🙏🕉️कृपया एक बार विचार अवश्य करें🕉️🙏 सत्य बोलने मे श्रेष्ठ और महान कार्य करने मे कष्ट के पांच चरण आते है उत्साह गिराने वाले निंदा करने वाले आलोचना करने वाले उपहास उड़ाने वाले विरोध करने वाले जो मनुष्य इन पांच परिस्थिति मे बिना विचलित हुए अडि़ग रहते हुए दृढनिश्चयी , दूरदर्शी , पारदर्शी व ईश्वर पर विश्वास रखने वाला होता है उसकी विजय निश्चित होती है क्योकि सत्य परेशान हो सकता हैं पर पराजित नही ऐसे ही अवतारी युगपुरुष , महापुरुष को ही लोग भ्रम वश भगवान के समान मानने लगते है और उन्हे ईश्वर का अवतार मानकर उनके अनुयायी बन जाते है "जिंदा" जिस्म की कोई "अहमियत" नही ... "मजार" बन जाने दो "मेले" लगा करेगे ..... ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसता है अपने मन को मंदिर बनाए नित्य प्रभु के दर्शन पाए कृपया सत्य का अनुशरण अवश्य करें 🙏🙏🙏भागो नही , जागो तुम 🙏🙏🙏 🙏🙏🙏🙏 संगठित हो। 🙏🙏🙏🙏 🇳🇵🇳🇵🇳🇵 शशांक आर्य शैंकी 🇳🇵🇳🇵🇳🇵

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कामेंट्स

Queen Mar 28, 2019
🌺 Jai shree radhe radhe krishna bhai Ji Good night Ji 🌺

Malkhan Singh Mar 28, 2019
************************* *॥हरि ॐ॥*ऊँ साईं राम जीII* *श्री कृष्ण गोविँद हरे मुरारे* *हे नाथ नारायण वासुदेव* *॥जय श्री राम॥*राधे राधे जी* *सपरिवार आपकी रात्रि शुभ हो* *🌹🙏सादर नमन सा🙏🌹* *************************

kavita Mar 28, 2019
ओम् नमः शिवाय हर हर महादेव 🙏

Malkhan Singh Mar 29, 2019
* *🌲🙏🏼जय माता दी🙏🏼🌲* *जगत जननी श्री माँ आदिशक्ति महामाया महालक्ष्मी वीणापाणि माँ सरस्वती की अद्भुत कृपा आप एवं आपके परिवार पर सदैव बनी रहे* *🌼🙏राम राम जी🙏🌼*

bhavisha Mar 29, 2019
🕉️नमः शिवाय 🙏

sanvi Attar Mar 31, 2019
right and very nice post jai shri Krishna ji have a beautiful life

Sandhya Nagar Apr 2, 2019
उद्धव जी जब कान्हा की चिट्ठियाँ लेकर जब बृज में आये,, तो नंद बाबा से जब मिले तो रात को विश्राम करने के वक्त कान्हा जी की चर्चा चल रही थी तभी नंद बाबा, जी का गला रूंधने लगा और वो अचानक मौन हो गये और अपना सिर तकिया में रखा उनकी आँखों से कान्हा के प्रेम के ऐसे अश्रु निकले की,, तकिया, कपड़े, सब आँसुओं से तर बतर हो गये, और आँसुओं की धारा नंद भवन के आँगन में नदी बनकर बहने लगी 🙌🏻🌺🙏🏻 पीछे दरवाजे की ओट में खड़ी यशोदा जी, जो उद्धव के मुख से कान्हा की बातें सुन रही थीं उनके सुंदर नयनों से भी आँसूओं की धारा बह रही थी हरि के लिये इतनी व्याकुलता हरि के बारे में सुनने के लिये इतनी तड़प,, ये तभी होगा जब हम हरि से सचमुच प्रेम करेंगे अपनेसुख का माध्यम नहीं 💝🙏🏻

Vinod Agrawal Apr 5, 2019
🌷Jai Mata Di Jai Maa Ambey Maharani Jai Maa Mahalaxmi Ji Jai Shree Radhe Krishna🌷

Sandhya Nagar Apr 5, 2019
उद्धव और गोपी के संवाद की कथा उद्धव भगवान श्री कृष्ण के परम् मित्र और उनके चाचा के पुत्र हैं। ये बड़े ज्ञानी हैं। ज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव जैसे ज्ञानी को भक्ति का उपदेश देने के लिए ब्रज में भेजा। वहां पर उद्धव और गोपियों का बड़ा ही सुंदर संवाद हुआ है।गोपियों का ये 8 प्रेम योग हैं ..गोपियां बोली —- 1. सुबह जागकर हम गायों का दूध दोहन करती हैं ..वो हमारा पहला योग है ..जो गाय दोहता है ..उसकी निर्विकल्प स्थिती बहुत आती है ..उसके विचार कम हो जाते हैं। 2. दधी मंथन -यहाँ साधना को कितना सरल कर दिया है ..दधी मंथन करके छाछ बनाना ..ये अगर किया होता ना तो अभी जो machine पर चलना पड़ता है ना वो चलना नहीं पड़ता ..बहनें ..कुछ काम ना करना हो ..शरीर पुष्ट बन जाये..सबकी बुराई ही करनी..यही काम ..और फिर machine पर चलना …पट्टा हिले और हम चलें ..फिर speed बढाये ..मुझे ये सब funny लगता है। 3. धान्य कूटना ..जिसने जिसने धान्य कूटा है उसको दूसरी exercise नहीं करनी पड़ी। 4. आंगन साफ करना ..ये भी एक योग है। 5. गायों को घास चरने भेजना और फिर जब वो वापिस आयें तब मेरे बाप ..मेरे बाप ..करके उनको वापिस बांधना। 6. घर में जो बूढे हो उनको खाना खिलाना यानी उनका ध्यान रखना ..उनका बिस्तर लगा देना ..उनके सिरहाने पानी का लोटा भरकर रखना ..ये सब योग साधना है। 7. छोटे छोटे बच्चों को सुलाते सुलाते पालने में ..लोरी सुनाना ..इसको भी योग कहा है। 8. घर की माँ होती है ना ..व्रजांगना ..वो सभी को सुलाकर ..पूरा दिन उसको हरि भजने का समय ही ना मिले ..उसका भजन ही ये..उसका योग ही ये..उसको कुछ special करना ही ना पड़े ..लेकिन फिर भी बच्चों को सुला दे..उनको ओढ़ा दे..सबका करे ..और फिर रात को ऐसे बैठे ..तब किसीको पता ना चले ..ऐसे जहाँ जगह मिले वहाँ बैठकर ..और छोटी सी माला लेकर ..हरि का नाम बोलते बोलते ..रोये …ये आँठवा योग है साहब ..

Tarlok Apr 21, 2019

शुक्र है मालिक तेरा, शुक्र है,शुक्र है। एक बार एक संत ने अपने दो भक्तों को बुलाया और कहा आप को यहाँ से पचास कोस जाना है एक भक्त को एक बोरी खाने के समान से भर कर दी और कहा जो भी रास्ते मे मिले उसे ये बांटते चलें और एक को ख़ाली बोरी दी उससे कहा रास्ते मे जो उसे अच्छा मिले उसे बोरी मे भर कर ले जाए दोनो निकल पड़े जिसके कंधे पर सामान था वो धीरे चल पा रहा था ख़ाली बोरी वाला भक्त आराम से जा रहा था थोड़ी दूर उसको एक सोने की ईंट मिली उसने उसे बोरी मे डाल लिया थोड़ी दूर चला फिर ईंट मिली उसे भी उठा लिया जैसे जैसे चलता गया उसे सोना मिलता गया और वो बोरी मे भरता हुआ चल रहा था और बोरी का वज़न। बढता गया उसका चलना मुश्किल होता गया और साँस भी चढ़ने लग गई एक एक क़दम मुश्किल होता गया दूसरा भक्त जैसे जैसे चलता गया रास्ते मै जो भी मिलता उसको बोरी मे से खाने का कुछ समान दे देता धीरे धीरे बोरी का वज़न कम होता गया और उसका चलना आसान होता गया। जो बाँटता गया उसका मंज़िल तक पहुँचना आसान होता गया जो इक्ट्ठा करता रहा वो रास्ते मे ही दम तोड़ गया दिल से सोचना हमने जीवन मे क्या बाँटा और क्या इकट्ठा किया हम मंज़िल तक कैसे पहुँच पाएँगे । जिन्दगी का कडवा सच... आप को 60 साल की उम्र के बाद कोई यह नहीं पूछेंगा कि आप का बैंक बैलेन्स कितना है या आप के पास कितनी गाड़ियाँ हैं.... दो ही प्रश्न पूछे जाएंगे ... 1- आप का स्वास्थ्य कैसा है ? और 2-आप के बच्चे क्या करते हैं ? ऐ मेरे मलिक !!! आशीर्वाद की वर्षा करते रहो, खाली झोलियां सबकी भरते रहो। तेरे चरणों में सर को झुका ही दिया है, गुनाहों की माफ़ी ऒर दुःखों को दूर करते रहो।। 🙏शुक्र है मालिक तेरा, शुक्र है,शुक्र है।🙏

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Tarlok Apr 21, 2019

दान केसे करना चाहीये। *रहीम एक बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी नज़रें नीचे झुका लेते थे।* *ये बात सभी को अजीब लगती थी कि ये रहीम कैसे दानवीर हैं। ये दान भी देते हैं और इन्हें शर्म भी आती है।* *ये बात जब तुलसीदासजी तक पहुँची तो उन्होंने रहीम को चार पंक्तियाँ लिख भेजीं जिसमें लिखा था* - *ऐसी देनी देन जु* *कित सीखे हो सेन।* *ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ* *त्यों त्यों नीचे नैन।।* *इसका मतलब था कि रहीम तुम ऐसा दान देना कहाँ से सीखे हो? जैसे जैसे तुम्हारे हाथ ऊपर उठते हैं वैसे वैसे तुम्हारी नज़रें तुम्हारे नैन नीचे क्यूँ झुक जाते हैं?* *रहीम ने इसके बदले में जो जवाब दिया वो जवाब इतना गजब का था कि जिसने भी सुना वो रहीम का कायल हो गया।* *इतना प्यारा जवाब आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया।* *रहीम ने जवाब में लिखा* - *देनहार कोई और है* *भेजत जो दिन रैन।* *लोग भरम हम पर करैं* *तासौं नीचे नैन।।* *मतलब, देने वाला तो कोई और है वो मालिक है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है। परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ रहीम दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती हैं।* 🙏🏻

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Tarlok Apr 21, 2019

परोपकार की इंटै। एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे ।वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी *”आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं।“* आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया। ऋषिवर बोले , *"प्रिय शिष्यों ,आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है ,मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें। यह एक बाधा दौड़ होगी इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा,तो क्या आप सब तैयार हैं ?”* *”जी हाँ, हम तैयार हैं ”* शिष्य एक स्वर में बोले । दौड़ शुरू हुई ,सभी तेजी से भागने लगे । वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे । वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह – जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था। सभी असमंजस में पड़ गए , जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे वहीँ अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे ; खैर , सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए। *“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों ?”*, ऋषिवर ने प्रश्न किया। यह सुनकर एक शिष्य बोला , *“गुरुजी , हम सभी लगभग साथ –साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी …कोई दूसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था …और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा -उठा कर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े…. इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की ।”* *“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ “*, ऋषिवर ने आदेश दिया । आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे, पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे । सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे । ऋषिवर बोले, *“दरअसल इन्हे मैंने ही उस सुरंग में डाला था , और यह दूसरों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।"* *पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम -भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है । पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागम -भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है।* *अतः यहाँ से जाते -जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना कभी ना भूलें, अंततः वही आपकी सबसे अनमोल जमा-पूँजी होगी। “*

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*"मैं न होता तो क्या होता”* अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्हों ने देखा मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये। वे सोचने लगे। यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो सीता जी को कौन बचाता??? बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मै न होता तो क्या होता ? परन्तु ये क्या हुआ सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं। आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है की उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है। अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा। जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है। आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है ! इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि... *मै न होता तो क्या होता*

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