Neha Sharma, Haryana
Neha Sharma, Haryana Oct 28, 2020

🌸🙏*(मीरा चरित -)..... (25, 26)*🙏🌸 🌸🙏*क्रमशः से आगे........................🌿👣🌿 *मेड़ता से गये पुरोहित जी के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित *और उनकी पत्नी मीरा को देखने आये *राजमहल में उनका आतिथ्य सत्कार हो रहा है *पर मीरा को तो जैसे वह सब दीखकर भी दिखाई नहीं दे रहा *है *उसे न तो कोई रूचि है न ही कोई आकर्षण, *दूसरे दिन माँ सुन्दर वस्त्राभूषण लेकर एक दासी के साथ मीरा के पास आई आग्रह से स्थिति समझाते हुये मीरा को सब पहनने को कहा, मीरा ने बेमन से कहा- आज जी ठीक नहीं है भाबू रहने दीजिये.. किसी और दिन पहन लूँगी माँ खिन्न हो कर उठकर चली गई तो मीरा ने उदास मन से तानपुरा उठाया और गाने लगी....... *राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊँ ए माय* *मीरा के प्रभु गिरधर नागर, रज चरणन की पाऊँ ए माय* भजन विश्राम कर वह उठी ही थी कि माँ और काकीसा के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित जी की पत्नी ने श्याम कुन्ज में प्रवेश किया मीरा उनको यथायोग्य प्रणाम कर बड़े संकोच के साथ एक ओर हटकर ठाकुर जी को निहारती हुईं खड़ी हो गई, पुरोहितानी जी ने तो ऐसे रूप की कल्पना भी न की थी वह, लज्जा से सकुचाई मीरा के सौंदर्य से विमोहित सी हो गई और उनसे प्रणाम का उत्तर, आशीर्वाद भी स्पष्ट रूप से देते न बना वे कुछ देर मीरा को एकटक निहारते ही बैठी रही दासियों ने आगे बढ़कर चरणामृत प्रसाद दिया कुछ समय और यूँ ही मन्त्रमुग्ध बैठी फिर काकीसा के साथ चली गई, माँ ने सबके जाने के बाद फिर मीरा से कहा- तेरा क्या होगा, यह आशंका ही मुझे मारे डालती है अरे विनोद में कहे हुये भगवान से विवाह करने की बात से क्या जगत का व्यवहार चलेगा...? साधु-संग ने तो मेरी कोमलांगी बेटी को बैरागन ही बना दिया है मैं अब किससे जा कर बेटी के सुख की भिक्षा माँगू...???? मीरा - माँ आप क्यों दुःखी होती है....? सब अपने भाग्य का लिखा ही पाते है यदि मेरे भाग्य में दुःख लिखा है तो क्या आप रो -रो कर उसे सुख में पलट सकती है....? तब जो हो रहा है उसी में संतोष मानिये मुझे एक बात समझ में नहीं आती माँ जो जन्मा है वह मरेगा ही, यह बात तो आप अच्छी तरह जानती है फिर जब आपकी पुत्री को अविनाशी पति मिला है तो आप क्यों दुःख मना रही है...???? आपकी बेटी जैसी भाग्यशालिनी और कौन है जिसका सुहाग अमर है....????? मीरा ने भाबू को बताया - ऐसे वर को क्या करूँ जो जन्मे अौर मर जाय... *वर बरिए गोपाल जी..म्हारो चूड़लो अमर होय जाये* वीरकुवंरी जी एक बार फिर मीरा के तर्क के आगे चुप हो चली गई मीरा श्याम कुन्ज में अकेली रह गई आजकल दासियों को भी कामों की शिक्षा दी जा रही है क्योंकि उन्हें भी मीरा के साथ चितौड़ जाना है मीरा ने एकान्त पा फिर आर्त मन से प्रार्थना आरम्भ की........ *तुम सुनो दयाल म्हाँरी अरजी* *भवसागर में बही जात हूँ..काढ़ो तो थाँरी मरजी* *या संसार सगो नहीं कोई...साँचा सगा रघुबर जी* *मात पिता अर कुटुम कबीलो...सब मतलब के गरजी* *मीरा की प्रभु अरजी सुण लो..चरण लगावो थाँरी मरजी* क्रमशः ................ (मीरा चरित - )......(26) क्रमशः से आगे..............🌿👣🌿 मीरा श्याम कुन्ज में एकान्त में गिरधर के समक्ष बैठी है आजकल दो ही भाव उस पर प्रबल होते है - या तो ठाकुर जी की करूणा का स्मरण कर उनसे वह कृपा की याचना करती है और या फिर अपने ही भाव- राज्य में खो अपने श्यामसुन्दर से बैठे बातें करती रहती है, इस समय दूसरा भाव अधिक प्रबल है- मीरा गोपाल से बैठे निहोरा (प्रार्थना) कर रही है--- *थाँने काँई काँई कह समझाऊँ...म्हाँरा सांवरा गिरधारी* *पूरब जनम की प्रीति म्हाँरी...अब नहीं जात निवारी* *सुन्दर बदन जोवताँ सजनी..प्रीति भई छे भारी* *म्हाँरे घराँ पधारो गिरधर...मंगल गावें नारी* *मोती चौक पूराऊँ व्हाला...तन मन तोपर वारी* *म्हाँरो सगपण तो थांसूं साँवरिया...जग सूँ नहीं विचारी* *मीरा कहे गोपिन को व्हालो...हम सूँ भयो ब्रह्मचारी* *चरण शरण है दासी थाँरी...पलक न कीजे न्यारी* मीरा गाते गाते अपने भाव जगत में खो गई----वह सिर पर छोटी सी कलशी लिए यमुना जल लेकर लौट रही है उसके तृषित नेत्र इधर-उधर निहार कर अपना धन खोज रहे है वो यहीं कहीं होंगे -आयेंगे -नहीं आयेंगे....बस इसी ऊहापोह में धीरे-धीरे चल रही थी कि पीछे से किसी ने मटकी उठा ली उसने अचकचाकर ऊपर देखा तो - कदम्ब पर एक हाथ से डाल पकड़े और एक हाथ में कलशी लटकाये मनमोहन बैठे हँस रहे है लाज के मारे उसकी दृष्टि ठहर नहीं रही लज्जा नीचे और प्रेम उत्सुकता ऊपर देखने को विवश कर रही है वे एकदम वृक्ष से उसके सम्मुख कूद पड़े वह चौंककर चीख पड़ी....और साथ ही उन्हें देख लजा गई, *डर गई न....? श्यामसुंदर ने हँसते हुए पूछा और हाथ पकड़ कर कहा -चल आ, थोड़ी देर बैठकर बातें करें" सघन वृक्ष तले एक शिला पर दोनों बैठ गये मुस्कुरा कर बोले- तोको का लगो - कोई वानर कूद पड़ो है क्या..? अभी पानी भरने को समय है का....??? दोपहर में पता नहीं घाट नितान्त सूने रहते है जो कोई सचमुच वानर आ जातो तो.....??? मीरा - तुम हो न उसके मुख से निकला श्यामसुंदर -मैं का यहाँ ही बैठो रहूँ हूँ....? गईयाँ नहीं चरानी मोकू.....? मीरा -एक बात कहूँ.....??? मैने सिर नीचा किए हुये कहा श्यामसुंदर -एक नहीं सौ कह...पर माथा तो ऊँचा कर तेरो मुख ही नाय दिख रहो मोकू....उन्होंने मुख ऊँचा किया तो फिर लाज ने आ घेरा, श्यामसुंदर अच्छा अच्छा मुख नीचो ही रहने दे कह का बात है......? मीरा -तुम्हें कैसे प्रसन्न किया जा सकता है...? बहुत कठिनाई से मैंने कहा श्यामसुंदर -तो सखी....तोहे मैं अप्रसन्न दीख रह्यो हूँ का मीरा -नहीं मेरा वो मतलब नहीं था..सुना है...तुम प्रेम से वश में होते हो श्यामसुंदर- मोको वश में करके क्या करेगी सखी नाथ डालेगी कि पगहा बाँधेगी.....??? मेरे वश हुये बिना तेरो कहा काज अटक्यो है भला....??? मीरा - सो नहीं श्यामसुन्दर श्यामसुंदर - तो फिर क्या.....??? कब से पूछ रहो हूँ....तेरो मोहढों (मुख) तो पूरो खुले हु नायक एकहु बात पूरी नाय निकसै...अब मैं भोरो-भारो कैसे समझूँगो? मीरा -सुनो श्यामसुन्दर...मैंने आँख मूँदकर पूरा ज़ोर लगाकर कह दिया -मुझे तुम्हारे चरणों में अनुराग चाहिए" श्यामसुंदर - सो कहा होय सखी.....? उन्होंने अन्जान बनते हुये पूछा, अपनी विवशता पर मेरी आँखों में आँसू भर आये घुटनों में सिर दे मैं रो पड़ी....😥 श्यामसुंदर - सखी रोवै मति....उन्होंने मेरे आँसू पौंछते हुये पूछा और ऐसो अनुराग कैसो होवे री....??? मीरा - सब कहते हैं..उसमें अपने सुख की आशा - इच्छा नहीं होती तो और कहा होय....?.....श्यामसुन्दर ने पूछा, मीरा - बस तुम्हारे सुख की इच्छा" श्यामसुंदर -और कहा अब तू मोकू दुःख दे रही है....? ऐसा कह हँसते हुये मेरी मटकी लौटाते हुये बोले, ले अपनी कलशी.....बावरी कहीं की..... और वह वन की ओर दौड़ गये...मैं वहीं सिर पर मटकी ले ठगी सी बैठी रही....... क्रमशः ................

🌸🙏*(मीरा चरित -)..... (25, 26)*🙏🌸
🌸🙏*क्रमशः से आगे........................🌿👣🌿

*मेड़ता से गये पुरोहित जी के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित *और उनकी पत्नी मीरा को देखने आये
*राजमहल में उनका आतिथ्य सत्कार हो रहा है
*पर मीरा को तो जैसे वह सब दीखकर भी दिखाई नहीं दे रहा *है
*उसे न तो कोई रूचि है न ही कोई आकर्षण,

*दूसरे दिन माँ सुन्दर वस्त्राभूषण लेकर एक दासी के साथ मीरा के पास आई
आग्रह से स्थिति समझाते हुये मीरा को सब पहनने को कहा,

मीरा ने बेमन से कहा- आज जी ठीक नहीं है
भाबू रहने दीजिये.. किसी और दिन पहन लूँगी

माँ खिन्न हो कर उठकर चली गई तो मीरा ने उदास मन से तानपुरा उठाया और गाने लगी.......

*राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊँ ए माय*

*मीरा के प्रभु गिरधर नागर, रज चरणन की पाऊँ ए माय*

भजन विश्राम कर वह उठी ही थी कि माँ और काकीसा के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित जी की पत्नी ने श्याम कुन्ज में प्रवेश किया
मीरा उनको यथायोग्य प्रणाम कर बड़े संकोच के साथ एक ओर हटकर ठाकुर जी को निहारती हुईं खड़ी हो गई,

पुरोहितानी जी ने तो ऐसे रूप की कल्पना भी न की थी
वह, लज्जा से सकुचाई मीरा के सौंदर्य से विमोहित सी हो गई और उनसे प्रणाम का उत्तर, आशीर्वाद भी स्पष्ट रूप से देते न बना
वे कुछ देर मीरा को एकटक निहारते ही बैठी रही
दासियों ने आगे बढ़कर चरणामृत प्रसाद दिया
कुछ समय और यूँ ही मन्त्रमुग्ध बैठी फिर काकीसा के साथ चली गई,
माँ ने सबके जाने के बाद फिर मीरा से कहा- तेरा क्या होगा,
यह आशंका ही मुझे मारे डालती है
अरे विनोद में कहे हुये भगवान से विवाह करने की बात से क्या जगत का व्यवहार चलेगा...?
साधु-संग ने तो मेरी कोमलांगी बेटी को बैरागन ही बना दिया है
मैं अब किससे जा कर बेटी के सुख की भिक्षा माँगू...????

मीरा - माँ आप क्यों दुःखी होती है....?
सब अपने भाग्य का लिखा ही पाते है
यदि मेरे भाग्य में दुःख लिखा है तो क्या आप रो -रो कर उसे सुख में पलट सकती है....?
तब जो हो रहा है उसी में संतोष मानिये
मुझे एक बात समझ में नहीं आती माँ जो जन्मा है वह मरेगा ही, यह बात तो आप अच्छी तरह जानती है
फिर जब आपकी पुत्री को अविनाशी पति मिला है तो आप क्यों दुःख  मना रही है...????
आपकी बेटी जैसी भाग्यशालिनी और कौन है
जिसका सुहाग अमर है....?????

मीरा ने भाबू को बताया - ऐसे वर को क्या करूँ
जो जन्मे अौर मर जाय...
*वर बरिए गोपाल जी..म्हारो चूड़लो अमर होय जाये*

वीरकुवंरी जी एक बार फिर मीरा के तर्क के आगे चुप हो चली गई

मीरा श्याम कुन्ज में अकेली रह गई
आजकल दासियों को भी कामों की शिक्षा दी जा रही है
क्योंकि उन्हें भी मीरा के साथ चितौड़ जाना है
मीरा ने एकान्त पा फिर आर्त मन से प्रार्थना आरम्भ की........

   *तुम सुनो दयाल म्हाँरी अरजी*

*भवसागर में बही जात हूँ..काढ़ो तो थाँरी मरजी*

*या संसार सगो नहीं कोई...साँचा सगा रघुबर जी*

*मात पिता अर कुटुम कबीलो...सब मतलब के गरजी*

*मीरा की प्रभु अरजी सुण लो..चरण लगावो थाँरी मरजी*

क्रमशः ................
(मीरा चरित - )......(26)

क्रमशः से आगे..............🌿👣🌿

मीरा श्याम कुन्ज में एकान्त में गिरधर के समक्ष बैठी है
आजकल दो ही भाव उस पर प्रबल होते है - या तो ठाकुर जी की करूणा का स्मरण कर उनसे वह कृपा की याचना करती है
और या फिर अपने ही भाव- राज्य में खो अपने श्यामसुन्दर से बैठे बातें करती रहती है,

इस समय दूसरा भाव अधिक प्रबल है- मीरा गोपाल से बैठे निहोरा (प्रार्थना) कर रही है---

*थाँने काँई काँई कह समझाऊँ...म्हाँरा सांवरा गिरधारी*

*पूरब जनम की प्रीति म्हाँरी...अब नहीं जात निवारी*

*सुन्दर बदन जोवताँ सजनी..प्रीति भई छे भारी*

*म्हाँरे घराँ पधारो गिरधर...मंगल गावें नारी*

*मोती चौक पूराऊँ व्हाला...तन मन तोपर वारी*

*म्हाँरो सगपण तो थांसूं साँवरिया...जग सूँ नहीं विचारी*

*मीरा कहे गोपिन को व्हालो...हम सूँ भयो ब्रह्मचारी*

*चरण शरण है दासी थाँरी...पलक न कीजे न्यारी*

मीरा गाते गाते अपने भाव जगत में खो गई----वह सिर पर छोटी सी कलशी लिए यमुना जल लेकर लौट रही है
उसके तृषित नेत्र इधर-उधर निहार कर अपना धन खोज रहे है
वो यहीं कहीं होंगे -आयेंगे -नहीं आयेंगे....बस इसी ऊहापोह में धीरे-धीरे चल रही थी कि पीछे से किसी ने मटकी उठा ली
उसने अचकचाकर ऊपर देखा तो - कदम्ब पर एक हाथ से डाल पकड़े और एक हाथ में कलशी लटकाये मनमोहन बैठे हँस रहे है लाज के मारे उसकी दृष्टि ठहर नहीं रही
लज्जा नीचे और प्रेम उत्सुकता ऊपर देखने को विवश कर रही है
वे एकदम वृक्ष से उसके सम्मुख कूद पड़े
वह चौंककर चीख पड़ी....और साथ ही उन्हें देख लजा गई,

*डर गई न....?
श्यामसुंदर ने हँसते हुए पूछा और हाथ पकड़ कर कहा -चल आ, थोड़ी देर बैठकर बातें करें"

सघन वृक्ष तले एक शिला पर दोनों बैठ गये
मुस्कुरा कर बोले- तोको का लगो - कोई वानर कूद पड़ो है क्या..? अभी पानी भरने को समय है का....???
दोपहर में पता नहीं घाट नितान्त सूने रहते है जो कोई सचमुच वानर आ जातो तो.....???

मीरा - तुम हो न उसके मुख से निकला

श्यामसुंदर -मैं का यहाँ ही बैठो रहूँ हूँ....?
गईयाँ नहीं चरानी मोकू.....?

मीरा -एक बात कहूँ.....???
मैने सिर नीचा किए हुये कहा

श्यामसुंदर -एक नहीं सौ कह...पर माथा तो ऊँचा कर
तेरो मुख ही नाय दिख रहो मोकू....उन्होंने मुख ऊँचा किया तो फिर लाज ने आ घेरा,

श्यामसुंदर अच्छा  अच्छा  मुख नीचो ही रहने दे
कह का बात है......?

मीरा -तुम्हें कैसे प्रसन्न किया जा सकता है...?
बहुत कठिनाई से मैंने कहा

श्यामसुंदर -तो सखी....तोहे मैं अप्रसन्न दीख रह्यो हूँ का

मीरा -नहीं मेरा वो मतलब नहीं था..सुना है...तुम प्रेम से वश में होते हो
श्यामसुंदर- मोको वश में करके क्या करेगी सखी
नाथ डालेगी कि पगहा बाँधेगी.....???
मेरे वश हुये बिना तेरो कहा काज अटक्यो है भला....???

मीरा - सो नहीं श्यामसुन्दर

श्यामसुंदर - तो फिर क्या.....???
कब से पूछ रहो हूँ....तेरो मोहढों (मुख) तो पूरो खुले हु नायक
एकहु बात पूरी नाय निकसै...अब मैं भोरो-भारो कैसे समझूँगो?

मीरा -सुनो श्यामसुन्दर...मैंने आँख मूँदकर पूरा ज़ोर लगाकर कह दिया -मुझे तुम्हारे चरणों में अनुराग चाहिए"

श्यामसुंदर - सो कहा होय सखी.....?
उन्होंने अन्जान बनते हुये पूछा,

अपनी विवशता पर मेरी आँखों में आँसू भर आये घुटनों में सिर दे मैं रो पड़ी....😥

श्यामसुंदर - सखी रोवै मति....उन्होंने मेरे आँसू पौंछते हुये पूछा  और ऐसो अनुराग कैसो होवे री....???

मीरा - सब कहते हैं..उसमें अपने सुख की आशा - इच्छा नहीं होती

तो और कहा होय....?.....श्यामसुन्दर ने पूछा,

मीरा - बस तुम्हारे सुख की इच्छा"

श्यामसुंदर -और कहा अब तू मोकू दुःख  दे रही है....?
ऐसा कह हँसते हुये मेरी मटकी लौटाते हुये बोले,
ले अपनी कलशी.....बावरी कहीं की.....

और वह वन की ओर दौड़ गये...मैं वहीं सिर पर मटकी ले ठगी सी बैठी रही.......

क्रमशः ................
🌸🙏*(मीरा चरित -)..... (25, 26)*🙏🌸
🌸🙏*क्रमशः से आगे........................🌿👣🌿

*मेड़ता से गये पुरोहित जी के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित *और उनकी पत्नी मीरा को देखने आये
*राजमहल में उनका आतिथ्य सत्कार हो रहा है
*पर मीरा को तो जैसे वह सब दीखकर भी दिखाई नहीं दे रहा *है
*उसे न तो कोई रूचि है न ही कोई आकर्षण,

*दूसरे दिन माँ सुन्दर वस्त्राभूषण लेकर एक दासी के साथ मीरा के पास आई
आग्रह से स्थिति समझाते हुये मीरा को सब पहनने को कहा,

मीरा ने बेमन से कहा- आज जी ठीक नहीं है
भाबू रहने दीजिये.. किसी और दिन पहन लूँगी

माँ खिन्न हो कर उठकर चली गई तो मीरा ने उदास मन से तानपुरा उठाया और गाने लगी.......

*राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊँ ए माय*

*मीरा के प्रभु गिरधर नागर, रज चरणन की पाऊँ ए माय*

भजन विश्राम कर वह उठी ही थी कि माँ और काकीसा के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित जी की पत्नी ने श्याम कुन्ज में प्रवेश किया
मीरा उनको यथायोग्य प्रणाम कर बड़े संकोच के साथ एक ओर हटकर ठाकुर जी को निहारती हुईं खड़ी हो गई,

पुरोहितानी जी ने तो ऐसे रूप की कल्पना भी न की थी
वह, लज्जा से सकुचाई मीरा के सौंदर्य से विमोहित सी हो गई और उनसे प्रणाम का उत्तर, आशीर्वाद भी स्पष्ट रूप से देते न बना
वे कुछ देर मीरा को एकटक निहारते ही बैठी रही
दासियों ने आगे बढ़कर चरणामृत प्रसाद दिया
कुछ समय और यूँ ही मन्त्रमुग्ध बैठी फिर काकीसा के साथ चली गई,
माँ ने सबके जाने के बाद फिर मीरा से कहा- तेरा क्या होगा,
यह आशंका ही मुझे मारे डालती है
अरे विनोद में कहे हुये भगवान से विवाह करने की बात से क्या जगत का व्यवहार चलेगा...?
साधु-संग ने तो मेरी कोमलांगी बेटी को बैरागन ही बना दिया है
मैं अब किससे जा कर बेटी के सुख की भिक्षा माँगू...????

मीरा - माँ आप क्यों दुःखी होती है....?
सब अपने भाग्य का लिखा ही पाते है
यदि मेरे भाग्य में दुःख लिखा है तो क्या आप रो -रो कर उसे सुख में पलट सकती है....?
तब जो हो रहा है उसी में संतोष मानिये
मुझे एक बात समझ में नहीं आती माँ जो जन्मा है वह मरेगा ही, यह बात तो आप अच्छी तरह जानती है
फिर जब आपकी पुत्री को अविनाशी पति मिला है तो आप क्यों दुःख  मना रही है...????
आपकी बेटी जैसी भाग्यशालिनी और कौन है
जिसका सुहाग अमर है....?????

मीरा ने भाबू को बताया - ऐसे वर को क्या करूँ
जो जन्मे अौर मर जाय...
*वर बरिए गोपाल जी..म्हारो चूड़लो अमर होय जाये*

वीरकुवंरी जी एक बार फिर मीरा के तर्क के आगे चुप हो चली गई

मीरा श्याम कुन्ज में अकेली रह गई
आजकल दासियों को भी कामों की शिक्षा दी जा रही है
क्योंकि उन्हें भी मीरा के साथ चितौड़ जाना है
मीरा ने एकान्त पा फिर आर्त मन से प्रार्थना आरम्भ की........

   *तुम सुनो दयाल म्हाँरी अरजी*

*भवसागर में बही जात हूँ..काढ़ो तो थाँरी मरजी*

*या संसार सगो नहीं कोई...साँचा सगा रघुबर जी*

*मात पिता अर कुटुम कबीलो...सब मतलब के गरजी*

*मीरा की प्रभु अरजी सुण लो..चरण लगावो थाँरी मरजी*

क्रमशः ................
(मीरा चरित - )......(26)

क्रमशः से आगे..............🌿👣🌿

मीरा श्याम कुन्ज में एकान्त में गिरधर के समक्ष बैठी है
आजकल दो ही भाव उस पर प्रबल होते है - या तो ठाकुर जी की करूणा का स्मरण कर उनसे वह कृपा की याचना करती है
और या फिर अपने ही भाव- राज्य में खो अपने श्यामसुन्दर से बैठे बातें करती रहती है,

इस समय दूसरा भाव अधिक प्रबल है- मीरा गोपाल से बैठे निहोरा (प्रार्थना) कर रही है---

*थाँने काँई काँई कह समझाऊँ...म्हाँरा सांवरा गिरधारी*

*पूरब जनम की प्रीति म्हाँरी...अब नहीं जात निवारी*

*सुन्दर बदन जोवताँ सजनी..प्रीति भई छे भारी*

*म्हाँरे घराँ पधारो गिरधर...मंगल गावें नारी*

*मोती चौक पूराऊँ व्हाला...तन मन तोपर वारी*

*म्हाँरो सगपण तो थांसूं साँवरिया...जग सूँ नहीं विचारी*

*मीरा कहे गोपिन को व्हालो...हम सूँ भयो ब्रह्मचारी*

*चरण शरण है दासी थाँरी...पलक न कीजे न्यारी*

मीरा गाते गाते अपने भाव जगत में खो गई----वह सिर पर छोटी सी कलशी लिए यमुना जल लेकर लौट रही है
उसके तृषित नेत्र इधर-उधर निहार कर अपना धन खोज रहे है
वो यहीं कहीं होंगे -आयेंगे -नहीं आयेंगे....बस इसी ऊहापोह में धीरे-धीरे चल रही थी कि पीछे से किसी ने मटकी उठा ली
उसने अचकचाकर ऊपर देखा तो - कदम्ब पर एक हाथ से डाल पकड़े और एक हाथ में कलशी लटकाये मनमोहन बैठे हँस रहे है लाज के मारे उसकी दृष्टि ठहर नहीं रही
लज्जा नीचे और प्रेम उत्सुकता ऊपर देखने को विवश कर रही है
वे एकदम वृक्ष से उसके सम्मुख कूद पड़े
वह चौंककर चीख पड़ी....और साथ ही उन्हें देख लजा गई,

*डर गई न....?
श्यामसुंदर ने हँसते हुए पूछा और हाथ पकड़ कर कहा -चल आ, थोड़ी देर बैठकर बातें करें"

सघन वृक्ष तले एक शिला पर दोनों बैठ गये
मुस्कुरा कर बोले- तोको का लगो - कोई वानर कूद पड़ो है क्या..? अभी पानी भरने को समय है का....???
दोपहर में पता नहीं घाट नितान्त सूने रहते है जो कोई सचमुच वानर आ जातो तो.....???

मीरा - तुम हो न उसके मुख से निकला

श्यामसुंदर -मैं का यहाँ ही बैठो रहूँ हूँ....?
गईयाँ नहीं चरानी मोकू.....?

मीरा -एक बात कहूँ.....???
मैने सिर नीचा किए हुये कहा

श्यामसुंदर -एक नहीं सौ कह...पर माथा तो ऊँचा कर
तेरो मुख ही नाय दिख रहो मोकू....उन्होंने मुख ऊँचा किया तो फिर लाज ने आ घेरा,

श्यामसुंदर अच्छा  अच्छा  मुख नीचो ही रहने दे
कह का बात है......?

मीरा -तुम्हें कैसे प्रसन्न किया जा सकता है...?
बहुत कठिनाई से मैंने कहा

श्यामसुंदर -तो सखी....तोहे मैं अप्रसन्न दीख रह्यो हूँ का

मीरा -नहीं मेरा वो मतलब नहीं था..सुना है...तुम प्रेम से वश में होते हो
श्यामसुंदर- मोको वश में करके क्या करेगी सखी
नाथ डालेगी कि पगहा बाँधेगी.....???
मेरे वश हुये बिना तेरो कहा काज अटक्यो है भला....???

मीरा - सो नहीं श्यामसुन्दर

श्यामसुंदर - तो फिर क्या.....???
कब से पूछ रहो हूँ....तेरो मोहढों (मुख) तो पूरो खुले हु नायक
एकहु बात पूरी नाय निकसै...अब मैं भोरो-भारो कैसे समझूँगो?

मीरा -सुनो श्यामसुन्दर...मैंने आँख मूँदकर पूरा ज़ोर लगाकर कह दिया -मुझे तुम्हारे चरणों में अनुराग चाहिए"

श्यामसुंदर - सो कहा होय सखी.....?
उन्होंने अन्जान बनते हुये पूछा,

अपनी विवशता पर मेरी आँखों में आँसू भर आये घुटनों में सिर दे मैं रो पड़ी....😥

श्यामसुंदर - सखी रोवै मति....उन्होंने मेरे आँसू पौंछते हुये पूछा  और ऐसो अनुराग कैसो होवे री....???

मीरा - सब कहते हैं..उसमें अपने सुख की आशा - इच्छा नहीं होती

तो और कहा होय....?.....श्यामसुन्दर ने पूछा,

मीरा - बस तुम्हारे सुख की इच्छा"

श्यामसुंदर -और कहा अब तू मोकू दुःख  दे रही है....?
ऐसा कह हँसते हुये मेरी मटकी लौटाते हुये बोले,
ले अपनी कलशी.....बावरी कहीं की.....

और वह वन की ओर दौड़ गये...मैं वहीं सिर पर मटकी ले ठगी सी बैठी रही.......

क्रमशः ................

+193 प्रतिक्रिया 18 कॉमेंट्स • 28 शेयर

कामेंट्स

Ranveer Soni Oct 28, 2020
🌹🌹जय श्री कृष्ण🌹🌹

Gour.... Oct 28, 2020
Jai Shri Krishna Jai Shri Radhe G... Bhagwan Aapko sada Khush Rakkhen G. Aapka Har Pal Khushion Se Bhara Ho G.

Ansouya Oct 28, 2020
जय श्री राधे कृष्ण श्री कृष्ण गोविन्द हरी मूरारी हे नाथ नारायण वासुदेव 🌹🌹 शुभ संध्या प्यारी बहना जी 🌷🙏🌷 मीरा जी कन्हा जी से कहती है: कहो कैसे तूमहारी बन जाऊँ रसिया कहो कैसे: पद पंकज अति सुकुमार तेरे कहो कैसे मै शिश झुकाऊँ रसिया कहो कैसे मै तुम्हारी बन जाऊं रसिया जय श्री कृष्ण 🌹🙏🌹

Ravi Thakur Oct 28, 2020
Jai Shri Krishna 🙏😇 Subhsndhya Vandan ji 🙏🙏

sk sharma Oct 28, 2020
जय जय श्री राधे कृष्ण 🙏🙏🙏

Renu Singh Oct 28, 2020
Shubh Sandhya Vandan Bahena Ji 🙏 Radhe Radhe Aapka Har pal Shubh V Mangalmay ho 🌸🙏

सरगम Oct 28, 2020
🥀🔆जय श्री श्यामसुंदर, राधे राधे🔆🥀

pawaR Jalindar Oct 28, 2020
जय श्री राधे कृष्णा राधे राधे जी 🌹💐 शुभ संध्या वंदन जी 🌹💐 जय श्री राधे राधे जी 🌹🚩🌹

Sushil Kumar Sharma 🙏🙏🌹🌹 Oct 28, 2020
Good Evening My Sister ji 🙏🙏 Very Beautiful Line ji 👌👌 Jay Shree Radhe Radhe Radhe ji 🙏 God Bless you And your Family Always Be Happy My Sister ji 🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹.

Ashwinrchauhan Oct 28, 2020
जय श्री कृष्णा राधे राधे जी राधा रानी की कृपा आप पर आप के पुरे परिवार पर सदेव बनी रहे मेरी आदरणीय बहना जी आप का हर पल मंगल एवं शुभ रहे ठाकुर जी आप की हर मनोकामना पूरी करे आप का आने वाला दिन शुभ रहे गुड़ नाईट बहना जी

madan pal Singh 🙏🏼 Oct 28, 2020
jai shree radhe Radhe kirisana Jiiii shubh ratari Vandan jiiiíi aàpka har pal shub magalmay hoo Jiiii 🌹🙏🏻

B K Patel Oct 29, 2020
जय श्री राधे राधे राधे राधे 🌹🙏🙏🙏

+15 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 41 शेयर

*जय-जय श्री राधेकृष्णा 🙏🌸🌸 *शुभ रात्रि नमन*🙏🌸🌸 *एक बार की बात है...! *यात्रियों से खचाखच भरी ट्रेन में *एक टी.टी.ई.को एक पुराना *फटा सा पर्स मिला। *उसने पर्स को खोलकर यह *पता लगाने की कोशिश की *कि वह किसका है....? *लेकिन पर्स में ऐसा कुछ नहीं था *जिससे कोई सुराग मिल सके...! पर्स में कुछ पैसे और किसी संत भगवान की फोटो थी।...! फिर उस टी.टी.ई. ने हवा में पर्स हिलाते हुए पूछा - "यह किसका पर्स है?" एक बूढ़ा यात्री बोला - "यह मेरा पर्स है....! इसे कृपया मुझे दे दें....! "टी.टी.ई. ने कहा - "तुम्हें यह साबित करना होगा कि यह पर्स तुम्हारा ही है....! केवल तभी मैं यह पर्स तुम्हें लौटा सकता हूं...! "उस बूढ़े व्यक्ति ने दंत विहीन मुस्कान के साथ उत्तर दिया - प्यारे भक्तों ध्यान से सुनना...! उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा "इसमें मेरे संत भगवान की फोटो है। "टी.टी.ई. ने कहा - "यह कोई ठोस सबूत नहीं है... ये किसी भी सतगुरु भक्त के पर्स की फोटो हो सकती है। इसमें क्या खास बात है...? पर्स में तुम्हारी फोटो क्यों नहीं है? "बूढ़ा व्यक्ति ठंडी गहरी सांस भरते हुए बोला - "मैं तुम्हें बताता हूं कि मेरा फोटो इस पर्स में क्यों नहीं है। जब मैं स्कूल में पढ़ रहा था, तब ये पर्स मेरे पिता ने मुझे दिया था। उस समय मुझे जेब खर्च के रूप में कुछ पैसे मिलते थे। मैंने पर्स में अपने माता-पिता की फोटो रखी हुयी थी। जब मैं किशोर अवस्था में पहुंचा, मैं अपनी कद-काठी पर मोहित था। मैंने पर्स में से माता-पिता की फोटो हटाकर अपनी फोटो लगा ली। मैं अपने सुंदर चेहरे और काले घने बालों को देखकर खुश हुआ करता था। कुछ साल बाद मेरी शादी हो गयी। मेरी पत्नी बहुत सुंदर थी और मैं उससे बहुत प्रेम करता था। मैंने पर्स में से अपनी फोटो हटाकर उसकी लगा ली। मैं घंटों उसके सुंदर चेहरे को निहारा करता। जब मेरी पहली संतान का जन्म हुआ, तब मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। मैं अपने बच्चे के साथ खेलने के लिए काम पर कम समय खर्च करने लगा। मैं देर से काम पर जाता और जल्दी लौट आता। कहने की बात नहीं, अब मेरे पर्स में मेरे बच्चे की फोटो आ गयी थी। "बूढ़े व्यक्ति ने डबडबाती आँखों के साथ बोलना जारी रखा - "कई वर्ष पहले मेरे माता-पिता का स्वर्गवास हो गया। पिछले वर्ष मेरी पत्नी भी मेरा साथ छोड़ गयी। मेरा इकलौता पुत्र अपने परिवार में व्यस्त है। उसके पास मेरी देखभाल का वक्त नहीं है। जिसे मैंने अपने जिगर के टुकड़े की तरह पाला था, वह अब मुझसे बहुत दूर हो चुका है। अब मैंने अपने संत भगवान की फोटो पर्स में लगा ली है। अब जाकर मुझे एहसास हुआ है कि संतों का आशीर्वाद और मेरे ठाकुर ही मेरे शाश्वत साथी हैं। वे हमेशा मेरे साथ रहेंगे। काश मुझे पहले ही यह एहसास हो गया होता। जैसा प्रेम मैंने अपने परिवार से किया, वैसा प्रेम यदि मैंने अपने ठाकुर जी के साथ किया होता तो आज मैं इतना अकेला नहीं होता। "टी.टी.ई. ने उस बूढ़े व्यक्ति को पर्स लौटा दिया..! प्यारे मनुष्य अपने जीवन में न जाने कितने अनुचित कार्य करते हैं प्रत्येक मनुष्य सोचता है, वह अपने पुत्र के लिए, अपनी पत्नी के लिए, अपने बच्चों के लिए.... अपने सुख सुविधा के लिए खूब धन एकत्रित करें..... मगर ध्यान रखना प्यारे, आपके कर्म ही , आपके साथ जाएंगे ....! कोई आपके साथ नहीं देगा .... जब तक आपके पास धन है ... सभी आपके सच्चे मित्र हैं.... आपका धन , आपकी काया जैसे ही समाप्त होगी..... वही सच्चा साथी, आपका वैरी बन जाएगा....! *जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸 🔆💥 🔆💥 *मेरे साथ-मेरा क्या जाएगा* एक विद्वान साधु थे जो दुनियादारी से दूर रहते थे। वह अपनी ईमानदारी,सेवा तथा ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार वह पानी के जहाज से लंबी यात्रा पर निकले। उन्होंने यात्रा में खर्च के लिए पर्याप्त धन तथा एक हीरा संभाल के रख लिया । ये हीरा किसी राजा ने उन्हें उनकी ईमानदारी से प्रसन्न होकर भेंट किया था सो वे उसे अपने पास न रखकर किसी अन्य राजा को देने जाने के लिए ही ये यात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान साधु की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। वे उन्हें ज्ञान की बातें बताते गए। एक फ़क़ीर यात्री ने उन्हें नीचा दिखाने की मंशा से नजदीकियां बढ़ ली। एक दिन बातों-बातों में साधु ने उसे विश्वासपात्र अल्लाह का बन्दा समझकर हीरे की झलक भी दिखा दी। उस फ़क़ीर को और लालच आ गया। उसने उस हीरे को हथियाने की योजना बनाई। रात को जब साधु सो गया तो उसने उसके झोले तथा उसके वस्त्रों में हीरा ढूंढा पर उसे नही मिला। अगले दिन उसने दोपहर की भोजन के समय साधु से कहा कि इतना कीमती हीरा है,आपने संभाल के रक्खा है न। साधु ने अपने झोले से निकलकर दिखाया कि देखो ये इसमे रखा है। हीरा देखकर फ़क़ीर को बड़ी हैरानी हुई कि ये उसे कल रात को क्यों नही मिला। आज रात फिर प्रयास करूंगा ये सोचकर उसने दिन काटा और सांझ होते ही तुंरन्त अपने कपड़े टांगकर, समान रखकर, स्वास्थ्य ठीक नही है कहकर जल्दी सोने का नाटक किया। निश्चित समय पर सन्ध्या पूजा अर्चना के पश्चात जब साधु कमरे में आये तो उन्होंने फ़क़ीर को सोता हुआ पाया । सोचा आज स्वास्थ ठीक नही है इसलिए फ़क़ीर बिना इबादत किये जल्दी सो गया होगा। उन्होंने भी अपने कपड़े तथा झोला उतारकर टांग दिया और सो गए। आधी रात को फ़क़ीर ने उठकर फिर साधु के कपड़े तथा झोला झाड़कर झाड़कर देखा। उसे हीरा फिर नही मिला। अगले दिन उदास मन से फकीर ने साधु से पूछा - "इतना कीमती हीरा संभाल कर तो रखा है ना साधुबाबा,यहां बहुत से चोर है"। साधु ने फिर अपनी पोटली खोल कर उसे हीरा दिखा दिया। अब हैरान परेशान फ़क़ीर के मन में जो प्रश्न था उसने साधु से खुलकर कह दिया उसने साधु से पूछा कि- " मैं पिछली दो रातों से आपकी कपड़े तथा झोले में इस हीरे को ढूंढता हूं मगर मुझे नहीं मिलता, ऐसा क्यों , रात को यह हीरा कहां चला जाता है साधु ने बताया- *" मुझे पता है कि तुम कपटी हो, तुम्हारी नीयत इस हीरे पर खराब थी और तुम इसे हर रात अंधेरे में चोरी करने का प्रयास करते थे इसलिए पिछले दो रातों से मैं अपना यह हीरा तुम्हारे ही कपड़ों में छुपा कर सो जाता था और प्रातः उठते ही तुम्हारे उठने से पहले इसे वापस निकाल लेता था"* मेरा ज्ञान यह कहता है कि *व्यक्ति अपने भीतर नई झांकता, नहीं ढूंढता। दूसरे में ही सब अवगुण तथा दोष देखता है। तुम भी अपने कपड़े नही टटोलते थे।"* फकीर के मन में यह बात सुनकर और ज्यादा ईर्ष्या और द्वेष उत्पन्न हो गया । वह मन ही मन साधु से बदला लेने की सोचने लगा। उसने सारी रात जागकर एक योजना बनाई। सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, 'हाय मैं मर गया। मेरा एक कीमती हीरा चोरी हो गया।' वह रोने लगा। जहाज के कर्मचारियों ने कहा, 'तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।' यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब साधु बाबा की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, 'आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो अविश्वास करना ही अधर्म है।’ यह सुन कर साधु बोले, 'नहीं, जिसका हीरा चोरी हुआ है उसके मन में शंका बनी रहेगी इसलिए मेरी भी तलाशी ली जाए।’ बाबा की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला। दो दिनों के बाद जब यात्रा खत्म हुई तो उसी फ़क़ीर ने उदास मन से साधु से पूछा, ‘बाबा इस बार तो मैंने अपने कपड़े भी टटोले थे, हीरा तो आपके पास था, वो कहां गया?' साधु ने मुस्करा कर कहा, 'उसे मैंने बाहर पानी में फेंक दिया। साधु ने पूछा - तुम जानना चाहते हो क्यों? क्योंकि मैंने जीवन में दो ही पुण्य कमाए थे - एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास। अगर मेरे पास से हीरा मिलता और मैं लोगों से कहता कि ये मेरा ही हैं तो शायद सभी लोग साधु के पास हीरा होगा इस बात पर विश्वास नही करते यदि मेरे भूतकाल के सत्कर्मो के कारण विश्वास कर भी लेते तो भी मेरी ईमानदारी और सत्यता पर कुछ लोगों का संशय बना रहता। *"मैं धन तथा हीरा तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को खोना नहीं चाहता, यही मेरे पुण्यकर्म है जो मेरे साथ जाएंगे।"* उस फ़क़ीर ने साधु से माफी मांगी और उनके पैर पकड कर रोने लगा। *जय - जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸

+191 प्रतिक्रिया 31 कॉमेंट्स • 250 शेयर

#पवित्र_शंख_का महत्व व लाभ,.....🌹🌹 हिन्दू धर्म में प्रत्येक मांगलिक कार्य के अवसर पर शंख बजाना अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है। साथ ही इसके अनेक वैज्ञानिक लाभ भी हैं, जो शंख बजाने वाले को अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। अगर दिन की शुरुआत शंख की आवाज़ से किया जाए तो दिन बहुत अच्छा जाता है। शंख का महत्व व लाभ,........🌹🌹🌹🌹 1) यदि गर्भावस्था के समय माँ को शंख में जल भरकर पिलाया जाए, तो उसकी संतान को वाणी संबंधी कोई भी समस्या नहीं होती है। चिकित्सकों के अनुसार गर्भवती महिलाओं को शंख नहीं बजाना चाहिए, क्योंकि इससे उनके गर्भ पर दबाव पड़ता है। 2) तोतला या हकलाकर बोलने वाले बच्चे यदि शंख में जल भरकर पिएँ और शंख बजाएं तो उनकी वाणी संबंधी समस्याएँ चमत्कारिक रूप से दूर हो जाती हैं। 3) शंख बजाने से फेफड़ों का व्यायाम होता है। पुराणों के अनुसार श्वास का रोगी नियमित शंख बजाकर इस रोग से मुक्ति पा सकता है| 4) बर्लिन विश्वविद्यालय में किए गए एक अनुसंधान के अनुसार शंख की ध्वनि जीवाणुओं-कीटाणुओं को नष्ट करने का सर्वोत्तम साधन है। शंखघोष गूँजने वाले स्थान पर दुष्टात्माएँ प्रवेश नहीं कर सकतीं। शंख में रखे जल में भी कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भुत शक्ति होती है। शंखनाद से व्यक्ति का शरीर एवं उसके आसपास का वातावरण शुद्ध होता है और मन में सतोगुण का संचार होता है, जिससे सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं। इससे शंख बजाने वाले के मस्तिष्क का प्रसुप्त तंत्र जागृत होता है, जो उसके व्यक्तित्व विकास में अत्यंत सहायक होता है। 5) शंख में गंधक, फास्फोरस और कैल्शियम जैसे उपयोगी पदार्थ विद्यमान होते हैं। अतः ये स्वास्थ्यप्रद गुण उसमें रखे जल में भी आ जाते हैं। अतः शंख में रखा पानी पीना हड्डियों और दांतों की मजबूती के लिए बहुत लाभदायक है। 6) शिव को छोड़कर सभी देवताओं पर शंख से जल अर्पित किया जा सकता है। शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। 7) शंख से वास्तुदोष ही दूर नहीं होता इससे आरोग्य वृद्धि, आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-दोष शांति, विवाह आदि की रुकावट भी दूर होती है। 8) शंख दो प्रकार के होते हैं:- दक्षिणावर्ती एवं वामावर्ती। लेकिन एक तीसरे प्रकार का भी शंख पाया जाता है जिसे मध्यावर्ती या गणेश शंख कहा गया है। * दक्षिणावर्ती शंख पुण्य के ही योग से प्राप्त होता है। यह शंख जिस घर में रहता है, वहां लक्ष्मी की वृद्धि होती है। इसका प्रयोग अर्घ्य आदि देने के लिए विशेषत: होता है। * वामवर्ती शंख का पेट बाईं ओर खुला होता है। इसके बजाने के लिए एक छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं। 9) महाभारत में भगवान कृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था जिसकी ध्वनि कई किलोमीटर तक पहुंच जाती थी। पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:। पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:।।-महाभारत 10) अथर्ववेद के अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है- शंखेन हत्वा रक्षांसि। भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है। यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला व्यक्ति अपिक्षित है। 11) महाभारत काल में अद्भुत शौर्य और शक्ति का संबल शंखनाद से होने के कारण ही योद्धाओं द्वारा इसका प्रयोग किया जाता था। श्रीकृष्ण का ‘पांचजन्य’ नामक शंख तो अद्भुत और अनूठा था, जो महाभारत में विजय का प्रतीक बना। 12) शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख की ध्वनि को ॐ की ध्वनि के समकक्ष माना गया है। शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है 13) शंख समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह अनमोल रत्नों में से एक है। लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने के कारण इसे लक्ष्मी भ्राता भी कहा जाता है। यही कारण है कि जिस घर में शंख होता है वहां लक्ष्मी का वास होता है। 14) शंख को कारखाने में स्था‍पित किया जाए तो कारखाने में तेजी से आर्थिक उन्नति होती है। यदि व्यापार में घाटा हो रहा है, दुकान से आय नहीं हो रही हो तो एक शंख दुकान के गल्ले में रखा जाए तो इससे व्यापार में वृद्धि होती है। 15) शंख को मंत्र सिद्ध व प्राण-प्रतिष्ठा पूजा कर स्थापित किया जाए तो उसमें जल भरकर लक्ष्मी के चित्र के साथ रखा जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आर्थिक उन्नति होती है। 16) शंख को घर में स्थापित कर रोज 'ॐ श्री महालक्ष्मै नम:' 11 बार बोलकर 1-1 चावल का दाना शंख में भरते रहें। इस प्रकार 11 दिन तक प्रयोग करें। यह प्रयोग करने से आर्थिक तंगी समाप्त हो जाती है। इसी तरह प्रत्येक शंख से अलग अलग लाभ प्रा‍प्त किए जा सकते हैं। 17) शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप है जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है। तीर्थाटन से जो लाभ मिलता है, वही लाभ शंख के दर्शन और पूजन से मिलता है। 18) शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं होते। 19) शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंख वादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है। गोरक्ष संहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्य संहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्ती शंख को आयुर्वद्धक और समृद्धि दायक कहा गया है। 20) पेट में दर्द रहता हो, आंतों में सूजन हो अल्सर या घाव हो तो दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है। यही नहीं, कालसर्प योग में भी यह रामबाण का काम करता है। 21) शंख को किसी भी दिन लाकर पूजा स्थान पर पवित्र करके रख लें और प्रतिदिन शुभ मुहूर्त में इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए तो घर में वास्तु दोष का प्रभाव कम हो जाता है। शंख में गाय का दूध रखकर इसका छिड़काव घर में किया जाए तो इससे भी सकारात्मक उर्जा का संचार होता है। भगवान कृष्ण आपकी हर मनोकामना पूर्ण करें,..🌹🌹 ,..🙏🙏..🌹🌹..राधे राधे जी..🌹🌹..🙏🙏..,

+11 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 21 शेयर

+20 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 85 शेयर
M.S.Chauhan Dec 3, 2020

*शुभ रात्रि जी* *जय श्री राम जी की* *एक बहुत सुन्दर लघुकथा* *ट्रेन के इंतजार में एक बुजुर्ग रेलवे स्टेशन पर बैठकर रामायण पढ़ रहे थे तभी वहां ट्रेन के इंतजार में बैठे एक नव दंपत्ति जोड़े में से उस नवयुवक ने कहा- बाबा आप इन सुनी सुनाई कहानी कथाओं को पढ़कर क्यों अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, इनसे आपको क्या सीखने को मिलेगा; अगर पढ़ना ही है तो इंडिया टुडे पढ़ो, अखबार पढ़ो और भी बहुत सारी चीजें हैं जो आपको दुनियादारी की बातें सिखाती हैं, व्यवहारिक ज्ञान देती है, उन्हें पढ़ो। तभी अचानक ट्रेन आ गई युवक अगले गेट से और बाबा पिछले गेट से ट्रेन में चढ़ गए। ट्रेन चलने के थोड़ी देर बाद युवक के चीखने चिल्लाने की आवाज आई, क्योंकि युवक खुद तो ट्रेन में चढ़ गया था पर उसकी पत्नी नीचे रह गई, ट्रेन में नहीं चढ़ सकी। तभी बाबा ने कहा बेटा तुमने इंडिया टुडे, अखबार व अन्य सैकड़ों पुस्तकें पढ़ने के बजाय अगर रामायण पढ़ी होती तो तुम्हें ज्ञात होता कि राम जी ने वनवास जाते समय पहले सीता जी को रथ पर चढ़ाया था उसके बाद खुद चढ़े थे। अतः तुम भी पहले अपनी पत्नी को ट्रेन में चढ़ाते उसके बाद खुद चढ़ते तो आज तुम्हारे साथ यह वाकिया नहीं होता....* *अतः इस लेख का तात्पर्य यह है कि.*.. *आधुनिक ज्ञान हमारे भौतिक सुख को बढ़ा सकता है लेकिन हमारा सनातन धर्म और हमारे ग्रंथ हमें जीवन जीना सिखाते हैं। इसलिए जो बात हमें हमारे ग्रंथ व सनातन धर्म सिखाता है वह आज की पुस्तकें नहीं* *लघु कथा अच्छी लगी तो बोले* *💐जय श्री राम💐* 🌷🌼⭐🙏⭐🌼🌷

+106 प्रतिक्रिया 27 कॉमेंट्स • 123 शेयर

हिंदू शास्त्र के नियम 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 विचारों में अपवित्रता होना भी किसी पाप से कम नहीं, हिंदू शास्त्र में मनुष्य जीवन से संबंधित एेसी कई बातें बताई गई हैं, जिस से व्यक्ति को बहुत कुछ सीखने को मिलता हैं। इतना ही धर्म शास्त्र में मनुष्य के जन्म से लेकर उसकीे मृत्यु तक के बारे में विस्तार मिलता है। तो आईए जानते हिंदू शास्त्र में बताए एेसे 10 काम जो मनुष्य को गरीबी से कभी मुक्ति नहीं दिला पाते। कुछ लोग नियमित पूजा-पाठ करते हैं लेकिन वह फिर भी धन के मामले में सदैव दुखी ही रहते हैं। धन का सुख मिलेगा या नहीं, ये बात पुराने कर्मों के साथ ही वर्तमान के कर्मों पर भी निर्भर करती है। यदि दरिद्रता से मुक्ति पानी हो तो शास्त्रों के अनुसार वर्जित किए गए कुछ काम बिलकुल नहीं करने चाहिए। जो लोग इन कामों से बचते हैं, उन्हें महालक्ष्मी के साथ ही सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है और जो नहीं करते उनके घर हमेशा गरीबी का वास रहता है। ज्ञान और विद्या का घमंड न करें 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 जो लोग अपने ज्ञान और विद्या का घमंड करते हैं, वे लक्ष्मी की स्थाई कृपा प्राप्त नहीं कर पाते हैं। अपने ज्ञान और विद्या का उपयोग दूसरों को दुख देने में, सिर्फ अपने स्वार्थों को पूरा करने में, दूसरों का अपमान करने में करेंगे तो लंबे समय तक सुखी नहीं रह सकते। भविष्य में सुखी रहने के लिए अपने ज्ञान और विद्या से दूसरों के दूख दूर करने के प्रयास करें। शास्त्रों का अपमान न करें 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 शास्त्रों को पूजनीय और पवित्र माना गया है। इनमें श्रेष्ठ जीवन के लिए महत्वपूर्ण सूत्र बताए गए हैं। जो लोग शास्त्रों की बातों का पालन करते हैं, वे कभी भी दुखी नहीं होते हैं। इसलिए शास्त्रों का अपमान नहीं करना चाहिए, इनका अपमान करना महापाप है। यदि हम शास्त्रों का सम्मान नहीं कर सकते हैं तो अपमान भी नहीं करना चाहिए। गुरु की बुराई का न करें 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 गुरु का महत्व भगवान से भी अधिक बताया गया है। अच्छे गुरु के बिना हम पाप और पुण्य का भेद नहीं समझ सकते हैं। गुरु द्वारा ही भगवान को प्रसन्न करने के सही उपाय बताए जाते हैं। गुरु की शिक्षा का पालन करने पर हम दरिद्रता और दुखों से मुक्त हो सकते हैं। गुरु पूजनीय है, सदैव इनका सम्मान करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में गुरु का अपमान न करें, अन्यथा दुख कभी दूर नहीं होंगे। बुरा न बोलें 🔸🔹🔸 कभी भी ऐसे शब्दों का उपयोग नहीं करना चाहिए, जिनसे दूसरों को दुख पहुंचे। वाणी से दूसरों को दुख देना भी महापाप है, इससे जितना हो सके बचना चाहिए। विचारों की पवित्रता बनाए रखें 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 विचारों में अपवित्रता यानी बुरा सोचना भी किसी पाप से कम नहीं होता। स्त्री या हो पुरुष, दूसरों के लिए गंदा सोचने पर देवी-देवताओं की प्रसन्नता प्राप्त नहीं की जा सकती है। विचारों की पवित्रता बनाए रखें। इसके लिए गलत साहित्य से दूर रहें और आध्यात्मिक साहित्य पढ़ें, ध्यान करें। इससे विचारों की गंदगी दूर हो सकती है। दिखावे से बचें 🔸🔸🔹🔸🔸 जिन लोगों की आदत दिखावा करने की होती है, वे भी दुखी रहते हैं। छिप-छिपकर गलत काम करते हैं और दूसरों के सामने खुद को धार्मिक और अच्छा इंसान बताते हैं, वे लोग कभी न कभी बड़ी परेशानियों का सामना करते हैं। धर्म के विरुद्ध आचरण करने पर पाप और दुख बढ़ते हैं। ज्ञानी होते हुए भी परमात्मा को न मानना 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 जो लोग अज्ञानी हैं, वे तो परमात्मा के संबंध में तरह-तरह के वाद-विवाद करेंगे ही, लेकिन जो लोग ज्ञानी हैं, यदि वे परमात्मा को नहीं मानते हैं तो वे जीवन में बहुत ज्यादा दुख भोगते हैं। परमात्मा यानी भगवान की भक्ति से सभी दुख दूर हो सकते हैं। दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या न करें 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 काफी लोग दूसरों के सुख को देखकर ही दुखी रहते हैं। कभी भी दूसरों के सुख से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। जो सुख-सुविधाएं हमारे पास हैं, उन्हीं में खुश रहना चाहिए। दूसरों के सुख को देखकर ईर्ष्या करेंगे तो कभी भी सुखी नहीं हो पाएंगे। दूसरों की संपत्ति को हड़पना नहीं चाहिए 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 दूसरों की संपत्ति हड़पना, लालच करना भी पाप है। हमें अपनी मेहनत से कमाई गई संपत्ति के अतिरिक्त दूसरों की संपत्ति को देखकर लालच नहीं करना चाहिए। लालच को बुरी बला कहा जाता है। जो लोग लालच करते हैं, वे कभी भी संतुष्ट नहीं हो पाते हैं और लगातार सोचते रहते हैं, इस कारण मानसिक शांति भी नहीं मिलती है। मान-सम्मान पाने के लिए दान न करें 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 गुप्त दान को श्रेष्ठ दान माना जाता है। गुप्त दान यानी ऐसा दान जो बिना किसी को बताए दिया जाता है। दान देने वाले व्यक्ति की पहचान भी गुप्त रहती है। जो लोग मान-सम्मान पाने के लिए दान करते हैं, दूसरों को दिखा-दिखाकर मदद करते हैं, स्वयं को बड़ा दिखाने के लिए दान करते हैं, वे ऐसे दान से पूर्ण पुण्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

+17 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 7 शेयर

गीताप्रेस गोरखपुर का इतिहास क्या है? जिसने घर-घर तक गीता पहुँचाया, धर्म की सेवा ‘घाटे का सौदा’नहीं है ये सीख दी। गीता प्रेस के संस्थापक श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार को नमन। बंगाली बड़ी तेज़ी से हिन्दू से ईसाई बनते जा रहे थे। कारण था - कलकत्ता मे मदर टेरेसा की ईसाई मिशनरी। यहाँ बाइबिल के अलावा ईसाईयों की अन्य किताबें (जिनमें हिन्दू धार्मिक परम्पराओं के अनादर से लेकर झूठ तक भरा होता था,) सहज उपलब्ध थीं। तभी युवा हनुमान प्रसाद पोद्दार ने... गीता प्रेस गोरखपुर आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है- धर्मशास्त्रों के मुद्रण (छपाई) और वितरण में अग्रणी इस प्रकाशक की माली हालत भले ऊपर-नीचे चलती रहती हो, जो किसी भी व्यवसायिक संस्थान के साथ होता ही रहता है, लेकिन हिन्दू समाज में इसके जितना सम्मान शायद ही किसी संस्थान का है किसी और का नहीं। और गीता प्रेस को इस मुकाम तक पहुँचाने में जिनका योगदान सबसे अधिक रहा, उनमें से एक हैं हनुमान प्रसाद पोद्दार- गीताप्रेस की मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ के संस्थापक सम्पादक, और इसे अखिल-भारतीय विस्तार देने वाले स्वप्नदृष्टा, जिन्होंने यह मिथक तोड़ा कि धर्म के प्रचार-प्रसार के काम में आर्थिक हानि ही होती है, या इसमें पैसे का निवेश घाटे का सौदा ही होता है। अंग्रेजों ने मोड़ा राष्ट्रवाद की ओर 17 सितंबर, 1892 को जन्मे हनुमान प्रसाद पोद्दार की राष्ट्रवादी और राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी जीवन के शुरुआती दौर में न के बराबर थी*। जैसा कि उनके मारवाड़ी समुदाय में उस समय का प्रचलन था, उन्होंने कम उम्र में ही शादी की, पत्नी को माँ-बाप की सेवा में बिठाया और काम-धंधा सीखने कलकत्ते निकल पड़े। *लेकिन उन दिनों का कलकत्ता राष्ट्रवादी क्रांतिकारी आन्दोलन का गढ़ था। युवा पोद्दार के हॉस्टल के भी कुछ युवक क्रांतिकारी निकले, और अंग्रेज़ पुलिस ने लगभग पूरे हॉस्टल के नौजवानों को बिना चार्ज जेल में ठूँस दिया- अंडरट्रायल के नाम पर सड़ने के लिए। इस अन्याय, और जेल में क्रांतिकारियों-राष्ट्रवादियों की संगति, ने पोद्दार को बदल दिया- वे जेल से छूटने के बाद शुरू में तो व्यापार के सिलसिले में बम्बई चले गए, लेकिन उनकी रुचि धीरे-धीरे अर्थ से अधिक धर्म और राष्ट्र की तरफ झुकने लगी थी। बाइबिल के बराबर गीता का प्रसार करने के लिए शुरू की प्रेस अलीपुर जेल में श्री ऑरोबिंदो (उस समय बाबू ऑरोबिंदो घोष) के साथ बंद रहे पोद्दार ने जेल में ही गीता का अध्ययन शुरू कर दिया था। वहाँ से छूटने के बाद उन्होंने ध्यान दिया कि कैसे कलकत्ता ईसाई मिशनरी गतिविधियों का केंद्र बना हुआ था, जहाँ बाइबिल के अलावा ईसाईयों की अन्य किताबें भी, जिनमें हिन्दुओं की धार्मिक परम्पराओं के लिए अनादर से लेकर झूठ तक भरा होता था, सहज उपलब्ध थीं। लेकिन गीता- जो हिन्दुओं का सर्वाधिक जाना-माना ग्रन्थ था, उसकी तक ढंग की प्रतियाँ उपलब्ध नहीं थीं। इसीलिए बंगाली तेज़ी से हिन्दू से ईसाई बनते जा रहे थे। मारवाड़ी अधिवेशन में पड़ी कल्याण की नींव 1926 में हुए मारवाड़ी अग्रवाल महासभा के दिल्ली अधिवेशन में पोद्दार की मुलाकात सेठ घनश्यामदास बिड़ला से हुई, जिन्होंने आध्यात्म में पहले ही गहरी रुचि रखने वाले पोद्दार को सलाह दी कि जन-सामान्य तक आध्यात्मिक विचारों और धर्म के मर्म को पहुँचाने के लिए आम भाषा (आज हिंदी, उस समय की ‘हिन्दुस्तानी’) में एक सम्पूर्ण पत्रिका प्रकाशित होनी चाहिए।..... पोद्दार ने उनके इस विचार की चर्चा जयदयाल गोयनका से की, जो उस समय तक गोबिंद भवन कार्यालय के अंतर्गत गीता प्रेस नामक प्रकाशन का रजिस्ट्रेशन करा चुके थे। गोयनका ने पोद्दार को अपनी प्रेस से यह पत्रिका निकालने की ज़िम्मेदारी दे दी, और इस तरह ‘कल्याण’ पत्रिका का उद्भव हुआ, जो तेज़ी से हिन्दू घरों में प्रचारित-प्रसारित होने लगी। आज कल्याण के मासिक अंक लगभग हर प्रचलित भारतीय भाषा और इंग्लिश में आने के अलावा पत्रिका का एक वार्षिक अंक भी प्रकाशित होता है, जो अमूमन किसी-न-किसी एक पुराण या अन्य धर्मशास्त्र पर आधारित होता है। गीता प्रेस की स्थापना का उद्देश्य गीता प्रेस की स्थापना के पीछे का दर्शन स्पष्ट था- प्रकाशन और सामग्री/जानकारी की गुणवत्ता के साथ समझौता किए बिना न्यूनतम मूल्य और सरलतम भाषा में धर्मशास्त्रों को जन-जन की पहुँच तक ले जाना। हालाँकि गीता प्रेस की स्थापना गैर-लाभकारी संस्था के रूप में हुई, लेकिन गोयनका-पोद्दार ने इसके लिए चंदा लेने से भी इंकार कर दिया, और न्यूनतम लाभ के सिद्धांत पर ही इसे चलाने का निर्णय न केवल लिया, बल्कि उसे सही भी साबित करके दिखाया। 5 साल के भीतर गीताप्रेस देश भर में फ़ैल चुकी थी, और विभिन्न धर्मग्रंथों का अनुवाद और प्रकाशन कर रही थी। गरुड़पुराण, कूर्मपुराण, विष्णुपुराण जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन ही नहीं, पहला शुद्ध और सही अनुवाद भी गीता प्रेस ने ही किया। बम्बई से आई गोरखपुर, गोरखधाम बना संरक्षक गीता प्रेस ने श्रीमद्भागवत गीता और रामचरितमानस की करोड़ों प्रतियाँ प्रकाशित और वितरित की हैं। इसका पहला अंक वेंकटेश्वर प्रेस बम्बई से प्रकाशित हुआ, और एक साल बाद इसे गोरखपुर से ही प्रकाशित किया जाने लगा। उसी समय गोरखधाम मन्दिर के प्रमुख और नाथ सम्प्रदाय के सिरमौर की पदवी को प्रेस का मानद संरक्षक भी नामित किया गया- यानी आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और नाथ सम्प्रदाय के मुखिया योगी आदित्यनाथ गीता प्रेस के संरक्षक हैं। गीता प्रेस की सबसे खास बात है कि इतने वर्षों में कभी भी उस पर न ही सामग्री (‘content’) की गुणवत्ता के साथ समझौते का इलज़ाम लगा, न ही प्रकाशन के पहलुओं के साथ- वह भी तब जब 60 करोड़ से अधिक प्रतियाँ प्रेस से प्रकाशित हो चुकीं हैं। 96 वर्षों से अधिक समय से इसका प्रकाशन उच्च गुणवत्ता के कागज़ पर ही होता है, छपाई साफ़ और स्पष्ट, अनुवाद या मुद्रण (printing) में शायद ही कभी कोई त्रुटि रही हो, और subscription लिए हुए ग्राहकों को यह अमूमन समय पर पहुँच ही जाती है- और यह सब तब, जबकि पोद्दार ने इसे न्यूनतम ज़रूरी मुनाफे के सिद्धांत पर चलाया, और यही सिद्धांत आज तक वर्तमान में 200 कर्मचारियों के साथ काम कर रही गीता प्रेस गोरखपुर में पालित होता है। न ही गीता प्रेस पाठकों से बहुत अधिक मुनाफ़ा लेती है, न ही चंदा- और उसके बावजूद गुणवत्ता में कोई कमी नहीं। ‘भाई जी’ कहलाने वाले पोद्दार ने ऐसा सिस्टम बना और चला कर यह मिथक तोड़ दिया कि धर्म का काम करने में या तो धन की हानि होती है (क्योंकि मुनाफ़ा कमाया जा नहीं सकता), या फिर गुणवत्ता की (क्योंकि बिना ‘पैसा पीटे’ उच्च गुणवत्ता वाला काम होता नहीं है)। उन्होंने मुनाफ़ाखोरी और फकीरी के दोनों चरम छोरों पर जाने से गीता प्रेस को रोककर, ethical business और धर्म-आधारित entrepreneurship का उदाहरण प्रस्तुत किया। ठुकराया राय बहादुर और भारत रत्न, आज भी जारी अखंड रामचरित मानस पाठ हनुमान प्रसाद पोद्दार उन चुनिन्दा सार्वजनिक हस्तियों में रहे, जिन्होंने अंग्रेजों का राय बहादुर और आज़ादी के बाद भारत सरकार का भारत रत्न दोनों ही मना कर दिया।.... 22 मार्च, 1971 को उनकी मृत्यु हो जाने के बाद प्रेस के जिस कमरे में, जिस डेस्क पर बैठकर वह प्रेस के संचालन और ‘कल्याण’ के सम्पादन के साथ-साथ ‘शिव’ के छद्म नाम से पत्रिका में लेखन भी करते थे, वह डेस्क और कमरा आज भी अक्षुण्ण रखे गए हैं। उनके कमरे में आज भी अखंड रामचरित मानस पाठ बदस्तूर चलता रहता है, जिसके लिए लोग पालियों में भागीदारी करते हैं। ऐसे अमर धर्मवीर हनुमान प्रसाद जी को कोटि कोटि नमन। प्रभु चरणों मे विनती हैं कि यह गीता प्रेस और भी गति से अपना कार्य करें ।

+28 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 14 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB