🎎💐🙏शुभ महाशिवरात्रि🙏💐🎎 🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞 🔱🌿🛕ॐ नमः शिवाय 🛕🌿🔱 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 💐🛕ॐश्री विष्णु देवाय नमः🛕💐🚩 ☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️ 🌺🌿🌻सुप्रभात🌻🌿🌺 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻 🎎🌼🥗 शुभ गुरुवार 🌼🥗🎎 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ 🙏🌹 हर हर महादेव 🌹🙏 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉 👏सनातन धर्म में आस्था रखने वाले सभी भाई बहनों को महाशिवरात्रि पर्व और शुभगुरुवार की ढेर सारी बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं🙏 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 🎎आप सभी पर श्री हरि विष्णु जी,और बाबा भोलेनाथ जी की कृपा दृष्टी हमेशा बनी रहे🙏 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🥀आपका शिवरात्रि का दिन शुभ शांतिमय, शिवमय, विष्णुमय और मंगलमय व्यतीत हो💐 🚩🛕ॐ विष्णु देवाय नमः🛕🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑

🎎💐🙏शुभ महाशिवरात्रि🙏💐🎎
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🔱🌿🛕ॐ नमः शिवाय 🛕🌿🔱
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💐🛕ॐश्री विष्णु देवाय नमः🛕💐🚩
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🌺🌿🌻सुप्रभात🌻🌿🌺
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🎎🌼🥗 शुभ गुरुवार 🌼🥗🎎
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     🙏🌹 हर हर महादेव 🌹🙏
    🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
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👏सनातन धर्म में आस्था रखने वाले सभी भाई बहनों को  महाशिवरात्रि पर्व और शुभगुरुवार की ढेर सारी बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं🙏
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🎎आप सभी पर श्री हरि विष्णु जी,और बाबा भोलेनाथ जी की कृपा दृष्टी हमेशा बनी रहे🙏
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🥀आपका शिवरात्रि का दिन शुभ शांतिमय,
शिवमय, विष्णुमय और मंगलमय व्यतीत हो💐
      🚩🛕ॐ विष्णु देवाय नमः🛕🚩
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कामेंट्स

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@sonupathk 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@devbhumidwaka 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@नरेशश्रीहरि 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@vinaysingh21 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@pkg172 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@purav 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@अरुणकुमारसिंह5 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@pinudhiman 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@मिश्राजीऐ 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@vijaysingh24 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@घनश्यामबंसल 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@subhaderbansalgmailcom 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@कृष्णाकृष्णाजगमगहुआरेअँगना 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन भाई🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@शान्तिपाठक 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@mamtachauhan3 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन दीदी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@alkadevgan 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@krishnamishra 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Mar 12, 2021
@krishnamishra 🚩🛕 जय माता दी🛕🚩 🙏शुभसंध्या वंदन जी🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 🥀आपका संध्या शुभ और मंगलमय व्यतीत हो💐

जितेंद्र बामनिया Mar 13, 2021
🙏🚩 जय भोलेनाथ जी, शुभ सुप्रभात आदरणीय भाई जी, आपका हर दिन शुभ हो जी सादर प्रणाम 🙏

dhruv wadhwani Mar 14, 2021
ओम नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः ओम नमः शिवाय

Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 183*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 24 (अन्तिम)*🙏🌸 *इस अध्याय में भगवान के मत्स्यावतार की कथा..... *राजा परीक्षित ने पूछा- 'भगवान के कर्म बड़े अद्भुत हैं। उन्होंने एक बार अपनी योगमाया से मत्स्यावतार धारण करके बड़ी सुन्दर लीला की थी, मैं उनके उसी आदि-अवतार की कथा सुनना चाहता हूँ। भगवन्! मत्स्ययोनि एक तो यों ही लोकनिन्दित है, दूसरे तमोगुणी और असह्य परतन्त्रता से युक्त भी है। सर्वशक्तिमान् होने पर भी भगवान ने कर्मबन्धन में बँधे हुए जीव की तरह यह मत्स्य का रूप क्यों धारण किया? भगवन्! महात्माओं के कीर्तनीय भगवान का चरित्र समस्त प्राणियों को सुख देने वाला है। आप कृपा करके उनकी वह सब लीला हमारे सामने पूर्ण रूप से वर्णन कीजिये।' *सूत जी कहते हैं- शौनकादि ऋषियों! जब राजा परीक्षित ने भगवान श्रीशुकदेव जी से यह प्रश्न किया, तब उन्होंने विष्णु भगवान का वह चरित्र जो उन्होंने मत्स्यावतार धारण करके किया था, वर्णन किया। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! यों तो भगवान सबके एकमात्र प्रभु हैं; फिर भी वे गौ, ब्राह्मण, देवता, साधु, वेद, धर्म और अर्थ की रक्षा के लिये शरीर धारण किया करते हैं। वे सर्वशक्तिमान प्रभु वायु की तरह नीचे-ऊँचे, छोटे-बड़े सभी प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से लीला करते रहते हैं। परन्तु उन-उन प्राणियों के बुद्धिगत गुणों से वे छोटे-बड़े या ऊँचे-नीचे नहीं हो जाते। क्योंकि वे वास्तव में समस्त प्राकृत गुणों से रहित-निर्गुण हैं। परीक्षित! पिछले कल्प के अन्त में ब्रह्मा जी के सो जाने के कारण ब्राह्म नामक नैमित्तिक प्रलय हुआ था। उस समय भूर्लोक आदि सारे लोक समुद्र में डूब गये थे। प्रलयकाल आ जाने के कारण ब्रह्मा जी को नींद आ रही थी, वे सोना चाहते थे। उसी समय वेद उनके मुख से निकल पड़े और उनसे पास ही रहने वाले हयग्रीव नामक बली दैत्य ने उन्हें योगबल से चुरा लिया। सर्वशक्तिमान् भगवान श्रीहरि ने दानवराज हयग्रीव की यह चेष्टा जान ली। इसलिये उन्होंने मत्स्यावतार ग्रहण किया। *परीक्षित! उस समय सत्यव्रत नाम के एक बड़े उदार एवं भगवत्परायण राजर्षि केवल जल पीकर तपस्या कर रहे थे। वही सत्यव्रत वर्तमान महाकल्प में विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुए और उन्हें भगवान ने वैवस्वत मनु बना दिया। एक दिन वे राजर्षि कृतमाला नदी में जल से तर्पण कर रहे थे। उसी समय उनकी अंजलि के जल में एक छोटी-सी मछली आ गयी। परीक्षित! द्रविड़ देश के राजा सत्यव्रत ने अपनी अंजलि में आयी हुई मछली को जल के साथ ही फिर से नदी में डाल दिया। उस मछली ने बड़ी करुणा के साथ परमदयालु राजा सत्यव्रत से कहा- ‘राजन! आप बड़े दीन दयालु हैं। आप जानते ही हैं कि जल में रहने वाले जन्तु अपनी जाति वालों को भी खा डालते है। मैं उनके भय से अत्यन्त व्याकुल हो रही हूँ। आप मुझे फिर इसी नदी के जल में क्यों छोड़ रहे हैं?' *राजा सत्यव्रत को इस बात का पता नहीं था कि स्वयं भगवान मुझ पर प्रसन्न होकर कृपा करने के लिये मछली के रूप में पधारे हैं। इसलिये उन्होंने उस मछली की रक्षा का मन-ही-मन संकल्प किया। राजा सत्यव्रत ने उस मछली की अत्यन्त दीनता से भरी बात सुनकर बड़ी दया से उसे अपने पात्र के जल में रख दिया और अपने आश्रम पर ले आये। *आश्रम पर लाने के बाद एक रात में ही वह मछली उस कमण्डलु में इतनी बढ़ गयी कि उसमें उसके लिये स्थान ही न रहा। उस समय मछली ने राजा से कहा- ‘अब तो इस कमण्डलु में मैं कष्टपूर्वक भी नहीं रह सकती; अतः मेरे लिये कोई बड़ा-सा स्थान नियत कर दें, जहाँ मैं सुखपूर्वक रह सकूँ’। *राजा सत्यव्रत ने मछली को कमण्डलु से निकालकर एक बहुत बड़े पानी के मटके में रख दिया। परन्तु वहाँ डालने पर वह मछली दो ही घड़ी में तीन हाथ बढ़ गयी। फिर उसने राजा सत्यव्रत से कहा- ‘राजन! अब यह मटका भी मेरे लिये पर्याप्त नहीं है। इसमें मैं सुखपूर्वक नहीं रह सकती। मैं तुम्हारी शरण में हूँ, इसलिये मेरे रहने योग्य कोई बड़ा-सा स्थान मुझे दो।' *परीक्षित! सत्यव्रत ने वहाँ से उस मछली को उठाकर एक सरोवर में डाल दिया। परन्तु वह थोड़ी ही देर में इतनी बढ़ गयी कि उसने एक महामत्स्य का आकार धारण कर उस सरोवर के जल को घेर लिया और कहा- ‘राजन! मैं जलचर प्राणी हूँ। इस सरोवर का जल भी मेरे सुखपूर्वक रहने के लिये पर्याप्त नहीं है। इसलिये आप मेरी रक्षा कीजिये और मुझे किसी अगाध सरोवर में रख दीजिये। मत्स्य भगवान के इस प्रकार कहने पर वे एक-एक करके उन्हें कई अटूट जल वाले सरोवरों में ले गये; परन्तु जितना बड़ा सरोवर होता, उतने ही बड़े वे बन जाते। अन्त में उन्होंने उस लीला मत्स्य को समुद्र में छोड़ दिया। *समुद्र में डालते समय मत्स्य भगवान ने सत्यव्रत से कहा- ‘वीर! समुद्र में बड़े-बड़े बली मगर आदि रहते हैं, वे मुझे खा जायेंगे, इसलिये आप मुझे समुद्र के जल में मत छोड़िये’। *मत्स्य भगवान की यह मधुर वाणी सुनकर राजा सत्यव्रत मोहमुग्ध हो गये। उन्होंने कहा- ‘मत्स्य का रूप धारण करके मुझे मोहित करने वाले आप कौन हैं? आपने एक ही दिन में चार सौ कोस के विस्तार का सरोवर घेर लिया। आज तक ऐसी शक्ति रखने वाला जलचर जीव तो न मैंने कभी देखा था और न सुना ही था। अवश्य ही आप साक्षात् सर्वशक्तिमान सर्वान्तर्यामी अविनाशी श्रीहरि हैं। जीवों पर अनुग्रह करने के लिये ही आपने जलचर का रूप धारण किया है। *पुरुषोत्तम! आप जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के स्वामी हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। प्रभो! हम शरणागत भक्तों के लिये आप ही आत्मा और आश्रय हैं। यद्यपि आपके सभी लीलावतार प्राणियों के अभ्युदय के लिये ही होते हैं, तथापि मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपने यह रूप किस उद्देश्य से ग्रहण किया है। कमलनयन प्रभो! जैसे देहादि अनात्म पदार्थों में अपनेपन का अभिमान करने वाले संसारी पुरुषों का आश्रय व्यर्थ होता है, उस प्रकार आपके चरणों की शरण तो व्यर्थ हो नहीं सकती; क्योंकि आप सबके अहैतुक प्रेमी, परम प्रियतम और आत्मा हैं। आपने इस समय जो रूप धारण करके हमें दर्शन दिया है, यह बड़ा ही अद्भुत है।' *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! भगवान अपने अनन्य प्रेमी भक्तों पर अत्यन्त प्रेम करते हैं। जब जगत्पति मत्स्य भगवान ने अपने प्यारे भक्त राजर्षि सत्यव्रत की यह प्रार्थना सुनी तो उनका प्रिय और हित करने के लिये, साथ ही कल्पान्त के प्रलयकालीन समुद्र में विहार करने के लिये उनसे कहा। *श्रीभगवान ने कहा- 'सत्यव्रत! आज से सातवें दिन भूर्लोक आदि तीनों लोक प्रलय के समुद्र में डूब जायेंगे। उस समय जब तीनों लोक प्रलयकाल की जलराशि में डूबने लगेंगे, तब मेरी प्रेरणा से तुम्हारे पास एक बहुत बड़ी नौका आयेगी। उस समय तुम समस्त प्राणियों एक सूक्ष्म शरीरों को लेकर सप्तर्षियों के साथ उस नौका पर चढ़ जाना और समस्त धान्य तथा छोटे-बड़े अन्य प्रकार के बीजों को साथ रख लेना। उस समय सब ओर एकमात्र महासागर लहराता होगा। प्रकाश नहीं होगा। केवल ऋषियों की दिव्य ज्योति के सहारे ही बिना किसी प्रकार की विकलता के तुम उस बड़ी नाव पर चढ़कर चारों ओर विचरण करना। जब प्रचण्ड आँधी चलने के कारण नाव डगमगाने लगेगी, तब मैं इसी रूप में वहाँ आ जाऊँगा और तुम लोग वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बाँध देना। *सत्यव्रत! इसके बाद जब तक ब्रह्मा जी की रात रहेगी, तब तक मैं ऋषियों के साथ तुम्हें उस नाव में बैठाकर उसे खींचता हुआ समुद्र में विचरण करूँगा। उस समय जब तुम प्रश्न करोगे, तब मैं तुम्हें उपदेश दूँगा। मेरे अनुग्रह से मेरी वास्तविक महिमा, जिसका नाम ‘परब्रह्म’ है, तुम्हारे हृदय में प्रकट हो जायेगी और तुम उसे ठीक-ठीक जान लोगे।' *भगवान राजा सत्यव्रत को यह आदेश देकर अन्तर्धान हो गये। अतः अब राजा सत्यव्रत उसी समय की प्रतीक्षा करने लगे, जिसके लिये भगवान ने आज्ञा दी थी। कुशों का अग्रभाग पूर्व की ओर करके राजर्षि सत्यव्रत उन पर पूर्वोत्तर मुख से बैठ गये और मत्स्यरूप भगवान के चरणों का चिन्तन करने लगे। इतने में ही भगवान का बताया हुआ वह समय आ पहुँचा। राजा ने देखा कि समुद्र अपनी मर्यादा छोड़कर बढ़ रहा है। प्रलयकाल के भयंकर मेघ वर्षा करने लगे। देखते-ही-देखते सारी पृथ्वी डूबने लगी। तब राजा ने भगवान की आज्ञा का स्मरण किया और देखा कि नाव भी आ गयी है। तब वे धान्य तथा अन्य बीजों को लेकर सप्तर्षियों को लेकर उस पर सवार हो गये। *सप्तर्षियों ने बड़े प्रेम से राजा सत्यव्रत से कहा- ‘राजन! तुम भगवान का ध्यान करो। वे ही हमें इस संकट से बचायेंगे और हमारा कल्याण करेंगे’। उनकी आज्ञा से राजा ने भगवान का ध्यान किया। उसी समय उस महान् समुद्र में मत्स्य के रूप में भगवान प्रकट हुए। मत्स्य भगवान का शरीर सोने के समान देदीप्यमान था और शरीर का विस्तार था चार लाख कोस। उनके शरीर में एक बड़ा भारी सींग भी था। भगवान ने पहले जैसी आज्ञा दी थी, उसके अनुसार वह नौका वासुकि नाग के द्वारा भगवान के सींग में बाँध दी गयी और राजा सत्यव्रत ने प्रसन्न होकर भगवान की स्तुति की। *राजा सत्यव्रत ने कहा- 'प्रभो! संसार के जीवों का आत्मज्ञान अनादि अविद्या से ढक गया है। इसी कारण वे संसार के अनेकानेक क्लेशों के भार से पीड़ित हो रहे हैं। जब अनायास ही आपके अनुग्रह से वे आपकी शरण में पहुँच जाते हैं, तब आपको प्राप्त कर लेते हैं। इसलिये हमें बन्धन से छुड़ाकर वास्तविक मुक्ति देने वाले परमगुरु आप ही हैं। यह जीव अज्ञानी है, अपने ही कर्मों से बँधा हुआ है। वह सुख की इच्छा से दुःखप्रद कर्मों का अनुष्ठान करता है। जिनकी सेवा से उसका यह अज्ञान नष्ट हो जाता है, वे ही मेरे परमगुरु आप मेरे हृदय की गाँठ काट दें। जैसे अग्नि में तपाने से सोने-चाँदी के मल दूर हो जाते हैं और उनका सच्चा स्वरूप निखर आता है, वैसे ही आपकी सेवा से जीव अपने अन्तःकरण का अज्ञानरूप मल त्याग देता है और अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है। आप सर्वशक्तिमान् अविनाशी प्रभु ही हमारे गुरुजनों के भी परमगुरु हैं। अतः आप ही हमारे भी गुरु बनें। *वे सब यदि स्वतन्त्र रूप से एक साथ मिलकर भी कृपा करें, तो आपकी कृपा के दस हजारवें अंश के अंश की भी बराबरी नहीं कर सकते। प्रभो! आप ही सर्वशक्तिमान हैं। मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। जैसे कोई अंधा अंधे को ही अपना पथ प्रदर्शक बना ले, वैसे ही अज्ञानी जीव अज्ञानी को ही अपना गुरु बनाते हैं। आप सूर्य के समान स्वयं प्रकाश और समस्त इन्द्रियों के प्रेरक हैं। हम आत्मतत्त्व के जिज्ञासु आपको ही गुरुरूप में वरण करते हैं। अज्ञानी मनुष्य अज्ञानियों को जिस ज्ञान का उपदेश करता है, वह तो अज्ञान ही है। उसके द्वारा संसाररूप घोर अन्धकार की अधिकाधिक प्राप्ति होती है। परन्तु आप तो उस अविनाशी और अमोघ ज्ञान का उपदेश करते हैं, जिससे मनुष्य अनायास ही अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। *आप सारे लोक के सुहृद्, प्रियतम, ईश्वर और आत्मा हैं। गुरु, उसके द्वारा प्राप्त होने वाला ज्ञान और अभीष्ट की सिद्धि भी आपका ही स्वरूप है। फिर भी कामनाओं के बन्धन में जकड़े जाकर लोग अंधे हो रहे हैं। उन्हें इस बात का पता ही नहीं है कि आप उनके हृदय में ही विराजमान हैं। आप देवताओं के भी आराध्यदेव, परमपूजनीय परमेश्वर हैं। मैं आपसे ज्ञान प्राप्त करने के लिये आपकी शरण में आया हूँ। भगवन्! आप परमार्थ को प्रकाशित करने वाली अपनी वाणी के द्वारा मेरे हृदय की ग्रन्थि काट डालिये और अपने स्वरूप को प्रकाशित कीजिये।' *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! जब राजा सत्यव्रत ने इस प्रकार प्रार्थना की; तब मत्स्य रूपधारी पुरुषोत्तम भगवान ने प्रलय के समुद्र में विहार करते हुए उन्हें आत्मतत्त्व का उपदेश किया। *भगवान ने राजर्षि सत्यव्रत को अपने स्वरूप के सम्पूर्ण रहस्य का वर्णन करते हुए ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग से परिपूर्ण दिव्य पुराण का उपदेश किया, जिसको ‘मत्स्यपुराण’ कहते हैं। *सत्यव्रत ने ऋषियों के साथ नाव में बैठे हुए ही सन्देहरहित होकर भगवान के द्वारा उपदिष्ट सनातन ब्रह्मस्वरूप आत्मतत्त्व का श्रवण किया। इसके बाद जब पिछले प्रलय का अन्त हो गया और ब्रह्मा जी की नींद टूटी, तब भगवान ने हयग्रीव असुर को मारकर उससे वेद छीन लिये और ब्रह्मा जी को दे दिये। भगवान की कृपा से राजा सत्यव्रत ज्ञान और विज्ञान से संयुक्त होकर इस कल्प में वैवस्वत मनु हुए। अपनी योगमाया से मत्स्यरूप धारण करने वाले भगवान विष्णु और राजर्षि सत्यव्रत का यह संवाद एवं श्रेष्ठ आख्यान सुनकर मनुष्य सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। *जो मनुष्य भगवान के इस अवतार का प्रतिदिन कीर्तन करता है, उसके सारे संकल्प सिद्ध हो जाते हैं और उसे परमगति की प्राप्ति होती है। प्रलयकालीन समुद्र में जब ब्रह्मा जी सो गये थे, उनकी सृष्टिशक्ति लुप्त हो चुकी थी, उस समय उनके मुख से निकली हुई श्रुतियों को चुराकर हयग्रीव दैत्य पाताल में ले गया था। भगवान ने उसे मारकर वे श्रुतियाँ ब्रह्मा जी को लौटा दीं एवं सत्यव्रत तथा सप्तर्षियों को ब्रह्मतत्त्व का उपदेश किया। उस समस्त जगत के परमकारण लीला मत्स्य भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 182*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 23*🙏🌸 *इस अध्याय में बलि का बन्धन से छूटकर सुतल लोक को जाना..…. *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- जब सनातन पुरुष भगवान ने इस प्रकार कहा, तो साधुओं के आदरणीय महानुभाव दैत्यराज के नेत्रों में आँसू छलक आये। प्रेम के उद्रेक से उनका गला भर आया। वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणी से भगवान से कहने लगे। *बलि ने कहा- 'प्रभो! मैंने तो आपको पूरा प्रणाम भी नहीं किया, केवल प्रणाम करने मात्र की चेष्टा भर की। उसी से मुझे वह फल मिला, जो आपके चरणों के शरणागत भक्तों को प्राप्त होता है। बड़े-बड़े लोकपाल और देवताओं पर आपने जो कृपा कभी नहीं की, वह मुझ-जैसे नीच असुर को सहज ही प्राप्त हो गयी।' *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! यों कहते ही बलि वरुण के पाशों से मुक्त हो गये। तब उन्होंने भगवान, ब्रह्मा जी और शंकर जी को प्रणाम किया और इसके बाद बड़ी प्रसन्नता से असुरों के साथ सुतल लोक की यात्रा की। इस प्रकार भगवान ने बलि से स्वर्ग का राज्य लेकर इन्द्र को दे दिया, अदिति की कामना पूर्ण की और स्वयं उपेन्द्र बनकर वे सारे जगत् का शासन करने लगे। जब प्रह्लाद ने देखा कि मेरे वंशधर पौत्र राजा बलि बन्धन से छूट गये और उन्हें भगवान का कृपा-प्रसाद प्राप्त हो गया तो वे भक्ति-भाव से भर गये। उस समय उन्होंने भगवान की इस प्रकार स्तुति की। *प्रह्लाद जी ने कहा- 'प्रभो! यह कृपाप्रसाद तो कभी ब्रह्मा जी, लक्ष्मी जी और शंकर जी को भी नहीं प्राप्त हुआ, तब दूसरों की तो बात ही क्या है। अहो! विश्ववन्द्य ब्रह्मा आदि भी जिनके चरणों की वन्दना करते रहते हैं, वही आप हम असुरों के दुर्गपाल-किलेदार हो गये। शरणागतवत्सल प्रभो! ब्रह्मा आदि लोकपाल आपके चरणकमलों का मकरन्द-रस सेवन करने के कारण सृष्टि रचना की शक्ति आदि अनेक विभूतियाँ प्राप्त करते हैं। हम लोग तो जन्म से ही खल और कुमार्गगामी हैं, हम पर आपकी ऐसी अनुग्रहपूर्ण दृष्टि कैसे हो गयी, जो आप हमारे द्वारपाल ही बन गये। आपने अपनी योगमाया से खेल-ही-खेल में त्रिभुवन की रचना कर दी। आप सर्वज्ञ, सर्वात्मा और समदर्शी हैं। फिर भी आपकी लीलाएँ बड़ी विलक्षण जान पड़ती हैं। आपका स्वभाव कल्प-वृक्ष के समान है; क्योंकि आप अपने भक्तों से अत्यन्त प्रेम करते हैं। इसी से कभी-कभी उपासकों के प्रति पक्षपात और विमुखों के प्रति निर्दयता भी आपमें देखी जाती है।' *श्रीभगवान ने कहा- 'बेटा प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम भी सुतल लोक में जाओ। वहाँ अपने पौत्र बलि के साथ आनन्दपूर्वक रहो और जाति-बन्धुओं को सुखी करो। वहाँ तुम मुझे नित्य ही गदा हाथ में लिये खड़ा देखोगे। मेरे दर्शन के परमानन्द में मग्न रहने के कारण तुम्हारे सारे कर्मबन्धन नष्ट हो जायेंगे।' *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! समस्त दैत्य सेना के स्वामी विशुद्ध बुद्धि प्रह्लाद जी ने ‘जो आज्ञा’ कहकर, हाथ जोड़, भगवान का आदेश मस्तक पर चढ़ाया। फिर उन्होंने बलि के साथ आदिपुरुष भगवान की परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और उनसे अनुमति लेकर सुतल लोक की यात्रा की। *परीक्षित! उस समय भगवान श्रीहरि ने ब्रह्मवादी ऋत्विजों की सभा में अपने पास ही बैठे हुए शुक्राचार्य जी से कहा- ‘ब्रह्मन्! आपका शिष्य यज्ञ कर रहा था। उसमें जो त्रुटि रह गयी है, उसे आप पूर्ण कर दीजिये। क्योंकि कर्म करने में जो कुछ भूल-चूक हो जाती है, वह ब्राह्मणों की कृपा-दृष्टि से सुधर जाती है’। *शुक्राचार्य जी ने कहा- 'भगवन! जिसने अपना समस्त कर्म समर्पित करके सब प्रकार से यज्ञेश्वर यज्ञपुरुष आपकी पूजा की है-उसके कर्म में कोई त्रुटि, कोई विषमता कैसे रह सकती है? क्योंकि मन्त्रों की, अनुष्ठान-पद्धति की, देश, काल, पात्र और वस्तु की सारी भूलें आपके नाम संकीर्तन मात्र से सुधर जाती है; आपका नाम सारी त्रुटियों को पूर्ण कर देता है। तथापि अनन्त! जब आप स्वयं कह रहे हैं, तब मैं आपकी आज्ञा का अवश्य पालन करूँगा। मनुष्य के लिये सबसे बड़ा कल्याण का साधन यही है कि वह आपकी आज्ञा का पालन करे।' *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- भगवान शुक्राचार्य ने भगवान श्रीहरि की यह आज्ञा स्वीकार करके दूसरे ब्रह्मर्षियों के साथ, बलि के यज्ञ में जो कमी रह गयी थी, उसे पूर्ण किया। *परीक्षित! इस प्रकार वामन भगवान ने बलि से पृथ्वी की भिक्षा माँगकर अपने बड़े भाई इन्द्र को स्वर्ग का राज्य दिया, जिसे उनके शत्रुओं ने छीन लिया था। इसके बाद प्रजापतियों के स्वामी ब्रह्मा जी ने देवर्षि, पितर, मनु, दक्ष, भृगु, अंगिरा, सनत्कुमार और शंकर जी के साथ कश्यप एवं अदिति की प्रसन्नता के लिये तथा सम्पूर्ण प्राणियों के अभ्युदय के लिये समस्त लोक और लोकपालों के स्वामी के पद पर वामन भगवान का अभिषेक कर दिया। *परीक्षित! वेद, समस्त देवता, धर्म, यश, लक्ष्मी, मंगल, व्रत, स्वर्ग और अपवर्ग-सबके रक्षक के रूप में सबके परम कल्याण के लिये सर्वशक्तिमान वामन भगवान को उन्होंने उपेन्द्र का पद दिया। उस समय सभी प्राणियों को अत्यन्त आनन्द हुआ। इसके बाद ब्रह्मा जी की अनुमति से लोकपालों के साथ देवराज इन्द्र ने वामन भगवान को सबसे आगे विमान पर बैठाया और अपने साथ स्वर्ग लिवा ले गये। इन्द्र को एक तो त्रिभुवन का राज्य मिल गया और दूसरे, वामन भगवान के करकमलों की छत्रछाया। सर्वश्रेष्ठ ऐशवर्यलक्ष्मी उनकी सेवा करने लगी और वे निर्भय होकर आनन्दोत्सव मनाने लगे। ब्रह्मा, शंकर, सनत्कुमार, भृगु आदि मुनि, पितर, सारे भूत, सिद्ध और विमानारोही देवगण भगवान के इस परम अद्भुत एवं अत्यन्त महान् कर्म का गान करते हुए अपने-अपने लोक को चले गये और सबने अदिति की भी बड़ी प्रशंसा की। *परीक्षित! तुम्हें मैंने भगवान की यह सब लीला सुनायी। इससे सुनने वालों के सारे पाप छूट जाते हैं। भगवान की लीलाएँ अनन्त हैं, उनकी महिमा अपार है। जो मनुष्य उसका पार पाना चाहता है, वह मानो पृथ्वी के परमाणुओं को गिन डालना चाहता है। भगवान के सम्बन्ध में मन्त्रद्रष्टा महर्षि वसिष्ठ ने वेदों में कहा है कि ‘ऐसा पुरुष न कभी हुआ, न है और न होगा जो भगवान की महिमा का पार पा सके’। देवताओं के आराध्यदेव अद्भुत लीलाधारी वामन भगवान के अवतार चरित्र का जो श्रवण करता है, उसे परमगति की प्राप्ति होती है। देवयज्ञ, पितृयज्ञ और मनुष्य यज्ञ किसी भी कर्म का अनुष्ठान करते समय जहाँ-जहाँ भगवान की इस लीला का कीर्तन होता है, वह कर्म सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है। यह बड़े-बड़े महात्माओं का अनुभव है। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 181*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 22*🙏🌸 *इस अध्याय में बलि के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का उस पर प्रसन्न होना...... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इस प्रकार भगवान् ने असुरराज बलि का बड़ा तिरस्कार किया और उन्हें धैर्य से विचलित करना चाहा। परन्तु वे तनिक भी विचलित न हुए, बड़े धैर्य से बोले। *दैत्यराज बलि ने कहा- 'देवताओं के आराध्यदेव! आपकी कीर्ति बड़ी पवित्र है। क्या आप मेरी बात को असत्य समझते हैं? ऐसा नहीं है। मैं उसे सत्य कर दिखाता हूँ। आप धोखे में नहीं पड़ेंगे। आप कृपा करके अपना तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिये। मुझे नरक में जाने का अथवा राज्य से च्युत होने का भय नहीं है। मैं पाश में बँधने अथवा अपार दुःख में पड़ने से भी नहीं डरता। मेरे पास फूटी कौड़ी भी न रहे अथवा आप मुझे घोर दण्ड दें- यह भी मेरे भय का कारण नहीं है। मैं डरता हूँ तो केवल अपनी अपकीर्ति से। अपने पूजनीय गुरुजनों के द्वारा दिया हुआ दण्ड तो जीवमात्र के लिये अत्यन्त वाञ्छनीय है। क्योंकि वैसा दण्ड माता, पिता, भाई और सुहृद् भी मोहवश नहीं दे पाते। *आप छिपे रूप से अवश्य ही हम असुरों को श्रेष्ठ शिक्षा दिया करते हैं, अतः आप हमारे परम गुरु हैं। जब हम लोग धन, कुलीनता, बल आदि के मद से अंधे हो जाते हैं, तब आप उन वस्तुओं को हमसे छीनकर हमें नेत्रदान करते हैं। आपसे हम लोगों का उपकार होता है, उसे मैं क्या बताऊँ? अनन्य भाव से योग करने वाले योगीगण जो सिद्धि प्राप्त करते हैं, वही सिद्धि बहुत-से असुरों को आपके साथ दृढ़ वैर भाव करने से ही प्राप्त हो गयी है। जिनकी ऐसी महिमा, ऐसी अनन्त लीलाएँ हैं, वही आप मुझे दण्ड दे रहे हैं और वरुण पाश से बाँध रहे हैं। इसकी न तो मुझे कोई लज्जा है और न किसी प्रकार की व्यथा ही। *प्रभो! मेरे पितामह प्रह्लाद जी की कीर्ति सारे जगत् में प्रसिद्ध है। वे आपके भक्तों में श्रेष्ठ माने गये हैं। उनके पिता हिरण्यकशिपु ने आपसे वैर-विरोध रखने के कारण उन्हें अनेकों प्रकार के दुःख दिये। परन्तु वे आपके ही परायण रहे, उन्होंने अपना जीवन आप पर ही निछावर कर दिया। उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि शरीर को लेकर क्या करना है, जब यह एक-न-एक दिन साथ छोड़ ही देता है। जो धन-सम्पत्ति लेने के लिये स्वजन बने हुए हैं, उन डाकुओं से अपना स्वार्थ ही क्या है? पत्नी से भी क्या लाभ है, जब वह जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्र में डालने वाली ही है। जब मर ही जाना है, तब घर से मोह करने में भी क्या स्वार्थ है? इन सब वस्तुओं में उलझ जाना तो केवल मेरे पितामह प्रह्लाद जी ने, यह जानते हुए भी कि आप लौकिक दृष्टि से उनके भाई-बन्धुओं के नाश करने वाले शत्रु हैं, फिर आपके ही भयरहित एवं अविनाशी चरणकमलों की शरण ग्रहण की थी। क्यों न हो-वे संसार से परम विरक्त, अगाध बोध सम्पन्न, उदार हृदय एवं संत-शिरोमणि जो हैं। आप उस दृष्टि से मेरे भी शत्रु हैं, फिर भी विधाता ने मुझे बलात् ऐश्वर्य-लक्ष्मी से अलग करके आपके पास पहुँचा दिया है। अच्छा ही हुआ; क्योंकि ऐश्वर्य-लक्ष्मी के कारण जीव की बुद्धि जड़ हो जाती है और वह यह नहीं समझ पाता कि ‘मेरा यह जीवन मृत्यु के पंजे में पड़ा हुआ और अनित्य है’। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजा बलि इस प्रकार कह ही रहे थे कि उदय होते हुए चन्द्रमा के समान भगवान के प्रेमपात्र प्रह्लाद जी वहाँ आ पहुँचे। राजा बलि ने देखा कि मेरे पितामह बड़े श्रीसम्पन्न हैं। कमल के समान कोमल नेत्र हैं, लंबी-लंबी भुजाएँ हैं, सुन्दर ऊँचे और श्यामल शरीर पर पीताम्बर धारण किये हुए हैं। *बलि इस समय वरुण पाश में बँधे हुए थे। इसलिये प्रह्लाद जी के आने पर जैसे पहले वे उनकी पूजा किया करते थे, उस प्रकार न कर सके। उनके नेत्र आँसुओं से चंचल हो उठे, लज्जा के मारे मुँह नीचा हो गया। उन्होंने केवल सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया। प्रह्लाद जी ने देखा कि भक्तवत्सल भगवान वहीं विराजमान हैं और सुनन्द, नन्द आदि पार्षद उनकी सेवा कर रहे हैं। प्रेम के उद्रेक से प्रह्लाद जी का शरीर पुलकित हो गया, उनकी आँखों में आँसू छलक आये। वे आनन्दपूर्ण हृदय से सिर झुकाये अपने स्वामी के पास गये और पृथ्वी पर सिर रखकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। *प्रह्लाह जी ने कहा- 'प्रभो! आपने ही बलि को यह ऐश्वर्यपूर्ण इन्द्रपद दिया था, अब आज आपने ही उसे छीन लिया। आपका देना जैसा सुन्दर है, वैसा ही सुन्दर लेना भी। मैं समझता हूँ कि आपने इस पर बड़ी भारी कृपा की है, जो आत्मा को मोहित करने वाली राज्यलक्ष्मी से इसे अलग कर दिया। प्रभो! लक्ष्मी के मद से तो विद्वान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। उसके रहते भला, अपने वास्तविक स्वरूप को ठीक-ठीक कौन जान सकता है? अतः उस लक्ष्मी को छीनकर महान् उपकार करने वाले, समस्त जगत् के महान् ईश्वर, सबके हृदय में विराजमान और सबके परमसाक्षी श्रीनारायणदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।' *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! प्रह्लाद जी अंजलि बाँधकर खड़े थे। उनके सामने ही भगवान ब्रह्मा जी ने वामन भगवान से कुछ कहना चाहा। परन्तु इतने में ही राजा बलि की परमसाध्वी पत्नी विन्ध्यावली ने अपने पति को बँधा देखकर भयभीत हो भगवान के चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़, मुँह नीचा कर वह भगवान से बोली। *विन्ध्यावली ने कहा- 'प्रभो! आपने अपनी क्रीड़ा के लिये ही इस सम्पूर्ण जगत् की रचना की है। जो लोग कुबुद्धि हैं, वे ही अपने को इसका स्वामी मानते हैं। जब आप ही इसके कर्ता, भर्ता और संहर्ता हैं, तब आपकी माया से मोहित होकर अपने को झूठमूठ कर्ता मानने वाले निर्लज्ज आपको समर्पण क्या करेंगे?' "ब्रह्मा जी ने कहा- 'समस्त प्राणियों के जीवनदाता, उनके स्वामी और जगत्स्वरूप देवाधिदेव प्रभो! अब आप इसे छोड़ दीजिये। आपने इसका सर्वस्व ले लिया है, अतः अब यह दण्ड का पात्र नहीं है। इसने अपनी सारी भूमि और पुण्यकर्मों से उपार्जित स्वर्ग आदि लोक, अपना सर्वस्व तथा आत्मा तक आपको समर्पित कर दिया है एवं ऐसा करते समय इसकी बुद्धि स्थिर रही है, यह धैर्य से च्युत नहीं हुआ है। प्रभो! जो मनुष्य सच्चे हृदय से कृपणता छोड़कर आपके चरणों में जल का अर्ध्य देता है और केवल दूर्वादल से भी आपकी सच्ची पूजा करते है, उसे भी उत्तम गति की प्राप्ति होती है। फिर बलि ने तो बड़ी प्रसन्नता से धैर्य और स्थिरतापूर्वक आपको त्रिलोकी का दान कर दिया है। तब यह दुःख का भागी कैसे हो सकता है?' *श्रीभगवान ने कहा- ब्रह्मा जी! मैं जिस पर कृपा करता हूँ, उसका धन छीन लिया करता हूँ। क्योंकि जब मनुष्य धन के मद से मतवाला हो जाता है, तब मेरा और लोगों का तिरस्कार करने लगता है। यह जीव अपने कर्मों के कारण विवश होकर अनेक योनियों में भटकता रहता है, जब कभी मेरी बड़ी कृपा से मनुष्य का शरीर प्राप्त करता है। मनुष्य योनि में जन्म लेकर यदि कुलीनता, कर्म, अवस्था, रूप, विद्या, ऐश्वर्य और धन आदि के कारण घमंड न हो जाये तो समझना चाहिये कि मेरी बड़ी ही कृपा है। *कुलीनता आदि बहुत-से ऐसे कारण हैं, जो अभिमान और जड़ता आदि उत्पन्न करके मनुष्य को कल्याण के समस्त साधनों से वंचित कर देते हैं; परन्तु जो मेरे शरणागत होते हैं, वे इनसे मोहित नहीं होते। यह बलि दानव और दैत्य दोनों ही वंशों में अग्रगण्य और उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाला है। इसने उस माया पर विजय प्राप्त कर ली है, जिसे जीतना अत्यन्त कठिन है। तुम देख ही रहे हो, इतना दुःख भोगने पर भी यह मोहित नहीं हुआ। *इसका धन छीन लिया, राजपद से अलग कर दिया, तरह-तरह के आपेक्ष किये, शत्रुओं ने बाँध लिया, भाई-बन्धु छोड़कर चले गये, इतनी यातनाएँ भोगनी पड़ी-यहाँ तक कि गुरुदेव ने भी इसको डाँटा-फटकारा और शाप तक दे दिया। परन्तु इस दृढ़व्रती ने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। मैंने इससे छल भरी बातें कीं, मन में छल रखकर धर्म का उपदेश किया; परन्तु इस सत्यवादी ने अपना धर्म न छोड़ा। अतः मैंने इसे वह स्थान दिया है, जो बड़े-बड़े देवताओं को भी बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। सावर्णि मन्वन्तर में यह मेरा परम भक्त इन्द्र होगा। तब तक यह विश्वकर्मा के बनाये हुए सुतल लोक में रहे। वहाँ रहने वाले लोग मेरी कृपादृष्टि का अनुभव करते हैं। इसलिये उन्हें शारीरिक अथवा मानसिक रोग, थकावट, तन्द्रा, बाहरी या भीतरी शत्रुओं से पराजय और किसी प्रकार के विघ्नों का सामना नहीं करना पड़ता। *[बलि को सम्बोधित कर] महाराज इन्द्रसेन! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम अपने भाई-बन्धुओं के साथ उस सुतल लोक में जाओ, जिसे स्वर्ग के देवता भी चाहते रहते हैं। बड़े-बड़े लोकपाल भी अब तुम्हें पराजित नहीं कर सकेंगे, दूसरों की तो बात ही क्या है। जो दैत्य तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, मेरा चक्र उनके टुकड़े-टुकड़े कर देगा। मैं तुम्हारी, तुम्हारे अनुचरों की और भोग सामग्री की भी सब प्रकार के विघ्नों से रक्षा करूँगा। *वीर बलि! तुम मुझे वहाँ सदा-सर्वदा अपने पास ही देखोगे। दानव और दैत्यों के संसर्ग से तुम्हारा जो कुछ आसुरभाव होगा, वह मेरे प्रभाव से तुरंत दब जायेगा और नष्ट हो जायेगा। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Anmol Mishra Apr 15, 2021

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Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 176*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏"अध्याय - 17*🙏🌸 *इस अध्याय में भगवान का प्रकट होकर अदिति को वर देना.... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अपने पतिदेव महर्षि कश्यप जी का उपदेश प्राप्त करके अदिति ने बड़ी सावधानी से बारह दिन तक इस व्रत का अनुष्ठान किया। बुद्धि को सारथि बनाकर मन की लगाम से उसने इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़ों को अपने वश में कर लिया और एकनिष्ठ बुद्धि से वह पुरुषोत्तम भगवान का चिन्तन करती रही। उसने एकाग्र बुद्धि से अपने मन को सर्वात्मा भगवान वासुदेव में पूर्ण रूप से लगाकर पयोव्रत का अनुष्ठान किया। तब पुरुषोत्तम भगवान उसके सामने प्रकट हुए। *परीक्षित! वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, चार भुजाएँ थीं और शंख, चक्र, गदा लिये हुए थे। अपने नेत्रों के सामने भगवान को सहसा प्रकट हुए देख अदिति सादर उठ खड़ी हुई और फिर प्रेम से विह्वल होकर उसने पृथ्वी पर लोटकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। फिर उठकर, हाथ जोड़, भगवान की स्तुति करने की चेष्टा की; परन्तु नेत्रों में आनन्द के आँसू उमड़ आये, उससे बोला न गया। सारा शरीर पुलकित हो रहा था, दर्शन के आनन्दोल्लास से उसके अंगों में कम्प होने लगा था, वह चुपचाप खड़ी रही। *परीक्षित! देवी अदिति अपने प्रेमपूर्ण नेत्रों से लक्ष्मीपति, विश्वपति, यज्ञेश्वर-भगवान को इस प्रकार देख रही थी, मानो वह उन्हें पी जायेगी। फिर बड़े प्रेम से, गद्गद वाणी से, धीरे-धीरे उसने भगवान की स्तुति की। *अदिति ने कहा- आप यज्ञ के स्वामी हैं और स्वयं यज्ञ भी आप ही हैं। अच्युत! आपके चरणकमलों का आश्रय लेकर लोग भवसागर से तर जाते हैं। आपके यशकीर्तन का श्रवण भी संसार से तारने वाला है। आपके नामों के श्रवणमात्र से ही कल्याण हो जाता है। आदिपुरुष! जो आपकी शरण में आ जाता है, उसकी सारी विपत्तियों का आप नाश कर देते हैं। भगवन! आप दीनों के स्वामी हैं। आप हमारा कल्याण कीजिये। आप विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कारण हैं और विश्वरूप भी आप ही हैं। अनन्त होने पर भी स्वच्छन्दता से आप अनेक शक्ति और गुणों को स्वीकार कर लेते हैं। आप सदा अपने स्वरूप में ही स्थित रहते हैं। नित्य-निरन्तर बढ़ते हुए पूर्ण बोध के द्वारा आप हृदय के अन्धकार को नष्ट करते हैं। भगवन! मैं आपको नमस्कार करती हूँ। *प्रभो! अनन्त! जब आप प्रसन्न हो जाते हैं, तब मनुष्यों को ब्रह्मा जी की दीर्घ आयु, उनके ही समान दिव्य शरीर, प्रत्येक अभीष्ट वस्तु, अतुलित धन, स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल, योग की समस्त सिद्धियाँ, अर्थ-धर्म-कामरूप त्रिवर्ग और केवल ज्ञान तक प्राप्त हो जाता है। फिर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना आदि जो छोटी-छोटी कामनाएँ हैं, उनके सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! जब अदिति ने इस प्रकार कमलनयन भगवान की स्तुति की, तब समस्त प्राणियों के हृयद में उनकी गति-विधि जानने वाले भगवान ने यह बात कही। *श्रीभगवान ने कहा- देवताओं की जननी अदिति! तुम्हारी चिरकालीन अभिलाषा को मैं जानता हूँ। शत्रुओं ने तुम्हारे पुत्रों की सम्पत्ति छीन ली है, उन्हें उनके लोक (स्वर्ग) से खदेड़ दिया है। तुम चाहती हो कि युद्ध में तुम्हारे पुत्र उन मतवाले और बली असुरों को जीतकर विजय लक्ष्मी प्राप्त करें, तब तुम उनके साथ भगवान की उपासना करो। *तुम्हारी इच्छा यह भी है कि तुम्हारे इन्द्रादि पुत्र जब शत्रुओं को मार डालें, तब तुम उनकी रोती हुई दुःखी स्त्रियों को अपनी आँखों से देख सको। *अदिति! तुम चाहती हो कि तुम्हारे पुत्र धन और शक्ति से समृद्ध हो जायें, उनकी कीर्ति और ऐश्वर्य उन्हें फिर से प्राप्त हो जायें तथा वे स्वर्ग पर अधिकार जमाकर पूर्ववत विहार करें। परन्तु देवि! वे असुर सेनापति इस समय जीते नहीं जा सकते, ऐसा मेरा निश्चय है; क्योंकि ईश्वर और ब्राह्मण इस समय उनके अनुकूल हैं। इस समय उनके साथ यदि लड़ाई छेड़ी जायेगी, तो उससे सुख मिलने की आशा नहीं है। *फिर भी देवि! तुम्हारे इस व्रत के अनुष्ठान से मैं बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिये मुझे इस सम्बन्ध में कोई-न-कोई उपाय सोचना ही पड़ेगा। क्योंकि मेरी आराधना व्यर्थ तो होनी नहीं चाहिये। उससे श्रद्धा के अनुसार फल अवश्य मिलता है। तुमने अपने पुत्रों की रक्षा के लिये ही विधिपूर्वक पयोव्रत से मेरी पूजा एवं स्तुति की है। अतः मैं अंशरूप से कश्यप के वीर्य में प्रवेश करूँगा और तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारी सन्तान की रक्षा करूँगा। कल्याणी! तुम अपने पति कश्यप में मुझे इसी रूप में स्थित देखो और उन निष्पाप प्रजापति की सेवा करो। देवि! देखो, किसी के पूछने पर भी यह बात दूसरे को मत बतलाना। देवताओं का रहस्य जितना गुप्त रहता है, उतना ही सफल होता है। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- इतना कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। उस समय अदिति यह जानकर कि स्वयं भगवान् मेरे गर्भ से जन्म लेने, अपनी कृतकृत्यता का अनुभव करने लगी। भला, यह कितनी दुर्लभ बात है! वह बड़े प्रेम से अपने पतिदेव कश्यप की सेवा करने लगी। कश्यप जी सत्यदर्शी थे, उनके नेत्रों से कोई बात छिपी नहीं रहती थी। अपने समाधि-योग से उन्होंने जान लिया कि भगवान का अंश मेरे अंदर प्रविष्ट हो गया है। जैसे वायु काठ में अग्नि का आधान करती है, वैसे ही कश्यप जी ने समाहित चित्त से अपनी तपस्या के द्वारा चिर-संचित वीर्य का अदिति में आधान किया। जब ब्रह्मा जी को यह बात मालूम हुई कि अदिति के गर्भ में तो स्वयं अविनाशी भगवान् आये हैं, तब वे भगवान के रहस्यमय नामों से उनकी स्तुति करने लगे। *ब्रह्मा जी ने कहा- समग्र कीर्ति के आश्रय भगवन! आपकी जय हो। अनन्त शक्तियों के अधिष्ठान! आपके चरणों में नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेव! त्रिगुणों के नियामक! आपके चरणों में मेरे बार-बार प्रणाम हैं। *पृश्नि के पुत्ररूप में उत्पन्न होने वाले! वेदों के समस्त ज्ञान को अपने अंदर रखने वाले प्रभो! वास्तव में आप ही सबके विधाता हैं। आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ। ये तीनों लोक आपकी नाभि में स्थित हैं। तीनों लोकों से परे वैकुण्ठ में आप निवास करते हैं। जीवों के अन्तःकरण में आप सर्वदा विराजमान रहते हैं। ऐसे सर्वव्यापक विष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ। *प्रभो! आप ही संसार के आदि, अन्त और इसलिये मध्य भी हैं। यही कारण है कि वेद अनन्त शक्तिपुरुष के रूप में आपका वर्णन करते हैं। जैसे गहरा स्रोत अपने भीतर पड़े हुए तिनके को बहा ले जाता है, वैसे ही आप कालरूप से संसार का धाराप्रवाह संचालन करते रहते हैं। आप चराचर प्रजा और प्रजापतियों को भी उत्पन्न करने वाले मूल कारण हैं। देवाधिदेव! जैसे जल में डूबते हुए के लिये नौका ही सहारा है, वैसे ही स्वर्ग से भगाये हुए देवताओं के लिये एकमात्र आप ही आश्रय हैं। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏 *श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 177*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 18*🙏🌸 *इस अध्याय में वामन भगवान का प्रकट होकर राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना...... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इस प्रकार जब ब्रह्मा जी ने भगवान की शक्ति और लीला की स्तुति की, तब जन्म-मृत्यु रहित भगवान अदिति के सामने प्रकट हुए। भगवान के चार भुजाएँ थीं; उनमें वे शंख, गदा, कमल और चक्र धारण किये हुए थे। कमल के समान कोमल और बड़े-बड़े नेत्र थे। पीताम्बर शोभायमान हो रहा था। विशुद्ध श्यामवर्ण का शरीर था। मकराकृति कुण्डलों की कान्ति से मुखकमल की शोभा और भी उल्लसित हो रही थी। वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न, हाथों में कंगन और भुजाओं में बाजूबंद, सिर पर किरीट, कमर में करधनी की लड़ियाँ और चरणों में सुन्दर नूपुर जगमगा रहे थे। *भगवान गले में अपनी स्वरूपभूत वनमाला धारण किये हुए थे, जिसके चारों ओर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। उनके कण्ठ में कौस्तुभ मणि सुशोभित थी। भगवान की अंग कान्ति से प्रजापति कश्यप जी के घर का अन्धकार नष्ट हो गया। उस समय दिशाएँ निर्मल हो गयीं। नदी और सरोवरों का जल स्वच्छ हो गया। प्रजा के हृदय में आनन्द की बाढ़ आ गयी। सब ऋतुएँ एक साथ अपना-अपना गुण प्रकट करने लगीं। स्वर्गलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, देवता, गौ, द्विज और पर्वत- इन सबके हृदय में हर्ष का संचार हो गया। परीक्षित! जिस समय भगवान ने जन्म ग्रहण किया, उस समय चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र पर थे। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की श्रवण नक्षत्र वाली द्वादशी थी। अभिजित् मुहूर्त में भगवान का जन्म हुआ था। सभी नक्षत्र और तारे भगवान के जन्म को मंगलमय सूचित कर रहे थे। *परीक्षित! जिस तिथि में भगवान का जन्म हुआ था, उसे ‘विजय द्वादशी’ कहते हैं। जन्म के समय सूर्य आकाश के मध्य भाग में स्थित थे। भगवान के अवतार के समय शंख, ढोल, मृदंग, डफ और नगाड़े आदि बाजे बजने लगे। इन तरह-तरह के बाजों और तुरहियों की तुमुल ध्वनि होने लगी। अप्सराएँ प्रसन्न होकर नाचने लगीं। श्रेष्ठ गन्धर्व गाने लगे। मुनि, देवता, मनु, पितर और अग्नि स्तुति करने लगे। सिद्ध, विद्याधर, किम्पुरुष, किन्नर, चारण, यक्ष, राक्षस, पक्षी, मुख्य-मुख्य नागगण और देवताओं के अनुचर नाचने-गाने एवं भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे तथा उन लोगों ने अदिति के आश्रम को पुष्पों की वर्षा से ढक दिया। जब अदिति ने अपने गर्भ से प्रकट हुए परम पुरुष परमात्मा देखा, तो वह अत्यन्त आश्चर्यचकित और परमानन्दित हो गयी। प्रजापति कश्यप जी भी भगवान को अपनी योगमाया से शरीर धारण किये हुए देख विस्मित हो गये और कहने लगे ‘जय हो! जय हो। *परीक्षित! भगवान स्वयं अव्यक्त एवं चित्स्वरूप हैं। उन्होंने जो परम कान्तिमय आभूषण एवं आयुधों से युक्त वह शरीर ग्रहण किया था, उसी शरीर से, कश्यप और अदिति के देखते-देखते वामन ब्रह्मचारी का रूप धारण कर लिया- ठीक वैसे ही, जैसे नट अपना वेष बदल ले। क्यों न हो, भगवान की लीला तो अद्भुत है ही। भगवान को वामन ब्रह्मचारी के रूप में देखकर महर्षियों को बड़ा आनन्द हुआ। उन लोगों ने कश्यप प्रजापति को आगे करके उनके जातकर्म आदि संस्कार करवाये। जब उनका उपनयन-संस्कार होने लगा, तब गायत्री के अधिष्ठातृ-देवता स्वयं सविता ने उन्हें गायत्री का उपदेश किया। देवगुरु बृहस्पति जी ने यज्ञोपवीत और कश्यप ने मेखला दी। *पृथ्वी ने कृष्णमृग का चर्म, वन के स्वामी चन्द्रमा ने दण्ड, माता अदिति ने कौपीन और कटिवस्त्र एवं आकाश के अभिमानी देवता ने वामन वेषधारी भगवान् को छत्र दिया। *परीक्षित! अविनाशी प्रभु को ब्रह्मा जी ने कमण्डलु, सप्तर्षियों ने कुश और सरस्वती ने रुद्राक्ष की माला समर्पित की। इस रीति से जब वामन भगवान का उपनयन-संस्कार हुआ, तब यक्षराज कुबेर ने उनको भिक्षा का पात्र और सतीशिरोमणि जगज्जननी स्वयं भगवती उमा ने भिक्षा दी। *इस प्रकार जब सब लोगों ने वटु वेषधारी भगवान का सम्मान किया, तब वे ब्रह्मर्षियों से भरी हुई सभा मे अपने ब्रह्मतेज के कारण अत्यन्त शोभायमान हुए। इसके बाद भगवान ने स्थापित और प्रज्ज्वलित अग्नि का कुशों से परिसमूहन और परिस्तरण करके पूजा की और समिधाओं से हवन किया। *परीक्षित! उसी समय भगवान् ने सुना कि सब प्रकार की सामग्रियों से सम्पन्न यशस्वी बलि भृगुवंशी ब्राह्मणों के आदेशानुसार बहुत-से अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं, तब उन्होंने वहाँ के लिये यात्रा की। भगवान समस्त शक्तियों से युक्त हैं। उनके चलने के समय उनके भार से पृथ्वी पग-पग पर झुकने लगी। *नर्मदा नदी के उत्तर तट पर ‘भृगुकच्छ’ नाम का एक बड़ा सुन्दर स्थान है। वहीं बलि के भृगुवंशी ऋत्विज श्रेष्ठ यज्ञ का अनुष्ठान करा रहे थे। उन लोगों ने दूर से ही वामन भगवान को देखा, तो उन्हें ऐसा जान पड़ा, मानो साक्षात् सूर्य देव का उदय हो रहा हो। *परीक्षित! वामन भगवान् के तेज से ऋत्विज, यजमान और सदस्य-सब-के-सब निस्तेज हो गये। वे लोग सोचने लगे कि कहीं यज्ञ देखने के लिये सूर्य, अग्नि अथवा सनत्कुमार तो नहीं आ रहे हैं। भृगु के पुत्र शुक्राचार्य आदि अपने शिष्यों के साथ इसी प्रकार अनेकों कल्पनाएँ कर रहे थे। उसी समय हाथ में छत्र, दण्ड और जल से भरा कमण्डलु लिये हुए वामन भगवान ने अश्वमेध यज्ञ के मण्डप में प्रवेश किया। *वे कमर में मूँज की मेखला और गले में यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। बगल में मृगचर्म था और सिर पर जटा थी। इसी प्रकार बौने ब्राह्मण के वेष में अपनी माया से ब्रह्मचारी बने हुए भगवान् ने जब उनके यज्ञ मण्डप में प्रवेश किया, तब भृगुवंशी ब्राह्मण उन्हें देखकर अपने शिष्यों के साथ उनके तेज से प्रभावित एवं निष्प्रभ हो गये। वे सब-के-सब अग्नियों के साथ उठ खड़े हुए और उन्होंने वामन भगवान का स्वागत-सत्कार किया। *भगवान के लघु रूप के अनुरूप सारे अंग छोटे-छोटे बड़े ही मनोरम एवं दर्शनीय थे। उन्हें देखकर बलि को बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने वामन भगवान को एक उत्तम आसन दिया। फिर स्वागत-वाणी से उनका अभिनन्दन करके पाँव पखारे और संगरहित महापुरुषों को भी अत्यन्त मनोहर लगने वाले वामन भगवान की पूजा की। भगवान् के चरणकमलों का धोवन परममंगलमय है। उससे जीवों के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं देवाधिदेव चन्द्रमौलि भगवान शंकर ने अत्यन्त भक्तिभाव से उसे अपने सिर पर धारण किया था। आज वही चरणामृत धर्म के मर्मज्ञ राजा बलि को प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़े प्रेम से उसे अपने मस्तक पर रखा। *बलि ने कहा- ब्राह्मणकुमार! आप भले पधारे। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आज्ञा कीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? *आर्य! ऐसा जान पड़ता है कि बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियों की तपस्या ही स्वयं मूर्तिमान होकर मेरे सामने आयी है। आज आप मेरे घर पधारे, इससे मेरे पितर तृप्त हो गये। आज मेरा वंश पवित्र हो गया। आज मेरा यह यज्ञ सफल हो गया। *ब्राह्मणकुमार! आपके पाँव पखारने से मेरे सारे पाप धुल गये और विधिपूर्वक यज्ञ करने से, अग्नि में आहुति डालने से जो फल मिलता, वह अनायास ही मिल गया। आपके इन नन्हे-नन्हे चरणों और इनके धोवन से पृथ्वी पवित्र हो गयी। ब्राह्मणकुमार! ऐसा जान पड़ता है कि आप कुछ चाहते हैं। परमपूज्य ब्रह्मचारी जी! आप जो चाहते हों- गाय, सोना, सामग्रियों से सुसज्जित घर, पवित्र अन्न, पीने की वस्तु, विवाह के लिये ब्राह्मण की कन्या, सम्पत्तियों से भरे हुए गाँव, घोड़े, हाथी, रथ-वह सब आप मुझसे माँग लीजिये। अवश्य ही वह सब मुझसे माँग लीजिये। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 180*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 21*🙏🌸 *इस अध्याय में बलि का बाँधा जाना...... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! भगवान का चरणकमल सत्यलोक में पहुँच गया। उनके नखचन्द्र की छटा से सत्यलोक की आभा फीकी पड़ गयी। स्वयं ब्रह्मा भी उसके प्रकाश में डूब-से गये। उन्होंने मरीचि आदि ऋषियों, सनन्दन आदि नैष्ठिक ब्रह्मचारियों एवं बड़े-बड़े योगियों के साथ भगवान के चरणकमल की अगवानी की। *वेद, उपवेद, नियम, यम, तर्क, इतिहास, वेदांग और पुराण-सहिंताएँ-जो ब्रह्मलोक में मूर्तिमान होकर निवास करते हैं-तथा जिन लोगों ने योगरूप वायु से ज्ञानाग्नि को प्रज्वलित करके कर्ममल को भस्म कर डाला है, वे महात्मा, सबने भगवान के चरण की वन्दना की। इसी चरणकमल के स्मरण की महिमा से ये सब कर्म के द्वारा प्राप्त न होने योग्य ब्रह्मा जी के धाम में पहुँचे हैं। भगवान ब्रह्मा की कीर्ति बड़ी पवित्र है। वे विष्णु भगवान के नाभिकमल से उत्पन्न हुए हैं। अगवानी करने के बाद उन्होंने स्वयं विश्वरूप भगवान के ऊपर उठे हुए चरण का अर्घ्यपाद्य से पूजन किया, प्रक्षालन किया। पूजा करके बड़े प्रेम और भक्ति से उन्होंने भगवान की स्तुति की। *परीक्षित! ब्रह्मा के कमण्डलु का वही जल विश्वरूप भगवान के पाँव पखारने से पवित्र होने के कारण उन गंगाजी के रूप में परिणत हो गया, जो आकाशमार्ग से पृथ्वी पर गिरकर तीनों लोकों को पवित्र करती हैं। ये गंगाजी क्या हैं, भगवान की मूर्तिमान् उज्ज्वल कीर्ति। *जब भगवान ने अपने स्वरूप को कुछ छोटा कर लिया, अपनी विभूतियों को कुछ समेट लिया, तब ब्रह्मा आदि लोकपालों ने अपने अनुचरों के साथ बड़े आदर भाव से अपने स्वामी भगवान को अनेकों प्रकार की भेंटें समर्पित कीं। उन लोगों ने जल-उपहार, माला, दिव्य गन्धों से भरे अंगराग, सुगन्धित धूप, दीप, खील, अक्षत, फल, अंकुर, भगवान की महिमा और प्रभाव से युक्त स्तोत्र, जयघोष, नृत्य, बाजे-गाजे, गान एवं शंख आदि दुन्दुभि के शब्दों से भगवान की आराधना की। उस समय ऋक्षराज जाम्बवान मन के समान वेग से दौड़कर सब दिशाओं में भेरी बजा-बजाकर भगवान की मंगलमय विजय की घोषणा कर आये। *दैत्यों ने देखा कि वामन जी ने तीन पग पृथ्वी माँगने के बहाने सारी पृथ्वी ही छीन ली। तब वे सोचने लगे कि हमारे स्वामी बलि इस समय यज्ञ में दीक्षित हैं, वे तो कुछ कहेंगे नहीं। इसलिये बहुत चिढ़कर वे आपस में कहने लगे- ‘अरे, यह ब्राह्मण नहीं है। यह सबसे बड़ा मायावी विष्णु है। ब्राह्मण के रूप में छिपकर यह देवताओं का काम बनाना चाहता है। जब हमारे स्वामी यज्ञ में दीक्षित होकर किसी को किसी प्रकार का दण्ड देने के लिये उपरत हो गये हैं, तब इस शत्रु ने ब्रह्मचारी का वेष बनाकर पहले तो याचना की और पीछे हमारा सर्वस्व हरण कर लिया। यों तो हमारे स्वामी सदा ही सत्यनिष्ठ हैं, परन्तु यज्ञ में दीक्षित होने पर वे इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। वे ब्राह्मणों के बड़े भक्त हैं तथा उनके हृदय में दया भी बहुत है। इसलिये वे कभी झूठ नहीं बोल सकते। ऐसी अवस्था में हम लोगों का यह धर्म है कि इस शत्रु को मार डालें। इससे हमारे स्वामी बलि की सेवा भी होती है।’ यों सोचकर राजा बलि के अनुचर असुरों ने अपने-अपने हथियार उठा लिये। *परीक्षित! राजा बलि की इच्छा न होने पर भी वे सब बड़े क्रोध से शूल, पट्टिश आदि ले-लेकर वामन भगवान को मारने के लिये टूट पड़े। *परीक्षित! जब विष्णु भगवान के पार्षदों ने देखा कि दैत्यों के सेनापति आक्रमण करने के लिये दौड़े आ रहे हैं, तब उन्होंने हँसकर अपने-अपने शस्त्र उठा लिये और उन्हें रोक दिया। नन्द, सुनन्द, जय, विजय, प्रबल, बल, कुमुद, कुमुदाक्ष, विष्वक्सेन, गरुड़, जयन्त, श्रुतदेव, पुष्पदन्त और सात्वत- ये सभी भगवान के पार्षद दस-दस हजार हाथियों का बल रखते हैं। वे असुरों की सेना का संहार करने लगे। *जब राजा बलि ने देखा कि भगवान के पार्षद मेरे सैनिकों को मार रहे हैं और वे भी क्रोध में भरकर उनसे लड़ने के लिये तैयार हो रहे हैं, तो उन्होंने शुक्राचार्य के शाप का स्मरण करके उन्हें युद्ध करने से रोक दिया। उन्होंने विप्रचित्ति, राहु, नेमि आदि दैत्यों को सम्बोधित करके कहा- ‘भाइयों! मेरी बात सुनो। लड़ो मत, वापस लौट आओ। यह समय हमारे कार्य के अनुकूल नहीं है। दैत्यों! जो काल समस्त प्राणियों को सुख और दुःख देने की सामर्थ्य रखता है-उसे यदि कोई पुरुष चाहे कि मैं अपने प्रयत्नों से दबा दूँ, तो यह उसकी शक्ति से बाहर है। जो पहले हमारी उन्नति और देवताओं की अवनति के कारण हुए थे, वही काल भगवान अब उनकी उन्नति और हमारी अवनति के कारण हो रहे हैं। बल, मन्त्री, बुद्धि, दुर्ग, मन्त्र, ओषधि और सामादि उपाय-इनमें से किसी भी साधन के द्वारा अथवा सबके द्वारा मनुष्य काल पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता। जब दैव तुम लोगों के अनुकूल था, तब तुम लोगों ने भगवान के इन पार्षदों को कई बार जीत लिया था। पर देखो, आज वे ही युद्ध में हम पर विजय प्राप्त करके सिंहनाद कर रहे हैं। यदि दैव हमारे अनुकूल हो जायेगा, तो हम भी इन्हें जीत लेंगे। इसलिये उस समय की प्रतीक्षा करो, जो हमारी कार्य-सिद्धि के लिये अनुकूल हो’। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अपने स्वामी बलि की बात सुनकर भगवान के पार्षदों से हारे हुए दानव और दैत्य सेनापति रसातल में चले गये। उनके जाने के बाद भगवान के हृदय की बात जानकर पक्षिराज गरुड़ ने वरुण के पाशों से बलि को बाँध दिया। उस दिन उनके अश्वमेध यज्ञ में सोमपान होने वाला था। *जब सर्वशक्तिमान भगवान् विष्णु ने बलि को इस प्रकार बँधवा दिया, तब पृथ्वी, आकाश और समस्त दिशाओं में लोग ‘हाय-हाय!’ करने लगे। यद्यपि बलि वरुण के पाशों से बँधे हुए थे, उनकी सम्पत्ति भी उनके हाथों से निकल गयी थी-फिर भी उनकी बुद्धि निश्चयात्मक थी और सब लोग उनके उदार यश का गान कर रहे थे। *परीक्षित! उस समय भगवान् ने बलि से कहा- ‘असुर! तुमने मुझे पृथ्वी के तीन पग दिये थे; दो पग में तो मैंने सारी त्रिलोकी नाप ली, अब तीसरा पग पूरा करो। जहाँ तक सूर्य की गरमी पहुँचती है, जहाँ तक नक्षत्रों और चन्द्रमा की किरणें पहुँचती हैं और जहाँ तक बादल जाकर बरसते हैं-वहाँ तक की सारी पृथ्वी तुम्हारे अधिकार में थी। तुम्हारे देखते-ही-देखते मैंने अपने एक पैर से भूर्लोक, शरीर से आकाश और दिशाएँ एवं दूसरे पैर से स्वर्लोक नाप लिया है। इस प्रकार तुम्हारा सब कुछ मेरा हो चुका है। फिर भी तुमने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे पूरा न कर सकने के कारण अब तुम्हें नरक में रहना पड़ेगा। तुम्हारे गुरु की तो इस विषय में सम्मति है ही; अब जाओ, तुम नरक में प्रवेश करो। जो याचक को देने की प्रतिज्ञा करके मुकर जाता है और इस प्रकार उसे धोखा देता है, उसके सारे मनोरथ व्यर्थ होते हैं। स्वर्ग की बात तो दूर रही, उसे नरक में गिरना पड़ता है। तुम्हें इस बात का बड़ा घमंड था कि मैं बड़ा धनी हूँ। तुमने मुझसे ‘दूँगा’-ऐसी प्रतिज्ञा करके फिर धोखा दे दिया। अब तुम कुछ वर्षों तक इस झूठ का फल नरक में भोगो’। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 179*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 20*🙏🌸 *इस अध्याय में भगवान वामन जी का विराट् रूप होकर दो ही पग से पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लेना..... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन! जब कुलगुरु शुक्राचार्य ने इस प्रकार कहा, तब आदर्श गृहस्थ राजा बलि ने एक क्षण चुप रहकर बड़ी विनय और सावधानी से शुक्राचार्य जी के प्रति यों कहा। *राजा बलि ने कहा- भगवन! आपका कहना सत्य है। गृहस्थाश्रम में रहने वालों के लिये वही धर्म है जिससे अर्थ, काम, यश और आजीविका में कभी किसी प्रकार बाधा न पड़े। परन्तु गुरुदेव! मैं प्रह्लाद जी का पौत्र हूँ और एक बार देने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। अतः अब मैं धन लोभ से ठग की भाँति इस ब्राह्मण से कैसे कहूँ कि ‘मैं तुम्हें नहीं दूँगा’। *इस पृथ्वी ने कहा है कि ‘असत्य से बढ़कर कोई अधर्म नहीं है। मैं सब कुछ सहने में समर्थ हूँ, परन्तु झूठे मनुष्य का भार मुझसे नहीं सहा जाता’। *मैं नरक से, दरिद्रता से, दुःख के समुद्र से, अपने राज्य के नाश से और मृत्यु से भी उतना नहीं डरता, जितना ब्राह्मण से प्रतिज्ञा करके उसे धोखा देने से डरता हूँ। *इस संसार में मर जाने के बाद धन आदि जो-जो वस्तुएँ साथ छोड़ देती हैं, यदि उनके द्वारा दान आदि से ब्राह्मणों को भी संतुष्ट न किया जा सका, तो उनके त्याग का लाभ ही क्या रहा? *दधीचि, शिबि आदि महापुरुषों ने अपने परम प्रिय दुस्त्यज प्राणों का दान करके भी प्राणियों की भलाई की है। फिर पृथ्वी आदि वस्तुओं को देने में सोच-विचार करने की क्या आवश्यकता है? *ब्रह्मन! पहले युग में बड़े-बड़े दैत्यराजों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया है। पृथ्वी में उनका सामना करने वाला कोई नहीं था। उनके लोक और परलोक को तो काल खा गया, परन्तु उनका यश अभी पृथ्वी पर ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। गुरुदेव! ऐसे लोग संसार में बहुत हैं, जो युद्ध में पीठ न दिखाकर अपने प्राणों की बलि चढ़ा देते हैं; परन्तु ऐसे लोग बहुत दुर्लभ हैं, जो सत्पात्र के प्राप्त होने पर श्रद्धा के साथ धन का दान करें। *गुरुदेव! यदि उदार और करुणाशील पुरुष अपात्र याचक की कामना पूर्ण करके दुर्गति भोगता है, तो वह दुर्गति भी उसके लिये शोभा की बात होती है। फिर आप-जैसे ब्रह्मवेत्ता पुरुषों को दान करने से दुःख प्राप्त हो तो उसके लिये क्या कहना है। इसलिये मैं इस ब्रह्मचारी की अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा। *महर्षे! वेदविधि के जानने वाले आप लोग बड़े आदर से यज्ञ-यागादि के द्वारा जिनकी आराधना करते हैं-वे वरदानी विष्णु ही इस रूप में हों अथवा कोई दूसरा हो, मैं इनकी इच्छा के अनुसार इन्हें पृथ्वी का दान करूँगा। यदि मेरे अपराध न करने पर भी ये अधर्म से मुझे बाँध लेंगे, तब भी मैं इनका अनिष्ट नहीं चाहूँगा। क्योंकि मेरे शत्रु होने पर भी इन्होंने भयभीत होकर ब्राह्मण का शरीर धारण किया है। यदि ये पवित्रकीर्ति भगवान् विष्णु ही हैं तो अपना यश नहीं खोना चाहेंगे (अपनी माँगी हुई वस्तु लेकर ही रहेंगे)’। *मुझे युद्ध में मारकर भी पृथ्वी छीन सकते हैं और यदि कदाचित ये कोई दूसरा ही हैं, तो मेरे बाणों की चोट से सदा के लिये रणभूमि में सो जायेंगे। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- जब शुक्राचार्य जी ने देखा कि मेरा यह शिष्य गुरु के प्रति अश्रद्धालु है तथा मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहा है, तब दैव की प्रेरणा से उन्होंने राजा बलि को शाप दे दिया-यद्यपि वे सत्यप्रतिज्ञ और उदार होने के कारण शाप के पात्र नहीं थे। *शुक्राचार्य जी ने कहा- ‘मूर्ख! तू है तो अज्ञानी, परन्तु अपने को बहुत बड़ा पण्डित मानता है। तू मेरी उपेक्षा करके गर्व कर रहा है। तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है। इसलिये शीघ्र ही तू अपनी लक्ष्मी खो बैठेगा’। *राजा बलि बड़े महात्मा थे। अपने गुरुदेव के शाप देने पर भी वे सत्य से नहीं डिगे। उन्होंने वामन भगवान् की विधिपूर्वक पूजा की और हाथ में जल लेकर तीन पग भूमि का संकल्प कर दिया। *उसी समय राजा बलि की पत्नी विन्ध्यावली, जो मोतियों के गहनों से सुसज्जित थी, वहाँ आयी। उसने अपने हाथों वामन भगवान के चरण पखारने के लिये जल से भरा सोने का कलश लाकर दिया। बलि ने स्वयं बड़े आनन्द से उनके सुन्दर-सुन्दर युगल चरणों को धोया और उनके चरणों का वह विश्व पावन जल अपने सिर पर चढ़ाया। उस समय आकाश में स्थित देवता, गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध, चारण-सभी लोग राजा बलि के इस अलौकिक कार्य तथा सरलता की प्रशंसा करते हुए बड़े आनन्द से उनके ऊपर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। एक साथ ही हजारों दुन्दुभियाँ बार-बार बजने लगीं। *गन्धर्व, किम्पुरुष और किन्नर गान करने लगे- ‘अहो धन्य है! इन उदारशिरोमणि बलि ने ऐसा काम कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। देखो तो सही, इन्होंने जान-बूझकर अपने शत्रु को तीनों लोकों का दान कर दिया’। *इसी समय एक बड़ी अद्भुत घटना घट गयी। अनन्त भगवान् का वह त्रिगुणात्मक वामन रूप बढ़ने लगा। वह यहाँ तक बढ़ा कि पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ, स्वर्ग, पाताल, समुद्र, पशु-पक्षी, मनुष्य, देवता और ऋषि- सब-के-सब उसी में समा गये। ऋत्विज, आचार्य और सदस्यों के साथ बलि ने समस्त ऐश्वर्यों के एकमात्र स्वामी भगवान् के उस त्रिगुणात्मक शरीर में पंचभूत, इन्द्रिय, उनके विषय, अन्तःकरण और जीवों के साथ वह सम्पूर्ण त्रिगुणमय जगत् देखा। *राजा बलि ने विश्वरूप भगवान के चरणतल में रसातल, चरणों में पृथ्वी, पिंडलियों में पर्वत, घुटनों में पक्षी और जाँघों में मरुद्गण को देखा। *इसी प्रकार भगवान् के वस्त्रों में सन्ध्या, गुह्य-स्थानों में प्रजापतिगण, जघनस्थल में अपने सहित समस्त असुरगण, नाभि में आकाश, कोख में सातों समुद्र और वक्षःस्थल में नक्षत्र समूह देखे। उन लोगों को भगवान् के हृदय में धर्म, स्तनों में ऋत (मधुर) और सत्य वचन, मन में चन्द्रमा, वक्षःस्थल पर हाथों में कमल लिये लक्ष्मी जी, कण्ठ में सामवेद और सम्पूर्ण शब्दसमूह उन्हें दीखे। बाहुओं में इन्द्रादि समस्त देवगण, कानों में दिशाएँ, मस्तक में स्वर्ग, केशों में मेघमाला, नासिका में वायु, नेत्रों में सूर्य और मुख में अग्नि दिखायी पड़े। वाणी में वेद, रसना में वरुण, भौंहों में विधि और निषेध, पलकों में दिन और रात। विश्वरूप के ललाट में क्रोध और नीचे के ओठ में लोभ के दर्शन हुए। *परीक्षित! उनके स्पर्श में काम, वीर्य में जल, पीठ में अधर्म, पदविन्यास में यज्ञ, छाया में मृत्यु, हँसी में माया और शरीर के रोमों में सब प्रकार की ओषधियाँ थीं। उनकी नाड़ियों में नदियाँ, नखों में शिलाएँ और बुद्धि में ब्रह्मा, देवता एवं ऋषिगण दीख पड़े। इस प्रकार वीरवर बलि ने भगवान् की इन्द्रियों और शरीर में सभी चराचर प्राणियों का दर्शन किया। *परीक्षित! सर्वात्मा भगवान् में यह सम्पूर्ण जगत देखकर सब-के-सब दैत्य अत्यन्त भयभीत हो गये। इसी समय भगवान् के पास असह्य तेज वाला सुदर्शन चक्र, गरजते हुए मेघ के समान भयंकर टंकार करने वाला शारंग धनुष, बादल की तरह गम्भीर शब्द करने वाला पांचजन्य शंख, विष्णु भगवान् की अत्यन्त वेगवती कौमुदकी गदा, सौ चन्द्राकार चिह्नों वाली ढाल और विद्याधर नाम की तलवार, अक्षय बाणों से भरे दो तरकश तथा लोकपालों के सहित भगवान् के सुनन्द आदि पार्षदगण सेवा करने के लिये उपस्थित हो गये। उस समय भगवान की बड़ी शोभा हुई। मस्तक पर मुकुट, बाहुओं में बाजूबंद, कानों में मकराकृत कुण्डल, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न, गले में कौस्तुभ मणि, कमर में मेखला और कंधे पर पीताम्बर शोभायमान हो रहा था। *वे पाँच प्रकार के पुष्पों की बनी वनमाला धारण किये हुए थे, जिस पर मधुलोभी भौंरे गुंजार कर रहे थे। उन्होंने अपने एक पग से बलि की सारी पृथ्वी नाप ली, शरीर से आकाश और भुजाओं से दिशाएँ घेर लीं; दूसरे पग से उन्होंने स्वर्ग को भी नाप लिया। तीसरा पैर रखने के लिये बलि की तनिक-सी भी कोई वस्तु न बची। भगवान का वह दूसरा पग ही ऊपर की ओर जाता हुआ महर्लोक, जनलोक और तपलोक से भी ऊपर सत्यलोक में पहुँच गया। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 178*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 19*🙏🌸 *इस अध्याय में भगवान वामन का बलि से तीन पग पृथ्वी माँगना, बलि का वचन देना और शुक्राचार्य जी का उन्हें रोकना..... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजा बलि के ये वचन धर्मभाव से भरे और बड़े मधुर थे। उन्हें सुनकर भगवान वामन ने बड़ी प्रसन्नता से उनका अभिननदन किया और कहा। *श्रीभगवान ने कहा- राजन! आपने जो कुछ कहा, वह आपकी कुल परम्परा के अनुरूप, धर्मभाव से परिपूर्ण, यश को बढ़ाने वाला और अत्यनत मधुर है। क्यों न हो, परलोकहितकारी धर्म के सम्बनध में आप भृगुपुत्र शुक्राचार्य को परम प्रमाण जो मानते हैं। साथ ही अपने कुलवृद्ध पितामह परमशान्त प्रह्लाद जी की आज्ञा भी तो आप वैसे ही मानते हैं। आपकी वंश परम्परा में कोई धैर्यहीन अथवा कृपण पुरुष कभी हुआ ही नहीं। ऐसा भी कोई नहीं हुआ, जिसने ब्राह्मण को कभी दान न दिया हो अथवा जो एक बार किसी को कुछ देने की प्रतिज्ञा करके बाद में मुकर गया हो। दान के अवसर पर याचकों की याचना सुनकर और युद्ध के अवसर पर शत्रु के ललकारने पर उनकी ओर से मुँह मोड़ लेने वाला कायर आपके वंश में कोई भी नहीं हुआ। क्यों न हो, आपकी कुल परम्परा में प्रह्लाद अपने निर्मल यश से वैसे ही शोभायमान होते हैं, जैसे आकाश में चनद्रमा। *आपके कुल में ही हिरण्याक्ष जैसे वीर का जन्म हुआ था। वह वीर जब हाथ में गदा लेकर अकेला ही दिग्विजय के लिये निकला, तब सारी पृथ्वी में घूमने पर भी उसे अपनी जोड़ का कोई वीर न मिला। जब विष्णु भगवान जल में से पृथ्वी का उद्धार कर रहे थे, तब वह उनके सामने आया और बड़ी कठिनाई से उन्होंने उस पर विजय प्राप्त की। परन्तु उसके बहुत बाद भी उन्हें बार-बार हिरण्याक्ष की शक्ति और बल का स्मरण हो आया करता था और उसे जीत लेने पर भी वे अपने को विजयी नहीं समझते थे। जब हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकशिपु को उसके वध का वृत्तांत मालूम हुआ, तब वह अपने भाई का वध करने वाले को मार डालने के लिये क्रोध करके भगवान के निवास स्थान वैकुण्ठ धाम में पहुँचा। *विष्णु भगवान माया रचने वालों में सबसे बड़े हैं और समय को खूब पहचानते हैं। जब उन्होंने देखा कि हिरण्यकशिपु तो हाथ में शूल लेकर काल की भाँति मेरे ही ऊपर धावा कर रहा है, तब उन्होंने विचार किया। ‘जैसे संसार के प्राणियों के पीछे मृत्यु लगी रहती है-वैसे ही मैं जहाँ-जहाँ जाऊँगा, वहीं-वहीं यह मेरा पीछा करेगा। इसलिये मैं इसके हृदय में प्रवेश कर जाऊँ, जिससे यह मुझे देख न सके; क्योंकि यह तो बहिर्मुख है, बाहर की वस्तुएँ ही देखता है। *असुरशिरोमणे! जिस समय हिरण्यकशिपु उन पर झपट रहा था, उसी समय ऐसा निश्चय करके डर से काँपते हुए विष्णु भगवान ने अपने शरीर को सूक्ष्म बना लिया और उसके प्राणों के द्वारा नासिकों में से होकर हृदय में जा बैठे। हिरण्यकशिपु ने उनके लोक को भलीभाँति छान डाला, परन्तु उनका कहीं पता न चला। इस पर क्रोधित होकर वह सिंहनाद करने लगा। उस वीर ने पृथ्वी, स्वर्ग, दिशा, आकाश, पाताल और समुद्र-सब कहीं विष्णु भगवान को ढूँढा, परन्तु वे कहीं भी उसे दिखायी न दिये। *उनको कहीं न देखकर वह कहने लगा- मैंने सारा जगत् छान डाला, परन्तु वह मिला नहीं। अवश्य ही वह भ्रातृघाती उस लोक में चला गया, जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता। बस, अब उससे वैरभाव रखने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वैर तो देह के साथ ही समाप्त हो जाता है। क्रोध का कारण अज्ञान है और अहंकार से उसकी वृद्धि होती है। *राजन! आपके पिता प्रह्लादनन्दन विरोचन बड़े ही ब्राह्मण भक्त थे। यहाँ तक कि उनके शत्रु देवताओं ने ब्राह्मणों का वेष बनाकर उनसे उनकी आयु का दान माँगा और उन्होंने ब्राह्मणों के छल को जानते हुए भी अपनी आयु दे डाली। आप भी उसी धर्म का आचरण करते हैं, जिसका शुक्राचार्य आदि गृहस्थ ब्राह्मण, आपके पूर्वज प्रह्लाद और दूसरे यशस्वी वीरों ने पालन किया है। दैत्येनद्र! आप मुँहमाँगी वस्तु देने वालों में श्रेष्ठ हैं। इसी से मैं आपसे थोड़ी-सी पृथ्वी-केवल अपने पैरों से तीन डग माँगता हूँ। माना कि आप सारे जगत् के स्वामी और बड़े उदार हैं, फिर भी मैं आपसे इससे अधिक नहीं चाहता। विद्वान पुरुष को केवल अपनी आवश्यकता के अनुसार ही दान स्वीकार करना चाहिये। इससे वह प्रतिग्रहजन्य पाप से बच जाता है। *राजा बलि ने कहा- 'ब्राह्मणकुमार! तुम्हारी बातें तो वृद्धों-जैसी हैं, परन्तु तुम्हारी बुद्धि अभी बच्चों की-सी ही है। अभी तुम हो भी तो बालक ही न, इसी से अपना हानि-लाभ नहीं समझ रहे हो। मैं तीनों लोकों का एकमात्र अधिपति हूँ और द्वीप-का-द्वीप दे सकता हूँ। जो मुझे अपनी वाणी से प्रसन्न कर ले और मुझसे केवल तीन डग भूमि माँगे-वह भी क्या बुद्धिमान कहा जा सकता है? ब्रह्मचारी जी! जो एक बार कुछ माँगने के लिये मेरे पास आ गया, उसे फिर कभी किसी से कुछ माँगने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिये। अतः अपनी जीविका चलाने के लिये तुम्हें जितनी भूमि की आवश्यकता हो, उतनी मुझसे माँग लो।' *श्रीभगवान ने कहा- राजन! संसार के सब-के-सब प्यारे विषय एक मनुष्य की कामनाओं को भी पूर्ण करने में समर्थ नहीं हैं, यदि वह अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला-संतोषी न हो। जो तीन पग भूमि से संतोष नहीं कर लेता, उसे नौ वर्षों से युक्त एक द्वीप भी दे दिया जाये तो भी वह संतुष्ट नहीं हो सकता। क्योंकि उसके मन में सातों द्वीप पाने की इच्छा बनी ही रहेगी। *मैंने सुना है कि पृथु, गय आदि नरेश सातों द्वीपों के अधिपति थे; परन्तु उतने धन और भोग की सामग्रियों के मिलने पर भी वे तृष्णा का पार न पा सके। जो कुछ प्रारब्ध से मिल जाये, उसी से संतुष्ट हो रहने वाला पुरुष अपना जीवन सुख से व्यतीत करता है। परन्तु अपनी इन्द्रियों को वश में न रखने वाला तीनों लोकों का राज्य पाने पर भी दुःखी ही रहता है। क्योंकि उसके हृदय में असंतोष की आग धधकती रहती है। धन और भोगों से संतोष न होना ही जीव के जन्म-मृत्यु के चक्कर में गिरने का कारण है तथा जो कुछ प्राप्त हो जाये, उसी में संतोष कर लेना मुक्ति का कारण है। *जो ब्राह्मण स्वयंप्राप्त वस्तु से ही संतुष्ट हो रहता है, उसके तेज की वृद्धि होती है। उसके असंतोषी हो जाने पर उसका तेज वैसे ही शान्त हो जाता है, जैसे जल से अग्नि। इसमें संदेह नहीं कि आप मुँहमाँगी वस्तु देने वालों में शिरोमणि हैं। इसलिये मैं आपसे केवल तीन पग भूमि ही माँगता हूँ। इतने से ही मेरा काम बन जायेगा। धन उतना ही संग्रह करना चाहिये, जितने की आवश्यकता हो। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- भगवान के इस प्रकार कहने पर राजा बलि हँस पड़े। उन्होंने कहा- ‘अच्छी बात है; जितनी तुम्हारी इच्छा हो, उतनी ही ले लो।’ यों कहकर वामन भगवान को तीन पग पृथ्वी का संकल्प करने के लिये उन्होंने जल पात्र उठाया। *शुक्राचार्य जी सब कुछ जानते थे। उनसे भगवान की यह लीला भी छिपी नहीं थी। उन्होंने राजा बलि को पृथ्वी देने के लिये तैयार देखकर उनसे कहा। *शुक्राचार्य जी ने कहा- 'विरोचनकुमार! ये स्वयं अविनाशी भगवान विष्णु हैं। देवताओं का काम बनाने के लिये कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से अवतीर्ण हुए हैं। तुमने यह अनर्थ न जानकर कि ये मेरा सब कुछ छीन लेंगे, इन्हें दान देने की प्रतिज्ञा ली है। यह तो दैत्यों पर बहुत बड़ा अन्याय होने जा रहा है। इसे मैं ठीक नहीं समझता। स्वयं भगवान ही अपनी योगमाया से यह ब्रह्मचारी बनकर बैठे हुए हैं। ये तुम्हारा राज्य, ऐश्वर्य, लक्ष्मी, तेज और विश्वविख्यात कीर्ति-सब कुछ तुमसे छीनकर इन्द्र को दे देंगे। ये विश्वरूप हैं। तीन पग में ही तो ये सारे लोकों को नाप लेंगे। *मूर्ख! जब तुम अपना सर्वस्व ही विष्णु को दे डालोगे, तो तुम्हारा जीवन-निर्वाह कैसे होगा। ये विश्वव्यापक भगवान एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग को नाप लेंगे। इनके विशाल शरीर से आकाश भर जायेगा। तब इनका तीसरा पग कहाँ जायेगा? तुम उसे पूरा न कर सकोगे। ऐसी दशा में मैं समझता हूँ कि प्रतिज्ञा करके पूरा न कर पाने के कारण तुम्हें नरक में ही जाना पड़ेगा। क्योंकि तुम अपनी की हुई प्रतिज्ञा को पूर्ण करने में सर्वथा असमर्थ होओगे। विद्वान पुरुष उस दान की प्रशंसा नहीं करते, जिसके बाद जीवन-निर्वाह के लिये कुछ बचे ही नहीं। जिसका जीवन-निर्वाह ठीक-ठीक चलता है-वही संसार में दान, यज्ञ, तप और परोपकार के कर्म कर सकता है। जो मनुष्य अपने धन को पाँच भागों में बाँट देता है-कुछ धर्म के लिये, कुछ यश के लिये, कुछ धन की अभिवृद्धि के लिये, कुछ भोगों के लिये और कुछ अपने स्वजनों के लिये-वही इस लोक और परलोक दोनों में ही सुख पाता है। *असुरशिरोमणे! यदि तुम्हें अपनी प्रतिज्ञा टूट जाने की चिन्ता हो, तो मैं इस विषय में तुम्हें कुछ ऋग्वेद की श्रुतियों का आशय सुनाता हूँ, तुम सुनो। *श्रुति कहती है- ‘किसी को कुछ देने की बात स्वीकार कर लेना सत्य है और नकार जाना अर्थात् अस्वीकार कर देना असत्य है। यह शरीर एक वृक्ष है और सत्य इसका फल-फूल है। परन्तु यदि वृक्ष ही न रहे तो फल-फूल कैसे रह सकते हैं? क्योंकि नकार जाना, अपनी वस्तु दूसरे को न देना, दूसरे शब्दों में अपना संग्रह बचाये रखना-यही शरीररूप वृक्ष का मूल है। *जैसे जड़ न रहने पर वृक्ष सूखकर थोड़े ही दिनों में गिर जाता है, उसी प्रकार यदि धन देने से अस्वीकार न किया जाये तो यह जीवन सूख जाता है-इसमें सन्देह नहीं। ‘हाँ मैं दूँगा’-यह वाक्य ही धन को दूर हटा देता है। इसलिये इसका उच्चारण ही अपूर्ण अर्थात् धन से खाली कर देने वाला है। यही कारण है कि जो पुरुष ‘हाँ मैं दूँगा’-ऐसा कहता है, वह धन से खाली हो जाता है। *जो याचक को सब कुछ देना स्वीकार कर लेता है, वह अपने लिये भोग की कोई सामग्री नहीं रख सकता। इसके विपरीत ‘मैं नहीं दूँगा’-यह जो अस्वीकारात्मक असत्य है, वह अपने धन को सुरक्षित रखने तथा पूर्ण करने वाला है। परन्तु ऐसा सब समय नहीं करना चाहिये। *जो सबसे, सभी वस्तुओं के लिये नहीं करता रहता है, उसकी अपकीर्ति हो जाती है। वह तो जीवित रहने पर भी मृतक के समान ही है। स्त्रियों को प्रसन्न करने के लिये, हास-परिहास में, विवाह में, कन्या आदि की प्रशंसा करते समय, अपनी जीविका की रक्षा के लिये, प्राण संकट उपस्थित होने पर, गौ और ब्राह्मण के हित के लिये तथा किसी को मृत्यु से बचाने के लिये असत्य-भाषण भी उतना निन्दनीय नहीं है। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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