आज का गीता ज्ञान !!

आज का गीता ज्ञान !!

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कामेंट्स

aanand Jan 13, 2019
जय श्री कृष्ण

SC Sharma Jan 13, 2019
ॐ नमो नारायण जय श्री राधे कृष्णा

pramod singh Jan 13, 2019
bahut sunder Bhajan Jai shree Radhe krishna Good night ji

" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ चौदहवां अध्याय : (गुणत्रयविभागयोग) नवम दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ।।19।। जब कोई यह अच्छी तरह जान लेता है कि समस्त कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य कोई कर्ता नहीं है और जब वह परमेश्वर को जान लेता है, जो इन तीनों गुणों से परे है, तो वह मेरे दिव्य स्वभाव को प्राप्त होता है। सज्जनों, समुचित महापुरुषों से केवल समझकर तथा समुचित ढंग से सीख कर मनुष्य प्रकृति के गुणों के सारे कार्यकलापों को लाँघ सकता है, वास्तविक गुरु श्रीकृष्ण है और वे अर्जुन को यह दिव्य ज्ञान प्रदान कर रहे हैं, इसी प्रकार जो लोग पूर्णतया भगवद्भक्ति में संलग्न है, उन्हीं से प्रकृति के गुणों के कार्यों के इस ज्ञान को सीखना होता है, अन्यथा मनुष्य का जीवन कुमार्ग पर चला जाता है। प्रामाणिक गुरु के उपदेश से जीव अपनी आध्यात्मिक स्थिति, अपने भौतिक शरीर, अपनी इन्द्रियों तथा प्रकृति के गुणों के अपनी बद्धावस्था होने के बारे में जान सकता है, जीव इन गुणों की जकड़ में होने से असहाय होता है, लेकिन अपनी वास्तविक स्थिति देख लेने पर वह दिव्य स्तर को प्राप्त कर सकता है, आध्यात्मिक जीवन की न्यूनता से जीव विभिन्न कर्मों का कर्ता नहीं होता, उसे बाध्य होकर कर्म करना पड़ता है, क्योंकि वह विशेष प्रकार के शरीर में स्थित रहता है, जिसका संचालन प्रकृति का कोई गुण करता है। जब तक मनुष्य को किसी आध्यात्मिक मान्यता प्राप्त व्यक्ति की सहायता नहीं मिलती, तब तक वह यह नहीं समझ सकता कि वह वास्तव में कहाँ स्थित है, प्रामाणिक गुरु की संगति से वह अपनी वास्तविक स्थिति समझ सकता है और इसे समझ लेने पर वह पूर्ण भगवद्भक्ति में स्थिर हो सकता है, भगवद्भक्त व्यक्ति कभी भी प्रकृति के गुणों के चमत्कार से नियन्त्रित नहीं होता, सातवें अध्याय में आप सभी पढ़ चुके हो कि जो भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में जाता है, वह प्रकृति के कार्यों से मुक्त हो जाता है, जो व्यक्ति वस्तुओं को यथारूप में देख सकता है, उस व्यक्ति पर प्रकृति का प्रभाव घटता जाता है। गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्‌। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ।।20।। जब देहधारी जीव भौतिक शरीर से सम्बद्ध इन तीनों गुणों को लाँघने में समर्थ होता है, तो वह जन्म, मरण, बुढा़पा तथा उनके कष्टों से मुक्त हो सकता है और इसी जीवन में अमृत का भोग कर सकता है। सज्जनों! इस श्लोक में बताया गया है कि किस प्रकार इसी शरीर में भगवद्भक्ति में स्थिर होकर दिव्य स्थिति में रहा जा सकता है, यद्यपि मनुष्य इस भौतिक शरीर के भीतर रहता है, लेकिन अपने आध्यात्मिक ज्ञान की उन्नति के द्वारा वह प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त हो सकता है, वह इसी शरीर में आध्यात्मिक जीवन का सुखोपभोग कर सकता है, क्योंकि इस शरीर के बाद उसका वैकुण्ठ जाना निश्चित है, यानी वह इसी शरीर में आध्यात्मिक सुख उठा सकता है। भगवद्भक्ति में रहकर भक्ति करना भव-पाश से मुक्ति का संकेत है और अठारहवें अध्याय में इसकी विशद व्याख्या की जायगी, जब मनुष्य प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, तो मनुष्य भक्ति में प्रविष्ट होता है, भाई-बहनों! आप सभी किसी न किसी आध्यात्मिक ग्रूपों से जुड़े है और मेरे द्वारा भेजी भगवद्गीता की यह पोस्ट पढ़ रहे हैं, इससे इतना तो पक्का है कि तमोगुण तो हमारे में बहुत कम है, लेकिन रजोगुण अब भी काफी है, मनुष्य में शानो-शौकत, ठाट-बाट से जीने का गुण विद्यमान है। तमोगुण मिट चुका है इसलिये हम व्यभिचार से दूर है, हम किसी गरीब की झोपड़ी में आग नहीं लगाते, लेकिन रजोगुण होने के कारण हम पूरी तरह निर्मल और पावन नहीं हुये है, वह राजसी प्रवृत्ति जब-तब अंश या सर्वांश के रूप में सक्रिय हो जाती है, जाग्रत हो जाती है, सतोगुण की तरफ हमारी प्रवृत्ति हो तो सुख और शान्ति हमारे साथ होगी, भले ही हम संसार में जीयें, परिवार में जियें, दाम्पत्य जीवन में जीयें। लेकिन हमारा विवेक हमारे कर्तव्य-कर्मों को कराते हुये भी हमको रजोगुण से अलग करता चला जायेगा, जब-जब हमारी चेतना का जागरण होता है, सचेतना आती है, विवेक पैदा होता है, तब-तब ऐसा समझो कि हमारे भीतर सत्व गुणों की वृद्धि ही होती है, और जब-जब हमारे भीतर लोभ प्रवृत्ति पनपने लगती है, तब यह जानो कि हमारे भीतर रजोगुण का बढावा हो रहा है, तथा जब-जब मूच्र्छा, प्रमाद तथ आसक्ति हमारे भीतर बढती चली जाय, अज्ञान हमारे भीतर दिखाई दे, तो समझना कि तमोगुण हमारे भीतर सक्रिय हुआ है। तमोगुण से रजोगुण अच्छा, लेकिन रजोगुण से सतोगुण अच्छा, जैसे काँटे से काँटा निकाला जाता है, वैसे ही ही हम भी रजोगुण तथा तमोगुण के काँटों को निकाल फेंके, तमोगुण को फेंकना ही है तो रजोगुण को भी फेंक दो और जब लगे कि तमोगुण और रजोगुण दोनों ही जीवन में नेस्तनाबूद हो रहे है, तब सत्व गुण से भी अपने आप को मुक्त कर लेना, क्योंकि गुणातीत होना ही श्रीकृष्ण की भाषा में मुक्ति को प्राप्त करने के लिये अन्तिम लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण चरण है। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Bhakti Vat May 18, 2019

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Manjusha Dadmode May 18, 2019

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ पंद्रहवां अध्याय : (गुणत्रयविभागयोग) अष्टम दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ।।18।। सतोगुणी व्यक्ति क्रमशः उच्च लोकों को ऊपर जाते हैं, रजोगुणी इसी पृथ्वीलोक में रह जाते हैं, और जो अत्यन्त गर्हित तमोगुण में स्थित है, वे नीचे नरक लोकों को जाते हैं। सज्जनों, इस श्लोक में तीनों गुणों के कर्मो के फल को स्पष्ट रूप से बताया गया है, ऊपर के लोकों यानी स्वर्गलोकों में प्रत्येक व्यक्ति अत्यन्त उन्नत होता है, जीवों में जिस मात्रा में सतोगुण का विकास होता है, उसी के अनुसार उसे विभिन्न स्वर्ग-लोकों में भेजा जाता है, सर्वोच्च-लोक यानी सत्य-लोक या ब्रह्मलोक है, जहाँ इस ब्रह्माण्ड के प्रधान ब्रह्माजी निवास करते हैं, हम आपको पहले ही बता चुके है कि ब्रह्मलोक में जिस प्रकार जीवन की आश्चर्यजनक परिस्थितियाँ है, उसका अनुमान लगाना मुश्किल है, तो भी सतोगुण नामक जीवन की सर्वोच्च अवस्था हमें वहाँ तक पहुँचा सकती है। रजोगुण मिश्रित होता है, यह सतो तथा तमोगुणों के मध्य में होता है, मनुष्य सदैव शुद्ध नहीं होता, लेकिन यदि वह पूर्णतया रजोगुणी हो, तो वह इस पृथ्वी पर केवल राजा या धनी व्यक्ति के रूप में रहता है, लेकिन गुणों का मिश्रण होते रहने से वह नीचे भी जा सकता है, इस पृथ्वी पर रजो या तमोगुणी लोग बलपूर्वक किसी विमान के द्वारा उच्चतर-लोकों में नहीं पहुँच सकते, रजोगुण में इसकी भी सम्भावना है कि अगले जीवन में कोई प्रमत्त हो जाये। यहाँ पर निम्नतम गुण यानी तमोगुण को अत्यन्त गर्हित यानी जघन्य कहा गया है, अज्ञानता (तमोगुण) विकसित करने का परिणाम अत्यन्त भयावह होता है, यह प्रकृति का निम्नतम गुण है, मनुष्य योनि से नीचे पक्षियों, पशुओं, सरीसृपों, वृक्षों आदि की अस्सी लाख योनियाँ है और तमोगुण के विकास के अनुसार ही लोगों को ये अधम योनियाँ प्राप्त होती रहती है, यहाँ इस श्लोक में तामसाः शब्द इस बात का सूचक है कि जो उच्चतर गुणों तक ऊपर न उठ कर निरन्तर तमोगुण में ही बने रहते हैं, उनका भविष्य अत्यन्त अंधकारमय होता है। तमोगुणी तथा रजोगुणी लोगों के लिये सतोगुणी बनने का सुअवसर केवल भगवद्भक्ति विधि से ही मिल सकता है, लेकिन जो इस सुअवसर का लाभ नहीं उठाता, वह निम्नतर गुणों में बना रहेगा, सतोगुण यानी जीवन का देवत्व, जीवन की दिव्यता, रजोगुण यानी मनुष्यता और तमोगुण यानी पशुता, अगर व्यक्ति रजोगुण में जी रहा है, आसक्ति में जी रहा है, कामनाओं के भँवर में जी रहा है तो वह मध्यलोक में जी रहा है, जीवन के बाद अगर मृत्यु भी हुई तो वापस इसी लोक में आओगे। मध्य लोक से ऊपर उठना ही जीवन की प्रगति है और इसी मध्य लोक में बार-बार लौट आना ही संसार की पाठशाला में अनुत्तीर्ण हो जाना है, पुनर्जन्म का मात्र इतना सा ही रहस्य है कि भगवान् ने हमें भेजा, लेकिन हम संसार की पाठशाला में रहकर ठीक से पढ़ न पाये, मेहनत न कर पाये, जीवन को पूरा पढ़ न पाये और फैल हो गयें इसलिये बार-बार यहीं धक्के खाने के लिये भेज दिये जाते हैं, यह तो बात कर रहा था मैं रजोगुण में जीने वाले लोगों की, लेकिन तमोगुण के लिये तो क्या कहा जाये? भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि तमोगुण में जीने वाला व्यक्ति अधोगति को प्राप्त होता है, मरोगे, तो मरने के बाद कीट-पतंगे, कीड़े-मकोड़े, जीव-जन्तु या पशु-पक्षी बनोगे, क्योंकि अन्तर्मन में इन जीव-जन्तुओं की प्रकृति कमोवेश अभी भी विद्यमान है, जब मैं कुछ लोगों को देखता हूंँ, तो मुझे नहीं लगता कि मनुष्य के भीतर का पशु समाप्त हो चुका है, अगर हम अपने आप को टटोलें, तो पायेंगे कि वह पशु जैसी मूढ़ता अभी भी हमारे मन में बैठा हुआ है, वह कभी इस घर, कभी उस घर डोलता रहता है। हम आज भी कभी ये सुख, कभी वो सुख में कूद-फाँद बन्दरों के माफिक करते रहते है, ऐसा नहीं है कि सर्प मिट गया हो या हमारी साँप की योनि से मुक्ति हो गई हो, जब-जब मनुष्य क्रोध में आँखे लाल करेगा, तब-तब वह मनुष्य के रूप में नागराज ही होगा, भीतर का पशुत्व जब तक न मिटे, भीतर की पशुता से ऊपर न उठ पाओ, तब तक शरीर मनुष्य का, लेकिन प्रकृति पशुता की ही रहेगी। अगर कीड़ा कीचड़ में पैदा होता है, तो कीचड़ में ही धँसता है और हम भी संसार में पैदा होते हैं तो संसार में ही धँसते है, सुना हैं कि पहले बड़े-बड़े सम्राटों और शूरवीरों के प्राण उनमें स्वयं में नहीं रहते थे, बल्कि किसी तोते में रख दिये जाते थे, उस व्यक्ति को मारने की लाख कोशिश करो, वह नहीं मरेगा, लेकिन तोते की गर्दन मरोड़ो, वह व्यक्ति झट से मर जाता था, ऐसे सम्राट भी नहीं रहें, वे तोते भी नहीं रहें, पर अब तोतों की जगह तिजोरियों ने ले ली है, तिजोरियों को लूट डालो, तो आदमी के प्राण-पखेरू पल भर में उड़ जायेंगे। भाई-बहनों, यह मनुष्य के लिये मकड़जाल का ही रूप है, जैसे मकड़ी अपने जाले को अपने भोजन और अपने जीवन की व्यवस्था के लिये बुनती है, लेकिन वह स्वयं उस मकड़जाल में उलझकर रह जाती है, यही हाल कमोबेश मनुष्य का है, वह भी पत्नी, बच्चों और परिवार में इसी तरह उलझकर ही रह जाता है और उसे मुक्ति का कोई रसास्वादन उपलब्ध नहीं हो पाता, इसलिये भगवद्भक्ति जैसे सरल मार्ग से सदा सतोगुण में रहने की कोशिश करें। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Harish K Sharma May 17, 2019

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Bhakti Vat May 17, 2019

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Biku Rajbhar May 16, 2019

8576016196

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जय श्री कृष्णा हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे राम हरे राम आज का श्लोक: श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप अध्याय 09 : परम् गुह्य ज्ञान श्लोक--07 *हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।* *हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।।* 🙌🏼🙌🏼 https://chat.whatsapp.com/ItsgjtXvQ6CAieOJwPySLN आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 9.07 अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् | कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || ७ || सर्वभूतानि– सारे प्राणी; कौन्तेय– हे कुन्तीपुत्र; प्रकृतिम्– प्रकृति में; यान्ति– प्रवेश करते हैं; मामिकाम्– मेरी; कल्प-क्षये – कल्पान्त में; पुनः– फिर से; तानि– उन सबों को; कल्प-आदौ– कल्प के प्रारम्भ में; विसृजामि– उत्पन्न करता हूँ; अहम्– मैं | हे कुन्तीपुत्र! कल्प का अन्त होने पर सारे प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और अन्य कल्प के आरम्भ होने पर मैं उन्हें अपनी शक्ति से पुनः उत्पन्न करता हूँ | तात्पर्य : इस विराट भौतिक अभिव्यक्ति का सृजन, पालन तथा संहार पूर्णतया भगवान् की परम इच्छा पर निर्भर है | कल्पक्षये का अर्थ है, ब्रह्मा की मृत्यु होने पर | ब्रह्मा एक सौ वर्ष जीवित रहते हैं और उनका एक दिन हमारे ४,३०,००,००,००० वर्षों के तुल्य है | रात्रि भी इतने ही वर्षों की होती है | ब्रह्मा के एक महीने में ऐसे तीस दिन तथा तीस रातें होती हैं और उनके एक वर्ष में ऐसे बारह महीने होते हैं | ऐसे एक सौ वर्षों के बाद जब ब्रह्मा की मृत्यु होती है, तो प्रलय हो जाता है, जिसका अर्थ है कि भगवान् द्वारा प्रकट शक्ति पुनः सिमट कर उन्हीं में चली जाती है | पुनः जब विराटजगत को प्रकट करने की आवश्यकता होती है तो उनकी इच्छा से सृष्टि उत्पन्न होती है | एकोऽहं बहु स्याम्– यद्यपि मैं अकेला हूँ, किन्तु मैं अनेक हो जाउँगा | यह वैदिक सूक्ति है (छान्दोग्य उपनिषद् ६.२.३)| वे इस भौतिक शक्ति में अपना विस्तार करते हैं और सारी विराट अभिव्यक्ति पुनः घटित हो जाती है | ************************************ प्रतिदिन *भगवद्गीता का हिंदी में एक श्लोक* प्राप्त करने हेतु, इस ग्रुप को join करें 🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/ItsgjtXvQ6CAieOJwPySLN ********************************** To receive daily *ONE shloka of Bhagavad Gita in English*, join below group:🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/Bjx2K7CHftX5gnCsEuxeOr

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