dilip
dilip Sep 20, 2017

जय श्री बाबा महाकाल की

जय श्री बाबा महाकाल की

*🗣सुबह होती है,शाम होती है,*
*जिंदगी यूं ही तमाम होती है,*

*पर जिंदगी होती है,*
*खुशनसीब उनकी,*

*जिनकी जिंदगी,*
*"मेरे महाकाल" के नाम होती है।*

*जय श्री बाबा महाकाल*

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Sumitra Soni Sep 28, 2020

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🌹🕉🌹🕉🌹🕉🌹🕉🌹🕉🌹🕉🌹🕉 जय श्री राम जी जय हनुमानजी हर हर महादेव सुप्रभात वन्दन जी 🌹🔯मंगलवार के दिन प्रदोष व्रत होने की वजह से इस व्रत को भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव के साथ भगवान हनुमान की पूजा और अधिक फलदायी मानी गई है।  आश्विन मास में इस साल अधिक मास जुड़ गया है इसलिए इस बार अधिक प्रदोष व्रत किया जाएगा। यह व्रत 29 सितंबर, मंगलवार के दिन रखा जाएगा। मंगलवार के दिन प्रदोष व्रत होने की वजह से इस व्रत को भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव के साथ भगवान हनुमान की पूजा और अधिक फलदायी मानी गई है। प्रदोष व्रत का महत्व हिंदू पंचांग के मुताबिक शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को भगवान शिव की आराधना कर प्रदोष व्रत किया जाता है। इस व्रत को परम पावन माना गया है। कहते हैं कि जो व्यक्ति प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की आराधना करता है भगवान की हमेशा उस पर अपनी कृपा बनी रहती है पौराणिक कथा के अनुसार चंद्र देव महाराजा दक्ष की 27 पुत्रियों से विवाह किया। लेकिन उनमें से एक उन्हें अत्यधिक प्रिय थी। वह उसी के साथ अपना अधिकांश समय व्यतीत करते थे। इससे क्रोधित होकर महाराजा दक्ष ने चंद्र देव को यह श्राप दिया कि उन्हें क्षय रोगी लगेगा। धीरे-धीरे श्राप सच होने लगा और चंद्र देव मृत्यु के निकट पहुंच गए। तब भगवान शिव की कृपा से प्रदोष काल में चंद्र देव को पुनर्जीवित किया गप्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त पूजा का शुभ मुहूर्त – शाम 6 बजकर 9 मिनट से रात 8 बजकर 34 मिनट तक त्रयोदशी तिथि आरंभ – 28 सितंबर, सोमवार – रात 8 बजकर 58 मिनट से त्रयोदशी तिथि समाप्त – 29 सितंबर, मंगलवार – रात 10 बजकर 33 मिनट तक प्रदोष व्रत पूजा विधि इस दिन सूर्योदय से पहले उठें। स्नानादि कर पवित्र हो जाएं। सफेद या बादामी रंग के कपड़े पहनें। एक चौकी लें। उस पर सफेद रंग का कपड़ा बिछाएं। फिर स्वास्तिक बनाकर भगवान गणेश का ध्यान करते हुए उस पर चावल और फूल चढ़ाएं। फिर उस पर भगवान शिव की प्रतिमा विराजित करें। उन्हें सफेद फूलों का हार पहनाएं। भगवान शिव का ध्यान करते हुए उन्हें प्रणाम करें। साथ में दीप और धूप जलाएं। ओम नमः शिवाय का 108 बार जाप करें। शिव चालीसा, शिव स्तुति और शिव आरती के साथ पूजा संपन्न करें। फिर भगवान शिव को सफेद मिठाई का भोग लगाएं। संभव हो तो खीर का भोग लगाया जा सकता है। प्रसाद बांट कर खुद भी प्रसाद लें। या। तब से ही त्रयोदशी के दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत कथा किसी भी व्रत को करने के पीछे कोई न कोई पौराणिक महत्व और कथा अवश्य होती है। तो चलिए जानते हैं इस व्रत की पौराणिक कथा के बारे में - स्कंद पुराण में दी गयी एक कथा के अनुसार प्राचीन समय की बात है। एक विधवा ब्राह्मणी अपने बेटे के साथ रोज़ाना भिक्षा मांगने जाती और संध्या के समय तक लौट आती। हमेशा की तरह एक दिन जब वह भिक्षा लेकर वापस लौट रही थी तो उसने नदी किनारे एक बहुत ही सुन्दर बालक को देखा लेकिन ब्राह्मणी नहीं जानती थी कि वह बालक कौन है और किसका है ? दरअसल उस बालक का नाम धर्मगुप्त था और वह विदर्भ देश का राजकुमार था। उस बालक के पिता को जो कि विदर्भ देश के राजा थे, दुश्मनों ने उन्हें युद्ध में मौत के घाट उतार दिया और राज्य को अपने अधीन कर लिया। पिता के शोक में धर्मगुप्त की माता भी चल बसी और शत्रुओं ने धर्मगुप्त को राज्य से बाहर कर दिया। बालक की हालत देख ब्राह्मणी ने उसे अपना लिया और अपने पुत्र के समान ही उसका भी पालन-पोषण किया कुछ दिनों बाद ब्राह्मणी अपने दोनों बालकों को लेकर देवयोग से देव मंदिर गई, जहाँ उसकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई।ऋषि शाण्डिल्य एक विख्यात ऋषि थे, जिनकी बुद्धि और विवेक की हर जगह चर्चा थी। ऋषि ने ब्राह्मणी को उस बालक के अतीत यानि कि उसके माता-पिता के मौत के बारे में बताया, जिसे सुन ब्राह्मणी बहुत उदास हुई। ऋषि ने ब्राह्मणी और उसके दोनों बेटों को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी और उससे जुड़े पूरे वधि-विधान के बारे में बताया। ऋषि के बताये गए नियमों के अनुसार ब्राह्मणी और बालकों ने व्रत सम्पन्न किया लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि इस व्रत का फल क्या मिल सकता है। कुछ दिनों बाद दोनों बालक वन विहार कर रहे थे तभी उन्हें वहां कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आईं जो कि बेहद सुन्दर थी। राजकुमार धर्मगुप्त अंशुमती नाम की एक गंधर्व कन्या की ओर आकर्षित हो गए। कुछ समय पश्चात् राजकुमार और अंशुमती दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे और कन्या ने राजकुमार को विवाह हेतु अपने पिता गंधर्वराज से मिलने के लिए बुलाया। कन्या के पिता को जब यह पता चला कि वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार है तो उसने भगवान शिव की आज्ञा से दोनों का विवाह कराया। राजकुमार धर्मगुप्त की ज़िन्दगी वापस बदलने लगी। उसने बहुत संघर्ष किया और दोबारा अपनी गंधर्व सेना को तैयार किया। राजकुमार ने विदर्भ देश पर वापस आधिपत्य प्राप्त कर लिया। कुछ समय बाद उसे यह मालूम हुआ कि बीते समय में जो कुछ भी उसे हासिल हुआ है वह ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के द्वारा किये गए प्रदोष व्रत का फल था। उसकी सच्ची आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे जीवन की हर परेशानी से लड़ने की शक्ति दी। उसी समय से हिदू धर्म में यह मान्यता हो गई कि जो भी व्यक्ति प्रदोष व्रत के दिन शिवपूजा करेगा और एकाग्र होकर प्रदोष व्रत की कथा सुनेगा और पढ़ेगा उसे सौ जन्मों तक कभी किसी परेशानी या फिर दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ेगा।

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Shikhaashu singh Sep 29, 2020

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