साष्टांग प्रणाम का महत्व ।

साष्टांग प्रणाम का महत्व ।

साष्टांग प्रणाम का महत्त्व
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वैसे आजकल पैरों को हल्का सा स्पर्श कर लोग चरण स्पर्श की औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। कभी-कभी पैरों को स्पर्श किए बिना ही चरण स्पर्श पूरा कर लिया जाता है। मंदिर में जाकर भगवान की मूर्ति के सामने माथा टेकने में भी आजकल लोग कोताही बरतते हैं। खैर ये तो सब आधुनिक तकनीक हैं, लेकिन कभी आपने उन लोगों को देखा है जो जमीन पर पूरा लेटकर माथा टेकते हैं, इसे साष्टांग दंडवत प्रणाम कहा जाता है।
यह एक आसन है जिसमें शरीर का हर भाग जमीन के साथ स्पर्श करता है, बहुत से लोगों को यह आसन आउटडेटेड लग सकता है लेकिन यह आसन इस बात का प्रतीक है व्यक्ति अपना अहंकार छोड़ चुका है। इस आसन के जरिए आप ईश्वर को यह बताते हैं कि आप उसे मदद के लिए पुकार रहे हैं। यह आसन आपको ईश्वर की शरण में ले जाता है।
इस तरह का आसन सामान्य तौर पर पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। क्या आप जानते हैं शास्त्रों के अनुसार स्त्रियों को यह आसन करने की मनाही है, जानना चाहते हैं क्यों?
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार स्त्री का गर्भ और उसके वक्ष कभी जमीन से स्पर्श नहीं होने चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि उसका गर्भ एक जीवन को सहेजकर रखता है और वक्ष उस जीवन को पोषण देते हैं। इसलिए यह आसन स्त्रियों को नहीं करना चाहिए।
धार्मिक दृष्टिकोण के अलावा साष्टांग प्रणाम करने के स्वास्थ्य लाभ भी बहुत ज्यादा हैं। ऐसा करने से आपकी मांसपेशियां पूरी तरह खुल जाती हैं और उन्हें मजबूती भी मिलती है।
साष्टांग प्रणाम
पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरस्तथा।
मनसा वचसा दृष्टया प्रणामोऽष्टाङ्ग मुच्यते॥

हाथ, पैर, घुटने, छाती, मस्तक, मन, वचन, और दृष्टि इन आठ अंगों से किया हुआ प्रणाम अष्टांग नमस्कार कहा जाता है।
साष्टांग आसन में शरीर के आठ अंग ज़मीन का स्पर्श करते हैं अत: इसे ‘साष्टांग प्रणाम’ कहते हैं। इस आसन में ज़मीन का स्पर्श करने वाले अंग ठोढ़ी, छाती, दोनो हाथ, दोनों घुटने और पैर हैं। आसन के क्रम में इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि पेट ज़मीन का स्पर्श नहीं करे। विशेष नमस्कार मन, वचन और शरीर से हो सकता है। शारीरिक नमस्कार के छः भेद हैं-

👉 केवल सिर झुकाना।
👉 केवल हाथ जोड़ना।
👉 सिर झुकाना और हाथ जोड़ना।
👉 हाथ जोड़ना और दोनों घुटने झुकाना।
👉 हाथ जोड़ना, दोनों घुटने झुकाना और सिर झुकाना।
👉 दंडवत प्रणाम जिसमें आठ अंग (दो हाथ, दो घुटने, दो पैर, माथा और वक्ष) पृथ्वी से लगते हैं। और जिसे ‘साष्टांग प्रणाम’ भी कहा जाता है।

प्रणाम करना भक्ति का २५वां अंग है। इस प्रणाम में सर्वतो भावेन आत्मसमर्पण की भावना है। इसमें भक्त अपने को नितांत असहाय जानकार अपने शरीर इन्द्रिय मन को भगवान् के अर्पण कर देता है। जब शरीर को इसी अवस्था में मुंह के बल भूमि पर लिटा दिया जाए तो इसे ‘साष्टांग प्रणाम’ कहते हैं। शरीर की इस मुद्रा में शरीर के छ: अंगों का भूमि से सीधा स्पर्श होता है अर्थात् शरीर मे स्थित छ: महामर्मो का स्पर्श भूमि से हो जाता है जिन्हें वास्तुशास्त्र में "षण्महांति" या "छ: महामर्म" स्थान मानाजाता है। ये अंग वास्तुपुरुष के महामर्म इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि ये शरीर (प्लॉट) के अतिसंवेदनशील अंग होते हैं।
योगशास्त्र में इन्हीं छ: अंगों में षड्चक्रों को लिया जाता है। षड्चक्रों का भूमि से स्पर्श होना इन चक्रों की सक्रियता और समन्वित एकाग्रता को इंगित करता है।
प्रणाम की मुद्रा में व्यक्ति सभी इंद्रियों (पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँचों कर्मेद्रियाँ) को कछुए की भाँति समेटकर अपने श्रद्धेय को समर्पित होता है। उसे ऎसा आभास होता है कि अब आत्म निवेदन और मौन श्रद्धा के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं करना। इसे विपरीत श्रद्धेय जब अपने प्रेय (दंडवत प्रणाम करने वाला) को दंडवत मुद्रा में देखता है तो स्वत: ही उसके मनोविकार या किसी भी प्रकार की दूषित मानसिकता धुल जाती है और उसके पास रह जाता है केवल त्याग, बलिदान या अर्पण। यहाँ पर श्रेय और प्रेय दोनों ही पराकाष्ठा का समन्वय ‘साष्टांग प्रणाम’ के माध्यम से किया गया है।

हरिॐतस्मैं श्रीगुरुवै नमः✏✏✏✏

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Swami Lokeshanand Aug 10, 2020

दुख मन की अवस्था विशेष का नाम है। देह का कष्ट दर्द नाम से जाना जाता है, मन का कष्ट दुख नाम से जाना जाता है। हो सकता है कि किसी को दर्द हो पर वह कोई दुख न मानता हो, और ऐसा भी हो सकता है कि किसी को कोई दर्द न हो पर वह दुखी हो। दुख का एकमात्र कारण है, अपना प्रेम संसार में लगा देना, और एकमात्र निवारण है वह प्रेम भगवान से लगा रखना। विभीषण दुखी है, कहता है- हनुमानजी! मैं इन राक्षसों के बीच ऐसे फंसा हूँ, जैसे दाँतों के बीच जीभ। जैसे दाँत जीभ को जब तब यहाँ वहाँ काटते रहते हैं, ये मुझे त्रस्त किए रहते हैं, मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता। अब हमारे भैया हनुमानजी तो हैं ही "नासै रोग मिटे सब पीरा" हनुमानजी कहते हैं चिंता मत करो, दो काम करो, एक तो वह स्थान दिखा दो जहाँ सीताजी बंदी हैं, माने यह बता दो कि तुम्हारा प्रेम संसार में कहाँ लगा है? दूसरे, तुम राम का नाम तो लेते ही हो, राम का काम भी करो। कौन सा काम? रावण आदि का विरोध करना, माने अपने अंत:करण के दोषों का शमन करना। तुम मूक दर्शक बने हो, अनाचार का विरोध नहीं करते। बस ये दो काम करो, दाँतों की चिंता मत करो। दाँत आते जीभ के बाद हैं, पर जाते पहले हैं। और जीभ बस जरा सा बोल जाए, दाँत टूटने में क्या देर लगती है? तुम बोलो तो! कुछ दिनों के बाद, सागर किनारे, इन दाँतों के विशेषज्ञ डा० रामचन्द्र का कैम्प लगेगा, बस तुम आ जाना। वे सारे दाँत निकाल देंगे, तब पूरे मुंह पर अकेली जीभ का ही राज होगा। माने लंका पर तुम्हारा राज होगा। लोकेशानन्द कहता है कि मोह की सत्ता को चुनौती देते हुए, अपना प्रेम संसार से निकाल कर, श्री राम के चरणों में लगा रखना ही राम काज है। आप भी हनुमानजी का यह मंत्र वैसे ही मान लो, जैसे विभीषण ने माना। विभीषण ने हनुमानजी को सीताजी का पता बता दिया और रावण का विरोध करने का संकल्प कर लिया। देखें विडियो- डा० रामचन्द्र https://youtu.be/rY3hhn10Ihk

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*A Useful Post for Human Being's Health.... *जय श्री राधेकृष्णा 🙏🌷 *शुभ प्रभात् नमन*🙏🏻🌷 *बाई करवट लेटने के लाभ* 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ *शरीर के लिए सोना बेहद जरूरी होता है। अच्छी सेहत के लिए शरीर को आराम देना कई तरह की बीमारियों से बचाता है। सोते समय हम कई बार करवट बदलकर सोते हैं जिसका हमारे शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। किसी भी इंसान के लिए एक तरफ करवट लेकर सोए रहना नामुमकिन है। लेकिन क्या आपको पता है बांए ओर करवट लेने से आपको कई तरह के फायदे मिल सकते हैं। *बांए ओर करवट लेकर सोने के फायदे..... *आयुर्वेद में शरीर को बीमारियों से बचाने के लिए बाएं ओर करवट लेकर सोने के बारे में बताया गया है। जिसे आज के वैज्ञानिकों ने शोध के आधार पर इसे माना है। शोध के अनुसार बाएं ओर करवट बदलकर सोने से पेट फूलने की समस्या, दिल के रोग, पेट की खराबी और थकान जैसी समस्याएं दूर होती हैं। यदि आप बाएं की जगह दाएं तरफ करवट लेकर सोते हैं तो इससे शरीर से टाक्सिन सही तरह से निकल नहीं पाते हैं और दिल पर जोर ज्यादा पड़ता है साथ ही पेट की बीमारी भी लगने लगती हैं। कई बार तो हार्ट रेट भी बढ़ सकता है। *सीधे लेटे रहने से भी इंसान को ठीक तरह से सांस लेने में परेशानी होती है। ज्यादातर वे लोग जिन्हें दमा या अस्थमा और स्लीप एपनिा की दिक्कत हो। उनको रात में सीधा नहीं लेटना चाहिए। इसलिए बांए ओर करवट लेकर सोने की आदत डालनी चाहिए। *किडनियां और लीवर के लिए..... *बाएं ओर करवट बदलकर सोने से लीवर और किडनियां ठीक तरह से काम करती हैं। शरीर से गंदगी को साफ करने में लीवर और किड़नी बेहद अहम भूमिका निभाती हैं इसलिए इन पर ज्यादा दबाव नहीं डालना चाहिए। *पाचन में सुधार...... *शरीर तभी ठीक रहता है जब आपका पाचन तंत्र ठीक हो। एैसे में बाएं तरफ करवट लेने से आपके पाचन तंत्र को फायदा मिलता है। और खाया हुआ खाना भी आसानी से पेट तक पहुंचता है जो ठीक से हजम भी हो जाता है। इसके अलावा एक ओर फायादा यह है कि बदहजमी की दिक्कत भी दूर हो जाती है। *खतरनाक बीमारियों से बचाव....... *बाएं ओर करवट लेने से शरीर पर जमा हुआ टाक्सिन धीरे-धीरे निकलने लगता है और इस वजह से शरीर को लगने वाली खतरनाक बीमारियां नहीं होती हैं। *एसिडिटी में फायदा...... *सीने में जलन और एसिडिटी की समस्या को दूर करता है बायीं ओर करवट लेकर सोना। क्योंकि इस तरीके से पेट में मौजूद एसिड उपर की जगह से नीचे आने लगता है जिस वजह से सीने की जलन और एसिडिटी की परेशानी में फायदा मिलता है। *पेट को आराम...... *बांए ओर सोने से पेट को आराम मिलता है। क्योंकि इस पोजिशन में सोने से भोजन छोटी आंत से बड़ी आंत तक आसानी से पहुंच जाता है जिस वजह से सुबह आपका पेट खुलकर साफ होता है। *दिल की परेशानी में..... *बाएं ओर करवट बदलकर सोने से दिल से संबंधित परेशानियां दूर होती हैं क्योंकि इस अवस्था में सोने से दिल तक खून की पूर्ती बेहद अच्छे तरह से होती है जिसकी वजह से आक्सीजन और खून की सप्लाई आराम से दिमाग और शरीर तक पहुंचती है जो इंसान को दिल की बीमारी यानि कि हार्ट अटैक जैसे गंभीर रोग से बचा सकती है। *गलत तरीकों से सोना कई बीमारियों जैसे सिर दर्द, पीठदर्द, माइग्रेन, थकान व दर्द को न्योता देता है । अच्छी स्लीपिंग पोजीशन इंसान को स्मार्ट और सेहतमन्द बनाती है इसलिए अपने सोने के तरीके को बदलें और हमेशा स्वस्थ रहें। [*वर्षा ऋतु के समय बच्चों को गले और पेट में होने वाली समस्या से बचाने के लिए स्वादिष्ट औषधि* 1-सोंठ 1/2चम्मच 2-अजवाइन पाउडर 1/3 3-काला नमक 2 चुटकी 4- 20ग्राम गुड़ लगभग *ये एक बार की मात्रा है* इसे गुड़ में मिलाकर छोटी छोटी गोलियां बना लें* दिन में 2 अथवा 3 गोली चूसने के लिए दें* *गले मे दर्द के लिये आसान उपाय* गले के दर्द में 2चम्मच प्याज रस गर्मजल से कभी भी ले *शरीर या हाथ पैरों में सूनापन* जिन लोगो को ये परेशानी है वो लोग पीपल के पत्ते को पानी मे उबालकर उस पानी से कुछ दिन स्नान करे तो ये समस्या बिल्कुल ठिक हो जाएगी। वंदेमातरम।।। पवन गौड़।। [: *आँखों पर गुहेरी हो जाना* *जिस साइड की आंख पर हो उसके विपरीत वाले पैर के अँगूठे के नाखून पर आक का दूध लगाए।* वन्देमातरम। राजीव दीक्षित जी अमर रहे।।। [ *रक्त प्रदर के लिए घरेलू उपचार* लौकी/दुधीके बीजों को छीलकर उनका हलवा बनाकर सुबह ख़ाली पेट खाने से रक्त प्रदर दूर होता है। वंदेमातरम।।। : *🌹वात्त्, पित्त, कफ...??🌹* *अर्ध रोग हरि निद्रा,पूर्ण रोग हरि क्षुधा* अच्छी नींद आये तो, आधे रोग हर लिए जाते है।। *पित्त संबंधी रोग* रात्रि जागरण से पित्त की तकलीफ होती है। पित्त ज्यादा होने से रात्रि 12 बजे निन्द खुल जाती है।। 🌷 *उपाय* 🌷 🍁पित्त के रोगी को दूध पर रहना चाहिए।। 🍁सेव फल का सेवन करना चाहिए। 🍁त्रिफला सेवन करना चाहिए। *कफ संबंधी रोग* रोगी को प्रभात में खांसी उठती है और नींद टूट जाती है।| 🌷 *उपाय* 🌷 🍁कफ नाशक चीज़ों का सेवन करे जैसे चने,ममरे आदि।। 🍁बेसन से बनी चीजों का सेवन करने से लाभ होता है।। 🍁1 लीटर गुनगुने पानी में 10 ग्राम नामक डालकर खारा पानी पीये और फिर वमन (उल्टी) करने से कफ संबंधी दमा ,कफ आदि कीटाणु का नाश होता है।। *वायु सम्बंधी रोग* 🌒रोगी की नींद रात्रि 2 से 2:30 के समय खुल जाती हैं।। *उपाय* 🍁गोझरण के सेवन से 50 प्रकार के वायु सम्बंधी रोग नष्ट होते है।। 🍁गोझरण ३०मीली,१कटोरी पानी, इससे वायू एवं कफ संबधी रोग ठीक होते हैं| 🍁42 वर्ष की आयु के बाद त्रिफला या रसायन चूर्ण का नियमित रूप से सेवन करना चाहिये जिससे किडनी,लिवर,पेशाब सम्बन्धी तकलीफे न हो।। सिर पर और 👣 पर गाय के घी से रात्रि को मालिश करे।। *प्रगाढ़ नींद से आधे रोग नही होते है और उपवास से पूर्ण रोग खीच कर जठरा में स्वाहा हो जाते है*।। *उपवास में कमजोरी महसूस होने पर शहद के पानी,अंगूर के रस या अंगूर का सेवन करना चाहिए*।। *तुलसी के पत्ते रविवार को छोड़कर रोज सेवन करना चाहिये*।। *दोपहर के बाद फूल -पत्ते या तुलसी को तोड़ने से पाप लगता है ऐसा हमारे पुराणों में वर्णित है*।। 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ ************************* 🍃 *Arogya* 🍃 *सावन व भादों मास में खाने पीने का परहेज़* *-----------------------------------* 1. दूध ,दही लस्सी न लें । 2. हरे पत्ते वाली सब्ज़ी न खाएँ । 3. रसदार फल न लें । आम न खाएँ । 4. बैंगन ,लौकी न खाएँ । 5. गाजर मूली चुकंदर ककड़ी खीरा न खाएँ । 6. बाजार से फ़ास्ट फ़ूड न खाएँ। 7. मिठाईयां न खाएँ । 8. किसी प्रकार का माँस व मदिरा न लें । 9. तेज़ खट्टा न खाएँ । 10. ठंडी व बासी चीज़ न खाएँ । 11. आइसक्रीम एवं कोल्ड ड्रिंक का सेवन ना करेंl#आयुर्वेदा *फिर क्या खाएँ ।* -------------------- 1. पनीर , मटर की सब्ज़ी ,दालें सभी खा सकते हैं । 2. गाजर टमाटर का सूप , 3. अदरक,प्याज़ ,लस्सन, 4. सेब ,अनानास,बेल फल ,नारियल । 5. बेकरी व भुजिया products., 6. जलेबी , थोड़ा गर्म गुलाब जामुन व हलवाl 7. बेसन का ज़्यादा प्रयोग करें । 8. पानी उबाल कर , ताज़ा कर के पीएँ । 9. हल्दी वाला गर्म दूध ले सकते हैं । 10. देसी चाय ले सकते है । ब्राह्मी चाय या इम्यून चाय का सेवन इस मौसम में बहुत ही चमत्कारिक लाभ दिखाता हैl 11. विटामिन सी से युक्त आंवले से भरपूर रसायनप्राश का सेवन भी ऐसे मौसम में बहुत लाभ देता है *ध्यान रखें* इन दो महीनों व वर्षा ऋतु में ज्ठराग्नि ( पाचन शक्ति ) कमज़ोर व मंद होती है । इसलिए वात पित् व कफ रोग बड़ जाता है ।इस ऋतु में वर्षा के कारण जलवायु में कई प्रकार के विषाक्त कीटाणुओं का सब्ज़ियों व फलों पर व ठंडे पेय पदार्थों पर हमला हो जाता है जो कि मनुष्य ,पशु ,जानवरों ,पंछियों व पानी में रहने वाले जीवों को भी नुक्सान करता है इसलिए पानी भी उबाल कर पीएँ । तलाब व खड़े पानी व नदी दरिया के पानी में न नहाएँ ।अगर नहाना पड़ जाए तो बाद में नीम् युक्त साबुन से नहाएँ नहीं तो पित रोग का ख़तरा है । *जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌷 *कहानी* *सभी बहनों को समर्पित* क्या बहन बेटियाँ मायके सिर्फ लेने के लिए आती हैं खिडकी के पास खड़ी सिमरन सोचती हैं राखी आने वाली है पर इस बार न तो माँ ने फोन करके भैया के आने की बात कही और न ही मुझे आने को बोला ऐसा कैसे हो सकता है।हे भगवान बस ठीक हो सबकुछ।अपनी सास से बोली माँजी मुझे बहुत डर लग रहा है।पता नहीं क्या हो गया।मुझे कैसे भूल गए इस बार।आगे से सास बोली कोई बात नही बेटा तुम एक बार खुद जाकर देख आओ।सास की आज्ञा मिलनेभर की देर थी सिमरन अपने पति साथ मायके आती हैं परंतु इस बार घर के अंदर कदम रखते ही उसे सबकुछ बदला सा महसूस होता है।पहले जहाँ उसे देखते ही माँ-पिताजी के चेहरे खुशी से खिल उठते थे इसबार उनपर परेशानी की झलक साफ दिखाई दे रही थी, आगे भाभी उसे देखते ही दौडी चली आती और प्यार से गले लगा लेती थी पर इसबार दूर से ही एक हल्की सी मुस्कान दे डाली।भैया भी ज्यादा खुश नही थे।सिमरन ने जैसे-तैसे एक रात बिताई परन्तु अगले दिन जैसे ही उसके पति उसे मायके छोड़ वापिस गये तो उसने अपनी माँ से बात की तो उन्होंने बताया इसबार कोरोना के चलते भैया का काम बिल्कुल बंद हो गया।ऊपर से और भी बहुत कुछ।बस इसी वजह से तेरे भैया को तेरे घर भी न भेज सकी।सिमरन बोली कोई बात नहीं माँ ये मुश्किल दिन भी जल्दी निकल जाएँगे आप चिंता न करो।शाम को भैया भाभी आपस में बात कर रहे थे जो सिमरन ने सुन ली।भैया बोले पहले ही घर चलाना इतना मुश्किल हो रहा था ऊपर से बेटे की कॉलेज की फीस,परसो राखी है सिमरन को भी कुछ देना पड़ेगा।आगे से भाभी बोली कोई बात नहीं आप चिंता न करो।ये मेरी चूड़ियां बहुत पुरानी हो गई हैं।इन्हें बेचकर जो पैसे आएंगे उससे सिमरन दीदी को त्योहार भी दे देंगे और कॉलेज की फीस भी भर देंगे।सिमरन को यह सब सुनकर बहुत बुरा लगा।वह बोली भैया-भाभी ये आप दोनों क्या कह रहे हो।क्या मैं आपको यहां तंग करके कुछ लेने के लिए ही आती हुँ।वह अपने कमरे में आ जाती हैं।तभी उसे याद आता है अपनी शादी से कुछ समय पहले जब वह नौकरी करती थी तो बड़े शौक से अपनी पहली तनख्वाह लाकर पापा को दी तो पापा ने कहा अपने पास ही रख ले बेटा मुश्किल वक़्त में ये पैसे काम आएंगे।इसके बाद वह हर महीने अपनी सारी तनख्वाह बैंक में जमा करवा देती।शादी के बाद जब भी मायके आती तो माँ उसे पैसे निकलवाने को कहती पर सिमरन हर बार कहती अभी मुझे जरूरत नही,पर आज उन पैसों की उसके परिवार को जरुरत है।वह अगले दिन ही सुबह भतीजे को साथ लेकर बैंक जाती है और सारे पैसे निकलवा पहले भतीजे की कॉलेज की फीस जमा करवाती है और फिर घर का जरूरी सामान खरीद घर वापस आती है।अगले दिन जब भैया के राखी बांधती है तो भैया भरी आँखी से उसके हाथ सौ का नोट रखते है।सिमरन मना करने लगती है तो भैया बोले ये तो शगुन है पगली मना मत करना।सिमरन बोली भैया बेटियां मायके शगुन के नाम पर कुछ लेने नही बल्कि अपने माँबाप कीअच्छी सेहत की कामना करने,भैया भाभी को माँबाप की सेवा करते देख ढेरों दुआएं देने, बडे होते भतीजे भतीजियो की नजर उतारने आती हैं।जितनी बार मायके की दहलीज पार करती हैं ईश्वर से उस दहलीज की सलामती की दुआएं माँगती हैं।जब मुझे देख माँ-पापा के चेहरे पर रौनक आ जाती हैं, भाभी दौड़ कर गले लगाती है, आप लाड़ लड़ाते हो,मुझे मेरा शगुन मिल जाता हैं।अगले दिन सिमरन मायके से विदा लेकर ससुराल जाने के लिए जैसे ही दहलीज पार करती हैं तो भैया का फोन बजता है।उन्हें अपने व्यापार के लिए बहुत बड़ा आर्डर मिलता है और वे सोचते है सचमुच बहनें कुछ लेने नही बल्कि बहुत कुछ देने आती हैं मायके और उनकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगते है। सचमुच बहन बेटियाँ मायके कुछ लेने नही बल्कि अपनी बेशकीमती दुआएं देने आती हैं।जब वे घर की दहलीज पार कर अंदर आती हैं तो बरक़त भी अपनेआप चली आती हैं।हर बहन बेटी के दिल की तमन्ना होती हैं कि उनका मायका हमेशा खुशहाल रहे और तरक्की करे।मायके की खुशहाली देख उनके अंदर एक अलग ही ताकत भर जाती हैं जिससे ससुराल में आने वाली मुश्किलो का डटकर सामना कर पाती है।मेरा यह लेख सभी बहन बेटियों को समर्पित है और साथ ही एक अहसास दिलाने की कोशिश है कि वे मायके का एक अटूट हिस्सा है।जब मन करे आ सकती हैं।उनके लिए घर और दिल के दरवाजे़ हमेशा खुले रहेंगें। ************************************************ 🍁*आज का सुविचार*🍁 🏯🌺✨👏🕉️👏✨🌺🏯 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, जो देश की एकता एवं अखंडता के लिए बहुत जरूरी है। प्राणी मात्र की सेवा करना ही विराट ब्रह्म की आराधना है। प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है - "ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता: ..."। अर्थात्, जो सब जीवों का हित-चिंतन करते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें, सेवाभावी बनें। विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवाव्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिंता रहती है, वे व्यक्ति सेवा-कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते। सेवाव्रती का हृदय करुणा और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहयता बढ़ती जाती है। दीन-दु:खियों की सेवा, निर्बलों की रक्षा और रोगियों की सहायता ही सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवाव्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्ट हो जाती है। मन शुद्ध हो तो अपने-पराये में भेद नहीं रहता। जब वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, तब 'सत्' को अपनाना और 'शुद्ध संकल्पों' में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता है और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परम तत्व के अस्तित्व का बोध होता है। अहम् का शोधन होने पर मान-अपमान की चिंता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है। अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है। सेवा द्वारा सुखों के उपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है। अत: सब प्राणियों में परमात्मा को स्थित मानते हुए निष्काम सेवा करना ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण संबंधों को समाप्त कर देती है। इसलिए केवल किसी को अपना मानकर सेवा न करें, बल्कि सेवा को कर्त्तव्य मानकर सभी की सेवा करें; क्योंकि परमात्मा के अंशभूत होने के कारण सभी प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है ...। 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀ 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣 *👣🙏🏻🌼*जय राधे कृष्णा*🌼🙏🏻🕉* 🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣

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Swami Lokeshanand Aug 9, 2020

आज का प्रसंग जीव और संत के मिलन का है। यह प्रसंग हम सब के लिए आश्वासन रूप है। आएँ, विभीषण की अवस्था का विचार करें। क्योंकि जो विभीषण की अवस्था है, न्यूनाधिक हमारी अवस्था भी वैसी ही है। जीव रूपी विभीषण, देह रूपी लंका में रहता है। पर वह क्रोध रूपी कुंभकर्ण, काम रूपी मेघनाद और वासना रूपी सूर्पनखा से घिरा, मोह रूपी रावण के आधीन है। जीव इस देह का असली मालिक होते हुए भी, मोह आदि वृत्तियों का गुलाम है। ये वृत्तियाँ दिन रात उसे जैसा चाहें वैसा नचाती हैं। किम्कर्तव्यविमूढ़ बना जीव, अपने को दीन हीन मानकर, न चाहते हुए भी, पापाचार का मौन समर्थक बना, जन्मजन्मान्तर से, जन्म मरण के बंधन में पड़ा है। उसके कोटि जन्मों में किए सत्कर्मों के फल स्वरूप, भगवान उसके बैठे बिठाए ही, किसी संत को उसके दरवाजे तक पहुँचा देते हैं। पर दुर्भाग्यवश कितने ही विभीषण, संत को संत न जान कर, अपने लाखों जन्मों के बाद मिले, ऐसे अमृत तुल्य लाभ से वंचित ही रह जाते हैं। देखो संत को किसी से धन नहीं चाहिए, जिसे धन चाहिए वो कैसा संत? सच्चा संत तो श्रद्धा चाहता है। संत तो झाड़ू मारने वाले हैं, उनका उपदेश ही झाड़ू है। वे तो बदले में कुछ भी चाहे बिना, आपके हृदय नगर में झाड़ू मार कर, उसमें रहने वाले काम क्रोध मोह आदि को निकाल बाहर कर, आपके हृदय को भगवान के रहने योग्य बना देते हैं। जो मनुष्य श्रद्धा रूपी कीमत चुकाने को तैयार हो, जो क-पट रहित होने को तैयार हो, माने अपने हृदय के दरवाजे संत के लिए खोलने को तैयार हो, उसके भगवान से मिलने में, न कोई संशय कभी था, न है, न होने की संभावना है। एक बार कोई मनुष्य किन्हीं संत को अपना बना ले, प्रसन्न कर ले, तो- "भाविहु मेटि सकहिं त्रिपुरारि" फिर बंधन रहता ही नहीं। देखें विभीषण ने उन्हें कैसे प्रसन्न किया? हनुमानजी ने "राम" लिखा मंदिर देखा तो विचार करने लगे कि यहाँ तो सब मोह के आधीन हैं, यहाँ सज्जन कहाँ से आ गया? इधर संत दरवाजे पर पहुँचा, कि उधर मोह रूपी रात्रि में सोए जीव के जागने का समय आया। विभीषण जागा, उसने कुछ ऐसा किया कि- "हृदय हरष कपि सज्जन चीन्हा" हनुमानजी हृदय में हर्षित हो गए, प्रसन्न हो गए, और उन्होंने विभीषण को सज्जन पहचान लिया। जो विभीषण ने किया, हम भी वही करते चलें। न मालूम कब, हम पर भी भगवान की कृपा बरस जाए- "राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा" जीवन के सब कार्य करते हुए, हम भी राम नाम जपते चलें। अब विडियो- हनुमान जी की प्रसन्नता https://youtu.be/us6gLhSAxQA हनुमानजी को प्रसन्न कैसे करें? https://youtu.be/ImEy3gIr05g

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गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए,, मंत्र जाप में अशुद्ध उच्चारण का प्रभाव 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 कई बार मानव अपने जीवन में आ रहे दुःख ओर संकटो से मुक्ति पाने के लिये किसी विशेष मन्त्र का जाप करता है.. लेकिन मन्त्र का बिल्कुल शुद्ध उच्चारण करना एक आम व्यक्ति के लिये संभव नहीं है । कई लोग कहा करते है.. कि देवता भक्त का भाव देखते है . वो शुद्धि अशुद्धि पर ध्यान नही देते है.. उनका कहना भी सही है, इस संबंध में एक प्रमाण भी है... "" मूर्खो वदति विष्णाय, ज्ञानी वदति विष्णवे । द्वयोरेव संमं पुण्यं, भावग्राही जनार्दनः ।। भावार्थ:-- मूर्ख व्यक्ति "" ऊँ विष्णाय नमः"" बोलेगा... ज्ञानी व्यक्ति "" ऊँ विष्णवे नमः"" बोलेगा.. फिर भी इन दोनों का पुण्य समान है.. क्यों कि भगवान केवल भावों को ग्रहण करने वाले है... जब कोइ भक्त भगवान को निष्काम भाव से, बिना किसी स्वार्थ के याद करता है.. तब भगवान भक्त कि क्रिया ओर मन्त्र कि शुद्धि अशुद्धि के ऊपर ध्यान नही देते है.. वो केवल भक्त का भाव देखते है... लेकिन जब कोइ व्यक्ति किसी विशेष मनोरथ को पूर्ण करने के लिये किसी मन्त्र का जाप या स्तोत्र का पाठ करता है.. तब संबंधित देवता उस व्यक्ति कि छोटी से छोटी क्रिया ओर अशुद्ध उच्चारण पर ध्यान देते है... जेसा वो जाप या पाठ करता है वेसा ही उसको फल प्राप्त होता है...। एक बार एक व्यक्ति कि पत्नी बीमार थी । वो व्यक्ति पंडित जी के पास गया ओर पत्नी कि बीमारी कि समस्या बताई । पंडित जी ने उस व्यक्ति को एक मन्त्र जप करने के लिये दिया । मन्त्र:- ""भार्यां रक्षतु भैरवी"" अर्थात हे भैरवी माँ मेरी पत्नी कि रक्षा करो । वो व्यक्ति मन्त्र लेकर घर आ गया । ओर पंडित जी के बताये मुहुर्त में जाप करने बेठ गया.. जब वो जाप करने लगा तो "" रक्षतु"" कि जगह "" भक्षतु"" जाप करने लगा । वो सही मन्त्र को भूल गया । "" भार्यां भक्षतु भैरवी"" अर्थात हे भैरवी माँ मेरी पत्नी को खा जाओ । "" भक्षण"" का अर्थ खा जाना है । अभी उसे जाप करते हुये कुछ ही समय बीता था कि बच्चो ने आकर रोते हुये बताया.. पिताजी माँ मर गई है । उस व्यक्ति को दुःख हुआ.. साथ ही पण्डित जी पर क्रोध भी आया.. कि ये केसा मन्त्र दिया है... कुछ दिन बाद वो व्यक्ति पण्डित जी से जाकर मिला ओर कहा आपके दिये हुये मन्त्र को में जप ही रहा था कि थोडी देर बाद मेरी पत्नी मर गई... पण्डित जी ने कहा.. आप मन्त्र बोलकर बताओ.. केसे जाप किया आपने... वो व्यक्ति बोला:-- "" भार्यां भक्षतु भैरवी"" पण्डित जी बोले:-- तुम्हारी पत्नी मरेगी नही तो ओर क्या होगा.. एक तो पहले ही वह मरणासन्न स्थिति में थी.. ओर रही सही कसर तुमने " रक्षतु" कि जगह "" भक्षतु!" जप करके पूरी कर दी.. भक्षतु का अर्थ है !" खा जाओ... "" ओर दोष मुझे दे रहे हो... उस व्यक्ति को अपनी गलति का अहसास हुआ.. तथा उसने पण्डित जी से क्षमा माँगी । इस लेख का सार यही है कि जब भी आप किसी मन्त्र का विशेष मनोरथ पूर्ण करने के लिये जप करे तब क्रिया ओर मन्त्र शुद्धि पर अवश्य ध्यान दे.. अशुद्ध पढने पर मन्त्र का अनर्थ हो जायेगा.. ओर मन्त्र का अनर्थ होने पर आपके जीवन में भी अनर्थ होने कि संभावना बन जायेगी । अगर किसी मन्त्र का शुद्ध उच्चारण आपसे नहीं हो रहा है.. तो बेहतर यही रहेगा.. कि आप उस मन्त्र से छेडछाड नहीं करे । और यदि किसी विशेष मंत्र का क्या कर रहे हैं तो योग्य और समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में ही करें और मंत्र के अर्थ को अच्छी तरह से समझ लेना के बाद ही उसका प्रयोग भाव विभोर होकर करें,, हर हर महादेव जय शिव शंकर ( प्रेषक अज्ञात ) 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Rajan Aug 10, 2020

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Deepak jindal Aug 11, 2020

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Amar jeet mishra Aug 11, 2020

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