक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। भगवान विष्णु के हाथों मारे जाने के कारण हिरण्याक्ष बैकुंठ लोक में चला गया। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथाअष्टादशोऽध्यायः भिन्न-भिन्न वर्षो का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीशुक उवाच तथा च भद्रश्रवा नाम धर्मसुतस्तत्कुल पतयः पुरुषा भद्राश्ववर्षे साक्षाद्भगवतो वासुदेवस्य प्रियां तनुं धर्ममयीं हयशीर्षाभिधानां परमेण समाधिना संनिधाप्येदमभिगृणन्त उपधावन्ति ॥ १ ॥ भद्रश्रवस ऊचुः ॐ नमो भगवते धर्मायात्मविशोधनाय नम इति ॥ २ ॥ अहो विचित्रं भगवद्विचेष्टितं मन्तं जनोऽयं हि मिषन्न पश्यति । ध्यायन्नसद्यर्हि विकर्म सेवितुं निर्हत्य पुत्रं पितरं जिजीविषति ॥ ३ वदन्ति' विश्वं कवयः स्म नश्वरं पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः । तथापि मुह्यन्ति तवाज मायया सुविस्मितं कृत्यमजं नतोऽस्मि तम् ॥ ४ विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतः युक्तं न चित्रं त्वयि कार्यकारणे सर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुतः ॥ ५ वेदान् युगान्ते तमसा तिरस्कृतान् रसातलाद्यो नृतुरङ्गविग्रहः । प्रत्या वै कवयेऽभियाचते तस्मै नमस्तेऽवित थेहिताय इति ॥ ६ हरिवर्षे चापि भगवान्नरहरिरूपेणास्ते । तद्रूपग्रहणनिमित्तमुत्तरत्राभिधास्ये । तयितं रूपं महापुरुषगुणभा महाभागवतो दैत्यदानवकुलतीर्थीकरणशीलाचरितः प्रह्लादोऽ व्यवधानानन्यभक्तियोगेन सह तद्वर्षपुरुषैरुपास्ते इदं चोदाहरति ॥ ७ ॥ ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय 'रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा । अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्षौम् ॥ ८ ॥ स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥ ९ मागारदारात्मजवित्तबन्धुषु सङ्गो यदि स्याद्भगवत्प्रियेषु नः । यः प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान् सिद्ध्यत्यदूरान्न तथेन्द्रियप्रियः ॥ १० श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन् ! भद्राश्ववर्ष में धर्मपुत्र भद्रश्रवा और उनके मुख्य-मुख्य सेवक भगवान् वासुदेव की हयग्रीवसंज्ञक धर्ममयी प्रिय मूर्ति को अत्यन्त समाधिनिष्ठा के द्वारा हृदय में स्थापित कर इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ भद्रश्रवा और उनके सेवक कहते हैं— 'चित्त को विशुद्ध करने वाले ओङ्कार स्वरूप भगवान् धर्म को नमस्कार है' ॥ २ ॥ अहो ! भगवान्‌ की लीला बड़ी विचित्र है, जिसके कारण यह जीव सम्पूर्ण लोकों का संहार करने वाले काल को देखकर भी नहीं देखता और तुच्छ विषयों का सेवन करने के लिये पापमय विचारों की उधेड़-बुन में लगा हुआ अपने ही हाथों अपने पुत्र और पितादि की लाश को जलाकर भी स्वयं जीते रहने की इच्छा करता है ॥ ३ ॥ विद्वान् लोग जगत् को नश्वर बताते हैं और सूक्ष्मदर्शी आत्मज्ञानी ऐसा ही देखते भी हैं; तो भी जन्मरहित प्रभो! आपकी माया से लोग मोहित हो जाते हैं। आप अनादि हैं तथा आपके कृत्य बड़े विस्मयजनक हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥ परमात्मन् ! आप अकर्ता और माया के आवरण से रहित हैं तो भी जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय- ये आपके ही कर्म माने गये हैं। सो ठीक ही है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि सर्वात्मरूप से आप ही सम्पूर्ण कार्यों के कारण हैं और अपने शुद्धस्वरूप में इस कार्य कारणभाव से सर्वथा अतीत हैं ॥ ५ ॥ आपका विग्रह मनुष्य और घोड़े का संयुक्त रूप है। प्रलयकाल में जब तमः प्रधान दैत्यगण वेदों को चुरा ले गये थे, तब ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर आपने उन्हें रसातल से लाकर दिया। ऐसे अमोघ लीला करने वाले सत्यसङ्कल्प आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६ ॥ हरिवर्षखण्ड में भगवान् नृसिंहरूप से रहते हैं। उन्होंने यह रूप जिस कारण से धारण किया था, उसका आगे (सप्तम (स्कन्ध में) वर्णन किया जायगा। भगवान्‌ के उस प्रिय रूप की महाभागवत प्रह्लाद जी उस वर्ष के अन्य पुरुषों के निष्काम एवं अनन्य भक्तिभाव से उपासना करते हैं। ये प्रह्लादजी महापुरुषोचित गुणों से सम्पन्न हैं तथा इन्होंने अपने शील और आचरण से दैत्य और दानवों के कुल को पवित्र कर दिया है। वे इस मन्त्र तथा स्तोत्र का जप-पाठ करते हैं ॥ ७ ॥ 'ओङ्कारस्वरूप भगवान् श्रीनृसिंहदेव को नमस्कार है। आप अग्नि आदि तेजों के भी तेज हैं, आपको नमस्कार है। हे वज्रनख! हे वज्रदंष्ट्र ! आप हमारे समीप प्रकट होइये, प्रकट होइये; हमारी कर्म-वासनाओं को जला डालिये, जला डालिये। हमारे अज्ञानरूप अन्धकार को नष्ट कीजिये, नष्ट कीजिये। ॐ स्वाहा। हमारे अन्तःकरण में अभयदान देते हुए प्रकाशित होइये। ॐ क्षौम्' ॥ ८ ॥ 'नाथ ! विश्व का कल्याण हो, दुष्टों की बुद्धि शुद्ध हो, सब प्राणियों में परस्पर सद्भावना हो, सभी एक-दूसरे का हितचिन्तन करें, हमारा मन शुभ मार्ग में प्रवृत्त हो और हम सबकी बुद्धि निष्कामभाव से भगवान् श्रीहरि में प्रवेश करे ॥ ९॥ प्रभो ! घर, स्त्री, पुत्र, धन और भाई-बन्धुओं में हमारी आसक्ति न हो; यदि हो तो केवल भगवान्‌ के प्रेमी भक्तों में ही । जो संयमी पुरुष केवल शरीर निर्वाह के योग्य अन्नादि से सन्तुष्ट रहता है, उसे जितना शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है, वैसी इन्द्रियलोलुप पुरुष को नहीं होती ।। १० ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (चौहत्तरवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सोमाष्टमी व्रत विधान...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज! अब मैं एक दूसरा व्रत बतला रहा हूँ, जो सर्वसम्मत, कल्याणप्रद एवं शिवलोक-प्रापक है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन यदि सोमवार हो तो उस दिन उमासहित भगवान् चन्द्रचूड का पूजन करे। इसके लिये एक ऐसी प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिये, जिसका दक्षिण भाग शिवस्वरूप और वाम भाग उमास्वरूप हो। अनन्तर विधिपूर्वक उसे पञ्चामृत से स्नान कराकर उसके दक्षिणभाग में कर्पूरयुक्त चन्दन का उपलेपन करे। श्वेत तथा रक्त पुष्प चढ़ाये और घृत में पकाये गये नैवेद्य का भोग लगाये। पचीस प्रज्वलित दीपकों से उमासहित भगवान् चन्द्रचूड की आरती करे। उस दिन निराहार रहकर दूसरे दिन प्रातः इसी प्रकार पूजन सम्पन्न कर तिल तथा घी से हवन कर ब्राह्मणों को भोजन कराये। यथाशक्ति सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा करे और पितरों का भी अर्चन करे। एक वर्ष तक इस प्रकार व्रत करके एक त्रिकोण तथा दूसरा चतुष्कोण (चौकोर) मण्डल बनाये। त्रिकोण में भगवती पार्वती तथा चौकोर मण्डल में भगवान् शंकर को स्थापित करे। तदनन्तर पूर्वोक्त विधि के अनुसार पार्वती एवं शंकर की पूजा करके श्वेत एवं पीत वस्त्र के दो वितान, पताका, घण्टा, धूपदानी, दीपमाला आदि पूजन के उपकरण ब्राह्मण को समर्पित करे और यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन भी कराये। ब्राह्मण-दम्पति का वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि से पूजनकर पचीस प्रज्वलित दीपकों से धीरे-धीरे नीराजन करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पाँच वर्षों तक या एक वर्ष ही व्रत करने से व्रती उमासहित शिवलोक में निवास कर अनामय पद प्राप्त करता है। जो पुरुष आजीवन इस व्रत को करता है, वह तो साक्षात् विष्णुरूप ही हो जाता है। उसके समीप आपत्ति, शोक, ज्वर आदि कभी नहीं आते। इतना विधान कहकर भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले – महाराज इसी प्रकार रविवारयुक्त अष्टमी का भी व्रत होता है। उस दिन एक प्रतिमा के दक्षिण भाग में शिव और वाम भाग में पार्वतीजी की पूजा करे। दिव्य पद्मराग से भगवान् शंकर को और सुवर्ण से पार्वती को अलंकृत करे यदि रत्नों की सुविधा न हो सके तो सुवर्ण ही चढ़ाये । चन्दन से भगवान् शिव को और कुंकुम से देवी पार्वती को अनुलिप्त करे। भगवती पार्वती को लाल वस्त्र और लाल माला तथा भगवान् शंकर को रुद्राक्ष निवेदित कर नैवेद्य में घृतपक्व पदार्थ निवेदित करे। शेष सारा विधान पूर्ववत् कर पारण गव्य-पदार्थों से करे । उद्यापन पूर्वरीत्या करना चाहिये। इस व्रत को एक वर्ष अथवा लगातार पाँच वर्ष करने वाला सूर्य आदि लोकों में उत्तम भोग को प्राप्तकर अन्त में परमपद को प्राप्त करता है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (तेतीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः भुशुण्ड की वास्तविक स्थिति का निरूपण, वसिष्ठजी द्वारा भुशुण्ड की प्रशंसा, भुशुण्ड द्वारा वसिष्ठ जी का पूजन तथा आकाशमार्ग से वसिष्ठजी की स्वलोक प्राप्ति...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भुशुण्ड ने कहा—महामुने ! मैंने प्राणसमाधि के द्वारा पूर्वोक रीति से विशुद्ध परमात्मा में यह चित्त- विश्रामरूप परम शान्ति क्रमशः स्वयं प्राप्त की है। मैं इस प्राणायाम का अबलम्बन करके दृढ़ता पूर्वक स्थित हूँ । इसलिये सुमेरु पर्वत के विचलित होने पर भी मैं चलायमान नहीं होता । चलते-बैठते, जागते या सोते अथवा स्वप्न में भी मैं अखण्ड ब्रह्माकावृत्ति रूप समाधि से विचलित नहीं होता; क्योंकि तपस्वीयों में महान् वसिष्ठजी ! प्राण और अपान के संयमरूप प्राणायाम के अभ्यास से प्राप्त परमात्मा के साक्षात् अनुभव से मैं समस्त शोकों से रहित आदि कारण परमपद को प्राप्त हो गया हूँ । ब्रह्मन् ! महाप्रलय से लेकर प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश को देखता हुआ मैं ज्ञानवान् हुआ आज भी जी रहा हूँ । जो बात बीत चुकी और जो होने वाली है, उसका मैं कभी चिन्तन नहीं करता । उपर्युक्त प्राणायाविषयक दृष्टि का अपने मन से अवलम्बन करके इस कल्पवृक्ष पर स्थित हूँ । न्याय युक्त जो भी कर्तव्य प्राप्त हो जाते हैं, उनका फलाभिलाषाओं से रहित होकर केवल सुषुप्ति के समान उपरत बुद्धि से अनुष्ठान करता रहता हूँ । प्राण और अपान के संयोगरूप कुम्भक काल में प्रकाशित होने वाले परमात्मतत्त्व का निरन्तर स्मरण करता हुआ मैं अपने आप में स्वयं ही नित्य संतुष्ट रहता हूँ इसलिये मैं दोषरहित होकर चिरकाल से जी रहा हूँ । मैंने आज यह प्राप्त किया और भविष्य में दूसरा सुन्दर पदार्थ प्राप्त करूँगा, इस प्रकार की चिन्ता मुझे कभी नहीं होती। मैं अपने या दूसरे किसी के कार्यों की किसी समय कहीं पर कभी स्तुति और निन्दा नहीं करता। शुभ की प्राप्ति होने पर मेरा मन हर्षित नहीं होता और अशुभ की प्राप्ति होने पर कभी खिन्न नहीं होता; क्योंकि मेरा मन नित्य सम ही रहता है । मुने ! मेरे मन की चञ्चलता शान्त हो गयी है । मेरा मन शोक से रहित, स्वस्थ, समाहित एवं शान्त हो चुका है। इसलिये मैं विकार-रहित हुआ चिरकाल से जी रहा हूँ । लकड़ी, रमणी, पर्वत, तृण, अग्नि, हिम आकाश — इन सबको मैं समभाव से देखता हूँ । जरा और मरण आदि से में भयभीत नहीं होता एवं राज्य प्राप्ति आदि से हर्षित नहीं होता । इसलिये मैं अनामय होकर जीवित हूँ । ब्रह्मन् ! यह मेरा बन्धु है, यह मेरा शत्रु है, यह मेरा है एवं यह दूसरे का है इस प्रकार को भेद-बुद्धि से मैं रहित हूँ । ग्रहण और बिहार करने वाला, बैठने और खड़ा रहने वाला, श्वास तथा निद्रा लेने वाला यह शरीर ही है, आत्मा नहीं—यह मैं अनुभव करता हूँ । इसलिये मैं चिरजीवी हूँ। मैं जो कुछ क्रिया करता हूँ, जो कुछ खाता-पीता हूँ, वह स अहंता-ममता से रहित हुआ ही करता हूँ । मैं दूसरों पर आक्रमण करने में समर्थ हुआ भी आक्रमण नहीं करता, दूसरों के द्वारा खेद पहुँचाये जाने पर भी दुःखित नहीं होता एवं दरिद्र होने पर भी कुछ नहीं चाहता; इसलिये मैं विकार-रहित हुआ बहुत काळ से जी रहा हूँ । मैं आपत्तिकाल में भी चलायमान नहीं होता, वरं पर्वत की तरह अचल रहता हूँ। जगत्-आकाश, देश-काल, परम्परा क्रिया-- इन सबमें चिन्मयरूप से मैं ही हूँ, इस प्रकार की मेरी बुद्धि है; इसलिये मैं विकार रहित हुआ बहुत काळ से स्थित हूँ। ज्ञान के पारंगत ब्रह्मन् ! एकमात्र आपकी आज्ञा का पालन करने के लिये ही धृष्टतापूर्वक मैंने, जो और जैसा हूँ, वह सब आपसे यथार्थरूपसे बता दिया है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 6 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारायण के द्वारा उर्वशी आदि की उत्पत्ति और नारायण के साथ अप्सराओं का संवाद... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ दिव्य अप्सराओं का संगीत, जिसे सुनते ही ध्यान टूट जाय, सुनायी पड़ रहा है। कहीं हमलोगों की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र की तो यह करतूत नहीं है? अन्यथा, ऋतुराज वसन्त अकाल में कैसे प्रीति प्रकट कर सकता था ? जान पड़ता है, डरे हुए इन्द्र ने यह विघ्न उपस्थित किया है ! सुगन्ध, शीतल एवं मन को मुग्ध करने वाला पवन शरीर का स्पर्श कर रहा है। इन्द्र के षड्यन्त्र के अतिरिक्त दूसरा कोई कारण इसमें नहीं है। भगवान् नारायण व्यापक पुरुष हैं। वे यों कह ही रहे थे, इतने में ही सारी मण्डली सामने दिखायी दी। उस समय सबमें प्रमुख कामदेव था। नर और नारायण- दोनों ने आश्चर्य से सबको देखा। कामदेव, मेनका, रम्भा, तिलोत्तमा, पुष्पगन्धा, सुकेशी, महाश्वेता, मनोरमा, प्रमद्वरा, घृताची, गीतज्ञा, चारुहासिनी, चन्द्रप्रभा, शोभा, विद्युन्माला, अम्बुजाक्षी और कांचनमालिनी तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-सी अप्सराएँ नर-नारायण को दृष्टिगोचर होने लगीं। उन सबकी संख्या सोलह हजार पचास थी। कामदेव की यह विशाल सेना देखकर नर और नारायण बड़े आश्चर्य में पड़ गये । तदनन्तर वे सभी अप्सराएँ उन्हें प्रणाम करके सामने खड़ी हो गयीं। वे अप्सराएँ दिव्य आभूषणों से अलंकृत थीं। दिव्य हार उनके गले की शोभा बढ़ा रहे थे। उन सभी के मुख से कपटपूर्ण ऐसे गीत निकल रहे थे, जिनका सुलभ होना धरातल पर असम्भव था। मुनिवर नारायण ने प्रसन्नता पूर्वक उन अप्सराओं से कहा 'सुमध्यमाओ! तुमलोग बड़े आनन्द से यहीं ठहरो। मैं तुम्हारा अद्भुत प्रकार से आतिथ्य सत्कार करने के लिये तैयार हूँ। तुम सभी अतिथि के रूप में स्वर्ग से यहाँ आयी हो।' व्यासजी कहते हैं- उस समय मुनिवर नारायण ने मन में अभिमानपूर्वक सोचा, इन्द्र ने हमारे तप में विघ्न उपस्थित करने के विचार से ही इन्हें यहाँ भेजा है। किंतु इन बेचारी नगण्य अप्सराओं से हमारा क्या बनना-बिगड़ना है। मैं अभी इन सबको आश्चर्य में डालने वाली नयी अप्सराओं की सृष्टि किये देता हूँ। इन अप्सराओं की अपेक्षा उन सबके रूप बड़े ही विलक्षण होंगे। इस समय तपस्या का बल दिखलाना परमावश्यक है। इस प्रकार मन में सोचकर नारायण ने अपना हाथ जंघा पर पटका और तुरंत एक सर्वांगसुन्दरी स्त्री को उत्पन्न कर दिया। नारायण के ऊरुभाग से निकली हुई | वह नारी 'उर्वशी' बड़ी सुन्दरी थी। वहाँ उपस्थित अप्सराओं ने उसे देखा तो उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उस समय मुनिवर नारायण का मन बिलकुल निश्चिन्त था । जितनी अप्सराएँ वहाँ थीं, उतनी ही अन्य अप्सराएँ सेवा करने के लिये उन्होंने तुरंत उत्पन्न कर दीं। वे सभी अप्सराएँ हाथों में तरह तरह की भेंट सामग्री लिये हँसती और गाती हुई आयीं। उन्होंने मुनिवर नर और नारायण के चरणों में मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं। तब स्वर्ग से आयी हुई अप्सराओं ने नर और नारायण से कहा-'अहो! हम मूर्ख स्त्रियाँ आपके तप की महिमा और धीरता देखकर ही आश्चर्य में डूब गयी हैं। महाभाग मुनियो! हमें आपके स्वरूप के विषय में विदित हो गया। आप परम पुरुष भगवान् श्रीहरि के अंशावतार हैं। आप शम-दम आदि सद्गुणों से सदा परिपूर्ण रहते हैं। आपकी सेवा के लिये नहीं; परंतु शतक्रतु इन्द्र का कुछ कार्य था, उसे सिद्ध करने के विचार से ही हमारा यहाँ आना हुआ था। किस भाग्य से हमें आपके दर्शन सुलभ हो गये ? हमने कौन-सा पुण्य कार्य कर रखा था, उसे जानने में हम असमर्थ हैं। किंतु यह मानना तो अनिवार्य है। कि कोई संचित प्रारब्ध अवश्य था। हम निश्चय ही अपराधिनी हैं। फिर भी, हमें अपना जन समझकर आपने मन में शान्ति रखी और हमें तापमुक्त रखा। ठीक ही है, विवेकशील महानुभाव पुरुष तुच्छ शापरूपी फलदान के व्याज से अपनी तपस्या के बल का अपव्यय नहीं करते।' क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथ सप्तदशोऽध्यायः गङ्गाजी का विवरण और भगवान् शङ्करकृत संकर्षणदेव की स्तुति...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीभगवानुवाच ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुण सङ्ख्यानायानन्तायाव्यक्ताय नम इति ॥ १७ ॥ भजे भजन्यारणपादपङ्कजं भगस्य कृत्स्त्रस्य परं परायणम् । भक्तेष्ठलं भावितभूतभावनं भवापहं त्वा भवभावमीश्वरम् ॥ १८ न यस्य मायागुणचित्तवृत्तिभि- र्निरीक्षतो ह्यण्वपि दृष्टिरज्यते । ईशे यथा नोऽजितमन्युरंहसां कस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मनः ॥ १९ असद्दृशो यः प्रतिभाति मायया क्षीबेव मध्वासवताम्रलोचनः । न नागवध्वोऽर्हण ईशिरे ह्िया यत्पादयोः स्पर्शनधर्षितेन्द्रियाः ॥ २० यमाहुरस्य स्थितिजन्मसंयमं त्रिभिर्विहीनं यमनन्तमृषयः । न वेद सिद्धार्थमिव क्वचित्स्थितं भूमण्डलं मूर्धसहस्रधामसु ॥ २१ यस्याद्य आसीद् गुणविग्रहो महान् विज्ञानधिष्ण्यो भगवानजः किल । यत्सम्भवोऽहं त्रिवृता स्वतेजसा वैकारिकं तामसमैन्द्रियं सृजे ॥ २२ एते वयं यस्य वशे महात्मनः स्थिताः शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिताः । महानहं वैकृततामसेन्द्रियाः सृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम् ॥ २३ यन्निर्मितां कह्यपि कर्मपर्वणीं मायां जनोऽयं गुणसर्गमोहितः । न वेद निस्तारणयोगमञ्जसा तस्मै नमस्ते विलयोदयात्मने ॥ २४ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ भगवान् शङ्कर कहते - ॐ जिनसे सभी गुणों की अभिव्यक्ति होती है, उन अनन्त और अव्यक्तमूर्ति ओङ्कारस्वरूप परमपुरुष श्रीभगवान् को नमस्कार है।' 'भजनीय प्रभो ! आपके चरणकमल भक्तों को आश्रय देने वाले हैं तथा आप स्वयं सम्पूर्ण ऐश्वर्या परम आश्रय हैं। भक्तों के सामने आप अपना भूतभावन स्वरूप पूर्णतया प्रकट कर देते हैं तथा उन्हें संसारबन्धन से भी मुक्त कर देते हैं, किन्तु अभक्तों को उस बन्धन में डालते रहते हैं। आप ही सर्वेश्वर हैं, मैं आपका भजन करता हूँ।॥ १७-१८॥ प्रभो ! हमलोग क्रोध के आवेग को नहीं जीत सके हैं तथा हमारी दृष्टि तत्काल पाप से लिप्त हो जाती है। परन्तु आप तो संसार का नियमन करने के लिये निरन्तर साक्षीरूप से उसके सारे व्यापारों को देखते रहते हैं। तथापि हमारी तरफ आपकी दृष्टि पर उन मायिक विषयों तथा चित्त की वृत्तियों का नाममात्र को भी प्रभाव नहीं पड़ता ऐसा स्थिति में अपने मन को वश में करने की इच्छा वाला कौन पुरुष आप का आदर न करेगा? ।। १९ ॥ आप जिन पुरुषों को मधु-आसवादि पान के कारण अरुणनयन और मतवाले जान पड़ते हैं, वे माया के वशीभूत होकर ही ऐसा मिथ्या दर्शन करते हैं तथा आपके चरणस्पर्श से ही चित्त चञ्चल हो जाने के कारण नागपत्नियाँ लज्जावश आपकी पूजा करने में असमर्थ हो जाती हैं।। २० ॥ वेदमन्त्र आपको जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण बताते हैं; परन्तु आप स्वयं इन तीनों विकारों से रहित हैं; इसलिये आपको 'अनन्त' कहते हैं। आपके सहस्त्र मस्तकों पर यह भूमण्डल सरसों के दाने के समान रखा हुआ है, आपको तो यह भी नहीं मालूम होता कि वह कहाँ स्थित है ॥ २१ ॥ जिनसे उत्पन्न हुआ मैं अहङ्काररूप अपने त्रिगुणमय तेज से देवता, इन्द्रिय और भूतों की रचना करता हूँ-वे विज्ञान के आश्रय भगवान् ब्रह्मा जी भी आपके ही महत्तत्त्वसंज्ञक प्रथम गुणमय स्वरूप हैं ।। २२ ॥ महात्मन् ! महत्तत्त्व, अहङ्कार इन्द्रियाभिमानी देवता, इन्द्रियाँ और पञ्चभूत आदि हम सभी डोरी में बँधे हुए पक्षी के समान आपकी क्रियाशक्ति के वशीभूत रहकर आपकी ही कृपा से इस जगत् की रचना करते हैं। २३ ॥ सत्त्वादि गुणों की सृष्टि से मोहित हुआ यह जीव आपकी ही रची हुई तथा कर्म-बन्धन में बाँधने वाली माया को तो कदाचित् जान भी लेता है, किन्तु उससे मुक्त होने का उपाय उसे सुगमता से नहीं मालूम होता । इस जगत् की उत्पत्ति और प्रलय भी आपके ही रूप हैं। ऐसे आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ २४ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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#ॐ #नमो #भगवते #वासुदेवाय #भक्तमाल #भाग - २२ #चौबीस #अवतारों #की #कथा #श्रीहंसावतार एक बारकी बात है, पितामाह ब्रह्माजी अपनी दिव्य सभामें बैठे थे l उसी समय उनके सनकादि मानस पुत्रोंने वहाँ प्रवेश किया l ब्रह्माजीको प्रणामकर आसनादि ग्रहण करनेके बाद उन्होंने अत्यंत विनम्रतापूर्वक तत्वज्ञान – सम्बन्धी जिज्ञासा की l सनकादिका प्रश्न सुनकर ब्रह्माजीने परब्रह्म परमात्माका ध्यान किया l उनके ध्यान करते ही श्रीभगवान् एक तेजस्वी महाहंसके रूपमें प्रकट हो गये और उन्होंने सनकादिको तत्वज्ञानका उपदेश दिया l इस प्रकार श्रीभगवान् ने सनकादि मुनियोंके संदेह-निवारणके लिये हंसावतार लिया था l 💫👌💫👌💫👌💫👌💫👌💫👌💫👌🎊 शेष अगले पोस्ट में .............. कल्याण ‘भक्तमाल अंक’, वर्ष ८७, संख्या १, पृष्ठ – ४८, पुस्तक कोड – १९४७, गीताप्रेस गोरखपुर

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