Sunit Kumar
Sunit Kumar Jun 24, 2017

Suit Kumar added this post.

#ज्ञानवर्षा

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M.S.Chauhan Feb 26, 2021

*शुभ रात्रि वंदन* *जय श्रीकृष्ण गोविंद* *जय श्री राधे राधे* *आपका हर पल शुभ हो* *बहुत सुन्दर पोस्ट है* *एक बार जरूर पढ़ें जी* *भागवत रहस्य- गोपी* *गोपियों के दो मुख्य भेद बताये हैं* - *(१) नित्यसिध्धा गोपियाँ और (२) साधनसिध्धा गोपियाँ।* 👉 *(१) नित्यसिध्धा गोपियाँ* वह हैं, जो श्रीकृष्ण के साथ गोलोक से आईं हैं... ललिता, विशाखा,चंपकलता,चित्रा,रंगदेवी, सुदेवी, इंदुलेखा, तुंगविद्या इत्यादि... 👉 *(२) साधनसिध्धा गोपियाँ* के कई भेद हैं - 💞 *(१) श्रुतिरूपा गोपियाँ -* वेद के मन्त्र गोपी बनकर आये हैं। वेदों ने ईश्वर का वर्णन तो बहुत किया है फिर भी उन्हें अनुभव नहीं हो पाया। ईश्वर केवल वाणी का नहीं... स्मरण,चिंतन का विषय है... संसार का विस्मरण हुए बिना ईश्वर से साक्षात्कार नहीं हो पाता । तभी तो वेदभिमानी रुचायें गोकुल में गोपी बनकर आईं हैं। 💞 *(२)ऋषिरूपा गोपियाँ -* जीव का सबसे बड़ा शत्रु काम है। काम से लोभ या क्रोध उत्पन्न होता है। ऋषियों ने वर्षो तक तपश्चर्या की - फिर भी मन में से काम नहीं गया। इस काम को श्रीकृष्ण को अर्पण करने के पश्चात गोपियों का रूप लेकर आये हैं। दंडकारण्य के ऋषियों ने गोपी बनकर आये... भगवान श्रीराम जी ने दंडकारण्य के ऋषियों को ये वरदान दिया था कि- त्रेतायुग में मैं एक पत्नीव्रत धारी हुं...द्वापर युग में हम सब मिलेंगें... तब मैं सबको प्रेमदान दुंगा... 💞 *(३)संकीर्णरूपा गोपियाँ -* ईश्वर के मनोहर स्वरुप को निहारने और उन्हें पाने की इच्छा वाली स्त्रियाँ गोपियाँ बनकर आई हैं। ये भी बहुत बडे भक्त हैं...जनकपुर के नारीयां जो श्रीराम जी को देखते ही सुधबुध खो बैठे...मन ही मन पाने की इच्छा रखने वाली नारीयां गोपी बनकर आयीं...कुछ देवकन्याएं भी गोपी बन कर आयीं... जो श्रीकृष्ण भक्ति किये थे... 💞 *(४)अन्यपूर्वा गोपियाँ -* संसार के सुख भुगतने के बाद जब संसार सुख से विरक्त हो गये और प्रभु को पाने की इच्छा जाग्रत हुआ,और श्रीकृष्ण का भक्ति निष्काम भाव से करने वाले भक्तगण गोपियाँ बनकर आई हैं। 💞 *(५) अनन्यपूर्वा गोपियाँ -* जन्म से ही प्रभु से प्रेम,पूर्ण वैरागी भक्त गोपियाँ बनकर आये हैं। अनेक भोग भुगतने के पश्चात भी श्रीकृष्ण निष्काम हैं - उन्हें भोगो में तनिक भी आसक्ति नहीं है। वो तो आसक्ति मिटाने वाले हैं। श्रीकृष्ण का ध्यान करने वाला व्यक्ति स्वयं निष्काम हो जाता है। कामभाव से भी जो श्रीकृष्ण का चिंतन करता है... भक्ति करता है... परिणाम स्वरूप वह भी निष्कामी बनता है। *चीरहरण लीला के समय श्रीकृष्ण ने गोपियों से प्रतिज्ञा किया था कि योग्य समय आने पर वे रासलीला में मिलेंगे*। *जिसे भगवान अपनाते हैं, अंगीकार करते हैं उसे ही रासलीला में प्रवेश मिलता है*। *गोकुल की सभी गोपियाँ रासलीला में गई नहीं हैं। जो अधिकारी थे, उनको रासलीला में प्रवेश मिला... शरदपूर्णिमा ही वो रात्रि थी,जब गोपीयों को महारास रस मिला...प्रेमदान मिला... इसमें भगवान शंकर जी... माता पार्वती जी भी गोपी बनकर महारास रस प्राप्त किये..*. *राधे राधे*🙏🚩 🌷💐🌿🙏🌿💐🌷

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Anita Sharma Feb 28, 2021

ज्ञान वाणी। राजस्थान के हाड़ोती क्षेत्र के बूंदी नगर में रामदासजी नाम के एक बनिया थे । वे व्यापार करने के साथ-साथ भगवान की भक्ति-साधना भी करते थे और नित्य संतों की सेवा भी किया करते थे । भगवान ने अपने भक्तों (संतों) की पूजा को अपनी पूजा से श्रेष्ठ माना है क्योंकि संत लोग अपने पवित्र संग से असंतों को भी अपने जैसा संत बना लेते हैं ।भगवान की इसी बात को मानकर भक्तों ने संतों की सेवा को भगवान की सेवा से बढ़कर माना है-‘प्रथम भक्ति संतन कर संगा ।’ रामदासजी सारा दिन नमक-मिर्च, गुड़ आदि की गठरी अपनी पीठ पर बांध कर गांव में फेरी लगाकर सामान बेचते थे जिससे उन्हें कुछ पैसे और अनाज मिल जाता था । एक दिन फेरी में कुछ सामान बेचने के बाद गठरी सिर पर रखकर घर की ओर चले । गठरी का वजन अधिक था पर वह उसे जैसे-तैसे ढो रहे थे । भगवान श्रीराम एक किसान का रूप धारण कर आये और बोले—‘भगतजी ! आपका दु:ख मुझसे देखा नहीं जा रहा है । मुझे भार वहन करने का अभ्यास है, मुझे भी बूंदी जाना है, मैं आपकी गठरी घर पहुंचा दूंगा ।’ गीता (९।१४) में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है—‘संत लोग धैर्य धारण करके प्रयत्न से नित्य कीर्तन और नमन करते हैं, भक्तिभाव से नित्य उपासना करते हैं । ऐसे प्रेमी संत मेरे और मैं उनका हूँ; इस लोक में मैं उनके कार्यों में सदा सहयोग करता हूँ ।’ ऐसा कह कर भगवान ने अपने भक्त के सिर का भार अपने ऊपर ले लिया और तेजी से आगे बढ़कर आंखों से ओझल हो गये । रामदासजी सोचने लगे—‘मैं इसे पहचानता नहीं हूँ और यह भी शायद मेरा घर न जानता होगा । पर जाने दो, राम करे सो होय ।’ यह कहकर वह रामधुन गाते हुए घर की चल दिए । रास्ते में वे मन-ही-मन सोचने लगे—आज थका हुआ हूँ, यदि घर पहुंचने पर गर्म जल मिल जाए तो झट से स्नान कर सेवा-पूजा कर लूं और आज कढ़ी-चपाती का भोग लगे तो अच्छा है । उधर किसान बने भगवान श्रीराम ने रामदासजी के घर जाकर गठरी एक कोने में रख दी और जोर से पुकार कर कहा—‘भगतजी आ रहे हैं, उन्होंने कहा है कि नहाने के लिए पानी गर्म कर देना और भोग के लिए कढ़ी-चपाती बना देना ।’ कुछ देर बाद रामदासजी घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि सामान की गठरी कोने में रखी है । उनकी पत्नी ने कहा—‘पानी गर्म कर दिया है, झट से स्नान कर लो । भोग के लिए गर्म-गर्म कढ़ी और फुलके भी तैयार हैं ।’ रामदासजी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा—‘तुमने मेरे मन की बात कैसे जान ली ।’ पत्नी बोली—‘मुझे क्या पता तुम्हारे मन की बात ? उस गठरी लाने वाले ने कहा था ।’ रामदासजी समझ गए कि आज रामजी ने भक्त-वत्सलतावश बड़ा कष्ट सहा । उनकी आंखों से प्रेमाश्रु झरने लगे और वे अपने इष्ट के ध्यान में बैठ गये । ध्यान में प्रभु श्रीराम ने प्रकट होकर प्रसन्न होते हुए कहा—‘तुम नित्य सन्त-सेवा के लिए इतना परिश्रम करते हो, मैंने तुम्हारी थोड़ी-सी सहायता कर दी तो क्या हुआ ?’ रामदासजी ने अपनी पत्नी से पूछा—‘क्या तूने उस गठरी लाने वाले को देखा था?’ पत्नी बोली—‘मैं तो अंदर थी, पर उस व्यक्ति के शब्द बहुत ही मधुर थे।’ रामदासजी ने पत्नी को बताया कि वे साक्षात् श्रीराम ही थे । तभी उन्होंने मेरे मन की बात जान ली। दोनों पति-पत्नी भगवान की भक्तवत्सलता से भाव-विह्वल होकर रामधुन गाने में लीन हो गये। संदेश -गीता (८।१४) में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है— अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश: । तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: ।। अर्थात्—‘मेरा ही ध्यान मन में रखकर प्रतिदिन जो मुझे भजता है, उस योगी संत को सहज में मेरा दर्शन हो जाता है ।’

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🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠 प्राचीन समय से ही भारत में एक से बढ़कर एक धनुर्धर हुए हैं. लेकिन हमारे देश में धनुष-बाण की शुरुआत कब और कैसे हुई? यह एक रहस्य ही है. विश्व के प्राचीनतम साहित्य संहिता और अरण्य ग्रंथों में इंद्र के वज्र और धनुष-बाण का वर्णन मिलता है. वहीँ हिन्दू धर्म के 4 उपवेदों में से चौथा उपवेद धनुर्वेद का ही है. एक अन्य साहित्य में भी कुल 12 तरह के शस्त्रों का वर्णन किया गया है जिसमें धनुष-बाण का स्थान सबसे ऊपर माना गया है. आइए जानते हैं कुछ दिव्य धनुष और बाणों के बारे में. पिनाक धनुष: भगवान शंकर ने इसी धनुष के द्वारा ब्रह्मा से अमरत्व का वरदान पाने वाले त्रिपुरासुर राक्षस का संहार किया था. भगवान शंकर ने इसी धनुष के एक ही तीर से त्रिपुरासुर के तीनों नगरों को ध्वस्त कर दिया था. बाद में भगवान शंकर ने इस धनुष को देवराज इंद्र को सौंप दिया था. पिनाक नामक यह वही शिव धनुष था जिसे देवताओं ने राजा जनक के पूर्वजों को दिया था जो अंत में धरोहर के रूप में राजा जनक को प्राप्त हुआ था. इसी पिनाक नामक धनुष को भगवान राम ने प्रत्यंचा चढ़ाकर तोड़ दिया था. कोदंड धनुष: कोदंड अर्थात ‘बांस’ का बना हुआ यह धनुष भगवान राम के पास था. ऐसी मान्यता है कि इस धनुष से छोड़ा गया बाण अपना लक्ष्य भेदकर ही वापस आता था. शारंग धनुष: सींग का बना हुआ यह धनुष भगवान श्रीकृष्ण के पास था. ऐसा माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण इसी धनुष के द्वारा लक्ष्मणा स्वयंवर की प्रतियोगिता जीतकर लक्ष्मणा से विवाह किया था. गाण्डीव धनुष: यह धनुष अर्जुन के पास था. मान्यता है कि अर्जुन के गाण्डीव धनुष की टंकार से सारा युद्ध क्षेत्र गूंज जाता था. अर्जुन को यह धनुष अग्नि देवता से प्राप्त हुआ था और अग्नि देवता को यह धनुष वरुण देव से प्राप्त हुआ था. विजय धनुष: यह धनुष कर्ण के पास था. ऐसा माना जाता है कि कर्ण को यह धनुष उनके गुरु परशुराम ने प्रदान किया था. इस धनुष की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह किसी भी तरह के अस्त्र-शस्त्र से खंडित नहीं हो सकता था. जय श्री भोलेनाथ जय श्री राम जय श्री कृष्ण जय श्री हरी ॐ 🙏 ॐ नमोऽस्तुते 👏 नमस्कार शुभ रात्री वंदन 👣 💐 👏 🚩 🐚 🌹 नमस्कार 🙏 🚩 🌙✨💫💥🎪🌷🎉🕯🌹🙏🚩 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷

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RAJ RATHOD Feb 26, 2021

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गोत्र क्या है? सनातन धर्म के अंतर्गत वर्ण के साथ-साथ गोत्र को भी बेहद महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया है। जहां एक ओर समान वर्ण में विवाह करने को मान्यता प्रदान की गई है वहीं इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी बताया है कि वर-वधु का गोत्र समान ना हो.... ऐसी मानयता है कि अगर समान गोत्र वाले स्त्री-पुरुष विवाह बंधन में बंध जाते हैं तो उनकी होने वाली संतान को रक्त संबंधित समस्याएं आ सकती हैं। कई बार गोत्र के विषय में पढ़ा और सुना है..... लेकिन गोत्र क्या है ?इसके विषय में हम जानते हैं? शायद नहीं.... बहुत ही कमलोग इस बात से अवगत होंगे कि आखिर गोत्र है और इसका निर्धारण कैसे होता है। आज हम इसी सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गोत्र का शाब्दिक अर्थ बेहद व्यापक है... जिसकी समय-समय पर व्याखाया भी की जाती रही है। गोत्र शब्द की संधि विच्छेद पर ध्यान दें तो यह ‘गो’ यानि इन्द्रियां और ‘त्र’ यानि रक्षा करना से मिलकर बना है... अर्थात इन्द्रियों पर आघात से रक्षा करने वाला....जिसे “ऋषि” कहा जाता है। सनातन धर्म से संबंधित दस्तावेजों पर नजर डालें तो प्राचीनकाल में चार ऋषियों के नाम से गोत्र परंपरा की शुरुआत हुई, जिनके नाम ऋषि अंगिरा, ऋषि कश्यप, ऋषि वशिष्ठ और ऋषि भृगु हैं... कुछ समय पश्चात इनमें ऋषि जमदग्नि, ऋषि अत्रि, ऋषि विश्वामित्र और ऋषि अगस्त्य भी इसमें जुड़ गए। प्रैक्टिकल तौर पर देखा जाए तो गोत्र का आशय पहचान से है... यानि कौनसा व्यक्ति किस ऋषि का वंशज है। सामाजिक तौर पर देखा जाए तो 'गोत्र' की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ‘एकत्रीकरण’ से संबंध रखता है। ॐ गं गणपतये नमः 👏 ॐ नम :शिवाय ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री भोलेनाथ ॐ सूर्याय नमः 🌅 👏 🌹 🚩 फेब्रुवारी महिने का आखरी दिवस 28 शुभ 🌅 रविवार जय श्री सुर्य नारायण 🌅 👣 💐 👏 ॐ नमो नारायणाय नमस्कार 🙏 🚩

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*यदि स्वयं सुख चाहते हो तो दूसरों को दुख मत दो. क्योंकि दूसरों को दुख दोंगे तो कई गुना लौट कर आएगा. आज नहीं तो कल. यह प्रकृति का सनातन नियम है.* ---------------------------------------------- महाकारुणिक बुद्ध कहते हैं, 'इस जगत में सभी प्राणी सुख से जीना चाहते हैं. सभी दुखों से मुक्ति चाहते हैं. सभी को अपनी जान प्यारी है इसलिए दूसरों को मन, वाणी व शरीर से दुख मत दो. दिलों को चोट मत पहुंचाओ और न ही दुख देने के लिए किसी को प्रेरित करो. यही सबसे बड़ा धम्म है. यही सच्ची मानवता है.' तथागत बुद्ध इस बात पर जोर देते हैं कि यदि तुम स्वयं सुख शांति चाहते हो, स्वयं का भला चाहते हो तो दूसरों का बुरा मत करो, दूसरों को दुख मत दो, दूसरों को मत सताओ. इसका फल इसी जीवन में आज नहीं तो कल, जरूर मिलता है. यह सनातन नियम है, सदियों से चला आ रहा प्रकृति का नियम है. एस धम्मो सनंतनो. मनुष्य, पशु पक्षी तो क्या वृक्ष भी सुख की कामना करता है. वह भी चोट, भूख व प्यास के मारे तड़पता है, कुम्हलाता है इसलिए उसे भी पीड़ा मत पहुंचाओ, वह भी सुख की वर्षा होने पर लहलहाता है. फूलों की खुशबू से प्रकृति को सरोबार करता है. सतरंगी रंगों से उल्लास व आनंद बिखेरता है. इसलिए किसी भी प्राणी या वनस्पति को चोट मत पहुंचाओ, दुख मत दो. और यदि किसी को दुख दोगे तो दुख तुम्ही पर वापस आएगा, वह भी बढ़कर और तुम सुख की नींद नहीं सो पाओंगे. भगवान बुद्ध कहते है, सुख से रहना प्रकृति के सभी जीवों का स्वभाव है दुख तो मनुष्य पहुंचाता है इसलिए दूसरों को अपनी तरह समझो. जो तुम खुद के लिए नहीं चाहते हो, वह दूसरों के लिए मत करो. यही प्रेम है. तुम दूसरों को सुख देने की बात छोड़ो. बस, इतनी मेहरबानी कर लो कि दूसरों को दुख मत दो. दूसरों की राह में कांटे मत बिछाओ क्योंकि फूल तो अपने आप खिल जाएंगे, खिलना तो उनका स्वभाव है. सुख भी मनुष्य का स्वभाव है इसलिए तुम किसी के सुख की राह में रोड़ा मत बनो. उसको आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक व शारीरिक दुख मत दो.किसी को भोजन भले ही मत खिलाओ लेकिन उसके मुंह से निवाला तो मत छीनो, शोषण की पीड़ा की गहरी चोट मत पहुंचाओ. किसी के आंसू नहीं पोंछ सकते हो तो कोई बात नहीं, रुलाओ तो मत. यदि तुमने किसी को दुख नहीं दिया तो उसके जीवन में आनंद की रसधारा जरूर बहेगी. पद, पैसा व प्रतिष्ठा पाने के स्वार्थ व स्वयं के सुख के लिए दूसरों की छाती पर चढ़ कर आगे मत बढ़ो, दूसरों का सुख मत छिनो. अपने अहंकार में किसी को चोट मत पहुंचाओ, शोषण मत करो, बुरा मत करो, दुख मत दो, किसी प्राणी को मत सताओ क्योंकि तुम्हारी तरह सभी सुख शांति से जीना चाहते हैं. सब्बे तसन्नति दण्डस्स सब्बेस जीवितं पियं। अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये।।....धम्मपद *सबका मंगल हो..सभी प्राणी सुखी हो.* जय श्री कृष्णा जय जगन्नाथ..🙏

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