Om Namo Mahalaxmi Namosthuthe

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sunita Sharma Oct 25, 2020

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Neha Sharma, Haryana Oct 25, 2020

🌸*देवी माहात्म्य*🌸🙏🌸*अध्याय - 06*🌸 *इस अध्याय में:- (धूम्रलोचन-वध)..... *ऋषि कहते हैं- 'देवी का यह कथन सुनकर दूत को बड़ा अमर्ष हुआ और उसने दैत्यराज के पास जाकर सब समाचार विस्तार पूर्वक कह सुनाया। दूत के उस वचन को सुनकर दैत्यराज कुपित हो उठा और दैत्य सेनापति धूम्रलोचन से बोला- 'धूम्रलोचन! तुम शीघ्र अपनी सेना साथ लेकर जाओ और उस दुष्टा के केश पकड़कर घसीटते हुए उसे बल पूर्वक यहाँ ले आओ। उसकी रक्षा करने के लिये यदि कोई दूसरा खड़ा हो तो वह देवता, यक्ष अथवा गन्धर्व ही क्यों न हो, उसे अवश्य मार डालना।' *ऋषि कहते हैं- 'शुम्भ के इस प्रकार आज्ञा देने पर वह धूम्रलोचन दैत्य साठ हजार असुरों की सेना को साथ लेकर वहाँ से तुरंत चल दिया। वहाँ पहुँचकर उसने हिमालय पर रहने वाली देवी को देखा और ललकारकर कहा- 'अरी ! तू शुम्भ-निशुम्भ के पास चल। यदि इस समय प्रसन्नता पूर्वक मेरे स्वामी के समीप नहीं चलेगी तो मैं बल पूर्वक झोंटा पकड़कर घसीटते हुए तुझे ले चलूँगा।' *देवी बोलीं- 'तुम्हें दैत्यों के राजा ने भेजा है, तुम स्वयं भी बलवान् हो और तुम्हारे साथ विशाल सेना भी है, ऐसी दशा में यदि मुझे बल पूर्वक ले चलोगे तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ?' *ऋषि कहते हैं- 'देवी के यों कहने पर असुर धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ा, तब अम्बिका ने 'हुं' शब्द के उच्चारण मात्र से उसे भस्म कर दिया। फिर तो क्रोध में भरी हुई दैत्यों की विशाल सेना और अम्बिका ने एक-दूसरे पर तीखे सायकों, शक्तियों तथा फरसों की वर्षा आरम्भ की। इतने में ही देवी का वाहन सिंह क्रोध में भरकर भयंकर गर्जना करके गर्दन के बालों को हिलाता हुआ असुरों की सेना में कूद पड़ा। उसने कुछ दैत्यों को पंजों की मार से, कितनों को अपने जबड़ों से और कितने ही महादैत्यों को पटककर ओठ की दाढ़ों से घायल करके मार डाला। उस सिंह ने अपने नखों से कितनों के पेट फाड़ डाले और थप्पड़ मारकर कितनों के सिर धड़ से अलग कर दिये। *कितनों की भुजाएँ और मस्तक काट डाले तथा अपनी गर्दन के बाल हिलाते हुए उसने दूसरे दैत्यों के पेट फाड़कर उनका रक्त चूस लिया। अत्यन्त क्रोध में भरे हुए देवी के वाहन उस महाबली सिंह ने क्षण भर में ही असुरों की सारी सेना का संहार कर डाला। *शुम्भ ने जब सुना कि देवी ने धूम्रलोचन असुर को मार डाला तथा उसके सिंह ने सारी सेना का सफाया कर डाला, तब उस दैत्यराज को बड़ा क्रोध हुआ। उसका ओठ काँपने लगा। उसने चण्ड और मुण्ड नामक दो महादैत्यों को आज्ञा दी- 'हे चण्ड! और हे मुण्ड! तुम लोग बहुत बड़ी सेना लेकर वहाँ जाओ, उस देवी के झोंटे पकड़कर अथवा उसे बाँधकर शीघ्र यहाँ ले आओ। यदि इस प्रकार उसको लाने में संदेह हो तो युद्ध में सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों तथा समस्त आसुरी सेना का प्रयोग करके उसकी हत्या कर डालना। उस दुष्टा की हत्या होने तथा सिंह के भी मारे जाने पर उस अम्बिका को बाँधकर साथ ले शीघ्र ही लौट आना।' *इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवी माहात्म्य में 'धूम्रलोचन-वध' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ॥६॥ ----------:::×:::---------- "ॐ श्री दुर्गायै नमः" 🌸🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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👉Malti gupta🌹 Oct 26, 2020

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Neha Sharma, Haryana Oct 25, 2020

🌸*श्री मद् देवी भागवत महापुराण .........(छठा अध्याय)*🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 🌸🙏*जय मां कपालिनी नमो नमः*🙏🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 🌸🙏*ओम् गं गणपतये नमः*🌸🙏 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 *इस अध्याय में सती के साथ भगवान शिव का हिमालय पर्वत पर आना, सभी देवों का हिमालय पर विवाहोत्सव में पहुँचना, नन्दी द्वारा हिमालय पर आकर शिव की स्तुति करना और शंकर द्वारा उनको प्रमथाधिपतिपद प्रदान करना आदि बातों का वर्णन है । *श्रीमहादेव जी बोले – हिमालय के श्री कैलाश शिखर पर सती के साथ महादेवजी के आ जाने पर सभी देवगण भी वहाँ पहुँच गए. महर्षिगण, देवपत्नियाँ, सर्प, गन्धर्व एवं हजारों किन्नरियाँ वहाँ पहुँच गईं. सखियों के साथ मेरुदुहिता गिरीन्द्रवनिता मेनका तथा मुनिपत्नियाँ भी वहाँ आ गईं. परम आह्लादित देवताओं ने आकाश से पुष्पवृष्टि की. मुख्य अप्सराएँ नाचने लगीं और श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे ।।1-4।। *सभी स्त्रियाँ समारोहपूर्वक विवाह से संबंधित मांगलिक कृत्य करने लगीं और सभी प्रमथगणों ने प्रसन्न होकर भगवान शंकर एवं सती को प्रणाम किया और वे ताली बजा-बजाकर नाचने तथा गीत गाने लगे।।5।। *तदनन्तर सभी श्रेष्ठ देवगण सती और देवेश भगवान शंकर को प्रणाम कर तथा उनकी अनुज्ञा प्राप्त कर अपने-अपने स्थान को चले गए. मुनिश्रेष्ठ ! उसी प्रकार अन्य सभी लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थान को चले गए तथा मेना आदि स्त्रियाँ भी चली गईं।।6-7।। *परम सुन्दरी, कोमलांगी सती को देखकर मेना मन में सोचने लगीं कि जिसकी यह पुत्री है वह माता धन्य है ! मैं प्रतिदिन यहाँ आकर सुमुखी सती की आराधना करके पुत्री-भाव से इसे प्राप्त करने की प्रार्थना करूँगी, इसमें संशय नहीं है।।8-9।। *इस प्रकार गिरिराजपत्नी मेना मन में विचार करके त्रिलोकमाता अम्बिका को कभी भी नहीं भूल पाई. शंकरप्रिया सती के घर प्रतिदिन आकर वे उनके प्रति परम स्नेहभाव से प्रीति बढ़ाने लगीं।।10-11½।। *तदनन्तर एक बार बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, ज्ञानी और शिवभक्त नन्दी, जो दक्ष की सेवा में थे, वहाँ आए और उन्होंने भगवान महेश को भूमि पर गिरकर दण्डवत प्रणाम किया।।12-13।। *वे बोले – देवाधिदेव ! प्रभो ! मैं प्रजापति दक्ष का सेवक और ब्रह्मर्षि दधीचि का शिष्य हूँ, जो आपके प्रभाव को जानने वाले संत हैं. देवेश ! शरणागतवत्सल ! आप मुझे मोहित मत कीजिए. मैं आपको साक्षात परमेश्वर और परमात्मा के रूप में जानता हूँ. मैं सृष्टि, स्थिति और संहारकारिणी भगवती सती को मूल प्रकृति के रूप में जानता हूँ।।14-15।। *इस प्रकार कहकर नन्दी ने भक्तों पर कृपा करने वाले भगवान शंकर का अपनी परम भक्तिपूर्ण गद्गद वाणी से स्तवन किया।।16-17।। *नन्दी बोले – शिव ! आप त्रिलोकी के आदि परम पुरुष हैं और समस्त जगत के सृष्टि, पालन एवं संहारा करने वाले भी आप ही हैं. देवश्रेष्ठ ! वरदायक भवानीपति ! आप ऎश्वर्ययुक्त, युवक, वृद्ध और एकमात्र ब्रह्म हैं।।18।। *हिमधवलकान्ति से युक्त, शशि समूह को पराजित करने वाला और अर्धचन्द्र धारण किए, चन्द्रमा के समान पाँच मुखोंवाला सुन्दर आपका स्वरुप अचिन्त्य है. निर्मल नागमणि से सुशोभित सर्परूपी आभूषण को सिर पर धारण करने वाले और ब्रह्मादि देवताओं के द्वारा पूजित युगचरण कमल वाले आपको मैं नमस्कार करता हूँ।।19।। *इस पृथ्वी पर जो व्यक्ति निरन्तर भक्ति अथवा अभक्तिपूर्वक भी आपकी नित्य पूजा करते हैं, आपके नामों का संकीर्तन करते हैं और आपके मन्त्र का निरन्तर जप करते हैं, वे आपके चरणों की संनिधि प्राप्त कर निरन्तर स्वर्ग में रमण करते हैं. प्रभो ! पशुपति ! आप देवाधिदेव को छोड़कर दीनों पर दया करने वाला और कौन है?।।20।। *श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! नन्दी की ऎसी स्तुति सुनकर भगवान शंकर उससे बोले – नन्दी ! तुम्हारी क्या इच्छा है, माँगो. वह मैं तुम्हें देता हूँ।।21।। *नन्दी ने कहा – जगदीश्वर ! मैं आपका हमेशा निकट रहने वाला दास बना रहूँ और अपनी आँखों से नित्य आपके दर्शन करता रहूँ, यही आपसे याचना करता हूँ।।22।। *शिवजी बोले – वत्स ! जो तुमने माँगा है, निश्चित रूप से वही होगा. अवश्य ही तुम हमेशा मेरे समीप निवास करोगे।।23।। *पृथ्वी पर जो मानव इस स्तोत्र से भक्तिपूवक मेरी स्तुति करेंगे, उनका तीनों लोकों में कभी अशुभ नहीं होगा. इस मृत्युलोक में दीर्घकाल तक रहकर वे अन्त में मोक्ष प्राप्त करेंगे।।24।। *महामते ! तुम मेरे इन प्रमथगणों के अधिपति होकर मेरे इस शिवलोक में निवास करो, नन्दी ! तुम मेरे प्रिय भक्त हो।।25-26।। *श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार वर प्राप्त करके भगवान शंकर के प्रभाव से नन्दी शिव के गणों के अधिपति हो गए।।27।। ।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत *श्रीशिव-नारद-संवाद में “नन्दिकेश्वरप्रमथाधिपत्ववर्णन” नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ।। ।। जय माता दी ।। 🌸🌸🙏🌸🌸 ~~~~~~~~~

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Shashikant Shahi Oct 25, 2020

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