murlidhargoyal39
murlidhargoyal39 Dec 11, 2017

जय जय नारायण नारायण हरि हरि

जय जय नारायण नारायण हरि हरि

तो इसलिए भगवान विष्‍णु को नारायण कहा जाता है, जानिए...!!

क्‍या आपने कभी सोच है कि भगवान विष्‍णु को नारायण क्‍यों कहा जाता है? आइये जानते हैं। पुराणों में भगवान विष्‍णु के बारे में लिखा है कि "शान्ताकारं भुजगशयनं" जिसका अर्थ होता है कि विष्‍णु शेषनाग पर लेटे हुए हैं।
विष्‍णु के इस अवतार को देखकर पहला प्रश्‍न मन में आता है कि कोई शेषनाग के ऊपर इतनी आराम से कैसे लेट सकता है। एक तत्‍काल जवाब यही मन में आता है कि चूंकि वे भगवान हैं इसलिए उनके लिए सब संभव है।
लेकिन उनके शेषनाग पर लेटने के पीछे क्‍या राज़ है? इसे ऐसे समझें। परिवार, समाज और पर्यावरण के प्रति हमारे सबके दायित्‍व हैं।

हालांक‍ि इन सभी कर्तव्‍यों को पूरा करने के लिए सभी को अनेक परेशानियों से गुज़रना पड़ता है जो कि शेषनाग के समान ही खतरनाक हैं।

विष्‍णु भगवान का चेहरा और हाथ हमें संकेत देता है कि हमें मुश्किल समय में भी धैर्य बनाकर रखना चाहिये। कुछ प्रयासों से हम मुसीबतों पर विजय प्राप्‍त कर सकते हैं।

इसलिए विष्‍णु का नाम है नारायण

हिंदू मान्‍यताओं के अनुसार नारद मुनि हमेशा विष्‍णु भगवान का नाम नारायण-नारायण बोलकर पुकारते थे। इसके बाद से विष्‍णु भगवान को नारायण कहा जाने लगा है।

उदाहरण के लिए, सत्‍यनारायण, अनंतनारायण, लक्ष्‍मीनारायण, शेषनारायण और धुव्रनारायण आदि नाम इस क्रम में शामिल हैं।

सभी लोगों को पता है कि भगवान विष्णु को नारायण के रूप में भी जाना जाता है, लेकिन इसके पीछे का रहस्य बहुत कम लोग जानते हैं। एक कथा के अनुसार, पानी भगवान विष्णु के चरणों से पैदा हुआ था। गंगा नदी का एक नाम "विष्णुपदोद्की" भी है अर्थात भगवान विष्णु के पैरों से निकली हुई जो इस तथ्य को सही साबित करती है। इसके अलावा पानी को "नीर" या "नर" के नाम से भी जाना जाता है और भगवान विष्णु भी जल में ही निवास करते हैं। इस प्रकार "नर" शब्द से उनका नारायण नाम पड़ा है। इसका अर्थ यह है कि पानी में भगवान निवास करते है।

उनके दूसरे नाम "हरि" का क्या अर्थ है?

आप सभी लोगों को पता है कि भगवान विष्णु को "हरि" नाम से भी पुकारा जाता है। लेकिन आप में से बहुत सारे लोगो को इसका कारण नहीं पता होगा। चलिए आज हम आपको इसका कारण बताते हैं। शास्त्रों के अनुसार हरि का अर्थ है हटाने वाला या चुराया हुआ। भगवान विष्णु के बारे में ऐसा कहा जाता है कि "हरि हरति पापानि" जिसका अर्थ है हरि भगवान हमारे जीवन में आने वाली समस्याओं और हमारे पापों को दूर करते है।
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|| जय श्री कृष्ण ||

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कामेंट्स

Shiv Bahadur Singh Dec 11, 2017
भगवान नारायण नारायण हरि हरि श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि

Sanjay Misra Dec 12, 2017
सुप्रभात।बहुत बढ़िया जानकारी प्राप्त हुई।धन्यवाद।

Ajnabi Dec 12, 2017
good morning jay shree Radhe krishna veeruda

Yogesh Kumar Sharma Dec 12, 2017
भगवान बजरंगबली आपकी मनोकामना पूर्ण करें, जय श्री राम

हरे कृष्णा | हम १३ फरवरी २०२० से श्रीमद्भागवद्गीता श्लोक प्रति श्लोक फिर से शुरू करेंगे | . *कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- ३.४१ अध्याय ३ : कर्मयोग . . तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ | पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् || ४१ || . . तस्मात् - अतः; त्वम् - तुम; इन्द्रियाणि - इन्द्रियों को ; आदौ - प्रारम्भ में; नियम्य - नियमित करके; भरत-ऋषभ - हे भरत वंशियों में श्रेष्ठ; पाप्मानम् - पाप के महान प्रतीक को; प्रजहि - दमन करो; हि - निश्चय ही; एनम् - इस; ज्ञान - ज्ञान; विज्ञान - तथा शुद्ध आत्मा के वैज्ञानिक ज्ञान का; नाशनम् - संहर्ता, विनाश करने वाला | . . इसलिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! प्रारम्भ में ही इन्द्रियों को वश में करके इस पाप का महान प्रतीक (काम) का दमन करो और ज्ञान तथा आत्म-साक्षात्कार के इस विनाशकर्ता का वध करो । . . तात्पर्य : भगवान् ने अर्जुन को प्रारम्भ से ही इन्द्रिय-संयम करने का उपदेश दिया जिससे वह सबसे पापी शत्रु काम का दमन कर सके जो आत्म-साक्षात्कार तथा आत्मज्ञान की उत्कंठा को विनष्ट करने वाला है । ज्ञान का अर्थ है आत्म तथा अनात्म के भेद का बोध अर्थात् यह ज्ञान कि आत्मा शरीर नहीं है । विज्ञान से आत्मा की स्वाभाविक स्थिति तथा परमात्मा के साथ उसके सम्बन्ध का विशिष्ट ज्ञान सूचित होता है । श्रीमद्भागवत में (२. ९. ३ १ ) इसकी विवेचना इस प्रकार हुई है - . ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदङगं च गृहाण गदितं मया || . 'आत्मा तथा परमात्मा का ज्ञान अत्यन्त गुह्य एवं रहस्यमय है, किन्तु जब स्वयं भगवान् द्वारा इसके विविध पक्षों की विवेचना की जाती है तो ऐसा ज्ञान तथा विज्ञान समझा जा सकता है ।' भगवद्गीता हमें आत्मा का सामान्य तथा विशिष्ट ज्ञान (ज्ञान तथा विज्ञान) प्रदान करती है । जीव भगवान् का भिन्न अंश हैं , अतः वे भगवान् की सेवा के लिए हैं । यह चेतना कृष्णभावनामृत कहलाती है । अतः मनुष्य को जीवन के प्रारम्भ से इस कृष्णभावनामृत को सीखना होता है, जिससे वह पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होकर तदनुसार कर्म करे । . काम ईश्र्वर-प्रेम का विकृत प्रतिबिम्ब है और प्रत्येक जीव के लिए स्वाभाविक है । किन्तु यदि किसी को प्रारम्भ से ही कृष्णभावनामृत की शिक्षा दी जाय तो प्राकृतिक ईश्र्वर-प्रेम काम के रूप में विकृत नहीं हो सकता । एक बार ईश्र्वर-प्रेम के काम रूप में विकृत हो जाने पर इसके मौलिक स्वरूप को पुनः प्राप्त कर पाना दुःसाध्य हो जाता है । फिर भी, कृष्णभावनामृत इतना शक्तिशाली है कि विलम्ब से प्रारम्भ करने वाला भी भक्ति के विधि-विधानों का पालन करके ईश्र्वरप्रेमी बन सकता है । अतः जीवन की किसी भी अवस्था में, या जब भी इसकी अनिवार्यता समझी जाय, मनुष्य कृष्णभावनामृत या भगवद्भक्ति के द्वारा इन्द्रियों को वश में करना प्रारम्भ कर सकता है और काम को भगवत्प्रेम में बदल सकता है , जो मानव जीवन की पूर्णता की चरम अवस्था है । . प्रश्न १ : ज्ञान तथा विज्ञान में क्या अन्तर है ? . प्रश्न २ : कृष्णभावनामृत युक्त चेतना किसे कहते हैं ? मनुष्य किस प्रकार काम को ईश्र्वर-प्रेम में बदल सकता है ? . अब आप हमारी भगवद्गीता एप्प में माध्यम से भी ये श्लोक(चित्र व प्रश्नोत्तर सहित) सीधे अपने एंड्राइड फ़ोन में पा सकते हैं | कृपया इसे यहाँ से डाउनलोड करें : Bhagavad Gita Multilingual

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sunita Sharma Jan 24, 2020

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Durga Pawan Sharma Jan 25, 2020

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Pushpa Sharma Jan 26, 2020

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Vinay Vyash Jan 25, 2020

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sona jangle Jan 24, 2020

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