जय सियाराम 🕉️🙏🙏🙏🙏

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Manju Agrawal Mar 26, 2020

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kiranben Mar 26, 2020

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श्रीमद्भागवत महापुराण (महात्म्य) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्रीमद्भागवत महात्म्य प्रथमोध्याय (चतुर्थ दिवस) (देवऋषि नारद की भक्ति से भेंट) नारद उवाच कासि त्वं काविमौ चेमा नार्य: काः पद्मलोचनाः। वद देवि सविस्तारं स्वस्य दुःखस्य कारणम् ॥ ४४ बालोवाच अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ ज्ञानवैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरै ॥ ४५ गङ्गाद्याः सरितश्चेमा मत्सेवार्थं समागताः । तथापि न च मे श्रेयः सेवितायाः सुरैरपि ॥ ४६ इदानीं शृणु मद्वार्तां सचित्तस्त्वं तपोधन । वार्ता मे वितताप्यस्ति तां श्रुत्वा सुखमावह ॥ ४७ उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता । क्वचित्क्वचिन्महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता । ॥ ४८ तत्र घोरकलेयोंगात्पाखण्डैः खण्डिताङ्गका । दुर्बलाहं चिरं याता पुत्राभ्यां सह मन्दताम् ॥ ४९ वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी । जाताहं युवती सम्यक्प्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम् ॥ ५० इमौ तु शयितावत्र सुतौ मे क्लिश्यतः श्रमात् । इदं स्थानं परित्यज्य विदेशं गम्यते मया ॥ ५१ जरठत्वं समायातौ तेन दुःखेन दुःखिता । साहं तु तरुणी कस्मात्सुतौ वृद्धाविमौ कुतः ॥ ५२ त्रयाणां सहचारित्वाद्वैपरीत्यं कुतः स्थितम् । घटते जरठा माता तरुणौ तनयाविति ॥ ५३ अतः शोचामि चात्मानं विस्मयाविष्टमानसा। वद योगनिधे धीमन् कारणं चात्र किं भवेत् ॥ ५४ नारद उवाच ज्ञानेनात्मनि पश्यामि सर्वमेतत्तवानघे । न विषादस्त्वया कार्यों हरिः शं ते करिष्यति ॥ ५५ सूत उवाच क्षणमात्रेण तज्ज्ञात्वा वाक्यमूचे मुनीश्वरः ॥ ५६ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ नारदजी कहते हैं- तब मैंने उस स्त्री से पूछा-देवि ! तुम कौन हो ? ये दोनों पुरुष तुम्हारे क्या होते हैं? और तुम्हारे पास ये कमलनयनी देवियाँ कौन हैं ? तुम हमें विस्तार से अपने दुःख का कारण बताओ ॥४४ ॥ युवती ने कहा- मेरा नाम भक्ति है, ये ज्ञान और वैराग्य नामक- मेरे पुत्र हैं। समय के फेर से ही ये ऐसे जर्जर हो गये हैं॥४५॥ ये देवियाँ गङ्गाजी आदि नदियाँ हैं । ये सब मेरी सेवा करने के लिये ही आयी हैं। इस प्रकार साक्षात् देवियों के द्वारा सेवित होने पर भी मुझे सुख-शान्ति नहीं है ॥ ४६॥ तपोधन ! अब ध्यान देकर मेरा वृत्तान्त सुनिये। मेरी कथा वैसे तो प्रसिद्ध है, फिर भी उसे सुनकर आप मुझे शान्ति प्रदान करें ॥ ४७ ॥ मैं द्रविड़ देश में उत्पन्न हुई, कर्णाटक में बढ़ी, कहीं-कहीं महाराष्ट्र में सम्मानित हुई; किन्तु गुजरात में मुझको बुढ़ापे ने आ घेरा ॥ ४८ ॥ वहाँ घोर कलियुग के प्रभाव से पाखण्डियों ने मुझे अङ्ग-भङ्ग कर दिया। चिरकाल तक यह अवस्था रहनेके कारण मैं अपने पुत्रों के साथ दुर्बल और निस्तेज हो गयी॥ ४९ |॥ अब जब से मैं वृन्दावन आयी, तबसे पुनः परम सुन्दरी सुरूपवती नवयुवती हो गयी हूँ। । ५० ॥ किन्तु सामने पड़े हुए ये दोनों मेरे पुत्र थके-माँदै दुःखी हो रहे हैं। अब मैं यह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना चाहती हूँ॥ ५१ ॥ ये दोनों बूढ़े हो गये हैं-इसी दुःख से मैं दुःखी हूँ। मैं तरुणी क्यों और ये दोनों मेरे पुत्र बूढ़े क्यों ? ॥ ५२ । हम तीनों साथ-साथ रहने वाले हैं। फिर यह विपरीतता क्यों ? होना तो यह चाहिये कि माता बूढ़ी हो और पुत्र तरुण ॥ ५३ ॥ इसी से मैं आश्चर्यचकित चित्त से अपनी इस अवस्था पर शोक करती रहती हूँ। आप परम बुद्धिमान् एवं योगनिधि हैं; इसका क्या कारण हो सकता है, बताइये ? ॥ ५४॥ नारदजी ने कहा-साध्वि ! मैं अपने हृदय में ज्ञानदृष्टि से तुम्हारे सम्पूर्ण दुःख का कारण देखता हूँ, तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये। श्रीहरि तुम्हारा कल्याण करेंगे।। ५५॥ सूतजी कहते हैं-मुनिवर नारदजी ने एक क्षण में ही उसका कारण जानकर कहा। ५६ ॥ क्रमशः..... ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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जय माता दी🔱🚩🌺🙏🌺 सभी को शुभ संध्या वंदन जी क्यों कहा जाता है माता रानी को दुर्गा” 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पुरातन काल में दुर्गम नामक दैत्य हुआ। उसने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर सभी वेदों को अपने वश में कर लिया जिससे देवताओं का बल क्षीण हो गया। तब दुर्गम ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। तब देवताओं को देवी भगवती का स्मरण हुआ। देवताओं ने शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ तथा चण्ड-मुण्ड का वध करने वाली शक्ति का आह्वान किया।‘ देवताओं के आह्वान पर देवी प्रकट हुईं। उन्होंने देवताओं से उन्हें बुलाने का कारण पूछा। सभी देवताओं ने एक स्वर में बताया कि दुर्गम नामक दैत्य ने सभी वेद तथा स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया है तथा हमें अनेक यातनाएं दी हैं। आप उसका वध कर दीजिए। देवताओं की बात सुनकर देवी ने उन्हें दुर्गम का वध करने का आश्वासन दिया। यह बात जब दैत्यों का राजा दुर्गम को पता चली तो उसने देवताओं पर पुन: आक्रमण कर दिया। तब माता भगवती ने देवताओं की रक्षा की तथा दुर्गम की सेना का संहार कर दिया। सेना का संहार होते देख दुर्गम स्वयं युद्ध करने आया। तब माता भगवती ने काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला आदि कई सहायक शक्तियों का आह्वान कर उन्हें भी युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। भयंकर युद्ध में भगवती ने दुर्गम का वध कर दिया। दुर्गम नामक दैत्य का वध करने के कारण भी भगवती का नाम दुर्गा के नाम से विख्यात हुआ। 🙏🙏 जय मांँ दुर्गा 🙏🙏

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एक ब्राम्हण था, कृष्ण के मंदिर में बड़ी सेवा किया करता था। . उसकी पत्नी इस बात से हमेशा चिढ़ती थी कि हर बात में वह पहले भगवान को लाता। . भोजन हो, वस्त्र हो या हर चीज पहले भगवान को समर्पित करता। . एक दिन घर में लड्डू बने। . ब्राम्हण ने लड्डू लिए और भोग लगाने चल दिया। . पत्नी इससे नाराज हो गई, कहने लगी कोई पत्थर की मूर्ति जिंदा होकर तो खाएगी नहीं जो हर चीज लेकर मंदिर की तरफ दौड़ पड़ते हो। . अबकी बार बिना खिलाए न लौटना, देखती हूं कैसे भगवान खाने आते हैं। . बस ब्राम्हण ने भी पत्नी के ताने सुनकर ठान ली कि बिना भगवान को खिलाए आज मंदिर से लौटना नहीं है। . मंदिर में जाकर धूनि लगा ली। . भगवान के सामने लड्डू रखकर विनती करने लगा। . एक घड़ी बीती। आधा दिन बीता, न तो भगवान आए न ब्राम्हण हटा। . आसपास देखने वालों की भीड़ लग गई . सभी कौतुकवश देखने लगे कि आखिर होना क्या है। . मक्खियां भिनभिनाने लगी ब्राम्हण उन्हें उड़ाता रहा। . मीठे की गंध से चीटियां भी लाईन लगाकर चली आईं। . ब्राम्हण ने उन्हें भी हटाया, फिर मंदिर के बाहर खड़े आवारा कुत्ते भी ललचाकर आने लगे। . ब्राम्हण ने उनको भी खदेड़ा। . लड्डू पड़े देख मंदिर के बाहर बैठे भिखारी भी आए गए। . एक तो चला सीधे लड्डू उठाने तो ब्राम्हण ने जोर से थप्पड़ रसीद कर दिया। . दिन ढल गया, शाम हो गई। . न भगवान आए, न ब्राम्हण उठा। शाम से रात हो गई। . लोगों ने सोचा ब्राम्हण देवता पागल हो गए हैं, . भगवान तो आने से रहे। . धीरे-धीरे सब घर चले गए। . ब्राम्हण को भी गुस्सा आ गया। . लड्डू उठाकर बाहर फेंक दिए। . भिखारी, कुत्ते,चीटी, मक्खी तो दिन भर से ही इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे, सब टूट पड़े। . उदास ब्राम्हण भगवान को कोसता हुआ घर लौटने लगा। . इतने सालों की सेवा बेकार चली गई। कोई फल नहीं मिला। . ब्राम्हण पत्नी के ताने सुनकर सो गया । . रात को सपने में भगवान आए। . बोले-तेरे लड्डू खाए थे मैंने। . बहुत बढिय़ा थे, लेकिन अगर सुबह ही खिला देता तो ज्यादा अच्छा होता । . कितने रूप धरने पड़े तेरे लड्डू खाने के लिए। . मक्खी, चीटी, कुत्ता, भिखारी। . पर तुने हाथ नहीं धरने दिया। . दिनभर इंतजार करना पड़ा। . आखिर में लड्डू खाए लेकिन जमीन से उठाकर खाने में थोड़ी मिट्टी लग गई थी। . अगली बार लाए तो अच्छे से खिलाना । . भगवान चले गए। . ब्राम्हण की नींद खुल गई। . उसे एहसास हो गया। . भगवान तो आए थे खाने लेकिन मैं ही उन्हें पहचान नहीं पाया। . बस, ऐसे ही हम भी भगवान के संकेतों को समझ नहीं पाते हैं।

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शुभ रात्रि मित्रों🙏😊🙏 बहता पानी और चलते विचार.. एक दिन ऋषिवर शिष्य को एक खेत पर लेकर गये जहाँ एक किसान बहती हुई नहर से पानी को रास्ता बनाकर खेत तक ले जा रहा था और ऋषिवर ने वो दृश्य शिष्य को बड़ी गहराई से दिखाया और फिर कहा! ऋषिवर - वत्स इस बहते हुये पानी को यदि सही दिशा मिल जायें तो ये पानी खेत तक जाकर वहाँ की फसल को निहाल कर देगी और यदि आप इस पानी को सही दिशा न दोगे तो पानी तो अपना रास्ता स्वयं बनाकर इधरउधर व्यर्थता मे चला जायेगा और खेत की सारी फसल बर्बाद हो जायेगी ! शिष्य - जी गुरुदेव! आगे ऋषिवर ने कहा - वत्स जिस तरह से बहते हुये पानी को सही दिशा देना जरूरी है उसी तरह से चलते हुये विचारों को सही दिशा देना बहुत जरूरी है और विचार कभी नही रुक सकते है वो निरन्तर चलते रहेंगे ! विचारों को दिशा देना आपके अपने हाथ मे है तुम चाहो तो उन्हे आध्यात्मिक राह दे दो और तुम चाहो तो उन्हे भोगीयो की राह दे दो! विचार और मन का बहुत गहरा सम्बन्ध है मन वही जायेगा जहाँ उसे विचार लेके जायेंगे इसलिये हमेशा पवित्र और आध्यात्मिक विचारों से ओतप्रोत रहो ताकि मन ईष्ट मे लगे इस मन को येनकेन प्रकारेण ईष्ट के श्री चरणों मे लगाओ साधना, सत्संग, भजन, कथा, स्वाध्याय और भी जिस भी तरीके से ये ईष्ट मे रमे उसे ईष्ट मे रमाओ क्योंकि यदि तुमने विचारों को सही दिशा प्रदान न की तो विचार और फिर मन गलत दिशा मे चला जायेगा! पहले विचार आयेगा फिर कर्म शुरू होगा फ़िर आगे की राह बनेगी और फिर सफलता असफलता मिलेगी! विचारों से ही पराया भी अपना हो जाता है और विचारों से ही अपने भी पराये हो जाते है! हे वत्स ये कभी न भुलना की विचार एक महाशक्ति है सकारात्मक विचारधारा एक वरदान है और नकारात्मक विचारधारा एक महाअभिशाप है ! समान विचारों से ही रिश्तें युगों युगों तक रहते है और ऐसा कहते है की नही कहते है की भाई मेरे और उसके विचार एक दुसरे से नही मिलते है इसलिये हम दोनो के रास्ते अलगअलग है इसलिये अपने विचारों को अध्यात्मिक राह की और मोड़ देना क्योंकि जब विचारों को सही राह मिल जायेगी तो मन भी सही जगह लग जायेगा और ईष्ट और गुरू चरण के अतिरिक्त इस मन को कही पर भी शान्ति न मिलेगी। इसलिये वत्स अपना तन, अपना मन और अपना धन बस अच्छे विचारों मे लगा देना क्योंकि सच्ची सफलता और आत्मशान्ति हमेशा अच्छे विचारों से आती है, और अच्छे विचार के लिये निरन्तर अच्छे लोगों के सम्पर्क मे रहना क्योंकि निरन्तर अच्छे लोगों के सम्पर्क मे रहने से जीवन मे अच्छे विचार ज़रूर आते है ।

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VK ( SHREE ) Mar 26, 2020

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