Krishna Singh
Krishna Singh Oct 10, 2017

रावण का जन्म और अमृत कुंड का रहस्य रावण का इतिहास -2

रावण का जन्म  और अमृत कुंड का रहस्य रावण का इतिहास -2

आप रावण के पूर्व जन्मों के बारे में तो पढ़ ही चुके हैं ( यदि नहीं पढ़ा तो यहाँ क्लिक करें ) कि कैसे उसके जन्म का निर्धारण पहले ही हो चुका था। लेकिन हर काम से पहले उसकी एक योजना बनायीं जाती है। जो की आदेश देने वाले नहीं काम करने वाले बनाते हैं। इसमें आदेश देने वाला बस आदेश देता है जैसे की सनकादि मुनि ने जय विजय को श्राप दिया था। रावण का जन्म होने की पृष्ठभूमि तो इस प्रकार तैयार हुयी :-

रावण का जन्म

ये कथा तब से शुरू होती है जब पृथ्वी पर माल्यवान, माई और सुमाली नमक 3 राक्षस हुए थे। तीनों ने ब्रह्मा जी की तपस्या की और बलशाली होने के वरदान प्राप्त किये। वरदान प्राप्त करते ही सबसे पहले वो शिल्पियों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा जी के पास गए और उन्हें शिभावन की भांति एक भवन बनाने को कहा।

उन्होंने उन राक्षसों को बताया कि त्रिकुट पर्वत एक सोने की लंका है। जो उन्होंने इंद्रा के कहने पर बनायीं थी। चूँकि इंद्र अमरावती में रहते हैं तो तुम लोग जाकर वहां अपना निवास स्थान बना सकते हो। इतना सुनते ही तीनों भाई ख़ुशी-ख़ुशी वहां चले गए। फिर उन तीनों का विवाह हो गया। माल्यवान का विवाह सौन्दर्यवती नमक स्त्री से हुआ। वसुधा का विवाह माली के साथ हुआ। वहीं सुमाली का विवाह केतुमती के साथ हुआ।

सवाल श्रेष्ठता का – कहानी धर्मो के लड़ाई की
इसके बाद उनका उत्पात बढ़ने लगा। वे सभी देवों, ऋषि-मुनियों और साधू संतो को सताने लगे। ब्रह्मा जी के वरदान के कारण कोई उनको हरा भी नहीं पा रहा था। तब इंद्रा देवताओं सहित भगवान् शंकर के पास गए। इतना सुनते ही तीनों भाई ख़ुशी-ख़ुशी वहां चले गए। फिर उन तीनों का विवाह हो गया। माल्यवान का विवाह सौन्दर्यवती नमक स्त्री से हुआ। परन्तु शंकर भगवान् ने उन्हें यह बताया कि वे राक्षस उनके द्वारा नहीं मारे जा सकते। इसलिए बेहतर ये होगा कि वे भगवान् विष्णु जी के पास जाएँ। ये सुनकर सभी देवता शंकर भगवान् की जय-जयकार करते हुए भगवान् विष्णु के पास चल दिए।

जब सभी देवताओं ने भगवान् विष्णु से उन्हें बचाने की विनती की तो भगवान् श्री हरी ने उन्हें इस समस्या का निवारण करने का आश्वासन दिया और भयमुक्त हो कर जाने को कहा। इसके बाद भगवान विष्णु और तीनों दैत्यों के बीच बहुत भयंकर लडाई हुयी। जिसमे माली मारा गया। जब दैत्य इस लडाई में कमजोर पड़ने लगे तो वे डर के मारे लंका छोड़ पातळ लोक में चले गए। इस प्रकार लंका खाली हो गयी और उन दैत्यों का आतंक शांत हो गया।

वही लंका फिर पिता विश्र्वा के कहने पर कुबेर ने फिर से बसाई। वे वहां अपने पुष्पक विमान सहित वहां रहते थे। एक दिन सुमाली ने पृथ्वी का भ्रमण करते हुए उन्हें पुष्पक विमान पर लंका से कहीं जाते हुए देखा। यह देख कर वह तुरंत पटल लोक गए। वह पातळ लोक में ज्ककर सोचने लगे कि कब तक हम यूँ ही डरे सहमे से छिपते रहेंगे और हमारा भी साम्राज्य बढेगा। यही सोचता हुआ वह फिर पातळ लोक गया।

पाताल लोक पहुँचते ही सुमाली ने यह योजना बनायी कि अगर विश्र्वा ऋषि के साथ अपनी पुत्री कैकसी का विवाह हो जाए तो हमें देवताओं से भी तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी। जो हमारा साम्राज्य बढ़ाएगा। ऐसा सोच कर उन्होंने अपने मन की बात अपनी पुत्री कैकसी को बताई। कैकसी ने वही किया जो उसके पिता की इच्छा थी।

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जब वह अपने पिता की यह इच्छा लेकर विश्र्वा मुनि के पास गयी। उन्हें सब कुछ बताया तो विश्र्वा मुनि ने उन्हें बताया कि वो गलत समय पर आई हैं। इस कारण उनके पुत्र राक्षसी प्रवृत्ति के होंगे। यह सुन कैकसी ने विश्र्वा मुनि से कहा,

” आप जैसे ब्रह्मवादी से मैं ऐसे दुराचारी पुत्र नहीं चाहती। अतः मुझ पर कृपा करें।”

यह सुन कर विश्र्वा मुनि ने कहा कि तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र मेरे वन्शानुरूप धर्मात्मा होगा। फिर विश्र्वा मुनि और कैकसी के 3 पुत्र – रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण हुए और एक पुत्री सुपनखा हुयी। रावण के 10 सिर होने के कारण उसका नाम दशग्रीव रखा गया।

चारों भाई बहन वन में रहते हुए बड़े होने लगे। विभीषण सारा दिन भक्ति में लीन रहते और कुम्भकर्ण जहाँ मन करे घूमा करता था। वो धर्मात्माओं और महर्षियों को पकड़ कर खा जाया करता था। उसका पेट कभी नहीं भरता था।

एक दिन कुबेर पुष्पक विमान में अपने पिता विश्र्वा मुनि से मिलने आये। उन्हें देख कर रावण की माँ कैकसी ने रावण से कहा,

” देखो दशग्रीव, तुम में और तुम्हारे भाई में कितना अंतर है। उसका तेज कितना प्रज्ज्वलित है। तुम भी कुछ ऐस करो कि उसके सामान हो जाओ।”

अपनी माता की ये इच्छा जान कर रावण ने यह प्रतिज्ञा ली की वो भी अपने भाई के बराबर पराक्रमी या उससे भी बढ़ कर होगा। ये सोच कर दशग्रीव अपने भाइयों सहित कठोर तप करने के लिए गोकर्ण नमक आश्रम में गया। उसने यह ठान रखा था कि वह तप कर के ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर उनसे वर प्राप्त करेगा।

रावण ने निरन्तर दस हजार वर्ष तक तपस्या की। एक हजार वर्ष पूरा होने पर वह अपना एक सिर होम में अर्पित कर देता था। इस तरह 9 हजार वर्षों तक वह अपने 9 सिर होम में अर्पित आकर चुका था। जब 10 हजार वर्ष पूरे होने को आये तो रावण 10वां सिर काटने को चला। तभी ब्रह्मा जी प्रकट हुए और रावण से कहा,

” हे धर्मज्ञ, तुझे जो वर मांगना है शीघ्र मांग। हम तेरे लिए क्या करें, जिससे तेरा परिश्रम व्यर्थ न जाए। ”

पहले रावण ने अमरता का वरदान माँगा लेकिन ब्रह्मा जी ने कहा की ऐसा संभव नहीं है। तब रावण ने ये वर माँगा कि मनुष्य जाती छोड़ और कोई भी उसका वध न कर सके। फिर ब्रह्मा जी ने वर के साथ उसके कटे हुए 9 सिर भी उसको वापस कर दिए। ये वरदान ऐसे ही बना रहे इसलिए ब्रह्मा जी ने रावण की नाभि में एक अमृत कुंड स्थापित कर दिया जिससे रावण की मृत्यु तभी संभव होती जब उस कुंद से अमृत सूख जाता। अब विभीषण की बारी थी तो उन्होंने यह वर माँगा कि वो सदा धर्म के कार्यों में लगे रहें। कितनी भी पड़ी विपत्ति क्यों न आन पड़े बुद्धि सदा धर्म में ही बनी रहे

जब कुम्भकर्ण की बारी आई तो देवताओं ने ब्रह्मा जी से बिनती की कि ये दैत्य तो बिना शक्तियों के सबको खा जाता है और उत्पात मचाता है। फिर भी इसका पेट नहीं भरता अगर इसने वर प्राप्त कर लिया तो बहुत ही विनाश करेगा। देवताओं की इस समस्या का हल करने के लिए ब्रह्मा जी ने सरस्वती जी का स्मरण किया। जब सरस्वती जी प्रकट हुयीं तो ब्रह्मा जी ने कुम्भकर्ण की जीभ से वही कहलाया जो देवता चाहते थे। कुम्भकर्ण ने वरदान माँगा कि वह अनेक वर्षों तक सोता रहे। ब्रह्मा जी ने ऐसा ही वरदान दिया।

वरदान पाने के बाद तीनों भाई अपने पिता के आश्रम में गए और वहां ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे।

तो ये था रावण का जन्म और तपस्या द्वारा वरदान प्राप्ति का किस्सा आगे की कथा पढ़ने के लिए बने रहें हमारे साथ। तब तक पढ़ें रावण के पूर्वजन्मों की और राक्षस योनि में जन्म लेने की कहानी।

आगे पढ़िए जो आपने शायद अब तक न पढ़ा हो रावण को मिले श्रापों और उसकी युद्ध में हुयी हारों के बाद उसके अंत की कथा। क्यों नहीं लगाया था रावण ने सीता को हाथ । अयोध्या के राजाओं से पहले भी युद्ध लड़ चुका था रावण।

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हम मनुष्यों की एक सामान्य सी आदत है कि दुःख की घड़ी में विचलित हो उठते हैं और परिस्थितियों का कसूरवार भगवान को मान लेते हैं। भगवान को कोसते रहते हैं कि 'हे भगवान हमने आपका क्या बिगाड़ा जो हमें यह दिन देखना पड़ रहा है।' गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि "जीव बार-बार अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग योनी और शरीर प्राप्त करता है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक जीवात्मा परमात्मा से साक्षात्कार नहीं कर लेता। इसलिए जो कुछ भी संसार में होता है या व्यक्ति के साथ घटित होता है उसका जिम्मेदार जीव खुद होता है।" संसार में कुछ भी अपने आप नहीं होता है, हमें जो कुछ भी प्राप्त होता है वह कर्मों का फल है। ईश्वर तो कमल के फूल के समान है जो संसार में होते हुए भी संसार में लिप्त नहीं होता है। ईश्वर न तो किसी को दुःख देता है और न सुख। इस संदर्भ में एक कथा प्रस्तुत हैः- गौतमी नामक एक शाक्य वृद्धा थी, जिसका एक मात्र सहारा उसका पुत्र था। शक्या अपने पुत्र से अत्यंत स्नेह करती थी, एक दिन एक सर्प ने शक्या के पुत्र को डंस लिया। पुत्र की मृत्यु से शाक्य व्रद्धा व्याकुल होकर विलाप करने लगी। पुत्र को डंसने वाले सांप के ऊपर उसे बहुत क्रोध आ रहा था। सर्प को सजा देने के लिए शक्या ने एक सपेरे को बुलाया। सपेरे ने सांप को पकड़ कर शक्या के सामने लाकर कहा कि इसी सांप ने तुम्हारे पुत्र को डंसा है, इसे मार दो। शक्या ने संपरे से कहा कि इसे मारने से मेरा पुत्र जीवित नहीं होगा, सांप को तुम्ही ले जाओ और जो उचित समझो सो करो। सपेरा सांप को जंगल में ले आया, सांप को मारने के लिए सपेरे ने जैसे ही पत्थर उठाया, सांप ने कहा मुझे क्यों मारते हो, मैंने तो वही किया जो काल ने कहा था। सपेरे ने काल को ढूंढा और बोला तुमने सर्प को शक्या के बच्चे को डंसने के लिए क्यों कहा। काल ने कहा 'शक्या के पुत्र का कर्म फल यही था, मेरा कोई कसूर नहीं है। सपेरा कर्म के पहुंचा और पूछा तुमने ऐसा बुरा कर्म क्यों किया। कर्म ने कहा 'मुझ से क्यों पूछते हो, यह तो मरने वाले से पूछो' मैं तो जड़ हूं। इसके बाद संपेरा शक्या के पुत्र की आत्मा के पास पहुंचा। आत्मा ने कहा सभी ठीक कहते हैं, मैंने ही वह कर्म किया था जिसकी वजह से मुझे सर्प ने डंसा, इसके लिए कोई अन्य दोषी नहीं है। महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने भीष्म को बाणों से छलनी कर दिया और भीष्म पितामह को बाणों की शैय्या पर सोना पड़ा। इसके पीछे भी भीष्म पितामह के कर्म का फल ही था। बाणों की शैय्या पर लेटे हुए भीष्म ने जब श्री कृष्ण से पूछा, किस अपराध के कारण मुझे इसे तरह बाणों की शैय्या पर सोना पड़ रहा है। इसके उत्तर में श्री कृष्ण ने कहा था कि, आपने कई जन्म पहले एक सर्प को नागफनी के कांटों पर फेंक दिया था। इसी अपराध के कारण आपको बाणों की शैय्या मिली है। इसलिए हमे कभी भी जाने-अनजाने किसी भी जीव को नहीं सताना चाहिए। हम जैसा कर्म करते हैं उसका फल हमें कभी न कभी जरूर मिलता है।

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RAJ RATHOD Mar 5, 2021

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हर साल माता सीता का जन्म फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. इस साल 2021 में यह जानकी जयंती (Janaki Jayanti) 7 मार्च को है. इस दिन मिथिला के राजा जनक और रानी सुनयना की गोद में सीता आईं. अयोध्या के राजा दशरथ के बड़े पुत्र राम से सीता का विवाह हुआ. विवाह के बाद उन्होंने पति राम और देवर लक्ष्मण के साथ 14 साल का वनवास भी भोगा. इतना ही नहीं, इस वनवास के दौरान उनका लंका के राजा रावण ने अपहरण किया. वनवास के बाद भी वह हमेशा के लिए अयोध्या वापस नहीं जा सकीं. अपने पुत्रों के साथ उन्हें आश्रम में ही अपना जीवन व्यतीत करना पड़ा और आखिर में उन्हें अपने सम्मान की रक्षा के लिए धरती में ही समाना पड़ा. अपने जीवन में इतने कष्टों को देखने वाली माता सीता आखिरकार थीं कौन? यहां जानें माता सीता का जन्म कैसे हुआ. कैसे हुआ जन्म? रामायण के अनुसार एक बार मिथिला के राजा जनक यज्ञ के लिए खेत को जोत रहे थे. उसी समय एक क्यारी में दरार हुई और उसमें से एक नन्ही बच्ची प्रकट हुईं. उस वक्त राजा जनक की कोई संतान नहीं थी. इसीलिए इस कन्या को देख वह मोहित हो गए और गोद ले लिया. आपको बता दें हल को मैथिली भाषा में सीता कहा जाता है और यह कन्या हल चलाते हुए ही मिलीं इसीलिए इनका नाम सीता रखा गया. कैसे मनाई जाती है जानकी जयंती? इस दिन माता सीता की पूजा की जाती है, लेकिन पूजा की शुरुआत गणेश जी और अंबिका जी से होती है. इसके बाद माता सीता को पीले फूल, कपड़े और सुहागिन के श्रृंगार का सामान चढ़ाया जाता है. बाद में 108 बार इस मंत्र का जाप किया जाता है. श्री जानकी रामाभ्यां नमः जय श्री सीता राम श्री सीताय नमः मान्यता है कि यह पूजा खासकर विवाहित महिलाओं के लिए लाभकारी होती है. इससे वैवाहिक जीवन की समस्याएं ठीक हो जाती हैं. नमस्कार 🙏 शुभ संध्या वंदन 🌹 👏 🚩 जय श्री राम 🌹 जय श्री लक्ष्मी नारायण 🙏 जय श्री सिता माता की 💐 👏 🚩 🐚 🌹 नमस्कार 🙏 🚩

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Anita Sharma Mar 4, 2021

. "गुरु अवज्ञा" एक बार की बात है, एक भक्त के दिल में आया कि गुरु महाराज जी को रात में देखना चाहिए कि क्या वो भी भजन सिमरन करते हैं ? वो रात को गुरु महाराज जी के कमरे की खिड़की के पास खड़ा हो गया। गुरु महाराज जी रात 9:30 तक भोजन और बाकी काम करके अपने कमरे में आ गये। वो भक्त देखता है कि गुरु महाराज जी एक पैर पर खड़े हो कर भजन सिमरन करने लग गये। वो कितनी देर तक देखता रहा और फिर थक कर खिड़की के बाहर ही सो गया। 3 घंटे बाद जब उसकी आँख खुली तो वो देखता है कि गुरु महाराज जी अभी भी एक पैर पर खड़े भजन सिमरन कर रहे हैं, फिर थोड़ी देर बाद गुरु महाराज जी भजन सिमरन से उठ कर थोड़ी देर कमरे में ही इधर उधर घूमें और फिर दोनों पैरो पर खड़े होकर भजन सिमरन करने लगे। वो भक्त देखता रहा और देखते-देखते उसकी आँख लग गई और वो सो गया। जब फिर उसकी आँख खुली तो 4 घंटे बीत चुके थे और अब गुरु महाराज जी बैठ कर भजन सिमरन कर रहे थे। थोड़ी देर में सुबह हो गई और गुरु महाराज जी उठ कर तैयार हुए और सुबह की सैर पर चले गये। वो भक्त भी गुरु महाराज जी के पीछे ही चल गया और रास्ते में गुरु महाराज जी को रोक कर हाथ जोड़ कर बोलता है कि गुरु महाराज जी मैं सारी रात आपको खिड़की से देख रहा था कि आप रात में कितना भजन सिमरन करते हो। गुरु महाराज जी हंस पड़े और बोले:- बेटा देख लिया तुमने फिर ? वो भक्त शर्मिंदा हुआ और बोला कि गुरु महाराज जी देख लिया पर मुझे एक बात समझ नहीं आई कि आप पहले एक पैर पर खड़े होकर भजन सिमरन करते रहे फिर दोनों पैरों पर और आखिर में बैठ कर जैसे कि भजन सिमरन करने को आप बोलते हो, ऐसा क्यूँ ? गुरु महाराज जी बोले बेटा एक पैर पर खड़े होकर मुझे उन सत्संगियो के लिए खुद भजन सिमरन करना पड़ता है जिन्होंने नाम दान लिया है मगर बिलकुल भी भजन सिमरन नहीं करते। दोनों पैरो पर खड़े होकर मैं उन सत्संगियो के लिए भजन सिमरन करता हूँ जो भजन सिमरन में तो बैठते हैं मगर पूरा समय नहीं देते। बेटा जिनको नाम दान मिला है, उनका जवाब सतपुरख को मुझे देना पडता है, क्योंकि मैंने उनकी जिम्मेदारी ली है नाम दान देकर। और आखिर में मैं बैठ कर भजन सिमरन करता हूँ, वो मैं खुद के लिए करता हूँ, क्योंकि मेरे गुरु ने मुझे नाम दान दिया था और मैं नहीं चाहता की उनको मेरी जवाबदारी देनी पड़े। भक्त ये सब सुनकर एक दम सन्न खड़ा रह गया।

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जानिये ॐ का रहस्य ~~~~~~~~~~~~~ मन पर नियन्त्रण करके शब्दों का उच्चारण करने की क्रिया को मन्त्र कहते है। मन्त्र विज्ञान का सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे मन व तन पर पड़ता है। मन्त्र का जाप एक मानसिक क्रिया है। कहा जाता है कि जैसा रहेगा मन वैसा रहेगा तन। यानि यदि हम मानसिक रूप से स्वस्थ्य है तो हमारा शरीर भी स्वस्थ्य रहेगा। मन को स्वस्थ्य रखने के लिए मन्त्र का जाप करना आवश्यक है। ओम् तीन अक्षरों से बना है। अ, उ और म से निर्मित यह शब्द सर्व शक्तिमान है। जीवन जीने की शक्ति और संसार की चुनौतियों का सामना करने का अदम्य साहस देने वाले ओम् के उच्चारण करने मात्र से विभिन्न प्रकार की समस्याओं व व्याधियों का नाश होता है। सृष्टि के आरंभ में एक ध्वनि गूंजी ओम और पूरे ब्रह्माण्ड में इसकी गूंज फैल गयी। पुराणों में ऐसी कथा मिलती है कि इसी शब्द से भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा प्रकट हुए। इसलिए ओम को सभी मंत्रों का बीज मंत्र और ध्वनियों एवं शब्दों की जननी कहा जाता है। इस मंत्र के विषय में कहा जाता है कि, ओम शब्द के नियमित उच्चारण मात्र से शरीर में मौजूद आत्मा जागृत हो जाती है और रोग एवं तनाव से मुक्ति मिलती है। इसलिए धर्म गुरू ओम का जप करने की सलाह देते हैं। जबकि वास्तुविदों का मानना है कि ओम के प्रयोग से घर में मौजूद वास्तु दोषों को भी दूर किया जा सकता है। ओम मंत्र को ब्रह्माण्ड का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि ओम में त्रिदेवों का वास होता है इसलिए सभी मंत्रों से पहले इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है जैसे ओम नमो भगवते वासुदेव, ओम नमः शिवाय। आध्यात्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि नियमित ओम मंत्र का जप किया जाए तो व्यक्ति का तन मन शुद्घ रहता है और मानसिक शांति मिलती है। ओम मंत्र के जप से मनुष्य ईश्वर के करीब पहुंचता है और मुक्ति पाने का अधिकारी बन जाता है। : वैदिक साहित्य इस बात पर एकमत है कि ओ३म् ईश्वर का मुख्य नाम है. योग दर्शन में यह स्पष्ट है. यह ओ३म् शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है- अ, उ, म. प्रत्येक अक्षर ईश्वर के अलग अलग नामों को अपने में समेटे हुए है. जैसे “अ” से व्यापक, सर्वदेशीय, और उपासना करने योग्य है. “उ” से बुद्धिमान, सूक्ष्म, सब अच्छाइयों का मूल, और नियम करने वाला है। “म” से अनंत, अमर, ज्ञानवान, और पालन करने वाला है. ये तो बहुत थोड़े से उदाहरण हैं जो ओ३म् के प्रत्येक अक्षर से समझे जा सकते हैं. वास्तव में अनंत ईश्वर के अनगिनत नाम केवल इस ओ३म् शब्द में ही आ सकते हैं, और किसी में नहीं. १. अनेक बार ओ३म् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनावरहित हो जाता है। २. अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ओ३म् के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं! ३. यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है। ४. यह हृदय और खून के प्रवाह को संतुलित रखता है। ५. इससे पाचन शक्ति तेज होती है। ६. इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है। ७. थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं। ८. नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है. रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी। ९ कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मजबूती आती है. इत्यादि! ॐ के उच्चारण का रहस्य? ॐ है एक मात्र मंत्र, यही है आत्मा का संगीत ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है। ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। यही है √ मंत्र बाकी सभी × है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है। तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम। साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना। *त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक : ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है। *बीमारी दूर भगाएँ : तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं। सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है। *उच्चारण की विधि : प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं। *इसके लाभ : इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। *शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव : प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक'पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरहआल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है। कम से कम 108 बार ओम् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव रहित हो जाता है। कुछ ही दिनों पश्चात शरीर में एक नई उर्जा का संचरण होने लगता है। । ओम् का उच्चारण करने से प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल और नियन्त्रण स्थापित होता है। जिसके कारण हमें प्राकृतिक उर्जा मिलती रहती है। ओम् का उच्चारण करने से परिस्थितियों का पूर्वानुमान होने लगता है। ओम् का उच्चारण करने से आपके व्यवहार में शालीनता आयेगी जिससे आपके शत्रु भी मित्र बन जाते है। ओम् का उच्चारण करने से आपके मन में निराशा के भाव उत्पन्न नहीं होते है। आत्म हत्या जैसे विचार भी मन में नहीं आते है। जो बच्चे पढ़ाई में मन नहीं लगाते है या फिर उनकी स्मरण शक्ति कमजोर है। उन्हें यदि नियमित ओम् का उच्चारण कराया जाये तो उनकी स्मरण शक्ति भी अच्छी हो जायेगी और पढ़ाई में मन भी लगने लगेगा। ~~~~~~~~~~~~~~~~

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