Jayshree Shah
Jayshree Shah May 26, 2018

भगवान की नजरों में अच्छा बनने बजाय पवित्र बनो..... 🙏

जय जिनेन्द्र जय महावीर 🙏 🙏 🙏

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Surendra m. Jain Jun 3, 2018
Bahot achhi or sachhi baat kahi hi. 🏳️‍🌈🙏🏳️‍🌈

Har har mahadev 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🙏🙏👍🌹🙋‍♀️🌹🙋‍♀️ *एक कहानी मुझे याद आती है* *एक घर में बहुत दिनों से एक वीणा रखी थी। उस घर के लोग भूल गए थे। उस वीणा को बजा कर पीढ़ियों पहले कभी कोई उसका उपयोग कर रहा होगा। अब तो कभी कोई भूल से बच्चा उसके तार छेड़ देता था तो घर के लोग नाराज होते थे। कभी कोई बिल्ली छलांग लगा कर उस वीणा को गिरा देती तो आधी रात में उसके तार झनझना जाते, घर के लोगों की नींद टूट जाती। वह वीणा एक उपद्रव का कारण हो गई थी। अंततः उस घर के लोगों ने एक दिन तय किया कि इस वीणा को फेंक दें -जगह घेरती है, कचरा इकट्ठा करती है और शांति में बाधा डालती है। वह उस वीणा को घर के बाहर कूड़े घर पर फेंक आए।* *वह फेंक कर लौट ही नहीं पाए थे कि एक भिखारी गुजरा , उसने वह वीणा उठा ली और उसके तारों को छेड़ दिया। वीणा को फेकनें वाले ठिठक कर खड़े हो गए, वापस लौट गए। उस रास्ते के किनारे जो भी निकला, वे ठहर गया। घरों में जो लोग थे, वे बाहर आ गए। वहां भीड़ लग गई। वह भिखारी मंत्रमुग्ध हो उस वीणा को बजा रहा था। जब उन्हें वीणा का स्वर और संगीत मालूम पड़ा और जैसे ही उस भिखारी ने बजाना बंद किया है, वे घर के लोग उस भिखारी से बोलेः वीणा हमें लौटा दो। वीणा हमारी है।* *उस भिखारी ने कहाः वीणा उसकी है जो बजाना जानता है, और तुम तो इसे फेंक चुके हो। तब वे लड़ने-झगड़ने लगे। उन्होंने कहा, हमें वीणा वापस चाहिए। उस भिखारी ने कहाः फिर कचरा इकट्ठा होगा, फिर जगह घेरेगी, फिर कोई बच्चा उसके तारों को छेड़ेगा और घर की शांति भंग होगी। वीणा घर की शांति भंग भी कर सकती है, यदि बजाना न आता हो। वीणा घर की शांति को गहरा भी कर सकती है, यदि बजाना आता हो। सब कुछ बजाने पर निर्भर करता है।* *जीवन भी एक वीणा है और सब कुछ बजाने पर निर्भर करता है। जीवन हम सबको मिल जाता है, लेकिन उस जीवन की वीणा को बजाना बहुत कम लोग सीख पाते हैं। इसीलिए इतनी उदासी है, इतना दुख है, इतनी पीड़ा है। इसीलिए जगत में इतना अंधेरा है, इतनी हिंसा है, इतनी घृणा है। इसलिए जगत में इतना युद्ध है, इतना वैमनस्य है, इतनी शत्रुता है। यह जीवन जो संगीत बन सकता था , वह कलह, द्वेष, वैमनस्यता का बेसंगीत बन गया है क्योंकि हम उसे बजाना नहीं जानते हैं।* *🌟🔸ओम शान्ति 🔸🌟* *संकलित*

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⛺जब आंख खुली तो अम्‍मा की ⛺गोदी का एक सहारा था ⛺उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको ⛺भूमण्‍डल से प्‍यारा था 🌹उसके चेहरे की झलक देख 🌹चेहरा फूलों सा खिलता था 🌹उसके स्‍तन की एक बूंद से 🌹मुझको जीवन मिलता था 👄हाथों से बालों को नोंचा 👄पैरों से खूब प्रहार किया 👄फिर भी उस मां ने पुचकारा 👄हमको जी भर के प्‍यार किया 🌹मैं उसका राजा बेटा था 🌹वो आंख का तारा कहती थी 🌹मैं बनूं बुढापे में उसका 🌹बस एक सहारा कहती थी 🌂उंगली को पकड. चलाया था 🌂पढने विद्यालय भेजा था 🌂मेरी नादानी को भी निज 🌂अन्‍तर में सदा सहेजा था 🌹मेरे सारे प्रश्‍नों का वो 🌹फौरन जवाब बन जाती थी 🌹मेरी राहों के कांटे चुन 🌹वो खुद गुलाब बन जाती थी 👓मैं बडा हुआ तो कॉलेज से 👓इक रोग प्‍यार का ले आया 👓जिस दिल में मां की मूरत थी 👓वो रामकली को दे आया 🌹शादी की पति से बाप बना 🌹अपने रिश्‍तों में झूल गया 🌹अब करवाचौथ मनाता हूं 🌹मां की ममता को भूल गया ☝हम भूल गये उसकी ममता ☝मेरे जीवन की थाती थी ☝हम भूल गये अपना जीवन ☝वो अमृत वाली छाती थी 🌹हम भूल गये वो खुद भूखी 🌹रह करके हमें खिलाती थी 🌹हमको सूखा बिस्‍तर देकर 🌹खुद गीले में सो जाती थी 💻हम भूल गये उसने ही 💻होठों को भाषा सिखलायी थी 💻मेरी नीदों के लिए रात भर 💻उसने लोरी गायी थी 🌹हम भूल गये हर गलती पर 🌹उसने डांटा समझाया था 🌹बच जाउं बुरी नजर से 🌹काला टीका सदा लगाया था 🏯हम बडे हुए तो ममता वाले 🏯सारे बन्‍धन तोड. आए 🏯बंगले में कुत्‍ते पाल लिए 🏯मां को वृद्धाश्रम छोड आए 🌹उसके सपनों का महल गिरा कर 🌹कंकर-कंकर बीन लिए 🌹खुदग़र्जी में उसके सुहाग के 🌹आभूषण तक छीन लिए 👑हम मां को घर के बंटवारे की 👑अभिलाषा तक ले आए 👑उसको पावन मंदिर से 👑गाली की भाषा तक ले आए 🌹मां की ममता को देख मौत भी 🌹आगे से हट जाती है 🌹गर मां अपमानित होती 🌹धरती की छाती फट जाती है 💧घर को पूरा जीवन देकर 💧बेचारी मां क्‍या पाती है 💧रूखा सूखा खा लेती है 💧पानी पीकर सो जाती है 🌹जो मां जैसी देवी घर के 🌹मंदिर में नहीं रख सकते हैं 🌹वो लाखों पुण्‍य भले कर लें 🌹इंसान नहीं बन सकते हैं ✋मां जिसको भी जल दे दे ✋वो पौधा संदल बन जाता है ✋मां के चरणों को छूकर पानी ✋गंगाजल बन जाता है 🌹मां के आंचल ने युगों-युगों से 🌹भगवानों को पाला है 🌹मां के चरणों में जन्‍नत है 🌹गिरिजाघर और शिवाला है 🌹हर घर में मां की पूजा हो 🌹ऐसा संकल्‍प उठाता हूं 🌹मैं दुनियां की हर मां के 🌹चरणों में ये शीश झुकाता हूं... 🙏🌹🌷😘🌷🌹🙏

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Manoj Prasadh Mar 6, 2021

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Santosh Hariharan Mar 6, 2021

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Manoj Prasadh Mar 6, 2021

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Rajesh Jain Mar 7, 2021

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Rajesh Jain Mar 7, 2021

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*एक कहानी* _*जीवन का टॉनिक*_ *मैं अपने विवाह के बाद अपनी पत्नी के साथ शहर में रह रहा था।* *बहुत साल पहले पिताजी मेरे घर आए थे। मैं उनके साथ सोफे पर बैठा बर्फ जैसा ठंडा जूस पीते हुए अपने पिताजी से विवाह के बाद की व्यस्त जिंदगी, जिम्मेदारियों और उम्मीदों के बारे में अपने ख़यालात का इज़हार कर रहा था और वे अपने गिलास में पड़े बर्फ के टुकड़ों को स्ट्रा से इधर-उधर नचाते हुए बहुत गंभीर और शालीन खामोशी से मुझे सुनते जा रहे थे।* *अचानक उन्होंने कहा- "अपने दोस्तों को कभी मत भूलना। तुम्हारे दोस्त उम्र के ढलने पर पर तुम्हारे लिए और भी महत्वपूर्ण और ज़रूरी हो जायेंगे। बेशक अपने बच्चों, बच्चों के बच्चों को भरपूर प्यार देना मगर अपने पुराने, निस्वार्थ और सदा साथ निभानेवाले दोस्तों को हरगिज़ मत भुलाना। वक्त निकाल कर उनके साथ समय ज़रूर बिताना। उनके घर खाना खाने जाना और जब मौक़ा मिले उनको अपने घर खाने पर बुलाना।* *कुछ ना हो सके तो फोन पर ही जब-तब, हालचाल पूछ लिया करना।"* *मैं नए-नए विवाहित जीवन की खुमारी में था और पिताजी मुझे यारी-दोस्ती के फलसफे समझा रहे थे।* *मैंने सोचा- "क्या जूस में भी नशा होता है जो पिताजी बिन पिए बहकी-बहकी बातें करने लगे? आखिर मैं अब बड़ा हो चुका हूँ, मेरी पत्नी और मेरा होने वाला परिवार मेरे लिए जीवन का मकसद और सब कुछ है।* *दोस्तों का क्या मैं अचार डालूँगा?"* *लेकिन फ़िर भी मैंने आगे चलकर एक सीमा तक उनकी बात माननी जारी रखी।* *मैं अपने गिने-चुने दोस्तों के संपर्क में लगातार रहा।* *समय का पहिया घूमता रहा और मुझे अहसास होने लगा कि उस दिन पिता 'जूस के नशे' में नहीं थे बल्कि उम्र के खरे तजुर्बे मुझे समझा रहे थे।* *उनको मालूम था कि उम्र के आख़िरी दौर तक ज़िन्दगी क्या और कैसे करवट बदलती है।* *हकीकत में ज़िन्दगी के बड़े-से-बड़े तूफानों में दोस्त कभी नाव बनकर, कभी पतवार बनकर तो कभी मल्लाह बनकर साथ निभाते हैं और कभी वे आपके साथ ही ज़िन्दगी की जंग में कूद पड़ते हैं।* *सच्चे दोस्तों का काम एक ही होता है- दोस्ती निभाना।* *ज़िन्दगी के पचास साल बीत जाने के बाद मुझे पता चलने लगा कि घड़ी की सुइयाँ पूरा चक्कर लगाकर वहीं पहुँच गयीं हैं जहाँ से मैंने जिंदगी शुरू की थी।* *विवाह होने से पहले मेरे पास सिर्फ दोस्त थे।* *विवाह के बाद बच्चे हुए।* *बच्चे बड़े हो हुए। उनकी जिम्मेदारियां निभाते-निभाते मैं बूढ़ा हो चला।* *बच्चों के विवाह हो गए और उनके अलग परिवार और घर बन गए।* *बेटियाँ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गयीं।* *उसके बाद उनकी रुचियाँ, मित्र-मंडलियाँ और जिंदगी अलग पटरी पर चलने लगीं।* *अपने घर में मैं और मेरी पत्नी ही रह गए।* *वक्त बीतता रहा।* *नौकरी का भी अंत आ गया।* *साथी-सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी मुझे बहुत जल्दी भूल गए।* *जो मालिक कभी छुट्टी मांगने पर मेरी मौजूदगी को कम्पनी के लिए जीने-मरने का सवाल बताता था, वह मुझे यूं भूल गया जैसे मैं कभी वहाँ काम करता ही नहीं था।* *एक चीज़ कभी नहीं बदली- मेरे मुठ्ठी-भर पुराने दोस्त।* *मेरी दोस्ती न तो कभी बूढ़ी हुई न ही रिटायर।* *आज भी जब मैं अपने दोस्तों के साथ होता हूँ, लगता है अभी तो मैं जवान हूँ और मुझे अभी बहुत साल और ज़िंदा रहना चाहिए।* *सच्चे दोस्त जिन्दगी की ज़रुरत हैं, कम ही सही कुछ दोस्तों का साथ हमेशा रखिये।* *वे कितने भी अटपटे, गैरजिम्मेदार, बेहूदे और कम अक्ल क्यों ना हों, ज़िन्दगी के खराब वक्त में उनसे बड़ा योद्धा और चिकित्सक मिलना नामुमकिन है।* *अच्छा दोस्त दूर हो चाहे पास हो, आपके दिल में धड़कता है।* *सच्चे दोस्त उम्र भर साथ रखिये और हर कीमत पर दोस्ती बचाइये।* *ये बचत उम्र-भर आपके काम आयेगी,,,!!!*

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🌷6.1.90🌷 *होलीहंस की परिभाषा* *🧘‍♂️योग का प्रयोग*🧘‍♀️ होली हंस की स्वच्छता अर्थात मन वचन- कर्म -संबंध सर्व में पवित्रता 🧘‍♀️ *तन की स्वच्छता वा पवित्रता की विधि स्मृति* सदा इस तन को आत्मा का मंदिर समझ स्वच्छ रखना है। बाप ने इस देव रूपी मंदिर का ट्रस्टी बनाया है । यह ट्रस्टी पन स्वत ही नष्टमोहा, अर्थात पवित्रता को अपने में लाता है। *😇स्वमान*:: *मैं आत्मा इस देह रूपी मंदिर में हीरे की मूर्ति हूं* । *🧘‍♂️मन की पवित्रता की विधि* *😇स्मृति*:: मनमनाभव का मंत्र को सदा स्मृति में रखना । *डायरेक्शन*👉🏻 मन को मेरे में लगाओ वा विश्व सेवा में लगाओ। *❤️दिल की स्वच्छता की विधि* *🌞स्वयं के पुरुषार्थ की स्वच्छता*- अपने स्व उन्नति अर्थ जो भी पुरुषार्थ है जैसा भी पुरुषार्थ है वह सच्चाई से बाप के आगे रखना। सेवा सच्ची दिल से करना। ब्राह्मण आत्मा का निजी संस्कार ही सेवा है। स्व-धर्म,स्व कर्म है। *👨‍👩‍👧‍👦संबंध में स्वच्छता की विधि*🤝 तीन प्रकार के संबंध में संतुष्टता रूपी स्वच्छता एक ब्राह्मण परिवार दूसरा जिज्ञासु आत्माओं के तीसरा अलौकिक परिवार के तीनों ही संबंध में सारे दिन में स्वयं भी संतुष्ट (मनसे हल्का और खुश रहना) और संबंध में आने वाली दूसरी आत्माओं की संतुष्ट था (दूसरे भी खुश होंगगे) सदा इन बातों में एवररेडी रहना है नहीं तो अलबेला पन का अंश प्रकट हो जाएगा । *इसको कहते हैं होली हंस की स्वच्छता*। 🌷ओम शान्ति🌷 नित याद करो मन से शिव को 🙏

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