KISHAN
KISHAN Mar 1, 2021

Suvichr Good afternoon

Suvichr
Good afternoon

+6 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 10 शेयर

कामेंट्स

Sonu Pathak (Jai Mata Di) Mar 1, 2021
ऊँ नमः शिवाय 🔱🌺 🙏🌺 जय माँ आदी शक्ति बाबा भोलेनाथ की असीम कृपा दृष्टि आप व आपके परिवार पर सदैव बनी रहे 🌹आपका हर पल सुखद मंगलमय हो 🌹🙏 नमस्कार शुभ दोपहर वंदन जी 🌻🌿🙏🌿🌻

+11 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 20 शेयर
sn vyas May 11, 2021

‼️ भगवत्कृपा हि केवलम ‼️ *📕 श्रीमद्भागवत गीता 📕* ************************ *अर्जुन का विषाद,भगवान के नामों की व्याख्या* **************************** *अर्जुन उवाच ---* *दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌ ॥* *सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।* *वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते ॥* भावार्थ : अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥ *गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते ।* *न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥* भावार्थ : हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ॥30॥ *निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।* *न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥* भावार्थ : हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता॥31॥ *न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।* *किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥* भावार्थ : हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?॥32॥ *येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।* *त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥* भावार्थ : हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं॥33॥ *आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।* *मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा ॥* भावार्थ : गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं ॥34॥ *एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।* *अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥* भावार्थ : हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?॥35॥ *निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।* *पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः ॥* भावार्थ : हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा॥36॥ *तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌ ।* *स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥* भावार्थ : अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?॥37॥ *यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।* *कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌ ॥* *कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌ ।* *कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥* भावार्थ : यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?॥38-39॥ *कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।* *धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥* भावार्थ : कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है॥40॥ *अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।* *स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥* भावार्थ : हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है॥41॥ *संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।* *पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥* भावार्थ : वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं॥42॥ *दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।* *उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥* भावार्थ : इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं॥43॥ *उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।* *नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥* भावार्थ : हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आए हैं॥44॥ *अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌ ।* *यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥* भावार्थ : हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गए हैं॥45॥ *यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।* *धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌ ॥* भावार्थ : यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारक होगा॥46॥ *संजय उवाच ---* *एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌ ।* *विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥* भावार्थ : संजय बोले- रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए॥47॥ ___________________________

+7 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 7 शेयर
KISHAN May 12, 2021

0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
KISHAN May 12, 2021

+21 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 12 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB