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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सोलहवाँ अध्याय:(दैवासुरसंपद्विभागयोग) अष्टम दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ।।9।। ऐसे निष्कर्षों का अनुगमन करते हुये आसुरी लोग, जिन्होंने आत्म-ज्ञान खो दिया है और जो बुद्धिहीन है, ऐसे अनुपयोगी एवम् भयावह कार्यों में प्रवृत्त होते हैं जो संसार का विनाश करने के लिये होता है। सज्जनों, आसुरी लोग ऐसे कार्यो में व्यस्त रहते हैं जिनसे संसार का विनाश हो जाये, भगवान् यहाँ कहते हैं कि वे कम बुद्धि वाले हैं, भौतिकतावादी, जिन्हें ईश्वर का कोई बोध नहीं होता, ऐसे लोग सोचते है कि वे प्रगति कर रहे हैं, लेकिन भगवद्गीता के अनुसार ऐसे लोग बुद्धिहीन तथा समस्त आध्यात्मिक विचारों से शून्य होते हैं, वे इस भौतिक जगत् का अधिक से अधिक भोग करने का प्रयत्न करते हैं, इसलिये इन्द्रियतृप्ति के लिये वे कुछ न कुछ नया विकल्प या अविष्कार करते रहते हैं, ऐसे लोगों के लिये ये उन्नति के मार्ग है। ऐसे भौतिक भोग की वस्तुओं या अविष्कारों से मानवसमाज को बहुत बड़ी मुश्किलों का सामना करना पडेगा, ऐसी भोग वाली सभ्यता से मानव का एक नया चेहरा सामने आया है, जो हिंसक तथा क्रूर है, इसके दुष्परिणाम से लोग अधिकाधिक हिंसक व क्रूर हो रहे है, पशुओं तथा मनुष्य के साथ ऐसी क्रूरता देखी जा सकती है, उन्हें इसका कोई ज्ञान नहीं है कि एक दूसरे से किस प्रकार व्यवहार किया जाय, आसुरी लोगों में पशुवध अत्यन्त प्रधान होता है, ऐसे लोग संसार के शत्रु समझे जाते हैं। सज्जनों! आज आतंकवादी, नक्सलवादी, कट्टरपंथी या किसी देश का सनकी शासक, इन लोगों के हाथों में हथियार है और संसार में कैसे मौत का तांडव हो रहा है, जो आप सब जानते है, ऐसे लोग मानवता के शत्रु समझे जाते हैं, क्योंकि वे अन्ततः ऐसा अविष्कार का दुरुपयोग कर लेंगे या कुछ सनकवश ऐसा कर देंगे जिससे सबका विनाश हो जाय, अप्रत्यक्ष यह श्लोक नाभिकीय अस्त्रों के अविष्कार की पूर्व सूचना देता है, जिसका आज सारे विश्व को गर्व है। भाई-बहनों, किसी भी क्षण विश्वयुद्ध हो सकता है और ये परमाणु हथियार विनाशलीला उत्पन्न कर सकते हैं, ऐसी वस्तुयें संसार के विनाश के उद्देश्य से ही उत्पन्न की जाती है और यहाँ पर इसका संकेत किया गया है, ईश्वर के प्रति अविश्वास के कारण ही ऐसे हथियारों का मानव समाज में अविष्कार किया जाता है, ऐसे अविष्कार संसार और मानवता की शान्ति और सम्पन्नता के लिये नहीं होते। काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः। मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ।।10। कभी न संतुष्ट होने वाले काम का आश्रय लेकर तथा गर्व के मद एवम् मिथ्या प्रतिष्ठा में डूबे हुये आसुरी लोग इस तरह मोहग्रहस्त होकर सदैव क्षणभंगुर वस्तुओं के द्वारा अपवित्र कर्म का व्रत लिये रहते हैं। सज्जनों! यहाँ इस श्लोक में आसुरी मनोवृत्ति का वर्णन हुआ है, असुरों में काम कभी तृप्त नहीं होता, ऐसे लोग अपनी भोग के लिये अतृप्त इच्छायें बढ़ाते चले जाते हैं, यद्यपि ऐसे लोग क्षणभंगुर वस्तुओं को स्वीकार करने के कारण सदैव चिन्तामग्न ही रहते हैं, तो भी वे मोहवश ऐसे कार्य करते जाते हैं, उन्हें कोई ज्ञान नहीं होता, इसलिये ऐसे लोग ऐसा महसूस भी नहीं कर पाते कि वे गलत दिशा में जा रहे है, ऐसे लोग क्षणभंगुर वस्तुओं को स्वीकार करने के कारण सनातन परम्परा से पिछड़ जाते हैं। ऐसे लोग अपना अलग भगवान् बना लेते हैं, अलग परंपरा से जुड़ जाते हैं, सम्पत्ति तथा भोग को ही सबकुछ समझते है, यहाँ तक कि उनके द्वारा नियुक्त ऐसे भगवान् से ऐसी वस्तु प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं और ऐसी वस्तुओं की प्राप्ति पर बहुत धन भी चढ़ाते है, इस प्रसंग में "अशुचि-व्रता शब्द का प्रयोग अपवित्र व्रत के लिये ही हुआ है, ऐसे आसुरी लोग मद्य, स्त्रीयाँ, द्यूत क्रिड़ा तथा मांसाहार के प्रति आसक्त होते हैं, ये ही उनकी अशुचि अर्थात् अपवित्र आदतें है, दर्प तथा अहंकार से प्रेरित होकर वे ऐसे धार्मिक सिद्धान्त बनाते है, जिनकी अनुमति वैदिक आदेशों में नहीं है। यद्यपि ऐसे आसुरी लोग अत्यन्त निन्दनीय होते हैं, लेकिन समाज में या संसार में कृत्रिम साधनों से ऐसे लोगों का झूठा सम्मान किया जाता है, यद्यपि वे सभी नरक की ओर बढ़ते रहते हैं, फिर भी वे लोग अपने को बहुत बड़े चतुर समझते है, दोस्तों! मेरी ऐसी आध्यात्मिक पोस्ट से दो-चार लोग भी देवत्व को प्राप्त हो गये, तो मेरा रोज का चार-पांच घंटे का लिखना और पढ़ना सार्थक हो गया, मैं अपने सभी कार्यों से समय निकालकर ऐसे आसुरी लोगों के जीवन में खुशहाली लाने के लिये समय दे पाया तो मैं अपने आपको धन्य समझूंगा। भाई-बहनों! एक सन्त किसी राह से गुजर रहे थे, इतने में ही देखा कि पीछे से एक युवक हाथ में लाठी लिये हुये आया और उसने सन्त की कमर पर एक लाठी जमा दी, लाठी के प्रहार के बाद युवक भयभीत हुआ, इसलिये लाठी उसके हाथ से अलग छिटक गई और वह भागने लगा, सन्त ने पलट कर आवाज दी, भैया दौड़ क्यों रहे हो? जाना ही है तो चले जाओ, लेकिन अपनी यह लाठी तो लेते जाओ, सन्त के साथ दूसरा आदमी चल रहा था, उसने सन्त से कहा कि यह तो हद ही हो गई, एक व्यक्ति ने लाठी मारी और ऊपर से आप कह रहे हैं कि लाठी को वापस लेते जा, क्या आपको क्रोध नहीं आया? सन्त अपने हमराही की बात सुनकर मुस्करा दिये, सन्त ने कहा कि यह समझ-समझ का फर्क है, तुम मुझे एक बात का जवाब दो, मान लो कि मैं इस रास्ते से गुजर रहा हूंँ और जिस पेड़ के नीचे मैं खड़ा हूंँ, उस पेड़ से एक टहनी मेरे कन्धे पर आकर गिर पड़े, तो क्या मैं उस पेड़ को गालियाँ दूँगा? क्या मैं उस पेड़ पर लाठी मारूँगा? पेड़ के नीचे से गुजरना और लाठी का गिरना यह तो संयोग मात्र है, सन्त की तरह क्यों न हम भी लोगों के द्वारा किये जाने वाला निकृष्ट व्यवहार और बर्ताव को एक संयोग ही समझें, संयोग मान लेते हो तो क्रोध नहीं आयेगा और आएगा भी तो सम्भल जायेगा। संयोग मानने से कोई भी शब्द हम पर प्रभावी नहीं होता, हम स्वयं शान्त न हो पाये, इसलिये किसी और का क्रोध कारगर होता है, अगर तालाब में जलते हुये अंगार फेकेंगे, तो तालाब का कुछ नहीं होगा, बल्कि अंगारे ही बुझ जायेंगे, हम सरोवर न बन पाये, इसलिये हमें क्रोध आता है, अपने में शीतलता भर कर अगर हम पानी हो जाये, तो सामने वाले को भी पानी-पानी होना ही पड़ेगा, क्रोध से परहेज रखो, अपने जीवन को प्रेम से आपूरित होने दो, हम संयम रखें, मीजाज ठंडा रखे, तो समझ लो कि हम नरक का दरवाज़ा पार कर ही लेंगे। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 
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सोलहवाँ अध्याय:(दैवासुरसंपद्विभागयोग)  अष्टम दिवस
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एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ।।9।।

ऐसे निष्कर्षों का अनुगमन करते हुये आसुरी लोग, जिन्होंने आत्म-ज्ञान खो दिया है और जो बुद्धिहीन है, ऐसे अनुपयोगी एवम् भयावह कार्यों में प्रवृत्त होते हैं जो संसार का विनाश करने के लिये होता है।

सज्जनों, आसुरी लोग ऐसे कार्यो में व्यस्त रहते हैं जिनसे संसार का विनाश हो जाये, भगवान् यहाँ कहते हैं कि वे कम बुद्धि वाले हैं, भौतिकतावादी, जिन्हें ईश्वर का कोई बोध नहीं होता, ऐसे लोग सोचते है कि वे प्रगति कर रहे हैं, लेकिन भगवद्गीता के अनुसार ऐसे लोग बुद्धिहीन तथा समस्त आध्यात्मिक विचारों से शून्य होते हैं, वे इस भौतिक जगत् का अधिक से अधिक भोग करने का प्रयत्न करते हैं, इसलिये इन्द्रियतृप्ति के लिये वे कुछ न कुछ नया विकल्प या अविष्कार करते रहते हैं, ऐसे लोगों के लिये ये उन्नति के मार्ग है।

ऐसे भौतिक भोग की वस्तुओं या अविष्कारों से मानवसमाज को बहुत बड़ी मुश्किलों का सामना करना पडेगा, ऐसी भोग वाली सभ्यता से मानव का एक नया चेहरा सामने आया है, जो हिंसक तथा क्रूर है, इसके दुष्परिणाम से लोग अधिकाधिक हिंसक व क्रूर हो रहे है, पशुओं तथा मनुष्य के साथ ऐसी क्रूरता देखी जा सकती है, उन्हें इसका कोई ज्ञान नहीं है कि एक दूसरे से किस प्रकार व्यवहार किया जाय, आसुरी लोगों में पशुवध अत्यन्त प्रधान होता है, ऐसे लोग संसार के शत्रु समझे जाते हैं।

सज्जनों! आज आतंकवादी, नक्सलवादी, कट्टरपंथी या किसी देश का सनकी शासक, इन लोगों के हाथों में हथियार है और संसार में कैसे मौत का तांडव हो रहा है, जो आप सब जानते है, ऐसे लोग मानवता के शत्रु समझे जाते हैं, क्योंकि वे अन्ततः ऐसा अविष्कार का दुरुपयोग कर लेंगे या कुछ सनकवश ऐसा कर देंगे जिससे सबका विनाश हो जाय, अप्रत्यक्ष यह श्लोक नाभिकीय अस्त्रों के अविष्कार की पूर्व सूचना देता है, जिसका आज सारे विश्व को गर्व है।

भाई-बहनों, किसी भी क्षण विश्वयुद्ध हो सकता है और ये परमाणु हथियार विनाशलीला उत्पन्न कर सकते हैं, ऐसी वस्तुयें संसार के विनाश के उद्देश्य से ही उत्पन्न की जाती है और यहाँ पर इसका संकेत किया गया है, ईश्वर के प्रति अविश्वास के कारण ही ऐसे हथियारों का मानव समाज में अविष्कार किया जाता है, ऐसे अविष्कार संसार और मानवता की शान्ति और सम्पन्नता के लिये नहीं होते।

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ।।10।

कभी न संतुष्ट होने वाले काम का आश्रय लेकर तथा गर्व के मद एवम् मिथ्या प्रतिष्ठा में डूबे हुये आसुरी लोग इस तरह मोहग्रहस्त होकर सदैव क्षणभंगुर वस्तुओं के द्वारा अपवित्र कर्म का व्रत लिये रहते हैं।

सज्जनों! यहाँ इस श्लोक में आसुरी मनोवृत्ति का वर्णन हुआ है, असुरों में काम कभी तृप्त नहीं होता, ऐसे लोग अपनी भोग के लिये अतृप्त इच्छायें बढ़ाते चले जाते हैं, यद्यपि ऐसे लोग क्षणभंगुर वस्तुओं को स्वीकार करने के कारण सदैव चिन्तामग्न ही रहते हैं, तो भी वे मोहवश ऐसे कार्य करते जाते हैं, उन्हें कोई ज्ञान नहीं होता, इसलिये ऐसे लोग ऐसा महसूस भी नहीं कर पाते कि वे गलत दिशा में जा रहे है, ऐसे लोग क्षणभंगुर वस्तुओं को स्वीकार करने के कारण सनातन परम्परा से पिछड़ जाते हैं।

ऐसे लोग अपना अलग भगवान् बना लेते हैं, अलग परंपरा से जुड़ जाते हैं, सम्पत्ति तथा भोग को ही सबकुछ समझते है, यहाँ तक कि उनके द्वारा नियुक्त ऐसे भगवान् से ऐसी वस्तु प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं और ऐसी वस्तुओं की प्राप्ति पर बहुत धन भी चढ़ाते है, इस प्रसंग में "अशुचि-व्रता शब्द का प्रयोग अपवित्र व्रत के लिये ही हुआ है, ऐसे आसुरी लोग मद्य, स्त्रीयाँ, द्यूत क्रिड़ा तथा मांसाहार के प्रति आसक्त होते हैं, ये ही उनकी अशुचि अर्थात् अपवित्र आदतें है, दर्प तथा अहंकार से प्रेरित होकर वे ऐसे धार्मिक सिद्धान्त बनाते है, जिनकी अनुमति वैदिक आदेशों में नहीं है।

यद्यपि ऐसे आसुरी लोग अत्यन्त निन्दनीय होते हैं, लेकिन समाज में या संसार में कृत्रिम साधनों से ऐसे लोगों का झूठा सम्मान किया जाता है, यद्यपि वे सभी नरक की ओर बढ़ते रहते हैं, फिर भी वे लोग अपने को बहुत बड़े चतुर समझते है, दोस्तों! मेरी ऐसी आध्यात्मिक पोस्ट से दो-चार लोग भी देवत्व को प्राप्त हो गये, तो मेरा रोज का चार-पांच घंटे का लिखना और पढ़ना सार्थक हो गया, मैं अपने सभी कार्यों से समय निकालकर ऐसे आसुरी लोगों के जीवन में खुशहाली लाने के लिये समय दे पाया तो मैं अपने आपको धन्य समझूंगा।

भाई-बहनों! एक सन्त किसी राह से गुजर रहे थे, इतने में ही देखा कि पीछे से एक युवक हाथ में लाठी लिये हुये आया और उसने सन्त की कमर पर एक लाठी जमा दी, लाठी के प्रहार के बाद युवक भयभीत हुआ, इसलिये लाठी उसके हाथ से अलग छिटक गई और वह भागने लगा, सन्त ने पलट कर आवाज दी, भैया दौड़ क्यों रहे हो? जाना ही है तो चले जाओ, लेकिन अपनी यह लाठी तो लेते जाओ, सन्त के साथ दूसरा आदमी चल रहा था, उसने सन्त से कहा कि यह तो हद ही हो गई, एक व्यक्ति ने लाठी मारी और ऊपर से आप कह रहे हैं कि लाठी को वापस लेते जा, क्या आपको क्रोध नहीं आया?

सन्त अपने हमराही की बात सुनकर मुस्करा दिये, सन्त ने कहा कि यह समझ-समझ का फर्क है, तुम मुझे एक बात का जवाब दो, मान लो कि मैं इस रास्ते से गुजर रहा हूंँ और जिस पेड़ के नीचे मैं खड़ा हूंँ, उस पेड़ से एक टहनी मेरे कन्धे पर आकर गिर पड़े, तो क्या मैं उस पेड़ को गालियाँ दूँगा? क्या मैं उस पेड़ पर लाठी मारूँगा? पेड़ के नीचे से गुजरना और लाठी का गिरना यह तो संयोग मात्र है, सन्त की तरह क्यों न हम भी लोगों के द्वारा किये जाने वाला निकृष्ट व्यवहार और बर्ताव को एक संयोग ही समझें, संयोग मान लेते हो तो क्रोध नहीं आयेगा और आएगा भी तो सम्भल जायेगा।

संयोग मानने से कोई भी शब्द हम पर प्रभावी नहीं होता, हम स्वयं शान्त न हो पाये, इसलिये किसी और का क्रोध कारगर होता है, अगर तालाब में जलते हुये अंगार फेकेंगे, तो तालाब का कुछ नहीं होगा, बल्कि अंगारे ही बुझ जायेंगे, हम सरोवर न बन पाये, इसलिये हमें क्रोध आता है, अपने में शीतलता भर कर अगर हम पानी हो जाये, तो सामने वाले को भी पानी-पानी होना ही पड़ेगा, क्रोध से परहेज रखो, अपने जीवन को प्रेम से आपूरित होने दो, हम संयम रखें, मीजाज ठंडा रखे, तो समझ लो कि हम नरक का दरवाज़ा पार कर ही लेंगे।

शेष जारी • • • 
जय श्री कृष्ण! 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय्
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ramkumar verma Jun 17, 2019

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सोलहवाँ अध्याय:(दैवासुरसंपद्विभागयोग) त्रयोदश दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ अहङ्‍कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ।।18।। शरीर में तथा अन्यों के शरीर में स्थित भगवान् से ईष्र्या और वास्तविक धर्म की निन्दा करने लगते हैं। सज्जनों, आसुरी वयक्ति भगवान् की श्रेष्ठता का विरोधी होने के कारण शास्त्रों में विश्वास करना पसन्द नहीं करता,ऐसे लोग शास्त्रों तथा भगवान् के अस्तित्व दोनों से ही ईष्र्या करते हैं, यह ईष्र्या उनकी तथाकथित प्रतिष्ठा तथा धन शक्ति के संग्रह से उत्पन्न होती हैं, ऐसे आसुरी लोग यह नहीं जानते कि वर्तमान जीवन अगले जीवन की तैयारी हैं, इस बात को नहीं जानने के कारण ऐसे लोग अपने प्रति तथा अन्यों के प्रति भी द्वेष करता हैं, ऐसे लोग अन्य जीवों की तथा स्वयं अपनी भी हिंसा करता हैं, आसुरी भगवान् के परम नियन्त्रण की चिन्ता नहीं करता, क्योंकि उसे ज्ञान नहीं होता। शास्त्रों तथा भगवान् से ईष्र्या करने के कारण आसुरी ईश्वर के अस्तित्व के विरूद्ध झूठे तर्क प्रस्तुत करता हैं और शास्त्रीय प्रमाणों को अस्वीकार करता हैं, वह प्रत्येक कार्य में अपने को स्वतन्त्र तथा शक्तिमान समझता है, ऐसे आसुरी सोचते है कि कोई भी शक्ति, बल या सम्पत्ति में उसकी समता नहीं कर सकता,अत: वह चाहे जिस तरह कर्म करे, उसे कोई रोक नहीं सकता, यदि उसका कोई शत्रु उसे ऐन्द्रिय कार्यों में आगे बढ़ने से रोकता है तो वह अपनी शक्ति से छिन्न-भिन्न करने की योजनायें बनाता है। तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्‌। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ।।19।। जो लोग ईष्र्यालु तथा क्रूर हैं और नराधर्म हैं उन्हें मैं निरन्तर विभिन्न आसुरी योनियों में डालता रहता हूँ। सज्जनों! इस श्लोक में स्पष्ट इंगित होता है कि किसी जीव को किसी विशेष शरीर में रखने का परमेश्वर को विशेष अधिकार पराप्त हैं, आसुरी लोग भले ही भगवान् की श्रेष्ठता को न स्वीकार करें और वे अपनी निजी सनकों के अनुसार कर्म करें, लेकिन उनका अगला जन्म भगवान् के निर्णय पर निर्भर करेगा,उन पर नहीं, श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध में कहा गया है कि मॄत्यु के बाद जीव को माता के गर्भ में रखा जाता है, जहाँ उच्च शक्ति के निरीक्षण में जीव विशेष प्रकार का शरीर प्राप्त होता हैं। यही कारण है कि संसार में जीवों की इतनी योनियाँ प्राप्त होती हैं, जैसे- पशु, पक्षी, कीट, पतंगे, मनुष्य या वनस्पति आदि, ये सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हैं कोई अकस्मात् नहीं,जहाँ तक असुरों की बात हैं, यहाँ यह स्पष्ट कहा गया है कि ये असुरों के गर्भ में निरन्तर रखे जाते हैं, इस प्रकार ये ईष्र्यालु बने रहते है और मानवता से रहित और अधर्मी होते हैं, ऐसे आसुरी योनि वाले मनुष्य सदैव काम से पूरित रहते हैं, ऐसे लोग उग्र, घृणास्पद तथा अपवित्र होते हैं, मांसाहार करने वाले मनुष्य आसुरी योनि से सम्बन्धित माने जाते हैं। सज्जनों, भगवान् श्रीकॄष्ण ने गीता का ज्ञान युद्ध के मैदान में दिया और उस धुरन्धर से किया, जिसकी प्रत्यंचा मात्र से सारा संसार कम्पित हो जाता था, महाभारत का समय तो अब नहीं हैं, सन्दर्भ भले ही बदल गये हों, लेकिन हर शख़्स के भीतर महाभारत होते हुये मैं साफ-साफ देख रहा हूँ, सबके भीतर महाभारत मचा हुआ हैं, उथल-पुथल मचा हुआ हैं, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। हर वयक्ति के भीतर दुर्योधन बैठा है, जो सबकुछ अकेला ही हडपना चाहता हैं, एक दु:शासन बैठा है जो द्रोपदी का चीरहरण करना चाहता हैं, एक कंस भी रहता है जो अपनी रक्षा और समृद्धि के लिये औरों के साथ खिलवाड़ करता हैं, अन्दर बैठा हुआ एक शिशुपाल अपने अभिमान, अपने घमण्ड को औरों पर छाँटनें के लिये उनकी उपेक्षा कर रहा है, भगवद्गीता की सार्थकता इसी में हैं कि हम अपने भीतर के महाभारत को पहचानें, द्वापरयुग के वे घटनाक्रम आज भी दोहराये जा रहे हैं। हम सबके भीतर एक शैतान, एक दु:शासन बैठा है जो औरों की इज्जत लेने में ही अपनी प्रतिष्ठा समझता है, एक शकुनि आसीन है जो स्वार्थ, छल, प्रपंच के दुश्चक्र चला रहा है, इसलिये गीता की प्रासंगिकता आज भी है और भविष्य में भी तब तक रहेगी, जब तक मनुष्य के भीतर स्वार्थ के शकुनी और दुश्चक्र के दुर्योधन बने रहेंगे, गीता हमें लड़ने की बात नहीं, अपितु स्वार्थ और दुश्चक्र से युद्ध करने की बात सिखाती है, गीता निश्चित तौर पर योद्धाओं का मार्ग हैं, जब तक हम स्वयं योद्धा नहीं बनते तब तक गीता को सुनना व पढ़ना सार्थक कहाँ हैं। भाई-बहनों! गीता को सुनने या पढ़ने के लिये रग-रग में, नस-नस में योद्धा जैसी हुँकार चाहिये,ऐसे क्षत्रियत्व का रक्त चाहिये, जिस पर गीता के वे सन्देश प्रभावी हो सकें, भारत देश की यह माटी कितनी ही शान्त क्यों न हो, पर जब-जब भी यह माटी जागती है, तब-तब अहिंसा को मानने वाला यह देश रणबांकुरों की धरती बन जाता है, मैं चाहता हूँ कि रणबांकुरों की यह धरती औरों से लड़ने के लिये नहीं, बल्कि औरों का दिल जीतने के लिये आगे आयें। मैं एक ऐसे युद्ध की प्रेरणा दे रहा हूँ जो हिंसा का नहीं, स्वयं हिंसा से लड़ने का युद्ध है, जो आतंक का, अपराध का युद्ध नहीं, स्वयं अपराध और आतंक से लड़ने का युद्ध है, एक ऐसा युद्ध जो अभय का वातावरण बनाये, जिससे विवेकानन्दजी जैसो का जन्म हो, आज का मनुष्य अपने आप से ही पलायन करता जा रहा है और मुझे उसी आज के मनुष्य को सम्बोधित करना हैं, इसलिये मुझे लिखने में सुनार और लुहार दोनों का काम करना पड़ता हैं, इसलिये हो सकता है कि मेरी लेखनी किसी को अच्छी न भी लगें। शेष जारी ॰॰॰ जय श्री कॄष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सोलहवाँ अध्याय:(दैवासुरसंपद्विभागयोग) द्वादश दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः। यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्‌ ।।17।। अपने को श्रेष्ठ मानने वाले तथा सदैव घमण्ड करने वाले, सम्पत्ति तथा मिथ्या प्रतिष्ठा से मोहग्रस्त लोग किसी विधि-विधान का पालन न करते हुये कभी-कभी नाममात्र के लिये बड़े ही गर्व के साथ यज्ञ करते हैं। सज्जनों, आसुरी लोग अपने आप को सब क़ुछ मानते हुये, किसी प्रमाण या शास्त्र की परवाह न करते हुये कभी-कभी तथाकथित धार्मिक‌ या याज्ञिक अनुष्ठान करते हैं, चूँकि वे किसी प्रमाण में विश्वास नहीं करते, इसलिये वे अत्यधिक घमंड़ी होते हैं, थोड़ी सी सम्पत्ति तथा झूठी प्रतिष्ठा पा लेने के कारण जो मोह यानी भ्रम उत्पन्न होता है, उसी के कारण ऐसा होता हैं, कभी-कभी ऐसे असुर उपदेशक की भूमिका भी निभाते है और लोगों को भ्रान्त करते है तथा धार्मिक‌ सुधारक या ईश्वर के अवतारों के रूप में प्रसिद्ध हो जाते हैं। आसुरी लोग यज्ञ करने का दिखावा भी करते है या दैवताओं की पूजा भी करते हैं या अपने निजी ईश्वर की सृष्टि भी कर लेते हैं, सामान्य लोग उनका प्रचार ईश्वर कह कर करते हैं, उन्हें पूजते है और मूर्ख लोग ऐसे पाखंड़ियों को धर्म और अध्यात्म में बढ़ा-चढ़ा मानते हैं, ऐसे लोग संन्यासी का वेश भी धारण कर लेते हैं और उस वेश में सभी प्रकार का अधर्म करते हैं, वास्तव में इस संसार से विरक्त होने वाले पर अनेक प्रतिबन्थ होते हैं, लेकिन ऐसे असुर इन प्रतिबन्धों की परवाह नहीं करते। ऐसे आसुरी लोगों के समक्ष आदर्श मार्ग जैसी कोई वस्तु नहीं, जिस पर चला जाय, इस श्लोक में "अविधिपूर्वकम" शब्द इसीलिये प्रयुक्त ‌हुआ हैं, जिसका अर्थ है विधि-विधानों की परवाह न करते हुये, ये सभी बातें सदैव अज्ञान तथा मोह के कारण होती हैं, सज्जनों, भगवद्गीता मानवीय शास्त्रों की कुंजी हैं, मानव जीवन के सारे सिद्धान्त भगवद्गीता में प्रतिपादित हैं,वेद और उपनिषद् का नवनीत भी भगवद्गीता में आत्मसात् हुआ हैं और मनुष्य से जुड़ा सारा उपदेश समाविष्ट हैं। सज्जनों! वह कंठ ही क्या जिसने गीता का अपने जीवन में गायन न किया, वे कदम ही क्या जो गीता के मार्ग पर न चले, वह वाणी धन्य हो जाती है, जिसे गीता का रसास्वादन हो जाता है, उस वयक्ति का जीवन धन्य है जो सोने से पहले भगवद्गीता जैसे धर्मग्रन्थ का श्लोक श्रवण करने को मिलता हैं, गीता के दिव्य ज्ञान के दो शब्द सुनने-पढ़ने को मिलते हैं, भ्रम में रहने वाले वयक्ति का मानव जीवन असफल हो जाता है, भले ही वह करोड़ों का मालिक क्यो न हो, लेकिन गीताजी के श्लोकों और सूत्रों को दिन-भर अपने चिन्तन और मनन में रखने वालों का मानव जीवन धन्य हो जाता है,भले ही वह श्रमिक ही क्यों न हो। भाई-बहनों, भगवान् करें, आप सभी का भी मनुष्य जन्म सफल हों, विकारो में तो हर आदमी का जीवन गुजर ही रहा है, लेकिन जीवन के ऐश्वर्य-ईश्वर के रसास्वादन में जिनका जीवन गुजरता हैं, ऐसे मनुष्य का प्रत्येक दिन भले ही अमावस्या जैसा अंधकारमय क्यों न हों, असल में वह प्रत्येक दिन पूनम के चन्द्रमा के समान है, पूर्ण रोशनी लिये, दोस्तों! मैं भगवद्गीता की पोस्ट बहुत सारे ग्रूपों में करता हूँ, इसलिये मुझें यह लिखना पड़ रहा है कि अगर हम जाती, वर्ण या विशेष धर्म के चश्मे से गीता से प्रेम रखते है, तो यह गीता के साथ अन्याय हैं, गीता प्रत्येक मानव के लिये हैं। सज्जनों आपमें से अगर कोई भाई या बहन जैन हो और उस नाते गीता को अस्वीकार करते हो, तो ऐसा करके आप गीता को नहीं, अपितु अपने जीवन के अन्तर्सत्यों को अस्वीकार कर बैठोगे, इस्लाम के अनुयायी होने के कारण गीता से परहेज रखोगे, तो कुरान के सन्देशों को समझने में आपसे चूक हुई हैं, जैनत्व, हिन्दुत्व, बौद्धत्व या इस्लाम, ये सब छिलके हैं, दोस्तों! किसी भी फल का महत्व छिलकों में नहीं होता, छिलकों को एक तरफ करो और गूदे को स्वीकार करो, शक्ति गूदे में हैं, छिलकों में नहीं। भाई-बहनों! मनुष्य को छिलके इतने लुभाते है कि भीतर का पदार्थ गौण हो जाता है, अगर हम छिलकों को एक तरफ रख कर भगवद्गीता को सुनेंगे, पढ़ेंगे, गीता का आचमन करेंगे, गीता को ह्रदय में धारण करेंगे, तो हमारा मनुष्य जन्म सफल हो सकता हैं, जीवन में एक महान् चमत्कार घटित हो सकता हैं, यह गीता जीवन में वह अन्तर-रूपांतर कर देगी, जिसके अभाव में हम जन्म-जन्मान्तर एक योनि से दूसरी योनि में भटकते रहे हैं। शेष जारी ... जय श्री कॄष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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ramkumar verma Jun 15, 2019

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सोलहवाँ अध्याय:(दैवासुरसंपद्विभागयोग) एकादश दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ।।15।। अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ।।16।। मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और इस तरह आनन्द मनाऊँगा, इस प्रकार ऐसे व्यक्ति अज्ञानवश मोहग्रहस्त होते रहते हैं इस प्रकार अनेक चिन्ताओं से उद्विग्न होकर तथा मोहग्रहस्त में बँधकर वे इन्द्रियभोग में अत्यधिक आसक्त हो जाते हैं और नरक में गिरते है। सज्जनों, आसुरी व्यक्ति धन अर्जित करने की इच्छा की कोई सीमा नहीं जानता, उसकी इच्छा असीम बनी रहती है, वह केवल यही सोचता रहता है कि उसके पास इस समय कितनी सम्पत्ति है और ऐसी योजना बनाता है कि सम्पत्ति का संग्रह बढता ही जाय, इसलिये वह किसी भी पापपूर्ण साधन को अपनाने में झिझकता नहीं और अवेध तृप्ति के लिये कालाबाजारी तक करता है, वह पहले से अपनी अधिकृत सम्पत्ति, यथा भूमि, परिवार, घर तथा बैंक पूँजी पर मुग्ध रहता है और उनमें वृद्धि के लिये सदैव योजनायें बनाता रहता है। आसुरी व्यक्ति को अपनी शक्ति पर ही विश्वास रहता है और वह यह नहीं जानता कि उसे जो लाभ हो रहा है वह उसके पूर्वजन्म के पुण्यकर्मों का फल है, उसे ऐसी वस्तुओं का संचय करने का अवसर इसीलिये मिला है, लेकिन उसे पूर्वजन्म के कारणों का कोई बोध नहीं होता, वह यही सोचता है कि उसकी सारी सम्पत्ति उसके निजी उद्योग से है, आसुरी व्यक्ति अपने बाबु-बल पर विश्वास करता है, कर्म के नियम पर नहीं, कर्म-नियम के अनुसार पूर्वजन्म में उत्तम करने के फलस्वरूप मनुष्य उच्चकुल में जन्म लेता है, या धनवान बनता है, या बहुत सुन्दर शरीर प्राप्त करता है। आसुरी व्यक्ति सोचता है कि ये चीज़ें आकस्मिक है और उसके बाहुबल यानी सामर्थ्य के फलस्वरूप है, उसे विभिन्न प्रकार के लोगों, सुन्दरता तथा शिक्षा के पीछे किसी प्रकार की योजना यानी व्यवस्था प्रतीत नहीं होती, ऐसे आसुरी मनुष्य की प्रतियोगिता में जो भी सामने आता है वह उसका शत्रु बन जाता है, ऐसे अनेक आसुरी व्यक्ति होते हैं और इनमें से प्रत्येक अन्यों का शत्रु होता है, यह शत्रुता पहले मनुष्यों के बीच, फिर परिवारों के बीच और अन्ततः समाज के बीच बढ़ती जाती है, इसलिये देश में निरन्तर संघर्ष, युद्ध तथा शत्रुता बनी हुई है। प्रत्येक आसुरी व्यक्ति सोचता है कि वह अन्य सभी लोगों गुलाम बना कर रख सकता है, ऐसा व्यक्ति सामान्यतया स्वयं को परम ईश्वर मानता है और आसुरी उपदेशक अपने अनुयायीओं से कहता है कि तुम लोग ईश्वर को अन्यत्र क्यों ढूँढ रहे हो? तुम स्वयं अपने ईश्वर हो, तुम जो चाहो सो कर सकते हो, ईश्वर पर विश्वास मत करो, ईश्वर को दूर करो, ईश्वर मृत है, ये ही आसुरी लोगों के उपदेश है, यद्यपि आसुरी मनुष्य अन्यों को अपने ही समान या अपने से बढ़कर धनी तथा प्रभावशाली देखता है, तो भी वह सोचता है कि उससे बढकर न तो कोई धनी है और न प्रभावशाली। जहाँ तक उच्चलोकों में जाने की बात है तो वे यज्ञों को सम्पन्न करने में विश्वास नहीं करते, वे सोचते है कि वे अपनी यज्ञ-विधि का निर्माण स्वयं करेंगे और कोई ऐसी मशीन बना लेंगे जिससे वे किसी भी उच्चलोक तक पहुँच जायेंगे, ऐसे आसुरी व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रावण था, उसने लोगों के समक्ष ऐसी योजना प्रस्तुत की थी, जिसके द्वारा वह एक ऐसी सीढ़ी बनाने वाला था, जिससे कोई भी व्यक्ति वेदों में वर्णित यज्ञों को सम्पन्न किये बिना स्वर्गलोक को जा सकता था। उसी प्रकार से आधुनिक युग के ऐसे ही आसुरी लोग यान्त्रिक विधि से उच्चतर लोकों तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं, ये सब मोह के उदाहरण है, परिणाम यह होता है कि बिना जाने हुये वे नरक की ओर बढ़ते जाते हैं, इस प्रकार मनुष्य मछली की भाँति मोह रूपी जाल में फँस कर उससे निकल नहीं पाता, आसुरी लोग महल बनाते है, जबकि संत तो महलों का त्याग कर जाते हैं, आसुरी पत्नी में उलझे है, जबकि नरेन्द्रभाई मोदी जैसे संत पत्नी को छोड़कर देश सेवा के लिये जाते हैं, आसुरी पैसे और सम्पत्ति में मोहित रहते हैं, जबकि भक्त करोड़ों की सम्पत्ति को ठुकराकर निर्वाण के पथिक हो जाते हैं। भाई-बहनों! आज मनुष्य उलझा हुआ है, मोह-माया के मकड़जाल में फँसा है, त्याग की चेतना विकृत हो गई है, लोभ की चेतना प्रगाढ़ हो गई है, कल ही आपसे कहा था कि लोभ मन का कब्ज है और त्याग लोभ को काटने का तरीका, अगर हम अपने लोभी मन को ज्यादा न काट पाये, तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि जिन चीजों की घर में जरूरत नहीं है, उन्हें अपने घर से निकाल फेंकें, जो आदमी अपने घर को कबाड़खाना बनाये रखता है, उसके घर में दारिद्र्य ही इकट्ठा होता है, अगर दारिद्र्य को संजोकर रखना चाहो तो अलग बात है। फालतू चीजों को उन लोगों को दे दे, जिनको उनकी जरूरत है, अगर घर में बोतलें या डब्बे पड़े है, तो उन्हें कल ही बेच डाले और जो पैसे आयें, उससे कहीं कबूतरों के लिये दाना डलवा दे, ऐसा करके हम कोई दान नहीं कर रहे, केवल परिग्रह को हटाया है, इस तरह परिग्रह को हटाना हमारे लिये जहाँ एक धर्म-कार्य साबित हो सकता है, वहीं घर की सफाई के काम को भी अंजाम दिया, तो ये काम, क्रोध और लोभ तीन दरवाजे है नरक के, ये ही वे तीन द्वार है, जो मनुष्य को संसार से बाँधे रखते हैं। भाई-बहनों! इन तीनों दरवाज़ों पर होने वाली जो गुणात्मक स्थिति है, उसी को भगवान् श्रीकृष्ण आसुरी प्रकृति, आसुरी सम्पदा या आसुरी गुण कहते हैं, दोस्तों हम स्वर्गीय हों, इसके पहले ही हम अपना स्वर्ग इस धरती पर बना लें, आत्मा में स्वर्ग बसा लें, अपने जीवन में देवराज इन्द्र होकर जीयें, तो शायद जीवन को जीना स्वर्ग को जीने के समान होगा, जो स्वर्ग को जीता है उसका जीना तो सार्थक है, नरक में तो हर आदमी पड़ा है, मेरा तो इतना ही निवेदन है कि नरक के द्वारों से बचो और दिव्य जीवन के द्वारों को उद्घाटित करो, देवत्व की दिशा में हमारे कदम उठें, जीवन पुण्य का पुष्प बने। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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