P.K. ARYA
P.K. ARYA Dec 23, 2016

GREETINGS ON BIRTH CEREMONY - 23 DECEMBER 2016 PARSHVANATH TEMPLE- KHAJURAHO This temple belongs t

GREETINGS ON BIRTH CEREMONY - 23 DECEMBER 2016  PARSHVANATH TEMPLE- KHAJURAHO  This temple belongs t
GREETINGS ON BIRTH CEREMONY - 23 DECEMBER 2016  PARSHVANATH TEMPLE- KHAJURAHO  This temple belongs t
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GREETINGS ON BIRTH CEREMONY - 23 DECEMBER 2016  PARSHVANATH TEMPLE- KHAJURAHO  This temple belongs t

GREETINGS ON BIRTH CEREMONY - 23 DECEMBER 2016
PARSHVANATH TEMPLE- KHAJURAHO

This temple belongs to jain group of temples and is one of the important temples in khajuraho, It is said to have been originally dedicated to Bhagwan Adinath, the first tirthankar.
Parshvanatha temple (IAST: Pārśvanātha Mandir) is a 10th century Jain temple located at Khajuraho in Madhya Pradesh, India. It is now dedicated to Parshvanatha, although it was probably built as an Adinatha shrine during the Chandela period. Despite the temple's Jain affiliation, its exterior walls feature Vaishnavaite themes. The temple entrance has an inscription with a most-perfect magic square. This temple is part of UNESCO World Heritage Site along with other temples in the Khajuraho Group of Monuments.
The temple is believed to have been constructed by a prominent Jain family between 950 and 970 CE, during the reign of the Chandela king Dhanga. A 954 CE (1011) inscription on the left door jamb of the temple records gifts and endowments of gardens by one Pahila. The gardens are named Pahila-vatika, Chandra-vatika, Laghuchandra-vatika, Shankara-vatika, Panchaitala-vatika, Amra-vatika and Dhanga-vadi. The inscription describes Pahila as a devotee of Jinanatha, and states that he was held in great esteem by the king Dhanga.
The earliest idol enshrined in the temple appears to have been that of Adinatha. When the British archaeological surveyor Alexander Cunningham visited the temple in 1852, he found the main sanctum of the temple deserted. He described the temple as "Jinanatha temple", and wrote that it had been repaired by a Jain banker in 1847. In 1860, a Parshvanatha idol was installed in the main sanctum. An Adinatha statue was placed in a secondary shrine attached to the rear of the temple.
The temple has been classified as a Monument of National Importance by the Archaeological Survey of India.
The Parshvanatha temple is the largest among the Jain temples of Khajuraho. It has an entrance porch, a small hall, a large hall (mandapa), a vestibule, and a sanctum. The temple structure has an oblong architectural plan with projections at two ends. The front (eastern) projection forms the entrance porch, the back (western) projection is a shrine attached to the sanctum.
The ceiling of the entrance porch features chain and floral patterns, and a pair of intertwined flying vidyadharas. The door-lintel of the mandapa has the sculpture of Adinatha's attendant: a ten-armed Chakreshvari riding a Garuda. The sanctum features sculptures of the Jinas.
The outer walls of the temple have three bands of sculptures.These sculptures feature surasundaris (graceful women), flying couples, dancers, musicians, and celestial beings. Despite the temple's Jain affiliation, the outer walls also depict Vaishnavite themes including sculptures of various Hindu gods and their incarnations with their consorts. These include Vishnu-Lakshmi, Rama-Sita, Balarama-Revati, Parashurama, Hanuman, Brahma and Yamalarjuna legend of Krishna.

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Mamta Chauhan Oct 31, 2020

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Subhash Singh Oct 31, 2020

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Subhash Singh Oct 31, 2020

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Neha Sharma, Haryana Oct 31, 2020

*सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती 31 अक्टूबर अर्थात् उनके जन्म दिवस के अवसर पर विश्व एकता दिवस के रूप में मनाई जाती है। देश की आजादी में सरदार पटेल का योगदान हमेशा स्मरणीय रहेगा। 562 देशी रियासतों का भारत में विलय सरदार पटेल ने ही करवाया था। अटल निश्चय से ओत प्रोत सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती के मौके पर जानिए उनके ऐसे विचारों को जो किसी की भी जिंदगी में और समाज के परिदृश्य में बदलाव ला सकते हैं। सरदार पटेल कहा करते थे कि आज हमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, जाति-पंथ के भेदभावों को समाप्त कर देना चाहिए तभी हम एक उन्नत देश की कल्पना कर सकते है। सरदार पटेल के अनुसार मनुष्य को ठंडा रहना चाहिए और क्रोध नहीं करना चाहिए क्योंकि लोहा भले ही गर्म हो जाए परन्तु हथौड़े को तो ठंडा ही रहना चाहिए अन्यथा वह स्वयं अपना हत्था जला डालेगा। सरदार पटेल के विचार से व्यक्ति की अधिक अच्छाई उसके मार्ग में बाधक है, इसलिए अपनी आंखों को क्रोध से लाल होने दीजिए और अन्याय का सामना मजबूत हाथों से कीजिए। सरदार पटेल कहा करते थे कि अधिकार मनुष्य को तब तक अंधा बनाए रखेंगे, जब तक मनुष्य उस अधिकार को प्राप्त करने हेतु मूल्य न चुका दे। सरदार पटेल के अनुसार इंसान को अपना अपमान सहने की कला भी आनी चाहिए। इस प्रकार सरदार पटेल के विचारों से एक नई ऊर्जा का संचार होता है। सरदार पटेल की एक ही इच्छा थी कि भारत एक अच्छा उत्पादक हो और इस देश में कोई अन्न के लिए आंसू बहाता हुआ भूखा ना रहें।  🇮🇳🙏🇮🇳🙏🇮🇳🙏🇮🇳🙏🇮🇳🙏🇮🇳🙏🇮🇳🙏🇮🇳 पूरा नामसरदार वल्लभ भाई पटेलअन्य नामसरदार पटेलजन्म31 अक्टूबर, 1875जन्म भूमिनाडियाड, गुजरातमृत्यु15 दिसंबर, 1950 (उम्र- 75)मृत्यु स्थानमुम्बई, महाराष्ट्रमृत्यु कारणदिल का दौराअभिभावकझवेरभाई पटेल, लाड़बाईपति/पत्नीझवेरबा[1]संतानपुत्र- दहयाभाई पटेल, पुत्री- मणिबेन पटेलनागरिकताभारतीयप्रसिद्धिभारत के लौहपुरुषपार्टीभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसपदउप प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, सूचना मंत्री और राज्य मंत्रीकार्य काल15 अगस्त, 1947 से 15 दिसंबर, 1950शिक्षावक़ालतभाषाहिंदीजेल यात्रा(1930), जनवरी 1932, अक्टूबर 1940पुरस्कार-उपाधिभारत रत्नविशेष योगदानदेशी रियासतों का विलय स्वतंत्र भारत की पहली उपलब्धि थी और निर्विवाद रूप से सरदार पटेल का इसमें विशेष योगदान था। नीतिगत दृढ़ता के लिए गाँधीजी ने उन्हें 'सरदार' और 'लौह पुरुष' की उपाधि दी थी।संबंधित लेखराष्ट्रीय एकता दिवस, विट्ठलदास झवेरभाई पटेलआंदोलननमक सत्याग्रहउपाधियाँ'लौहपुरुष', 'भारत का बिस्मार्क'अन्य जानकारीवास्तव में सरदार पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व में विस्मार्क[2] जैसी संगठन कुशलता, कौटिल्य जैसी राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। सरदार वल्लभभाई पटेल (अंग्रेज़ी: Sardar Vallabhbhai Patel; जन्म- 31 अक्टूबर, 1875, गुजरात; मृत्यु- 15 दिसंबर, 1950, महाराष्ट्र) प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री थे। वे 'सरदार पटेल' के उपनाम से प्रसिद्ध हैं। सरदार पटेल भारतीय बैरिस्टर और प्रसिद्ध राजनेता थे। भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' के नेताओं में से वे एक थे। 1947 में भारत की आज़ादी के बाद पहले तीन वर्ष वे उप प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सूचना मंत्री और राज्य मंत्री रहे थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद क़रीब पाँच सौ से भी ज़्यादा देसी रियासतों का एकीकरण एक सबसे बड़ी समस्या थी। कुशल कूटनीति और ज़रूरत पड़ने पर सैन्य हस्तक्षेप के जरिए सरदार पटेल ने उन अधिकांश रियासतों को तिरंगे के तले लाने में सफलता प्राप्त की। इसी उपलब्धि के चलते उन्हें लौह पुरुष या भारत का बिस्मार्क की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्हें मरणोपरांत वर्ष 1991 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' दिया गया। वर्ष 2014 में सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती (31 अक्टूबर) 'राष्ट्रीय एकता दिवस' के रूप में मनाई जाती है। जीवन परिचय सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 ई. में नाडियाड, गुजरात में हुआ था। उनका जन्म लेवा पट्टीदार जाति के एक समृद्ध ज़मींदार परिवार में हुआ था। वे अपने पिता झवेरभाई पटेल एवं माता लाड़बाई की चौथी संतान थे। सोमभाई, नरसीभाई और विट्ठलदास झवेरभाई पटेल उनके अग्रज थे। पारम्परिक हिन्दू माहौल में पले-बढ़े सरदार पटेल ने करमसद में प्राथमिक विद्यालय और पेटलाद स्थित उच्च विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की, लेकिन उन्होंने अधिकांश ज्ञान स्वाध्याय से ही अर्जित किया। 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया। 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और ज़िला अधिवक्ता की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए, जिससे उन्हें वक़ालत करने की अनुमति मिली। सन 1900 में उन्होंने गोधरा में स्वतंत्र ज़िला अधिवक्ता कार्यालय की स्थापना की और दो साल बाद खेड़ा ज़िले के बोरसद नामक स्थान पर चले गए। परिवार सरदार पटेल के पिता झबेरभाई एक धर्मपरायण व्यक्ति थे। गुजरात में सन 1829 ई. में स्वामी सहजानन्द द्वारा स्थापित स्वामी नारायण पंथ के वे परम भक्त थे। 55 वर्ष की अवस्था के उपरान्त उन्होंने अपना जीवन उसी में अर्पित कर दिया था। वल्लभभाई ने स्वयं कहा है- "मैं तो साधारण कुटुम्ब का था। मेरे पिता मन्दिर में ही ज़िन्दगी बिताते थे और वहीं उन्होंने पूरी की।" वल्लभभाई की माता लाड़बाई अपने पति के समान एक धर्मपरायण महिला थीं। वल्लभभाई पाँच भाई व एक बहन थे। भाइयों के नाम क्रमशः सोभाभाई, नरसिंहभाई, विट्ठलभाई, वल्लभभाई और काशीभाई थे। बहन डाबीहा सबसे छोटी थी। इनमें विट्ठलभाई तथा वल्लभभाई ने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेकर भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया। माता-पिता के गुण संयम, साहस, सहिष्णुता, देश-प्रेम का प्रभाव वल्लभभाई के चरित्र पर स्पष्ट था।[3] *31 अक्टूबर 1875: भारत के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभ पटेल का जन्म हुआ. *स्वतंत्र भारत के पहले तीन वर्ष सरदार पटेल देश के प्रथम उप-प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री रहे। पटेल ने भारतीय संघ में उन रियासतों का विलय किया जो स्वयं में सम्प्रभुता प्राप्त थीं। उनका अलग झंडा और अलग शासक था। *सरदार पटेल को 1991 में मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया *भारत के लौह पुरुष (Iron Man of India) की जयंती को मनाने के लिए भारत सरकार द्वारा साल 2014 में राष्ट्रीय एकता दिवस (National Unity Day) की शुरुआत की गई थी. #AajKa_Itihaas...... *जय हिन्द 🇮🇳 जय भारत 🇮🇳 वंदेमातरम्* 🇮🇳🙏*भारत माता की जय*🙏🇮🇳

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Jai Mata Di Oct 31, 2020

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asha mishra Oct 31, 2020

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