सुदर्शन चक

सुदर्शन चक

आखिर क्या है ? सुदर्शन चक्र, जानिए पूरी कहानी

सुदर्शन चक्र भगवन #विष्णु का शस्त्र है| यह चक्र एक ऐसा अस्त्र है ,जो चलाने के बाद अपने लक्ष्य पर पहुंच कर वापस आ जाता है| यानि यह चक्र कभी नष्ट नहीं होता|

इस चक्र की उत्पत्ति की कई कहानियां सुनने को मिलती हैं| कुछ लोगों का मानना है ,कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, बृहस्पति ने अपनी ऊर्जा एकत्रित कर के इस की उत्पत्ति की है|

यह भी माना जाता है ,कि यह चक्र भगवान विष्णु ने भगवान शिव की आराधना कर के प्राप्त किया है|

लोगों का मानना यह भी है कि महाभारत काल में अग्निदेव ने श्री कृष्ण को यह चक्र दिया था ! जिस से अनेकों का संहार हुआ था !

सुदर्शन दो शब्दों से जुड़ क्र बना है, सु यानि शुभ और दर्शन | चक्र शब्द चरुहु और करूहु शब्दों के मेल से बना है, जिस का अर्थ है गति (हमेशा चलने वाला)|

यह चांदी की शलाकाओं से निर्मित था। इस की ऊपरी और निचली सतहों पर लौह शूल लगे हुए थे। इस में अत्यंत विषैले किस्म के विष का उपयोग किया गया था।

सुदर्शन चक्र से जुडी एक कहानी यह भी है ,कि इस का निर्माण विश्वकर्मा के द्वारा किया गया है|

विश्वकर्मा ने अपनी पुत्री संजना का विवाह सूर्य देव के साथ किया ! परन्तु संजना सूर्य देव की रोशनी तथा गर्मी के कारण उन के समीप ना जा सकी| यह बात जब विश्वकर्मा को पता चली तब उन्होंने सूर्य की चमक को थोड़ा कम कर दिया और सूर्य की बाकि बची ऊर्जा से त्रिशूल, पुष्पक विमान तथा सुदर्शन चक्र का निर्माण किया|

सुदर्शन चक्र शत्रु पर गिराया नहीं जाता यह प्रहार करने वाले की इच्छा शक्ति से भेजा जाता है| यह चक्र किसी भी चीज़ को समाप्त करने की क्षमता रखता है|

माना जाता है ,कि कृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत को सुदर्शन चक्र की सहायता से उठाया था| श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल सूर्यास्त दिखने के लिया किया था ! जिसकी मदद से जयद्रथ का वध अर्जुन द्वारा हो पाया|

सब कुछ अच्छा न होने पर भी क्यो कही जाती है ! ये कहावत !

इस चक्र ने देवी सती के शरीर के ५१ हिस्से कर भारत में जगह-जगह बिखेर दिए और इन जगहों को शक्ति-पीठ के नाम से जाना जाता है|

यह तब हुआ जब देवी सती ने अपने पिता के घर हो रहे यग्न में खुद को अग्नि में जला लिया| तब भगवान शिव शोक में आकर सती के प्राण-रहित शरीर को उठाए घूमते रहे|

सुदर्शन चक्र की हिन्दू धर्म में बहुत मान्यता है ,जैसे वक़्त, सूर्य और ज़िंदगी कभी रूकती नहीं हैं ,वैसे ही इस का भी कोई अंत नहीं कर सकता| यह परम्-सत्य का प्रतीक है|

हमारे शरीर में भी कई तरह के चक्र मौजूद है ! जिस में अत्यंत ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति उत्पन्न करने की क्षमता है| योग उपनिषद् में सहस्रार चक्र के आलावा ६ चक्र और हैं- मूलधारा, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विसुद्धा और अजना|

श्री मंदिर के रत्न सिंहासन के ४ देवताओं को चतुर्द्धामूर्थी कहा जाता जिन में सुदर्शन चक्र को भी देव माना गया है|

सुदर्शन चक्र को यहां एक खम्बे के जैसे दर्शाया गया है| इन्हें ऊर्जा और शक्ति का देवता कहा जाता है|
तमिल में सुदर्शन चक्र कोचक्रथ अझवार भी कहा जाता है| थाईलैंड की सत्ता का नाम भी इसी चक्र के नाम पर रखा गया है , जिसे चक्री डायनेस्टी कहा जाता है !
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कामेंट्स

राम कुमार रेवाड़ Aug 13, 2017
नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण

राजेंद्र अवस्थी Aug 13, 2017
भैयाजी कृपया ये बताएँ कि सती के शरीर के 51 टुकड़े सुदर्शनचक्र से हुए और वो भारत मे जहाँ जहाँ गिरे वहाँ आज शक्तिपीठ स्थापित हैं.. तो सारे टुकड़े भारत में ही क्यों गिरे किसी अन्य देश में क्यो नही गिरे!!?

MAHESH MALHOTRA May 26, 2019

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १३.२४ . प्रश्न १ : ज्ञान अर्जित करने का मुख्य लक्ष्य क्या है ? मनुष्य किस प्रकार अपनी आध्यात्मिक चेतना को प्राप्त कर सकता है ? . उत्तर १ : "ज्ञान यह समझने के लिए है कि दैवयोग से जीव इस संसार में आ गिरा है । उसे प्रामाणिक व्यक्तियों, साधु-पुरुषों तथा गुरु की संगति में निजी प्रयास द्वारा अपनी स्थिति समझनी है, और तब जिस रूप में भगवान् ने भगवद्गीता कही है, उसे समझ कर आध्यात्मिक चेतना या कृष्णभावनामृत को प्राप्त करना है । तब यह निश्चित है कि वह संसार में फिर कभी नहीं आ सकेगा, वह सच्चिदानन्दमय जीवन बिताने के लिए वैकुण्ठ-लोक भेज दिया जायेगा ।" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १३.२४, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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वैकुण्ठेश्वर विष्णु कूर्मावतार: विशेष दशावतार इति जीवन चक्र आधार..🐢🐢🐢 भगवान #विष्णु के #कूर्म अवतार को '#कच्छप अवतार' कछुआ अवतार भी कहते हैं। पौराणिकता के प्रसिद्ध प्रमाणों में कूर्म अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्रमंथन के समय मंदार पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदर पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एंव असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नोंकी प्राप्ति की और इसी समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था। कूर्म अवतार संबंधित मतों में भिन्नताऐं: #नरसिंहपुराण के अनुसार कूर्मावतार द्वितीय अवतार है जबकि #भागवतपुराण के अनुसार ग्यारहवाँ अवतार। शतपथ ब्राह्मण, महाभारत तथा #पद्मपुराण में उल्लेख है कि #संतति प्रजनन हेतु प्रजापति, कच्छप का रूप धारण कर पानी में संचरण करते हैं। #लिंगपुराण के अनुसार पृथ्वी रसातल को जा रही थी, तब विष्णु ने कच्छपरूप में अवतार लिया। उक्त कच्छप की पीठ का घेरा एक लाख योजन था। पद्मपुराण में वर्णन हैं कि इंद्र ने दुर्वासा द्वारा प्रदत्त पारिजातक माला का अपमान किया तो कुपित होकर दुर्वासा ने शाप दिया, तुम्हारा वैभव नष्ट होगा। परिणामस्वरूप लक्ष्मी समुद्र में लुप्त हो गई। पश्चात् विष्णु के आदेशानुसार देवताओं तथा दैत्यों ने लक्ष्मी को पुन: प्राप्त करने के लिए मंदराचल की मथानी तथा वासुकी की डोर बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया। मंथन करते समय मंदराचल रसातल को जाने लगा तो विष्णु ने कच्छप के रूप में अपनी पीठ पर धारण किया और देवदानवों ने समुद्र से अमृत एवं लक्ष्मी सहित १४ रत्नों की प्राप्ति करके पूर्ववत् वैभव संपादित किया। एकादशी का उपवास लोक में कच्छपावतार के बाद ही प्रचलित हुआ। कूर्मपुराण में विष्णु ने अपने कच्छपावतार में ऋषियों से जीवन के चार लक्ष्यों (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) की वर्णन किया था। कूर्म अवतार की पद्म पुराण कथा : देवराज इंद्र के शौर्य को देख ऋषि दुर्वासा नें उन्हें पारिजात पुष्प की माला भेंट की परंतु इंद्र नें इसे ग्रहण न करते हुए ऐरावत को पहना दिया और ऐरावत नें उसे भूमि पर फेंक दिया, दुर्वासा ने इससे क्रोधित होकर देवताओं को श्राप दे दिया, इनके देवताओं पर अभिशाप के कारण, देवताओं ने अपनी शक्ति खो दी। इससे अत्यंत निराश होकर वे ब्रह्मा के पास मार्गदर्शन के लिए पहुँचे। उन्होंने देवताओं को भगवान विष्णु से संपर्क करने को कहा। विष्णु ने उन्हें यह सलाह दी कि वे क्षीर समुद्र का मंथन करें जिससे अमृत मिलेगी। इस अमृत को पीने से देवों की शक्ती वापस आ जाएगी अौर वे सदा के लिए अमर हो जाएँगे। इस विशाल कार्य को मन्दर पर्वत और वासुकी(साँप के राजा) के सहारे से ही किया जा सकता था, जहाँ पर्वत को मथिनी का डंडा और वासुकी को रस्सी के समान उपयोग किया गया। इस कार्य के लिए असुरों का भी सहारा अवश्यक था और इसके कारण सभी देवता आतंकित हो गए। लेकिन विष्णु ने उनको समझाया और असुर देवों के पूछ्ने पर उनकी मदद करने के लिए तैयार हो गए, अमृत के लालच में। वे समुद्र का मंथन करने लगे, जहाँ एक तरफ असुर थे और दुसरी तरफ देव थे। लेकिन इस मंथन करने से एक घातक जहर निकलने लगी जिससे घुटन होने लगी और सारी दुनिया पर खतरा आ गया। लेकिन भगवान महादेव बचाव के लिए आए और उस ज़हर का सेवन किया और अपने कंठ में उसे बरकरार रखा जिससे उनका नीलकंठ नाम पड़ा। मंथन जारी रहा लेकिन धीरे धीरे पर्वत डूबने लगा। तभी भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार (कछुआ) में अवतीर्ण हुए एक विशाल कछुए का अवतार लिया ताकि अपने पीट कर पहाड़ को उठा सकें। उस कछुए के पीठ का व्यास 100,000 योजन था। कामधेनु जैसे अन्य पुरस्कार समुद्र से प्रकट हुए औरे धन्वतरि अपने हाथो में अमृत कलश के साथ प्रकट हुए। इस प्रकार से भगवान का कूर्म अवतार हुआ। कूर्म उर्जा चक्र: सृष्टि विन्यास व स्थिरता का परिचायक कूर्म उर्जा चक्र का संबंध तंत्र विद्या से है, जिसके द्वारा हमारे पूर्वजों ने ब्रह्मांड के बारे में जानकारी ली। तंत्र तत्वज्ञान है, जिसके द्वारा हम अपने जीवन के ऊर्जा स्रोतों को जाग्रत करते हैं। इस ऊर्जा से मानव अपने अंदर एक ऐसी ऊर्जा उत्पन्न कर लेता है, जिसके द्वारा वह ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्य को भेदकर कई चमत्कारिक प्रयोग सफलतापूर्वक कर सकता है। तंत्र के प्राचीन ग्रंथों में कूर्म चक्र को विशेष स्थान दिया गया है। कूर्म चक्र प्राकृतिक रूप से किसी इकाई में बनने वाला एक प्रकार का ऊर्जा चक्र है। तंत्र विद्या की उत्पत्ति पृथ्वी के उत्पन्न होते ही हो गई थी। यह सब जीवों में एक समान होती है। अत: भगवान विष्णु के दशावतारों के आधार पर महाप्रलय पश्चात मत्स्य अवतार के बाद कूर्म अवतार में अवतरित होना सृष्टि संचालन हितों में एक सिद्ध व गतिमान चक्रिय नियोजन है, जिनके साक्ष्य कालखण्डों के भिन्न संदर्भों में देखे जा सकते हैं। लिंगपुराण वर्णित कूर्म अवतार संदर्भ ही इस विष्णु अवतार का प्रथम अवतरण है जो महाप्रलय पश्चात सृष्टि पुनर्निर्माण के आरंभ काल का तंत्र-सिद्धि युक्त एक वैज्ञानिक नियोजन है, कालांतर समुद्र मंथन आदि अनेकों पौराणिक द्रष्टव्यों को आधार भी इसी कूर्म अवतार चक्रों द्वारा सिद्ध होता है। इन आधारों से जुड़े डार्विन के वैज्ञानिक पहलुओं पे भी शोध व ध्यान रखने योग्य है। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,

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prakash mehta May 26, 2019

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमैंट्स में दें ।* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीत यथारूप १३.२५ अध्याय १३ :प्रकृति, पुरुष तथा चेतना . . ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना | अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे || २५ || . . ध्यानेन - ध्यान द्वारा; आत्मनि - अपने भीतर; पश्यन्ति - देखते हैं; केचित् - कुछ लोग; आत्मानम् - परमात्मा को;आत्मना - मन से; अन्ये - अन्य लोग; साङ्ख्येन - दार्शनिक विवेचना द्वारा; योगेन - योग पद्धति द्वारा; कर्म-योगेन - निष्काम कर्म के द्वारा;च - भी; अपरे - अन्य । . . कुछ लोग परमात्मा को ध्यान के द्वारा अपने भीतर देखते हैं, तो दूसरे लोग ज्ञान के अनुशीलन द्वारा और कुछ ऐसे हैं जो निष्काम कर्मयोग द्वारा देखते हैं । . . तात्पर्य:भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि जहाँ तक मनुष्य द्वारा आत्म-साक्षात्कार की खोज का प्रश्न है, बद्ध जीवों की दो श्रेणियाँ हैं । जो लोग नास्तिक, अज्ञेयवाादी तथा संशयवादी हैं, वे आध्यात्मिक ज्ञान से विहीन हैं । किन्तु अन्य लोग, जो आध्यात्मिक जीवन सम्बन्धी अपने ज्ञान के प्रति श्रद्धावान हैं, वे आत्मदर्शी भक्त, दार्शनिक तथा निष्काम कर्मयोगी कहलाते हैं । जो लोग सदैव अद्वैतवाद की स्थापना करना चाहते हैं, उनकी भी गणना नास्तिकों एवं अजेयवादियों में की में की जाती है । दूसरे शब्दों में, केवल भगवद्भक्त ही आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त होते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि इस प्रकृति के भी परे वैकुण्ठ-लोक तथा भगवान् है, जिसका विस्तार परमात्मा के रूप में प्रत्येक व्यक्ति में हुआ में, और वे सर्वव्यापी है । निस्सन्देह कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा भगवान् को समझने का प्रयास करते हैं । इन्हें श्रद्धावानों की श्रेणी में गिना जा सकता है । सांख्य दार्शनिक इस भौतिक जगत का विश्लेषण २४ तत्त्वों के रूप में करते हैं, और वे आत्मा को पच्चीसवाँ तत्त्व मानते हैं । जब वे आत्मा की प्रकृति को भौतिक तत्त्वों से परे समझने में समर्थ होते हैं, तो वे यह भी समझ जाते हैं कि आत्मा के भी ऊपर भगवान् है, और वह छब्बीसवाँ तत्त्व है । इस प्रकार वे भी क्रमशः कृष्णभावनामृत की भक्ति के स्तर तक पहुँच जाते हैं । जो लोग निष्काम भाव से कर्म करते हैं,उनकी भी मनोवृत्ति सही होती है । उन्हें कृष्णभावनामृत की भक्ति के पद तक बढ़ने का अवसर दिया जाता है | यहाँ पर कहा गया है कि कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी चेतना शुद्ध होती है,और वे ध्यान द्वारा परमात्मा को खोजने का प्रयत्न करते हैं, और जब वे परमात्मा को अपने अन्दर खोज लेते हैं, तो वे दिव्य पद को प्राप्त होते हैं । इसी प्रकार अन्य लोग हैं, जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा परमात्मा को जानने का प्रयास करते हैं । कुछ ऐसे भी हैं जो हठयोग द्वारा, अपने बालकों जैसे क्रियाकलापों द्वारा, भगवान् को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं । . प्रश्न १ : किस प्रकार सांख्य दार्शनिक व निष्काम कर्मयोगी भी कृष्णभावनामृत की भक्ति के पद तक पहुँच जाते हैं ?

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