ssd
ssd Jun 9, 2018

Jay shree krishna

https://youtu.be/_B-8uVM1tS8

+16 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 79 शेयर

कामेंट्स

Raju Rai.. Feb 23, 2021

+12 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 63 शेयर
Mamta Chauhan Feb 23, 2021

+191 प्रतिक्रिया 47 कॉमेंट्स • 97 शेयर

+233 प्रतिक्रिया 50 कॉमेंट्स • 125 शेयर
Neha Sharma, Haryana Feb 23, 2021

*मंगलवार_विशेष...... *प्रभु श्रीराम द्वारा लक्ष्मण का परित्याग *औऱ महाप्रयाण की कथा *वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड से !!!!! *जब राज्य करते हुये श्रीरघुनाथजी को बहुत वर्ष व्यतीत हो गये तब एक दिन काल तपस्वी के वेश में राजद्वार पर आया । उसने सन्देश भिजवाया कि मैं महर्षि अतिबल का दूत हूँ और अत्यन्त आवश्यक कार्य से श्री रामचन्द्र जी से मिलना चाहता हूँ । सन्देश पाकर राजचन्द्रजी ने उसे तत्काल बुला भेजा । काल के उपस्थित होने पर श्रीराम ने उन्हें सत्कारपूर्वक यथोचित आसन दिया और महर्षि अतिबल का सन्देश सुनाने का आग्रह किया । *यह सुनकर मुनि वेषधारी काल ने कहा , " यह बात अत्यन्त गोपनीय है । यहाँ हम दोनों के अतिरिक्‍त कोई तीसरा व्यक्‍ति नहीं रहना चाहिये । मैं आपको इसी प्रतिज्ञा पर उनका सन्देश दे सकता हूँ कि यदि बातचीत के समय कोई व्यक्‍ति आ जाये तो आप उसका वध कर देंगे । " *श्रीराम ने काल की बात मानकर लक्ष्मण से कहा, " तुम इस समय द्वारपाल को विदा कर दो और स्वयं ड्यौढ़ी पर जाकर खड़े हो जाओ । ध्यान रहे , इन मुनि के जाने तक कोई यहाँ आने न पाये । जो भी आयेगा , मेरे द्वारा मारा जायेगा । " *जब लक्ष्मण वहाँ से चले गये तो उन्होंने काल से महर्षि का सन्देश सुनाने के लिये कहा । उनकी बात सुनकर काल बोला , " मैं आपकी माया द्वारा उत्पन्न आपका पुत्र काल हूँ । ब्रह्मा जी ने कहलाया है कि आपने लोकों की रक्षा करने के लिये जो प्रतिज्ञा की थी वह पूरी हो गई । अब आपके स्वर्ग लौटने का समय हो गया है । वैसे आप अब भी यहाँ रहना चाहें तो आपकी इच्छा है । " *यह सुनकर श्रीराम ने कहा , " जब मेरा कार्य पूरा हो गया तो फिर मैं यहाँ रहकर क्या करूँगा ? मैं शीघ्र ही अपने लोक को लौटूँगा । " *जब काल रामचन्द्र जी से इस प्रकार वार्तालाप कर रहा था , उसी समय राजप्रासाद के द्वार पर महर्षि दुर्वासा रामचन्द्रजी से मिलने आये । वे लक्ष्मण से बोले , " मुझे तत्काल राघव से मिलना है । विलम्ब होने से मेरा काम बिगड़ जायेगा । इसलिये तुम उन्हें तत्काल मेरे आगमन की सूचना दो । " *लक्ष्मण बोले , " वे इस समय अत्यन्त व्यस्त हैं । आप मुझे आज्ञा दीजिये , जो भी कार्य हो मैं पूरा करूँगा । यदि उन्हीं से मिलना हो तो आपको दो घड़ी प्रतीक्षा करनी होगी । " *यह सुनते ही मुनि दुर्वासा का मुख क्रोध से तमतमा आया और बोले , " तुम अभी जाकर राघव को मेरे आगमन की सूचना दो । यदि तुम विलम्ब करोगे तो मैं शाप देकर समस्त रघुकुल और अयोध्या को अभी इसी क्षण भस्म कर दूँगा । " *ऋषि के क्रोधयुक्‍त वचन सुनकर लक्ष्मण सोचने लगे , चाहे मेरी मृत्यु हो जाये , रघुकुल का विनाश नहीं होना चाहिये । यह सोचकर उन्होंने रघुनाथजी के पास जाकर दुर्वासा के आगमन का समाचार जा सुनाया । रामचन्द्र जी काल को विदा कर महर्षि दुर्वासा के पास पहुँचे । उन्हें देखकर दुर्वासा ऋषि ने कहा , " रघुनन्दन! मैंने दीर्घकाल तक उपवास करके आज इसी क्षण अपना व्रत खोलने का निश्‍चय किया है । इसलिये तुम्हारे यहाँ जो भी भोजन तैयार हो तत्काल मँगाओ और श्रद्धापूर्वक मुझे खिलाओ । " *रामचन्द्र जी ने उन्हें सब प्रकार से सन्तुष्ट कर विदा किया । फिर वे काल कि दिये गये वचन को स्मरण कर भावी भ्रातृ वियोग की आशंका से अत्यन्त दुःखी हुये । *अग्रज को दुःखी देख लक्ष्मण बोले , " प्रभु ! यह तो काल की गति है । आप दुःखी न हों और निश्‍चिन्त होकर मेरा वध करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें । " *लक्ष्मण की बात सुनकर वे और भी व्याकुल हो गये । उन्होंने गुरु वसिष्ठ तथा मन्त्रियों को बुलाकर उन्हें सम्पूर्ण वृतान्त सुनाया । यह सुनकर वसिष्ठ जी बोले , " राघव ! आप सबको शीघ्र ही यह संसार त्याग कर अपने-अपने लोकों को जाना है । इसका प्रारम्भ सीता के प्रस्थान से हो चुका है । इसलिये आप लक्ष्मण का परित्याग करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें । प्रतिज्ञा नष्ट होने से धर्म का लोप हो जाता है । साधु पुरुषों का त्याग करना उनके वध करने के समान ही होता है । " *गुरु वसिष्ठ की सम्मति मानकर श्री राम ने दुःखी मन से लक्ष्मण का परित्याग कर दिया । वहाँ से चलकर लक्ष्मण सरयू के तट पर आये । जल का आचमन कर हाथ जोड़ , प्राणवायु को रोक , उन्होंने अपने प्राण विसर्जन कर दिये । *महाप्रयाण,,, *लक्ष्मण का त्याग करके अत्यन्त शोक विह्वल हो रघुनन्दन ने पुरोहित , मन्त्रियों और नगर के श्रेष्ठिजनों को बुलाकर कहा , " आज मैं अयोध्या के सिंहासन पर भरत का अभिषेक कर स्वयं वन को जाना चाहता हूँ । " *यह सुनते ही सबके नेत्रों से अश्रुधारा बह चली । भरत ने कहा , " मैं भी अयोध्या में नहीं रहूँगा , मैं आपके साथ चलूँगा । आप कुश और लव का अभिषेक कीजिये । " *प्रजाजन भी कहने लगे कि हम सब भी आपके साथ चलेंगे । कुछ क्षण विचार करके उन्होंने दक्षिण कौशल का राज्य कुश को और उत्तर कौशल का राज्य लव को सौंपकर उनका अभिषेक किया । *कुश के लिये विन्ध्याचल के किनारे कुशावती और लव के लिये श्रावस्ती नगरों का निर्माण कराया फिर उन्हें अपनी-अपनी राजधानियों को जाने का आदेश दिया । इसके पश्‍चात् एक द्रुतगामी दूत भेजकर मधुपुरी से शत्रघ्न को बुलाया । दूत ने शत्रुघ्न को लक्ष्मण के त्याग , लव-कुश के अभिषेक आदि की सारी बातें भी बताईं । इस घोर कुलक्षयकारी वृतान्त को सुनकर शत्रुघ्न अवाक् रह गये । *तदन्तर उन्होंने अपने दोनों पुत्रों सुबाहु और शत्रुघाती को अपना राज्य बाँट दिया । उन्होंने सबाहु को मधुरा का और शत्रुघाती को विदिशा का राज्य सौंप तत्काल अयोध्या के लिये प्रस्थान किया । अयोध्या पहुँचकर वे बड़े भाई से बोले , " मैं भी आपके साथ चलने के लिये तैयार होकर आ गया हूँ । कृपया आप ऐसी कोई बात न कहें जो मेरे निश्‍चय में बाधक हो । " *इसी बीच सुग्रीव भी आ गये और उन्होंने बताया कि मैं अंगद का राज्यभिषक करके आपके साथ चलने के लिये आया हूँ । उनकी बात सुनकर रामचन्द्रजी मुस्कुराये और बोले , " बहुत अच्छा । " *फिर विभीषण से बोले , " विभीषण ! मैं चाहता हूँ कि तुम इस संसार में रहकर लंका में राज्य करो । यह मेरी हार्दिक इच्छा है । आशा है , तुम इसे अस्वीकार नहीं करोगे । " *विभीषण ने भारी मन से रामचन्द्र जी का आदेश स्वीकार कर लिया । श्रीराम ने हनुमान को भी सदैव पृथ्वी पर रहने की आज्ञा दी । जाम्बवन्त , मैन्द और द्विविद को द्वापर तथा कलियुग की सन्धि तक जीवित रहने का आदेश दिया । *अगले दिन प्रातःकाल होने पर धर्मप्रतिज्ञ श्री रामचन्द्र जी ने गुरु वसिष्ठ जी की आज्ञा से महाप्रस्थानोचित सविधि सब धर्मकृत्य किये । *तत्पश्‍चात् पीताम्बर धारण कर हाथ में कुशा लिये राम ने वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के साथ सरयू नदी की ओर प्रस्थान किया । नंगे पैर चलते हुये वे सूर्य के समान प्रकाशमान मालूम पड़ रहे थे । उस समय उनके दक्षिण भाग में साक्षात् लक्ष्मी , वाम भाग में भूदेवी और उनके समक्ष संहार शक्‍ति चल रही थी । उनके साथ बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और समस्त ब्राह्मण मण्डली थी । *वे सब स्वर्ग का द्वार खुला देख उनके साथ चले जाते थे । उनके साथ उनके राजमहल के सभी आबालवृद्ध स्त्री-पुरुष भी चल रहे थे । भरत व शत्रुघ्न भी अपने-अपने रनवासों के साथ श्रीराम के संग-संग चल रहे थे । सब मन्त्री तथा सेवकगण अपने परिवारों सहित उनके पीछे हो लिये । *उन सबके पीछे मानो सारी अयोध्या ही चल रही थी । मस्त ऋक्ष ‌और वानर भी किलकारियाँ मारते , उछलते-कूदते , दौड़ते हुये चले । इस समस्त समुदाय में कोई भी दुःखी अथवा उदास नहीं था , बल्कि सभी इस प्रकार प्रफुल्लित थे जैसे छोटे बच्चे मनचाहा खिलौना पाने पर प्रसन्न होते हैं । इस प्रकार चलते हुये वे सरयू नदी के पास पहुँचे । *उसी समय सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी सब देवताओं और ऋषियों के साथ वहाँ आ पहुँचे । श्रीराम को स्वर्ग ले जाने के लिये करोड़ों विमान भी वहाँ उपस्थित हुये । उस समय समस्त आकाशमण्डल दिव्य तेज से दमकने लगा । *शीतल-मंद-सुगन्धित वायु बहने लगी , आकाश में गन्धर्व दुन्दुभियाँ बजाने लगे , अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और देवतागण फूल बरसाने लगे । *श्रीरामचन्द्रजी ने सभी भाइयों और साथ में आये जनसमुदाय के साथ पैदल ही सरयू नदी में प्रवेश किया । तब आकाश से ब्रह्माजी बोले , " हे राघव ! हे विष्णु ! आपका मंगल हो । हे विष्णुरूप रघुनन्दन ! आप अपने भाइयों के साथ अपने स्वरुपभूत लोक में प्रवेश करें । चाहें आप चतुर्भुज विष्णु रूप धारण करें और चाहें सनातन आकाशमय अव्यक्‍त ब्रह्मरूप में रहें । " *पितामह ब्रह्मा जी की स्तुति सुनकर श्रीराम वैष्णवी तेज में प्रविष्ट हो विष्णुमय हो गये । सब देवता , ऋषि-मुनि , मरुदगण , इन्द्र और अग्निदेव उनकी पूजा करने लगे । नाग , यक्ष , किन्नर , अप्सराएँ तथा राक्षस आदि प्रसन्न हो उनकी स्तुति करने लगे । तभी विष्णुरूप श्रीराम ब्रह्माजी से बोले , " हे सुव्रत ! ये जितने भी जीव स्नेहवश मेरे साथ चले आये हैं , ये सब मेरे भक्‍त हैं , इस सबको स्वर्ग में रहने के लिये उत्तम स्थान दीजिये । " *ब्रह्मा जी ने उन सबको ब्रह्मलोक के समीप स्थित संतानक नामक लोक में भेज दिया । वानर और ऋक्ष आदि जिन-जिन देवताओं के अंश से उत्पन्न हुये थे , वे सब उन्हीं में लीन हो गये । सुग्रीव ने सूर्यमण्डल में प्रवेश किया । उस समय जिसने भी सरयू में डुबकी लगाई वहीं शरीर त्यागकर परमधाम का अधिकारी हो गया । *रामायण की महिमा,,, *लव और कुश ने कहा , " महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण महाकाव्य यहाँ समाप्त होता है । यह महाकाव्य आयु तथा सौभाग्य को बढ़ाता है और पापों का नाश करता है । इसका नियमित पाठ करने से मनुष्य की सभी कामनाएँ पूरी होती हैं और अन्त में परमधाम की प्राप्ति होती है । " *सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में एक भार स्वर्ण का दान करने से जो फल मिलता है , वही फल प्रतिदिन रामायण का पाठ करने या सुनने से होता है । यह रामायण काव्य गायत्री का स्वरूप है । यह चरित्र धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को देने वाला है । इस प्रकार इस पुरान महाकाव्य का आप श्रद्धा और विश्‍वास के साथ नियमपूर्वक पाठ करें । आपका कल्याण होगा । *जय श्रीराम जय श्री हनुमान*🚩🙏🌸 *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸

+165 प्रतिक्रिया 27 कॉमेंट्स • 69 शेयर
Jai Mata Di Feb 23, 2021

+23 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 11 शेयर
mona Feb 23, 2021

+9 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 52 शेयर

+8 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 1 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB