Neha Sharma, Haryana
Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 146*✳️✳️ ✳️✳️*प्रभु का पुरी में भक्तों से पुनर्मिलन*✳️✳️ *अद्यास्मांक सफलमभवज्जन्म नेत्रे कृतार्थे *सर्वस्ताप: सपदि वरितो निर्वृतिं प्राप चेत:। *किं वा ब्रूमो बहुलमपरं पश्य जन्मान्तरं नो *वृन्दारण्यात् पुनरूपगतो नीलशैलं यतीन्द्र:॥ *'संन्यासिचूडामणि श्रीचैतन्य वृन्दावन से लौटकर पुन: नीलाचल आ गये हैं- इस सुखद संवाद के श्रवणमात्र से ही गौर भक्तों में अपार आनन्द छा गया। वे परस्पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए एक-दूसरे का आलिंगन करने लगे। कोई जल्दी से दौड़कर कानों में अमृत का सिंचन करने वाले इस प्रिय समाचार को दूसरे से कहता, वह तीसरे के पास दौड़ा जाता। इसी प्रकार क्षण भर में यह संवाद सम्पूर्ण जगन्नाथपुरी में फैल गया। महाप्रभु जब वृन्दावन को जा रहे थे, तभी सब भक्तों ने समझ लिया था कि प्रभु के अन्तिम दर्शन हैं। जो वृन्दावन का नाम सुनते ही मूर्च्छित हो जाते हैं, जिनकी दृष्टि में वृन्दावन से बढ़ाकर विश्व ब्रह्माण्ड में कोई उत्तम स्थान ही नहीं हैं, वे वृन्दावन पहुँचकर फिर वहाँ से क्यों लोटने लगे? अब तो प्रभु वृन्दावनवास करते हुए उस बाँकेविहारी के साथ निरन्तर आनन्दविहार में ही निमग्न रहेंगे, किन्तु जब भक्तों ने सुना, प्रभु वृन्दावन से लौट आये हैं, तब तो उनके आनन्द की सीमा नहीं रही और सभी प्रेमोन्मत्त होकर संकीर्तन करते हुए एक स्थान पर एकत्रित होने लगे। सभी मिलकर प्रभु को लेने चले। सार्वभौम भट्टाचार्य और राय रामानन्द जी उन सभी भक्तों के अग्रणी थे। उन्होंने दूर से देखा, काषायाम्बर धारण किये हुए प्रभु श्री हरि के मधुर नामों का उच्चारण करते-करते मत्त गजेन्द्र की भाँति आनन्द में विभोर हुए श्री मन्दिर की ओर चले आ रहे हैं, तब तो सभी ने भूमि में लोटकर प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया। अपने पैरों के नीचे पड़े सभी भक्तों को प्रभु ने अपने कोमल करों से स्वयं उठाया और सभी को एक-एक करके छाती से लगाया। आज चिरकाल के अनन्तर प्रभु का प्रेमालिंगन प्राप्त करके सभी को परम प्रसन्नता हुई और सभी अपने सौभाग्य की सराहना करने लगे। *भक्तों को साथ लेकर प्रभु श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिये गये। पुजारी ने प्रभु को देखते ही उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें जगन्नाथ जी की प्रसादी माला पहनायी तथा उनके सम्पूर्ण शरीर पर प्रसादी चन्दन का दर्शन करके भक्त लेप किया। आज चिरकाल में जगन्नाथ जी के दर्शन करके भक्त-चूड़ामणि श्री गौरांग प्रेम में विह्वल होकर जोरों से रुदन करने लगे। भक्तों ने मन्दिर के श्री आँगन में ही संकीर्तन आरम्भ कर दिया। नर्तकों के अग्रणी श्री चैतन्य देव दोनों हाथों को ऊपर उठा-उठाकर नृत्य करने लगे। *महाप्रभु के नृत्य को देखने के लिये लोगो की अपार भीड़ वहाँ आकर एकत्रित हो गयी। सभी प्रभु के उद्दण्ड नृत्य को देखकर अपने आपेको भूल गये और भावावेश में आकर सभी- *हरिहरये नम: कृष्णयादवाय नम:। *गोपाल गोविन्द राम श्री मधुसूदन॥ *कह कहकर नृत्य करने लगे। कुछ काल के अनन्तर प्रभु ने संकीर्तन बंद कर दिया और आप श्री मन्दिर की प्रदक्षिणा करते हुए भक्तों के सहित काशी मिश्र के घर अपने पूर्व के निवास स्थान पर आये। मिश्र जी ने प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया इतने में ही परमानन्दपुरी प्रभु का आगमन सुनकर भीतर से बाहर निकल आये। प्रभु ने श्रद्धा पूर्वक पुरी के चरणों में प्रणाम किया। पुरी महाराज ने प्रभु का आलिंगन किया और वे हाथ पकड़कर भीतर ले गये। सभी के बैठ जाने पर प्रभु अपनी यात्रा का वृत्तान्त बताने लगे। व्रजमण्डल की बातें करते-करते उनका गला भर आया, नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगी। तब सार्वभौम ने प्रभु से अपने यहाँ भिक्षा करने की प्रार्थना की। *प्रभु ने कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय! आज चिरकाल में तो मेरी भक्तों से भेंट हुई हैं, तिस पर भी मैं अकेला ही भिक्षा करूँ, यह मुझे अच्छा नहीं प्रतीत होता। आज तो मेरी इच्छा है कि अपने सभी भक्तों के सहित यहीं भगवान का प्रसाद पाऊं।’ इस बात से भट्टाचार्य बड़ी प्रसन्नता हुई। वे काशी मिश्र, वाणीनाथ तथा और भी दो-चार भक्तों को साथ लेकर महाप्रसाद लेने चले। सभी भक्तों के खाने योग्य बहुत बढ़िया-बढ़िया बहुत-सी प्रसादी-वस्तुएं भट्टाचार्य जी ने वहाँ लाकर उपस्थित कर दीं। प्रभु ने भक्तों को साथ लेकर बड़े ही स्नेह के सहित भगवान का प्रसाद पाया। प्रभु के पास प्रसाद पाने से सभी को परम प्रसन्नता प्राप्त हुई, सभी अपने-अपने भाग्य की प्रशंसा करने लगे। प्रसाद पाकर प्रभु विश्राम करने लगे और भक्त अपने-अपने घरों को चले गये। *इधर स्वरूप गोस्वामी ने दामोदर पण्डित के हाथों प्रभु के आगमन का सुखद संवाद नवद्वीप में शची माता, विष्णुप्रिया तथा अन्यान्य सभी भक्तों के समीप पठाया। प्रभु के आगमन का संवाद सुनकर गौर भक्त आनन्द के सहित नृत्य करने लगे। वे जल्दी-जल्दी रथयात्रा के समय की प्रतीक्षा करने लगे। श्री शिवानन्द सेन समाचार सुनते ही यात्रा की तैयारियाँ करने लगे। शान्तिपुराधीश श्री अद्वैताचार्य अपने सभी भक्तों के सहित नीलाचल के लिये तैयार हुए। श्रीखण्ड, कुलियाग्राम, कांचनापाड़ा, कुमारहट्ट, शान्तिपुर तथा नवद्वीप के सैकड़ो भक्त प्रभुदर्शनों की लालसा से चले। सदा की भाँति श्री शिवानन्द सेन जी ने ही सबकी यात्रा का प्रबन्ध किया। सभी भक्त तथा भक्तों की स्त्रियाँ प्रभु के निमित्त भाँति-भाँति के पदार्थ लेकर और विष्णुप्रिया तथा शचीमाता से आज्ञा आज्ञा माँगकर प्रभु के दर्शनों के निमित्त रथयात्रा को उपलक्ष्य बनाकर पैदल ही पुरी की ओर चल दिये। *अब के शिवानन्द जी के साथ उनका कुत्ता भी चला। उन्होंने उसे बहुत रोका, किन्तु वह किसी प्रकार भी न रुका, तब तो सेन महाशय उसे भोजन कराते हुए साथ-ही-साथ ले चले। रास्ते में घाट वालों ने कुत्ते को पार उतारने में कई जगह आपत्ति भी की, किन्तु सेन महाशय प्रचुर द्रव्य देकर उसे जिस किसी भाँति उसे पार करा ही ले गये। एक दिन उन्हें घाट वालों से उतराई का हिसाब करते-करते बहुत देर हो गयी। उनके नौकर कुत्ते को भात देना भूल ही गये। इससे कुत्ता क्रद्ध होकर और इन सबका साथ छोड़कर न जाने किधर चला गया। जब शिवानन्द जी ने कुत्ते की खोज करायी तो उसका कहीं भी पता नहीं चला, इससे उन्हें अपार दु:ख हुआ। *दूसरे दिन सभी भक्त प्रभु के समीप पहुँचे। भक्तों ने देखा कि वही कुत्ता प्रभु के समीप बैठा और प्रभु उसे अपने हाथ से खीर खिला रहे हैं, और हंसते-हंसते उससे कह रहे हैं- *कृष्ण कहो, राम कहो, हरि भजो बावरे। *हरिे के भजन बिनु खाओगे क्या पामरे॥ *प्रभु की मधुर वाणी को सुनकर कुत्ता प्रेमपूर्वक पूँछ हिलाता हुआ अपनी भाषा में राम, कृष्ण, हरि आदि भगवान के सुमधुर नामों का कीर्तन कर रहा था। शिवानन्द सेन उस कुत्ते को प्रभु के पास बैठ देखकर परम आश्चर्य करे लगे। वह कुत्ता पहले सभी जगन्नाथपुरी में नहीं आया था और न उसने प्रभु का निवास स्थान देखा था, फिर यह अकेला ही यहाँ कैसे आ गया? सेन महाशय समझ गये कि यह कोई पूर्व जन्म का सिद्ध हैं, किसी कारणवश इसे कुत्ते की योनि प्राप्त हो गयी है। तभी तो प्रभु इसे इतना अधिक प्यार कर रहे हैं, यह सोचकर उन्होंने कुत्ते को साष्टांग प्रणाम किया। कुत्ता पूँछ हिलाता हुआ वहाँ से कही अन्यत्र चला गया। इसके अनन्तर फिर किसी ने उस कुत्ते को नहीं देखा। *महाप्रभु सभी भक्तों से मिले। भक्तों की पत्नियों ने प्रभु को दूरे से ही प्रणाम किया। प्रभु स्त्रियों की ओर न तो कभी देखते थे, न उनका स्पर्श करते थे और न स्त्रियों के सम्बन्ध की बातें ही सुनते थे। स्त्रियों का प्रसंग छिड़ते ही प्रभु अत्यन्त ही संकुचित हो जाते और प्रसंग को जल्दी-से-जल्दी समाप्त कर देते। *नवद्वीप में प्रभु के घर के समीप परमेश्वर नाम का एक भक्त रहता था। वह लड्डू बेचकर अपने परिवार का निर्वाह करता था। बाल्याकाल से ही वह प्रभु के प्रति अत्यन्त ही स्नेह रखता था। जब महाप्रभु बहुत ही छोटे थे, तभी परमेश्वर उन्हें गोद में बिठाकर उनसे 'हरि' 'हरि' बुलवाया करता था और खाने के लिये रोज लडडू देता था। प्रभु भी उससे बहुत स्नेह करते थे। अब वह बूढ़ा हो गया था, अब के वह भी अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के सहित प्रभु के दर्शनों को आया था। प्रभु के पास भीतर स्त्रियाँ नहीं जाती थीं, वे दूर से ही प्रभु का दर्शन करती थीं। भक्त परमेश्वर को इस बात का क्या पता था। उसने अपने कांपते हुए हाथों से भूमि में लोटकर प्रभु को प्रणाम किया और प्रेम के साथ कहने लगा- 'प्रभो! अपने परमेश्वर को तो भूल ही गये होंगे। मुझे अब शायद न पहचान सकेंगे।' *प्रभु ने उसका आलिंगन करते हुए अत्यन्त ही स्नेह से कहा- 'परमेश्वर! भला, तुम्हें मैं कभी भूल सकता हूँ? तुम्हारे लड्डू तो अभी तक मेरे गले में ही अटके हुए हैं, वे नीचे भी नही उतरे! तुम मुझे पुत्र की तरह प्यार करते थे।' *परमेश्वर ने बड़े ही उल्लास के साथ कहा- 'प्रभो! आपका पुत्र, पुत्रवधू तथा घर से सभी आपके दर्शनों के लिये आये हैं। वे सभी आपके दर्शनों को उत्सुक हैं।' *यह कहकर भक्त ने सभी से प्रभु के पाद-स्पर्श कराये। भक्त वत्सल प्रभु संकोच के कारण कुछ भी न कह सके। वे लज्जित भाव से नीचा सिर किये हुए चुपचाप बैठे रहे। परमेश्वर के चले जाने पर भक्तों ने उसे समझाया कि प्रभु के समीप सपरिवार नहीं जाया जाता। बेचारा सरल भक्त इस बात को क्या समझे। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया। तब भक्तों ने उसे समझा दिया। इस प्रकार सभी भक्त प्रभु के समीप रहकर पूर्व की भाँति सत्संग सुख का अनुभव करने लगे। भक्तों की पत्नियाँ बारी-बारी से रोज प्रभु का निमन्त्रण करतीं और उन्हें अपने निवास स्थान पर बुलाकर भिक्षा करातीं। *इधर प्रभु के दर्शनों की लालसा से श्री रूपजी अपने भाई अनूप सहित गौड़ देश होते हुए पुरी को आने लगे। रास्ते में अनूप जी को ज्वर आ गया, दैव की गति, ज्वर-ही-ज्वर में वे इस नश्वर शरीर को परित्याग करके परलोकवासी बन गये। श्री रूप ने अत्यन्त ही दु:ख के साथ अपने कनिष्ठ भाई का शरीर गंगा जी के पावन प्रवाह में कर दिया और वे संसार की अनित्यता का विचार करते हुए पुर में आये। श्री वृन्दावन में ही उन्होंने श्रीकृष्ण लीला विषयक एक नाटक लिखना आरम्भ कर दिया था। रास्ते में वे नाटक के विषय को सोचते जाते थे और रात्रि को जहाँ ठहरते थे, वहीं उस सोचे हुए विषय को लिख लेते थे। उनकी इच्छा थी कि एक ही नाटक को दो भागों में विभक्त करेंगे, पूर्व भाग में तो श्रीकृष्ण की वृन्दावन-लीलाओं का सम्मिलित रूप से ही लिख रहे थे। रास्ते में चलते-चलते जब वे उड़िया देश में 'सत्यभामापुर' नामक ग्राम में आये, तो वहाँ स्वप्न में श्री सत्यभामा जी ने प्रत्यक्ष होकर इन्हें आदेश दिया कि 'तुम हमारी लीलाओं का पृथक ही वर्णन करो। *व्रज की लीलाओं के साथ हमारा वर्णन मत करो।' श्री सत्यभामा जी का आदेश पाकर आपने उसी समय द्वारा की लीलाओं का पृथक वर्णन करने का निश्चय किया और उसका वर्णन उन्होंने 'ललितमाधव' नामक नाटक में किया। उसी समय 'विदग्धमाधव' और ललितमाधव' इन दोनों नामों की उत्पत्ति हुई। *नीलाचल में पहुँचकर ये प्रभु के समीप नहीं गये। ये दोनों ही भाई नम्रता की तो सजीव मूर्ति ही थे, यवनों के संसर्ग में रहने के कारण ये अपने को अत्यन्त ही नीच समझते थे और यहाँ तक कि मन्दिर में घुसकर दर्शन भी नहीं करते थे, दूर से ही जगन्नाथ जी की ध्वजा को प्रणाम कर लेते थे। इसलिये रूप जी महात्मा हरिदास जी के स्थान पर जाकर ठहरे। हरिदास जी तो जाति के यवन थे, किन्तु गौर भक्त उनका चतुर्वेदी ब्राह्मणों से भी अधिक सम्मान करते थे, वे भी जगन्नाथ जी के मन्दिर में प्रवेश नहीं करते थे। यहाँ तक कि जिस रास्ते से मन्दिर के पुजारी और सेवक जाते थे, उस रास्ते से भी कभी नही निकलते थे। प्रभु नित्य प्रति समुद्रस्नान करके हरिदास जी के स्थान पर आते थे। दूसरे दिन जब प्रभु नित्य की भाँति हरिदास जी के आश्रम पर आये, तब श्री रूप जी ने भूमि पर लोटकर प्रभु के पादपद्मों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु की दृष्टि ऊपर की ओर थी। हरिदास जी ने धीरे से कहा- 'प्रभो! रूप जी प्रणाम कर रहे है।' *रूप का नाम सुनते ही चौंककर प्रभु ने कहा- 'हैं! क्या कहा? रूप आये हैं क्या?' यह कहते-कहते प्रभु ने उनका आलिंगन किया और उन्हें वहीं रहने की आज्ञा दी। इसके अनन्तर प्रभु ने सभी गौड़ीय तथा पुरी के भक्तों के साथ श्रीरूप का परिचय करा दिया। श्री रामानन्दराय और सार्वभौम महाशय दोनों ही कवि थे। रूप जी का परिचय पाकर ये दोनों ही परम सन्तुष्ट हुए और प्रभु से इनकी कविता सुनने के लिये प्रार्थना करने लगे। *एक दिन प्रभु राय रामानन्द जी, सार्वभौम भट्टाचार्य, स्वरूप दामोदर तथा अन्यान्य भक्तों को साथ लेकर हरिदास जी के निवास स्थान पर श्री रूप जी के नाटकों को सुनने के लिये आये। सबके बैठ जाने पर प्रभु ने रूप जी से कहा- 'रूप! तुम अपने नाटकों को इन लोगों को सुनाओ। ये सभी काव्यमर्मज्ञ, रसज्ञ और कवि हैं।' *इतना सुनते ही रूप जी लज्जा के कारण पृथ्वी की ओर ताकने लगे। उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकला; तब प्रभु ने बड़े ही स्नेह के साथ कहा- 'वाह जी, यह अच्छी रही! हम यहाँ तुम्हारी कविता सुनने आये हैं, तुम शरमाते हो!! शरम की कौन-सी बात है? कविता का तो फल ही यह है कि वह रसिको के सामने सुनायी जाय। हाँ, सुनाओं, संकोच मत करो। देखे, ये राय बड़े भारी रसमर्मज्ञ हैं। इन्हें तो हम पकड़ लाये हैं। *राय ने कहा- 'हाँ जी, सुनाइये। इस प्रकार शरमा ने से का न चलेगा। पहले तो अपने नाटक का नाम बातइये, फिर विषय बातइये, तब उसके कहीं-कहीं के स्थलों को पढ़कर सुनाइये।' इस पर भी रूप ही रहे। तब प्रभु स्वयं कहने लगे- 'इन्होंने 'ललितमाधव' और विदग्धमाधव' -ये दो नाटक लिखे हैं। 'विदग्धमाधव' में तो भगवान की व्रज की लीलाओं का वर्णन है और 'ललितमाधव' में द्वारकापुरी की लीलाओं का। इनसे ही सुनिये। इन्होंने रथ के सम्मुख नृत्य करते समय जो मेरे भावों को समझकर श्लोक बनाया था, उसे तो मैंने आप लोगों को सुना ही दिया, अब इनके नाटक में से कुछ सुनिये।' *राय ने कुछ प्रेम पूर्वक भर्त्सना के स्वर में कहा- 'क्यों जी, सुनाते क्यों नहीं? देखे प्रभु भी कह रहे हैं। प्रभु की आज्ञा नहीं मानते? हाँ, पहले विदग्धमाधव का मंगलाचरण सुनाइये।' नान्दी के मुख से भगवान की धीरे 'विदग्धमाधव' का मंगलाचरण पढ़ने लगे- *सुधानां चान्द्रीनामपि मधुरिमोन्माददमनी *दधाना राधादिप्रणयघनसारै: सुरभिताम्। *समन्तात् सन्तापोदगमविषमसंसारसरणी- *प्रणीतां ते तृष्णां हरतु हरिलीलाशिखरिणी॥ *श्लोकों को सुनते ही सभी एक स्वर में 'वाह! वाह! करने लगे। श्री रूपजी का लज्जा के कारण मुख लाल पड़ गया, वे नीचें की ओर देख रहे थे। इस पर राय ने कहा- 'रूप जी! आप तो बहुत ही अधिक संकोच करते हैं। इसीलिये, लीजिये मैं आपके काव्य की प्रशंसा ही नहीं करता। अच्छा, तो यह तो भगवान की वन्दना हुई। अब भगवत-स्वरूप जो गुरुदेव हैं, जो कि प्राणियों के एकमात्र भजनीय और इष्ट हैं, भगवत-वन्दा के अनन्तर उनकी वन्दा में जो कुछ कहा हो, उसे और सुनाइये।' *यह सुनकर श्री रूप जी और भी अकिध सिकुड़ गये। महाप्रभु के सम्मुख उन्हीं के सम्बन्ध का श्लोक पढ़ने में उन्हें बड़ी घबड़ाहट-सी होने लगी। किन्तु, फिर भी राय महाशय के आग्रह से रुक-रूककर ये लजाते हुए पढ़ने लगे- *अनर्पितचरीं चिरात करुणयावतीर्ण: कलौ *समर्पयितुमुन्नतोज्जवलरसां स्वभक्तिश्रियम्। *हरि: पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसंदीपित: सदा "हृदयकन्दरें स्फुरतु व: शीचनन्दन:॥ *इसे सुनते ही प्रभु कहने लगे- 'भगवान जाने इन कवियों को राजा लोग दण्ड क्यों नहीं देते। किसी की प्रशंसा करने लगते हैं, तो आकाश-पाताल एक कर देते हैं। इनसे बढ़कर झूठा और कौन होगा? इस श्लोक में तो अतिशयोक्ति की हद कर डाली है।' *राय ने कहा- 'प्रभो! इसे तो हम ही समझ सकते हैं, यथार्थ वर्णन तो इसी श्लोंक में किया गया है। ऐसे स्वाभाविक गुणपूर्ण श्लोक की रचना सभी कवि नहीं कर सकते।' इतना कहर राय ने 'विदग्धमाधव'- के अन्य भी बहुत-से स्थलों को सुना और सुनकर उनके काव्य की हृदय से भूरि-भूरि प्रशंसा की। 'विदग्धमाधव' को सुन लेने पर राय रामानन्द जी कहने लगे- 'अपने दूसरे नाटक 'ललितमाधव' की माधुरी की बानगी भी इन सभी उपस्थित भक्तों को चखा दीजिये। हाँ, उसका भी पहले मंगलाचरण का श्लोक सुनाइये। यह सुनकर श्री रूपजी फिर उसी लहज के साथ श्लोक पढ़ने लगे- *सुररिपुसुदृशमुरोजकोकान् मुखकमलानि च खेदयन्नखण्ड:। *चिरमखिलसुहृच्चकोनन्दी दिशतु मुकुन्दयश:शशी मुदं व:॥ *धन्य है, धन्य है और साधु-साधु की ध्वनि समाप्त होने पर राय महाशय ने कहा- 'श्री भगवान की स्तुति के अनन्तर इष्टस्वरूप श्री गुरुदेव की स्तुति में जो श्लोक हो उसे भी सुनाइये। उसके श्रवण से यहाँ सभी उपस्थित भक्तों को अत्यन्त ही आह्लाद होगा। हाँ सुनाइये। प्रभु की ओर न देखते हुए धीरे-धीरे श्री रूप जी पढ़ने लगे- *निजप्रणयितां सुधामुदयमाप्नुवन् य: क्षितौ *किरत्यलमुरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थिति:। *स लुंचिततमस्ततिर्मम शचीसुतासख्य: शशी *वशीकृतजगन्मना: किमपि शर्म विन्यस्यतु॥ *इस श्लोक को सुनते ही प्रभु कुछ बनावटी क्रोध के स्वर में कहने लगे- 'रूप ने और सम्पूर्ण काव्य तो बहुत ही सुन्दर बनाया। इनका एक-एक श्लोक अमूल्य रत्न के समान है, किन्तु जाने क्या समझकर इन्होंने ये दो-एक अतिशयोक्ति पूर्ण श्लोक मणियों में काँच के टुकड़ो के समान मिला दिये हैं? *इस पर भक्तों ने एक स्वर से कहा-' हमें तो यही श्लोक सर्वश्रेष्ठ प्रतीत हुआ है।' बात को यहीं समाप्त करने के लिये राय महाशय ने कहा-' अच्छा, छोड़िये इस प्रसंग को। आगे काव्य की मधुरिमा का पान कीजिये। हाँ, रूप जी! इस नाटक के भी भाव पूर्ण अच्छे-अच्छे स्थल पढ़कर सुनाइये।' *इतना सुनते ही श्री रूपजी नाटक के अन्यान्य स्थलों को बड़े स्वर के साथ सुनाने लगे। सभी रसमर्मज्ञ भक्त उनके भक्तिभाव पूर्ण काव्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। अन्त में प्रभु रूपजी का प्रेम से आलिंगन करके भक्तों को साथ लेकर अपने स्थान पर चले गये। *इस प्रकार भक्तों के साथ रथ यात्रा और चातुर्मास के सभी त्यौहारों तथा पर्वो को पहले की भाँति धूमधाम से मनाकर, क्वार के दशहरे के बाद भक्तों को गौड़ के लिये विदा किया। नित्यानन्द जी से प्रभु ने प्रतिवर्ष पुरी न आने का पुन: आग्रह किया; किन्तु उन्होंने प्रभु-प्रेम के कारण इसे स्वीकार नहीं किया। सभी भक्त गौड़ देश को लौट गये। श्री रूप कुछ दिनों प्रभु के पास और रहे। अन्त में कुछ समय के पश्चात प्रभु ने उन्हें वृन्दावन में ही जाकर निवास करने की आज्ञा दी। प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वे गौड़ देख होते हुए वृन्दावन जाने के लिये उद्यत हुए। यही इनकी प्रभु से अन्तिम भेंट थी। यहाँ से जाकर ये अन्तिम समय तक श्री वृन्दावन की पवित्र भूमि में ही श्री कृष्ण-कीर्तन करते हुए निवास करते रहे। व्रज की परम पावन भूमि को छोड़कर ये एक रात्रि के लिए भी व्रज से बाहर नहीं गये। प्रभु ने जाते समय इनका प्रेम पूर्वक आलिंगन किया और भक्ति विषयक ग्रन्थों के प्रणयन की आज्ञा प्रदान की। इन्होंने प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके श्री कृष्ण के गुणगान में ही अपना सम्पूर्ण समय बिताया। गौड़ में इनकी कुछ धन-सम्पत्ति थी, उसका परिवार वालों में यथारीति विभाग करने के निमित्त इन्हें गौड़ भी जाना था, इसलिये ये प्रभु से विदा होकर गौड़ देश को गये और वहाँ इन्हें लगभग एक वर्ष धन-सत्पत्ति की व्यवस्था करने के निमित्त ठहरना पड़ा। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️
                          ✳️✳️*पोस्ट - 146*✳️✳️
       ✳️✳️*प्रभु का पुरी में भक्तों से पुनर्मिलन*✳️✳️

          *अद्यास्मांक  सफलमभवज्जन्म  नेत्रे कृतार्थे
          *सर्वस्ताप: सपदि  वरितो  निर्वृतिं प्राप चेत:। 
          *किं वा ब्रूमो  बहुलमपरं  पश्य  जन्मान्तरं नो 
          *वृन्दारण्यात् पुनरूपगतो नीलशैलं यतीन्द्र:॥

          *'संन्यासिचूडामणि श्रीचैतन्य वृन्दावन से लौटकर पुन: नीलाचल आ गये हैं- इस सुखद संवाद के श्रवणमात्र से ही गौर भक्तों में अपार आनन्द छा गया। वे परस्पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए एक-दूसरे का आलिंगन करने लगे। कोई जल्दी से दौड़कर कानों में अमृत का सिंचन करने वाले इस प्रिय समाचार को दूसरे से कहता, वह तीसरे के पास दौड़ा जाता। इसी प्रकार क्षण भर में यह संवाद सम्पूर्ण जगन्नाथपुरी में फैल गया। महाप्रभु जब वृन्दावन को जा रहे थे, तभी सब भक्तों ने समझ लिया था कि प्रभु के अन्तिम दर्शन हैं। जो वृन्दावन का नाम सुनते ही मूर्च्छित हो जाते हैं, जिनकी दृष्टि में वृन्दावन से बढ़ाकर विश्व ब्रह्माण्ड में कोई उत्तम स्थान ही नहीं हैं, वे वृन्दावन पहुँचकर फिर वहाँ से क्यों लोटने लगे? अब तो प्रभु वृन्दावनवास करते हुए उस बाँकेविहारी के साथ निरन्तर आनन्दविहार में ही निमग्न रहेंगे, किन्तु जब भक्तों ने सुना, प्रभु वृन्दावन से लौट आये हैं, तब तो उनके आनन्द की सीमा नहीं रही और सभी प्रेमोन्मत्त होकर संकीर्तन करते हुए एक स्थान पर एकत्रित होने लगे। सभी मिलकर प्रभु को लेने चले। सार्वभौम भट्टाचार्य और राय रामानन्द जी उन सभी भक्तों के अग्रणी थे। उन्होंने दूर से देखा, काषायाम्बर धारण किये हुए प्रभु श्री हरि के मधुर नामों का उच्चारण करते-करते मत्त गजेन्द्र की भाँति आनन्द में विभोर हुए श्री मन्दिर की ओर चले आ रहे हैं, तब तो सभी ने भूमि में लोटकर प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया। अपने पैरों के नीचे पड़े सभी भक्तों को प्रभु ने अपने कोमल करों से स्वयं उठाया और सभी को एक-एक करके छाती से लगाया। आज चिरकाल के अनन्तर प्रभु का प्रेमालिंगन प्राप्त करके सभी को परम प्रसन्नता हुई और सभी अपने सौभाग्य की सराहना करने लगे। 
          *भक्तों को साथ लेकर प्रभु श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिये गये। पुजारी ने प्रभु को देखते ही उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें जगन्नाथ जी की प्रसादी माला पहनायी तथा उनके सम्पूर्ण शरीर पर प्रसादी चन्दन का दर्शन करके भक्त लेप किया। आज चिरकाल में जगन्नाथ जी के दर्शन करके भक्त-चूड़ामणि श्री गौरांग प्रेम में विह्वल होकर जोरों से रुदन करने लगे। भक्तों ने मन्दिर के श्री आँगन में ही संकीर्तन आरम्भ कर दिया। नर्तकों के अग्रणी श्री चैतन्य देव दोनों हाथों को ऊपर उठा-उठाकर नृत्य करने लगे।
          *महाप्रभु के नृत्य को देखने के लिये लोगो की अपार भीड़ वहाँ आकर एकत्रित हो गयी। सभी प्रभु के उद्दण्ड नृत्य को देखकर अपने आपेको भूल गये और भावावेश में आकर सभी- 

          *हरिहरये नम:  कृष्णयादवाय नम:। 
          *गोपाल गोविन्द राम श्री मधुसूदन॥ 

          *कह कहकर नृत्य करने लगे। कुछ काल के अनन्तर प्रभु ने संकीर्तन बंद कर दिया और आप श्री मन्दिर की प्रदक्षिणा करते हुए भक्तों के सहित काशी मिश्र के घर अपने पूर्व के निवास स्थान पर आये। मिश्र जी ने प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया इतने में ही परमानन्दपुरी प्रभु का आगमन सुनकर भीतर से बाहर निकल आये। प्रभु ने श्रद्धा पूर्वक पुरी के चरणों में प्रणाम किया। पुरी महाराज ने प्रभु का आलिंगन किया और वे हाथ पकड़कर भीतर ले गये। सभी के बैठ जाने पर प्रभु अपनी यात्रा का वृत्तान्त बताने लगे। व्रजमण्डल की बातें करते-करते उनका गला भर आया, नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगी। तब सार्वभौम ने प्रभु से अपने यहाँ भिक्षा करने की प्रार्थना की। 
          *प्रभु ने कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय! आज चिरकाल में तो मेरी भक्तों से भेंट हुई हैं, तिस पर भी मैं अकेला ही भिक्षा करूँ, यह मुझे अच्छा नहीं प्रतीत होता। आज तो मेरी इच्छा है कि अपने सभी भक्तों के सहित यहीं भगवान का प्रसाद पाऊं।’ इस बात से भट्टाचार्य बड़ी प्रसन्नता हुई। वे काशी मिश्र, वाणीनाथ तथा और भी दो-चार भक्तों को साथ लेकर महाप्रसाद लेने चले। सभी भक्तों के खाने योग्य बहुत बढ़िया-बढ़िया बहुत-सी प्रसादी-वस्तुएं भट्टाचार्य जी ने वहाँ लाकर उपस्थित कर दीं। प्रभु ने भक्तों को साथ लेकर बड़े ही स्नेह के सहित भगवान का प्रसाद पाया। प्रभु के पास प्रसाद पाने से सभी को परम प्रसन्नता प्राप्त हुई, सभी अपने-अपने भाग्य की प्रशंसा करने लगे। प्रसाद पाकर प्रभु विश्राम करने लगे और भक्त अपने-अपने घरों को चले गये। 
          *इधर स्वरूप गोस्वामी ने दामोदर पण्डित के हाथों प्रभु के आगमन का सुखद संवाद नवद्वीप में शची माता, विष्णुप्रिया तथा अन्यान्य सभी भक्तों के समीप पठाया। प्रभु के आगमन का संवाद सुनकर गौर भक्त आनन्द के सहित नृत्य करने लगे। वे जल्दी-जल्दी रथयात्रा के समय की प्रतीक्षा करने लगे। श्री शिवानन्द सेन समाचार सुनते ही यात्रा की तैयारियाँ करने लगे। शान्तिपुराधीश श्री अद्वैताचार्य अपने सभी भक्तों के सहित नीलाचल के लिये तैयार हुए। श्रीखण्ड, कुलियाग्राम, कांचनापाड़ा, कुमारहट्ट, शान्तिपुर तथा नवद्वीप के सैकड़ो भक्त प्रभुदर्शनों की लालसा से चले। सदा की भाँति श्री शिवानन्द सेन जी ने ही सबकी यात्रा का प्रबन्ध किया। सभी भक्त तथा भक्तों की स्त्रियाँ प्रभु के निमित्त भाँति-भाँति के पदार्थ लेकर और विष्णुप्रिया तथा शचीमाता से आज्ञा आज्ञा माँगकर प्रभु के दर्शनों के निमित्त रथयात्रा को उपलक्ष्य बनाकर पैदल ही पुरी की ओर चल दिये।
          *अब के शिवानन्द जी के साथ उनका कुत्ता भी चला। उन्होंने उसे बहुत रोका, किन्तु वह किसी प्रकार भी न रुका, तब तो सेन महाशय उसे भोजन कराते हुए साथ-ही-साथ ले चले। रास्ते में घाट वालों ने कुत्ते को पार उतारने में कई जगह आपत्ति भी की, किन्तु सेन महाशय प्रचुर द्रव्य देकर उसे जिस किसी भाँति उसे पार करा ही ले गये। एक दिन उन्हें घाट वालों से उतराई का हिसाब करते-करते बहुत देर हो गयी। उनके नौकर कुत्ते को भात देना भूल ही गये। इससे कुत्ता क्रद्ध होकर और इन सबका साथ छोड़कर न जाने किधर चला गया। जब शिवानन्द जी ने कुत्ते की खोज करायी तो उसका कहीं भी पता नहीं चला, इससे उन्हें अपार दु:ख हुआ। 
          *दूसरे दिन सभी भक्त प्रभु के समीप पहुँचे। भक्तों ने देखा कि वही कुत्ता प्रभु के समीप बैठा और प्रभु उसे अपने हाथ से खीर खिला रहे हैं, और हंसते-हंसते उससे कह रहे हैं- 

          *कृष्ण कहो, राम कहो, हरि भजो बावरे। 
          *हरिे के भजन बिनु खाओगे क्या पामरे॥ 

          *प्रभु की मधुर वाणी को सुनकर कुत्ता प्रेमपूर्वक पूँछ हिलाता हुआ अपनी भाषा में राम, कृष्ण, हरि आदि भगवान के सुमधुर नामों का कीर्तन कर रहा था। शिवानन्द सेन उस कुत्ते को प्रभु के पास बैठ देखकर परम आश्चर्य करे लगे। वह कुत्ता पहले सभी जगन्नाथपुरी में नहीं आया था और न उसने प्रभु का निवास स्थान देखा था, फिर यह अकेला ही यहाँ कैसे आ गया? सेन महाशय समझ गये कि यह कोई पूर्व जन्म का सिद्ध हैं, किसी कारणवश इसे कुत्ते की योनि प्राप्त हो गयी है। तभी तो प्रभु इसे इतना अधिक प्यार कर रहे हैं, यह सोचकर उन्होंने कुत्ते को साष्टांग प्रणाम किया। कुत्ता पूँछ हिलाता हुआ वहाँ से कही अन्यत्र चला गया। इसके अनन्तर फिर किसी ने उस कुत्ते को नहीं देखा। 
          *महाप्रभु सभी भक्तों से मिले। भक्तों की पत्नियों ने प्रभु को दूरे से ही प्रणाम किया। प्रभु स्त्रियों की ओर न तो कभी देखते थे, न उनका स्पर्श करते थे और न स्त्रियों के सम्बन्ध की बातें ही सुनते थे। स्त्रियों का प्रसंग छिड़ते ही प्रभु अत्यन्त ही संकुचित हो जाते और प्रसंग को जल्दी-से-जल्दी समाप्त कर देते।
          *नवद्वीप में प्रभु के घर के समीप परमेश्वर नाम का एक भक्त रहता था। वह लड्डू बेचकर अपने परिवार का निर्वाह करता था। बाल्याकाल से ही वह प्रभु के प्रति अत्यन्त ही स्नेह रखता था। जब महाप्रभु बहुत ही छोटे थे, तभी परमेश्वर उन्हें गोद में बिठाकर उनसे 'हरि' 'हरि' बुलवाया करता था और खाने के लिये रोज लडडू देता था। प्रभु भी उससे बहुत स्नेह करते थे। अब वह बूढ़ा हो गया था, अब के वह भी अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के सहित प्रभु के दर्शनों को आया था। प्रभु के पास भीतर स्त्रियाँ नहीं जाती थीं, वे दूर से ही प्रभु का दर्शन करती थीं। भक्त परमेश्वर को इस बात का क्या पता था। उसने अपने कांपते हुए हाथों से भूमि में लोटकर प्रभु को प्रणाम किया और प्रेम के साथ कहने लगा- 'प्रभो! अपने परमेश्वर को तो भूल ही गये होंगे। मुझे अब शायद न पहचान सकेंगे।' 
          *प्रभु ने उसका आलिंगन करते हुए अत्यन्त ही स्नेह से कहा- 'परमेश्वर! भला, तुम्हें मैं कभी भूल सकता हूँ? तुम्हारे लड्डू तो अभी तक मेरे गले में ही अटके हुए हैं, वे नीचे भी नही उतरे! तुम मुझे पुत्र की तरह प्यार करते थे।' 
          *परमेश्वर ने बड़े ही उल्लास के साथ कहा- 'प्रभो! आपका पुत्र, पुत्रवधू तथा घर से सभी आपके दर्शनों के लिये आये हैं। वे सभी आपके दर्शनों को उत्सुक हैं।' 
          *यह कहकर भक्त ने सभी से प्रभु के पाद-स्पर्श कराये। भक्त वत्सल प्रभु संकोच के कारण कुछ भी न कह सके। वे लज्जित भाव से नीचा सिर किये हुए चुपचाप बैठे रहे। परमेश्वर के चले जाने पर भक्तों ने उसे समझाया कि प्रभु के समीप सपरिवार नहीं जाया जाता। बेचारा सरल भक्त इस बात को क्या समझे। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया। तब भक्तों ने उसे समझा दिया। इस प्रकार सभी भक्त प्रभु के समीप रहकर पूर्व की भाँति सत्संग सुख का अनुभव करने लगे। भक्तों की पत्नियाँ बारी-बारी से रोज प्रभु का निमन्त्रण करतीं और उन्हें अपने निवास स्थान पर बुलाकर भिक्षा करातीं। 
          *इधर प्रभु के दर्शनों की लालसा से श्री रूपजी अपने भाई अनूप सहित गौड़ देश होते हुए पुरी को आने लगे। रास्ते में अनूप जी को ज्वर आ गया, दैव की गति, ज्वर-ही-ज्वर में वे इस नश्वर शरीर को परित्याग करके परलोकवासी बन गये। श्री रूप ने अत्यन्त ही दु:ख के साथ अपने कनिष्ठ भाई का शरीर गंगा जी के पावन प्रवाह में कर दिया और वे संसार की अनित्यता का विचार करते हुए पुर में आये। श्री वृन्दावन में ही उन्होंने श्रीकृष्ण लीला विषयक एक नाटक लिखना आरम्भ कर दिया था। रास्ते में वे नाटक के विषय को सोचते जाते थे और रात्रि को जहाँ ठहरते थे, वहीं उस सोचे हुए विषय को लिख लेते थे। उनकी इच्छा थी कि एक ही नाटक को दो भागों में विभक्त करेंगे, पूर्व भाग में तो श्रीकृष्ण की वृन्दावन-लीलाओं का सम्मिलित रूप से ही लिख रहे थे। रास्ते में चलते-चलते जब वे उड़िया देश में 'सत्यभामापुर' नामक ग्राम में आये, तो वहाँ स्वप्न में श्री सत्यभामा जी ने प्रत्यक्ष होकर इन्हें आदेश दिया कि 'तुम हमारी लीलाओं का पृथक ही वर्णन करो।
          *व्रज की लीलाओं के साथ हमारा वर्णन मत करो।' श्री सत्यभामा जी का आदेश पाकर आपने उसी समय द्वारा की लीलाओं का पृथक वर्णन करने का निश्चय किया और उसका वर्णन उन्होंने 'ललितमाधव' नामक नाटक में किया। उसी समय 'विदग्धमाधव' और ललितमाधव' इन दोनों नामों की उत्पत्ति हुई।
          *नीलाचल में पहुँचकर ये प्रभु के समीप नहीं गये। ये दोनों ही भाई नम्रता की तो सजीव मूर्ति ही थे, यवनों के संसर्ग में रहने के कारण ये अपने को अत्यन्त ही नीच समझते थे और यहाँ तक कि मन्दिर में घुसकर दर्शन भी नहीं करते थे, दूर से ही जगन्नाथ जी की ध्वजा को प्रणाम कर लेते थे। इसलिये रूप जी महात्मा हरिदास जी के स्थान पर जाकर ठहरे। हरिदास जी तो जाति के यवन थे, किन्तु गौर भक्त उनका चतुर्वेदी ब्राह्मणों से भी अधिक सम्मान करते थे, वे भी जगन्नाथ जी के मन्दिर में प्रवेश नहीं करते थे। यहाँ तक कि जिस रास्ते से मन्दिर के पुजारी और सेवक जाते थे, उस रास्ते से भी कभी नही निकलते थे। प्रभु नित्य प्रति समुद्रस्नान करके हरिदास जी के स्थान पर आते थे। दूसरे दिन जब प्रभु नित्य की भाँति हरिदास जी के आश्रम पर आये, तब श्री रूप जी ने भूमि पर लोटकर प्रभु के पादपद्मों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु की दृष्टि ऊपर की ओर थी। हरिदास जी ने धीरे से कहा- 'प्रभो! रूप जी प्रणाम कर रहे है।'
          *रूप का नाम सुनते ही चौंककर प्रभु ने कहा- 'हैं! क्या कहा? रूप आये हैं क्या?' यह कहते-कहते प्रभु ने उनका आलिंगन किया और उन्हें वहीं रहने की आज्ञा दी। इसके अनन्तर प्रभु ने सभी गौड़ीय तथा पुरी के भक्तों के साथ श्रीरूप का परिचय करा दिया। श्री रामानन्दराय और सार्वभौम महाशय दोनों ही कवि थे। रूप जी का परिचय पाकर ये दोनों ही परम सन्तुष्ट हुए और प्रभु से इनकी कविता सुनने के लिये प्रार्थना करने लगे।
          *एक दिन प्रभु राय रामानन्द जी, सार्वभौम भट्टाचार्य, स्वरूप दामोदर तथा अन्यान्य भक्तों को साथ लेकर हरिदास जी के निवास स्थान पर श्री रूप जी के नाटकों को सुनने के लिये आये। सबके बैठ जाने पर प्रभु ने रूप जी से कहा- 'रूप! तुम अपने नाटकों को इन लोगों को सुनाओ। ये सभी काव्यमर्मज्ञ, रसज्ञ और कवि हैं।'
          *इतना सुनते ही रूप जी लज्जा के कारण पृथ्वी की ओर ताकने लगे। उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकला; तब प्रभु ने बड़े ही स्नेह के साथ कहा- 'वाह जी, यह अच्छी रही! हम यहाँ तुम्हारी कविता सुनने आये हैं, तुम शरमाते हो!! शरम की कौन-सी बात है? कविता का तो फल ही यह है कि वह रसिको के सामने सुनायी जाय। हाँ, सुनाओं, संकोच मत करो। देखे, ये राय बड़े भारी रसमर्मज्ञ हैं। इन्हें तो हम पकड़ लाये हैं।
          *राय ने कहा- 'हाँ जी, सुनाइये। इस प्रकार शरमा ने से का न चलेगा। पहले तो अपने नाटक का नाम बातइये, फिर विषय बातइये, तब उसके कहीं-कहीं के स्थलों को पढ़कर सुनाइये।' इस पर भी रूप ही रहे। तब प्रभु स्वयं कहने लगे- 'इन्होंने 'ललितमाधव' और विदग्धमाधव' -ये दो नाटक लिखे हैं। 'विदग्धमाधव' में तो भगवान की व्रज की लीलाओं का वर्णन है और 'ललितमाधव' में द्वारकापुरी की लीलाओं का। इनसे ही सुनिये। इन्होंने रथ के सम्मुख नृत्य करते समय जो मेरे भावों को समझकर श्लोक बनाया था, उसे तो मैंने आप लोगों को सुना ही दिया, अब इनके नाटक में से कुछ सुनिये।' 
          *राय ने कुछ प्रेम पूर्वक भर्त्सना के स्वर में कहा- 'क्यों जी, सुनाते क्यों नहीं? देखे प्रभु भी कह रहे हैं। प्रभु की आज्ञा नहीं मानते? हाँ, पहले विदग्धमाधव का मंगलाचरण सुनाइये।' नान्दी के मुख से भगवान की धीरे 'विदग्धमाधव' का मंगलाचरण पढ़ने लगे-  

          *सुधानां   चान्द्रीनामपि   मधुरिमोन्माददमनी
          *दधाना   राधादिप्रणयघनसारै:   सुरभिताम्। 
          *समन्तात्   सन्तापोदगमविषमसंसारसरणी- 
          *प्रणीतां ते तृष्णां हरतु हरिलीलाशिखरिणी॥ 

          *श्लोकों को सुनते ही सभी एक स्वर में 'वाह! वाह! करने लगे। श्री रूपजी का लज्जा के कारण मुख लाल पड़ गया, वे नीचें की ओर देख रहे थे। इस पर राय ने कहा- 'रूप जी! आप तो बहुत ही अधिक संकोच करते हैं। इसीलिये, लीजिये मैं आपके काव्य की प्रशंसा ही नहीं करता। अच्छा, तो यह तो भगवान की वन्दना हुई। अब भगवत-स्वरूप जो गुरुदेव हैं, जो कि प्राणियों के एकमात्र भजनीय और इष्ट हैं, भगवत-वन्दा के अनन्तर उनकी वन्दा में जो कुछ कहा हो, उसे और सुनाइये।' 
          *यह सुनकर श्री रूप जी और भी अकिध सिकुड़ गये। महाप्रभु के सम्मुख उन्हीं के सम्बन्ध का श्लोक पढ़ने में उन्हें बड़ी घबड़ाहट-सी होने लगी। किन्तु, फिर भी राय महाशय के आग्रह से रुक-रूककर ये लजाते हुए पढ़ने लगे-   

          *अनर्पितचरीं  चिरात  करुणयावतीर्ण:  कलौ 
          *समर्पयितुमुन्नतोज्जवलरसां स्वभक्तिश्रियम्।
          *हरि:   पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसंदीपित:   सदा 
          "हृदयकन्दरें     स्फुरतु     व:     शीचनन्दन:॥

          *इसे सुनते ही प्रभु कहने लगे- 'भगवान जाने इन कवियों को राजा लोग दण्ड क्यों नहीं देते। किसी की प्रशंसा करने लगते हैं, तो आकाश-पाताल एक कर देते हैं। इनसे बढ़कर झूठा और कौन होगा? इस श्लोक में तो अतिशयोक्ति की हद कर डाली है।'
          *राय ने कहा- 'प्रभो! इसे तो हम ही समझ सकते हैं, यथार्थ वर्णन तो इसी श्लोंक में किया गया है। ऐसे स्वाभाविक गुणपूर्ण श्लोक की रचना सभी कवि नहीं कर सकते।' इतना कहर राय ने 'विदग्धमाधव'- के अन्य भी बहुत-से स्थलों को सुना और सुनकर उनके काव्य की हृदय से भूरि-भूरि प्रशंसा की। 'विदग्धमाधव' को सुन लेने पर राय रामानन्द जी कहने लगे- 'अपने दूसरे नाटक 'ललितमाधव' की माधुरी की बानगी भी इन सभी उपस्थित भक्तों को चखा दीजिये। हाँ, उसका भी पहले मंगलाचरण का श्लोक सुनाइये। यह सुनकर श्री रूपजी फिर उसी लहज के साथ श्लोक पढ़ने लगे-

*सुररिपुसुदृशमुरोजकोकान् मुखकमलानि च खेदयन्नखण्ड:।
*चिरमखिलसुहृच्चकोनन्दी  दिशतु  मुकुन्दयश:शशी मुदं व:॥

          *धन्य है, धन्य है और साधु-साधु की ध्वनि समाप्त होने पर राय महाशय ने कहा- 'श्री भगवान की स्तुति के अनन्तर इष्टस्वरूप श्री गुरुदेव की स्तुति में जो श्लोक हो उसे भी सुनाइये। उसके श्रवण से यहाँ सभी उपस्थित भक्तों को अत्यन्त ही आह्लाद होगा। हाँ सुनाइये। प्रभु की ओर न देखते हुए धीरे-धीरे श्री रूप जी पढ़ने लगे-

          *निजप्रणयितां  सुधामुदयमाप्नुवन्  य:  क्षितौ
           *किरत्यलमुरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थिति:।
          *स लुंचिततमस्ततिर्मम शचीसुतासख्य: शशी
          *वशीकृतजगन्मना: किमपि शर्म विन्यस्यतु॥

          *इस श्लोक को सुनते ही प्रभु कुछ बनावटी क्रोध के स्वर में कहने लगे- 'रूप ने और सम्पूर्ण काव्य तो बहुत ही सुन्दर बनाया। इनका एक-एक श्लोक अमूल्य रत्न के समान है, किन्तु जाने क्या समझकर इन्होंने ये दो-एक अतिशयोक्ति पूर्ण श्लोक मणियों में काँच के टुकड़ो के समान मिला दिये हैं? 
          *इस पर भक्तों ने एक स्वर से कहा-' हमें तो यही श्लोक सर्वश्रेष्ठ प्रतीत हुआ है।' बात को यहीं समाप्त करने के लिये राय महाशय ने कहा-' अच्छा, छोड़िये इस प्रसंग को। आगे काव्य की मधुरिमा का पान कीजिये। हाँ, रूप जी! इस नाटक के भी भाव पूर्ण अच्छे-अच्छे स्थल पढ़कर सुनाइये।' 
          *इतना सुनते ही श्री रूपजी नाटक के अन्यान्य स्थलों को बड़े स्वर के साथ सुनाने लगे। सभी रसमर्मज्ञ भक्त उनके भक्तिभाव पूर्ण काव्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। अन्त में प्रभु रूपजी का प्रेम से आलिंगन करके भक्तों को साथ लेकर अपने स्थान पर चले गये।
          *इस प्रकार भक्तों के साथ रथ यात्रा और चातुर्मास के सभी त्यौहारों तथा पर्वो को पहले की भाँति धूमधाम से मनाकर, क्वार के दशहरे के बाद भक्तों को गौड़ के लिये विदा किया। नित्यानन्द जी से प्रभु ने प्रतिवर्ष पुरी न आने का पुन: आग्रह किया; किन्तु उन्होंने प्रभु-प्रेम के कारण इसे स्वीकार नहीं किया। सभी भक्त गौड़ देश को लौट गये। श्री रूप कुछ दिनों प्रभु के पास और रहे। अन्त में कुछ समय के पश्चात प्रभु ने उन्हें वृन्दावन में ही जाकर निवास करने की आज्ञा दी। प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वे गौड़ देख होते हुए वृन्दावन जाने के लिये उद्यत हुए। यही इनकी प्रभु से अन्तिम भेंट थी। यहाँ से जाकर ये अन्तिम समय तक श्री वृन्दावन की पवित्र भूमि में ही श्री कृष्ण-कीर्तन करते हुए निवास करते रहे। व्रज की परम पावन भूमि को छोड़कर ये एक रात्रि के लिए भी व्रज से बाहर नहीं गये। प्रभु ने जाते समय इनका प्रेम पूर्वक आलिंगन किया और भक्ति विषयक ग्रन्थों के प्रणयन की आज्ञा प्रदान की। इन्होंने प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके श्री कृष्ण के गुणगान में ही अपना सम्पूर्ण समय बिताया। गौड़ में इनकी कुछ धन-सम्पत्ति थी, उसका परिवार वालों में यथारीति विभाग करने के निमित्त इन्हें गौड़ भी जाना था, इसलिये ये प्रभु से विदा होकर गौड़ देश को गये और वहाँ इन्हें लगभग एक वर्ष धन-सत्पत्ति की व्यवस्था करने के निमित्त ठहरना पड़ा।
    *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!
                      ----------:::×:::----------

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कामेंट्स

Ranveer soni Apr 11, 2021
🌹🌹जय श्री कृष्णा🌹🌹

kamlesh sharma Apr 11, 2021
RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RAFHE RAFHE RADHE RADHE RADHE RADHE RAFHR RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RAFHE RAFHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE ROADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE

Asha-Bakshi Apr 11, 2021
JAI SHREE RADHE RADHE KRISHNA JI SHUBH RAATRI VANDAN AAPKA HAR PAL SHUBH AUR MANGALMAY HO RADHE RADHE RADHE RADHE RADHE 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

RAJ RATHOD Apr 11, 2021
शुभ रात्रि वंदन..शुभ स्वप्न * 😊🌹 *_❥ Զเधे-Զเधे ❥_* Good night.. Sweet Dreams ¸.•*””*•.¸ *🌹💐🌹* 🙏🏻🙏🏻 *””सदा मुस्कुराते रहिये””*

MEENAKSHI ASHOK KUKREJA Apr 13, 2021
जय श्री राधे राधे जय श्री कृष्णा जी की

. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 168 लोकातीत दिव्योन्माद स्वकीयस्य प्राणार्बुदसदृशगोष्ठस्य विरहात् प्रलापानुन्मादात् सततमतिकुर्वन विकलधी:। दधद्भित्तौ शश्वद्वदनविधुघर्षेण रुधिरं क्षतोत्थं गौरांगो हृदय उदयन्मां मदयति॥ महाप्रभु की दिव्योन्माद की अवस्था का वर्णन करना कठिन तो है ही, साथ ही बड़ा ही हृदयविदारक है। हम वज्र-जैसे हृदय रखने वालों की बात छोड़ दीजिये, किन्तु जो सहृदय हैं, भावुक है, सरस हैं, परपीडानुभवी हैं, मधुर रति के उपासक हैं, कोमल हृदय के हैं, जिनका हृदय परपीड़ाश्रवण से ही भर आता है, जिनका अन्त:करण अत्यन्त लुजलुजा- शीघ्र ही द्रवित हो जाने वाला है, वे तो इन प्रकरणों को पढ़ भी नहीं सकते। सचमुच इन अपठनीय अध्यायों का लिखना हमारे ही भाग्य में बदा था। क्या करें, विवश हैं हमारे हाथ में बलपूर्वक यह लौह की लेखनी दे दी गयी है। इतना ग्रन्थ लिखने पर भी यह डाकिनी अभी ज्यों-की त्यों ही बनी है, घिसती भी नहीं। न जाने किस यंत्रालय में यह खास तौर से हमारे ही लिये बनायी गयी थी। हाय ! जिसके मुखकलम के संघर्षण की करुण कहानी इसे लिखनी पड़ेगी। जिस श्रीमुख की शोभा को स्मरण करके लेखनी अपने लौहपने को भूल जाती थी, वही अब अपने काले मुंह से उस रक्त रंजित मुख का वर्णन करेगी। इस लेखनी का मुख ही काला नहीं है। किन्तु इसके पेट में भी काली स्याही भर रही है और स्वयं भी काली ही है। इसे मोह कहाँ, ममता कैसी, रुकना तो सीखी ही नहीं। लेखनी ! तेरे इस क्रूर कर्म को बार-बार धिक्कार है। महाप्रभु की विरह-वेदना अब अधिकाधिक बढ़ती ही जाती थी। सदा राधाभाव में स्थित होकर आप प्रलाप करते रहते थे। कृष्ण को कहाँ पाऊँ, श्याम कहाँ मिलेंगे, यही उनकी टेक थी। यही उनका अहर्निश का व्यापार था। एक दिन राधाभाव में ही आपको श्रीकृष्ण के मथुरागमन की स्फूर्ति हो आयी, आप उसी समय बड़े ही करुणस्वर में राधा जी के समान इस श्लोक को रोते-रोते गाने लगे– क्व नन्दकुलचन्द्रमा: क्व शिखिचन्द्रिकालंकत: क्व मन्दमुरलीरव: क्व नु सुरेन्द्रनीलद्युति:। क्व रासरसताण्डवी क्व सखि जीवरक्षौषधि र्निधिर्मम सुहृत्तम: क्व बत हन्त हा धिग्विधिम्॥ इस प्रकार विधाता को बार-बार धिक्कार देते हुए प्रभु उसी भावावेश में श्रीमद्भागवत के श्लोकों को पढ़ने लगे। इस प्रकार आधी रात तक आप अश्रु बहाते हुए गोपियों के विरहसम्बन्धी श्लोकों की ही व्याख्या करते रहे। अर्धरात्रि बीत जाने पर नियमानुसार स्वरूप गोस्वामी ने प्रभु को गम्भीरा के भीतर सुलाया और राय रामानन्द अपने घर को चले गये। महाप्रभु उसी प्रकार जोरों से चिल्ला-चिल्लाकर नाम-संकीर्तन करते रहे। आज प्रभु की वेदना पराकाष्ठा को पहुँच गयी। उनके प्राण छटपटाने लगे। अंग किसी प्यारे के आलिंगन के लिये छटपटाने लगे। मुख किसी के मुख को अपने ऊपर देखने के लिये हिलने लगा। ओष्ठ किसी के मधुमय, प्रेममय शीतलतापूर्ण अधरों के स्पर्श के लिये स्वत: ही कँपने लगे। प्रभु अपने आवेश को रोकने में एकदम असमर्थ हो गये। वे जोरों से अपने अति कोमल सुन्दर श्रीमुख को दीवार में घिसने लगे। दीवार की रगड़ के कारण उसमें से रक्त बह चला। प्रभु का गला रुँधा हुआ था, श्वास कष्ट से बाहर निकलता था। कण्ठ घर-घर शब्द कर रहा था। रक्त के बहने से वह स्थान रक्तवर्ण का हो गया। वे लम्बी–लम्बी सांस लेकर गों-गों ऐसा शब्द कर रहे थे। उस दिन स्वरूप गोस्वामी को भी रात्रिभर नींद नहीं आयी। उन्होंने प्रभु का दबा हुआ ‘गों-गों’ शब्द सुना। अब इस बात को कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये– विरहे व्याकुल प्रभुर उद्वेग उठिला। गम्भीरा-भितरे मुख घर्षिते लागिला॥ मुखे, गण्डे, नाके, क्षत हइल अपार। भावावेश ना जानेन प्रभु पड़े रक्तधार॥ सर्वरात्रि करने भावे मुखसंघर्षण। गों-गों शब्द करने, स्वरूप सुनिल तखन॥ गों-गों शब्द सुनकर स्वरूप गोस्वामी उसी क्षण उठकर प्रभु के पास आये। उन्होंने दीपक जलाकर जो देखा उसे देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये। महाप्रभु अपने मुख को दीवार में घिस रहे हैं। दीवार लाल हो गयी है, नीचे रुधिर पड़ा है। गेरुए रंग के वस्त्र रक्त में सराबोर हो रहे हैं। प्रभु की दोनों आँखें चढ़ी हुई हैं। वे बार-बार जोरों से मुख को उसी प्रकार रगड़ रहे हैं। नाक छिल गयी है। उनकी दशा विचित्र थी– रोमकूपे रक्तोद्गम दंत सब हाले। क्षणे अंग क्षीण हाय क्षणे अंग फूले॥ जिस प्रकार सेही नाम के जानवर के शरीर पर लम्बे-लम्बे काँटे होते हैं और क्रोध में वे एकदम खड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रभु के अंग के सम्पूर्ण रोम सीधे खड़े हुए थे, उनमें रक्त की धारा बह रही थी। दाँत हिल रहे थे और कड़-कड़ शब्द कर रहे थे। अंग कभी तो फूल जाता था और कभी क्षीण हो जाता था। स्वरूप गोस्वामी ने इन्हें पकड़कर उस कर्म से रोका। तब प्रभु को कुछ बाह्य ज्ञान हुआ। स्वरूप गोस्वामी ने दु:खित चित्त से पूछा– ‘प्रभो ! यह आप क्या कर रहे हैं? मुँह को क्यों घिस रहे हैं?’ महाप्रभु उनके प्रश्न को सुनकर स्वस्थ हुए और कहने लगे– ‘स्वरूप ! मैं तो एकदम पागल हो गया हूँ। न जाने क्यों रात्रि मेरे लिये अत्यन्त ही दु:खदायी हो जाती है। मेरी वेदना रात्रि में अत्यधिक बढ़ जाती है। मैं विकल होकर बाहर निकलना चाहता था। अँधेरे में दरवाजा नहीं मिला। इसीलिये दीवार में दरवाजा करने के निमित्त मुँह घिसने लगा। यह रक्त निकला या घाव हो गया, इसका मुझे कुछ पता नहीं।’ इस बात से स्वरूप दामोदर को बडी चिन्ता हुई। उन्होंने अपनी चिन्ता भक्तों पर प्रकट की, उनमें से शंकर जी ने कहा– ‘यदि प्रभु को आपत्ति न हो, तो में उनके चरणों को हृदय पर रखकर सदा शयन किया करूँगा, इससे वे कभी ऐसा काम करेंगे भी तो मैं रोक दूँगा।’ उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की, प्रभु ने कोई आपत्ति नहीं की। इसलिये उस दिन से शंकर जी सदा प्रभु के पादपद्मों को अपने वक्ष:स्थल पर धारण करके सोया करते थे। प्रभु इधर से उधर करवट भी लेते, तभी उनकी आँखें खुल जातीं और वे सचेष्ट हो जाते। रात्रि-रात्रिभर जाकर प्रभु के चरणों को दबाते रहते थे। इस भये से प्रभु अब बाहर नहीं भाग सकते थे। उसी दिन से शंकर जी का नाम पड़ गया ‘प्रभुपादोपाधान’। सचमुच वे प्रभु के पैरों के तकिया ही थे। उन तकिया लगाने वाले महाराज के और तकिया बने हुए सेवक के चरणों में हमारा बार-बार प्रणाम हैं। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 171 समुद्रपतन और मृत्युदशा शरज्ज्योत्स्नासिन्धोरवकलनया जातयमुना भ्रमाद्धावन् योऽस्मिन् हरिविरहतापार्णव इव। निमग्नो मूर्च्छात: पयसि निवसन् रात्रिमखिलां प्रभाते प्राप्त: स्वैरवतु से शचीसुनुरिह न:॥ सर्वशास्त्रों में श्रीमद्भावगत श्रेष्ठ है। श्रीमद्भागवत में भी दशम स्कन्ध सर्वश्रेष्ठ हैं, दशम स्कन्ध में भी पूर्वार्ध श्रेष्ठ है और पूर्वार्ध में भी रासपंचाध्यायी सर्वश्रेष्ठ है और रासपंचाध्यायी में भी ‘गोपी-गीत’ अतुलनीय है। उसकी तुलना किसी से की ही नहीं जा सकती, वह अनुपमेय है। उसे उपमा भी दे तो किसकी दें। उससे श्रेष्ठ या उसके समान संसार में कोई गीत है ही नहीं। महाप्रभु को भी रासपंचाध्यायी ही अत्यन्त प्रिय थी। वे सदा रासपंचाध्यायी के ही श्लोकों को सुना करते थे और भावावेश में उन्हीं भावों का अनुकरण भी किया करते थे। एक दिन राय रामानन्द जी ने श्रीमद्भागवत के तैंतीसवें अध्याय में से भगवान् की कालिन्दी कूल की जल-क्रीडा की कथा सुनायी। प्रभु के दिनभर वही लीला स्फुरण होती रही। दिन बीता, रात्रि आयी, प्रभु की विरहवेदना भी बढने लगी। वे आज अपने को संभालने में एकदम असमर्थ हो गये। पता नहीं किस प्रकार वे भक्तों की दृष्टि बचाकर समुद्र के किनारे-किनारे आईटोटा की ओर चले गये। वहाँ विशाल सागर की नीली-नीली तरंग उठकर संसार को हृदय की विशालता, संसार की अनित्यता और प्रेम की तन्मयता की शिक्षा दे रही थीं। प्रेमावतार, गौरांग के हृदय से एक सुमधुर संगीत स्वत: ही उठ रहा था। महाप्रभु उस संगीत के स्वर को श्रवण करते-करते पागल हुए बिना सोचे-विचारे ही समुद्र की ओर बढ़ रहे थे। अहा ! समुद्र के किनारे सुन्दर-सुन्दर वृक्ष अपनी शरत्कालीन शोभा से सागर की सुषमा को और भी अधिक शक्तिशालनी बना रहे थे। शरत् की सुहावनी शर्वरी थी, अपने प्रिय पुत्र चन्द्रमा की श्रीवृद्धि और पूर्ण ऐश्वर्य से प्रसन्न होकर पिता सागर आनन्द से उमड़ रहे थे। महाप्रभु उसमें कृष्णांग-स्पर्श से पुलकित और आनन्दित हुई कालिन्दी का दर्शन कर रहे थे। उन्हें समुद्र की एकदम विस्मृति हो गयी, वे कालिन्दी में गोपिकाओं के साथ क्रीडा करते हुए श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन करने लगे। बस, फिर क्या था, आप उस क्रीडासुख से क्यों वंचित रहते, जोरों से हुंकार करते हुए अथाह सागर के जल में कूद पड़े और अपने प्यारे के साथ जलविहार का आनन्द लेने लगे। इसी प्रकार जल में डूबते और उछलते हुए उनकी सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। इधर प्रभु को स्थान पर न देखकर भक्तों को सन्देह हुआ कि प्रभु कहाँ चले गये। स्वरूप गोस्वामी, गोविन्द, जगदानन्द, वक्रेश्वर, रघुनाथदास, शंकर आदि सभी भक्तों को साथ व्याकुलता के साथ प्रभु की खोज में चले। श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर में सिंहद्वार से लेकर उन्होंने तिल-तिलभर जगह को खोज डाला। सभी के साथ वे जगन्नाथवल्लभ नामक उद्यान में गये वहाँ भी प्रभु का कोई पता नहीं। वहाँ से निराश होकर वे गुण्टिचा मन्दिर में गये। सुन्दरचल में उन्होंने इन्द्रद्युम्नसरोवर, समीप के सभी बगीचे तथा मन्दिर खोज डाले। सभी को परम आश्चर्य हुआ कि प्रभु गये भी तो कहाँ गये। इस प्रकार उन्हें जब कहीं भी प्रभु का पता नहीं चला तब वे निराश होकर फिर पुरी में लौट आये। इस प्रकार प्रभु की खोज करते-करते उन्हें सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। प्रात:काल के समय स्वरूप गोस्वामी ने कहा– ‘अब चलो, समुद्र के किनारे प्रभु की खोज करे, वहाँ प्रभु का अवश्य ही पता लग जायगा।’ यह कहकर वे भक्तों को साथ लेकर समुद्र के किनारे-किनारे चल पड़े। इधर महाप्रभु रात्रिभर जल में उछलते और डूबते रहे। उसी समय एक मल्लाह वहाँ जाल डालकर मछली मार रहा था, महाप्रभु का मृत्यु–अवस्था को प्राप्त वह विकृत शरीर उस मल्लाह के जाल में फँस गया। उसने बड़ा भारी मच्छ समझकर उसे किनारे पर खींच लिया। उसने जब देखा कि यह मच्छ नहीं कोई मुर्दा है, तो उठाकर प्रभु को किनारे पर फेंक दिया। बस, महाप्रभु के अंग का स्पर्श करना था कि वह मल्लाह आनन्द से उन्मत्त होकर नृत्य करने लगा। प्रभु के श्रीअंग के स्पर्शमात्र से ही उसके शरीर में सभी सात्त्विक भाव आप से आप ही उदित हो उठे। वह कभी तो प्रेम में विह्वल होकर हँसने लगता, कभी रोने लगता, कभी गाने लगता और कभी नाचने लगता। वह भयभीत हुआ वहाँ से दौडने लगा। उसे भ्रम हो गया कि मेरे शरीर में भूत ने प्रवेश किया है, इसी भय से वह भागता-भागता आ रहा था कि इतने में ये भक्त भी वहाँ पहुँच गये। उसकी ऐसी दशा देखकर स्वरूप गोस्वामी ने उससे पूछा– ‘क्यों भाई ! तुमन यहाँ किसी आदमी को देखा है, तुम इतने डर क्यों रहे हो? अपने भय का कारण तो हमें बताओ।’ भय से कांपते हुए उस मल्लाह ने कहा– ‘महाराज ! आदमी तों मैंने यहाँ कोई नहीं देखा। मैं सदा की भाँति मछली मार रहा था कि एक मुर्दा मेरे जाल में फँस आया। उसके अंग में भूत था, वही मेरे अंग में लिपट गया है। इसी भय से मैं भूत उतरवाने के लिये ओझा के पास जा रहा हूँ। आप लोग इधर न जायँ। वह बडा ही भयंकर मुर्दा है, ऐसा विचित्र मुर्दा तो मैंने आज तक देखा ही नहीं।’ उस समय महाप्रभु का मृत्युदशा में प्राप्त शरीर बड़ा ही भयानक बन गया था। कविराज गोस्वामी ने मल्लाह के मुख से प्रभु के शरीर का जो वर्णन कराया है, उसे उन्हीं के शब्दों में सुनिये – जालिया कहे–इहाँ एक मनुष्य ना देखिल। जाल बाहिते एक मृत मोर जाले आइल॥ बड़ मत्स्य बले, आमि उठाइलूँ यतने। मृतक देखिते मोर भय हैल मने॥ जाल खसाइते तार अंग-स्पर्श हइल। स्पर्शमात्रे सेइ भूत हृदये पशिल॥ भये कम्प हैल, मोर नेत्रे बहे जल। गद्गद वाणी मोर उठिल सकल॥ कि वा ब्रह्मदैत्य कि वा भूत कहने ना जाय। दर्शनमात्रे मनुष्येर पशे सेइ काय॥ शरीर दीघल तार-हाथ पांच सात। एक हस्त पद तार, तिन तिन हाथ॥ अस्थि-सन्धि छूटि चर्म कर नड-बड़े। ताहा देखि, प्राण कार नाहि रहे धरे॥ मड़ा रूप धरि, रहे उत्तान-नयन। कभू गों-गों करे, कभू देखि अचेतन॥ स्वरूप गोस्वामी के पूछने पर जालिया (मल्लाह) कहने लगा– मनुष्य तो मैंने यहाँ कोई देखा नहीं है। जाल डालते समय एक मृतक मनुष्य मेरे जाल आ गया। मैंने उसे बड़ा मत्स्य जानकर उठाया। जब मैंने देखा कि यह तो मुर्दा है, तब मेरे मन में भय हुआ। जाल से निकालते समय उसके अंग से मेरे अंग का स्पर्श हो गया। स्पर्शमात्र से ही वह भूत मेरे शरीर में प्रवेश कर गया। भय के कारण मेरे शरीर में कँपकँपी होने लगी, नेत्रों से जल बहने लगा और मेरी वाणी गद्गद हो गयी। या तो वह ब्रह्मदैत्य है या भूत है, इस बात को मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकता। वह दर्शनमात्र से ही मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाता है। उसका शरीर पांच-सात हाथ लम्बा है। उसके एक-एक हाथ-पांव तीन-तीन हाथ लम्बे हैं। उसके हड्डियों की सन्धियाँ खुल गयी हैं। उसके शरीर के ऊपर का चर्म लुजु-बुजुर-सा करता है। उसे देखकर किसी के भी प्राण नही रह सकते। बड़ा ही विचित्र रूप धारण किये है, दोनों नेत्र चढ़े हुए हैं। कभी तो गों-गों शब्द करता है और कभी फिर अचेतन हो जाता है। इस बात को मल्लाह के मुख से सुनकर स्वरूप गोस्वामी सब कुद समझ गये कि वह महाप्रभु का ही शरीर होगा। उनके अंग-स्पर्श से ही इसकी ऐसी दशा हो गयी है। भय के कारण इसे पता नहीं कि यह प्रेम की अवस्था है। यह सोचकर वे कहने लगे– ‘तुम ओझा के पास क्यों जाते हो, हम बहुत अच्छी ओझाई जातने हैं। कैसा भी भूत क्यों न हो, हमने जहाँ मंत्र पढ़ा नहीं बस, वहीं उसी क्षण वह भूत भागता हुआ ही दिखायी देता है। फिर वह क्षणभर भी नहीं ठहरता।’ ऐसा कहकर स्वरूप गोस्वामी ने वैसे ही झूठ-मूँठ कुछ पढ़कर अपने हाथ को उसके मस्तक पर छुआया और जोरों से उसके गाल पर तीन तमाचे मारे। उसके ऊपर भूत थोड़े ही था। उसे भूत का भ्रम था, विश्वास के कारण वह भय दूर हो गया। तब स्वरूप गोस्वामी ने उससे कहा– ‘तू जिन्हें भूत समझ रहा है, वे महाप्रभु चैतन्यदेव हैं, प्रेम के कारण उनकी ऐसी दशा हो जाती है। तू उन्हें हमको बता कहाँ हैं। हम उन्हीं की खोज में तो आये हैं।’ इस बात को सुनकर वह मल्लाह प्रसन्न होकर सभी भक्तों को साथ लेकर प्रभु के पास पहुँचा। भक्तों ने देखा, सुवर्ण के समान प्रभु का शरीर चांदी के चूरे के समान समुद्र की बालुका में पड़ा हुआ है, आँखे ऊपर को चढ़ी हुई हैं, पेट फूला हुआ है, मुँह में से झाग निकल रहे हैं। बिना किसी प्रकार की चेष्टा किये हुए उनका शरीर गीली बालुका से सना हुआ निश्चेष्ट पड़ा हुआ है। सभी भक्त प्रभु को घेरकर बैठ गये। हम संसारी लोग तो मृत्यु को ही अन्तिम दशा समझते हैं, इसलिये संसारी दृष्टि से प्रभु के शरीर का यहीं अन्त हो गया। फिर उसे चैतन्यता प्राप्त नहीं हुई। किन्तु रागानुगामी भक्त तो मृत्यु के पश्चात भी विरहिणी को चैतन्यता लाभ कराते हैं। उनके मत में मृत्यु ही अन्तिम दशा नहीं है। इस प्रसंग में हम बंगला भाषा के प्रसिद्ध पदकर्ता श्री गोविन्ददास जी का एक पद उद्धृत करते हैं। इससे पाठकों को पता चल जायगा कि श्री कृष्ण नाम श्रवण से मृत्युदशा को प्राप्त हुई भी राधिका जी फिर चैतन्यता प्राप्त करके बातें कहने लगीं। कुंज भवने धीन। तुया गुण गणि गणि। अतिशय दुरबली भेल॥ दशमीक पहिल, दशा हेरि सहचरी। घरे संगे बाहिर केल॥ शुन माधव कि बलब तोय। गोकुल तरुणी, निचय मरण जानि। राइ राइ करि रोय॥ तहि एक सुचतुरी, ताक श्रवण भरि। पुन पुन कहे तुया नाम॥ बहु क्षणे सुन्दरी, पाइ परान कोरि। गद्गद कहे श्याम नाम॥ नामक आछू गुणे, शुनिले त्रिभुवने। मृतजने पुन कहे बात॥ गोविन्ददास कह, इह सब आन नह। याइ देखह मझ साथ॥ श्रीकृष्ण से एक सखी श्री राधिका जी की दशा का वर्णन कर रही है। सखी कहती है– ‘हे श्यामसुन्दर! राधिका जी कुंजभवन में तुम्हारे नामों को दिन-रात रटते-रटते अत्यन्त ही दुबली हो गयी हैं। जब उनकी मृत्यु के समीप की दशा मैंने देखी तब उन्हें उस कुंजकुटीर से बाहर कर लिया। प्यारे माधव ! अब तुमसे क्या कहूँ, बाहर आने पर उसकी मृत्यु हो गयी, सभी सखियाँ उसकी मृत्युदशा को देखकर रुदन करने लगीं। उनमें एक चतुर सखी थी, वह उसके कान में तुम्हारा नाम बार-बार कहने लगी। बहुत देर के अनन्तर उस सुन्दरी के शरीर में कुछ-कुछ प्राणों का संचार होने लगा। थोडी देर में वह गद्गद-कण्ठ से ‘श्याम’ ऐसा कहने लगी। तुम्हारे नाम का त्रिभुवन में ऐसा गुण सुना गया है कि मृत्यु-दशा को प्राप्त हुआ प्राणी भी पुन: बात कहने लगता है। सखी कहती है– ‘तुम इस बात को झूठ मत समझना। यदि तुम्हें इस बात का विश्वास न हो, तो मेरे साथ चलकर उसे देख आओ।’ यह पद गोविन्द दास कवि द्वारा कहा गया है।’ इसी प्रकार भक्तों ने भी प्रभु के कानों में हरिनाम सुनाकर उन्हें फिर जागृत किया। वे अर्धबाह्य दशा में आकर कालिन्दी में होने वाली जलकेलि का वर्णन करने लगे। ‘वह साँवला सभी सखियों को साथ लेकर यमुना जी के सुन्दर शीतल जल में घुसा। सखियों के साथ वह नाना भाँति की जलक्रीडा करने लगा। कभी किसी के शरीर को भिगोता, कभी दस-बीसों को साथ लेकर उनके साथ दिव्य-दिव्य लीलाओं का अभिनय करता। मैं भी उस प्यारे की क्रीडा में सम्मिलित हुई। वह क्रीडा बडी ही सुखकर थी।’ इस प्रकार कहते-कहते प्रभु चारों ओर देखकर स्वरूप गोस्वामी से पूछने लगे– ‘मैं यहाँ कहाँ आ गया? वृन्दावन से मुझे यहाँ कौन ले आया?’ तब स्वरूप गोस्वामी ने सभी समाचार सुनाये और वे उन्हें स्नान कराकर भक्तों के साथ वास स्थान पर ले गये श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 166 श्री कृष्णान्वेषण पयोराशेस्तीरे स्फुरदुपवनलीकनया मुहुर्वृन्दारण्यस्मरणजनितप्रेमविवश:। क्वचित् कृष्णावृत्तिप्रचलरसनो भक्तिरसिक: स चैतन्य: किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥ महाप्रभु एक दिन समुद्र की ओर स्नान करने के निमित्त जा रहे थे। दूर से ही समुद्र तट की शोभा देखकर वे मुग्ध हो गये। वे खड़े होकर उस अद्भुत छटा को निहारने लगे। अनन्त जलराशि से पूर्ण सरितापति सागर अपने नीलरंग के जल से अठखेलियाँ करता हुआ कुछ गम्भीर-सा शब्द कर रहा है। समुद्र के किनारे पर खजूर, ताड, नारियल और अन्य विविध प्रकार के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष अपने लम्बे-लम्बे पल्लवरूपी हाथों से पथिकों को अपनी ओर बुला-से रहे हैं। वृक्षों के अंगों का जोरों से आलिंगन किये हुए उनकी प्राणप्यारी लताएँ धीरे-धीरे अपने कोमल करों को हिला-हिलाकर संकेत से उन्हें कुछ समझा रही हैं। नीचे एक प्रकार की नीली-नीली घास अपने हरे-पीले-लाल तथा भाँति-भाँति के रंग वाले पुष्पों से उस वन्यस्थली की शोभा को और भी अधिक बढ़ाये हुए हैं। मानो श्रीकृष्ण की गोपियों के साथ होने वाली रासक्रीडा के निमित्त नीले रंग के विविध चित्रों से चित्रित कालीन बिछ रही हो। महाप्रभु उस मनमोहिनी दिव्य छटा को देखकर आत्मविस्मृत से बन गये वे अपने को प्रत्यक्ष वृन्दावन में ही खड़ा हुआ समझने लगे। समुद्र का नीला जल उन्हें यमुना जल ही दिखायी देने लगा। उस क्रीडा स्थली में सखियों के साथ श्रीकृष्ण को क्रीड़ा करते देखकर उन्हें रास में भगवान के अन्तर्धान होने की लीला स्मरण हो उठी। बस, फिर क्या था, लगे वक्षों से श्रीकृष्ण का पता पूछने। वे अपने को गोपी समझकर वृक्षों के समीप जाकर बडे ही करुणस्वर में उन्हें सम्बोधन करके पूछने लगे – हे कदम्ब ! हे निम्ब ! अंब ! क्यों रहे मौन गहि। हे बट ! उतँग सुरग वीर कहु तुम इत उत लहि॥ हे अशोक ! हरि-सोक लोकमनि पियहि बतावहु। अहो पनस ! सुभ सरस मरत-तिय अमिय पियावहु॥ इतना कहकर फिर आप-ही-आप कहने लगे– ‘अरी सखियो ! ये पुरुष-जाति के वृक्ष तो उस सांवले के संगी-साथी हैं। पुरुष जाति तो निर्दयी होती है। ये परायी पीर को क्या जाने। चलो, लताओं से पूछें। स्त्री-जाति होने उनका चित्त दयामय और कोमल होता है, वे हमें अवश्य ही प्यारे का पता बतावेंगी। सखि! इन लताओं से पूछो। देखे, ये क्या कहती है?’ यह कहकर आप लताओं को सम्बोधन करके उसी प्रकार अश्रुविमोचन करते हुए गद्गद कण्ठ से करुणा के साथ पूछने लगे– हे मालति ! हे जाति ! जूथके ! सुनि हित दे चित। मन-हरन मन-हरन लाल गिरिधरन लखे इत॥ हे केतकि ! इततें कितहूँ चितये पिय रूसे। कै नँदनन्दन मन्द मुसुकि तुमरे मन मूसे॥ फिर स्वत: ही कहने लगे– ‘अरी सखियों ! ये तो कुछ भी उत्तर नहीं देतीं। चलो, किसी और से ही पूछें।’ यह कहकर आगे बढने लगे। आगे फलों के भार से नवे हुए बहुत-से वृक्ष दिखायी दिये। उन्हें देखकर कहने लगे–‘सखि! ये वृक्ष तो अन्य वृक्षों की भाँति निर्दयी नहीं जान पडते। देखो, सम्पत्तिशाली होकर भी कितने नम्र हैं। इन्होंने इधर से जाने वाले प्यारे का अवश्य ही सत्कार किया होगा। क्योंकि जो सम्पत्ति पाकर भी नम्र होते हैं, उन्हें कैसा भी अतिथि क्यों न हो, प्राणों से भी अधिक प्रिय होता है। इनसे प्यारे का पता अवश्यक लग जायगा। हाँ, तो मैं ही पूछती हूँ’। यह कहकर वे वृक्षों से कहने लगे– हे मुत्ताफल ! बेल धरे मुत्ताफल माला। देखे नैन-बिसाल मोहना नँदके लाला॥ हे मन्दार ! उदार बीर करबीर ! महामति। देखे कहूँ बलवीर धीर मन-हरन धीरगति॥ फिर चन्दन की ओर देखकर कहने लगे– ‘यह बिना ही मांगे सबको शीतलता और सुगन्ध प्रदान करता है, यह हमारे ऊपर अवश्य दया करेगा, इसलिये कहते है– हे चन्दन ! दुखदन्दन ! सबकी जरन जुडावहु। नँदनन्दन, जगबन्दन, चन्दन ! हमहि बतावहु॥ फिर पुष्पों से फूली हुई लताओं की ओर देखकर मानो अपने साथ की सखियों से कह रहे हैं– पूछो री इन लतनि फूलि रहिं फूलनि जोई। सुन्दर पियके परस बिना अस फूल न होई॥ प्यारी सखियो ! अवश्य ही प्यारे ने अपनी प्रिय सखी को प्रसन्न करने के निमित्त इन पर से फूल तोड़े हैं, तभी तो ये इतनी प्रसन्न हैं। प्यारे के स्पर्श बिना इतनी प्रसन्नता आ ही नही सकती। यह कह कर आप उनकी ओर हाथ उठा-उठाकर कहने लगे– हे चम्पक ! हे कुसुम ! तुम्हैं छबि सबसों न्यारी। नेंक बताय जु देहु जहाँ हरि कुंज बिहारी॥ इतने में कुछ मृग उधर से दौड़ते हुए आ निकले। उन्हें देख-देखकर जल्दी कहने लगे– हे सखि ! हे मृगवधू ! इन्हें किन पूछहू अनुसरि। डहडहे इनके नैन अबहिं कहुँ देखे हैं हरि॥ इस प्रकार महाप्रभु गोपीभवन में अधीर से बने चारों ओर भटक रहे थे, उन्हें शरीर का होश नहीं था। आँखों से दो अश्रुधाराएँ बह रही थीं। उसी समय आप पृथ्वी पर बैठ गये और पैर अँगूठे के नख से पृथ्वी को कुरेदन लगे। उसी समय आप फिर उसी तरह कहने लगे– हे अवनी ! नवनीत-चारे, चितचोर हमारे। राखे कतहुँ दुराय बता देउ प्रान पियारे॥ वहीं पास में एक तुलसी का वृक्ष खडा था, उसे देखकर बड़े ही आह्लाद के साथ आलिंगन करते हुए कहने लगे– हे तुलसी ! कल्यानि ! सदा गोविंद-पद-प्यारी। क्यों न कहौ तुम नन्द–सुवन सों बिथा हमारी॥ इतना कहकर आप जोरों से समुद्र की ओर दौडने लगे और समुद्र के जल को यमुना समझकर कहने लगे– हे जमुना ! सबजानि बूझि तुम हठहिं गहत हो। जो जल जग उद्धार ताहि तुम प्रकट बहुत हो॥ थोड़ी देर में उन्हें मालूम हुआ कि करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को फीका बनाने वाले श्रीकृष्ण कदम्ब के नीचे खड़े मुरली बजा रहे हैं। उन्हें देखते ही प्रभु उनकी ओर जल्दी से दौड़े। बीच में ही मूर्छा आने से बेहोश होकर गिर पड़े। उसी समय राय रामानन्द, स्वरूप गोस्वामी, शंकर, गदाधर पण्डित और जगदानन्द आदि वहाँ आ पहुँचे। प्रभु अब अर्धबाह्य दशा में थे। वे आँखे फाड़-फाड़कर चारों आरे कृष्ण की खोज कर रहे थे और स्वरूप गोस्वामी के गले को पड़कर रोते-रोते कह रहे थे– ‘अभी तो थे, अभी इसी क्षण तो मैंने उनके दर्शन किये थे। इतनी ही देर में वे मुझे ठगकर कहाँ चले गये। मैं अब प्राण धारण न करूँगी। प्यारे के विरह में मर जाऊँगी। हाय ! दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोडता। पाये हुए को भी मैं गँवा बैठी।’ राय रामानन्दजी भाँति-भाँति की कथाएँ कहने लगे। स्वरूप गोस्वामी प्रभु ने कोई पद गाने के लिये कहा। स्वरूप गोस्वामी अपनी उसी पुरानी सुरीली तान से गीतगोविन्द के इस पद को गाने लगे– ललितलवंगलतापरिशीलनकोमलमलयसमीरे। मधुकर निकरकरम्बितकोकिलकूजितकुंजकुटीरे॥ विहरति हरिरिह सरसवसन्ते। नृत्यति युवतिजनेन समं सखि विरहिजनस्य जुरन्ते॥१॥ उन्मदमदनमनोरथपथिकवधूजनजनितविलापे । अलिकुलसंकुलकुसुमसमुहनिराकुलवकुलकलापे॥२॥ इस पद को सुनते ही प्रभु के सभी अंग-प्रत्यंग फड़कने लगे। वे सिर हिलाते हुए कहने लगे– ‘अहा, विहरति हरिरिह सरसवसन्ते!’ ठीक है, स्वरूप ! आगे सुनाओ। मेरे कर्णों में इस अमृत को चुआ दो। तुम चुप क्यों हो गये? इस अनुपम रस से मेरे हृदय को भर दो, कानों में होकर बहने लगे। और कहो, और कहो। आगे सुनाओ, फिर क्या हुआ। स्वरूप पद को गाने लगे– मृगमदसौरभरभसवशंवदनवदलमालतमाले। युवजनहृदयविदारणमनसिजनखरुचिकिंशुकजाले॥३॥ मदनमहीपतिकनकदण्डरुचिकेसरकुसुमविकासे। मिलितशिलीमुखपाटलपटलकृतस्मरतूणविलासे॥४॥ महाप्रभु ने कहा– ‘अहा! धन्य है, रुको मत, आगे बढो। हाँ– ‘स्मरतूणविलासे’ ठीक है, फिर ?’ स्वरूप गोस्वामी गाने लगे– विगलितलज्जितजगदवलोकनतरुणवरुणकृतहासे। विरहिनिकृन्तनकुन्तमुखाकृतिकेतकिदन्तुरिताशे॥५॥ माधविकापरिमिलललिते नवमालतिजातिसुगन्धौ। मुनिमनसामपि मोहनकारिणि तरुणा कारणबन्धौ॥६॥ महाप्रभु कहने लगे–‘धन्य, धन्य‘ ‘अकारणबन्धौ’ सचमुच वसन्त युवक-युवतियों का अकृत्रिम सखा है। आगे कहो, आगे– स्वरूप उसी स्वर में मस्त होकर गाने लगे– स्फुरदतिमुक्तलतापरिरम्भणमुकुलितपुलकितचूते। वृन्दावनविपिने परिसरपरिगतयमुनाजलपूते॥७॥ श्रीजयदेवभणितमिदमुदयति हरिचरणस्मृतिसारम्। सरसवसन्तसमयवनवर्णनमनुगतमदनविकारम्॥८॥ महाप्रभु इस पद को सुनते ही नृत्य करने लगे। उन्हें फिर आत्मविस्मृति हो गयी। वे बार-बार स्वरूप गोस्वामी का हाथ पकड़कर उनसे पुन:-पुन: पद-पाठ करने का आग्रह कर रहे थे। प्रभु की ऐसी उन्मत्तावस्था को देखकर सभी विस्मृति से बन गये। स्वरूप गोस्वामी प्रभु की ऐसी दशा देखकर पद गाना नहीं चाहते थे, प्रभु उनसे बार-बार आग्रह कर रहे थे। जैसे-तैसे रामानन्द जी ने उन्हें बिठाया, उनके ऊपर जल छिड़का और वे अपने वस्त्र से वायु करने लगे। प्रभु को कुछ-कुछ चेत हुआ। तब राय महाशय सभी भक्तों के साथ प्रभु को समुद्रतट पर ले गये। वहाँ जाकर सबने प्रभु को स्नान कराया। स्नान कराके सभी भक्त प्रभु को उनके निवास स्थान पर ले गये। अब प्रभु को कुछ-कुछ बाह्य ज्ञान हुआ। तब सभी भक्त अपने-अपने घरों को चले गये। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 167 उन्मादावस्था की अदभुत आकृति अनुद्घाट्य द्वारत्रयमुरु च भित्तित्रयमहो विलंघ्योच्चै: कालिंगिकसुरभिमध्ये निपतित:। तनूद्यत्संकोचात् कमठ इव कृष्णोरुविरहा- द्विराजन् गौरांगो हृदय उदयन्मां मदयति॥ महाप्रभु की दिव्योन्मादावस्था बडी ही अद्भुत थी। उन्हें शरीर का जब होश नहीं था, तब शरीर को स्वस्थ रखने की परवा तो रह ही कैसे सकती है? अपने को शरीर से एकदम पृथक समझकर सभी चेष्टाएं किया करते थे। उनकी हृदय को हिला देने वाली अपूर्व बातों को सुनकर ही हम शरीराध्यासियों के तो रोंगटे खडे हो जाते हैं। क्या एक शरीरधारी प्राणी इस प्रकार की सुधि भुलाकर ऐसा भयंकर व्यापार कर सकता है, जिसके श्रवण से ही भय मालूम पड़ता हो, किन्तु चैतन्यदेव ने तो ये सभी चेष्टाएँ की थीं और श्री रघुनाथदास गोस्वामी ने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से उन्हें देखा था। इतने पर भी कोई अविश्वास करे तो करता रहे। महाप्रभु की गम्भीरा की दशा वर्णन करते हुए कविराज गोस्वामी कहते हैं– गम्भीरा-भितरे रात्रे नाहि निद्रा-लव, भित्ते मुख-शिर घषे क्षत हय सब। तीन द्वारे कपाट प्रभु यायेन बाहिरे, कभू सिंहद्वारे पड़े, कभू सिन्धु नीरे॥ अर्थात ‘गम्भीरा मन्दिर के भीतर महाप्रभु एक क्षण के लिये भी नहीं सोते थे। कभी मुख और सिर को दीवारों से रगडने लगते। इस कारण रक्त की धारा बहने लगती और सम्पूर्ण मुख क्षत-विक्षत हो जाता। कभी द्वारों के बंद रहने पर भी बाहर आ जाते, कभी सिंहद्वार पर जाकर पडे रहते तो कभी समुद्र के जल में कूद पडते।’ कैसा दिल को दहला देने वाला हृदयविदारक वर्णन है। कभी-कभी बड़े ही करुण स्वर में जोरों से रुदन करने लगते, उस करुणाक्रन्दन को सनुकर पत्थर भी पसीजने लगते और वृक्ष भी रोते हुए से दिखायी पड़ते। वे बडे ही करुणापूर्ण शब्दों में रोते-रोते कहते– कहाँ मोर प्राणनाथ मुरलीवदन काहाँ करों काहाँ पाओं व्रजेन्द्रनन्दन। काहारे कहिब केवा जाने मोर दु-ख, ब्रजेन्द्रनन्दन बिना फाटे मोर बुक॥ ‘हाय ! मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं ? जिनके मुख पर मनोहर मुरली विराजमान है ऐसे मेरे मनमोहन मुरलीधर कहाँ हैं ? अरी, मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ ? मैं अपने प्यारे व्रजेन्द्रनन्दन को कहाँ पा सकूँगा ? मैं अपनी विरह-वेदन को किससे कहूँ? कहूँ भी तो मेरे दु:ख को जानेगा ही कौन? परायी पीर को समझने की सामर्थ्य ही किसमें है? उन प्यारे व्रजेन्द्रनन्दन प्राणधन के बिना मेरा हृदय फटा जा रहा है।’ इस प्रकार वे सदा तडपते-से रहते। मछली जैसे कीचड़ में छटपटाती है, सिर कटने पर बकरे का सिर जिस प्रकार थोड़ी देर तक इधर-उधर छटपटाता-सा रहता है उसी प्रकार वे दिन-रात छटपटाते रहते। रात्रि में उनकी विरह-वेदना और भी अधिक बढ़ जाती। उसी वेदना में वे स्थान को छोड़कर इधर-उधर भाग जाते और जहाँ भी बेहोश होकर गिर पड़ते वहीं पड़े रहते। एक दिन की एक अद्भुत घटना सुनिये– नियमानुसार स्वरूप गोस्वामी और राय रामानन्द जी प्रभु को कृष्ण-कथा और विरह के पद सुनाते रहे। सुनाते-सुनाते अर्धरात्रि हो गयी। राय महाशय अपने घर चले गये, स्वरूप गोस्वामी अपनी कुटिया में पड़े रहे। यह तो हम पहले ही बता चुके हैं कि गोविन्द का महाप्रभु के प्रति वात्सल्यभाव था। उसे प्रभु की ऐसी दयनीय दशा असह्य थी। जिस प्रकार वृद्धा माता अपने एकमात्र पुत्र को पागल देखकर सदा उसके शोक में उद्विग्न सी रहती है–उसी प्रकार गोविन्द सदा उद्विग्न बना रहता। प्रभु कृष्ण विरह में दु:खी रहते और गोविन्द प्रभु की विरहावस्था के कारण सदा खिन्न-सा बना रहता। वह प्रभु को छोड़कर पलभर भी इधर-उधर नहीं जाता। प्रभु को भीतर सुलाकर आप गम्भीरा के दरवाजे पर सोता। हमारे पाठकों में से बहुतों को अनुभव होगा कि किसी यंत्र का इंजिन सदा धक्-धक् शब्द करता रहता है। सदा उसके पास रहने वाले लोगों के कान में वह शब्द भर जाता है, फिर सोते-जागते में वह शब्द बाधा नहीं पहुँचाता, उसकी ओर ध्यान नहीं जाता, उसके इतने भारी कोलाहल में भी नींद आ जाती है। रात्रि में सहसा वह बंद हो जाय तो झट उसी समय नींद खुल जाती है और अपने चारों ओर देखकर उस शब्द के बंद होने की जिज्ञासा करने लगते हैं। गोविन्द का भी यही हाल था। महाप्रभु रात्रिभर जोरों से करुणा के साथ पुकारते रहते– श्रीकृष्ण ! गोविन्द ! हरे ! मुरारे ! हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव ! ये शब्द गोविन्द के कानों में भर गये थे, इसलिये जब भी ये बंद हो जाते तभी उसकी नींद खुल जाती और वह प्रभु की खोज करने लगता। स्वरूप गोस्वामी और राय महाशय के चले जाने पर प्रभु जोरों से रोते-रोते श्रीकृष्ण के नामों का कीर्तन करते रहे। गोविन्द द्वार पर ही सो रहा था। रात्रि में सहसा उसकी आँखे अपने-आप ही खुल गयीं। गोविन्द शंकित तो सदा बना ही रहता था, वह जल्दी से उठकर बैठ गया। उसे प्रभु की आवाज नहीं सुनायी दी। घबडाया-सा काँपाता हुआ वह गम्भीरा के भीतर गया। जल्दी से चकमक जलाकर उसने दीपक को जलाया। वहाँ उसने जो कुछ देखा, उसे देखकर वह सन्न रह गया। महाप्रभु का बिस्तरा ज्यों-का-त्यों ही पड़ा है, महाप्रभु वहाँ नहीं हैं। गोविन्द को मानो लाखों बिच्छुओं ने एक साथ काट लिया हो। उसने जोरों से स्वरूप गोस्वामी को आवाज दी। गुसाईं-गुसाईं ! प्रलय हो गया, हाय, मेरा भाग्य फूट गया। गुसाईं ! जल्दी दौडो। महाप्रभु का कुछ पता नहीं।’ गोविन्द के करुणाक्रन्दन को सुनकर स्वरूप गोस्वामी जल्दी से उतरकर नीचे आये। दोनों के हाथ कांप रहे थे। काँपते हुए हाथों से उन्होंने उस विशाल भवन के कोने-कोने में प्रभु को ढूँढा। प्रभु का कुछ पता नहीं। उस किले के समान भवन के तीन परकोटा थे, उनके तीनों दरवाजे ज्यों के त्यों ही बन्द थे। अब भक्तों को आश्चर्य इस बात का हुआ कि प्रभु गये किधर से। आकाश में उड़कर तो कहीं चले नहीं गये। सम्भव है यहीं कहीं पड़े हों। घबडाया हुआ आदमी पागल ही हो जाता है। बावला गोविन्द सुई की तरह जमीन में हाथ से टटोल-टटोलकर प्रभु को ढूँढने लगा। स्वरूप गोस्वामी ने कुछ प्रेम की भर्त्सना के साथ कहा– ‘गोविन्द ! क्या तू भी पागल हो गया ? अरे ! महाप्रभु कोई सुई तो हो ही नहीं गये जो इस तरह हाथ से टटोल रहा है, जल्दी से मशाल जला। समुद्रतट पर चलें, सम्भव है वहीं पडे होंगे। इस विचार को छोड़ दे कि किवाड़ें बंद होने पर वे बाहर कैसे गये। कैसे भी गये हों, बाहर ही होंगे’। कांपते-कांपते गोविन्द ने जल्दी से मशाल में तेल डाला, उसे दीपक से जलाकर वह स्वरूप गोस्वामी के साथ जाने को तैयार हुआ। जगदानन्द, वक्रेश्वर पण्डित, रघुनाथदास आदि सभी भक्त मिलकर प्रभु को खोजने चले। सबसे पहले मन्दिर में ही भक्त खोजते थे। इसलिये सिंहद्वार की ही ओर सब चले। वहाँ उन्होंने बहुत सी मोटी-मोटी तैलंगी गौओं को खड़े देखा। पगला गोविन्द जोरों से से चिल्ला उठा– ‘यहीं होंगे।’ किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। भला गौओं के बीच में प्रभु कहां, सब आगे बढ़ने लगे। किन्तु विक्षिप्त गोविन्द गौओं के भीतर घुसकर देखने लगा। वहाँ उसने जो कुछ देखा उसे देखकर वह डर गया। जोरों से चिल्ला उठा– ‘गुसाईं ! यहाँ आओ देखो, यह क्या पडा है, गौएं उसे बडे‌‌ ही स्नेह से चाट रही हैं। गोविन्द मशाल को उसके समीप ले गया और जोरों से चिल्ला उठा–‘महाप्रभु हैं।’ भक्तों ने भी ध्यान से देखा सचमुच महाप्रभु ही हैं। उस समय उनकी आकृति कैसी बन गयी थी उसे कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये– पेटेर भितर हस्त–पाद कूर्मेर आकार। मुखे फेन, पुलकांग नेत्रे अश्रुधार॥ अचेतन पड़िया छेन येन कूष्माण्डफल। बाहिरे जड़िमा अन्तरे आनन्दविह्वल॥ गाभि सब चौदिके शुके प्रभुर श्रीअंग। दूर कैले नाहि छाड़े प्रभुर अंग संग॥ अर्थात 'महाप्रभु के हाथ-पैर पेट के भीतर धँसे हुए थे। उनकी आकृति कछुए की सी बन गयी थी। मुख से निरन्तर फेन निकल रहा था, सम्पूर्ण अंग के रोम खड़े हुए थे। दोनों नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी। वे कूष्माण्ड-फल की भाँति अचेतन पड़े हुए थे। बाहर से तो जडता प्रतीत होती थी, किन्तु भीतर ही भीतर वे आनन्द में विह्वल हो रहे थे। गौएं चारों ओर खडी होकर प्रभु के श्रीअंग को सूँघ रही थीं। उन्हें बार-बार हटाते थे, किन्तु वे प्रभु के अंग के संग को छोडना ही नहीं चाहती थीं। फिर वहीं आ जाती थीं।’ अस्तु, भक्तों ने मिलकर संकीर्तन किया। कानों में जोरों से हरिनाम सुनाया, जल छिड़का, वायु की तथा और भी भाँति-भाँति के उपाय किये, किन्तु प्रभु को चेतना नहीं हुई। तब विवश होकर भक्तवृन्द उन्हें उसी दशा में उठाकर निवास स्थान की ओर ले चले। वहाँ पहुँचने पर प्रभु को कुछ-कुछ होश होने लगा। उनके हाथ पैर धीरे-धीरे पेट में से निकलकर सीधे होने लगे। शरीर में कुछ-कुछ रक्त का संचार सा होता हुआ प्रतीत होने लगा। थोड़ी ही देर में अर्धबाह्य दशा में आकर इधर-उधर देखते हुए जोरों के साथ क्रन्दन करते हुए कहने लगे– ‘हाय, हाय ! मुझे यहाँ कौन ले आया ? मेरा वह मनमोहन श्याम कहाँ चला गया? मैं उसकी मुरली की मनोहर तान को सुनकर ही गोपियों के साथ उधर चली गयी। श्याम ने अपने संकेत के समय वही मनोहारिणी मुरली बजायी। उस मुरली-रव में ऐसा आकर्षण था कि सखियों की पांचों इन्द्रियां उसी ओर आकर्षित हो गयीं। ठकुरानी राधारानी भी गोपियों को साथ लेकर संकेत के शब्द को सुनकर उसी ओर चल पडीं। अहा ! उस कुंज-कानन में वह कदम्ब विटप के निकट ललित त्रिभंगीगति से खडा बांसुरी में सुर भर रहा था। वह भाग्यवती मुरली उसकी अधरामृत पान से उन्मत्त सी होकर शब्द कर रही थी। उस शब्द में कितनी करुणा थी, कैसी मधुरिमा थी, कितना आकर्षण था, कितनी मादकता, मोहकता, प्रवीणता, पटुता, प्रगल्भता और परवशता थी। उसी शब्द में बावली बनी मैं उसी ओर निहारने लगी। वह छिछोरा मेरी ओर देखकर हँस रहा था।’ फिर चौंककर कहने लगे– ‘स्वरूप ! मैं कहाँ हूँ ? मैं कौन हूँ ? मुझे यहाँ क्यो ले आये ? अभी-अभी तो मैं वृन्दावन में था। यहाँ कहाँ?’ प्रभु की ऐसी दशा देखकर स्वरूप गोस्वामी श्रीमद्भागवत के उसी प्रसंग के श्लोकों को बोलने लगे। उनके श्रवणमात्र से ही प्रभु की उन्मादावस्था फिर ज्यों की त्यों हो गयी। वे बार-बार स्वरूप गोस्वामी से कहते– ‘हां सुनाओ, ठीक है वाह-वाह, सचमुच हाँ यही तो है, इसी का नाम तो अनुराग है’। ऐसा कहते-कहते वे स्वयं ही श्लोक की व्याख्या करने लगते। फिर स्वयं भी बड़े करुणस्वर में श्लोक बोलने लगते– प्रेमच्छेदरुजोऽवगच्छति हरिर्नायं न च प्रेम वा स्थानास्थानमवैति नापि मदनो जानाति नो दुर्बला:। अन्यो वेद न चान्यदु: खमखिलं नो जीवनं वाश्रवं द्वित्रीण्येव दिनानि यौवनमिदं हा हा विधे: का गति:॥ इस श्लोक की फिर आप ही व्याख्या करते-करते कहने लगे– ‘हाय ! दु:ख भी कितना असह्य है, यह प्रेम भी कैसा निर्दयी है। मदन हमारे ऊपर दया नहीं करता। कितनी बेकली है, कैसी विवशता है, कोई मन की बात को क्या जाने। अपने दु:ख का आप ही अनुभव हो सकता है। अपने पास तो कोई प्यारे को रिझाने की वस्तु नहीं ! मान लें वह हमारे नवयौवन के सौन्दर्य से मुग्ध होकर हमें प्यार करने लगेगा, सो यह यौवन भी तो स्थायी नहीं। जल के बुद्बुदों के समान यह भी तो क्षणभंगुर है। दो-चार दिनों में फिर अँधेरा-ही-अँधेरा है। हा ! विधाता की गति कैसी वाम है ! यह इतना अपार दु:ख हम अबलाओं के ही भाग्य में क्यों लिख दिया ? हम एक तो वैसे ही अबला कही जाती हैं, रहे-सहे बल को यह विरहकूकर खा गया। अब दुर्बलातिदुर्बल होकर हम किस प्रकार इस असह्य दु:ख को सहन कर सकें।’ इस प्रकार प्रभु अनेक श्लोकों की व्याख्या करने लगे। विरह के वेग के कारण आप से आप ही उनके मुख से विरहसम्बन्धी ही श्लोक निकल रहे थे और स्वयं उनकी व्याख्या भी करते जाते थे। इस प्रकार व्याख्या करते-करते जोरों से रुदन करते-करते फिर उसी प्रकार श्रीकृष्ण के विरह में उन्मत्त से होकर करुणकण्ठ से प्रार्थना करने लगे – हा हा कृष्ण प्राणधन, हा हा पद्मलोचन ! हा हा दिव्यु सद्गुण-सागर ! हा श्यामसुन्दर, हा हा पीताम्बर-धर ! हा हा रासविलास-नागर ! काहां गेलेतोमा पाई, तुमि कह, ताहां याई ! एत कहि चलिला धाय्या ! हे कृष्ण ! हा प्राणनाथ ! हा पद्मलोचन ! ओ दिव्य सद्गुणों के सागर ! ओ श्यामसुन्दर ! प्यारे, पीताम्बरधर ! ओ रासविलासनागर ! कहाँ जाने से तुम्हें पा सकूँगा ? तुम कहो वहीं जा सकता हूँ। इतना कहते-कहते प्रभु फिर उठकर बाहर की ओर दौड़ने लगे। तब स्वरूप गोस्वामी ने उन्हें पकड़कर बिठाया। फिर आप अचेतन हो गये। होश में आने पर स्वरूप गोस्वामी से कुछ गाने को कहा। स्वरूपगोस्वामी अपनी उसी सुरीली तान से गीत गोविन्द के सुन्दर-सुन्दर पद गाने लगे। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 164 महाप्रभु का दिव्योन्माद सिंचन् सिंचन् नयनपयसा पाण्डुगण्डस्थलान्तं मुंचन मुंचन प्रतिमुहुरहो दीर्घनि:श्वासजातम उच्चै: क्रन्दन् करुणकरुणोद्गीर्णहाहेतिरावो गौर: कोअपि व्रजविरहिणीभावमगन्श्चकास्ति॥ पाठकों को सम्भवतया स्मरण होगा, इस बात को हम पहले ही बता चुके हैं कि श्रीचैतन्यदेव के शरीर में प्रेम के सभी भाव क्रमश: धीरे-धीरे ही प्रस्फुटित हुए। यदि सचमुच प्रेम के ये उच्च भाव एक साथ ही उनके शरीर में उदित हो जाते तो उनका हृदय फट जाता। उनका क्या किसी भी प्राणी का शरीर इन भावों के वेग को एक साथ सहन नहीं कर सकता। गया में आपको छोटे-से मुरली बजाते हुए श्याम दीखे, उन्हीं के फिर दर्शन पाने की लालसा से वे रुदन करने लगे। तभी से धीरे-धीरे उनके भावों में वृद्धि होने लगी। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर इन भावों में मधुर ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। पुरी में प्रभु इसी भाव में विभोर रहते थे। मधुरभाव में राधाभाव सर्वोत्कृष्ट है। सम्पूर्ण रस, सम्पूर्ण भाव और अनुभाव राधाभाव में ही जाकर परिसमाप्त हो जाते हैं, इसलिये अन्त के बारह वर्षों में प्रभु अपने को राधा मानकर ही श्रीकृष्ण के विरह में तडपते रहे। कविराज गोस्वामी कहते हैं– राधिकार भावे प्रभुर सदा अभिमान। सेइ भावे आपनाके हय ‘राधा’ ज्ञान। दिव्योन्माद ऐछे हय, कि इहा विस्मय ? अधिरूढ भावे दिव्योन्माद-प्रलाप हय॥ अर्थात ‘महाप्रभु राधाभाव में भावान्वित होकर उसी भाव से सदा अपने को ‘राधा’ ही समझते थे। यदि फिर उनके शरीर में ‘दिव्योन्माद’ प्रकट होता था तो इसमें विस्मय करने की कौन सी बात है। अधिरूढ भाव में दिव्योन्माद प्रलाप होता ही है’। इसलिये अब आपकी सभी क्रियाएँ उसी विरहिणी की भाँति होती थीं। एक दिन स्वप्न में आप रासलीला देखने लगे। अहा ! प्यारे को बहुत दिनों के पश्चात आज वृन्दावन में देखा है। वही सुन्दर अलकावली, वही माधुरी मुसकान, वे ही हाव-भाव-कटाक्ष, उसी प्रकार रास में थिरकना, सखियों को गले लगाना, कैसा सुख है ! कितना आनन्द है ! ! ताथेई-ताथेई करके सखियों के बीच में श्याम नाच रहे हैं और सैनों को चलाते हुए वंशी बजा रहे हैं। महाप्रभु भूल गये कि यह स्वप्न है या जागृति है। वे तो उस रस में सराबोर थे। गोविन्द को आश्चर्य हुआ कि–‘प्रभु आज इतनी देर तक क्यों सो रहे हैं, रोज तो अरुणोदय में ही उठ जाते थे, आज तो बहुत दिन भी चढ़ गया है। सम्भव है, नाराज हों, इसलिये जगा दूँ।’ यह सोचकर गोविन्द धीरे-धीरे प्रभु के तलवों को दबाने लगा। प्रभु चौंककर उठ पड़े और ‘कृष्ण कहाँ गये?’ कहकर जोरों से रुदन करने लगे। गोविन्द ने कहा– 'प्रभो ! दर्शनों का समय हो गया है, नित्यकर्म से निवृत्त होकर दर्शनों के लिये चलिये।’ इतना सुनते ही उसी भाव में यंत्र की तरह शरीर के स्वभावानुसार नित्यकर्मों से निवृत्त होकर श्रीजगन्नाथ जी के दर्शनों को गये। महाप्रभु गरुडस्तम्भ के सहारे घंटों खड़े-खड़े दर्शन करते रहते थे। उनके दोनों नेत्रों में से जितनी देर तक वे दर्शन करते रहते थे उतनी देर तक जल की दो धाराएँ बहती रहती थीं। आज प्रभु ने जगन्नाथ जी के सिंहासन पर उसी मुरली मनोहर के दर्शन किये। वे उसी प्रकार मुरली बजा-बजाकर प्रभु की ओर मन्द-मन्द मुस्कान कर रहे थे, प्रभु अनिमेषभाव से उनकी रूपमाधुरी का पान कर रहे थे। इतने में ही एक उड़ीसा प्रान्त की वृद्धा माई जगन्नाथ जी के दर्शन न पाने से गरुडस्तम्भ पर चढ़कर और प्रभु के कन्धे पर पैर रखकर दर्शन करने लगी। पीछे खड़े हुए गोविन्द ने उसे ऐसा करने से निषेध किया। इस पर प्रभु ने कहा– ‘यह आदिशक्ति महामाया है, इसके दर्शनसुख में विघ्न मत डालो, इसे यथेष्ट दर्शन करने दो।’ गोविन्द के कहने पर वह वृद्धा माता जल्दी से उतरकर प्रभु के पादपद्मों में पड़कर पुन:-पुन: प्रणाम करती हुई अपने अपराध के लिये क्षमा-याचना करने लगी। प्रभु ने गद्गद कण्ठ से कहा– मातेश्वरी ! जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिये तुम्हें जैसी विकलता है ऐसी विकलता जगन्नाथ जी ने मुझे नहीं दी। हा ! मेरे जीवन को धिक्कार है। जननी ! तुम्हारी ऐसी एकाग्रता को कोटि-कोटि धन्यवाद है। तुमने मेरे कन्धे पर पैर रखा और तुम्हें इसका पता भी नहीं।’ इतना कहते-कहते प्रभु फिर रुदन करने लगे। ‘भावसन्धि’ हो जाने से स्वप्न का भाव जाता रहा और अब जगन्नाथ जी के सिंहासन पर उन्हें सुभद्रा-बलरामसहित जगन्नाथ जी के दर्शन होने लगे। इससे महाप्रभु को कुरुक्षेत्र का भाव उदित हुआ, जब ग्रहण के स्नान के समय श्रीकृष्ण जी अपने परिवार के सहित गोपिकाओं को मिले थे। इससे खिन्न होकर प्रभु अपने वासस्थान पर लौट आये। अब उनकी दशा परम कातर विरहिणी की सी हो गयी। वे उदास मन से नखों से भूमि को कुरेदते हुए विषण्णवदन होकर अश्रु बहाने लगे और अपने को बार-बार धिक्कारने लगे। इसी प्रकार दिन बीता, शाम हुई, अँधेरा छा गया और रात्रि हो गयी। प्रभु के भाव में कोई परिवर्तन नहीं। वही उन्माद, वही बेकली, वही विरह-वेदना उन्हें रह-रहकर व्यथित करने लगी। राय रामानन्द आये, स्वरूप गोस्वामी ने सुन्दर-सुन्दर पद सुनाये, राय महाशय ने कथा की। कुछ भी धीरज न बँधा। ‘हाय ! श्याम ! तुम किधर गये ? मुझ दु:खिनी अबला को मँझधार में ही छोड गये। हाय ! मेरे भाग्य को धिक्कार है, जो अपने प्राणवल्लभ को पाकर भी मैंने फिर गँवा दिया। अब कहाँ जाऊँ ? कैसे करूँ ? किससे कहूँ, कोई सुनने वाला भी तो नहीं। हाय! ललिते ! तू ही कुछ उपाय बता। ओ बहिन विशाखे ! अरी, तू ही मुझे धीरज बँधा। मैना ! मर जाऊँगी। प्यारे के बिना मैं प्राण धारण नहीं कर सकती। जोगिन बन जाऊँगी। घर-घर अलख जगाऊँगी, नरसिंहा लेकर बजाऊँगी, तन में भभूत रमाऊँगी, मैं मारी-मारी फिरूँगी, किसी की भी न सुनूँगी। या तो प्यारे के साथ जीऊँगी या आत्मघात करके मरूँगी ! हाय ! निर्दयी ! ओ निष्ठुर श्याम ! तुम कहाँ चले गये?’ बस, इसी प्रकार प्रलाप करने लगे। रामानन्द जी आधी रात्रि होने पर गम्भीरा मन्दिर में प्रभु को सुलाकर चले गये। स्वरूप गोस्वामी वहीं गोविन्द के समीप ही पडे रहे। महाप्रभु जोरों से बड़े ही करुणस्वर में भगवान के इन नामों का उच्चारण कर रहे थे– श्रीकृष्ण ! गोविन्द ! हरे ! मुरारे ! हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव ! इन नामों की सुमधुर गूँज गोविन्द और स्वरूप गोस्वामी के कानों में भर गयी। वे इन नामों को सुनते-सुनते ही सो गये। किन्तु प्रभु की आँखों में नींद कहाँ, उनकी तो प्राय: सभी रातें हा नाथ ! हा प्यारे ! करते-करते ही बीतती थीं। थोड़ी देर में स्वरूप गोस्वामी की आँखें खुलीं तो उन्हें प्रभु का शब्द सुनायी नहीं दिया। सन्देह होने से वे उठे, गम्भीरा में जाकर देखा, प्रभु नहीं हैं। मानो उनके हृदय में किसी ने वज्र मार दिया हो। अस्त-व्यस्तीभाव से उन्होंने दीपक जलाया। गोविन्द को जगाया। दोनों ही उस विशाल भवन के कोने-कोने में खोज करने लगे, किन्तु प्रभु का कही पता ही नहीं। सभी घबडाये-से इधर-उधर भागने लगे। गोविन्द के साथ वे सीधे मन्दिर की ओर गये वहाँ जाकर क्या देखते हैं, सिंहद्वार के समीप एक मैंले स्थान में प्रभु पड़े हैं। उनकी आकृति विचित्र हो गयी थी। उनका शरीर खूब लम्बा पडा था। हाथ-पैर तथा सभी स्थानों की सन्धियाँ बिलकुल खुल गयी थीं। मानो किसी ने टूटी हड्डियां लेकर चर्म के खोल में भर दी हो। शरीर अस्त-व्यस्त पड़ा था। श्वास-प्रश्वास की गति एकदम बंद थी। कविराज गोस्वामी ने वर्णन किया है– प्रभु पड़ि आछेन दीर्घ हात पांच छय। अचेतन देह नाशाय श्वास नाहि बय॥ एक-एक हस्त-पाद-दीर्घ तिन हात। अस्थि ग्रंथिभिन्न, चर्मे आछे मात्र तात॥ हस्त, पाद, ग्रीवा, कटि, अस्थि-संधि यत। एक-एक वितस्ति भिन्न हय्या छे तत॥ चर्ममात्र उपरे, संधि आछे दीर्घ हय्या। दु:खित हेला सबे प्रभुरे देखिया॥ मुख लाला-फेन प्रभुर उत्तान-नयन। देखिया सकल भक्तेर देह छाडे प्रान॥ अर्थ स्पष्ट है, भक्तों ने समझा प्रभु के प्राण शरीर छोड़कर चले गये। तब स्वरूप गोस्वामी जी जोरों से प्रभु के कानों में कृष्ण नाम की ध्वनि की। उस सुमधुर और कर्णप्रिय ध्वनि को सुनकर प्रभु को कुछ-कुछ बाह्य-ज्ञान सा होने लगा। वे एक साथ ही चौंककर ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ कहते हुए उठ बैठे। प्रभु के उठने पर धीरे-धीरे अस्थियों की संन्धियाँ अपने-आप जुडने लगीं। श्री गोस्वामी रघुनाथदास जी वहीं थे, उन्होंने अपनी आँखों से प्रभु की यह दशा देखी होगी। उन्होंने अपने ‘चैतन्यस्वतकल्पवृक्ष’ नामक ग्रन्थ में इस घटना का यों वर्णन किया है– क्वचिन्मिश्रावासे व्रजपतिसुतस्योरुविरहा- च्छलथत्सत्सन्धित्वाद्दधदधिकदैर्घ्यं भुजपदो:। लुठन् भूमौ काक्वा विकलविकल गद्गदवचा रुदंञ्चछ्रीगौरांगो हृदय उदयन्मां मदयति॥ किसी समय काशी मिश्र के भवन में श्रीकृष्ण विरह उत्पन्न होने पर प्रभु की सन्धियाँ ढीली पड़ जाने से हाथ-पैर लंबे हो गये थे। पृथ्वी पर काकुस्वर से, गद्गद वचनों से जोरों के साथ रुदन करते-करते लोट-पोट होने लगे, वे ही श्री गौरांग हमारे हृदय में उदित होकर हमें मद में मतवाला बना रहे हैं। उन हृदय में उदित होकर मतवाले बनाने वाले श्री गौरांग के और मदमत्त बने श्री रघुनाथदास जी के चरणों में हमारा साष्टांग प्रणाम है! श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 170 श्री अद्वैताचार्य जी की पहेली एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्म: पर: स्मृत:। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभि:॥ मातृभक्त श्रीगौरांग उन्मादावस्था में भी अपनी स्नेहमयी जननी को एकदम नहीं भूले थे। जब वे अन्तर्दशा से कभी-कभी बाह्य दशा में आ जाते तो अपने प्रिय भक्तों की और प्रेममयी माता की कुशल-क्षेम पूछते और उनके समाचार जानने के निमित्त जगदानन्द जी को प्रतिवर्ष गौड़ भेजते थे। जगदानन्द जी गौड़ में जाकर सभी भक्तों से मिलते, उनसे प्रभु की सभी बातें कहते, उनकी दशा बताते और सभी का कुशल-क्षेम लेकर लौट आते। शचीमाता के लिये प्रभु प्रतिवर्ष जगन्नाथ जी का प्रसाद भेजते और भाँति-भाँति के आश्वासनों द्वारा माता को प्रेम-सन्देश पठाते। प्रभु के सन्देश को कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये– तोमार सेवा छांड़ि आमि करिनूँ संन्यास। ‘बाउल हय्या आमि कैलूँ ध र्म नाश॥ एइ अपराध तुमि ना लइह आमार। तोमार अधीन आमि-पुत्र से तोमार॥ नीलाचले आछि आमि तोमार आज्ञाते। यावत् जीव तावत् आमि नारिब छाड़िते॥ अर्थात हे माता ! मैंने तुम्हारी सेवा छोड़कर पागल होकर संन्यास धारण कर लिया है, यह मैंने धर्म के विरुद्ध आचरण किया है, मेरे इस अपराध को तुम चित्त में मत लाना। मैं अब भी तुम्हारे अधीन ही हूँ। निमाई अब भी तुम्हारा पुराना ही पुत्र है। नीलाचल में मैं तुम्हारी ही आज्ञा से रह रहा हूँ और जब तक जीऊँगा तब तक नीलाचल को नहीं छोड़ूँगा। इस प्रकार प्रतिवर्ष प्रेम-सन्देश और प्रसाद भेजते। एक बार जगदानन्द पण्डित प्रभु की आज्ञा से नवद्वीप गये। वहाँ जाकर उन्होंने शचीमाता को प्रसाद दिया, प्रभु का कुशल-समाचार बताया और उनका प्रेम-सन्देश भी कह सुनाया। निमाई को ही सर्वस्व समझने वाली माँ अपने प्यारे पुत्र की ऐसी दयनीय दशा सुनकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसके अतिक्षीण शरीर में अब अधिक दिनों तक जीवित रहने की सामर्थ्य नहीं रही थी। जो कुछ थोड़ी-बहुत सामर्थ्य थी भी सो निमाई की ऐसी भयंकर दशा सुनकर उसके शोक के कारण विलीन हो गयी। माता अब अपने जीवन से निराश हो बैठी, निमाई का चन्द्रवदन अब जीवन में फिर देखने को न मिल सकेगा, इस बात से माता की निराशा और बढ़ गयी। वह अब इस विषमय जीवनभार को बहुत दिनों तक ढोते रहने में असमर्थ-सी हो गयी। माता ने पुत्र को रोते-रोते आशीर्वाद पठाया और जगदानन्द जी को प्रेमपूर्वक विदा किया। जगदानन्द जी वहाँ से अन्यान्य भक्तों के यहाँ होते हेुए श्री अद्वैताचार्यजी के घर गये। आचार्य ने उनका अत्यधिक स्वागत-सत्कार किया और प्रभु के सभी समाचार पूछे। आचार्य का शरीर भी अब बहुत वृद्ध हो गया था। उनकी अवस्था 90 से ऊपर पहुँच गयी थी। खाल लटक गयी थी, अब वे घर से बाहर बहुत ही कम निकलते थे। जगदानन्द को देखकर मानो फिर उनके शरीर में नवयौवन का संचार हो गया और वे एक-एक करके सभी विरक्त भक्तों का समाचार पूछने लगे। जगदानन्द जी दो-चार दिन आचार्य के यहाँ रहे। जब उन्होंने प्रभु के पास जने के लिये अत्यधिक आग्रह किया तब आचार्य ने उन्हें जाने की आज्ञा दे दी और प्रभु के लिये एक पहेली युक्त पत्र भी लिखकर दिया। जगदानन्दजी उस पत्र को लेकर प्रभु के पास पहुँचे। महाप्रभु जब बाह्य दशा में आये, तब उन्होंने सभी भक्तों के कुशल-समाचार पूछे। जगदानन्द जी सबका कुशल-क्षेम बताकर अन्त में अद्वैताचार्य की वह पहेलीवाली पत्री दी। प्रभु की आज्ञा से वे सुनाने लगे। प्रभु को कोटि-कोटि प्रणाम कर लेने के अनन्तर उसमें यह पहेली थी– बाउलके कहिह-लोक हइल बाउल। बाउलके कहिह-बाटेना बिकाय चाउल॥ बाउलके कहिह-काजे नाहिक आउल। बाउलके कहिह-इहा कहिया छे बाउल॥ सभी समीप में बैठे हुए भक्त इस विचित्र पहेली को सुनकर हँसने लगे। महाप्रभु मन ही मन इसका मर्म समझकर कुछ मन्द-मन्द मुसकाये और जैसी उनकी आज्ञा, इतना कहकर चुप हो गये। प्रभु के बाहरी प्राण श्रीस्वरूप गोस्वामी को प्रभु की मुसकराहट में कुछ विचित्रता प्रतीत हुई। इसलिये दीनता के साथ पूछने लगे– ‘प्रभो ! मैं इस विचित्र पहेली का अर्थ समझना चाहता हूँ। आचार्य अद्वैत राय ने यह कैसी अनोखी पहेली भेजी है। आप इस प्रकार इसे सुनकर क्यों मुसकराये?’ प्रभु ने धीरे-धीरे गम्भीरता के स्वर में कहा– अद्वैताचार्य कोई साधारण आचार्य तो हैं ही नहीं। वे नाम के ही आचार्य नहीं हैं, किन्तु आचार्यपने के सभी कार्य भली-भाँति जानते हैं। उन्हें शास्त्रीय विधि के अनुसार पूजा-पाठ करने की सभी विधि मालूम है। पूजा में पहले तो बडे सत्कार के साथ देवताओं को बुलाया जाता है, फिर उनकी षोडशोपचार रीति से विधिवत् पूजा की जाती है, यथास्थान पधराया जाता है, तब देवताओं से हाथ जोड़कर कहते है– ‘गच्छ-गच्छ परं स्थानम्’ अर्थात ‘अब अपने परम स्थान को पधारिये।’ सम्भवतया यही उनका अभिप्राय हो, वे ज्ञानी पण्डित हैं, उनके अर्थ को ठीक-ठीक समझ ही कौन सकता है। इस बात को सुनकर स्वरूप गोस्वामी कुछ अन्यमनस्क से हो गये। सभी को पता चल गया कि महाप्रभु अब शीघ्र ही लीला-संवरण करेंगे। इस बात के स्मरण से सभी का हृदय फटने-सा लगा। उसी दिन से प्रभु की उन्मादावस्था और भी अधिक बढ़ गयी। वे रात-दिन उसी अन्तर्दशा में निमग्न रहने लगे। प्रतिक्षण उनकी दशा लोक-बाह्य-सी बनी रहती थी। कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये– स्तम्भ, कम्प, प्रस्वेद, वैवर्ण अश्रुस्वर-भेद। देह हैल पुलके व्यापित॥ हासे-कान्दे, नाचे, गाय, उठि इति-उति धाय। क्षणे, भूमैं पड़िया मूर्च्छिते॥ ‘शरीर सन्न पड़ जाता है, कँपकँपी छूटने लगती है। शरीर से पसीना बहने लगता है, मुख म्लान हो जाता है, आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है। गला भर आता है, शब्द ठीक-ठीक उच्चारण नहीं होते हैं। देह रोमांचित हो जाती है। हँसते हैं, जोरों से रुदन करते हैं, नाचते हैं, गाते हैं, उठ-उठकर इधर-उधर भागने लगते हैं, क्षणभर में मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ते हैं।’ प्यारे ! पगले दयालु चैतन्य ! क्या इस पागलपन में हमारा कुछ भी साझा नहीं है? हे दीनवत्सल ! इस पागलपन में से यत्किंचित भी हमें मिल जाय तो यह सार-हीन जीवन सार्थक बन जाय। मेरे गौर ! उस मादक मदिरा का एक प्याला मुझको भी क्यों नहीं पिला देता? हे मेरे पागलशिरोमणि ! तेरे चरणों में मैं कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 169 शारदीय निशीथ में दिव्य गन्ध का अनुसरण कुरंगमदजिद्वपु: परिमलोर्मिकृष्टांगन: स्वकांगनलिनाष्टके शशियुताब्जगन्धप्रथ:। मदेन्दुवरचन्दनागुरुसुगन्धिचर्चार्चित: स मे मदनमोहन: सखि तनोति नासास्पृहाम्॥ विरहव्यथा से व्यथित व्यक्तियों के लिये प्रकृति के यावत् सौन्दर्यपूर्ण समान हैं वे ही अत्यन्त दु:खदायी प्रतीत होते हैं। सम्पूर्ण ऋतुओं में श्रेष्ठ वसन्त-ऋतु, शुक्ल पक्ष का प्रवृद्ध चन्द्र, शीतल, मन्द, सुगन्धित मलय मारुत, मेघ की घनघोर गर्जना, अशोक, तमाल, कमल, मृणाल आदि शोकनाशक और शीतलता प्रदान करने वाले वृक्ष तथा उनके नवपल्लव, मधुकर, हंस, चकोर, कृष्णसागर, सारंग, मयूर, कोकिल, शुक, सारिका आदि सुहावने सुन्दर और सुमधुर वचन बोलने वाले पक्षी ये सभी विरह की अग्नि को और अधिक बढ़ाते हैं सभी उसे रुलाते हैं। सभी को विरहिणी के खिझाने में ही आनन्द आता है। पपीहा पी-पी कहकर उसके कलेजे में कसक पैदा करता है, वसन्त उसे उन्मादी बनाता है। फूले हुए वृक्ष उसकी हँसी करते हैं और मलयाचल का मन्दवाही मारुत उसकी मीठी-मीठी चुटकियां लेता है। मानो ये सब प्रपंच विधाता ने विरहिणी को ही खिझाने के लिये रचे हों। बेचारी सबकी सहती है, दिन-रात रोती है और इन्हीं सबसे अपने प्रियतम का पता पूछती है, कैसी बेवशी है। क्यों है न? सहृदय पाठक अनुभव तो करते ही होंगे। वैशाखी पूर्णिमा थी, निशानाथ अपनी सहचरी निशादेवी के साथ खिलखिलाकर हँस रहे थे। उनका सुमधुर श्वेत हास्य का प्रकाश दिशा-विदिशाओं में व्याप्त था। प्रकृति इन पति-पत्नियों के सम्मेलन को दूर से देखकर मन्द-मन्द मुसकरा रही थी। पवन धीरे-धीरे पैरों की आहट बचाकर चल रहा था। शोभा सजीव होकर प्रकृति का आलिंगन कर रही थी। समुद्रतट के जगन्नाथवल्लभ नाम के उद्यान में प्रभु विरहिणी की अवस्था में विचरण कर रहे थे। स्वरूपदामोदर, राम रामानन्द प्रभृति अन्तरंग भक्त उनके साथ थे। महाप्रभु के दोनों नेत्रों से निरन्तर अश्रु प्रवाहित हो रहे थे। मुख कुछ-कुछ म्लान था। चन्द्रमा की चमकीली किरणें उनके श्रीमुख को धीरे-धीरे चुम्बन कर रही थीं। अनजाने के उस चुम्बनसुख से उनके अरुरण रंग के अधर श्वेतवर्ण के प्रकाश के साथ और भी द्युतिमान होकर शोभा की भी शोभा को बढ रहे थे। महाप्रभु का वही उन्माद, वही बेकली, वही छटपटाहट, उसी प्रकार रोना, उसी तरह की प्रार्थना करना था, इसी प्रकार घूम-घूमकर वे अपने प्रियतम की खोज कर रहे थे। प्यारे को खोजते-खोजते वे अत्यन्त ही करुणस्वर से इस श्लोक को पढ़ते जाते थे– तच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतमित्यवेहि मच्चापलंच तव वा मम वाधिगम्यम्। तत् किं करोमि विरलं मुरलीविलासि मुग्धं मुखाम्बुजमुदीक्षितमीक्षणाभ्याम्॥ हे प्यारे, मुरलीविहारी ! तुम्हारा शैशवावस्था का मनोहर, माधुर्य-त्रिभुवनविख्यात है। संसार में उसकी मधुरिमा सर्वत्र व्याप्त है, उससे प्यारी वस्तु कोई विश्व में है ही नहीं और मेरी चपलता, चंचलता, उच्छ्रंखलता तुम पर विदित ही है। तुम ही मेरी चपलता से पूर्णरीत्या परिचित हो। बस मेरे और तुम्हारे सिवा तीसरा कोई उसे नहीं जानता। प्यारे ! बस, एक ही अभिलाषा है, इसी अभिलाषा से अभी तक इन प्राणों को धारण किये हुए हूँ। वह यह कि जिस मनोहर मुखकमल को देखकर व्रजवधू भूली-सी, भटकी-सी, सर्वस्व गंवाई-सी बन जाती हैं, उसी कमलमुख को अपनी दोनों आँखें फाड-फाड़कर एकान्त में देखना चाहती हूँ। हृदयरमण ! क्या कभी देख सकूँगी? प्राणवल्लभ ! क्या कभी ऐसा सुयोग प्राप्त हो सकेगा? बस, इसी प्रकार प्रेम-प्रलाप करते हुए प्रभु जगन्नाथवल्लभ नामक उद्यान में परिभ्रमण कर रहे थे। वे प्रत्येक वृक्ष को आलिंगन करते, उससे अपने प्यारे का पता पूछते और फिर आगे बढ़ जाते। प्रेम से लताओं की भाँति वृक्षों से लिपट जाते, कभी मूर्च्छित होकर गिर पड़ते, कभी फिर उठकर उसी ओर दौडने लगते। उसी समय वे क्या देखते हैं कि अशोक के वृक्ष के नीचे खडे होकर वे ही मुरलीमनोहर अपनी मदमाती मुरली की मन्द-मन्द मुस्कान के साथ बजा रहे हैं। वे मुरली में ही कोई सुन्दर-सा मनोहारी गीत गा रहे हैं, न उनके साथ कोई सखा है, न पास में कोई गोपिका ही। अकेले ही वे अपने स्वाभाविक टेढ़ेपन से ललित त्रिभंगी गति से खड़े हैं। बांस की वह पूर्वजन्म की परम तपस्विनी मुरली अरुण रंग के अधरों का धीरे-धीरे अमृत पान कर रही है। महाप्रभु उसे मनोहर मूर्ति को देखकर उसी की ओर दौडे। प्यारे को आलिंगनदान देने के लिये वे शीघ्रता से बढ़े। हा सर्वनाश ! प्रलय हो गया ! प्यारा तो गायब ! अब उसका कुछ भी पता नहीं ! महाप्रभु वहीं मूर्च्छित होकर गिर पड़े। थोड़ी देर में इधर-उधर सूँ-सूँ करके कुछ सूँघने लगे ! उन्हें श्रीकृष्ण के शरीर की दिव्य गन्ध तो आ रही थी। गन्ध तो आ ही रही थी, किन्तु श्रीकृष्ण दिखायी नहीं देते थे। इसीलिये उसी गन्ध के सहारे-सहारे वे श्रीकृष्ण की खोज करने के लिये फिर चल पड़े। अहा ! प्यारे के शरीर की दिव्य गन्ध कैसी मनोहारिणी होगी, इसे तो कोई रतिसुख की प्रवीणा नायिका ही समझ सकती है, हम अरसिकों का उसमें प्रवेश कहाँ? हाय रे ! प्यारे के शरीर की दिव्य गन्ध घोर मादकता पैदा करने वाली है, जैसे मद्यपीकी आँख से ओझल बहुत ही उत्तम गन्धयुक्त सुरा रखी हो, किन्तु वह उसे दीखती न हो। जिस प्रकार वह उस आसव के लिये विकल होकर तड़पता है, उसी प्रकार प्रभु उस गन्ध को सूँघकर तड़प रहे थे। उस गन्ध की उन्मादकता का वर्णन कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये– सेहे गन्ध वश नासा, सदा करने गन्धेर आशा। कभू पाय कभू ना पाय॥ पाइले पिया पेट भरे, पिड. पिड. तवू करे। ना पाइल तृष्णाय मरिजाय॥ मदन मोहन नाट, पसारि चांदेर हाट। जगन्नारी-ग्राहक लोभाय॥ विना-मूल्य देय गन्ध, गन्ध दिया करे अन्ध। धर याइते पथ नाहि पाय॥ एइ मत गौरहरि, गन्धे कैल मन चुरि। भृंग प्राय इति उति धाय॥ जाय वृक्ष लता पाशे, कृष्ण-स्फुरे सेइ आशे। गन्ध न पाय, गन्ध मात्र पाय॥ श्रीकृष्ण के अंग की उस दिव्य गन्ध के वश में नासिका हो गयी है, वह सदा उसी गन्ध की आशा करती रहती है। कभी तो उस गन्ध को पा जाती है और कभी नहीं भी पाती है। जब पा लेती है तब पेट भरकर खूब पीती है और फिर भी ‘पीऊँ और पीऊँ’ इसी प्रकार कहती रहती है। नहीं पाती तो प्यास से मर जाती है। इस नटवर मदनमोहन ने रूप की हाट लगा रखी है। ग्राहकरूपी जो जगत की स्त्रियां हैं उन्हें लुभाता है। यह ऐसा विचित्र व्यापारी है कि बिना ही मूल्य वैसे ही उस दिव्य गन्ध को दे देता है और गन्ध को देकर अन्धा बना देता है। जिससे वे बेचारी स्त्रियों अपने घर का रास्ता भूल जाती हैं। इस प्रकार गन्ध के द्वारा जिनका मन चुराया गया है, ऐसे गौरहरि भ्रमर की भाँति इधर-उधर दौड रहे थे। वे वृक्ष और लताओं के समीप जाते हैं कि कहीं श्रीकृष्ण मिल जायँ किन्तु वहाँ श्रीकृष्ण नहीं मिलते, केवल उनके शरीर की दिव्य गन्ध ही मिलती हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण की गंध के पीछे घूमते-घूमते सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत हो गयी। निशा अपने प्राणनाथ के वियोगदु:ख के स्मरण से कुछ म्लान-सी हो गयी। उसके मुख का तेज फीका पडने लगा। भगवान भुवनभास्कर के आगमन के भय से निशानाथ भी धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर जाने लगे। स्वरूप गोस्वामी और राय रामानन्द प्रभु को उनके निवास स्थान पर ले गये। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 165 गोवर्धन के भ्रम से चटकगिरि की ओर गमन समीपे नीलाद्रेश्चटकगिरिराजस्य कलना दये गोष्ठे गोवर्धनगिरिपतिं लोकितुमित:। व्रजन्नस्मीत्युक्त्वा प्रमद इव धावन्नवधृते गणै: स्वैर्गौरांगो हृदय उदयन्मां मदयति॥ महाप्रभु की अब प्राय: तीन दशाएँ देखी जाती थीं– अन्तर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा। अन्तर्दशा में वे गोपीभाव से या राधाभाव से श्रीकृष्ण के विरह में, मिलन में भाँति-भाँति के प्रलाप किया करते थे। अर्धबाह्यदशा में अपने को कुछ-कुछ समझने लगते और अब थोड़ी देर पहले जो देख रहे थे उसे ही अपने अन्तरंग भक्तों को सुनाते थे और उस भाव के बदलने के कारण पश्चात्ताप प्रकट करते हुए रुदन भी करते थे। बाह्यदशा में खूब अच्छी-भली बातें करते थे और सभी भक्तों को यथायोग्य सत्कार करते, बड़ो को प्रणाम करते, छोटों की कुशल पूछते। इस प्रकार उनकी तीन ही दशाएँ भक्तों को देखने में आती थीं। तीसरी दशा में तो वे बहुत ही कम कभी-कभी आते थे, नहीं तो सदा अन्तर्दशा या अर्धबाह्यदशा में ही मग्न रहते थे। स्नान शयन, भोजन और पुरुषोत्तदर्शन, ये तो शरीर के स्वभावानुमान स्वत: ही सम्पन्न होते रहते थे। अर्धबाह्यदशा में भी इन कामों में कोई विघ्न नहीं होता था। प्राय: उनका अधिकांश समय रोने में और प्रलाप में ही बीतता था। रोने के कारण आँखें सदा चढ़ी सी रहती थीं, निरन्तर की अश्रुधारा के कारण उनका वक्ष:स्थल सदा भीगा ही रहता था। अश्रुओं की धारा बहने से कपोलों पर कुछ हलकी सी पपड़ी पड़ गयी थी और उनमें कुछ पीलापन भी आ गया था। रामानन्द राय और स्वरूप दामोदर ही उनके एकमात्र सहारे थे। विरह की वेदना में इन्हें ही ललिता और विशाखा-समझकर तथा इनके गले से लिपटकर वे अपने दु:खों को कुछ शान्त करते थे। स्वरूप गोस्वामी के कोकिल कूजित कण्ठ से कविता श्रवण करके वे परमानन्द सुख का अनुभव करते थे। उनका विरह उन प्रेममयी पदावलियों के श्रवण से जितना ही अधिक बढ़ता था, उतनी ही उन्हें प्रसन्नता होती थी और वे उठकर नृत्य करने लगते थे। एक दिन महाप्रभु समुद्र की ओर जा रहे थे, दूर से ही उन्हें बालुका का चटक नामक पहाड़- सा दीखा। बस, फिर क्या था, जोरों की हुंकार मारते हुए आप उसे ही गोवर्धन समझकर उसी ओर दौड़े। इनकी अद्भुत हुंकार को सुनकर जो भी भक्त जैसे बैठा था, वह वैसे ही इनके पीछे दौडा। किन्तु भला, ये किसके हाथ आने वाले थे। वायु की भाँति आवेश के झोकों के साथ उड़े चले जा रहे थे। उस समय इनके सम्पूर्ण शरीर में सभी सात्त्विक विकार उत्पन्न हो गये थे। बड़ी ही विवित्र और अभूतपूर्व दशा थी। गोस्वामी ने अपनी मार्मिक लेखनी से बडी ही ओजस्विनी भाषा में इनकी दशा का वर्णन किया है। उन्हीं के शब्दों में सुनिये – प्रति रोमकूपे मांस व्रणेर आकार। तार उपरे रोमोद्गम कदंब प्रकार॥ प्रतिरोमे प्रस्वेद पड़े रुधिरेर धार। कंठ घर्घर, नाहि वर्णेर उच्चार॥ दुई नेत्रे भरि, अश्रु बहये अपार। समुद्रे मिलिला येन गंगा-यमुना धार॥ वैवर्ण शंख प्राय, स्वेद हेल अंग। तवे कंप उठे येन समुद्रे तरंग॥ अर्थात ‘प्रत्येक रोकूप मानो मांस का फोडा ही बन गया है, उनके ऊपर रोम ऐसे दीखते हैं जैसे कदम्ब की कलियाँ। प्रत्येक रोमकूप से रक्त की धार के समान पसीना बह रहा है। कण्ठ घर्घर शब्द कर रहा है, एक भी वर्ण स्पष्ट सुनायी नहीं देता। दोनों नेत्रों से अपार अश्रुओं की दो धाराएं बह रही हैं मानो गंगाजी और यमुना जी मिलने के लिये समुद्र की ओर जा रही हों। वैवर्ण के कारण मुख शंख के समान सफेद-सा पड़ गया है। शरीर पसीने से लथपथ हो गया है। शरीर में कँपकँपी ऐसे उठती हैं मानो समुद्र से तरंगें उठ रही हों।’ ऐसी दशा होने पर प्रभु और आगे न बढ़ सके। वे थर-थर कांपते हुए एकदम भूमि पर गिर पडे। गोविन्द पीछे दौडा आ रहा था, उसने प्रभु को इस दशा में पड़े हुए देखकर उनके मुख में जल डाला और अपने वस्त्र से वायु करने लगा। इतने में ही जगदानन्द पण्डित, गदाधर गोस्वामी, रमाई, नदाई तथा स्वरूप दामोदर आदि भक्त पहुँच गये। प्रभु की ऐसी विचित्र दशा देखकर सभी को परम विस्मय हुआ। सभी प्रभु को चारों ओर से घेरकर उच्च स्वर से संकीर्तन करने लगे। अब प्रभु को कुछ-कुछ होश आया। वे हुंकार मारकर उठ बैठे और और अपने चारों ओर भूल-से, भटके-से, कुछ गँवाये-से इधर-उधर देखने लगे। और स्वरूप गोस्वामी से रोते-रोते कहने लगे– ‘अरे ! हमें यहाँ कौन ले आया? गोवर्धन पर से यहाँ हमें कौन उठा लाया? अहा ! वह कैसी दिव्य छटा थी, गोवर्धन की नीरव निकुंज में नन्दलाल ने अपनी वही बांस की वंशी बजायी। उसकी मीठी ध्वनि सुनकर मैं भी उसी ओर उठ धायी। राधारानी भी अपनी सखी-सहेलियों के साथ उसी स्थान पर आयीं। अहा ! उस सांवरे की कैसी सुन्दर मन्द मुस्कान थी ! उसकी हँसी में जादू था। सभी गोपिकाएँ अकी-सी, जकी-सी, भूली-सी, भटकी-सी उसी को लक्ष्य करके दौड़ी आ रही थीं। सहसा वह सांवला अपनी सर्वश्रेष्ठ सखी श्रीराधिका जी को साथ लेकर न जाने किधर चला गया। तब क्या हुआ कुद पता नहीं। यहाँ मुझे कौन उठा लाया? इतना कहकर प्रभु बड़े ही जोरों से हा कृष्ण ! हा प्राणवल्लभ ! हा हृदयरमण ! कहकर जोरों से रुदन करने लगे। प्रभु की इस अद्भुत दशा का समाचार सुनकर श्री परमानन्द जी पुरी और ब्रह्मानन्द जी भारती भी दौड़े आये। अब प्रभु की एकदम बाह्य दशा हो गयी थी, अत: उन्होंने श्रद्धा पूर्वक इन दोनों पूज्य संन्यासियों को प्रणाम किया और संकोच के साथ कहने लगे– ‘आपने क्यों कष्ट किया? व्यर्थ ही इतनी दूर आये।’ पुरी गोस्वामी ने हँसकर कहा– ‘हम भी चले आये कि चलकर तुम्हारा नृत्य ही देखें।’ इतना सुनते ही प्रभु लज्जित-से हो गये। भक्तवृन्द महाप्रभु को साथ लेकर उनके निवास स्थान पर आये। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 172 महाप्रभु का अदर्शन अथवा लीलासंवरण अद्यैव हसिंतं गीतं पठितं यै: शरीरिभि:। अद्यैव ते न दृश्यन्ते कष्टं कालस्य चेष्टितम्॥ महाभारत में स्थान-स्थान पर क्षात्रधर्म की निन्दा की गयी है। युद्ध में खड़ग लेकर जो क्षत्रिय अपने भाई-बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियों का बात की बात में वध कर सकता है, ऐसे कठोर धर्म को धर्मराज युधिष्ठिर ऐसे महात्मा ने पर निन्द्य बताकर भी उसमें प्रवृत्त होने के लिये अपनी विवशता बतलायी है। किन्तु क्षात्र धर्म से भी कठोर और क्रूर कर्म हम-जैसे क्षुद्र लेखकों का है, जिनके हाथ में वज्र के समान बलपूर्वक लोहे की लेखनी दे दी जाती है और कहा जाता है कि उस महापुरुष की अदर्शन-लीला लिखो ! हाय ! कितना कठोर कर्म है, हृदय को हिला देने वाले इस प्रसंग का वर्णन हमसे क्यों कराया जाता है? कल तक जिसके मुखकमल को देखकर असंख्य भावुक भक्त भक्ति भागीरथी के शीतल और सुखकर सलिलरूपी आनन्द में विभोर होकर अवगाहन कर रहे थे, उनके नेत्रों के सामने वह आनन्दमय दृश्य हटा दिया जाय, यह कितना गर्हणीय काम होगा। हाय रे विधाता ! तेरे सभी काम निर्दयतापूर्ण होते हैं ! निर्दयी ! दुनियाभर की निर्दयता का ठेका तैने ही ले लिया है। भला, जिनके मनोहर चन्द्रवदन को देखकर हमारा मनकुमुद खिल जाता है, उसे हमारी आँखों से ओझल करने में तुझे क्या मजा मिलता है? तेरा इसमें लाभ ही क्या है? क्यों नही तू सदा उसे हमारे पास ही रहने देता। किन्तु कोई दयावान हो उससे तो कुछ कहा- सुना भी जाय, जो पहले से ही निर्दयी है, उससे कहना मानो अरण्य में रोदन करना है। हाय रे विधाता ! सचमुच लीलासंवरण के वर्णन के अधिकारी तो व्यास, वाल्मीकि ही हैं। इनके अतिरिक्त जो नित्य महापुरुषों की लीलासंवरण का उल्लेख करते हैं, वह उनकी अनधिकार चेष्टा ही है। महाभारत में जब अर्जुन की त्रिभुवनविख्यात शूरता, वीरता और युद्ध चातुर्य की बातें पढ़ते हैं तो पढते-पढते रोंगटे खड हो जाते हैं। हमारी आँखों के सामने लम्बी-लम्बी भुजाओं वाले गाण्डीवधारी अर्जुन की वह विशाल और भव्य मूर्ति प्रत्यक्ष होकर नृत्य करने लगती है। उसी को जब श्रीकृष्ण के अदर्शन के अनन्तर आभीर और भीलों द्वारा लुटते देखते हैं, तो यह सब दृश्य-प्रपंच स्वप्नवत प्रतीत होने लगता है। तब यह प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है कि यह सब उस खिलाडी श्रीकृष्ण की खिलवाड है, लीला-प्रिय श्याम की ललित लीला के सिवा कुछ नहीं है। पाण्डवों की सच्चरित्रता, कष्टसहिष्णुता, शूरता, कार्यदक्षता, पटुता, श्रीकृष्णप्रियता आदि गुणों को पढ़ते हैं तब रोंगटे खड़े हो जाते हैं, हृदय उनके लिये भर आता है, किन्तु उन्हें ही जब हिमालय में गलते हुए देखते हैं तो छाती फटने लगती है। सबसे पहले द्रौपदी बर्फ में गिर जाती है। उस कौमलांगी अबला को बर्फ में ही बिलबिलाती छोड़कर धर्मराज आगे बढ़ते हैं। वे मुड़कर भी उसकी ओर नहीं देखते। फिर प्यारे नकुल-सहदेव गिर पड़ते हैं। धर्मराज उसी प्रकार दृढ़तापूर्वक बर्फ पर चढ़ रहे हैं। हाय, गजब हुआ। जिस भीम के पराक्रम से यह सप्तद्वीपा वसुमती प्राप्त हुई थी। वह भी बर्फ में पैर फिसलने से गिर पड़ और तड़पने लगा। किन्तु युधिष्ठिर किसकी सुनते हैं, वे आगे बढे ही जा रहे हैं। अब वह हृदयविदारक दृश्य आया। जिसके नाम से मनुष्य तो क्या स्वर्ग के देवता थर-थर कांपते थे, वह गाण्डीव धुनषधारी अर्जुन मूर्च्छित होकर गिर पड़ा और हा तात ! कहकर चीत्कार मारने लगा, किन्तु धर्मराज ने मुड़कर भी उनकी ओर नहीं देखा ! सचमुच स्वर्गारोहण पर्व को पढ़ते-पढ़ते रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कैसा भी वज्रहृदय क्यों न हो बिना रोये न रहेगा। जब मुझ-जैसे कठोर हृदय वाले की आँखों से भी अश्रुविन्द निकल पड़े तब फिर सहृदय पाठकों की तो बात ही क्या? इसी प्रकार जब वाल्मीकीय रामायण में, श्री राम की सुकुमारता, ब्राह्मणप्रियता, गुरुभक्ति, शूरता और पितृभक्ति की बातें पढ़ते तो हृदय भर आता है। सीता जी के प्रति उनका कैसा प्रगाढ़ प्रेम था। हाय ! जिस समय कामान्ध रावण जनकनन्दिनी को चुरा ले गया, तब उन मर्यादापुरुषोत्तम की भी मर्यादा टूट गयी। वे अकेली जानकी के पीछे विश्वब्रह्माण्ड को अपने अमोघ बाण के द्वारा भस्म करने को उद्यत हो गये। उस समय उनका प्रचण्ड क्रोध, दुर्धर्ष तेज और असहनीय रोष देखते ही बनता था। दूसरे ही क्षण वे साधारण कामियों की भाँति रो-रोकर लक्ष्मण से पूछने लगते– ‘भैया ! मैं कौन हूँ? तुम कौन हो, हम यहाँ क्यों फिर रहे हैं? सीता कौन है, हा सीते ! हा प्राणवल्लभे ! तू कहाँ चली गयी ?’ ऐसा कहते-कहते बेहोश होकर गिर पड़ते हैं। उनके अनुज ब्रह्मचारी लक्षमण जी बिना खाये-पीये और भूख-नींद का परित्याग किये छाया की तरह उनके पीछे-पीछे फिरते हैं और जहाँ श्रीराम का एक बूँद पसीना गिरता है, वहीं वे अपने कलेजे को काटकर उसका एक प्याला खून निकालकर उससे उसे स्वेद-विन्दु को धोते हैं। उन्हीं लक्ष्मण का जब श्री रामचन्द्र जी ने छद्मवेषधारी यमराज के कहने से परित्याग कर दिया और वे श्री राम के प्यारे भाई सुमित्रानन्दन महाराज दशरथ के प्रिय पुत्र सरयू नदी में निमग्न कर अपने प्राणों को खोते हैं तो हृदय फटने लगता है। उससे भी अधिक करुणापूर्ण तो यह दृश्य है कि जब श्री रामचन्द्र जी भी अपने भाइयों के साथ उसी प्रकार सरयू में शरीर को निमग्न कर अपने नित्यधाम को पधारते हैं। सचमुच इन दोनों महाकवियों ने इन करुणापूर्ण प्रसंग को लिखकर करुणा की एक अविच्छिन्न धारा बहा दी है, जो इन ग्रन्थों के पठन करने वालों के नेत्र-जल से सदा बढ़ती ही रहती है। महाभारत और रामायण के ये दो स्थल मुझे अत्यन्त प्रिय हैं, इन्हीं हृदयविदारक प्रकरणों को जब पढ़ता हूँ तभी कुछ हृदय पसीजता है और श्रीराम-कृष्ण की लीलाओं की कुछ-कुछ झलक सी दिखायी देने लगती है। यह हम-जैसे नीरस हृदय वालों के लिये है। जो भगवत्कृपा पात्र हैं, जिनके हृदय कोमल हैं, जो सरस हैं, भावुक है, प्रेमी हैं और श्रीराम-कृष्ण के अनन्य उपासक हैं, उन सबके लिये तो ये प्रकरण अत्यन्त ही असह्य हैं। उनके मत में तो श्रीराम-कृष्ण का कभी अदर्शन हुआ ही नहीं, वे नित्य हैं, शाश्वत हैं। आत्मा से नहीं, वे शरीर से भी अभी ज्यों-के-त्यों ही विराजमान हैं। इसीलिये श्रीमद्वाल्मीकीय के पारायण में उत्तरकाण्ड छोड़ दिया जाता है। वैष्णवगण राजगद्दी होने पर ही रामायण की समाप्ति समझते हैं और वही रामायण का नवाह समाप्त हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो इस प्रकरण को एकदम छोड़ ही दिया है। भला, वे अपनी कोमल और भक्तिभरी लेखनी से सीता माता का परित्याग, उनका पृथ्वी में समा जाना और गुप्तारघाट पर रामानुज लक्ष्मण का अन्तर्धान हो जाना इन हृदयविदारक प्रकरणों को कैसे लिख सकते थे। इसी प्रकार श्री चैतन्य चरित्र-लेखकों ने श्री श्रीचैतन्य की अन्तिम अदर्शन लीला का वर्णन नहीं किया है। सभी इस विषय में मौन ही रहे हैं। हाँ, ‘चैतन्यमंगल’ कार ने कुछ थोसा-सा वर्णन अवश्य किया है, सो अदर्शन की दृष्टि से नहीं। उसमें श्री चैतन्य देव के सम्बन्ध की सब करामाती, अलौकिक चमत्कारपूर्ण घटनाओं का ही वर्णन किया गया है। इसीलिये उनका शरीर साधारण लोगों की भाँति शान्त नहीं हुआ, इसी दृष्टि से अलौकिक घटना ही समझकर उसका वर्णन किया गया है। नहीं तो सभी वैष्णव इस दु:खदायी प्रसंग को सुनना नहीं चाहते। कोमल प्रकृति के वैष्णव भला इसे सुन ही कैसे सकते हैं? इसीलिये एक भौतिक घटनाओं को ही सत्य और इतिहास मानने वाले महानुभाव ने लिखा है कि ‘श्रीचैतन्यदेव के भक्तों की अन्धभक्ति ने श्री चैतन्य देव की मृत्यु के सम्बन्ध में एकदम पर्दा डाल दिया है।’ उन भोले भाई को यह पता नहीं कि चैतन्य तो नित्य हैं। भला चैतन्य की भी कभी मृत्यु हो सकती है। जिस प्रकार अग्नि कभी नहीं बुझती उसी प्रकार चैतन्य भी कभी नहीं मरते। अज्ञानी पुरुष ही इन्हें बुझा और मरा हुआ समझते हैं। अग्नि तो सर्वव्यापक है, विश्व उसी के ऊपर अवलम्बित है। संसार से अग्नितत्त्व निकाल दीजिये। उसी क्षण प्रलय हो जाय। शरीर के पेट की अग्नि को शान्त कर दीजिये उसी क्षण शरीर ठंडा हो जाय। सर्वव्यापक अग्नि के ही सहारे यह विश्व खड़ा है। वह हमें इन चर्म-चक्षुओं से सर्वत्र प्रत्यक्ष नहीं दीखती। दो लकडियों को घिसिये, अग्नि प्रत्यक्ष हो जायेगी। इसी प्रकार चैतन्य सर्वत्र व्यापक हैं। त्याग, वैराग्य और प्रेम का अवलम्बन कीजिये, चैतन्य प्रत्यक्ष होकर ऊपर को हाथ उठा-उठाकर नृत्य करने लगेंगे। जिसका जीवन अग्निमय हो, जो श्रीकृष्ण प्रेम में छटपटाता-सा दृष्टिगोचर होता हो, जिसके शरीर में त्याग, वैराग्य और प्रेम ने घर बना लिया हो, जो दूसरों की निन्दा और दोष-दर्शन से दूर रहता हो वहाँ समझ लो कि श्री चैतन्य यहाँ प्रत्यक्ष प्रकट हो गये हैं। यदि सचमुच चैतन्य के दर्शन करने के तुम उत्सुक हो तो इन्हीं स्थानों में चैतन्य के दर्शन हो सकेंगे। किन्तु ये सब बातें तो ज्ञान की हैं। भक्त को इतना अवकाश कहाँ कि वह इन ज्ञानगाथाओं को श्रवण करे। वह तो श्री चैतन्य–चरित्र ही सुनना चाहता है। उसमें इतना पुरुषार्थ कहाँ ? उसका पुरुषार्थ तो इतना ही है कि भक्तरूप में या भगवान रूप में श्रीकृष्ण ने जो-जो लीलाएं की हैं उन्हीं को बार-बार सुनना चाहता है। उसकी इच्छा नहीं कि सभी लीलाओं को सुन ले। श्रीकृष्ण की सभी लीलाओं का पार तो वे स्वयं ही नहीं जानते फिर दूसरा कोई तो जान ही क्या सकता है? भक्त तो चाहता है, चाहे कूप से ला दो या घड़े से हमारी तो एक लोटे की प्यास है, नदी से लाओगे तो भी एक ही लोटा पीवेंगे और घड़े से दोगे तो भी उतना ही। समुद्र में से लाओ तो सम्भव है, हमसे पिया भी न जाय। क्योंकि उसका पान तो कोई अगस्त्य-जैसे महापुरुष ही कर सकते हैं। इसलिये भावुक भक्त सद श्रीकृष्ण और उनके दूसरे स्वरूप श्रीकृष्ण-भक्तों की ही लीलाओं का श्रवण करते रहते हैं। उनका कोमल हृदय इन अप्रकट और अदर्शन लीलाओं का श्रवण नहीं कर सकता, क्योंकि शिरीषकुसुम के समान, छुई-मुई के पत्तों के समान उनका शीघ्र ही द्रवित हो जाने वाला हृदय होता है। यह बात भी परम भावुक भक्तों की है; किन्तु हम-जैसे वज्र के समान हृदय रखने वाले पुरुष क्या करें? भक्त का तो लक्षण ही यह है कि भगवन्नाम के श्रवणमात्र से चन्द्रकान्तमणि के समान उसके दोनों नेत्र बहने लगें। आंसू ही भक्त का आभूषण है, आंसू में ही श्रीकृष्ण छिपे रहते हैं। जिस आँख में आंसू नहीं वहाँ श्रीकृष्ण नहीं। तब हम कैसे करें, हमारी आँखों में तो आंसू आते ही नहीं। हां, ऐसे-ऐसे हृदयविदारक प्रकरणों को कभी पढ़ते हैं तो दो-चार बूँदें आप से आप ही निकल पड़ती हैं, इसलिये भक्तों को कष्ट देने के निमित्त नहीं, अपनी आँखों को पवित्र करने के निमित्त, अपने वज्र के समान हृदय को पिघलाने के निमित्त हम यहाँ अति संक्षेप में श्री चैतन्यदेव के अदर्शन का यत्किंचित वृत्तान्त लिखते हैं। चौबीस वर्ष नवद्वीप में रहकर गृहस्थाश्रम में और चौबीस वर्ष संन्यास लेकर पुरी आदि तीर्थों में प्रभु ने बिताये। संन्यास लेकर छ: वर्षों तक आप तीर्थों में भ्रमण करते रहे और अन्त में अठारह वर्षों तक अचल जगन्नाथजी के रूप में पुरी में रहे। बारह वर्षों तक निरन्तर दिव्योन्माद की दशा में रहे। उसका यत्किंचित आभास पाठकों को पिछले प्रकरणों में मिल चुका है। जिन्होंने प्रार्थना करके प्रभु को बुलाया था उन्होंने ही अब पहेली भेजकर गौरहाट उठाने की अनुमति दे दी। इधर स्नेहमयी शचीमाता भी इस संसार को त्यागकर परलोकवासिनी बन गयीं। चैतन्य महाप्रभु जिस कार्य के लिये अवतरित हुए थे, वह कार्य भी सुचारुरीति से सम्पन्न हो गया। अब उन्होंने लीलासंवरण करने का निश्चय कर लिया। उनके अन्तरंग भक्त तो प्रभु के रंग-ढंग को ही देखकर अनुमान लगा रहे थे कि प्रभु अब हमसे ओझल होना चाहते हैं। इसलिये वे सदा सचेष्ट ही बने रहते थे। शाके 1455 (संवत 1590, ई. सन 1533) का आषाढ़ महीना था। रथ यात्रा का उत्सव देखने के निमित्त गौड़ देश से कुछ भक्त आ गये थे। महाप्रभु आज अन्य दिनों की अपेक्षा अत्यधिक गम्भीर थे। भक्तों ने इतनी अधिक गम्भीरता उनके जीवन में कभी नहीं देखी। उनके ललाट से एक अद्भुत तेज-सा निकल रहा था, अत्यन्त ही दत्तचित्त होकर प्रभु स्वरूप गोस्वामी के मुख से श्रीकृष्ण कथा श्रवण कर रहे थे। सहसा वे वैसे ही जल्दी से उठकर खडे हो गये और जल्दी से अकेले ही श्रीजगन्नाथजी के मन्दिर की ओर दौडने लगे। भक्तों को परम आश्चर्य हुआ। महाप्रभु इस प्रकार अकेले मन्दिर की ओर कभी नहीं जाते थे, इसलिये भक्त भी पीछे-पीछे प्रभु के पादपद्मों का अनुसण करते हुए दौड़ने लगे। आज महाप्रभु अपने नित्य के नियमित स्थान पर गरुडस्तम्भ के समीप नहीं रुके, वे सीधे मन्दिर के दरवाजे के समीप चले गये। सभी परम विस्मित-से हो गये। महाप्रभु ने एक बार द्वार पर से ही उछककर श्रीजगन्नाथ जी की ओर देखा और फिर जल्दी से आप मन्दिर में घुस गये। महान आश्चर्य ! अघटित घटना ! ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। मन्दिर के सभी कपाट अपने-आप बंद हो गये, महाप्रभु अकेले ही मन्दिर के भीतर थे। सभी भक्तगण चुपचाप दरवाजे पर खड़े इस अलौकिक दृश्य को उत्सुकता के साथ देख रहे थे। गुंजाभवन में एक पूजा करने वाले भाग्यवान पुजारी प्रभु की इस अन्तिम लीला को प्रत्यक्ष देख रहे थे। उन्होंने देखा, महाप्रभु जगन्नाथ जी के सम्मुख हाथ जोड़े खड़े हैं और गद्गदकण्ठ से प्रार्थना कर रहे हैं– ‘हे दीनवत्सल प्रभो! हे दयामय देव ! हे जगत्पिता जगन्नाथ देव ! सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि–इन चारों युगों में कलियुग का एकमात्र धर्म श्रीकृष्ण संकीर्तन ही है। हे नाथ! आप अब जीवों पर ऐसी दया कीजिये कि वे निरन्तर आपके सुमधुर नामों का सदा कीर्तन करते रहें। प्रभो ! अब घोर कलियुग आ गया है, इसमें जीवों को आपके चरणों के सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं। इन अनाश्रित जीवों पर कृपा करके अपने चरण कमलों का आश्रय प्रदान कीजिये।’ बस, इतना कहते-कहते प्रभु ने श्री जगन्नाथ जी के श्री विग्रह को आलिंगन किया और उसी क्षण आप उसमें लीन हो गये। पुजारी जल्दी से यह कहता हुआ– ‘प्रभो ! यह आप क्या कर रहे हैं, दयालो ! यह आपकी कैसी लीला है, जल्दी से प्रभु को पकड़़ने के लिये दौड़़ा ! किन्तु प्रभु अब वहाँ कहाँ ! वे तो अपने असली स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये। पुजारी मूर्च्छित होकर गिर पड़ा और ‘हा देव ! हे प्रभो ! हे दयालो ! कहकर जोरों से चीत्कार करने लगा। द्वार पर खड़े हुए भक्तों ने पुजारी का करुण क्रन्दन सुनकर जल्दी से किवाड़ खोलने को कहा, किन्तु पुजारी को होश कहाँ ! जैसे-तैसे बहुत कहने-सुनने पर पुजारी ने किवाड़ खोले। भक्तों ने मन्दिर में प्रवेश किया और प्रभु को वहाँ न देखकर अधीर होकर वे पूछने लगे– ‘प्रभु कहाँ हैं? पुजारी ने लड़खड़ती हुई वाणी में रुक-रुककर सारी कहानी कह सुनायी। सुनते ही भक्तों की जो दशा हुई, उसका वर्णन यह काले मुख की लेखनी भला कैसे कर सकती है ? भक्त पछाड़ खा-खाकर गिरने लगे, कोई दीवार से सिर रगड़ने लगा। कोई पत्थर से माथा फोड़ने लगा। कोई रोते-रोते धूलि में लोटने लगा। स्वरूप गोस्वामी तो प्रभु के बाहरी प्राण ही थी। वे प्रभु के वियोग को कैसे सह सकते थे। वे चुपचाप स्तम्भित भाव से खड़े रहे। उनके पैर लड़खड़ाने लगे। भक्तों ने देखा उनके मुंह से कुछ धुँआं-सा निकल रहा है। उसी समय फट से आज हुई। स्वरूप गोस्वामी का हृदय फट गया और उन्होंने भी उसी समय प्रभु के ही पथ का अनुसरण किया। भक्तों को जगन्नाथ पुरी अब उजड़ी हुई नगरी-सी मालूम हुई। किसी ने तो उसी समय समुद्र में कूदकर प्राण गँवा दिये। किसी ने कुछ किया और बहुत-से पुरी को छोड़कर विभिन्न स्थानों में चले गये। पुरी से अब गौराहट उठ गयी। वक्रेश्वर पण्डित ने फिर उसे जमाने की चेष्टा की, किन्तु उसका उल्लेख करना विषयान्तर हो जायगा। किसी के जमाने में हाट थोडे ही जमती है, लाखों मठ हैं और उनके लाखों ही पैर पुजाने वाले महन्त हैं, उनमें वह चैतन्यता कहाँ। साँप निकल गया, पीछे से लकीर को पीटते रहो। इससे क्या? इस प्रकार अड़तालीस वर्षों तक इस धराधाम पर प्रेमरूपी अमृत की वर्षा करने के पश्चात महाप्रभु अपने सत्वस्वरूप में जाकर अवस्थित हो गये। बोलो प्रेमावतार श्री चैतन्य देव की जय ! बोलो उनके सभी प्रियपार्षदों की जय ! बोलो भगवन्नाम प्रचारक श्री गौरचन्द्र की जय ! नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्। प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम्।। ‘जिनके नाम का सुमधुर संकीर्तन सर्व पापों को नाश करने वाला है और जिनको प्रणाम करना सकल दु:खों को नाश करने वाला है उन सर्वोत्तम श्रीहरि के पादपद्मों में मैं प्रणाम करता हूँ।’ श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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varsha gupta May 5, 2021

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