Lakhan Singh Rajput Amlaha ने यह पोस्ट की।

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Neha Sharma, Haryana Oct 25, 2020

*रावण और कुबेर दोनों भाई थे तो फिर रावण असुर (राक्षस) और कुबेर सुर(देव) क्यों कहलाए? *पौराणिक संदर्भों के अनुसार पुलत्स्य ऋषि ब्रह्मा के दस मानसपुत्रों में से एक माने जाते हैं। इनकी गिनती सप्तऋषियों और प्रजापतियों में की जाती है। विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने पुलत्स्य ऋषि को पुराणों का ज्ञान मनुष्यों में प्रसारित करने का आदेश दिया था। पुलत्स्य के पुत्र विश्रवा ऋषि हुए, जो हविर्भू के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। विश्रवा ऋषि की एक पत्नी इलबिड़ा से कुबेर और कैकसी के गर्भ से रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा पैदा हुए थे। सुमाली विश्रवा के श्वसुर व रावण के नाना थे। विश्रवा की एक पत्नी माया भी थी, जिससे खर, दूषण और त्रिशिरा पैदा हुए थे और जिनका उल्लेख तुलसी की रामचरितमानस में मिलता है। *दो पौराणिक संदर्भ रावण की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए जरूरी हैं। एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के दर्शन हेतु सनक, सनंदन आदि ऋषि बैकुंठ पधारे परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें प्रवेश देने से इंकार कर दिया। ऋषिगण अप्रसन्न हो गए और क्रोध में आकर जय-विजय को शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो जाओ। जय-विजय ने प्रार्थना की व अपराध के लिए क्षमा माँगी। भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से क्षमा करने को कहा। तब ऋषियों ने अपने शाप की तीव्रता कम की और कहा कि तीन जन्मों तक तो तुम्हें राक्षस योनि में रहना पड़ेगा और उसके बाद तुम पुनः इस पद पर प्रतिष्ठित हो सकोगे। इसके साथ एक और शर्त थी कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी स्वरूप के हाथों तुम्हारा मरना अनिवार्य होगा। *यह शाप राक्षसराज, लंकापति, दशानन रावण के जन्म की आदि गाथा है। भगवान विष्णु के ये द्वारपाल पहले जन्म में हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु राक्षसों के रूप में जन्मे। हिरण्याक्ष राक्षस बहुत शक्तिशाली था और उसने पृथ्वी को उठाकर पाताललोक में पहुँचा दिया था। पृथ्वी की पवित्रता बहाल करने के लिए भगवान विष्णु को वराह अवतार धारण करना पड़ा था। फिर विष्णु ने हिरण्याक्ष का वधकर पृथ्वी को मुक्त कराया था। हिरण्यकशिपु भी ताकतवर राक्षस था और उसने वरदान प्राप्तकर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया था। *भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष का वध करनेकी वजह से हिरण्यकशिपु विष्णु विरोधी था और अपने विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद को मरवाने के लिए भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फिर भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकशिपु का वध किया था। खंभे से नृसिंह भगवान का प्रकट होना ईश्वर की शाश्वत, सर्वव्यापी उपस्थिति का ही प्रमाण है। *त्रेतायुग में ये दोनों भाई रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए और तीसरे जन्म में द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, तब ये दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे। इन दोनों का ही वध भगवान श्रीकृष्ण के हाथों हुआ। त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों से सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई थी। रावण का अत्यंत विकराल स्वरूप था और वह स्वभाव से क्रूर था। उसने सिद्धियों की प्राप्ति हेतु अनेक वर्षों तक तप किया और यहाँ तक कि उसने अपने सिर अग्नि में भेंट कर दिए। ब्रह्मा ने प्रसन्ना होकर रावण को वर दिया कि दैत्य, दानव, यक्ष, कोई भी तुम्हें परास्त नहीं कर सकेगा, परंतु इसमें 'नर' और 'वानर' को शुमार नहीं किया गया था। इसलिए नर रूप में भगवान श्रीराम ने जन्म लिया, जिन्होंने वानरों की सहायता से लंका पर आक्रमण किया और रावण तथा उसके कुल का विनाश हुआ। प्रकांड पंडित एवं ज्ञाता होने के नाते रावण संभवतः यह जानता था कि श्रीराम के रूप में भगवान विष्णु का अवतार हुआ है। छल से वैदेही का हरण करने के बावजूद उसने सीता को महल की अपेक्षा अशोक वाटिका में रखा था क्योंकि एक अप्सरा रंभा का शाप उसे हमेशा याद रहता था कि 'रावण, यदि कभी तुमने बलात्कार करने का प्रयास भी किया तो तुम्हारा सिर कट जाएगा।' खर, दूषण और त्रिशिरा की मृत्यु के बाद रावण को पूर्ण रूप से अवगत हो गया था कि वे 'मेरे जैसे बलशाली पुरुष थे, जिन्हें भगवान के अतिरिक्त और कोई नहीं मार सकता था। 'रावण एक विचारक व दार्शनिक पुरुष था। वह आश्वस्त था कि यदि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भगवान हैं तो उनके हाथों मरकर उनके लोक में जाना उत्तम है और यदि वे मानव हैं तो उन्हें परास्त कर सांसारिक यश प्राप्त करना भी उचित है। अंततः रावण का परास्त होना इस बात काशाश्वत प्रमाण है कि बुराइयों के कितने ही सिर हों, कितने ही रूप हों, सत्य की सदैव विजय होती है। विजयादशमी को सत्य की असत्य पर विजय के रूप में देखा जाता है। कहते हैं कि भगवान श्रीराम ने त्रेतायुग में नवरात्रि का व्रत करने के बाद ही रावण का वध किया था। पुलत्स्य ऋषि के उत्कृष्ट कुल में जन्म लेने के बावजूद रावण का पराभव और अधोगति के अनेक कारणों में मुख्य रूप से दैविक एवं मायिक कारणों का उल्लेख किया जाता है। दैविक एवं प्रारब्ध से संबंधित कारणों में उन शापों की चर्चा की जाती है जिनकी वजह से उन्हें राक्षस योनि में पैदा होना पड़ा। मायिक स्तर पर शक्तियों के दुरुपयोग ने उनके तपस्या से अर्जित ज्ञान को नष्ट कर दिया था। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद अशुद्ध, राक्षसी आचरण ने उन्हें पूरी तरह सराबोर कर दिया था और हनुमानजी को अपने समक्ष पाकर भी रावण उन्हें पहचाननहीं सका था कि ये उसके आराध्य देव शिव के अवतार हैं। रावण के अहंकारी स्वरूप से यह शिक्षा मिलती है कि शक्तियों के नशे में चूर होने से विनाश का मार्ग प्रशस्त होता है। भक्त के लिए विनयशील, अहंकाररहित होना प्राथमिक आवश्यकता है *स्रोत:- पुराणों से* ******************* *इँसान के लिए दो ही चीजें अहम हैं।* *ईश्वर का डर* *और* *ईश्वर का दर* *ईश्वर का डर रहेगा तो इँसान गुनाहों से बचता रहेगा।* *ईश्वर का दर रहेगा तो उसकी रहमतें बरसती रहेंगी ।* 🌸🙏आप सभी भाई-बहनों को सपरिवार दशहरा के पावन पर्व की हार्दिक *शुभकामनाएँ 🙏🌸 🚩*अधर्म पर धर्म की विजय*🚩 🚩*असत्य पर सत्य की विजय*🚩 🚩*बुराई पर अच्छाई की विजय*🚩 🚩*पाप पर पुण्य की विजय*🚩 🚩*अत्याचार पर सदाचार की विजय*🚩 🚩*क्रोध पर दया, क्षमा की विजय*🚩 🚩*अज्ञान पर ज्ञान की विजय*🚩 🌸🙏रावण पर श्रीराम की विजय के प्रतीक पावन पर्व *विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायेँ🙏🌸

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simran Oct 25, 2020

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saroj singh Baghel Oct 25, 2020

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Neha Oct 25, 2020

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Ganesh jangid Oct 25, 2020

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*ॐ नमः शिवाय भाग/118 *🌹कालरात्रि की शुभकामनाएं* / *🌹गंगोलीहाट की कालिका माता* *🌹तू ही काली तू ही भद्रकाली सर्वस्वरुपा जय मां हाट काली🌹 गंगोलीहाट। /रमाकान्त पन्त/ महाविद्याओंकी जननी हाटकाली की महिमा अपरंपार है शैल पर्वत की इसी घाटी पर देवताओं ने मां काली की स्तुति करके उन्हें प्रसन्न किया कहा जाता है कि जिसने शैल पर्वत वासिनी कालिका का पूजन या दर्शन कर लिया उसका जीवन धन्य हो गया यही जयंती मंगला यही काली व यही *🌹भद्रकाली सहित सर्व रूप में सर्व स्वरुपा के नाम से जगत में विख्यात है दस महाविद्या में माता का प्रथम स्थान है इन्हें महाविद्या ओं की जननी भी कहा जाता है* जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट की सौन्दर्य से परिपूर्ण छटाओं के बीच यहां से लगभग 1 किमी दूरी पर स्थित अत्यन्त ही प्राचीन मां भगवती महाकाली का अद्भुत मंदिर है, जो धार्मिक दृष्टि और पौराणिक दृष्टि काफी महत्वपूर्ण है व आगन्तुकों का मन मोहने में पूर्णतया सक्षम है। स्कंदपुराण के मानस खंड में यहां स्थित देवी का विस्तार से वर्णन मिलता है। *🌹कई रहस्यमयी गाथाओं का साक्षी है यह मन्दिर* उत्तराखण्ड के लोगोंकी आस्था का केन्द्र महाकाली मंदिर अनेक रहस्यमयी कथाओं को अपने आप में समेटे हुए है। कहा जाता है कि जो भी भक्तजन श्रद्वापूर्वक महाकाली के चरणों में आराधना के श्रद्वापुष्प अर्पित करता है उसके रोग, शोक, दरिद्रता व महान विपदाओं का हरण हो जाता है व उसे अतुल ऐश्वर्य और सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। भक्तों के अनुसार यहां श्रद्वा एवं विनयता से की गई पूजा का विशेष महत्व है। इसलिये वर्ष भर यहां बड़ी संख्या में श्रद्वालओं का आवागमन लगा रहता है। तथा यहां पधारनें वाले भक्तजन बड़े ही भक्ति भाव से बताते हैं कि किस प्रकार माता महाकालिका ने उनकी मनौती पूर्ण की। *🌹यहां पहुंचकर धंन्य हुए शंकंराचार्य* महाकालिका की अलौकिक महिमा के पास आकर ही जगतगुरू शंकराचार्य ने स्वयं को धन्य माना और मां के प्रति अपनी आस्था के श्रद्वापुष्प हुए कहा कि शक्ति ही शिव है। लोगों की आस्था का प्रतीक उत्तराखण्ड के प्रसिद्व कवि पं. लोकरत्न गुमानी ने कहा है कि यहां माता विशेष परिस्थितियों में गंभीर व भयानक रूप धरण करती हैं। श्री महाकाली का यह मंदिर उत्तराखण्ड के लोगों की आस्था का प्रतीक है। सुबह शाम जब माँ की आरती की जाती है। तो वातावरण अद्भूत हो जाता है। प्रातः काल से ही यहां भक्तजनोंका तांता लगना शुरू होता जाता है। सुंदरता से भरपूर इस मंदिर के एक ओर हरा भरा देवदार का आच्छादित घना जंगल है। जो बड़ा ही मनभावन है विशेष रूप से नवरात्रियों व चैत्र मास की अष्टमी को महाकाली भक्तों का यहां पर विशाल तांता लगा रहता है। *🌹कभी आवाज सुनने पर हो जाती थी मौत* आदि शक्ति महाकाली का यह मंदिर ऐतिहासिक, पौराणिक मान्यताओं सहित अद्भुत चमत्कारिक किवदंतियों व गाथाओं को अपने आप में समेटे हुए है। कहा जाता है कि महिषासुर व चण्डमुण्ड सहित तमाम भयंकर शुम्भ निशुम्भ आदि राक्षसों का वध करने के बाद भी महाकाली का यह रौद्र रूप शांत नहीं हुआ और इस रूप ने महाविकराल धधकती महाभयानक ज्वाला का रूप धारण कर तांडव मचा दिया था। कहते है कि महाकाली ने महाकाल का भयंकर रूप धारण कर देवदार के वृक्ष में चढ़कर जागनाथ व भुवनेश्वर नाथ को आवाज लगानी शुरू कर दी। यह आवाज जिस किसी के कान में पड़ती थी वह व्यक्ति सुबह तक यमलोक पहुंच चुका होता था। बाद में आदि जगत गुरू शंकराचार्य जब अपने भारत भ्रमण के दौरान जागेश्वर आये तो शिव प्रेरणा से उनके मन में यहां आने की इच्छा जागृत हुई, लेकिन जब वे यहां पहुंचे तो नरबलि की बात सुनकर उद्वेलित शंकराचार्य ने इस दैवीय स्थल की सत्ता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और शक्ति के दर्शन करने से भी वे विमुख हो गए। मान्यता के अनुसार लेकिन जब विश्राम के उपरान्त शंकराचार्य ने देवी जगदम्बा की माया से मोहित होकर मंदिर शक्ति परिसर में जाने की इच्छा प्रकट की तो मंदिर शक्ति स्थल पर पहुंचने से ही कुछ दूर पूर्व तक ही स्थित प्राकृतिक रूप से निर्मित गणेश मूर्ति से आगे वे नहीं बढ़ पाये और अचेत होकर इस स्थान पर गिर पड़े व कई दिनों तक यही पड़े रहे उनकी आवाज भी अब बंद हो चुकी थी। अपने अंहभाव व कटु वचन के लिए जगत गुरू शंकराचार्य को अब अत्यधिक पश्चाताप हो रहा था। पश्चाताप प्रकट करने व अन्तर्मन से माता से क्षमा याचना के पश्चात मां भगवती की अलौकिक आभा का उन्हें आभास हुआ। *🌹पूजन की परम्परा को नया स्वरुप दे गये शकंराचार्य* चेतन अवस्था में लौटने पर उन्होंने महाकाली से वरदान स्वरूप प्राप्त मंत्र शक्ति व योगसाधना के बल पर शक्ति के दर्शन किए और महाकाली के रौद्रमय रूप को शांत किया तथा मंत्रोचार के द्वारा लोहे के सात बड़े-बड़े भदेलों से शक्ति को कीलनं कर प्रतिष्ठापित किया। अष्टदल व कमल से मढवायी गयी इस शक्ति की ही पूजा अर्चना वर्तमान समय में यहां पर होती है। पौराणिक काल में प्रचलित नरबली के स्थान पर नारियल चढ़ानें की प्रथा अब यहां प्रचलित है। *🌹चमत्कारों का शाक्षी* चमत्कारों से भरे इस महामाया भगवती के दरबार में सहस्त्रचण्डी यज्ञ, सहस्रघट पूजा, शतचंडी महायज्ञ, का पूजन समय-समय पर आयोजित होता है। यही एक ऐसा दरबार है। जहां अमावस्या हो चाहे पूर्णिमा सब दिन हवन यज्ञ आयोजित होते हैं। मंदिर में अर्धरात्रि में भोग चैत्र और अश्विन मास की महाष्टमी को पिपलेत गांव के पंत उपजाति के ब्राह्मणों द्वारा लगाया जाता है। इस कालिका मंदिर के पुजारी स्थानीय गांव निवासी रावल उपजाति के लोग हैं। सरयू एवं रामगंगा के मध्य गंगावली की सुनहरी घाटी में स्थित भगवती के इस आराध्य स्थल की बनावट त्रिभुजाकार बतायी जाती है और यही त्रिभुज तंत्र शास्त्र के अनुसार माता का साक्षात् यंत्र है। यहां धनहीन धन की इच्छा से, पुत्रहीन पुत्र की इच्छा से, सम्पत्तिहीन सम्पत्ति की इच्छा से सांसारिक मायाजाल से विरक्त लोग मुक्ति की इच्छा से आते हैं व अपनी मनोकामना पूर्ण पाते हैं। *🌹मंदिर के निर्माण की कथा भी बड़ी चमत्कारिक रही है* महामाया की प्रेरणा से प्रयाग में होने वाले कुम्भ मेले में से नागा पंथ के महात्मा जंगम बाबा जिन्हें स्वप्न में कई बार इस शक्ति पीठ के दर्शन होते थे। उन्होंने रूद्र दन्त पंत के साथ यहां आकर भगवती के लिए मंदिर निर्माण का कार्य शुरू किया। परन्तु उनके आगे मंदिर निर्माण के लिये पत्थरों की समस्या आन पडी। इसी चिंता में एक रात्रि वे अपने शिष्यों के साथ अपनी धूनी के पास बैठकर विचार कर रहे थे। कोई रास्ता नजर न आने पर थके व निढाल बाबा सोचते-सोचते शिष्यों सहित गहरी निद्रा में सो गये तथा स्वप्न में उन्हें महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती रूपी तीन कन्याओं के दर्शन हुए वे दिव्य मुस्कान के साथ बाबा को स्वप्न में ही अपने साथ उस स्थान पर ले गयी जहां पत्थरों का खजाना था। यह स्थान महाकाली मंदिर के निकट देवदार वृक्षोंके बीच घना वन था। इस स्वप्न को देखते ही बाबा की नींद भंग हुई उन्होंने सभी शिष्यों को जगाया स्वप्न का वर्णन कर रातों-रात चीड की लकड़ी की मशालें तैयार की तथा पूरा शिष्य समुदाय उस स्थान की ओर चल पड़ा, जिसे बाबा ने स्वप्न में देखा था। वहां पहुंचकर रात्रि में ही खुदाई का कार्य आरम्भ किया गया थोडी ही खुदान के बाद यहां संगमरमर से भी बेहतर पत्थरों की खान निकल आयी। कहते हैं कि पूरा मंदिर, भोग भवन, शिवमंदिर, धर्मशाला वं मंदिर परिसर का व प्रवेश द्वारों का निर्माण होने के बाद पत्थर की खान स्वत: ही समाप्त हो गयी। आश्चर्य की बात तो यह है इस खान में नौ फिट से भी लम्बे तराशे हुए पत्थर मिले। महाकाली के संदर्भ में एक प्रसिद्व किवदन्ति है कि कालिका का जब रात में डोला चलता है तो इस डोले के साथ कालिका के गण आंण व बांण की सेना भी चलती हैं। कहते है यदि कोई व्यक्ति इस डोले को छू ले तो दिव्य वरदान का भागी बनता है। *🌹रोज विश्राम करनें आती है कालिका* महाआरती के बाद शक्ति के पास महाकाली का बिस्तर लगाया जाता है और सुबह बिस्तर यह दर्शाता है कि मानों यहां साक्षात् कालिका विश्राम करके गयी हों क्योंकि विस्तर में सलवटें पड़ी रहती हैं। मां काली के प्रति उनके तमाम किस्से आज भी क्षेत्र में सुने जाते है भगवती महाकाली का यह दरबार असंख्य चमत्कार व किवदन्तियों से भरा पड़ा है**🌹सेना की है गहरी आस्था* गंगोलीहाट में स्थित 'माँ कालिका मंदिर' जिसे पूरे कुमाऊँ क्षेत्र सहित भारतीय फौज की एक शाखा कुमाऊ रेजीमेंट की आस्था और विश्वास का केंद्र भी कहा जाता है, जो विश्वभर में प्रसिद्ध है। हाट कालिका माता के इस पावन मंदिर को भगवती माता मंदिर, हाट दरबार, महाकाली शक्तिपीठ आदि नामो से भी जाना जाता है। कुमाऊ रेजीमेंट का हाट कालिका से जुड़ाव द्वितीय विश्वयुद्ध (1939 से 1945) के दौरान हुआ। बताया जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बंगाल की खाड़ी में भारतीय सेना का जहाज डूबने लगा। तब सैन्य अधिकारियों ने जहाज में सवार सैनिकों से अपने-अपने ईष्ट की आराधना करने को कहा। कुमाऊ के सैनिकों ने जैसे ही हाट काली का जयकारा लगाया तो जहाज किनारे लग गया। इस वाकये के बाद कुमाऊ रेजीमेंट ने मां काली को अपनी आराध्य देवी की मान्यता दे दी। जब भी कुमाऊ रेजीमेंट के जवान युद्ध के लिए रवाना होते हैं तो कालिका माता की जै के नारों के साथ आगे बढ़ते हैं। सेना की विजयगाथा में हाट कालिका के नाम से विख्यात गंगोलीहाट के महाकाली मंदिर का भी गहरा नाता रहा है। 1971 की लड़ाई समाप्त होने के बाद कुमाऊ रेजीमेंट ने हाट कालिका के मंदिर में महाकाली की मूर्ति चढ़ाई थी। यह मंदिर में स्थापित पहली मूर्ति थी। हाट कालिका के मंदिर में शक्ति पूजा का विधान है। सेना द्वारा स्थापित यह मूर्ति मंदिर की पहली मूर्ति थी। इसके बाद 1994 में कुमाऊं रेजीमेंट ने ही मंदिर में महाकाली की बड़ी मूर्ति चढ़ाई। इन मूर्तियों को आज भी शक्तिस्थल के पास देखा जा सकता है। हाट कालिका की पूजा के लिए सालभर सैन्य अफसरों और जवानों का तांता लगा रहता है।////@ रमाकान्त पन्त///

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