Sunil sahu
Sunil sahu Sep 26, 2017

Hinglaj Mataji second Mandir in world

Hinglaj Mataji second Mandir in world

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Tarun Mishra Sep 27, 2017
*नवदुर्गा: नौ रूपों में स्त्री जीवन का पूर्ण बिम्ब..👇* *एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र का बिम्ब है नवदुर्गा केनौ स्वरूप।* 1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या *"शैलपुत्री"* स्वरूप है। 2. कौमार्य अवस्था तक *"ब्रह्मचारिणी"* का रूप है। 3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह *"चंद्रघंटा"* समान है। 4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह *"कूष्मांडा"* स्वरूप में है। 5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री *"स्कन्दमाता"* हो जाती है। 6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री *"कात्यायनी"* रूप है। 7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह *"कालरात्रि"* जैसी है। 8. संसार (कुटुंब ही उसके लिए संसार है) का उपकार करने से *"महागौरी"* हो जाती है। 9. धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार में अपनी संतान को सिद्धि(समस्त सुख-संपदा) का आशीर्वाद देने वाली *"सिद्धिदात्री"* हो जाती है। *माँ के नवरात्रि पर्व पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएँ।।* *माता रानी आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करें - जय माता की🙏* तरुण मिश्रा, korba Chhattisgarh

Shanti Pathak Mar 26, 2019

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N.K.Gupta Mar 26, 2019

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Jay Shree Krishna Mar 26, 2019

जय माता दी शीतला माता की कहानी यह कथा बहुत पुरानी है। एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखु कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर भी नही है, ना मेरी पुजा है। माता शीतला गाँव कि गलियो में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) निचे फेका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड गये। शीतला माता के पुरे शरीर में जलन होने लगी। कुम्हारन पर हुई मेहरबान शीतला माता गाँव में इधर उधर भाग भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा हे। कोई मेरी मदद करो। लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही करी। वही अपने घर के बहार एक कुम्हारन (महिला) बेठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पुरे शरीर में तपन है। इसके पुरे शरीर में (छाले) फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नही कर पा रही है। तब उस कुम्हारन ने कहा है माँ तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खुब ठंडा पानी डाला और बोली है माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी (जुवार) के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली। तब उस कुम्हारन ने कहा आ माँ बेठ जा तेरे सिर के बाल बिखरे हे ला में तेरी चोटी गुथ देती हु और कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु (कंगी) कागसी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन कि नजर उस बुडी माई के सिर के पिछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख वालो के अंदर छुपी हैं। यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उसबूढी माई ने कहा रुक जा बेटी तु डर मत। मैं कोई भुत प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पुजा करता है। इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई। कुम्हारन के गधे को बनाया अपना वाहन माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब में गरीब इस माता को कहा बिठाऊ। तब माता बोली है बेटी तु किस सोच मे पड गई। तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहते हुए कहा- है माँ मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता है बिखरी हुई हे में आपको कहा बिठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारन से कहा है बेटी में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हु अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले। क्यों मनाया जाता है शीतलाष्टमी का त्यौहार तब कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा है माता मेरी इच्छा है अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहो और जिस प्रकार आपने आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद कि सप्तमी को भक्ति भाव से पुजा कर आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर कि दरिद्रता को साफ़ करना और आपकी पुजा करने वाली नारि जाति (महिला) का अखंड सुहाग रखना। उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहा बाल ना कटवाये धोबी को कपडे धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये। तब माता बोली तथाअस्तु है बेटी जो तुने वरदान मांगे में सब तुझे देती हु । है बेटी तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पुजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील कि डुंगरी। शील कि डुंगरी में शीतला माता का मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी पर वहाँ बहुत विशाल मेला भरता है। इस कथा को पढ़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है।

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jai shri krishna Mar 26, 2019

"शीतलाष्टमी" (बसौड़ा) होली के एक सप्ताह बाद अष्टमी तिथि को आने वाला शीतला अष्टमी का पर्व पूरे उतरी भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। शीतला अष्टमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता की पूजा करने एवं व्रत रखने से चिकन पॉक्स यानी माता, खसरा, फोड़े, नेत्र रोग नहीं होते है। माता इन रोगों से रक्षा करती है। माता शीतला को माँ भगवती का ही रूप माना जाता है। अष्टमी के दिन महिलाएं सुबह ठण्डे जल से स्नान करके शीतला माता की पूजा करती है और पूर्व रात्रि को बनाया गया बासी भोजन (दही, राबड़ी, चावल, हलवा, पूरी, गुलगुले) का भोग माता के लगाया जाता है। ठण्डा भोजन खाने के पीछे भी एक धार्मिक मान्यता भी है कि माता शीतला को शीतल, ठण्डा व्यंजन और जल पसन्द है। इसलिए माता को ठण्डा (बासी) व्यंजन का ही भोग लगाया जाता है। परिवार के सभी सदस्य भी ठण्डे पानी से स्नान करते है और रात में बनाया हुआ बासी भोजन ही करते हैं। इससे माता शीतला प्रसन्न होती है। यह ऋतु का अंतिम दिन होता है। ऋतु परिवर्तन से मानव शरीर में विभिन्न प्रकार के विकार और रोग होने स्वभाविक है। इन विकारों को दूर करने एवं इनसे रक्षा करने के लिए माता शीतला का व्रत और पूजन किया जाता है। माता शीतला इन विकारों से रक्षा करती है। वहीं वैज्ञानिक तथ्य ये भी है कि इस दिन के बाद से सर्दी की विदाई मानी जाती है। अतः इस दिन अंतिम बार ठण्डा भोजन ग्रहण करने के बाद आगे ठण्डा बासी भोजन खाना गर्मी में हानिकारक होता है। क्योंकि गर्मी में वो भोजन खराब हो जाता है। इस तरह धार्मिक और वैज्ञानिक तथ्यों के बीच इस पारम्परिक त्यौहार ने देश मे एक विशिष्ट स्थान बनाया हुआ है जो हमारी समृद्ध संस्कृति की महानता को और समृद्ध कर रहा है "माता की पौराणिक कथा" शीतला माता के संदर्भ में अनेक कथाएँ प्रचलित है एक कथा के अनुसार एक दिन माता ने सोचा कि धरती पर चल कर देखें की उसकी पूजा कौन-कौन करता है। माता एक बुढ़िया का रूप धारण कर एक गांव में गई। माता जब गांव में जा रही थी तभी ऊपर से किसी ने चावल का उबला हुआ पानी डाल दिया। माता के पूरे शरीर पर छाले हो गए और पूरे शरीर में जलन होने लगी। माता दर्द में कराहते हुए गांव में सभी से सहायता माँगी। लेकिन किसी ने भी उनकी नहीं सुनी। गांव में कुम्हार परिवार की एक महिला ने जब देखा कि एक बुढ़िया दर्द से कराह रही है तो उसने माता को बुलाकर घर पर बैठाया और बहुत सारा ठण्डा जल माता के ऊपर डाला। ठण्डे जल से माता को उन छालों की पीड़ा में काफी राहत महसूस हुई। फिर कुम्हारिन महिला ने माता से कहा माता मेरे पास रात के दही और राबड़ी है, आप इनको खाये। रात के रखे दही और ज्वार की राबड़ी खा कर माता को शरीर में काफी ठंडक मिली। कुम्हारिन ने माता को कहा माता आपके बाल बिखरे है इनको गूथ देती हूँ। वो जब बाल बनाने लगी तो बालों के नीचे छुपी तीसरी आँख देख कर डर कर भागने लगी। तभी माता ने कहा बेटी डरो मत में शीतला माता हूँ और मैं धरती पर ये देखने आई थी कि मेरी पूजा कौन करता है। फिर माता असली रूप में आ गई। कुम्हारिन महिला शीतला माता को देख कर भाव विभोर हो गई। उसने माता से कहा माता मैं तो बहुत गरीब हूँ। आपको कहा बैठाऊँ। मेरे पास तो आसन भी नहीं है। माता ने मुस्कुराकर कुम्हारिन के गधे पर जाकर बैठ गई। और झाडू से कुम्हारिन के घर से सफाई कर डलिया में डाल कर उसकी गरीबी को बाहर फेंक दिया। माता ने कुम्हारिन की श्रद्धा भाव से खुश हो कर वर माँगने को कहा। कुम्हारिन ने हाथ जोड़कर कहा माता आप वर देना चाहती है तो आप हमारे गांव में ही निवास करे और जो भी इंसान आपकी श्रद्धा भाव से सप्तमी और अष्टमी को पूजा करे और व्रत रखे तथा आपको ठण्डा व्यंजन का भोग लगाएं उसकी गरीबी भी ऐसे ही दूर करें। पूजा करने वाली महिला को अखंड शौभाग्य का आशीर्वाद दें। माता शीतला ने कहा बेटी ऐसा ही होगा और कहा कि मेरी पूजा का मुख्य अधिकार कुम्हार को ही होगा। तभी से ये परंपरा चल रही है। यह गांव का नाम अब राजस्थान में "शील की डूंगरी" नाम से प्रचलित है। जहाँ माता शीतला का भव्य मंदिर बना हुआ है और सप्तमी पर मंदिर पर विशाल मेला लगता है। काफी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन कर मनौती माँगते है, पूरी होने पर चढ़ावा चढ़ाते है। "जय शीतला माता" ********************************************

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Jay Shree Krishna Mar 26, 2019

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को शीतला सप्तमी कहते हैं, इस दिन शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए पूजन व व्रत किया जाता है, इस व्रत में एक दिन पूर्व बनाया हुआ भोजन किया जाता है अत: इसे बसौड़ा या बासी कहते हैं, शीतला सप्तमी का व्रत करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं तथा जो यह व्रत करता है, उसके परिवार में दाहज्वर, पीतज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र के समस्त रोग तथा ठंड के कारण होने वाले रोग नहीं होते। वन्देहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्। मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम्।। इस व्रत की विशेषता है कि इसमें शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बना लिये जाते हैं, और दूसरे दिन इनका भोग शीतला माता को लगाया जाता है, मान्यता के अनुसार सप्तमी के दिन घरों में चूल्हा भी नहीं जलाया जाता यानी सभी को एक दिन बासी भोजन ही करना पड़ता है। महिलाओ को इस दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निपटकर स्वच्छ व शीतल जल से स्नान करना चाहियें, स्नान के बाद इस मंत्र से व्रत का संकल्प लें- "मम गेहे शीतलारोगजनितोपद्रव प्रशमन पूर्वकायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धिये शीतला सप्तमी अष्टमी व्रतं करिष्ये" विधान से माता शीतला का पूजन करें, इसके बाद एक दिन पहले बनाये हुये खाने को मिठाई, पूआ, मिठीपूरी, दहि-भात का भोग लगायें। शीतला स्तोत्र का पाठ करें और यदि यह उपलब्ध न हो तो शीतला माता की कथा सुनें व जगराता करें, इस दिन व्रती तथा उसके परिवार के किसी अन्य सदस्य को भी गर्म भोजन नहीं करना चाहिये, प्राचीनकाल से ही शीतला माता का बहुत अधिक माहात्म्य रहा है, स्कंद पुराण में माता शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं, इन बातों का प्रतीकात्मक महत्व होता है, चेचक का रोगी व्यग्रतामें वस्त्र उतार देता है, सूप से रोगी को हवा की जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं, नीम के पत्ते फोडों को सड़ने नहीं देते, रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है अत:कलश का महत्व है, गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। शीतला-मंदिरों में प्राय: माता शीतला को गर्दभ पर ही आसीन दिखाया गया है, स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है, ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी, शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिये भक्तों को प्रेरित भी करता है, शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिये के लिये मंत्र उपर दर्शाया गया है। मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से शीतला देवी प्रसन्‍न होती हैं, आज भी करोड़ों लोग इस नियम का बड़ी आस्था के साथ पालन करते हैं, शीतला माता की उपासना अधिकांशत: ग्रीष्म ऋतु के शुरुआत की ऋतु में होती है, आधुनिक युग में भी शीतला माता की उपासना स्वच्छता की प्रेरणा देने के कारण सर्वथा प्रासंगिक है। भगवती शीतला की उपासना से स्वच्छता और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा मिलती है, जीवन में शांति और समृद्धि के लिए भी वर और वधु माँ शीतला का पूजन करते हैं, हमारे जीवन में संताप और ताप से हम बचे रहें और शांति और शीतलता बनी रहे, इस कामना से हम माँ शीतला का पूजन करते हैं, श्री शीतला मां सदा हमें शान्ति, शीतलता तथा निरोगीता दें, "शीतले त्वं जगन्माता, शीतले त्वं जगत् पिता, शीतले त्वं जगद्धात्री, शीतलायै नमो नमः" श्री शीतला माता की जय!

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Manoj manu Mar 26, 2019

🚩🙏🌿जय माँ जगत जननी 🌺🌿🙏 🌿किसने कहा कि चिरागों से ही उजाला होता है, 🌿बेटियाँ भी तो धर में रोशनी करती हैं, 🌿प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः। 🌿 सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः॥ भावार्थ :- - - जिस सागर को हम इतना गम्भीर समझते हैं, प्रलय आने पर वह भी अपनी मर्यादा भूल जाता है और किनारों को तोड़कर जल-थल एक कर देता है ; परन्तु साधु अथवा श्रेठ व्यक्ति संकटों का पहाड़ टूटने पर और कभी भी श्रेठ मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करता । अतः साधु पुरुष सागर से भी महान होता है । 🌿दरबाजों पे खाली तख्तियाँ अच्छी नहीं लगती, 🌸मुझे ये उजडी हुई बस्तियाँ अच्छी नहीं लगती , 🌿उन्हें कैसे मिलेगी माँ के पैरों लते जन्नत, जिन्हें 🌸अपने घरों में बच्चियाँ अच्छी नहीं लगती, 🌿🌿🌿जय जय श्री राधे जी 🌿🌿🌿

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PRAMIL KUMAR SHARMA Mar 26, 2019

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Nayana Patel Mar 26, 2019

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