भगवान का भजन सौदे के लिए नहीं करना चाहिए...

भगवान का भजन सौदे के
     लिए नहीं करना चाहिए...

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भगवान का भजन सौदे के
लिए नहीं करना चाहिए...
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महाराज युधिष्ठिर ध्यानमग्न वन में बैठे हुए थे। वे मन ही मन ईश्वर को याद कर रहे थे। जब वे आसन से उठे, तो द्रौपदी ने कहा, ‘धर्मराज, आप भगवान का इतना भजन करते हैं, उनके लिए ध्यानस्थ होते हैं, फिर उनसे यह क्यों नहीं कहते हैं कि इन संकटों को दूर कर दें। आप सभी पांडव इतने बलशाली हैं। किसी भी व्यक्ति को परास्त करने की क्षमता रखते हैं, पर इतने वर्षों से आप सभी भाई वन में भटक रहे हैं।

आप सभी को कष्टपूर्वक दिन बिताने पड़ रहे हैं। कभी पत्थरों पर रात्रि व्यतीत करनी पड़ती है, तो कभी कांटों पर। कभी प्यास बुझाने के लिए पानी नहीं मिलता है, तो कभी भूख मिटाने के लिए अन्न नहीं उपलब्ध होता। फिर भगवान श्रीकृष्ण से आप क्यों नहीं कहते कि इन कष्टों का अंत कर दें?

युधिष्ठिर बोले, ‘सुनो द्रौपदी, मैं भगवान का भजन सौदे के लिए नहीं किया करता। मैं भजन इसलिए करता हूँ, क्योंकि इससे मुझे आनंद प्राप्त होता है। सामने फैली हुई उस पर्वतमाला को देखो। उसे देखते ही मन प्रफुल्लित हो जाता है। हम उससे कुछ मांगते नहीं। हम उसे इसलिए देखते हैं क्योंकि देखने मात्र से हमें प्रसन्नता मिलती है। अपने सारे कर्म हम खुद करते हैं, फिर सांसारिक सुखों के लिए ईश्वर को परेशान करने का क्या औचित्य है? मै तो मात्र अपनी प्रसन्नता के लिए भगवान का भजन करता हूं।

कथा सार :- ईश्वर का चिंतन-मनन मन की खुशी के लिए किया जाता है, न कि किसी कार्य के संपन्न होने की लालसा से। लक्ष्य पाने के संपन्न होने की लालसा से। लक्ष्य पाने के लिए कर्म स्वयं ही करना पड़ता है।
।। नारायण नारायण।।
Jai shri Krishna

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Soni Mishra Apr 22, 2021

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Anita Sharma Apr 22, 2021

. दक्षिण में वेंकटाचल ( तिरुपति बालाजी ) के समीप कूर्मग्राम में एक कुम्हार रहता था। उसका नाम था भीम। . वह भगवान का बड़ा भक्त था। साधारण लोगों की उसकी भाव-भक्ति का कुछ भी पता नहीं था। . परन्तु अन्तर्यामी वेंकटनाथ उसकी प्रत्येक सेवा बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकार करते थे। . कुम्हार और उसकी पत्नी दोनों भगवान् श्री निवास के अनन्य भक्त थे। . इन्हीं दिनों भक्तप्रवर महाराज तोण्डमान प्रतिदिन भगवान् श्रीनिवास की पूजा सुवर्णमय कमल पुष्पों से किया करते थे। . एक दिन उन्होंने देखा, भगवान के ऊपर मिट्टी के बने हुए कमल तथा तुलसी पुष्प चढ़े हुए हैं। . इससे विस्मित होकर राजा ने पूछा -भगवान् ! ये मिट्टी के कमल और तुलसी पुष्प चढ़ाकर कौन आपकी पूजा करता है ? . भगवान ने कहा.. कूर्मग्राम मे एक कुम्हार है, जो मुझ मे बड़ी भक्ति रखता है। वह अपने घर में बैठकर मेरी पूजा करता है और मैं उसकी प्रत्येक सेवा स्वीकार करता हूँ। . राजा तोण्डमान के हदय मे भगवद्भक्तों के प्रति बड़े आदर का भाव था। . वे उस भक्तशिरोमणि कुम्हार का दर्शन करने के लिये स्वयं उसके घर पर गये। . राजाको आया देख कुम्हार उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। . राजा ने कहा -भीम ! तुम अपने कुल में सबसे श्रेष्ठ हो, क्योंकि तुम्हारे हदय मे भगवान् श्रीनिवास के प्रति परम पावन अनन्य भक्ति का उदय हुआ है। . मैं तुम्हारा दर्शन करने आया हूँ। बताओ, तुम भगवान की पूजा किस प्रकार करते हो ? . कुम्हार बोला.. महाराज ! मैं क्या जानूँ के भगवान की पूजा कैसे की जाती है ? . भला, आपसे किसने कह दिया कि कुम्हार पूजा करता है ? . राजा ने कहा.. स्वयं भगवान् श्रीनिवास ने तुम्हारे पूजन की बात बतायी है। . राजाके इतना कहते ही कुम्हार की सोयी हुई स्मृति जाग उठी। . वह बोला.. महाराज ! पूर्वकाल मे भगवान् वेंकटनाथ ने मुझे वरदान दिया था कि जब तुम्हारी की हुई पूजा प्रकाशित हो जायगी.. . और जब राजा तोण्डमान तुम्हारे द्वार पर आ जायँगे तथा उनके साथ तुम्हारा वार्तालय होगा.. . उसी समय तुम्हें परमधामकी प्राप्ति होगी। . उसकी यह बात जैसे ही पूर्ण हुई, उसी समय ही आकाश से एक दिव्य विमान उतर आया। . उसके ऊपर साक्षात् भगवान् विष्णु विराजमान थे। . कुम्हार और उसकी पत्नी ने भगवान को प्रणाम करते हुए प्राण त्याग दिये तथा राजाके देखते-देखते ही वे दोनों दिव्य रुप धारण करके विमान पर जा बैठे। . विमान उन्हें लेकर परम धाम वैकुण्ठ को चला गया।

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Anita Sharma Apr 21, 2021

*रामायण को लाखों वर्ष हो गये लेकिन जनता के हृदयपटल से विलुप्त नहीं हुई, क्योंकि ‘रामायण’ में वर्णित आदर्श चरित्र विश्वसाहित्य में मिलना दुर्लभ है।* *भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो भगवान श्री राम की धर्मपत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया। परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मणजी कैसे रामजी से दूर हो जाते? माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की... परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु अपनी धर्म पत्नी उर्मिला को कैसे समझाऊंगा? क्या कहूंगा?* *यही सोच विचार करके लक्ष्मणजी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिलाजी आरती का थाल लेकर खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़िये, प्रभु श्री राम की सेवा में वन को जाइए। मैं आपको नहीं रोकूँगी। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"* *लक्ष्मणजी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिलाजी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया। वास्तव में यही पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही धर्मपत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!!* *लक्ष्मणजी चले गये, परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिलाजी ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया। वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मणजी कभी सोये नहीं, परन्तु उर्मिलाजी ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग-जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया।* *मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मणजी को शक्ति लग जाती है और श्री हनुमानजी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरतजी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमानजी गिर जाते हैं। तब हनुमानजी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि माता सीताजी को रावण ले गया, लक्ष्मण जी मूर्छित हैं।* *यह सुनते ही कौशल्याजी कहती हैं कि श्री राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे। माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है। मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं। माताओं का प्रेम देखकर श्री हनुमानजी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिलाजी को देखा तो सोचने लगे कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं??* *हनुमानजी पूछते हैं- हे देवी, आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। उर्मिलाजी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा।* *उर्मिला बोलीं- "मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता। आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर राम की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गये हैं, तब से सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जायेंगे। और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो रामजी को लगी है। मेरे पतिदेव की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम-रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद-बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में सिर्फ राम ही हैं, तो शक्ति रामजी को ही लगी, दर्द रामजी को ही हो रहा है। इसलिये हनुमानजी आप निश्चिन्त होके जाएँ। सूर्य उदित नहीं होगा।"* *रामायण का दूसरा प्रसंग* ~~~~~~~~~~~~~~~ *भरतजी नंदिग्राम में रहते हैं, शत्रुघ्नजी उनके आदेश से राज्य संचालन करते हैं।* *एक रात की बात है, माता कौशिल्याजी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। नींद खुल गई । पूछा कौन है?* *मालूम पड़ा श्रुतिकीर्तिजी हैं। नीचे बुलाया गया।* *श्रुतिकीर्तिजी, जो सबसे छोटी हैं, आकर चरणों में प्रणाम कर खड़ी हो गईं।* *माता कौशिल्याजी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बिटिया? क्या नींद नहीं आ रही?* *शत्रुघ्न कहाँ है?* *श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, गोद में सिमट गईं; बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए।* *उफ ! कौशल्याजी का हृदय काँप गया।* *तुरंत आवाज लगी, सेवक दौड़े आए। आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्नजी की खोज होगी, माँ चली।* *आपको मालूम है, शत्रुघ्न जी कहाँ मिले?* *अयोध्याजी के जिस दरवाजे के बाहर भरतजी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले।* *माँ सिराहने बैठ गईं, बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी ने आँखें खोलीं, माँ ! उठे, चरणों में गिरे। माँ ! आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुलवा लिया होता।* *माँ ने कहा, शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?* *शत्रुघ्नजी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया श्री रामजी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, भैया लक्ष्मणजी उनके पीछे चले गए, भैया भरतजी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं?* *माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं।* *देखो यह रामकथा है।* ~~~~~~~~~~~~~~ *यह भोग की नहीं त्याग की कथा है, यहाँ त्याग की प्रतियोगिता चल रही है और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा!* *चारों भाइयों का प्रेम और त्याग एक-दूसरे के प्रति अद्भुत, अभिनव और अलौकिक है।* *रामायण जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती है।* *भगवान श्रीराम के वनवास का मुख्य कारण - मंथरा के लिए भी श्रीराम के हृदय में विशाल प्रेम है। रामायण का कोई भी पात्र तुच्छ नहीं है, हेय नहीं है। श्रीराम की दृष्टि में तो रीछ और बंदर भी तुच्छ नहीं हैं। जामवंत, हनुमान, सुग्रीव, अंगदादि सेवक भी उन्हें उतने ही प्रिय हैं जितने भरत, शत्रुघ्न, लखन और माँ सीता। माँ कौशल्या, कैकयी एवं सुमित्रा जितनी प्रिय हैं, उतनी ही शबरी श्रीराम को प्यारी लगती हैं।

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सोना एक दैन‍िक द‍िनचर्या है लेक‍िन क्‍या आप जानते हैं वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार अगर गलत द‍िशा में स‍िर रखकर सोएं तो यह आपके ल‍िए प्रॉब्‍लम बढ़ा सकता है। जी हां इससे ड‍िप्रेशन, अन‍िद्रा, उन्‍नत‍ि में रुकावटें, दांपत्‍य सुख में कमी, बुरे सपने और भारी धन हान‍ि की समस्‍या होती है। लेक‍िन सही द‍िशा में स‍िर रखकर सोने से लाइफ की सारी टेंशन खत्‍म हो जाती है और भगवान कुबेर के आशीर्वाद से धन वर्षा भी होती है। तो आइए जानते हैं कि किस दिशा में सिर रखकर सोना द‍िलाता है कुबरे का आशीर्वाद और बुरे सपनों से न‍िजात… तब नहीं आएंगे बुरे सपने, रखें ख्‍याल वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार उतर दिशा में सिर करके सोने से बुरे सपने आते है। इस दिशा में सिर रखकर सोने से ब्लड प्रेशर भी बढ़ता है और मन भी काबू में नहीं रहता है। वहीं जब आपका सिर उतर दिशा में और दक्षिण दिशा में होता है तो बुरे सपने ज्यादा आते है क्योंकि यह शवों को रखने की दिशा है और यमलोक की दिशा है। इसल‍िए इस द‍िशा में भूलकर भी नहीं सोना चाह‍िए। इस द‍िशा में तो कतई न सोएं, बहुत अशुभ वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार कभी भी पश्चिम दिशा में सिर रखके नहीं सोना चाहिए। क्योंकि अगर इस दिशा में सिर रखकर सोने से पैर पूर्व दिशा में होते हैं। ध्‍यान रखें पूर्व दिशा देवी-देवताओं की दिशा है। इस दिशा में सोना अशुभ माना जाता है। इस दिशा में सोने से बुरे सपने तो आते ही है और मन में भी बैचेनी रहती है। इस द‍िशा में सोने से म‍िलता है यह लाभ शास्‍त्रों के अनुसार जो व्यक्ति पूर्व दिशा में सोता है वह बुद्धिमान और ज्ञानी होता है। वह ज‍िस कार्यक्षेत्र में कार्यरत होता है वहां उसे सफलता म‍िलती है और वह धन प्राप्ति में भी सफल होता है। इसल‍िए इस द‍िशा में सोने को शुभ बताया गया है। जय श्री महाकाली जय श्री महाकाल जी ॐ नमो नारायण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री राम जय श्री कृष्ण राधे राधे नमस्कार 🙏 शुभ रात्री वंदन 👣 🌹 👏 🌿 🚩 🐚

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Garima Gahlot Rajput Apr 20, 2021

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Neeraj Dongre Apr 21, 2021

शुभ दोपहर माय मंदिर। 🙏🙏🙏 ॐ राम रामाय नमः ॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमः ⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️

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