संत सूरदास जी के जीवन का एक प्रसंग- एक बार संत सूरदास जी को किसी ने भजन के लिए आमंत्रित किया.. भजन कार्यक्रम के बाद उस व्यक्ति को सूरदास जी को अपने घर तक पहुँचाने का ध्यान नही रहा और वह अन्य अतिथियों की सेवा में व्यस्त हो गया। सूरदास जी ने भी उसे कष्ट नहीं देना चाहा और खुद लाठी लेकर गोविंद–गोविंद करते हुये अंधेरी रात में पैदल घर की ओर निकल पड़े । रास्ते मे एक कुआं पड़ता था । वे लाठी से टटोलते–टटोलते भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते हुये बढ़ रहे थे और चलते चलते कुएं में गिर गये। तो उन्होंने श्रीकृष्ण को पुकारा। कोई बालक आकर बोला बाबा! आप मेरे हाथ पकड लो… मैं आपको निकाल दुंगा। तो सुरदास जी उस बालक का हाथ पकड लिए… जब वो पकडे उनके तन में बिजली सी दौड गई। शरीर रोमांचित होने लगा… बालक का हाथ कमल से भी कोमल है। ऐसा शरीर मैंने कभी छुआ ही नहीं… बालक की शरीर से महक आ रही थी… चंदन,कस्तूरी, तुलसी का भीनी भीनी सुगंध नाशा में प्रवेश कर रही है… दिव्य अनुभूति हो रहा है। अब उन्हें लगा कि उस बालक ने उनकी लाठी पकड़ ली है… मार्ग दिखाकर ले जाने लगा है। तब उन्होंने पूछा - तुम कौन हो ? उत्तर मिला – बाबा! मैं एक बालक हूँ । मैं भी आपका भजन सुन कर लौट रहा हूँ… आपके पिछे पिछे ही आ रहा था। देखा कि आप कुएं में गिर गये हैं…तो दौड कर इधर आ गया । चलिये, आपको आपके घर तक छोड़ दूँ। सूरदास जी ने पूछा- तुम्हारा नाम क्या है पुत्र ? "बाबा! अभी तक माँ ने मेरा नाम नहीं रखा है।‘ तब मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ ? कोई भी नाम चलेगा बाबा… लोग मुझे तरह तरह के नाम से पुकारते हैं… कितना गिनाउं आपको ? सूरदास जी ने रास्ते में और कई सवाल पूछे। उन्हे लगा कि हो न हो, यह मेरे कन्हैया ही है। वे समझ गए कि आज गोपाल खुद मेरे पास आए हैं । क्यो नहीं मैं इनका हाथ पकड़ लूँ । यह सोंच उन्होने अपना हाथ उस लकड़ी पर श्रीकृष्ण की ओर बढ़ाने लगे । भगवान श्रीकृष्ण उनकी यह चाल समझ गए… वो तो अंतर्यामी हैं ही… उनसे क्या छुपा है । सूरदास जी का हाथ धीरे–धीरे आगे बढ़ रहा था । जब केवल चार अंगुल अंतर रह गया, तब श्रीकृष्ण लाठी को छोड़ दूर चले गए । जैसे उन्होने लाठी छोड़ी, सूरदास जी विह्वल हो गए… आंखो से अश्रुधारा बह निकली । बोले - "मैं अंधा हूँ ,ऐसे अंधे की लाठी छोड़ कर चले जाना क्या कन्हैया तुम्हारी बहादुरी है ? और.. उनके श्रीमुख से वेदना के यह स्वर निकल पड़े “हाथ छुड़ाये जात हो, निर्बल जानि के मोय । हृदय से जब जाओगे, तो सबल जानूँगा तोय ।।" अर्थात् मुझे निर्बल जानकार मेरा हाथ छुड़ा कर जाते हो, पर मेरे हृदय से जाओ तो मैं तुम्हें बलवान कहूँ…पुरुष समझुं। भगवान तो सदैव भक्त के पिछे पिछे चलते हैं… आज भगवान भक्त सुरदास जी के पिछे पिछे चल रहे हैं… भगवान भक्त के हाथ कभी नहीं छोडते। आज भगवान ने सुरदास जी का हाथ पकड लिया। भगवान श्रीकृष्ण सुरदास जी के बात सुनकर बोले… "बाबा! अगर मैं ऐसे भक्तों के हृदय से चला जाऊं तो फिर मैं कहाँ रहूँ ?… आप ही बताओ। मैं ना वैकुंठ में हुं…ना यज्ञ स्थल पर जहां मंत्रों से आहुति दी जाती है। मैं तो भक्तों के हृदय में रहता हूँ… जब वो मुझको स्मरण करते हैं,मैं भी उनका स्मरण करता हूँ। मुझे मेरे पत्नी लक्ष्मी जी उतनी प्रिय नहीं हैं, मुझे दाउ भैया उतने प्रिय नहीं हैं… मेरे स्वांश भगवान शंकर जी उतने प्रिय नहीं हैं… और क्या कहुं मुझे मेरे प्राण जितने प्रिय नहीं हैं…उतने प्रिय मेरे भक्तजन हैं… उनके लिए मैं स्वयं उपस्थित हुं बाबा!… जो मेरा निंदा करता है मैं उसे क्षमा कर सकता हूँ… पर जो मेरे भक्तों की निंदा, अपमान करता है मैं उसको कभी क्षमा नहीं करता… जब वो भक्त क्षमा करेगा तब मैं क्षमा करुंगा। ऋषि दुर्वासा जी ने महाराज अंबरीष जी का अपमान कर दिया… तो भगवान का सुदर्शन चक्र चल पडा… जब ऋषि दुर्वासा ने महाराज अंबरीष से क्षमा मांगे,तब सुदर्शन चक्र अलक्षित हो गया… ऐसो है हमारा कन्हैया… जय श्री कृष्णा जय जगन्नाथ

संत सूरदास जी के जीवन का एक प्रसंग-

एक बार संत सूरदास जी को किसी ने भजन के लिए आमंत्रित किया..
भजन कार्यक्रम के बाद उस व्यक्ति को सूरदास जी को अपने घर तक पहुँचाने का ध्यान नही रहा और वह अन्य अतिथियों की सेवा में व्यस्त हो गया।

सूरदास जी ने भी उसे कष्ट नहीं देना चाहा और खुद लाठी लेकर गोविंद–गोविंद करते हुये अंधेरी रात में पैदल घर की ओर निकल पड़े ।
रास्ते मे एक कुआं पड़ता था ।
वे लाठी से टटोलते–टटोलते भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते हुये बढ़ रहे थे और चलते चलते कुएं में गिर गये। तो उन्होंने श्रीकृष्ण को पुकारा। कोई बालक आकर बोला बाबा! आप मेरे हाथ पकड लो… मैं आपको निकाल दुंगा। तो सुरदास जी उस बालक का हाथ पकड लिए… जब वो पकडे उनके तन में बिजली सी दौड गई। शरीर रोमांचित होने लगा… बालक का हाथ कमल से भी कोमल है। ऐसा शरीर मैंने कभी छुआ ही नहीं… बालक की शरीर से महक आ रही थी… चंदन,कस्तूरी, तुलसी का भीनी भीनी सुगंध नाशा में प्रवेश कर रही है… दिव्य अनुभूति हो रहा है।
अब उन्हें लगा कि उस बालक ने उनकी लाठी पकड़ ली है… मार्ग दिखाकर ले जाने लगा है।

तब उन्होंने पूछा - तुम कौन हो ? उत्तर मिला – बाबा! मैं एक बालक हूँ । मैं भी आपका भजन सुन कर लौट रहा हूँ… आपके पिछे पिछे ही आ रहा था। देखा कि आप कुएं में गिर गये हैं…तो दौड कर इधर आ गया । चलिये, आपको आपके घर तक छोड़ दूँ।
सूरदास जी ने पूछा- तुम्हारा नाम क्या है पुत्र ?
"बाबा! अभी तक माँ ने मेरा नाम नहीं रखा है।‘
तब मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ ?
कोई भी नाम चलेगा बाबा… लोग मुझे तरह तरह के नाम से पुकारते हैं… कितना गिनाउं आपको ?

सूरदास जी ने रास्ते में और कई सवाल पूछे।
उन्हे लगा कि हो न हो, यह मेरे कन्हैया ही है।
वे समझ गए कि आज गोपाल खुद मेरे पास आए हैं । क्यो नहीं मैं इनका हाथ पकड़ लूँ ।
यह सोंच उन्होने अपना हाथ उस लकड़ी पर श्रीकृष्ण की ओर बढ़ाने लगे ।
भगवान श्रीकृष्ण उनकी यह चाल समझ गए… वो तो अंतर्यामी हैं ही… उनसे क्या छुपा है ।
सूरदास जी का हाथ धीरे–धीरे आगे बढ़ रहा था । जब केवल चार अंगुल अंतर रह गया, तब श्रीकृष्ण लाठी को छोड़ दूर चले गए । जैसे उन्होने लाठी छोड़ी, सूरदास जी विह्वल हो गए… आंखो से अश्रुधारा बह निकली । बोले - "मैं अंधा हूँ ,ऐसे अंधे की लाठी छोड़ कर चले जाना क्या कन्हैया तुम्हारी बहादुरी है ?

और..
उनके श्रीमुख से वेदना के यह स्वर निकल पड़े

“हाथ छुड़ाये जात हो, निर्बल जानि के मोय ।
हृदय से जब जाओगे, तो सबल जानूँगा तोय ।।"
अर्थात् मुझे निर्बल जानकार मेरा हाथ छुड़ा कर जाते हो, पर मेरे हृदय से जाओ तो मैं तुम्हें बलवान कहूँ…पुरुष समझुं।

भगवान तो सदैव भक्त के पिछे पिछे चलते हैं… आज भगवान भक्त सुरदास जी के पिछे पिछे चल रहे हैं… भगवान भक्त के हाथ कभी नहीं छोडते। आज भगवान ने सुरदास जी का हाथ पकड लिया। भगवान श्रीकृष्ण सुरदास जी के बात सुनकर बोले…
"बाबा! अगर मैं ऐसे भक्तों के हृदय से चला जाऊं तो फिर मैं कहाँ रहूँ ?… आप ही बताओ। मैं ना वैकुंठ में हुं…ना यज्ञ स्थल पर जहां मंत्रों से आहुति दी जाती है। मैं तो भक्तों के हृदय में रहता हूँ… जब वो मुझको स्मरण करते हैं,मैं भी उनका स्मरण करता हूँ। मुझे मेरे पत्नी लक्ष्मी जी उतनी प्रिय नहीं हैं, मुझे दाउ भैया उतने प्रिय नहीं हैं… मेरे स्वांश भगवान शंकर जी उतने प्रिय नहीं हैं… और क्या कहुं मुझे मेरे प्राण जितने प्रिय नहीं हैं…उतने प्रिय मेरे भक्तजन हैं… उनके लिए मैं स्वयं उपस्थित हुं बाबा!… जो मेरा निंदा करता है मैं उसे क्षमा कर सकता हूँ… पर जो मेरे भक्तों की निंदा, अपमान करता है मैं उसको कभी क्षमा नहीं करता… जब वो भक्त क्षमा करेगा तब मैं क्षमा करुंगा। ऋषि दुर्वासा जी ने महाराज अंबरीष जी का अपमान कर दिया… तो भगवान का सुदर्शन चक्र चल पडा… जब ऋषि दुर्वासा ने महाराज अंबरीष से क्षमा मांगे,तब सुदर्शन चक्र अलक्षित हो गया… ऐसो है हमारा कन्हैया…

जय श्री कृष्णा जय जगन्नाथ

+55 प्रतिक्रिया 14 कॉमेंट्स • 162 शेयर

कामेंट्स

Devendra Tiwari Apr 15, 2021
🙏🌹Jai Mata Di 🌹🙏 🌹Jai Shree Radhe Krishna🌹 Subh Ratri Bandan ji 🌹🙏🙏

Vijay C Pandey Apr 15, 2021
jai shree Hari Narayana namo bhagwate vasudevay namah 🙏🙏🌷🌷🥀🥀🌹🌹

Deepak Singh Apr 16, 2021
पूरी कहानी कैसे दिखती है भाई?

Ameet Apr 16, 2021
जय श्री कृष्ण

Ameet Apr 16, 2021
राधे राधे

Babulal patel Apr 17, 2021
acharya g 🙏🙏🌷 jay Shree Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe 🌷 Krishna 🌷

Sachin May 4, 2021
जय श्री राधे कृष्णा

+336 प्रतिक्रिया 79 कॉमेंट्स • 290 शेयर

रामायण पवित्र ग्रंथ है। इसकी कथा जितनी आदर्श है उसके पात्र उतने ही प्रेरणादायी। क्या आप रामायण के सभी पात्रों को जानते हैं, नहीं, तो यह जानकारी आपके लिए है। प्रस्तुत है रामायण के प्रमुख पात्र और उनका परिचय ... दशरथ – रघुवंशी राजा इन्द्र के मित्र कौशल के राजा तथा राजधानी एवं निवास अयोध्या कौशल्या – दशरथ की बड़ी रानी,राम की माता सुमित्रा - दशरथ की मंझली रानी,लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न की माता कैकयी - दशरथ की छोटी रानी, भरत की माता सीता – जनकपुत्री,राम की पत्नी उर्मिला – जनकपुत्री, लक्ष्मण की पत्नी मांडवी – जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री,भरत की पत्नी श्रुतकीर्ति - जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री,शत्रुघ्न की पत्नी राम – दशरथ तथा कौशल्या के पुत्र, सीता के पति लक्ष्मण - दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्र,उर्मिला के पति भरत – दशरथ तथा कैकयी के पुत्र,मांडवी के पति शत्रुघ्न - दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्रश्रुतकीर्ति के पति,मथुरा के राजा लवणासूर के संहारक शान्ता – दशरथ की पुत्री,राम भगिनी बाली – किष्किन्धा (पंपापुर) का राजा,रावण का मित्र तथा साढ़ू,साठ हजार हाथियों का बल सुग्रीव – बाली का छोटा भाई,जिनकी हनुमान जी ने मित्रता करवाई तारा – बाली की पत्नी,अंगद की माता, पंचकन्याओं में स्थान रुमा – सुग्रीव की पत्नी,सुषेण वैद्य की बेटी अंगद – बाली तथा तारा का पुत्र । रावण – ऋषि पुलस्त्य का पौत्र, विश्रवा तथा पुष्पोत्कटा का पुत्र कुंभकर्ण – रावण तथा कुंभिनसी का भाई, विश्रवा तथा पुष्पोत्कटा का पुत्र कुंभिनसी – रावण तथा कुुंंभकर्ण की भगिनी,विश्रवा तथा पुष्पोत्कटा की पुत्री विश्रवा - ऋषि पुलस्त्य का पुत्र, पुष्पोत्कटा-राका-मालिनी का पति विभीषण – विश्रवा तथा राका का पुत्र,राम का भक्त पुष्पोत्कटा – विश्रवा की पत्नी,रावण, कुंभकर्ण तथा कुंभिनसी की माता राका – विश्रवा की पत्नी,विभीषण की माता मालिनी - विश्रवा की तीसरी पत्नी,खर-दूषण,त्रिसरा तथा शूर्पणखा की माता । त्रिसरा – विश्रवा तथा मालिनी का पुत्र,खर-दूषण का भाई एवं सेनापति शूर्पणखा - विश्रवा तथा मालिनी की पुत्री, खर-दूषण एवं त्रिसरा की भगिनी,विंध्य क्षेत्र में निवास । मंदोदरी – रावण की पत्नी,तारा की भगिनी, पंचकन्याओं में स्थान मेघनाद – रावण का पुत्र इंद्रजीत,लक्ष्मण द्वारा वध दधिमुख – सुग्रीव का मामा ताड़का – राक्षसी,मिथिला के वनों में निवास,राम द्वारा वध। मारिची – ताड़का का पुत्र,राम द्वारा वध (स्वर्ण मृग के रूप में)। सुबाहू – मारिची का साथी राक्षस,राम द्वारा वध। सुरसा – सर्पों की माता। त्रिजटा – अशोक वाटिका निवासिनी राक्षसी, रामभक्त,सीता की अनुरागी त्रिजटा विभीषण की पुत्री थी। प्रहस्त – रावण का सेनापति,राम-रावण युद्ध में मृत्यु। विराध – दंडक वन में निवास,राम लक्ष्मण द्वारा मिलकर वध। शंभासुर – राक्षस, इन्द्र द्वारा वध, इसी से युद्ध करते समय कैकेई ने दशरथ को बचाया था तथा दशरथ ने वरदान देने को कहा। सिंहिका(लंकिनी) – लंका के निकट रहने वाली राक्षसी,छाया को पकड़कर खाती थी। कबंद – दण्डक वन का दैत्य,इन्द्र के प्रहार से इसका सर धड़ में घुस गया,बाहें बहुत लम्बी थी,राम-लक्ष्मण को पकड़ा राम-लक्ष्मण ने गड्ढा खोद कर उसमें गाड़ दिया। जामवंत – रीछ,रीछ सेना के सेनापति। नल – सुग्रीव की सेना का वानरवीर। नील – सुग्रीव का सेनापति जिसके स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरते थे,सेतुबंध की रचना की थी। नल और नील – सुग्रीव सेना मे इंजीनियर व राम सेतु निर्माण में महान योगदान। (विश्व के प्रथम इंटरनेशनल हाईवे “रामसेतु”के आर्किटेक्ट इंजीनियर) शबरी – अस्पृश्य जाति की रामभक्त, मतंग ऋषि के आश्रम में राम-लक्ष्मण का आतिथ्य सत्कार। संपाती – जटायु का बड़ा भाई,वानरों को सीता का पता बताया। जटायु – रामभक्त पक्षी,रावण द्वारा वध, राम द्वारा अंतिम संस्कार। गुह – श्रंगवेरपुर के निषादों का राजा, राम का स्वागत किया था। हनुमान – पवन के पुत्र,राम भक्त,सुग्रीव के मित्र। सुषेण वैद्य – सुग्रीव के ससुर । केवट – नाविक,राम-लक्ष्मण-सीता को गंगा पार कराई। शुक्र-सारण – रावण के मंत्री जो बंदर बनकर राम की सेना का भेद जानने गए। अगस्त्य – पहले आर्य ऋषि जिन्होंने विन्ध्याचल पर्वत पार किया था तथा दक्षिण भारत गए। गौतम – तपस्वी ऋषि,अहिल्या के पति,आश्रम मिथिला के निकट। अहिल्या - गौतम ऋषि की पत्नी,इन्द्र द्वारा छलित तथा पति द्वारा शापित,राम ने शाप मुक्त किया,पंचकन्याओं में स्थान। ऋण्यश्रंग – ऋषि जिन्होंने दशरथ से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराया था। सुतीक्ष्ण – अगस्त्य ऋषि के शिष्य,एक ऋषि। मतंग – ऋषि,पंपासुर के निकट आश्रम, यहीं शबरी भी रहती थी। वशिष्ठ – अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं के गुरु। विश्वामित्र – राजा गाधि के पुत्र,राम-लक्ष्मण को धनुर्विद्या सिखाई थी। शरभंग – एक ऋषि, चित्रकूट के पास आश्रम। सिद्धाश्रम – विश्वमित्र के आश्रम का नाम। भारद्वाज – वाल्मीकि के शिष्य,तमसा नदी पर क्रौंच पक्षी के वध के समय वाल्मीकि के साथ थे,मां-निषाद’ वाला श्लोक कंठाग्र कर तुरंत वाल्मीकि को सुनाया था। सतानन्द – राम के स्वागत को जनक के साथ जाने वाले ऋषि। युधाजित – भरत के मामा। जनक – मिथिला के राजा। सुमन्त – दशरथ के आठ मंत्रियों में से प्रधान । मंथरा – कैकयी की मुंह लगी दासी,कुबड़ी। देवराज – जनक के पूर्वज-जिनके पास परशुराम ने शंकर का धनुष सुनाभ (पिनाक) रख दिया था। मय दानव - रावण का ससुर और उसकी पत्नी मंदोदरी का पिता मायावी --मय दानव का पुत्र और रावण का साला, जिसका बालि ने वध किया था मारीच --रावण का मामा सुमाली --रावण का नाना माल्यवान --सुमाली का भाई, रावण का वयोवृद्ध मंत्री नारंतक - रावण का पुत्र,मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण रावण ने उसे सागर में प्रवाहित कर दिया था। रावण ने अकेले पड़ जाने के कारण युद्ध में उसकी सहायता ली थी। दधिबल - अंगद का पुत्र जिसने नारंतक का वध किया था। नारंतक शापित था कि उसका वध दधिबल ही करेगा। अयोध्या – राजा दशरथ के कौशल प्रदेश की राजधानी,बारह योजन लंबी तथा तीन योजन चौड़ी नगर के चारों ओर ऊंची व चौड़ी दीवारों व खाई थी,राजमहल से आठ सड़कें बराबर दूरी पर परकोटे तक जाती थी। साभार संकलन 🙏पं.प्रणयन एम पाठक🙏 जय श्री राम 🚩

+213 प्रतिक्रिया 73 कॉमेंट्स • 232 शेयर
Renu Singh May 8, 2021

+405 प्रतिक्रिया 79 कॉमेंट्स • 285 शेयर
Archana Singh May 8, 2021

+300 प्रतिक्रिया 69 कॉमेंट्स • 137 शेयर

*एक दिन एक कुत्ता 🐕 जंगल में रास्ता खो गया..* *तभी उसने देखा, एक शेर 🦁 उसकी तरफ आ रहा है..* *कुत्ते की सांस रूक गयी..* *"आज तो काम तमाम मेरा..!"* *फिर उसने सामने कुछ सूखी हड्डियाँ ☠ पड़ी देखीं..* *वो आते हुए शेर की तरफ पीठ कर के बैठ गया..* *और एक सूखी हड्डी को चूसने लगा और जोर-जोर से बोलने लगा..* *"वाह ! शेर को खाने का मज़ा ही कुछ और है..* *एक और मिल जाए तो पूरी दावत हो जायेगी !"* *और उसने जोर से डकार मारी..* *इस बार शेर सोच में पड़ गया..* *उसने सोचा-* *"ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है !* *जान बचा कर भागने में ही भलाई है !"* *और शेर वहाँ से जान बचा कर भाग गया..* *पेड़ पर बैठा एक बन्दर 🐒 यह सब तमाशा देख रहा था..* *उसने सोचा यह अच्छा मौका है,* *शेर को सारी कहानी बता देता हूँ ..* *शेर से दोस्ती भी हो जायेगी* *और उससे ज़िन्दगी भर के लिए जान का खतरा भी दूर हो जायेगा..* *वो फटाफट शेर के पीछे भागा..* *कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया कि कोई लोचा है..* *उधर बन्दर ने शेर को सारी कहानी बता दी कि कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ बनाया है..* *शेर जोर से दहाड़ा -* *"चल मेरे साथ, अभी उसकी लीला ख़तम करता हूँ"..* *और बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर शेर कुत्ते की तरफ चल दिया..* *कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर उसके आगे जान का संकट आ गया,* *मगर फिर हिम्मत कर कुत्ता उसकी तरफ पीठ करके बैठ गया l* *और जोर-जोर से बोलने लगा..* *"इस बन्दर को भेजे 1 घंटा हो गया..* *साला एक शेर को फंसा कर नहीं ला सकता !"* *यह सुनते ही शेर ने बंदर को वहीं पटका और वापस पीछे भाग गया ।* _*❇️शिक्षा 1 :❇️*_ _*मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं..*_ _*❇️शिक्षा 2 :❇️*_ _*हार्ड वर्क के बजाय स्मार्ट वर्क ही करें, क्योंकि यही जीवन की असली सफ़लता मिलेगी...*_ _*❇️शिक्षा 3 :❇️*_ _*आपकी ऊर्जा, समय और ध्यान भटकाने वाले कई बन्दर, आपके आस-पास हैं, उन्हें पहचानिए और उनसे सावधान रहिये ।🙏🙏

+68 प्रतिक्रिया 9 कॉमेंट्स • 138 शेयर
ANITA THAKUR May 8, 2021

+160 प्रतिक्रिया 13 कॉमेंट्स • 119 शेयर

+32 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 56 शेयर
R.S.RANA May 8, 2021

+168 प्रतिक्रिया 13 कॉमेंट्स • 90 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB