Acharya Umesh Badola
Acharya Umesh Badola Aug 25, 2017

गणेश चतुर्थी पर विशेष

#गणेशजी
माता-पिता के लिए संतान ही सबकुछ होता है।सर्वोपरि और परम माता- पिता शिव-शक्ति है इन्हें हम प्रकृति और पूरूष कहते है ये निराकार एवं निर्गुण है परन्तु बिना साकार के हम आंनदित नहीं हो सकते।कारण हम स्वयं साकार है,पहले जो साकार की लीला देखेगा वही तो निराकार के रहस्य से परिचित होगा।इस प्रकृति और पूरूष का जो परम प्रेम है वह श्री गणेश है और षडानन श्री कार्तिकेय जी है।ये दोनो पुत्र सृष्टि मे बड़े प्यारे है।शिव तो शक्ति के हृदय में रहते है और शिव के हृदय में रूद्र रूप हनुमान भक्ति से पूर्णरुपेण चैतन्य विराज रहे है।

वही श्री हनुमान के हृदय में श्री सीताराम जी विराज रहे है जो साक्षात विष्णु है।ये आकाश तत्व में महाशुन्य है जो चराचर जगत में व्याप्त है यही आदि गणेश है।शक्ति के गोद मे दुलार,प्यार कौन पायेगा,वही जो सनातन माता- पिता का पुत्र होगा।शिव-शक्ति का प्रेम अमिट है तथा संसार के सभी जीव इन्हीं की संतान है लेकिन जब शक्ति ने अपने उबटन से एक शिशु की मूर्ति बनाकर प्राण-प्रतिष्ठा का मंत्र फूंका तो एक सुन्दर बालक के रूप में श्री गणेश प्रकट हुए।गणेश क्या है मंगलदाता,भाग्य-विधाता।कारण एक बार गुरू गोरखनाथ जी ने दत्तात्रेय जी से पूछा कि कौन मुक्त है,कौन बन्धन दुःख में है,कौन नष्ट होता है और कौन अजर अमर है?यदि यह प्रकट करने योग्य हो तो आप इस पर प्रकाश डालिये।दत्तात्रेय जी ने कहा कि ब्रह्म मुक्त है,और प्रकृति दुःख सहती है।यही अपार गुप्त ज्ञान है।प्रकृति अपने दुःख के निवारण के लिए ही श्री गणेश की उत्पति से अपने सारे संतानो की पीड़ा हरती है तभी तो ब्रह्म शिव भी पुत्र प्रेम में गणपति को गोद मे बिठाये भक्तों का कल्याण करते है।इसलिये मातृॠण से मुक्त होने के लिये सभी जीव को शक्ति उपासना करनी चाहिये और वहाँ प्रथम पूज्य श्री गणेश को प्रसन्न किये बिना शक्ति की कृपा प्राप्त नहीं होती।गणेश जी के आशीर्वाद के फलस्वरुप ही माता-पिता जीव पर सबसे ज्यादा करूणा बरसाते हैं।बुद्धि के दाता श्री गणेश का हमारे शरीर में आधार चक्र के पास निवास का यहीं कारण हैं कि शक्ति के साथ ये सदैव विराजमान है,शिव तो आज्ञा चक्र से सहस्त्रसार मे बैठे है वहाँ तक पहुँचना बहुत कठिन है और नीचे शक्ति अलसायी सोयी रहती है।जब श्री गणेश की कृपा साधक पर होती है तो वे माँ को जगाकर ऊपर भागते है,तो शक्ति पुत्र के पिछे भागती है।अब तो साधक का कल्याण होना निश्चित ही है कारण गणेश हँसते खिलखिलाते शिव के गोद में जाकर बैठ जाते है,जिससे माँ भी अपने पुत्र के मोह और प्रेम वश शिव के पास पहुँच वामभाग में विराज जाती हैं।तब जीव समाधि में जाकर उस परम तत्व माता पिता का दर्शन कर लेता हैं,ऐसे कृपालु हैं हमारे गणेश।जीवन में बहुत पीड़ा हैं जीव को पर गणेश हर उस पीड़ा से निकाल बाहर करते है पल में।कितने स्वरूप में है गणेश जी विराजमान और उनकी अनेकानेक लीलाएँ है तभी तो गणेश प्रथम पूज्य है।कितना भी साधना उपासना कर लिजिये लेकिन श्री गणेश जी के कृपा के बिना आगे बढ पाना सम्भव ही नहीं।जिस त्रिपुर सुन्दरी को एक बार देखने के लिए साधक पुरा जीवन साधना में समर्पित कर देता है उस माँ के गोद में गणेश हँसते खिलखिलाते माँ को मोह में बाँधे रहते हैं।आदि शंकराचार्य के समय की एक घटना है।एक सिद्ध माता का मंदिर बन्द था कारण वह प्राचीन तांत्रिक पीठ था तथा वहाँ शक्ति कुपित हो गई थी।उस समय कितने साधक मंदिर के अन्दर गये लेकिन बाहर कभी नहीं निकल पाये।तभी एकबार वहाँ शंकराचार्य जी पहुँच गये तथा एक गणेश मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठा कर गणेश स्तोत्र का पाठ करते हुये अन्दर पहुँच गये,अब तो जैसे ही माँ शक्ति श्री गणेश को देखी प्रसन्न हो गई और हमेशा के लिये वह मंदिर खुल गया,ऐसे है हमारे श्री गणेश जी।पति पत्नि में चाहे मतभेद रहता हो,सारे रिश्ते कही न कही तनाव पैदा कर देते हो परन्तु संतान सभी को प्यारा है कारण संतान में जीव को गणेश,कार्तिक दिखाइ देते है।सारा व्रत,उपवास,पूजन लोग अपने संतान को सुखी रखने के लिये ही करते है। जीवन में सारा पूर्व अर्जित पुण्य प्रताप संतान के दुःख मिटाने में ही लग जाता है,ऐसा होता है माता पिता का प्रेम।माता पिता के उस प्रेम की लाज श्रीगणेश शिव-शक्ति के पास रखते है और सारी अशुभता को दूर कर मंगल प्रदान करते हैं।गणेश की उपासना मात्र से सृष्टि के सभी देवी देवता कृपा करते हैं।अगर गणेश नहीं होते तो इस सृष्टि का कार्य सुचारू रूप से नहीं चल पाता,इसलिये माता ने सभी जीव पर विशेष कृपा कर श्रीगणेश की उत्पति कर उन्हें गजानन बनाकर सृष्टि में प्रथम पूज्य बना दिया।गणेश शीघ्र प्रसन्न होकर,भक्त के सारे अमंगल को हर कर मंगल प्रदान करते है।अनेकानेक लीलाएँ है गजानन की, ये ग्रह दोष,या कोई बाधा तत्क्षण दूर कर भक्त की मनोकामना पूर्ण कर देते हैं।

आज मै यहाँ श्रीगणेश की स्तुति पाठ दे रहा हूँ।एक मोदक या बेसन के प्रसाद के साथ ११ दूर्वा और सिन्दूर अर्पण कर गणेश जी का एक बार भी पाठ कर लिया जाय तो विघ्नों का शमन होता है और जीवन के हर कार्य में सफलता मिलता रहता है निरंतर।"

 -:श्रीगणेश स्तुति:-

चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेम् पाशांकुशौ मोदकपात्र दन्तौ।करैर्दधानं सरसीरूहस्थं,गणाधिनाथं शशिचूडमीडे॥

गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थ जम्बूफल चारूभक्षणम्।उमासुतं शोकविनाशकारकं,नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्॥

अलिमण्डल मण्डित् गण्ड थलं तिलकीकृत कोमलचन्द्रकलम्।कर घात विदारित वैरिबलं,प्रणमामि गणाधिपतिं जटिलम्॥

खर्व स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरम्।प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्ध मधुपव्यालोल गण्डस्थलम्।दन्ताघात विदारितारि रूधिरैःसिंदूरशोभाकरं,वन्दे शैलसुता सुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्॥

नमो नमःसुरवर पूजितांघ्रये,नमो नमःनिरूपम मंगलात्मने।नमो नमःविपुल पदैक सिद्धयै,नमो नमः करिकलभाननाय ते॥

शुक्लाम्बरं धरं देवं,शशिवर्ण चतुर्भुजम्,प्रसन्न वदनं ध्यायेत,सर्वविघ्नोपशान्तये॥गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः,मातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः॥

वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभः।निर्विघ्न कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।सर्व विघ्न विनाशाय सर्व कल्याण हेतवे,पार्वती प्रियपुत्राय गणेशाय नमो नमः॥

प्रातःस्मरामि गणनाथमनाथ बन्धु,सिंदूरपूर्ण परिशोभित गण्ड युग्मम्,उद्दण्डविघ्नपरिखण्डन चण्ड दण्डमाखण्डलादि सुरनायक वृन्द वन्द्यम्॥

प्रातर्नमामि चतुरानन वन्द्यमानं,इच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम्।तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं,पुत्रं विलास चतुरै शिवयोःशिवाय॥

प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्त शोकं,दावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम्।अज्ञान कानन विनाशन हव्यवाहमुत्साहवर्द्धनमहं सुतमीश्वरस्य॥

                                       

    -:द्वादश गणेश स्तुति:-

प्रणम्य शिरसा देवं,गौरीपुत्र विनायकम्।भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थ सिद्धये॥प्रथमं वक्रतुण्ड च एकदन्तं द्वितीयकम।तृतीय कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्ण तथाष्टकम्॥नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकं।एकादशं गणपतिं,द्वादशं तु गजाननम्॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥

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*1.कुंडली के भावों पे विभिन्न मत-* *2.मार्केश ग्रह के लक्षण व समाधान-* *3.पुत्र द्वारा धन प्राप्ति के योग-* *4- वास्तु टिप्स-* *1.किसी भी जन्म कुंडली मे चन्द्रमा 10 वें अंक अर्थात मकर राशि मे किसी भी घर में स्थित हो तो उस व्यक्ति को जीवन में एक बार तो अवश्य ही भयँकर विफलता झेलनी ही होगी , समाज में अपना मुख दिखाने में भी संकोच करेगा।* *2.चन्द्रमा के साथ एक ही घर में शनि , राहु अथवा मंगल जैसे दुष्ट ग्रह हो तो वह व्यक्ति मानसिक रूप से इतना परेशान होगा कि लगे पागल है।* *3.चन्द्रमा चार दुष्ट ग्रहों शनि , राहु , मंगल , केतु में से किसी दो के साथ किसी भी घर मे हो अथवा दो दुष्ट ग्रह चन्द्रमा को देखते हैं तब भी उपरोक्त से मिलता जुलता प्रभाव ही पड़ता है। । यदि दो दुष्ट ग्रह चंद्र के साथ न हों किन्तु उससे अगले पिछले घर में हों तो भी मानसिक यातना और परेशानी का अनुभव उस व्यक्ति को होता ही है ।* *4. यदि किसी की कुंडली मे मंगल और शुक्र एक ही भाव मे साथ हों तो उस व्यक्ति के विवाह पश्चात भी अन्यत्र सम्बन्ध होते ही हैं ।चाहे वो कितना ही संयमी और सदाचारी हो।* *5.यदि कुंडली मे 10 नम्बर अर्थात मकर राशि का मंगल हो तो दो परिणाम होंगे , यदि कुंडली महिला की है तो उसके पिता का स्वभाव बात बात में भद्दी गालियां देना होगा और यदि पुरुष की है तो ऐसी ही अभद्र भाषा का प्रयोग उसके चाचा करेंगे । साथ ही वह व्यक्ति उत्तम श्रेणी का विद्यार्थी भी होगा।* *6.शनि यदि तुला राशि 7 अंक में होगा तब वह विद्वान और श्रेष्ठ विद्यार्थी होगा।* *7.यदि गुरु 4 अंक में अर्थात कर्क राशि मे उच्च होगा तो वो व्यक्ति सज्जन , उदार ह्रदय , चरित्रवान और सत्यवादी होगा ।* *8. यदि लग्न में मंगल हो और अस्त न हो तो व्यक्ति क्रोधी होगा ही।* *9. यदि लग्न मेष है तो व्यक्ति धैर्यहीन होगा।* *10. कर्क लग्न में या नौवें घर अथवा भाव कहें में गुरु और चन्द्र स्थित हों तो वह व्यक्ति महान नेता , निडर सत्यवादी और ख्याति प्राप्त हो।* *11. यदि मकर लग्न में अकेला केतु हो वो व्यक्ति जर्जर शरीर , जिसके देह में माँस न दिखता हो पीत शरीर वाला होता है और क्षय रोग tb से पीड़ित हो ।* *12. तीसरे भाव का मंगल व्यक्ति को साहसी बनाता है।* *13.किसी भी भाव में मकर राशि मे चार ग्रह वाला व्यक्ति कलंक , लज्जा या पराजय की भावना से ग्रस्त होता है और समाज के उच्च लोगो के सामने प्रकट होने में लज्जा महसूस करे।* *14. किसी भी घर मे चन्द्र और राहु साथ हों वो व्यक्ति कारावास , आरोप , मुक़्क़दमें , अकस्मात दुःख आदि से ग्रस्त हो ।* *15.किसी भी भाव में गुरु और चन्द्र अथवा शुक्र और चन्द्र साथ हों , वो व्यक्ति बहुत सुंदर आकर्षक होगा और यदि यही सहयोग चौथे भाव में हों तो माता का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक होता है । यदि यही सहयोग सप्तम भाव अर्थात पत्नी के भाव मे हो तो पत्नी लुभावन होगी ।और यदि दशम भाव हो तो पिता सुंदर होंगें ।* *16.चन्द्र ,शनि एक साथ चौथे घर हों तो बचपन और जवानी घोर आपदाओं में बीते ।* *चंद्र और राहु युति के प्रभाव से माता या पत्नी को कष्ट होता है, मानसिक तनाव रहता है, आर्थिक परेशानियाँ, गुप्त रोग, भाई से बैर और परिजनों का व्यवहार भी परायों जैसा होने के फल मिल सकते हैं।* *दरअसल चंद्र-राहु या सूर्य-राहु की युति को ग्रहण योग कहते हैं। अब यदि बुध की युति राहु के साथ है तो यह जड़त्व योग बन जाता है। इन योगों के प्रभाव स्वरुप भाव स्वामी की स्थिति के अनुसार ही अशुभ फल मिलते हैं। वैसे चंद्र की युति राहु के साथ कभी भी शुभ नही मानी जाती है। ऐसे में शिव आराधना अच्छा लाभ दे सकती है।* *कुंडली के भावों पे विभिन्न मत-* *वैदिक ज्योतिष में आचार्यो के विभिन्न्न मत की बात करे तो सभी विद्धवान के विभिन्न मत है जो यहाँ लिख रहे है।* *लग्नेश सदैव शुभ फल देता है।* *लग्नेश यदि अष्टमेश हो तो भी शुभ होता है।* *लग्नेश यदि ष्टमेश हो तो थोड़ा दोष युक्त होता है।* *लग्नेश यदि द्वादेश हो तो भी थोड़ा दोष युक्त होता है।* *लग्नेश चाहे शुभ ग्रह हो किंतु निकृष्ट स्थान का भी स्वामी हो तो कुछ पाप फल उसमे आ जाता है।* *द्वितीयेश और व्ययेश-* *यह स्वयं न शुभ होते है और न पाप होते है जैसी इनकी दूसरी राशि होती है उसके स्वामित्व के अनुसार ही जैसे शुभ या पाप ग्रह बैठे हो वैसा ही फल करते है यह मारक भी होते है।* *त्रिकोण-* *त्रिकोण सदैव शुभ फल करते है।* *त्रिकोण यदि अष्टमेश हो तो दोष युक्त होते है।* *त्रिकोण यदि अष्टमेश भी हो और पंचम में बैठा हो यो पाप नही होता।* *त्रिकोण यदि व्ययेश भी हो तो शुभ ही रहता है।* *त्रिकोण यदि द्वितीयेश हो तो मारक भी हो जाता है किंतु भाग्य उदय उसी में ही होता है।* *त्रिकोण यदि केन्द्रेश भी हो तो योगकारक होता है।* *त्रिकोण यदि ष्टमेश भी हो तो दोषयुक्त हो जात है |* *मार्केश ग्रह के लक्षण व समाधान-* *मारक ग्रह के बारे में तो सुना ही होगा, क्योंकि प्रत्येक कुंडली में कुछ ग्रह मारक का काम करते हैं, माना जाता है कि जब भी इन ग्रहों की दशा या अंतर्दशा आती है तो उस समय यह ग्रह जातक को कष्ट देते हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि सभी को एक जैसा ही कष्ट और परेशानी दें, यह सब अलग-2 लग्नो के हिसाब से कष्ट देते हैं, और यह प्रत्येक कुंडली में शुभ अशुभ ग्रह, ग्रहों की अच्छी व बुरी दृष्टि पर ही निर्भर करता है इसलिए घबराना नहीं चाहिए।* *आप अपनी कुंडली चेक कर जान सकते हैं कि कौन सा ग्रह आपके लिए मारक मतलब कष्टकारक होंगे।* *कुंडली में लग्न से गिनने पर दूसरा घर और सातवां घर मारक स्थान या भाव कहलाते हैं, (कुछ विद्वान 12वें घर को भी मारक मानते है) इन घरों में जो भी राशि आती है उनके स्वामी मारकेश कहलाते हैं।* *लक्षण-* *मारकेश की दशा/अंतर्दशा या प्रत्यंतर दशा में मानसिक व शारीरिक कष्ट, चोट लगना, दुर्घटना होना, कोई लंबी बीमारी, मानसिक तनाव, अपयश, कार्यों में बाधाएं और अड़चने, वैवाहिक जीवन में क्लेश, बिना वजह क्लेश, डर व घबराहट, आत्म विश्वास की कमी आदि परेशानियां हो सकती है।* *सौम्य और शुभ ग्रह यदि मारकेश हैं तो इतने कष्टकारी नहीं होते किन्तु यदि पापी और क्रूर ग्रह मारकेश हैं तो फिर कुछ कष्ट अवस्य देते हैं।* *चंद्रमा और सूर्य यदि मारकेश हों तो मारकेश होकर भी मारकेश नहीं होते मतलब अशुभ फल नहीं देते।* *उपाय- यदि मारकेश की दशा/अंतर /प्रत्यंतर चल रहा हो तो घबराना नहीं चाहिए क्योंकि जहां चाह वहां राह होती है, अगर ज्योतिष में कुछ बुरे योग हैं तो वहां उपाय भी हैं।* *शिव आराधना से लाभ मिलता है, शिवजलाभिषेख करें।* *मारक ग्रहों की दशा मे उनके उपाय करना चाहिए.* *महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र इस प्रकार है-* *ॐ हौं जूं स: ॐ भू: भुव: स्वःॐत्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्।* *उर्व्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतातॐ भू:भूव: स्वः ॐ जूं स: हौं ॐ।।* *इस विषय में राम रक्षा स्त्रोत, महामृत्युंजय मन्त्र, लग्नेश और राशीश के मन्त्रों का अनुष्ठान और गायत्री मन्त्रों द्वारा इनमे कुछ वृद्धि की जा सकती है।* *चार बातें नोट कर लीजिए-* *कभी भी उच्च के ग्रहों का दान नहीं करना चाहिए और नीच ग्रहों की कभी पूजा नहीं करनी चाहिए।* *कुंडली में गुरु दसम भाव में हो या चौथे भाव में हो तो किसी भी प्रकार के धार्मिक निर्माण के लिए धन नहीं देना चाहिए यह अशुभ होता है और जातक को कभी भी फांसी तक पहुंचा सकता है। आप चाहें तो शारीरिक श्रम दान दे सकते हैं।* *कुंडली के सप्तम भाव में गुरु हो तो कभी भी पीले रंग के वस्त्र दान नहीं करने चाहिए।* *बारहवें भाव में चन्द्र हो तो साधुओं का संग करना बहुत अशुभ होगा। इससे परिवार की वृद्धि तक भी रुक सकती है।* *सूर्य पापी व्यक्ति के लिए बुरा है , चंद्र तार्किक व्यक्ति के लिए बुरा है , शुक्र वैरागी व्यक्ति के लिए बुरा है, गुरु अधर्मी व्यक्ति के लिए बुरा है , राहु सत्यवादी व्यक्ति के लिए बुरा है , बुध भावप्रधान व्यक्ति के लिए बुरा है , मंगल शांतिप्रिय व्यक्ति के लिए बुरा है , शनि अत्याचारी व्यक्ति के लिए बुरा है, केतु सांसारिक लोभी व्यक्ति के लिए बुरा है।* *उदाहरण-* *मान लीजिए किसी का शराब का व्यापार है, तो गुरु उसके व्यापार में लाभ नही देगा, या किसी की हवन पूजन सामग्री की दुकान है तो राहु उसके व्यापार में लाभ नही देगा।* *इसी प्रकार ग्रहों के कारकत्व का विस्तार में विश्लेषण करें फिर स्वयं ही पता चल जाएगा की ज्योतिष फलित क्यो नही हो-* *पुत्र द्वारा धन प्राप्ति के योग-* *जन्मपतरी से कैसे मालूम हो कि आपको पुत्र से धन प्राप्ति होगी कि नही।* *जन्मपत्री का दूसरा भाव आपकी सन्तान का। देवगुरु बृहस्पति सन्तान के कारक* *जब कभी भी दूसरे भाव के स्वामी का सम्बन्ध पंचमेश या पंचम भाव से होगा जातक को सन्तान से धन की प्राप्ति अवश्य ही होगी।* *देवगुरु बृहस्पति पंचम भाव मे हो और उस पर नवमेश की दृश्टि हो तब भी जातक को पुत्र से धन की प्राप्ति होती है।* *किसी भी योग को फलित होने के लिए लगनेश का बलवान होना अत्यंत आवश्यक है। यदि लगनेश कमजोर हो जाये तो जन्मपत्री के शुभ योगो में कमी आ जाती है। अतः लगनेश की स्तिथि अवश्य ही देख ले।* *कुछ वास्तु टिप्स-* *केक्टस और किसी भी प्रकार के काँटे वाले पौधे घर में स्थापित करना शुभ नहीं होता है।आज के जमाने में केक्टस राहु के कारक हैं।* *केतु इमली का वृक्ष, तिल के पौधे तथा केले के फल का कारक है। यदि केतु खराब हो तो इन पौधों को घर के आसपास लगाना घर के मालिक के बेटे के लिए अशुभ फल का कारक हो जाता है,क्योंकि कुंडली में केतु हमारे बेटे को कारक भी है।*

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Durga Pawan Sharma Jan 26, 2020

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Pankaj Jan 26, 2020

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Jeetram Bairwa Jan 24, 2020

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kalimehra Jan 24, 2020

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