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yogradhey May 9, 2020

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महाराणा प्रताप जी की जन्मदिवस पर विशेष 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ नाम - कुँवर प्रताप जी (श्री महाराणा प्रताप सिंह जी) जन्म - 9 मई, 1540 ई. जन्म भूमि - कुम्भलगढ़, राजस्थान पुण्य तिथि - 29 जनवरी, 1597 ई. पिता - श्री महाराणा उदयसिंह जी माता - राणी जीवत कँवर जी राज्य - मेवाड़ शासन काल - 1568–1597ई. शासन अवधि - 29 वर्ष वंश - सुर्यवंश राजवंश - सिसोदिया राजघराना - राजपूताना धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध राजधानी - उदयपुर पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह महाराणा प्रताप की संक्षिप्त जानकारी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था, जिसका नाम 'चेतक' था। राजपूत शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर मेवाड़-मुकुटमणि राणा प्रताप का जन्म हुआ। महाराणा का नाम इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिये अमर है। महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी:- 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1... महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे। 2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था। “बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं। 3.... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था। कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था। 4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। 5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी। लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। 6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए। 7.... महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है। 8.... महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं। इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है। मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को। 9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था। 10..... महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे। 11.... महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था। 12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे। आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं तो दूसरी तरफ भील। 13..... महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ। उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है। 14..... राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी। यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे। 15..... मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे। 16.... महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में। महाराणा प्रताप के हाथी की कहानी: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ आप सब ने महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा, लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ। रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल- बदायुनी, जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है। वो लिखता है की जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद। आगे अल बदायुनी लिखता है की वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था वो आगे लिखता है कि उस हाथी को पकड़ने के लिए हमने 7 बड़े हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उन पर 14 महावतो को बिठाया तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये। उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया जहा अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा। रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया। पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न तो दाना खाया और न ही पानी पिया और वो शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा। ऐसे ऐसे देशभक्त चेतक व रामप्रसाद जैसे तो यहाँ जानवर थे। महाराणाप्रताप एक अद्वितीय वीर योद्धा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ बहलोल खान अकबर का बड़ा सिपहसालार था,, हाथी जैसा भारी भरकम शरीर , और लम्बाई लगभग 7 फिट 8 इंच ,, क्रूर तो ऐसा था कि,, नवजात बालकों को भी अपने हाथ में लेकर उनका गला रेत देता था,, यदि बालक हिन्दुओं के हों तो,,,, वीर महाराणा प्रताप से युद्ध करने कोई जाना नहीं चाहता था,, क्योंकि उनके सामने युद्ध के लिये जाना मतलब अपनी मौत का चुनाव करना ही था,, अकबर ने दरबार में राणा को समाप्त करने के लिये बहलोल खाँ को चुना,, बहलोल खाँ यद्यपि अकबर के दरबार का सबसे हिम्मत वाला व्यक्ति माना जाता था ।,,, किन्तु वह भी महाराणा के समक्ष जाने से भय खाता था,, उसके मन में महाराणा का ऐसा भय था कि,,, वह घर गया ,और अपनी सारी बेगमों की हत्या कर दी।,,, पता नहीं वापस लौटूं न लौटूं ? इन्हे कोई दूसरे अपनी बेगमें बना लेंगे,, बस इसी भय के कारण उसने सबको मार डाला।,, और आ गया मेवाड़ में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी के समक्ष,,आखिर सामना हो ही गया उसका , उसकी मृत्यु से।,,, अफीम के खुमार मे डूबी हुई सुर्ख नशेड़ी आंखों से भगवा अग्नि की लपट से प्रदीप्त रण के मद में डूबी आंखें टकराईं और जबरदस्त भिड़ंत शुरू हो गई,,, एक क्षण तलवार से तलवार टकराईं और राणा की विजय ध्वनि बहलोल खाँ को भी प्रतीत होने लगी,, दूसरे ही क्षण वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की तलवार नें बहलोल खाँ को उसके शिरस्त्राण, बख्तरबंद, घोड़ा उसके रक्षा कवच सहित दो टुकड़ों में चीर कर रख दिया,,, 7फिट 8 इंच का विशाल शरीर वाला पिशाच बहलोल खाँ का शरीर आधा इस तरफ आधा उस तरफ अलग अलग होकर गिर पड़ा,,, ऐसे महावीर थे वीर महाराणा,,,,।अकबर अपने जीवन में कभी भी महाराणा प्रताप से युद्ध करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाया,,,, जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी नें 14 वर्ष वनवास भोगा,उसी तरह से स्वाभिमान की खातिर महाराणा ने पच्चीस वर्ष का वनवास भोगा।,,, घोड़े की पीठ पर कितनी रातें गुजारी.. जंगल में घास की रोटियाँ खाईं,,, इस वनवास के दौरान उनकी पुत्री की मृत्यु भूख के कारण से हो गई,,, किन्तु कभी भी ना कोई शिकायत ,, ना अपने सिद्धान्तों से कोई समझौता,, पूरे भारत को दबा देने वाले आततायी जिहादियों की नाक में दम बनाके रख दिया। सोते समय भी अकबर जैसे जिहादी को किसी का खौफ सताता था तो,, वो था,, वीर महाराणा प्रताप का,,, महाराणा नें अन्ततः मेवाड़ को आज़ाद करवा लिया । और इन कलमघिस्सू वामपंथी इतिहासकारों के लिये ये महाराणा महान नहीं,,,, धूर्त आततायी, विदेशी हमलावर जिहादी अकबर को महान बता दिया,,, अद्वितीय वीर बलिदानी हिन्दू शिरोमणि वीर महाराणा प्रताप के जन्मोत्सव पर उन्हें शत शत नमन,,, वन्दन,, जय भवानी 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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आज नारद जयंती विशेष 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ नारद मुनि👉 ब्रह्माण्ड के प्रथम संवाद दाता। नारद, देवताओं के ऋषि हैं। इसी कारण नारद जी को देवर्षि नाम से भी पुकारा जाता हैं। इनका जन्‍म ब्रह्माजी की गोद से हुआ था। पुराणों के अनुसार हर साल ज्येष्ठ के महीने की कृष्णपक्ष प्रतिपदा को नारद जयंती मनाई जाती है। क्‍या आप जानते हैं नारद को ब्रह्मदेव का मानस पुत्र भी माना जाता है. ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा सृष्टि का निर्माण कर रहे थे तब उनके चार पुत्र हुए। जो बड़े होने पर तपस्या करने के लिए चले गये। ब्रह्मा के सभी पुत्रों में से नारद सबसे चंचल स्वभाव के थे वह किसी की बात नहीं मानते थे। जब ब्रह्मा ने अपने पुत्र नारद से सृष्टि के निर्माण में सहयोग करने के लिए विवाह करने की बात कही तब नारद ने अपने पिता को साफ मना कर दिया। जिस पर क्रोधित होकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें आजीवन अविवाहित रहने का श्राप दे दिया। नारद मुनि को श्राप देते हुए ब्रह्मा ने कहा तुम हमेशा अपनी जिम्मेदारियों से भागते हो इसलिए अब पूरी जिंदगी इधर उधर भागते ही रहोगे। अन्य कथा अनुसार दक्ष प्रजापति ने भी इन्हें श्राप दिया था इसका उल्लेख आगे मिलेगा। नारद मुनि हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा  के सात मानस पुत्रों में से एक है। उन्होने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते है। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारदजी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है।  श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के 26 वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है - देवर्षीणाम्चनारद:। देवर्षियों में मैं नारद हूं। श्रीमद्भागवत महापुराणका कथन है, सृष्टि में भगवान ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वततंत्र का उपदेश दिया जिसमें सत्कर्मो के द्वारा भव-बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है। वायुपुराण में देवर्षि के पद और लक्षण का वर्णन है- देवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करनेवाले ऋषिगण देवर्षिनाम से जाने जाते हैं। भूत, वर्तमान एवं भविष्य-तीनों कालों के ज्ञाता, सत्यभाषी, स्वयं का साक्षात्कार करके स्वयं में सम्बद्ध, कठोर तपस्या से लोकविख्यात, गर्भावस्था में ही अज्ञान रूपी अंधकार के नष्ट हो जाने से जिनमें ज्ञान का प्रकाश हो चुका है, ऐसे मंत्रवेत्तातथा अपने ऐश्वर्य (सिद्धियों) के बल से सब लोकों में सर्वत्र पहुँचने में सक्षम, मंत्रणा हेतु मनीषियोंसे घिरे हुए देवता, द्विज और नृपदेवर्षि कहे जाते हैं। इसी पुराण में आगे लिखा है कि धर्म, पुलस्त्य, क्रतु, पुलह, प्रत्यूष, प्रभास और कश्यप - इनके पुत्रों को देवर्षिका पद प्राप्त हुआ। धर्म के पुत्र नर एवं नारायण, क्रतु के पुत्र बालखिल्यगण, पुलहके पुत्र कर्दम, पुलस्त्यके पुत्र कुबेर, प्रत्यूषके पुत्र अचल, कश्यप के पुत्र नारद और पर्वत देवर्षि माने गए, किंतु जनसाधारण देवर्षिके रूप में केवल नारदजी को ही जानता है। उनकी जैसी प्रसिद्धि किसी और को नहीं मिली। वायुपुराण में बताए गए देवर्षि के सारे लक्षण नारदजी में पूर्णत:घटित होते हैं। महाभारत के सभापर्व के पांचवें अध्याय में नारदजी के व्यक्तित्व का परिचय इस प्रकार दिया गया है - देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों (अतीत) की बातों को जानने वाले, न्याय एवं धर्म के तत्त्‍‌वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान, संगीत-विशारद, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, नीतिज्ञ, कवि, महापण्डित, बृहस्पति जैसे महाविद्वानोंकी शंकाओं का समाधान करने वाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के यथार्थ के ज्ञाता, योगबलसे समस्त लोकों के समाचार जान सकने में समर्थ, सांख्य एवं योग के सम्पूर्ण रहस्य को जानने वाले, देवताओं-दैत्यों को वैराग्य के उपदेशक, क‌र्त्तव्य-अक‌र्त्तव्य में भेद करने में दक्ष, समस्त शास्त्रों में प्रवीण, सद्गुणों के भण्डार, सदाचार के आधार, आनंद के सागर, परम तेजस्वी, सभी विद्याओं में निपुण, सबके हितकारी और सर्वत्र गति वाले हैं। अट्ठारह महापुराणों में एक नारदोक्त पुराण; बृहन्नारदीय पुराण के नाम से प्रख्यात है। मत्स्यपुराण में वर्णित है कि श्री नारदजी ने बृहत्कल्प-प्रसंग में जिन अनेक धर्म-आख्यायिकाओं को कहा है, 25,000 श्लोकों का वह महाग्रन्थ ही नारद महापुराण है। वर्तमान समय में उपलब्ध नारदपुराण 22,000 श्लोकों वाला है। 3,000 श्लोकों की न्यूनता प्राचीन पाण्डुलिपि का कुछ भाग नष्ट हो जाने के कारण हुई है। नारदपुराण में लगभग 750 श्लोक ज्योतिषशास्त्र पर हैं। इनमें ज्योतिष के तीनों स्कन्ध-सिद्धांत, होरा और संहिता की सर्वागीण विवेचना की गई है। नारदसंहिता के नाम से उपलब्ध इनके एक अन्य ग्रन्थ में भी ज्योतिषशास्त्र के सभी विषयों का सुविस्तृत वर्णन मिलता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि देवर्षिनारद भक्ति के साथ-साथ ज्योतिष के भी प्रधान आचार्य हैं। आजकल धार्मिक चलचित्रों और धारावाहिकों में नारदजी का जैसा चरित्र-चित्रण हो रहा है, वह देवर्षि की महानता के सामने एकदम बौना है। नारदजी के पात्र को जिस प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे आम आदमी में उनकी छवि लडा़ई-झगडा़ करवाने वाले व्यक्ति अथवा विदूषक की बन गई है। यह उनके प्रकाण्ड पांडित्य एवं विराट व्यक्तित्व के प्रति सरासर अन्याय है। नारद जी का उपहास उडाने वाले श्रीहरि के इन अंशावतार की अवमानना के दोषी है। भगवान की अधिकांश लीलाओं में नारदजी उनके अनन्य सहयोगी बने हैं। वे भगवान के पार्षद होने के साथ देवताओं के प्रवक्ता भी हैं। नारदजी वस्तुत: सही मायनों में देवर्षि हैं। विभिन्न धर्मग्रन्थों मे 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ नारद मुनि को देवर्षि कहा गया है। विभिन्न धर्मग्रन्थों में इनका उल्लेख आता है। कुछ उल्लेख निम्न हैं: अथर्ववेद के अनुसार नारद नाम के एक ऋषि हुए हैं।ऐतरेय ब्राह्मण के कथन के अनुसार हरिशचंद्र के पुरोहित सोमक, साहदेव्य के शिक्षक तथा आग्वष्टय एवं युधाश्रौष्ठि को अभिशप्त करने वाले भी नारद थे।मैत्रायणी संहिता में नारद नाम के एक आचार्य हुए हैं।सामविधान ब्राह्मण में बृहस्पति के शिष्य के रू प में नारद का वर्णन मिलता है।छान्दोग्यपनिषद् में नारद का नाम सनत्कुमारों के साथ लिखा गया है।महाभारत में मोक्ष धर्म के नारायणी आख्यान में नारद की उत्तरदेशीय यात्रा का विवरण मिलता है। इसके अनुसार उन्होंने नर-नारायण ऋषियों की तपश्चर्या देखकर उनसे प्रश्न किया और बाद में उन्होंने नारद को पांचरात्र धर्म का श्रवण कराया।नारद पंचरात्र के नाम से एक प्रसिद्ध वैष्णव ग्रन्थ भी है जिसमें दस महाविद्याओं की कथा विस्तार से कही गई है। इस कथा के अनुसार हरी का भजन ही मुक्ति का परम कारण माना गया है।नारद पुराण के नाम से एक ग्रन्थ मिलता है। इस ग्रन्थ के पूर्वखंड में 125 अघ्याय और उत्तरखण्ड में 182 अघ्याय हैं।कुछ स्मृतिकारों ने नारद का नाम सर्वप्रथम स्मृतिकार के रू प में माना है।नारद स्मृति में व्यवहार मातृका यानी अदालती कार्रवाई और सभा अर्थात न्यायालय सर्वोपरि माना गया है। इसके अलावा इस स्मृति में ऋणाधान ऋण वापस प्राप्त करना, उपनिधि यानी जमानत, संभुय, समुत्थान यानी सहकारिता, दत्ताप्रदानिक यानी करार करके भी उसे नहीं मानने, अभ्युपेत्य-असुश्रुषा यानी सेवा अनुबंध को तोड़ना है। वेतनस्य अनपाकर्म यानी काम करवाके भी वेतन का भुगतान नहीं करना शामिल है। नारद स्मृति में अस्वामी विक्रय यानी बिना स्वामित्व के किसी चीज का विक्रय कर देने को दंडनीय अपराध माना है। विक्रिया संप्रदान यानी बेच कर सामान न देना भी अपराध की कोटि में है। इसके अतिरिक्त क्रितानुशय यानी खरीदकर भी सामान न लेना, समस्यानपाकर्म यानी निगम श्रेणी आदि के नियमों का भंग करना, सीमाबंद यानी सीमा का विवाद और स्त्रीपुंश योग यानी वैवाहिक संबंध के बारे में भी नियम-कायदों की चर्चा मिलती है। नारद स्मृति में दायभाग यानी पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकार और विभाजन की चर्चा भी मिलती है। इसमें साहस यानी बल प्रयोग द्वारा अपराधी को दंडित करने का विधान भी है। नारद स्मृति वाक्पारूष्य यानी मानहानि करने, गाली देने और दण्ड पारूष्य यानी चोट और क्षति पहुँचाने का वर्णन भी करती है। नारद स्मृति के प्रकीर्णक में विविध अपराधों और परिशिष्ट में चौर्य एवं दिव्य परिणाम का निरू पण किया गया है। नारद स्मृति की इन व्यवस्थाओं पर मनु स्मृति का पूर्ण प्रभाव दिखाई देता है। श्रीमद्भागवत और वायुपुराण के अनुसार 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ देवर्षि नारद का नाम दिव्य ऋषि के रू प में भी वर्णित है। ये ब्रह्मधा के मानस पुत्र थे। नारद का जन्म ब्रह्मधा की जंघा से हुआ था। इन्हें वेदों के संदेशवाहक के रू प में और देवताओं के संवाद वाहक के रू प में भी चित्रित किया गया है। नारद देवताओं और मनुष्यों में कलह के बीज बोने से कलिप्रिय अथवा कलहप्रिय कहलाते हैं। मान्यता के अनुसार वीणा का आविष्कार भी नारद ने ही किया था।ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार मेरू के चारों ओर स्थित बीस पर्वतों में से एक का नाम नारद है।मत्स्य पुराण के अनुसार वास्तुकला विशारद अठारह आचार्यो में से एक का नाम भी नारद है। चार शक्ति देवियों में से एक शक्ति देवी का नाम नारदा है।रघुवंश के अनुसार लोहे के बाण को नाराच कहते हैं। जल के हाथी को भी नाराच कहा जाता है। स्वर्णकार की तराजू अथवा कसौटी का नाम नाराचिका अथवा नाराची है।मनुस्मृति के अनुसार एक प्राचीन ऋषि का नाम नारायण है जो नर के साथी थे। नारायण ने ही अपनी जंघा से उर्वशी को उत्पन्न किया था। विष्णु के एक विशेषण के रूप में भी नारायण शब्द का प्रयोग किया जाता है। नारद जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ नारद, देवताओं के ऋषि हैं. इसी कारण नारद जी को देवर्षि नाम से भी पुकारा जाता हैं। अगर आप नारद जी के बारे में विस्‍तार से जानना चाहते हैं तो आपको 'नारद पुराण' जरूर पढ़ना चाहिए यह एक वैष्णव पुराण है। कहा जाता है कि कठिन तपस्या के बाद नारद जी को ब्रह्मर्षि पद प्राप्त हुआ था। नारद जी बहुत ज्ञानी थे, इसी कारण दैत्‍य हो या देवी-देवता सभी वर्गों में उनको बेहद आदर और सत्‍कार किया जाता था। नारद मुनि के श्राप के कारण ही राम को देवी सीता से वियोग सहना पड़ा था। दक्ष ने भटकते रहने का दिया श्राप: नारद मुनि हमेशा नारायण नारायण कहते इधर उधर भटकते रहते थे। उनके ऐसा करने के पीछे भी एक कथा है। दरअसल, राजा दक्ष की पत्नी आसक्ति ने 10 हज़ार पुत्रों को जन्म दिया था। लेकिन इनमें से किसी ने भी उनका राज पाट नहीं संभाला क्योंकि नारद जी ने सभी को मोक्ष की राह पर चलना सीखा दिया था। इसके बाद दक्ष ने पंचजनी से विवाह किया और उन्होंने एक हजार पुत्रों को जन्म दिया। नारद जी ने दक्ष के इन पुत्रों को भी सभी प्रकार के मोह माया से दूर रहना सिखा दिया। इस बात से राजा दक्ष को बहुत क्रोध आया, जिसके बाद उन्होंने नारद मुनि को श्राप दे दिया और कहा कि वह हमेशा इधर-उधर भटकते रहेंगे । देवर्षि नारद पहले गन्धर्व थे। एक बार ब्रह्मा जी की सभा में सभी देवता और गन्धर्व भगवान्नाम का संकीर्तन करने के लिये आये। नारद जी भी अपनी स्त्रियों के साथ उस सभा में गये।भगवान के संकीर्तन में विनोद करते हुए देखकर ब्रह्मा जी ने इन्हें शूद्र होने का शाप दे दिया।उस शाप के प्रभाव से नारद जी का जन्म एक शूद्रकुल में हुआ।जन्म लेने के बाद ही इनके पिता की मृत्युहो गयी। इनकी माता दासी का कार्य करके इनका भरण-पोषण करने लगी। एक दिन इनके गाँव में कुछ महात्मा आये और चातुर्मास्य बिताने के लिये वहीं ठहर गये। नारद जी बचपन से ही अत्यन्त सुशील थे। वे खेलकूद छोड़कर उन साधुओं के पास ही बैठे रहते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा भी बड़े मन से करते थे। संत-सभा में जब भगवत्कथा होती थी तो ये तन्मय होकर सुना करते थे।संत लोग इन्हें अपना बचा हुआ भोजन खाने के लिये दे देते थे।साधुसेवा और सत्संग अमोघ फल प्रदान करने वाला होता है। उसके प्रभाव से नारद जी का हृदय पवित्र हो गया और इनके समस्त पाप धुल गये।जाते समय महात्माओं ने प्रसन्न होकर इन्हें भगवन्नाम का जप एवं भगवान के स्वरूप के ध्यान का उपदेश दिया। एक दिन साँप के काटने से इनकी माता जी भी इस संसार से चल बसीं।अब नारद जी इस संसार में अकेले रह गये। उस समय इनकी अवस्था मात्र पाँच वर्ष की थी। माता के वियोग को भी भगवान का परम अनुग्रह मानकर ये अनाथों के नाथ दीनानाथ का भजन करने के लिये चल पड़े। एक दिन जब नारद जी वन में बैठकर भगवान के स्वरूप का ध्यान कर रहे थे,अचानक इनके हृदय में भगवान प्रकट हो गये और थोड़ी देर तक अपने दिव्यस्वरूप की झलक दिखाकर अन्तर्धान हो गये। भगवान का दोबारा दर्शन करने के लिये नारद जी के मन में परम व्याकुलता पैदा हो गयी।वे बार-बार अपने मन को समेटकर भगवान के ध्यान का प्रयास करने लगे,किन्तु सफल नहीं हुए। उसी समय आकाशवाणी हुई- ''हे दासीपुत्र! अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद रूप में मुझे पुन: प्राप्त करोगे।'' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ विष्णवे नम: 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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कन्या कुमारी की कथा 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 इस जगह का नाम कन्‍याकुमारी पड़ने के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने असुर बाणासुर को वरदान दिया था कि कुंवारी कन्या के अलावा किसी के हाथों उसका वध नहीं होगा। प्राचीन काल में भारत पर शासन करने वाले राजा भरत को आठ पुत्री और एक पुत्र था। भरत ने अपना साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी संतानों को दे दिया। दक्षिण का हिस्सा उसकी पुत्री कुमारी को मिला। कुमारी को शक्ति देवी का अवतार माना जाता था। कुमारी ने दक्षिण भारत के इस हिस्से पर कुशलतापूर्वक शासन किया। उसकी ईच्‍छा थी कि वह शिव से विवाह करें। इसके लिए वह उनकी पूजा करती थी। शिव विवाह के लिए राजी भी हो गए थे और विवाह की तैयारियां होने लगीं थी। लेकिन नारद मुनि चाहते थे कि बाणासुर का कुमारी के हाथों वध हो जाए। इस कारण शिव और देवी कुमारी का विवाह नहीं हो पाया। इस बीच बाणासुर को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसने कुमारी के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा। कुमारी ने कहा कि यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा तो वह उससे विवाह कर लेगी। दोनों के बीच युद्ध हुआ और बाणासुर को मृत्यु की प्राप्ति हुई। कुमारी की याद में ही दक्षिण भारत के इस स्थान को कन्याकुमारी कहा जाता है।माना जाता है कि शिव और कुमारी के विवाह की तैयारी का सामान गेहू व चावल थे, आगे चलकर रंग बिरंगी रेत में परिवर्तित हो गये। सागर के मुहाने के दाई और स्थित यह एक छोटा सा मंदिर है जो पार्वती को समर्पित है। मंदिर तीनों समुद्रों के संगम स्थल पर बना हुआ है। यहां सागर की लहरों की आवाज स्वर्ग के संगीत की भांति सुनाई देती है। भक्तगण मंदिर में प्रवेश करने से पहले त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाते हैं जो मंदिर के बाई ओर 500 मीटर की दूरी पर है। मंदिर का पूर्वी प्रवेश द्वार को हमेशा बंद करके रखा जाता है क्योंकि मंदिर में स्थापित देवी के आभूषण की रोशनी से समुद्री जहाज इसे लाइटहाउस समझने की भूल कर बैठते है और जहाज को किनारे करने के चक्‍कर में दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाते है।हिन्दुओ के लिए हमेशा से यह स्थान पावन एवं पवित्र माना जाता रहा हैं। यह एक ऐसा स्थान हैं जहा देवी भगवती के नाबालिंग रूप की पूजा होती हैं।पुराने ग्रंथो में इस स्थान का जिक्र मिलता हैं. एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार ये स्थान हिन्दू धर्म के 51 शक्ति पीठो में से एक हैं. यहाँ देवी सती की पीठ गिरी थी और यहाँ देवी के पीठ रूप की पूजा होती हैं। एक अन्य कथा के अनुसार जब देवी कन्या ने शिव से विवाह की इच्छा जताई और इसके लिए देवी ने समुन्द्र में एक चट्टान पर एक पैर पर खड़े होकर शिव को प्रसन्न कर उन्हें विवाह के राजी किया तो शिव ने विवाह के लिए एक नियत समय तय किया। उस दिन भगवान शिव कैलाश से बारात लेकर चले, पर जिस रात को शिव को समुन्द्र तट पर पहुचना था उस रात को वे वहा पहुचते उससे पहले नारद जी, जो की बाणासुर का वध कुँवारी कन्या के हाथो करवाना चाहते थे। उन्होंने मुर्गा बन कर बाग लगा दी और दिन का उदय कर दिया इस तरह भगवान शिव कन्याकुमारी स्थान से 10 किलोमीटर दूर एक स्थान जो आज शुचीन्द्रम के नाम से जाना जाता हैं वहा रुक गए। इस प्रकार पार्वती अवतार देवी और शिव का मिलाप नहीं हो सका। मान्यता है कि इस कन्या को कलयुग के अंत तक शिव जी से विवाह के लिए अब इंतजार करना है। 🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ प्रथम स्कन्ध: पंचमोध्याय: (पहला दिन) (भगवान के यश-कीर्तन की महिमा और देवर्षि नारद का पूर्व चरित्र) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ सूत उवाच अथ तं सुखमासीन उपासीनं बृहच्छ्रवाः । देवर्षिः प्राह विप्रर्षि वीणापाणिः स्मयन्निव ॥ १ नारद उवाच पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना । परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ॥ २ जिज्ञासितं सुसम्पन्नमपि ते महदद्भुतम् । कृतवान् भारतं यस्त्वं सर्वार्थपरिबृंहितम् ॥ ३ जिज्ञासितमधीतं च यत्तद्रह्म सनातनम् । अथापि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ व्यास उवाच अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं तथापि नात्मा परितुष्यते मे । तन्मूलमव्यक्तमगाधबोधं पृच्छामहे त्वाऽऽत्मभवात्मभूतम् ॥ स वै भवान् वेद समस्तगुह्य- मुपासितो यत्पुरुषः पुराणः । परावरेशो मनसैव विश्वं सृजत्यवत्यत्ति गुणैरसङ्गः ॥ ६ त्वं पर्यटन्नर्क इव त्रिलोकी- मन्तश्चरो वायुरिवात्मसाक्षी। परावरे ब्रह्मणि धर्मतो व्रतैः स्नातस्य मे न्यूनमलं विचक्ष्व ॥ ७ श्रीनारद उवाच भवतानुदितप्रायं यशो भगवतोऽमलम्। येनैवासौ न तुष्येत मन्ये तद्दर्शनं खिलम् ।॥ यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः । न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित् । तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा न यत्र हंसा निरमन्त्युशिक्क्षयाः ॥ १० तद्वाग्विसर्गों जनताघविप्लवो यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि । नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि य- छृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ॥ ११ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ सूतजी कहते हैं-तदनन्तर सुखपूर्वक बैठे हुए वीणापाणि परम यशस्वी देवर्षि नारद ने मुसकराकर अपने पास ही बैठे ब्रह्मर्षि व्यासजीसे कहा । १ ।॥ नारदजी ने प्रश्न किया-महाभाग व्यासजी ! आपके शरीर एवं मन-दोनों ही अपने कर्म एवं चिन्तन से सन्तुष्ट हैं न ? ॥ २ ॥ अवश्य ही आपकी जिज्ञासा तो भली भाँति पूर्ण हो गयी है; क्योंकि आपने जो यह महाभारत की रचना की है, वह बड़ी ही अद्भरुत है । वह धर्म आदि सभी पुरुषार्थों से परिपूर्ण है ॥ ३ ॥ ब्रह्मतत्त्व को भी आपने खूब विचारा है और जान भी लिया है। फिर भी प्रभु ! आप अकृतार्थ पुरुष के समान अपने विषय में शोक क्यों कर रहे हैं ? ॥ ४ ॥ व्यासजी ने कहा- आपने मेरे विषय मे जो कुछ भी कहा है, वह सब ठीक ही है। वैसा होनेपर भी मेरा हृदय सन्तुष्ट नहीं है। पता नहीं, इसका क्या कारण है आपका ज्ञान अगाध है। आप साक्षात् ब्रह्माजी के मानसपुत्र इसलिये मैं आपसे ही इसका कारण पूछता हूँ।॥ ५ ॥ नारदजी ! आप समस्त गोपनीय रहस्यों को जानते हैं; क्योंकि आपने उन पुराणपुरुष की उपासना की है, जो प्रकृति-पुरुष दोनों के स्वामी हैं और असङ्ग रहते हुए ही अपने सङ्कल्पमात्र से गुणों के द्वारा संसार की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते रहते हैं ॥ ६ आप सूर्य की भाँति तीनों लोकों में भ्रमण करते रहते हैं और योगबल से प्राणवायु के समान सबके भीतर रहकर अन्तःकरणों के साक्षी भी हैं । योगानुष्ठान और नियमों के द्वारा परब्रह्म और शब्दब्रह्म दोनों की पूर्ण प्राप्ति कर लेने पर भी मुझमें जो बड़ी कमी है, उसेबआप कृपा करके बतलाइये॥ ७ ॥ नारदजी ने कहा-व्यासजी ! आपने भगवान् के निर्मल यश का गान प्रायः नहीं किया । मेरी ऐसी मान्यता सनातन आपने मेरे विषय में जो कुछ है कि जिससे भगवान् संतुष्ट नहीं होते, वह शास्त्र या ज्ञान अधूरा है ॥ ८ ॥ आपने धर्म आदि पुरुषार्थों का जैसा निरूपण किया है, भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा का वैसा निरूपण नहीं किया॥ ९ ॥ जिस वाणी से-चाहे वह रस-भाव-अलङ्कारादि से युक्त ही क्यों न हो-जगत् को पवित्र करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण के यश का कभी गान नहीं होता, वह तो कौओंके लिये उच्छिष्ट फेंकने के स्थान के समान अपवित्र मानी जाती है। मानसरोवर के कमनीय कमलवन में विहरने वाले हंसों की भाँति ब्रह्मधाम में विहार करने वाले भगवच्चरणारविन्दाश्रित परमहंस भक्त कभी उसमें रमण नहीं करते।। १० ॥ इसके विपरीत जिसमें सुन्दर रचना भी नहीं है और जो दूषित शब्दों से युक्त भी है, परन्तु जिसका प्रत्येक श्लोक भगवान् के सुयशसूचक नामों से युक्त है, वह वाणी लोगों के सारे पापों का नाश कर देती है; क्योंकि सत्पुरुष ऐसी ही वाणी का श्रवण, गान और कीर्तन किया करते हैं। ११ ।। क्रमशः..... ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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👉माता सीता के भाई का नाम क्या था? रामायण में ऐसी बहुत सी गाथा है जिसके बारे में अधिकतर लोग अवगत है लेकिन ऐसे बहुत से अनूठे किस्से भी है जिनसे आप अभी तक परचित नहीं होंगे। आज जानते है रामायण के उस प्रसंग के बारे में जिसकी जानकारी से अधिकतर लोग वंचित है। क्या आपने कभी सीता के भाई के बारे सुना है या कभी जानने की कोशिश की है या आप को ऐसा लगा हो की सीता का तो कोई भाई ही नहीं है। उनके किसी भाई का उल्लेख रामायण में कहीं आता भी नहीं है। किन्तु रामायण में एक ऐसा भी प्रसंग है जहाँ किसी ने कुछ समय के लिए माता सीता के भाई के रूप में एक अहम भूमिका निभाई थी।  श्रीराम और देवी सीता का विवाह कदाचित महादेव एवं माता पार्वती के विवाह के बाद सबसे प्रसिद्ध विवाह माना जाता है। इस विवाह की एक और विशेषता ये थी कि इस विवाह में त्रिदेवों सहित लगभग सभी मुख्य देवता किसी ना किसी रूप में उपस्थित थे। कोई भी इस विवाह को देखने का मौका छोड़ना नहीं चाहता था। श्रीराम सहित ब्रह्महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र को भी इसका ज्ञान था। कहा जाता है कि उनका विवाह देखने को स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र ब्राह्मणों के वेश में आये थे। चारो भाइयों में श्रीराम का विवाह सबसे पहले हुआ। विवाह का मंत्रोच्चार चल रहा था और उसी बीच कन्या के भाई द्वारा की जाने वाली विधि आयी। इस विधि में कन्या का भाई कन्या के आगे-आगे चलते हुए लावे का छिड़काव करता है। आज भी शादी में यह परंपरा निभाई जाती है। विवाह पुरोहित ने जब इस प्रथा के लिए कन्या के भाई का आह्वान किया तो ये विचार किया जाने लगा कि इस प्रथा को कौन पूरा कर सकता है। समस्या ये थी कि उस समय वहाँ ऐसा कोई नहीं था जो माता सीता के भाई की भूमिका निभा सके। अपनी पुत्री के विवाह में इस प्रकार विलम्ब होता देख कर पृथ्वी माता भी दुखी हो गयी। चर्चा चल ही रही थी कि अचानक एक श्यामवर्ण का युवक उठा और उसने इस विधि को पूरा करने के लिए आज्ञा माँगी। वास्तव में वो कोई और नहीं स्वयं मंगलदेव थे जो वेश बदलकर नवग्रहों सहित श्रीराम का विवाह देखने को वहाँ आये थे। देवी सीता का जन्म पृथ्वी से हुआ था और मंगल भी पृथ्वी के पुत्र थे। इस नाते वे देवी सीता के भाई भी लगते थे। इसी कारण पृथ्वी माता के संकेत से वे इस विधि को पूर्ण करने के लिए आगे आये। इस प्रकार एक अनजान व्यक्ति को इस रस्म को निभाने को आता देख कर राजा जनक दुविधा में पड़ गए। जिस व्यक्ति के कुल, गोत्र एवं परिवार का कुछ आता पता ना हो उसे वे कैसे अपनी पुत्री के भाई के रूप में स्वीकार कर सकते थे। उन्होंने मंगल से उनका परिचय, कुल एवं गोत्र पूछा। इसपर मंगलदेव ने मुस्कुराते हुए कहा – “हे महाराज जनक! मैं अकारण ही आपकी पुत्री के भाई का कर्तव्य पूर्ण करने को नहीं उठा हूँ। आपकी आशंका निराधार नहीं है किन्तु आप निश्चिंत रहें, मैं इस कार्य के सर्वथा योग्य हूँ। अगर आपको कोई शंका हो तो आप महर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र से इस विषय में पूछ सकते हैं।” ऐसी तेजयुक्त वाणी सुनकर राजा जनक ने महर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र से इसके बारे में पूछा। वे दोनों तो सब जानते ही थे अतः उन्होंने इसकी आज्ञा दे दी। इस प्रकार गुरुजनों से आज्ञा पाने के बाद मंगल ने देवी सीता के भाई के रूप में सारी रस्में निभाई। रामायण एवं रामचरितमानस में इसका उल्लेख है। ये कथा अपनी बहन के प्रति एक भाई के उत्तरदायित्वों के निर्वाह का एक मुख्य उदाहरण है।

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नारदजी का अभिमान-भंग और माया का प्रभाव। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ एक बार नारदजी हिमालय पर तपस्या कर रहे थे। सहस्त्रों वर्ष बीत गए पर उनकी समाधि भंग न हुई। यह देखकर इन्द्र को बड़ा भय हुआ अत: इन्द्र ने कामदेव और बसंत को बुलाकर नारदजी की तपस्या भंग करने भेजा। कामदेव ने सभी कलाओं का प्रयोग कर लिया पर नारदजी पर उसकी एक न चली क्योंकि यह वही स्थान था जहां भगवान शंकर ने कामदेव को जलाया था। अत: इस स्थान पर कामदेव के वाणों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। विवश होकर कामदेव इन्द्र के पास लौट आया और कहा–’नारदजी में न काम ही है न क्रोध ही। क्योंकि उन्होंने मेरा मधुर वचनों से आतिथ्य किया।’ यह सुनकर सब दंग रह गए। तपस्या पूरी होने पर ‘कामदेव पर मेरी विजय हुई है’ ऐसा मानकर नारदजी के मन में व्यर्थ ही गर्व हो गया। वे यह नहीं समझ सके कि कामदेव के पराजित होने में भगवान शंकर का प्रभाव ही कारण है। नारदजी अपना काम-विजय सम्बन्धी वृतान्त बताने के लिए भगवान शंकर के पास कैलास पर्वत पर गए और अपनी कथा सुनाई। शंकरजी ने कहा आप अपनी यह बात कभी किसी से न कहना। यह सिद्धि सम्बन्धी बात गुप्त रखने योग्य है। यह बात भगवान विष्णु को बिल्कुल न बताइयेगा। नारदजी को यह बात अच्छी नहीं लगी और वे वीणा लेकर वैकुण्ठ को चल दिए और वहां जाकर भगवान विष्णु को अपना काम-विजय प्रसंग सुनाने लगे। भगवान ने सोचा–’इनके हृदय में समस्त शोक का कारण अहंकार का अंकुर उत्पन्न हो रहा है, सो इसे झट से उखाड़ डालना चाहिए।’ विष्णुलोक से जब नारदजी पृथ्वी पर आए तो उन्हें वैकुण्ठ से भी सुन्दर एक बड़ा मनोहर नगर दिखाई दिया। भगवान की माया की बात वे समझ न सके। लोगों से पूछने पर पता चला कि इस नगर का राजा शीलनिधि अपनी पुत्री ‘श्रीमती’ का स्वयंवर कर रहा है जिसमें देश-विदेश से राजा आये हैं। नारदजी भी राजा के यहां पहुँच गए। राजा और उसकी पुत्री ने नारदजी को प्रणाम किया। इसके बाद राजा ने अपनी पुत्री के भाग्य के बारे में नारदजी से पूछा। नारदजी उसके लक्षण देखकर चकित रह गए। नारदजी ने राजा को बताया–’आपकी यह पुत्री अपने महान भाग्य के कारण धन्य है और साक्षात् लक्ष्मी की भांति समस्त गुणों से सम्पन्न है। इसका भावी पति निश्चय ही भगवान शंकर के समान वैभवशाली, सर्वेश्वर, किसी से पराजित न होने वाला, वीर, कामविजयी तथा सम्पूर्ण देवताओं में श्रेष्ठ होगा।’ अब नारदजी स्वयं काम के वशीभूत होकर उस राजकुमारी से विवाह करना चाहते थे। उन्होंने विष्णु भगवान से प्रार्थना की। प्रभु प्रकट हो गए। नारदजी बोले–’नाथ ! मेरा हित करो। मैं आपका प्रिय सेवक हूँ। राजा शीलनिधि ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए स्वयंवर रचाया है। आप अपना स्वरूप मुझे दे दीजिए। आपकी कृपा के बिना राजकुमारी को प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं है।’ भगवान ने कहा– ‘वैद्य जिस प्रकार रोगी की औषधि करके उसका कल्याण करता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारा हित अवश्य करूंगा।’ यद्यपि भगवान का कथन स्पष्ट था किन्तु काम से व्याकुल नारदजी को कुछ समझ नहीं आया। और वे यह समझकर कि ‘भगवान ने मुझे अपना रूप दे दिया’ स्वयंवर-सभा में जा विराजे। भगवान ने उनका मुख हरि (हरि भगवान का एक नाम है और बंदर को भी हरि कहते हैं) जैसा बना दिया और शेष अंग अपने जैसे बना दिए थे। अब राजकुमारी जयमाल लेकर सभा में आई तो नारदजी का बंदर का मुख देखकर कुपित हो गई और उसने वहां सभा में बैठे विष्णु भगवान को जयमाला पहना दी। भगवान राजकुमारी को लेकर चले गए। नारदजी बड़े दुखी हुए। वहां उपस्थित शिवजी के गणों ने नारदजी को अपना मुंह दर्पण में देखने के लिए कहा। दर्पण तो था नहीं, जब नारदजी ने पानी में अपना मुंह देखा तो वानरमुख देखकर उन्हें बहुत क्रोध आया। और वे विष्णुलोक के लिए चल दिए। रास्ते में ही उन्हें भगवान विष्णु राजकुमारी के साथ मिल गए। नारदजी क्रोध में बोले– ‘मैं तो जानता था कि तुम भले व्यक्ति हो परन्तु तुम सर्वथा विपरीत निकले। समुद्र-मंथन के समय तुमने असुरों को मद्य पिला दिया और स्वयं कौस्तुभादि चार रत्न और लक्ष्मी को ले गए। शंकरजी को बहलाकर विष दे दिया। यदि उन कृपालु ने उस समय हलाहल को न पी लिया होता तो तुम्हारी सारी माया नष्ट हो जाती और आज हमारे साथ यह कौतुक न होता। तुमने मेरी अभीष्ट कन्या छीनी, अतएव तुम भी स्त्री के विरह में मेरे जैसे ही विकल होओगे। तुमने जिन वानरों के समान मेरा मुंह बनाया था, वे ही उस समय तुम्हारे सहायक होंगे।’ भगवान ने अपनी माया खींच ली। अब नारदजी देखते हैं तो न वहां राजकुमारी है और न ही लक्ष्मीजी। वे बड़ा पश्चात्ताप करने लगे और ‘त्राहि त्राहि’ कहकर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े। भगवान ने भी उन्हें सान्त्वना दी और आशीर्वाद दिया कि अब माया तुम्हारे पास न फटकेगी। श्रीनारदजी ही एकमात्र ऐसे संत हैं, जिनका सभी देवता और दैत्यगण समान रूप से सम्मान एवं विश्वास करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने नारदजी के सम्बन्ध में कहा है– ‘मैं दिव्यदृष्टि सम्पन्न श्रीनारदजी की स्तुति करता हूँ। जिनके मन में अहंकार नहीं है, जिनका शास्त्रज्ञान और चरित्र किसी से छिपा नहीं है, उन देवर्षि नारद को मैं नमस्कार करता हूँ। जो कामना अथवा लोभवश झूठी बात मुँह से नहीं निकालते और सभी प्राणी जिनकी उपासना करते हैं, उन नारदजी को मैं नमस्कार करता हूँ 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ प्रथम स्कन्ध: चतुर्थोध्याय: (दूसरा दिन) (महर्षि व्यास का असंतोष) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ सूत उवाच द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये। जातः पराशराद्योगी वासव्यां कलया हरेः ॥ १४ स कदाचित्सरस्वत्या उपस्पृश्य जलं शुचि । विविक्तदेश आसीन उदिते रविमण्डले ॥ १५ परावरज्ञः स ऋषि: कालेनाव्यक्तरंहसा । युगधर्मव्यतिकरं प्राप्तं भुवि युगे युगे ॥ १६ भौतिकानां च भावानां शक्तिह्रासं च तत्कृतम् । अश्रद्धानान्निःसत्त्वान्दुर्मेधान् ह्रसितायुषः ॥ १७ दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुषा । सर्ववर्णाश्रमाणां यद्दध्यौ हितममोघदृक् ॥ १८ चातुहोंत्रं कर्म शुद्धं प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् । व्यदधाद्यज्ञसन्तत्यै वेदमेकं चतुर्विधम् ॥ १९ ऋग्यजुःसामाथर्वाख्या वेदाश्चत्वार उद्धृताः। इतिहासपुराणं च पञ्चमो वेद उच्यते ॥ २० तत्रग्व्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः । वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामुत ॥ २१ अथर्वाङ्गिरसामासीत्सुमन्तुर्दारुणो मुनिः । इतिहासपुराणानां पिता मे रोमहर्षणः ॥ २२ त एत ऋषयो वेदं स्वं स्वं व्यस्यन्ननेकधा । शिष्यैः प्रशिष्यैस्तच्छिष्यैर्वेदास्ते शाखिनोऽभवन् ॥ २३ त एव वेदा दुर्मेधैर्धार्यन्ते पुरुषैर्यथा । एवं चकार भगवान् व्यासः कृपणवत्सलः ॥ २४ स्त्रीशुद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह । इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ २५ एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः । सर्वात्मकेनापि यदा नातुष्यद्धृदयं ततः ॥ २६ नातिप्रसीदद्धृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ । वितर्कयन् विवितक्तस्थ इदं प्रोवाच धर्मवित् ।॥ २७ धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्रयः । मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २८ भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः । दृश्यते यत्र धर्मादि स्त्रीशूद्रादिभिरष्युत ।। २९ तथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवात्मना विभुः। असम्पन्न इवाभाति ब्रह्मवर्चस्यसत्तमः ॥ ३० किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः। प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३१ तस्यैवं खिलमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः । कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहतम् ॥ ३२ तमभिज्ञाय सहसा प्रत्युत्थायागतं मुनिः । पूजयामास विधिवन्नारदं सुरपूजितम् ॥ ३३ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ सूतजीने कहा-इस वर्तमान चतुर्युगी के तीसरे युग द्वापर में महर्षि पराशर के द्वारा वसु-कन्या सत्यवती के गर्भ से भगवान् के कलावतार योगिराज व्यासजी का जन्म हुआ ।। १४ ॥ एक दिन वे सूर्योदय के समय सरस्वती के पवित्र जल में स्रानादि करके एकान्त पवित्र स्थान पर बैठे हुए थे। १५ ॥ महर्षि भूत और भविष्य को जानते थे। उनकी दृष्टि अचूक थी। उन्होंने देखा कि जिसको लोग जान नहीं पाते, ऐसे समय के फेर से प्रत्येक युग में धर्म सङ्करता और उसके प्रभाव से भौतिक वस्तुओं की भी शक्ति का ह्रास होता रहता है। संसार के लोग श्रद्धाहीन और शक्ति रहित हो जाते हैं। उनकी बुद्धि कर्तव्य का ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाती और आयु भी कम हो जाती है। लोगों की इस भाग्यहीनता को देखकर उन मुनीश्वर ने अपनी दिव्यदृष्टि से समस्त वर्णों और आश्रमों का हित कैसे हो, इसपर विचार किया ॥ १६-१८ ॥ उन्होंने सोचा कि वेदोक्त चातुहोंत्र * कर्म लोगों का हृदय शुद्ध करने वाला है। इस दृष्टि से यज्ञों का विस्तार करने के लिये उन्होंने एक ही वेद के चार विभाग कर दिये॥ १९ ॥ व्यासजी के द्वारा ऋक्, यजु:, साम और अथर्व- इन चार वेदों का उद्धार (पृथक्करण) हुआ। इतिहास और पुराणों को पाँचवाँ वेद कहा जाता है ।। २० ॥ उनमें से ऋग्वेद के पैल, साम-गान के विद्वान् जैमिनि एवं यजुर्वेद के एकमात्र स्नातक वैशम्पायन हुए ॥ २१ ॥ अथर्ववेद में प्रवीण हुए दरुणनन्दन सुमन्तु मुनि । इतिहास और पुराणों के स्नातक मेरे पिता रोमहर्षण थे॥ २२ ॥ इन पूर्वोक्त ऋषियों ने अपनी-अपनी शाखा को और भी अनेक भागों में विभक्त कर दिया। इस प्रकार शिष्य, प्रशिष्य और उनके शिष्योंद्वारा वेदों की बहुत-सी शाखाएँ बन गयीं॥ २३ ॥ कम समझ वाले पुरुषों पर कृपा करके भगवान् वेदव्यास ने इसलिये ऐसा विभाग कर दिया कि जिन लोगों को स्मरणशक्ति नहीं है या कम है, वे भी वेदों को धारण कर सकें ॥ २४ ॥ स्त्री शूद्र और पतित द्विजाति-तीनों ही वेद श्रवण के अधिकारी नहीं हैं। इसलिये वे कल्याणकारी शा्त्रोक्त कर्मो कि आचरण में भूल कर बैठते हैं। अब इसके द्वारा उनका भी कल्याण हो जाय, यह सोचकर महामुनि व्यासजी ने बड़ी कृपा करके महाभारत इतिहास की रचना की ॥ २५॥ शौनकादि ऋषियो ! यद्यपि व्यासजी इस प्रकार अपनी पूरी शक्ति से सदा-सर्वदा प्राणियों के कल्याण में ही लगे रहे. तथापि उनके हृदय को सन्तोष नहीं हुआ ॥ २६ ॥ उनका मन कुछ खिन्न-सा हो गया। सरस्वती नदी के पवित्र तटपर एकान्त में बैठकर धर्मवेत्ता व्यासजी मन-ही-मन विचार करते हुए इस प्रकार कहने लगे- भाव से ब्रह्मचर्यादि व्रतों का पालन करते हुए वेद, गुरुजन और अग्नियों का सम्मान किया है और उनकी आज्ञा का 'मैंने निष्कपट पालन किया है॥ ।। २७ ।। २८ ॥ महाभारत की रचना के बहाने मैंने वेद के अर्थ को खोल दिया है-जिससे स्त्री, शूद्र आदि भी अपने-अपने धर्म-कर्म का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं । २९ ॥ यद्यपि मैं ब्रह्मतेज से सम्पन्न एवं समर्थ हूँ, तथापि मेरा हृदय कुछ अपूर्णकाम-सा जान पड़ता है। ३० ॥ अवश्य ही अबतक मैंने भगवान को प्राप्त कराने वाले धर्मो का प्रायः निरूपण नहीं किया है। वेही धर्म परमहंसों को प्रिय हैं और वे ही भगवान्को भी प्रिय हैं (हो-न-हो मेरी अपूर्णताका यही कारण है)॥ ३१ ॥ श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास इस प्रकार अपने को अपूर्ण-सा मानकर जब खिन्न हो रहे थे, उसी समय पूर्वोक्त आश्रमपर देवर्षि नारदजी आ पहुँचे ॥ ३२ ।॥ उन्हें आया देख व्यासजी तुरन्त खड़े हो गये। उन्होंने देवताओं के द्वारा सम्मानित देवर्षिनारदकी विधिपूर्वक पूजा की ॥ ३३ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे नैमिषीयोपाख्याने चतुर्थोऽध्यायः' ॥ ४ ॥ क्रमशः..... ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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yogradhey May 9, 2020

https://youtu.be/zvNKBArlALY श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कंध के तीसरे अध्याय में गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र दिया गया है. इसमें कुल तैतीस श्लोक हैं इस स्त्रोत में ग्राह के साथ गजेन्द्र के युद्ध का वर्णन किया गया है, जिसमें गजेन्द्र ने ग्राह के मुख से छूटने के लिए श्री हरि की स्तुति की थी और प्रभु श्री हरि ने गजेन्द्र की पुकार सुनकर उसे ग्राह से मुक्त करवाया। गजेन्द्र मोक्ष का माहात्म्य बतलाते हुए कहा गया है कि इसको समस्त पापों का नाशक, साधक कहा गया है। बच्चों की बुद्धि इस पाठ को रोज एक बार करने से तीर्व होती हैं कर्ज से मुक्ति पाने के लिए गजेन्द्र-मोक्ष स्तोत्र का सूर्योदय से पूर्व प्रतिदिन पाठ करना चाहिए। यह ऐसा अमोघ उपाय है जिससे बड़ा से बड़ा कर्ज भी श‍ीघ्र उतर जाता है। जिसे भूत, प्रेत से भय लगता है या उसे ऐसा लगता है कि कोई साया उसका पीछा कर रहा है, तो उसके गले में “ॐ” या “रुद्राक्ष” को अभिमंत्रित करवाकर पहना दें तथा उसके माथे पर चन्दन, केसर और भभूत का तिलक लगाएं व हांथ में रक्षासूत्र बाँध दें. और जो व्यक्ति प्रत्येक मंगलवार और शनिवार हनुमान चालीसा व गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करता है, तो उसे किसी भी प्रकार का भय नहीं लगता. #Gajendra #Moksha #Stotra #गजेन्द्र-#मोक्ष #स्तोत्र by #yogradhey #श्लोक संख्या 11,12 बच्चों के लिए

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