पवन सिंह
पवन सिंह Nov 16, 2017

हमें सत्संग क्यों करना चाहिये????

हमें सत्संग क्यों करना चाहिये????

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥

सत्संग के बिना हरि की कथा सुनने को नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह के गए बिना श्री रामचंद्रजी के चरणों में दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता॥

हमारे देश का पौराणिक और धार्मिक कथा साहित्य बडा समृद्धिशाली हैं, ऋषि- मुनियों ने भारतीय ज्ञान, नीति,सत्य प्रेम न्याय संयम धर्म तथा उच्च कोटि के नैतिक सिद्धांतों को जनता तक पहुचाने के लिए बढे ही मनो वैज्ञानिक ढंग से अनेक प्रकार की धार्मिक कथाओं की रचना की हैं।

इनमें दुष्ट प्रवृत्तियों की हमेशा हार दिखाकर उन्हें छोड़ने की प्रेरणा दी गई हैं,इस प्रकार ये कथाएं हमें पापबुद्धि से छुड़ाती हैं। हमारी नैतिक बुद्धि को जगाती हैं जिससे मनुष्य सभ्य, सुसंस्कृत और पवित्र बनता हैं भगवान की कथा को भव-भेषज, सांसारिक कष्ट पीड़ाओं और पतन से मुक्ति दिलाने वाली ओषधि कहा जाता हैं,इसलिए कथा सुनने तथा सत्संग का बहुत महत्त्व होता हैं।

वेद व्ययास जी ने भागवत की रचना इसलिए की ताकि लोग कथा के द्वारा ईश्वर के आदर्श रूप को समझें और उसको अपनाकर जीवनलाभ उठाये।भगवान की कथा को आधिभौतिक आदिदैविक एवं आध्यात्मिक तापों को काटने वाली कहा गया हैं यानि इनका प्रभाव मृत्यु के बाद ही नहीं जीवन में भी दिखाई देने लगता हैं।सांसारिक सफलताओं से लेकर पारलौकिक उपलब्धियों तक उसकी गति बनी रहने से जीवन की दिशा ही बदल जाती हैं।

पाप और पुण्य का सही स्वरूप भगवत गीता से समझ आता हैं,इसे अपने हर पापों का छय तथा पुण्यों की वृद्धि की जा सकती हैं,व्यक्ति अपने बंधनो को छोड़ने और तोड़ने में सफल हो जाता हैं,तथा मुक्ति का अधिकारी बन जाता हैं,इससे अलावा कथा सुनने से जीवन की समस्याओं कुंठाओं विडम्बनाओं का समाधान आसानी से मिल जाता हैं।

आत्मानुशासन 5 में कहा गया हैं की जो बुद्धिमान हो जिसने समस्त शास्त्रों का रहस्य प्राप्त किया हो लोक मर्यादा जिसके प्रकट हुई हो कांतिमान हो, उपशमि हो, प्रश्न करने से पहले ही जिसने उत्तर जाना हो,बाहूल्यता से प्रश्नों को सहने वाला हो, प्रभु हो, दूसरे की तथा दूसरे के द्वारा अपनी निंदारहित गूढ़ से दूसरे के मन को हरने वाला हो गुण निधान हो जिसके वचन स्पष्ट और मधुर हों सभा का ऐसा नायक धर्मकथा कहें।

स्कन्दपुराण में सूतजी कहते हैं- श्री मद्भागवत का जो श्रवण करता हैं,वह अवस्य ही भगवान के दर्शन करता हैं. किन्तु कथा का श्रवण, पाठन, श्रद्धाभक्ति, आस्था के साथ-साथ विधिपूर्वक होना चाहिए अन्यथा सफल की प्राप्ति नहीं होती।

श्रीमद्भागवत जी में लिखा हैं की जहाँ भगवत कथा की अमृतमयी सरिता नहीं बहती, जहाँ उसके कहने वाले भक्त, साधुजन निवास नहीं करते, वह चाहें ब्र्म्हलोक ही कियों ना हो, उसका उसका सेवन नहीं करना चाहिए।

धर्मिककथा, प्रवचन आदि का महात्म केवल उसके सुनने मात्र तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनपर श्रद्धापूर्वक मनन ,चिंतन और आचरण करने में हैं। श्रद्धा के लिए मात्र जग को दिखाने के लिए कथा आदि सुनने का कोई फल नहीं मिलता। एक बार किसी भक्त ने नारद ने पूछा- भगवान की कथा के प्रभाव से लोगों के अंदर भाव और वैराग्य के भव जागने और पुष्ट होने चाहिए

वह क्यों नहीं होते, नारद ने कहा- ब्राम्हण लोग केवल अन्न, धनादि के लोभवश घर-घर एवं जन-जन को भगवतकथा सुनाने लगे हैं, इसलिए भगवत का प्रभाव चला गया हैं।

वीतराग शुकदेवजी के मुहं से राजा परीक्षित ने भगवत पुराण की कथा सुनकर मुक्ति प्राप्त की और स्वर्ग चले गए।सुकदेव ने परमार्थभाव से कथा कही थी और परीक्षित ने उसे आत्मकल्याण के लिए पूर्ण श्रद्धाभाव से सुनकर आत्मा में उत्तर लिया था इसलिए उन्हें मोछ मिला।

सत्संग के विषय में कहा जाता हैं की भगवान की कथाएँ कहने वाले और सुनने वाले दोनों का ही मन और शरीर दिव्य एवं तेजमय होता चला जाता हैं।इसी तरह कथा सुनने से पाप कट जाते है और प्रभु कृपा सुलभ होकर परमांनद की अनुभूति होती हैं।

भय विपत्ति रोग दरिद्रता में सांत्वना उत्साह और प्रेणा की प्राप्ति होती हैं। मन और आत्मा की चिकित्साह पुनरुद्धार प्राणसंचार की अद्भुत शक्तियां मिलती हैं। विपत्ति में धैर्य, आवेस में विवेक व् कल्याण चिंतन में मदद प्राप्त होती हैं।

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Sanjeev kohli Apr 19, 2019

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Sanjeev kohli Apr 19, 2019

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आकाश Apr 18, 2019

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Sanjeev kohli Apr 17, 2019

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Madhav Goswami Apr 17, 2019

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sanjay singh Apr 17, 2019

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