श्रीराम दरबार श्रृंगार दर्शन

श्रीराम दरबार श्रृंगार दर्शन
श्रीराम दरबार श्रृंगार दर्शन
श्रीराम दरबार श्रृंगार दर्शन
श्रीराम दरबार श्रृंगार दर्शन

दशहरा पर्व के पावन अवसर पर प्राचीन सिंहासन पुष्पक विमान पर आरूढ़ श्रीराम दरबार का श्रृंगार दर्शन----
सभी रामभक्तों को दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनायें
"जय श्रीराम"

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sunita Sharma Sep 25, 2020

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sonia koushik Sep 25, 2020

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Savita Vaidwan Sep 25, 2020

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kapil.parmar Sep 25, 2020

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Suresh Pandey Sep 25, 2020

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Neha Sharma Sep 25, 2020

*जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌷🌷 *, शुभ संध्या नमन*🙏🌷🌷 🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺 🌺*मुझे मनुष्य चाहिये*🌺 *एक मन्दिर था आसाम में| खूब बड़ा मन्दिर था| उसमें हजारों यात्री दर्शन करने आते थे| सहसा उसका प्रबन्धक प्रधान पुजारी मर गया| *मन्दिर के महन्त को दूसरे पुजारी की आवश्यकता हुई| उन्होंने घोषणा करा दी कि जो कल सबेरे पहले पहर आकर यहाँ पूजा सम्बन्धी जाँच में ठीक सिद्ध होगा, उसे पुजारी रखा जायगा| *मन्दिर बड़ा था| पुजारी को बहुत आमदनी थी| बहुत-से ब्राह्मण सबेरे पहुँचने के लिये चल पड़े| मन्दिर पहाड़ी पर था| एक ही रास्ता था| उस पर भी काँटे और कंकड़-पत्थर थे| ब्राह्मणों की भीड़ चली जा रही थी मन्दिर की ओर| किसी प्रकार काँटे और कंकड़ों से बचते हुए लोग जा रहे थे| *सब ब्राह्मण पहुँच गये| महन्त ने सबको आदरपूर्वक बैठाया| सबको भगवान् का प्रसाद मिला| सबसे अलग-अलग कुछ प्रश्न और मन्त्र पूछे गये| अन्त में परीक्षा पूरी हो गयी| जब दोपहर हो गयी और सब लोग उठने लगे तो एक नौजवान ब्राह्मण वहाँ आया| उसके कपड़े फटे थे| वह पसीने से भीग गया था और बहुत गरीब जान पड़ता था| *महन्त ने कहा – ‘तुम बहुत देर से आये!’ *वह ब्राह्मण बोला – ‘मैं जानता हूँ| मैं केवल भगवान् का दर्शन करके लौट जाऊँगा|’ *महन्त उसकी दशा देखकर दयालु हो रहे थे| बोले – ‘तुम जल्दी क्यों नहीं आये?’ *उसने उत्तर दिया – ‘घर से बहुत जल्दी चला था| मन्दिर के मार्ग में बहुत काँटे थे और पत्थर भी थे| बेचारे यात्रियों को उनसे कष्ट होता| उन्हें हटाने में देर हो गयी|’ *महन्त पूछा – ‘अच्छा, तुम्हें पूजा करना आता है?’ *उसने कहा – ‘भगवान् को स्नान कराके चन्दन-फूल चढ़ा देना, धूप-दीप जला देना तथा भोग सामने रखकर पर्दा गिरा देना और शंख बजाना तो जानता हूँ|’ ‘और मन्त्र?’ महन्त ने पूछा| *वह उदास होकर बोला – ‘भगवान् से नहाने-खाने को कहने के लिये मन्त्र भी होते हैं, यह मैं नहीं जानता| ‘सब पण्डित हँसने लगे कि ‘यह मुर्ख भी पुजारी बनने आया है|’ *महन्त ने एक क्षण सोचा और कहा – ‘पुजारी तो तुम बन गये| अब मन्त्र सीख लेना, मैं सिखा दूँगा| मुझसे भगवान् ने स्वप्न में कहा है कि मुझे मनुष्य चाहये|’ *हम लोग मनुष्य नहीं हैं?’ दूसरे पण्डितों ने पूछा| वे लोग महन्त पर नाराज हो रहे थे| इतने पढ़े-लिखे विद्वानों के रहते महन्त एक ऐसे आदमी को पुजारी बना दे जो मन्त्र भी न जानता हो, यह पण्डितों को अपमान की बात जान पड़ती थी| *महन्त ने पण्डितों की ओर देखा और कहा – ‘अपने स्वार्थ की बात तो पशु भी जानते हैं| बहुत-से पशु बहुत चतुर भी होते हैं| लेकिन सचमुच मनुष्य तो वही है, जो दूसरों को सुख पहुँचाने का ध्यान रखता है, जो दूसरों को सुख पहुँचाने के लिये अपने स्वार्थ और सुख को छोड़ सकता है|’ *पण्डितों का सिर नीचे झुक गया| उन लोगों को बड़ी लज्जा आयी| वे धीरे-धीरे उठे और मन्दिर में भगवान् को और महन्त जी को नमस्कार करके उस पर्वत से नीचे उतरने लगे| *भाई, तुम सोचो तो कि मनुष्य हो या नहीं? *जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌷🌷 🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺

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Shyam Sundersahoo Sep 25, 2020

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