lalit mohan jakhmola
lalit mohan jakhmola Apr 5, 2020

*****आज का स्पेशल भजन**** *****जय श्री राधे कृष्णा जी**** ******जय श्री राम*********** ******जय श्री सूर्यदेवाय नमः**** ***शुभ प्रभातम जी***********

Audio - *****आज का स्पेशल भजन****
*****जय श्री राधे कृष्णा जी****
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***शुभ प्रभातम जी***********

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कामेंट्स

ǟռʝʊ ʝօֆɦɨ Apr 5, 2020
♨ ज य श्री राधे राधे ♨ ♨ हम सब देशवासियों को मिलकर आज कोरोना वायरस के अंधेरे को मिलकर मिटाना है इसलिए जागरूकता लाने के लिए हम सबको मिलकर दिया जलाना है। जय श्री राधे राधे भरी दुपहरी में अंधियारा, सूरज परछाईं से हारा, अंतरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएं। आओ फिर से दिया जलाएं।   हम पड़ाव को समझे मंजिल, लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल, वर्तमान के मोहजाल में आने वाला कल न भुलाएं। आओ फिर से दिया जलाएं।  

lalit mohan jakhmola Apr 5, 2020
@༺राधेराधेभक्तों༻ अति उत्तम विचार बहिना।।। तमसो मा ज्योतिर्गमय।।। 🙏🇮🇳 *शुभ प्रभात ।आपके साथ ही समस्त समाज की मंगलकामना करता हूँ* 🌹🌹🌹🌹🌹 *थाली पीटना* *डॉक्टर को पीटने से कहीं बेहतर *है!* *दिया जलाना* *देश जलाने से कही बेहतर है*! *आइये एकता का परिचय दे हम अकेले नही है हम ऊर्जावान है अनुशासित है और हम मिलकर इस महामारी पर विजय जल्द ही पाएंगे तो आज रात 9 बजे आइये उम्मीद को रौशन करते है* *जय हिंद, जय भारत*🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🙏

Raghvendra dubey Apr 5, 2020
jai surya devay namo namah🚩🙏🚩🙏🚩🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏

lalit mohan jakhmola Apr 5, 2020
@raghvendradubey2 ऊं सूर्य देवाय नमः, शुभ दोपहर जी।। शुभ कामनाओं सहित सादर।।।

lalit mohan jakhmola Apr 11, 2020
@sarveshkrmishra *जय श्री राम, जय हनुमान* *ॐ शं शनैश्चराय नमः* ॐ ध्वजिनी धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिहा। कंकटी कलही चाउथ तुरंगी महिषी अजा।। शनैर्नामानि पत्नीनामेतानि संजपन् पुमान्। दुःखानि नाश्येन्नित्यं सौभाग्यमेधते सुखमं।। **शुभ दोपहर जी***

श्रीकृष्ण लीला 🔸🔸🔹🔸🔸 भगवान दूर खड़े मुस्कुरा रहे है।तभी भगवान के परम मित्र मनसुखा आ गए तो मैया मनसुखा से कहती है-"मनसुखा तू आज लल्ला को पकडवाने मे मदद करेगा तो तुझको खाने को मक्खन दूंगी" मनसुखा बातों मे आ जाते हैं। अब मनसुखा भी कन्हैया को पकड़ने भागे।कन्हैया बोले-"क्यों रे सखा तू आज माखन के लोभ मे मैया से मार लगवायगो। सोच ले में तो तुझ को रोज चोरी करके माखन खाने की लिए देता हूँ। मैया तो तुझे सिर्फ आज माखन खाने को देगी।अगर तूने मुझे पकड़ा और मैया से मार लगवाई तो अपनी सखा मंडली से तोय बाहर कर दूंगो" मनसुखा बोले-"देख कान्हा मैया का क्या है एक तो वो तुझ से प्यार इतना करती है जो तुझको जोर से मार तो लगाएगी नहीं और 2 चपत तेरे गाल पे लग जायेगी तो क्या इस ब्राहमण सखा का भला हो जायेगा और माखन खाने को मिल जायेगा चोरी भी नहीं करनी पड़ेगी। कान्हा बोले-"अच्छा मेरी होए पिटाई और तेरी होय चराई।वाह मनसुखा वाह" और यह सब कहते हुएउनके छोटे छोटे पैरों में घुंघरू छन-छन करके बज रहे हैं।यशोदा सब कुछ सुन रही हैं।अपने लाल की लीला देख के गुस्सा भी और प्रसन्न भी हो रही हैं। गुस्सा इसलिए हो रही है की इतना छोटा और इतना खोटा, पकड़ मैं ही नहीं आ रहा।अपने लाल की लीला जिसपे सारा बृज वारी-वारी जाता है। भगवान् सुंदर लीला कर रहे हैं। तभी मनसुखा ने माखन के लोभ में कृष्ण को पकड़ लिया है व जोर से आवाज लगायी काकी जल्दी आओ मैंने कान्हा को पकड़ लिया है। आवाज सुनकर मैया दौड़ी-दौड़ी आई।जैसे ही मैया पास पहुंची मनसुखा ने कान्हा को छोड दिया। मनसुखा बोले मैया मैंने इतनी देर से पकड़ के रखो पर तू नाए आई। कान्हा तो हाथ छुडवा के भाग गयो। जब मैया थककर बैठ गयी तो मनसुखा मैया से बोलो-"मैया तू कहे तो कान्हा को पकड़ने को तरीका बताऊँ तू इसे अपने भक्तन (सखा और सखी गोपियों ) की सौगंध खवा" मैया बोली-"या चोर को कौन भक्त बनेगो" फिर भी मैया कन्हैया को सौगंध खवाती है कि कन्हैया तुझे तेरे भक्तो की सौगंध जो मेरी गोदी मे न आयो। भगवान् मन मे सोचते है “अहम् भक्ता पराधीन “ मैं तो भक्त के आधीन हूँ और वो भागकर मैया के पास चले आते हैं। मैया से बोलते हैं -"अरी मैया अब तू मोये मार या छोड दे ले अब मे तेरे हाथ मे हूँ" मैया बोली-"लल्ला आज मारूंगी तो नहीं पर छोडूंगी भी नहीं पर तेरी सब नटखटी तो बंद करनी ही पड़ेगी" मैया रेशम की डोरी से उखल से कृष्ण के पेट को बांध रही हैं। भगवान सोच रहे हैं मैया मेरे हाथ को बांधे तो बंध जाऊं पैर बांधे तो भी बंध जाऊं पर मैया तो पेट से बांध रही और मेरे पेट मैं तो पूरा ब्रहम्मांड समाया है। मैया बार बार बंध रही है पर हर बार डोरी 2 उंगल छोटी पड़ जाती है और डोरी जोडके बंधती है तो भी 2 उंगल छोटी पड़ जाती है एक उंगल प्रेम है और दूसरा है कृपा भगवान सोच रहे है की अगर प्रेम है तो कृपा तो मैं अपने आप ही कर देता हूँ। आज जब मैया थक गयी और प्रेम मैं आ गयी तो प्रभु ने कृपा कर दी और अब मैया ने कान्हा को बाँध दिया है। संस्कृत मे डोरी को दाम कहते है और पेट को उदर कहते है जब भगवान् को रस्सी से पेट से बांधा तो कान्हा का येे नया नाम उत्पन्न हुआ दामोदर। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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(((((((( मेरा कन्हैया आयेगा… )))))))) . गोकुल के पास ही किसी गाँव में एक महिला थी जिसका नाम था आनंदीबाई। देखने में तो वह इतनी कुरूप थी कि देखकर लोग डर जायें। . गोकुल में उसका विवाह हो गया, विवाह से पूर्व उसके पति ने उसे नहीं देखा था। विवाह के पश्चात् उसकी कुरूपता को देखकर उसका पति उसे पत्नी के रूप में न रख सका एवं उसे छोड़कर उसने दूसरा विवाह रचा लिया। . आनंदी ने अपनी कुरूपता के कारण हुए अपमान को पचा लिया एवं निश्चय किया कि ‘अब तो मैं गोकुल को ही अपनी ससुराल बनाऊँगी।’ . वह गोकुल में एक छोटे से कमरे में रहने लगी। घर में ही मंदिर बनाकर आनंदीबाई श्रीकृष्ण की भक्ति में मस्त रहने लगी। . आनंदीबाई सुबह-शाम घर में विराजमान श्रीकृष्ण की मूर्ति के साथ बातें करती, उनसे रूठ जाती, फिर उन्हें मनाती…. और दिन में साधु-सन्तों की सेवा एवं सत्संग-श्रवण करती। . इस प्रकार कृष्ण भक्ति एवं साधु-सन्तों की सेवा में उसके दिन बीतने लगे। . एक दिन की बात है गोकुल में गोपेश्वरनाथ नामक जगह पर श्रीकृष्ण-लीला का आयोजन निश्चित किया गया था। उसके लिए अलग-अलग पात्रों का चयन होने लगा, पात्रों के चयन के समय आनंदीबाई भी वहाँ विद्यमान थी। . अंत में कुब्जा के पात्र की बात चली। उस वक्त आनंदी का पति अपनी दूसरी पत्नी एवं बच्चों के साथ वहीं उपस्थित था, अतः आनंदीबाई की खिल्ली उड़ाते हुए उसने आयोजकों के आगे प्रस्ताव रखाः- . “सामने यह जो महिला खड़ी है वह कुब्जा की भूमिका अच्छी तरह से अदा कर सकती है, अतः उसे ही कहो न, यह पात्र तो इसी पर जँचेगा, यह तो साक्षात कुब्जा ही है।” . आयोजकों ने आनंदीबाई की ओर देखा, उसका कुरूप चेहरा उन्हें भी कुब्जा की भूमिका के लिए पसंद आ गया। उन्होंने आनंदीबाई को कुब्जा का पात्र अदा करने के लिए प्रार्थना की। . श्रीकृष्णलीला में खुद को भाग लेने का मौका मिलेगा, इस सूचना मात्र से आनंदीबाई भाव विभोर हो उठी। उसने खूब प्रेम से भूमिका अदा करने की स्वीकृति दे दी। . श्रीकृष्ण का पात्र एक आठ वर्षीय बालक के जिम्मे आया था। . आनंदीबाई तो घर आकर श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे विह्वलता से निहारने लगी एवं मन-ही-मन विचारने लगी कि ‘मेरा कन्हैया आयेगा… . मेरे पैर पर पैर रखेगा, मेरी ठोड़ी पकड़कर मुझे ऊपर देखने को कहेगा….’ . वह तो बस, नाटक में दृश्यों की कल्पना में ही खोने लगी। . आखिरकार श्रीकृष्णलीला रंगमंच पर अभिनीत करने का समय आ गया। लीला देखने के लिए बहुत से लोग एकत्रित हुए। . श्रीकृष्ण के मथुरागमन का प्रसंग चल रहा था, नगर के राजमार्ग से श्रीकृष्ण गुजर रहे हैं… रास्ते में उन्हे कुब्जा मिली…. . आठ वर्षीय बालक जो श्रीकृष्ण का पात्र अदा कर रहा था उसने कुब्जा बनी हुई आनंदी के पैर पर पैर रखा और उसकी ठोड़ी पकड़कर उसे ऊँचा किया। . किंतु यह कैसा चमत्कार……………… कुरूप कुब्जा एकदम सामान्य नारी के स्वरूप में आ गयी….. . वहाँ उपस्थित सभी दर्शकों ने इस प्रसंग को अपनी आँखों से देखा। . आनंदीबाई की कुरूपता का पता सभी को था, अब उसकी कुरूपता बिल्कुल गायब हो चुकी थी। . यह देखकर सभी दाँतो तले ऊँगली दबाने लगे। आनंदीबाई तो भाव विभोर होकर अपने कृष्ण में ही खोयी हुई थी… . उसकी कुरूपता नष्ट हो गयी यह जानकर कई लोग कुतुहल वश उसे देखने के लिए आये। . फिर तो आनंदीबाई अपने घर में बनाये गये मंदिर में विराजमान श्रीकृष्ण में ही खोयी रहतीं। यदि कोई कुछ भी पूछता तो एक ही जवाब मिलता “मेरे कन्हैया की लीला कन्हैया ही जाने….” . आनंदीबाई ने अपने पति को धन्यवाद देने में भी कोई कसर बाकी न रखी। यदि उसकी कुरूपता के कारण उसके पति ने उसे छोड़ न दिया होता तो श्रीकृष्ण में उसकी इतनी भक्ति कैसे जागती ? . श्रीकृष्णलीला में कुब्जा के पात्र के चयन के लिए उसका नाम भी तो उसके पति ने ही दिया था, इसका भी वह बड़ा आभार मानती थी। . प्रतिकूल परिस्थितियों एवं संयोगों में शिकायत करने की जगह प्रत्येक परिस्थिति को भगवान की ही देन मानकर धन्यवाद देने से प्रतिकूल परिस्थिति भी उन्नतिकारक हो जाती है। . ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (((((((((( जय जय श्री राधे )))))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ . .

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बिहारी शतसई से ------ ••••••••••••••••••••••••• मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झांई परे, श्याम हरित दुति होई॥ व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं कि वे राधा उनके सांसारिक कष्टों को दूर करें जिनके सुंदर स्वरूप की झलक मात्र पड़ने से अथवा देखने से श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं। श्लेष अलंकार के अनुसार अन्य अर्थ----- वे चतुर राधा मेरी भव बाधाएँ दूर करें जिनकी झलकमात्र पड़ने से श्याम(पाप) प्रभावहीन हो जाते हैं। अथवा जिनके शरीर की सुनहरी कान्ति पड़ने से श्रीकृष्ण के शरीर की नीली कान्ति हरे रंग की हो जाती है। तो पर वारी उरबसी, सुनि राधिके सुजान। तू मोहन के उरबसी, वै उरबसी समान।। व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं- हे चतुर राधिका जी! मैं आपके सौन्दर्य पर परम सुन्दर मानी जाने वाली अप्सरा, उर्वशी को भी न्यौछावर कर सकता हूँ। आप सभी का मन मोहने वाले श्रीकृष्ण के मन में उनके मन को भी मोह लेने वाली बनकर अथवा अप्सरा उर्वशी के समान होकर बस गई हो। बंधु भए का दीन के, को तारयो रघुराई॥ तूठे-तूठे फिरत हौ, झूठे बिरद कहाई॥ व्याख्या-कवि कहता है- हे रघुपति ! आप दीन बन्धु कहलाते हो, पतितोद्धारक कहे जाते हो। आप अपनी प्रशंसा सुन-सुन कर बड़े इतराते फिर रहे हो। सच तो यह है कि आपको अभी तक मुझ जैसे दीन और पापी से पाला नहीं पड़ा है। छोटे-छोटे दोनों और पतितों का उद्धार करके, झूठी प्रशंसा से संतुष्ट हो रहे हो। यदि मेरा उद्धार कर दो तो मैं मान लूंगा कि आप वास्तव में दीनबन्धु और पत्ति पावन हैं। कब को टेरतु दीन रट, होत ने स्याम सहाय। तुमहूँ लागी जगत गुरु, जग नायक जग बाइ॥ व्याख्या-कवि कहता है-हे प्रभु! मैं कब से दीनता भरी पुकार से आपको अपनी सहायता के लिए पुकार रहा हूँ पर आप मेरी दीन-पुकार को अनसुनी किए जा रहे हैं। हे श्याम ! हे जगत पूज्य! हे जगन्नायक! कहीं ऐसा तो नहीं कि आप को भी सांसारिक हवी लग गई हो। आपने भी सांसारिक गुरुओं और नायकों के समान दोनों की अपेक्षा करना आरम्भ कर दिया हो। यदि ऐसा न होता तो मेरी करुण पुकार सुनकर आप मेरी सहायता करने अवश्य आते। या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई। ज्यों-ज्यों बूडै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ॥ व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं-श्रीकृष्ण के प्रेम रंग में रंगे हुए इस मन का व्यवहार बड़ा विचित्र है। यह जितना-जितना श्याम रंग में डूबता है, उतना-उतना ही उज्ज्वल होता चला जाता है। भजन कह्यौ तातें भज्यौ, भज्यौ ने एक बार। दूरि भजन जातें कयौ, सो नैं भज्यौ गॅवार॥ व्याख्या-बिहारी अपने मन अथवा भगवान के भेजने से विमुख गॅवार लोगों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं- अरे ! नादान ! हमने तुमसे जिसका भजन करने, स्मरण करने या अपनाने को कहा था। उस प्रभु स्मरण से तो तू दूर भागता रहा। तूने जीवन में एक बार भी उस प्रभु की भजन नहीं किया और जिन सांसारिक विषयों से दूर भागने को कहा, तृने उन्हीं का सेवन किया, उन्हीं में डूबा रहा। पिर तेरी उद्धार कैसे हो सकता है॥ अजौ तरुयौना ही रहयौ, श्रुति सेवत इक रंग। नाकवास बेसरि लयौ, बसि मुकुतन के संग॥ व्याख्या-सामान्य अर्थ कवि कानों में पहने जाने वाले आभूषण’तरयौना’ को संबोधित करते हुए कहता है-अरे तरयौना तू एक ही रंग (स्वर्ण-रंग) में रहने के कारण कोई प्रगति नहीं कर पाया। आज तक कानों में ही पहना जा रहा है। जबकि मोतियों को साथ में लेने के कारण बेसर (नाक के आभूषण) ने व्यक्ति के सम्मान की प्रतीक ‘नाक’ पर स्थान पा लिया है। श्लेष से अन्य अर्थ-हे एक निष्ठभाव से वेद-शास्त्रों का अध्ययन करने वाले। तू अभी तक अपना उद्धार नहीं कर पाया, जब कि पुक्त पुरुषों की संगति करके, सामान्य जन भी स्वर्ग के भागी हो गए। एक अन्य अर्थ-कवि राजदरबारों में चलने वाले कुटिल व्यवहारों पर व्यंग्य करते हुए कहता है------ अरे निरंतर राजा के कान भरने वाले ! तेरी अभी तक दरबार में कोई उन्नति नहीं हो पाई। जबकि दरबार के निष्पक्ष लोगों का संग करने वाले राज की नाक बन गए। राजा उन पर गर्व करने लगा है॥

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white beauty May 8, 2020

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jatan kurveti May 8, 2020

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