जय श्री कृष्ण,जय श्री राधे राधे, शुभ रात्रि जी,श्री कृष्ण जी का बहुत मधुर भजन वंदना,

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*जय श्री राधे राधे जी,
*जय श्री कृष्ण जी की,
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*कर्म और ईश्वर*
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"कर्म प्रधान विश्व रचि राखा" और "होइहि सोइ जो राम रचि राखा"

👉दोनों सिद्धान्तों में कोई अंतर नहीं है ! साधारण भाषा मे लोगों को समझाने के लिए...

जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा॥

काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं॥

भावार्थ:-जन्म-मरण, सुख-दुःख के भोग, हानि-लाभ, प्यारों का मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी! काल और कर्म के अधीन रात और दिन की तरह बरबस होते रहते हैं॥

👉 पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मों के अनुसार भगवान ने जो हमारे इस जन्म में (सुख दुख भोगाने के लिए) घटनाऐं रच दी हैं उनहें कोई नहीं रोक सकता क्योंकि प्रारब्ध का भोग अटल और अवश्यम्भावी होता है।

👉 इस लिए जो तय है वह "होइहि सोइ जो राम रचि राखा" है ! केवल भगवान और उनके अनन्य भक्त ही मन की मोज आए तो उसे बदल दें। क्योंकि भगवान के लिए कुछ भी असंभव नहीं !

👉 श्री व्‍यासजी शोक ग्रस्त अर्जुन से कहते हैं– "कुन्‍तीकुमार ! वे समस्‍त यदुवंशी देवताओं के अंश थे । वे देवाधिदेव श्रीकृष्‍ण के साथ ही यहाँ आये थे और साथ ही चले गये।

👉 उनके रहने से धर्म की मर्यादा के भंग होने का डर था; अत: भगवान श्रीकृष्‍ण ने धर्म-व्‍यवस्‍था की रक्षा के लिये उन मरते हुए यादवों की उपेक्षा कर दी ।कुरूश्रेष्‍ठ ! वृष्णि और अन्‍धकवंश के महारथी ब्राह्मणों के शाप से दग्‍ध होकर नष्‍ट हुए हैं; अत: तुम उनके लिये शोक न करों । उन महामनस्‍वी वीरों की भवितव्‍यता ही ऐसी थी।

👉 उनका प्रारब्‍ध ही वैसा बन गया था । यद्यपि भगवान श्रीकृष्‍ण उनके संकट को टाल सकते थे तथापि उन्‍होंने इसकी उपेक्षा कर दी । श्रीकृष्‍ण तो सम्‍पूर्ण चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकों की गति को पलट सकते हैं, फिर उन महामनस्‍वी वीरों को प्राप्‍त हुए शाप को पलट देना उनके लिये कौन बड़ी बात थी ।" (मौसल पर्व: अष्‍टम अध्याय: श्लोक 20-27)

👉 हमारे कर्मों के अनुसार जो कुछ राम ने रच रखा है, वो होगा ही । जो करके आये हो वह तो भुगतना ही पडेगा क्योंकि "जो जस करइ सो तस फल चाखा"। इसका यह अर्थ नहीं की प्रारब्ध पर ही निर्भर रहकर कुछ किया ही ना जाए। बलकि आगे आने वाली समस्या से लडने के लिए बल को इकट्ठा किया जाय क्योंकि "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा"।

👉भीष्म पितामाह महाभारत के शांति पर्व में युधिष्टर से कहते हैं "बेटा युधिष्ठिर! तुम सदा पुरूषार्थ के लिये प्रयत्नशील रहना। पुरूषार्थ के बिना केवल प्रारब्ध तुम्हारा प्रयोजन नहीं सिद्ध कर सकता। यद्यपि कार्य की सिद्धी में प्रारब्ध और पुरूषार्थ - ये दोनों साधारण कारण माने गये है, तथापि मैं पुरूषार्थ को ही प्रधान मानता हूँ। प्रारब्ध तो पहले से ही निश्चित बताया गया है।

👉 अतः यदि आरम्भ किया हुआ कार्य पूरा न हो सके अथवा उसमें बाधा पड जाय तो इसके लिये तुम्हें अपने मन में दुःख नहीं मानना चाहिये। तुम सदा अपने आपको पुरूषार्थ में ही लगाये रखो।" (शान्ति पर्व, अध्याय 56)

👉 "देवराज इन्द्र ने उद्योग (प्रयास) से ही अमृत प्राप्त किया, उद्योग से ही असुरों का संहार किया तथा उद्योग से ही देवलोक और इहलोक में श्रेष्ठता प्राप्त की। जो उद्योग में वीर है, वह पुरूष केवल वाग्वीर (खाली बातें बनानेवाला) पुरूषों पर अपना आधिपत्य जमा लेता है।" (शान्ति पर्व, अध्याय 58)

👉 जो भक्त प्रारब्ध पर निर्भर रहते हैं वे भी भजन-ध्यानादि, परमार्थ- साधन तो करते ही हैं। अत: प्रारब्ध पर निर्भर रहने वालों को भी अपना कर्तव्य कर्म करते रहना चाहिए। हम जैसे मनुष्य बहुत ही सीमित सामर्थ्य और ज्ञान वाले हैं। आज के समय में प्रत्येक मनुष्य इस बात को एक दिन में अनेको बार दोहराता है "होइहि सोइ जो राम रचि राखा"।

👉 उसकी मान्यता अनुसार तो इस संसार में कोई भी घटना अथवा दुर्घटना भगवान ने पहले से ही तय की हुई है जबकी एसा नहीं है ।

👉 सब कुछ प्रारब्ध नहीं होता । हाँ हमारे जीवन का कुछ हिस्सा प्रारब्ध से जुड़ा अवशय होता है । मगर हम यह पता नहीं लगा सकते कि कोन सी घटना प्रारब्ध से जुड़ी हुई है और कोनसी नहीं । इस लिए हमें पुरूषार्थी ही होना चाहिए ! और प्रारब्ध भी तो हमारे पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मों से ही बनता है।

👉 क्योंकि "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करइ सो तस फल चाखा" । पुरषार्थ करने के बाद कार्य पूर्ण न होने पर इसे राम जी की इच्छा अथवा "होनी" का नाम दे देना परमातमा की शरण लेना ही है।
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कामेंट्स

*प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि का आश्रम था। एक दिन गुरुजी ने अपने शिष्यों से कहा की- शिष्यों! अब मुझे कोढ़ निकलेगा और मैं अंधा भी हो जाऊँगा, इसिलिए काशी में जाकर रहूँगा। है कोई शिष्य जो मेरे साथ रह कर सेवा करने के लिए तैयार हो ? सब चुप हो गये। उनमें संदीपनी ने कहा- गुरुदेव! मैं आपकी सेवा में रहूँगा। गुरुदेव ने कहा इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा। संदीपनी बोले इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है आपको। वेदधर्म मुनि एवं संदीपन काशी में रहने लगे । कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया । शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया । संदीपनी के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ । वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा । गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता । गुरुजी डाँटते, तमाचा मार देते... किंतु संदीपनी की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव और प्रगाढ़ होता गया।* *गुरु निष्ठा देख काशी के अधिष्ठाता देव विश्वनाथ संदीपनी के समक्ष प्रकट होकर बोले- तेरी गुरुभक्ति देख कर हम प्रसन्न हैं । कुछ भी वर माँग लो । संदीपनी गुरु से आज्ञा लेने गया और बोला भगवान शिवजी वरदान देना चाहते हैं, आप आज्ञा दें तो आपका रोग एवं अंधेपन ठीक होने का वरदान मांग लूँ ? गुरुजी ने डाँटा,बोले- मैं अच्छा हो जाऊँ और मेरी सेवा से तेरी जान छूटे यही चाहता है तु ? अरे मूर्ख ! मेरा कर्म कभी-न-कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा । संदीपनी ने भगवान शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित हो गये और गोलोकधाम पहुंच के श्रीकृष्ण से पूरा वृत्तान्त कहा। श्रीकृष्ण भी संदीपनी के पास वर देने आये। संदीपनी ने कहा- प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप मुझे यही वर दें कि गुरुसेवा में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे।* *एक दिन गुरुजी ने संदीपनी को कहा कि- मेरा अंत समय आ गया है। सभी शिष्यों से मिलने की इच्छा है । संदीपनी ने सब शिष्यों को सन्देश भेज दिया। सारे शिष्य उनके दर्शन के लिए आये। गुरुजी ने सभी शिष्यों कुछ न कुछ दिया । किसी को पंचपात्र, किसी को आचमनी , किसी को आसन किसी को माला दे दी । जब संदीपनी का आये तो सभी वस्तुएं समाप्त हो चुकी थी । गुरुजी चुप हो गए,फिर बोले कि मैं तुम्हे क्या दूँ ? तुम्हारी गुरूभक्ति के समान मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है । मैं तुम्हें यह वर देता हूँ कि- त्रिलोकी नाथ का अवतार होने वाला है, वह तुम्हारे शिष्य बनेंगे । संदीपनी के लिए इससे बड़ी भेंट और क्या होती । उन्होंने गुरूजी की अंत समय तक सेवा की। जब श्रीकृष्ण अवतार हुआ तो गुरुजी के दिए उस वरदान को फलीभूत करने के लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दूर उज्जैन में स्थित संदीपनी ऋषि के आश्रम में भ्राता बलराम जी के साथ आए और संदीपनी ऋषि के शिष्य बने... ऐसी है गुरुभक्ति की शक्ति। इसिलिए गुरुभक्ति ही सार है... राधे राधे...संगृहीत कथा*🙏🚩

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Neetu Shukla May 10, 2020

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Raju begi Rk begi May 10, 2020

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Sunita Pawar May 10, 2020

♻️♻️♻️♻️♻️♻️♻️♻️ *बनावटी मदर डे* ➖➖➖➖➖ 🔷 मदर्स डे का मतलब यह नहीं होता कि एक दिन माँ की सेवा कर ली, सेल्फी लेकर अपलोड कर दी और लाईक, कॉमेंट इकट्ठे करके लोगों में धाक जमा दी । 🔷 असली मातृ दिवस तो कभी होता ही नहीं है, वह तो सदैव रहता है । क्योंकि माँ का कर्ज तो हम कभी चुका ही नहीं सकते । इसके लिए कोई एक दिन तय करना माँ की ममता के लिए खिलवाड़ होगा । आज, सिर्फ आज जो लोग 'मदर्स डे' मना रहे हैं, शायद वे लोग बनावटी विदेशी परम्पराओं में अपनी संस्कृति को भूल गए हैं । 🔷 माँ की आँखों में खुशी है तो हर रोज मदर्स डे है और यदि आपकी वजह से माँ दुःखी है तो यह दिन सिर्फ एक 'दिखावा दिवस' है, इससे ज्यादा और कुछ नहीं । क्योंकि माँ को प्रेम करने वाले किसी 'मदर्स डे' के इंतज़ार के मोहताज नहीं होते । . . . .* ------------------------ ♻️♻️♻️♻️♻️♻️♻️♻️

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Sanjay Singh May 10, 2020

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