सूर्य साधना

सूर्य साधना

सूर्य देव की सरल साधना
🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞
सूर्य एक ऐसा ग्रह है जो की जीवन में नाम, शक्ति, सकारात्मक ओरा , ज्ञान आदि के लिए जिम्मेदार है. सूरज की शक्ति के बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते है. सूर्य को सूरज, भास्कर आदि के नमो से भी जानते है. अंग्रेजी में इसे Sun कहते है.
सूर्य को ग्रहों के राजा के रूप में भी जानते है. सारे ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते रहते है. जब कुंडली में सूर्य ख़राब होता है या कमजोर होता है तो विभिन्न प्रकार के समस्याओं से व्यक्ति परेशान होता है. सूर्य के कारण पितृ दोष भी उत्पन्न होता है.
सूर्य एक ऐसा ग्रह है जिसको हम रोज अपनी खुल्ली आँखों से देख सकते है. ये ग्रह हमे, प्रकाश, ऊर्जा और गर्मी देता है.
सभी जीव सूर्य से उर्जा प्राप्त करते है अतः ये सभी के लिए महत्वपूर्ण है.
सूर्य साधना का महत्तव:

अगर कोई रचनात्मकता, ज्ञान, सम्मान, अच्छा स्वास्थ्य, अध्यात्मिक शक्ति चाहता है तो उसे सूर्य पूजा या सूर्य साधना जरुर करनी चाहिए. हमारे पुरानो में रोज उगते सूर्य को अर्ध्य देने को कहा गया है , इसका कारण ये है की उस समय सूर्य से निकलने वाली किरने अत्यंत लाभकारी होती है.
सूर्य में रोग को ठीक करने की अद्भूत शक्ति है इसी कारण सूर्य योग के नाम से पूरा एक अलग साधना का उल्लेख भी बहुत जगह मिलता है जिसमे साधक सिर्फ सूर्य पूजा और धयान साधना द्वारा शक्तियां अर्जित करते है.
सूर्योदय के समय मंत्र जप,ध्यान, प्राणायाम बहुत लाभकारी होता है. सूर्य की किरणें जब शारीर पर पड़ती है तो विटामिन डी बनता है जिससे शारीर मजबूत होता है, इसी कारण योग में भी सूर्य स्नान का जिक्र मिलता है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान् सूर्य हनुमानजी के गुरु है और उनसे ही हनुमानजी ने विभिन्न प्रकार के ज्ञान अर्जित किया है. अतः सूर्य देव का हमारे जीवन में बहुत अधिक महत्व है.

सूर्य साधना का सबसे आसान तरीका लिख रही हूँ जिसका प्रयोग मैंने किया है, इस तरीके का प्रयोग कोई भी कर सकता है और एक स्वस्थ जीवन जी सकता है. कुछ ही दिनों के साधना के बाद साधक बहुत अच्छा बदलाव महसूस कर सकता है. !

इस साधना के लिए सिर्फ एक ऊनी आसन लाल या पीले रंग का चाहिए.

सूर्य साधना का आसान तरीका
🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞
1.सबसे पहले एक ऐसा स्वच्छ स्थान ढूंढे जहाँ पर सुबह सुभ सूर्य की किरने आती हो.

2.अब स्थान को साफ़ करके अपना आसन वहां पर बिछाए.

3.अब करीब 5 मिनट तक गहरी सांस लीजिये और छोड़िये.

4.अब धीरे से अपनी आँखे बंद करके सूर्य पर ध्यान करिए. ऐसा भावना कीजिये की सुर्य की शक्ति आपके शारीर के प्रत्येक अंग में प्रवेश कर रही है और आपको स्वस्थ कर रही है. आपका शारीर उर्जावान हो रहा है. सभी दिशाओं से सफलता आपके पास आ रही है.

5.रोज अपने ध्यान का समय बढ़ाते जाइए.

6.अगर आप मंत्र जप करना चाहते है तो “ॐ सूर्याय नमः” का जप कर सकते है.

सूर्य को अर्घ्य देने से समस्याए दूर होती है
🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞
सनातन काल से ही भारतीय ऋषि-मुनि सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म बेला में या ठीक सूर्योदय के समय नदी में स्नान करते थे और स्नान के उपरान्त सूर्य देव को जल अपने दोनों हाथो से अथवा ताम्बे के जल पात्र से देते थे।

सूर्य सभी ग्रहों के राजा हैं। ज्योतिष में जिस प्रकार माता और मन के कारक चन्द्रमा है उसी प्रकार पिता और आत्मा का कारक सूर्य हैं। रोज स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य देने का अर्थ है जीवन में संतुलन को आमांत्रित करना।
ज्योतिषशास्त्र में कुण्डली में सूर्य कमज़ोर व नीच के राशि तुला में है तो अशुभ फल से बचने के लिए प्रतिदिन सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। वही यदि सूर्य किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर सुबह स्थान में बैठा है तो सूर्योपासना करनी चाहिए।

साथ ही जिनकी कुंडली में सूर्यदेव अशुभ ग्रहो यथा शनि, राहु-केतु, के प्रभाव में है तो वैसे व्यक्ति को अवश्य ही प्रतिदिन नियमपूर्वक सूर्य को जल अर्पण करना चाहिए।
सूर्य देव को जल अर्पण करने से सूर्यदेव की असीम कृपा की प्राप्ति होती है सूर्य भगवान प्रसन्न होकर आपको दीर्घायु , उत्तम स्वास्थ्य, धन, उत्कृष्ट संतान, मित्र, मान-सम्मान, यश, सौभाग्य और विद्या प्रदान करते हैं।

जल चिकित्सा और आयुर्वेद के अनुसार प्रातःकालीन सूर्य को सिर के ऊपर पानी का बर्तन ले जाकर जल अर्पित करना चाहिए। ऐसा करते समय अपनी दृष्टि जलधारा के बीच में रखें ताकि जल से छनकर सूर्य की किरणें दोनों आंखों के मध्य में पड़ें। इससे आंखों की रौशनी और बौद्धिक क्षमता बढ़ती है।

सूर्योदय के प्रथम किरण में अर्घ्य देना सबसे उत्तम माना गया है।

सर्वप्रथम प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व नित्य-क्रिया से निवृत्त्य होकर स्नान करें।

उसके बाद उगते हुए सूर्य के सामने आसन लगाए।

पुनः आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में पवित्र जल लें।
रक्तचंदन आदि से युक्त लाल पुष्प, चावल आदि तांबे के पात्र में रखे जल या हाथ की अंजुलि से तीन बार जल में ही मंत्र पढ़ते हुए जल अर्पण करना चाहिए।

जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्योदय दिखाई दे आप दोनों हाथों से तांबे के पात्र को पकड़कर इस तरह जल अर्पण करे की सूर्य तथा सूर्य की किरण जल की धार से दिखाई दें।

ध्यान रखें जल अर्पण करते समय जो जल सूर्यदेव को अर्पण कर रहें है वह जल पैरों को स्पर्श न करे।

सम्भव हो तो आप एक पात्र रख लीजिये ताकि जो जल आप अर्पण कर रहे है उसका स्पर्श आपके पैर से न हो पात्र में जमा जल को पुनः किसी पौधे में डाल दे।
यदि सूर्य भगवान दिखाई नहीं दे रहे है तो कोई बात नहीं आप प्रतीक रूप में पूर्वाभिमुख होकर किसी ऐसे स्थान पर ही जल दे जो स्थान शुद्ध और पवित्र हो।

जो रास्ता आने जाने का हो भूलकर भी वैसे स्थान पर अर्घ्य (जल अर्पण) नहीं करना चाहिए।

पुनः उसके बाद दोनों हाथो से जल और भूमि को स्पर्श करे और ललाट, आँख कान तथा गला छुकर भगवान सूर्य देव को एकबार प्रणाम करें।

सूर्योपासना के समय किस मन्त्र का जप करना चाहिए

अर्घ्य देते समय सूर्य देव के मन्त्र का अवश्य ही जप करना चाहिए। आप जल अर्पण करते समय स्वयं ही या अपने गुरु के आदेशानुसार मन्त्र का चयन कर सकते है। सूर्यदेव के लिए निम्न मन्त्र है —

सामान्यतः जल अर्पण के समय निम्न मंत्रो का जप करना चाहिए।

‘ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते। अनुकंपये माम भक्त्या गृहणार्घ्यं दिवाकर:।।

ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय। मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा :।।

ऊँ सूर्याय नमः।

ऊँ घृणि सूर्याय नमः।

‘ऊं भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात।

इसके बाद सीधे हाथ की अँजूरी में जल लेकर अपने चारों ओर छिड़कना चाहिए। पुनः अपने स्थान पर ही तीन बार घुमकर परिक्रमा करना चाहिए ततपश्चात आसन उठाकर उस स्थान को नमन करें।
सूर्य देव के अन्य मन्त्र निम्न प्रकार से है।

सूर्य मंत्र – ऊँ सूर्याय नमः ।

तंत्रोक्त मंत्र – ऊँ ह्यं हृीं हृौं सः सूर्याय नमः । ऊँ जुं सः सूर्याय नमः ।

सूर्य का पौराणिक मंत्र –

जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम ।

तमोडरि सर्वपापघ्नं प्रणतोडस्मि दिवाकरम् ।
🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞

+155 प्रतिक्रिया 14 कॉमेंट्स • 79 शेयर

कामेंट्स

Atul Dec 17, 2017
OM Suryay Namah

Ajnabi Dec 17, 2017
jay shree Radhe krishna

Yogesh Kumar Sharma Dec 18, 2017
हर हर महादेव ओम् नमः शिवायः शुभ प्रभातम्

+513 प्रतिक्रिया 89 कॉमेंट्स • 280 शेयर
Swami Lokeshanand May 27, 2019

बड़ी गंभीर बात है, आज असली और नकली का खेल समझना है। विभक्त माने जो टूट गया, भक्त माने जो जुड़ गया। हर कोई कहीं ना कहीं जुड़ा ही है, तो भक्त तो सब हैं, पर सबको एक जैसा फल नहीं मिलता, क्योंकि असली बात है कि कौन कहाँ जुड़ा है? भगवान से जुड़ा हुआ असली भक्त है, संसार पर दृष्टि वाला नकली भक्त है, उसे तो भक्त कहा भी नहीं जाता, आसक्त कहा जाता है। रामकथा में असली और नकली भक्ति के अंतर को सीताजी के माध्यम से दिखाया गया है। सीताजी जब असली थीं, तब रामजी और अयोध्या में से चुनना था, तो रामजी को चुना, सुख साधन का त्याग किया, दुर्गम वन का मार्ग पकड़ा। आज नकली बैठी हैं, तो रामजी से दृष्टि हट गई, स्वर्णमृग पर पड़ गई। गहनता से विचार करें, असली भक्ति में दुख नहीं है, दुख तो नकली भक्ति का फल है। देखें, सीताजी जब तक जनकजी के यहाँ रहीं, उन्हें कोई दुख नहीं था। रामजी से विवाह कर अवध आईं तब तो दुख होता ही क्यों? वनवास की सुबह, अयोध्या छोड़ कर, तपस्वी वेषधारी रामजी के पीछे चलते हुए भी, उनके मुख मंडल पर वही स्वाभाविक मुस्कान तैर रही थी, जो पिछली रात सोने जाते समय थी। यहाँ तक की लम्बे वनवासकाल में, सर्दी गर्मी वर्षा में, नंगे पैर पथरीली कंकरीली पगडंडियों पर चलते हुए भी उन्हें दुखानुभूति नहीं हुई। पर जिस दिन दृष्टि राम जी से हटी और संसार रूपी मारीच पर पड़ी, उनकी दुख की यात्रा प्रारंभ हो गई। वास्तव में भगवान से दृष्टि लग जाना ही सुख है, और संसार से दृष्टि लग जाना ही दुख है। इन्द्रियों का बहिर्मुखी, अधोमुखी, संसारोन्मुखी प्रवाह ही दुख नाम से, और अन्तर्मुखी, ऊर्ध्वमुखी, परमात्मोन्मुखी प्रवाह ही सुख नाम से जाना जाता है। तो येन् केन् प्रकारेन् भगवान में वृति लगाए रखने वाले को दुख छू नहीं पाता। यह विडियो भी देखें- तुम पावक महुँ करहु निवासा https://youtu.be/agl8M3skRo8 और https://youtu.be/BYTcbh0B0nU

+17 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 76 शेयर

+17 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 15 शेयर

+386 प्रतिक्रिया 40 कॉमेंट्स • 479 शेयर
Anju Mishra May 26, 2019

🙏🌹🚩🙏जय श्री कृष्णा 🙏🌹🚩🙏 कृष्ण के जीवन से सीख कृष्ण को पूरा बृज प्यार और सम्मान करता था क्योकि वो दूसरों की मदद करते थे और दूसरो के दुखो को भी दूर करते थे. प्रत्येक व्यक्ति अपनी यथा शक्ति दूसरों की मदद जरूर करनी चाहिए. कृष्ण पृथ्वी से दुष्टों का, बुराईयों का नाश किया और मानव को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी. उन्होंने मानव समाज को सीख दे अच्छे कर्म का फल हमेशा अच्छा ही होता हैं और बुरे कर्म का फल हमेशा बुरा ही होता हैं. कृष्ण ने दुष्टों को भी अपनी गलती सुधारने का मौका दिया क्योकि वो किसी मनुष्य को नही उसके अंदर के बुराई को मारना चाहते थे. कृष्ण ने द्रोपदी के सम्मान की रक्षा के लिए एक बार बुलाने पर स्वयं आ गये क्योकि जब वीरों से भरा समाज किसी स्त्री की रक्षा करने में असमर्थ होता हैं तो भगवान् को स्वयं ही आना पड़ता हैं. भगवान् कृष्ण ने जैसे ही जाना अपने मित्र सुदामा की गरीबी को तो वो तीनों लोक अपने मित्र के नाम कर दिया. मित्र को लेने नंगे पाँव घर के बाहर आये और अपनी गद्दी पर बिठाकर उनका सम्मान किया. मानव समाज के लिए उनकी मित्रता एक मिसाल हैं.

+181 प्रतिक्रिया 24 कॉमेंट्स • 28 शेयर

+43 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 133 शेयर

+42 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 97 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB