💫Shuchi Singhal💫
💫Shuchi Singhal💫 Apr 21, 2021

🙏🍁Durga Navmi our Ram navmi ki Hardik Shubkamnay🍁🙏🍁Ganpati Bappa morya🙏🍁

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कामेंट्स

Madhuben patel Apr 21, 2021
जय हो माता सिद्धिदात्री जी स्नेहानुराग प्रभात की स्नेहवंदन प्यारी बहना जी आपको सपरिवार दुर्गानवमी की हार्दिक शुभकामनाएं

न प Apr 21, 2021
🙏प्रभात वंदन दीदीजी 🙏 🚩माता रानी कि कृपा दृष्टि बनी रहे ओर आप का हर पल शुभ मंगलमय हो 🚩

🌹🌹Mamta Kapoor🌹🌹🙏🙏🌷🌷 Apr 21, 2021
"रिद्धि दे, सिद्धि दे, वंश में वृद्धि दे, ह्रदय में ज्ञान दे,चित्त में ध्यान दे, अभय वरदान दे, दुःख को दूर कर, सुख भरपूर कर, आशा को संपूर्ण कर, सज्जन जो हित दे, कुटुंब में प्रीत दे, जग में जीत दे, माया दे, साया दे, और निरोगी काया दे, मान-सम्मान दे, सुख समृद्धि और ज्ञान दे, शान्ति दे, शक्ति दे, भक्ति भरपूर दें..."👣 🌹🌹🌹🌹🌹🕉️🕉️🕉️🕉️ इसी मंगलकामना के साथ आप सभी को🎉 Navratri 🎉की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।।

sanjay choudhary Apr 21, 2021
जय माता दी।।।। शुभ प्र्भात् जी।।।।�*🙏🌹!!

RAJ RATHOD Apr 21, 2021
💐🚩🙏शुभ चैत्र शुक्ल नवमी 🙏🚩💐 🌸🌅🌅शुभ बुधवार 🌅🌅🌸 🙏जय श्री माँ सिध्दिदात्री 🙏 🌹🚩🏹जय श्री राम 🏹🚩🌹 🌺🌺मोक्ष एवं अष्टसिध्दि प्रदायिनी माँ सिध्दिदात्री एवं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी की कृपा से आपका सदा मंगल हो 🌺🌺

Arvid bhai Apr 21, 2021
jay siyaram didi prnam nmskar subh prbhat vandan ram jnam otsv ki hardik subhkamna radhe radhe nmskar ji ram ram ji

Neeta Trivedi Apr 21, 2021
jay Mata Rani ki subh prabhat vandan dear shuchi ji Aapka har ek Pal subh or mangalmay ho happy Ramnavmi lovely bahena ji 🙏🌹🙏

Bm. Nama Apr 21, 2021
suprabhat Vandan ramnavami ki aapko Hardik shubhkamnaen🌹🙏🌹

arvind sharma Apr 21, 2021
जय श्रीराम जय श्रीकृष्ण 🙏🙏 *मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र भगवान के जन्मोत्सव की समस्त देश वासियों को बधाई शुभकामनाएं बधाई करता हू🚩 💠------------------राधे-राधे जी 🎭🎭 सबका दिन मंगलमय हो ! --सुखद--सुंदर --सुरक्षित हो--खुश-- रहो --स्वस्थ --रहो-- प्रसन्न --होकर रामनवमी बनाओ 🙏🙏🙏 🙏 शुप्रभात्🙏💥 जय मंगल नाथ 💥

अष्टभुजी दुर्गा और दशभुजी दुर्गा का स्वरुप विवेचना 'नवार्ण मन्त्र के अनुसार इस भगवती का तेजो रूप ( अनलात्मक) ध्यान है विद्युद्दाम-सम-प्रभां मृग पति स्कन्ध स्थितां भीषणाम्। कन्याभिः करवाल-खेट विलसद् हस्ताभिरासेविताम्॥ हस्तैश्चक्र गदाऽसि खेट विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीम्। विभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रा भजे ॥ बिजली के सदृश वर्णवाली, मृगपति अर्थात् सिंह के स्कन्ध वा ग्रीवा पर सवार, भोषणा अर्थात् कराल (डरावनी) आकृतिवाली, कन्याओं अर्थात् कुमारी गण से, जिनके हाथों में करवाल अर्थात् खड्ग और खेट अर्थात् दाल हैं, वेष्टित (आठों) भुजाओं में चक्र, गदा, खड्ग, ढाल, शर धनुष, गुण (रक्षा का एक साधन) और तर्जनी- मुद्रा (सावधानकारक) रखती हुई अनलात्मिका अर्थात् तेजोराश्यात्मिका चन्द्र धारिणी तीन नेत्रवाली दुर्गा को भजता हूँ। १. विद्युद-दाम-सम-प्रभा- यह ध्यान तेजः स्वरूपा 'दुर्गा' का है। 'विद्युल्लता चित् शक्ति की घोतक है। 'तैत्तरीय' श्रुति कहती है कि 'विद्युत्'– 'ब्रह्म' है, 'शक्ति' है— 'बलमिति विद्युति' 'ब्रह्म' वा परात्परा शक्ति को 'विद्युत्' क्यों कहते है? इसलिए कि इसके स्मरण मात्र से अन्धकार का नाश हो, प्रकाश का आविर्भाव होता है अथर्वशिर उपनिषत् कहता है— 'अथ कस्मादुच्यते वैद्युतम् यस्मादुच्चार्यमाण एव व्यक्ते महसि द्योतयति तस्मादुच्यते वैद्युतम्।' 'बृहदारण्यक' भी कहता है- 'विद्युद ब्रह्म...' (५७)। 'तन्त्र' का भी कहना यही है। 'मन्त्र-महोदधि' कहता है कि 'विद्युल्लता' ही 'चित्-शक्ति' है। यही 'प्राण-शक्ति' है, जिसके बिना किसी पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं है। जड़ पदार्थों यथा मिट्टी, पत्थर आदि में यह शक्ति (चेतना व प्राण) सोती रहती है, वनस्पति आदि में इसकी स्वप्नावस्था और जीवों में जाग्रदवस्था है। २. मृगपति — इससे सिंह और शव रूपी शिव दोनों का बोध होता है। पशुपति शिव को भी कहते हैं, कारण ये पशुओं— देवताओं के पति वा स्वामी हैं शरभोपनिषत् श्रुति भी कहती है 'सर्वे देवा: पशुतामवापुः स्वयं तस्मात् पशुपतिबंभूव' ३. भीषणा अर्थात् कराला भीषणत्व या करालत्व-ब्रह्म की एक विशिष्ट लक्षणा है, जिसे गीता 'सुदुर्दर्श' पद से व्यक्त करती है- 'सुदर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम भगवान् कृष्ण ने, जो सगुण ब्रह्म हैं, अपने भक्त प्रवर सखा अर्जुन को यह भीषण रूप दिखाया था। यहाँ शङ्का हो सकती है कि यह जगज्जननी 'भीषणा' अर्थात् जिसको देखने से भय हो, वैसी क्यों है? 'भुति' इसका निराकरण इस प्रकार करती है कि इससे सभी डरते हैं, यह किसी से नहीं डरती। इसी के डर से वायु ठीक प्रकार से बहता है, सूर्य उदय होता है। इसी प्रकार प्रकृति के सभी कार्य शृङ्खलाबद्ध होते हैं (देखिए, नृसिंह-पूर्व तापिन्युपनिषत् | इसके सिवा 'विराट्' स्वरूप भय कारक होता ही है। जब यह 'महतो महीयान्' है अर्थात् विराट् से भी अधिक विराट् है तब इसका 'भीषणत्व' स्वाभाविक ही है। ४. कन्याओं से सेविता- 'कन्या' पद के अनेक तात्पर्य हैं। इसका एक अर्थ है ज्योतिष्मती 'कन् प्रकाशने + यक् उणादि टापू इस भाव में भगवती प्रकाश मण्डल से वेष्टिता है, ऐसा बोध है। दूसरा अर्थ है- अविवाहिता व्यक्ति शक्ति। इस भाव में अपञ्चीकृत तत्त्वों से वेष्टिता है, यह तात्पर्य है। कन्याओं के हाथों में तलवार (करवाल) और डाल (खेट) हननात्मक तथा रक्षणात्मक शक्ति के द्योतक है। संक्षेप में यह भाव है कि भगवती 'कन्याओं' अर्थात् सृजन शक्ति, रक्षण वा पालन शक्ति और संहार शक्ति से सेविता अर्थात् युक्ता हैं। ५. अष्टभुजा-आठ भुजाओं से १ पृथ्वी, २ जल, ३ अग्नि, ४ वायु, ५ आकाश, ६ मन ७ बुद्धि और ८ अहङ्कार-इन आठो प्रकृतियों का बोध होता है। इस प्रकार अनुपहित महा चिति उपहित चेतनावाली भी है अर्थात् परात्पर भगवती-प्रकृति-धारिणी, प्रकृति रूपिणी भी है। इन हाथों में अवस्थित आठों आयुध तत् तत् प्रकृति के नियन्त्रक है। शशि धरा, त्रिनेत्रा और दुर्गा के तात्पर्य बताए जा चुके हैं।३. दश भुजी दुर्गा दश भुजा कात्यायनी प्राण- महा शक्ति का प्रकृत रूप है, जिसने 'महिषासुर' अर्थात् महा मोह रूपी आसुरी सर्ग का दमन किया था कात्यायन्याः प्रवक्ष्यामि, मूर्ति दश भुजां तथा त्रयाणामपि देवानामनुकारण-कारिणीम्॥ जटाजूट समायुक्तामर्धेन्दु कृत शेखराम्। लोचन- त्रय संयुक्तां, पद्मेन्दु- सदृशाननाम् ॥ अतसी पुष्प वर्णाभां, सुप्रतिष्ठां प्रलोचनाम् । नव-यौवन सम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम्॥ सुचारु दशनां तद्-वत्, पीनोन्नत पयोधराम्। त्रिभङ्ग स्थान संस्थानां, महिषासुर मर्दिनीम्॥ त्रिशूलं दक्षिणे दद्यात्, खड्गं चक्रं क्रमादधः। तीक्ष्ण-वाणं तथा शक्ति, वामतोऽपि निबोधत॥ 0 भगवती दुर्गा के तीन विलक्षण स्वरूप । १९ खेटकं पूर्ण चापं च पाशमंकुशमूवंतः। घण्टा वा परशुं वाऽपि, वामतः सन्निवेशयेत्॥ अधस्तान्महिषं तद् वद, वि-शिरस्कं प्रदर्शयेत् । शिरच्छेदोद्भवं तद्-वद्, दानवं खड्ग पाणिनम् ॥ हृदि शूलेन निर्भिन्नं, निर्यदन्त्र विभूषितम् रक्त रक्ती कृताङ्गश्च रक्त विस्फारितेक्षणम् ॥ वेष्टितं नाग पाशेन, धुकुटी भीषणाननम् स पाश-वाम हस्तेन, धृत केशं च दुर्गया॥ अर्थात् दश भुजा कात्यायनी देवी तीनों देवों अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और शिव की जननी है। जटा-जूट से युक्ता, अर्ध-चन्द्र से विभूषिता, त्रिनेत्रा, पद्म और चन्द्र के सदृश प्रसन्न मुखवाली, अतसी के फूल अथवा मरकत समान वर्णवाली, सुन्दर भाव से अवस्थिता, सुन्दर नेत्रवाली, नव-युवती, सभी आभरणों से भूषिता, सुन्दर दाँतवाली, बड़े स्तनवाली, त्रिभङ्गा स्थान में रहनेवाली, महिषासुर को मर्दन करनेवाली, दाहिने हाथों में ऊपर त्रिशूल फिर क्रमशः खड्ग, चक्र, शर और शक्ति हैं, बाएँ हाथ में खेटक, धनुष, पाश, अंकुश और घण्टा अथवा परशु (फरसा) है। नीचे में छिन्न-शिर महिप है। कटे हुए धड़ से निकला, खड्ग हाथ में लिए असुर देवी के त्रिशूल से हृदय में विद्ध है। असुर की अंतड़ी निकली है, जिस कारण लहू के निकलने से असुर का पूर्ण शरीर लहूलुहान है। उसकी लाल आँखें विस्फारित हैं। वह देवी द्वारा नागपाश में बद्ध है। उसकी धुकुटी ऐसी है कि मुख मण्डल भीषण दीखता है। देवी ने पाश युक्त वाम हस्त से उसके केशों को पकड़ रखा है। १. दश भुजा दश भुजाएँ दश प्राणस्वरूपिणी हैं। व्यष्टि दुर्ग में स्थिता दुर्गा इन्हीं दश-प्राण-रूपी भुजाओं से क्रियाशीला है। इन हाथों में अवस्थित आयुध इनकी तत् तत् क्रियाओं के द्योतक हैं। तात्पर्य यह है कि मनरूपिणी दुर्ग की स्वामिनी भगवती दुर्गा दशभुजा रूपी इन्द्रियों से किया शीला है और दश-आयुध रूपी क्रियाशील गुणों से वह इन्द्रियों का संयमन करती हैं। इसी प्राण शक्ति से इच्छा ज्ञान और क्रिया शक्ति-रूपी त्रिदेवों की उत्पत्ति होती है और इसी में वे लीन होते हैं। २. जटाजूट- इससे शृङ्खलाबद्ध धर्म का बोध होता है। इस मृङ्खला पर किसी प्रकार का पहुंचने का अतिक्रमण होने पर प्राण शक्ति कुपित हो जाती है। इसी कारण इसे उग्रा, भीषणा, कराला आदि कहते हैं। ३. पद्मेन्दु-सदृशानना–पद्म और इन्दु के सदृश प्रसन्न मुखवाली प्राण शक्ति का प्रकृत रूप 'पद्म' के समान सुन्दर होता हुआ उसी के समान विकासोन्मुख है और 'इन्दु' (चन्द्र) के सदृश सौम्य और शीतल होता हुआ मध्यावस्था से पूर्णावस्था प्राप्त करनेवाली है। अतः प्राण शक्ति की सम्बर्धना ही दशभुजी दुर्गा भगवती की वास्तविक पूजा है। ४. नव-यौवन सम्पन्ना- अपचय रहिता अर्थात् हास रहिता होने से कालातीता है, ऐसा ५. सर्वाभरणभूषिता सभी आभरणों से भूषिता अर्थात् सर्व गुणोपेता का तात्पर्य है।६. सुचारु दर्शना सुन्दर दाँतवाली अर्थात् सुन्दर नियन्त्रण शक्ति शीला है। ७. त्रिभङ्ग स्थान संस्थाना- यह उन तीनों स्थानों में रहती है, जहाँ ग्रन्थि का भङ्ग वा भेद होता है। यह 'हृदय' में रहती है, जहाँ 'ब्रह्म' ग्रन्थि भेद कर आना होता है: 'भू' मध्य में रहती है, जहाँ 'विष्णु' ग्रन्थि भेद कर आना होता है और 'ब्रह्मरन्ध्र' में रहती है, जहाँ 'रुद्र-ग्रन्थि' भङ्ग कर आना है। इसी अवस्था में महिषासुर' अर्थात् महा मोह का मर्दन होता है और प्राण शक्ति- महिषमर्दिनी कहला सकती 'महिष' के शरीर'मोह' वा 'अविद्या के बाहरी रूप का नाश होने पर उसका आन्तरिक रूप हृदय में प्रकट होता है, जिसे 'प्राण शक्ति का आत्म शूल हृदय में प्रविष्ट होकर निष्प्राण वा निःशक्त करता है। सम्बंधित प्राण शक्ति के पाद-तल में अर्थात् नियन्त्रित होकर महिषासुर नित्य रहता है। भगवती से महिषासुर ने तीन वरों में एक वर यह भी माँगा था कि मैं जीवित ही तुम्हारे वाम पाद- तल में नित्य रहूँ और तुम्हारे मुख को देखता रहूँ। ८. नियंदन्त्र विभूषितम्- इससे तात्पर्य है कि सब मैल निकल चुके हैं। ९. रक्त रक्ती कृताङ्गम्- इससे ऐसा बोध होता है कि महा मोह ग्रसित जीव के समस्त राग बाहर निकल गए हैं। १०. रक्त-विस्फारितेक्षणम्- इसका अर्थ है- आसुरी भावापन्न जीव का आश्चर्य भय से भी आँखे विस्फारित होती हैं, परन्तु महा-मोह में ग्रसित जीव को भय कैसा? असुर राज रावण को भी भय का नाम नहीं था। ये तो ज्ञानी थे। जिस प्रकार 'ब्रह्मा' के प्रपौत्र रावण को 'राम का ज्ञान' था, उसी प्रकार 'शिव'-तनय महिषासुर को भी ज्ञान था भगवती दुर्गा का। इस तथ्य को सिद्ध करता है 'असुर' अर्थात् आसुरी भावापत्र जीव का 'खड्ग'-पाणि होना। 'खड्ग'–ज्ञान का द्योतक है। इसी से 'महिषासुर को अपने आकस्मिक परिवर्तन पर आश्चर्य हुआ। ११. नागपाशेन वेष्टितं नाग-पाश से बंधा। इसके अनेक तात्पर्य है। एक तो इससे ॐकार पाश, प्रणव विधानुबन्धन का बोध है प्रणव विद्या के बिना जीव की अविद्या (महा मोह) दूर नहीं होती। दूसरे, नग का अर्थ है पर्वत में अवस्थित, या पर्वत में उत्पन्न 'नाग अणू'। अर्थात् जीव शरीर में स्थित विन्ध्य हिमाचल मेरु आदि पर्वतों में अवस्थित विशिष्ट नाड़ी रूप पाश से विद्ध सुषुम्ना रूपी पाश से जब तक जीव अपने को आबद्ध नहीं करता, तब तक किसी प्रकार की आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती। इस पाश बन्धन के दृढ़ीकरण का द्योतक है— श्रीदुर्गा द्वारा महिषासुर की चोटी को पकड़े रखना। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि महिषासुर मर्दिनी दुर्गा के प्रधानतया तीन रूप हैं-१ अष्टादश भुजावाली उग्र चण्डा, २ षोडश भुजावाली भद्रकाली और ३ दश भुजावाली सौम्य-रूपिणी कात्यायनी । प्रश्न उठता है कि एक ही असुर का तीन बार तीन रूपों द्वारा क्यों दमन हुआ? इसका उत्तर यह है कि 'अविद्या' व 'मोह' तीन गुणों के आश्रित है। दूसरे शब्दों में तीन प्रकार के मोह हैं भगवती दुर्गा के तीन विलक्षण स्वरूप | २१ १ तामसिक मोह, २ राजसिक मोह और सात्विक मोह 'मोह' मल है, जिसका अन्त नित्रगुण्यावस्था में ही होता है। इसी से भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को निस्त्रगुण्य होने का उपदेश दिया था। सबसे पहले 'तामसिक मल' का नाश होता है। इस हेतु 'उग्र चण्डा' साधन द्वारा क्रिया योग को पद्धति से तमोगुणाश्रित 'मोह' दूर होता है। फिर 'राजसिक मोह' के नाशार्थ अर्ध सौम्य और अर्ध उग्र साधन की आवश्यकता होती है क्योंकि रजोगुण सत्त्व और तामस इन गुणों का मिश्रण है। अन्त में 'सात्विक' मोह के नाश के लिए शुद्ध साम्य साधन की ही आवश्यकता होती है क्योंकि सत्त्वगुण शुद्ध सौम्य है। 'महिषासुर' द्वारा देवी से सर्व प्रथम सौम्य रूप में ही मारने का वर माँगना यह बतलाता है कि एक ही जन्म में एक ही बार में जीव के आसुरी सर्ग नष्ट नहीं होते। अनेक बार वा अनेक जन्मों में सच्ची साधना करने से ही अविद्या का पूर्ण रूप से नाश होकर 'मोक्ष' होता है। 'गीता' भी ऐसा ही कहती है— अनेक जन्म-संसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।' 'शारदीय नवरात्र' के शुभ अवसर पर दश भुजी सीम्य-रूपिणी कात्यायनी-महिष मर्दिनी दुर्गा की आराधना के समय सरस्वती, लक्ष्मी, कार्तिकेय और गणेश की स्थिति की कल्पना की जाती है। सूक्ष्म रूप में ये सभी स्वरूप भगवती में अन्तर्निहित है, इनकी पृथक्-पृथक् कल्पना की आवश्यकता नहीं है। किन्तु स्थूल रूप में, आसुरी सर्गों को नष्ट करनेवाली विजयी शक्तियों के स्पष्ट परिचय के लिए इनकी कल्पना उचित ही है। सरस्वती विद्या अर्थात् यथार्थ ज्ञान स्वरूपा वाक् देवी है। अविद्या स्वरूप आसुरी सर्ग के दूरी-करण हेतु आत्म विद्या की आवश्यकता होती है। आत्म विद्या के बिना अविद्या का नाश सम्भव नहीं है। यह आत्म विद्या प्रकृति रूपा प्राण शक्ति से ही उत्पन्न होती है। लक्ष्मी दैवी सम्पत्ति स्वरूपा है। इसी सम्पत्ति से आसुरी सर्गों से युद्ध किया जाता है। इसी के बल पर विद्या अविद्या को परास्त करने में समर्थ होती है। इसे विज्ञान शक्ति कहते हैं। कार्तिकेय दैवी सम्पद रूप महा-सैन्य का सेनानी- यह संयतेन्द्रिय भाव है। इसे साधारणतया 'कुमार' कहते हैं। 'कुमार' से, यदि जैसा हम समझते हैं, अविवाहित का बोध है, तो ये अविवाहित नहीं है। शास्त्रों में इनको दो खियों का उल्लेख है तो इनको 'कुमार' क्यों कहते हैं? इसका कारण यह है कि यह 'कु' अर्थात् कुत्सित भावों को मारनेवाले या दूर करनेवाले हैं- 'कुं मारयति इति कुमारः।' कुमार से ब्रह्मचारी अर्थात् संयतेन्द्रिय का भी बोध होता है। गणेश गण + ईश गणेश 'गण' शब्द के कई अर्थ है यहाँ यह शब्द संख्या वाचक है। काल की गति की विच्छेदावस्था ही संख्या है। दूसरे शब्दों में 'गणेश' पद यहाँ स्थिरत्व भाव का घोतक है। स्थिरता भाव के बिना आसुरी सर्गों से युद्ध विजय नहीं पाई जा सकती।

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Ruchi Khanna May 4, 2021

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Adhikari Molay May 5, 2021

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Mamta Chauhan May 5, 2021

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ooooooo May 5, 2021

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