sn vyas
sn vyas Apr 20, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *दृष्टि दोष-दर्शन पर नहीं,* *बल्कि गुण-दर्शन पर हो।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° अहल्या को महर्षि गौतम ने शाप दिया और कबन्ध को दुर्वासा ने शाप दिया। पर दोनों की दृष्टि में आपको भिन्नता दिखाई देगी। अहल्या जब भगवान के चरणों के स्पर्श से चेतन हुई तो कह सकती थी कि महाराज! आप बड़े सज्जन हैं, मेरे पति तो बड़े क्रोधी हैं। क्योंकि एक छोटे से अपराध पर उन्होंने मुझे इतना बड़ा शाप दे दिया। अगर ऐसी बात अहल्या कहती तो गौतम के व्यवहार की दृष्टि से कोई अटपटी बात नहीं होती। लेकिन अहल्या की दृष्टि कितनी सुन्दर है ! अहल्या को उस समय महर्षि गौतम की याद आई और तुरत उसने भगवान राम के चरणों में प्रणाम करके कहा -- प्रभु ! मैं आपकी कृतज्ञ तो हूँ ही लेकिन अपने पतिदेव की और भी अधिक कृतज्ञ हूँ। क्योंकि -- *मुनि साप जो दीन्हा अति भल कीन्हा* *परम अनुग्रह मैं माना।* *देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन* *इहइ लाभ संकर जाना।।* १/२११ -- महाराज ! वरदान का लक्ष्य अन्त में भगवान की प्राप्ति ही तो है। तो *जो ईश्वर, वरदान से मिलता है अगर शाप से मिल जाय, तब तो वरदान की अपेक्षा शाप ही अच्छा है।* मेरे पतिदेव ने बड़ी कृपा की जो मुझे शाप दे दिया। और जब भगवान राम अहल्या को इस प्रकार की वाणी को सुनते हैं तो समझ लेते हैं कि इसकी दृष्टि दोष-दर्शन पर नहीं है बल्कि गुण-दर्शन पर है। ☯️ जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!.........
         ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।।
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
          *दृष्टि दोष-दर्शन पर नहीं,*
          *बल्कि गुण-दर्शन पर हो।*
         °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "°
     अहल्या को महर्षि गौतम ने शाप दिया और कबन्ध को दुर्वासा ने शाप दिया। पर दोनों की दृष्टि में आपको भिन्नता दिखाई देगी। अहल्या जब भगवान के चरणों के स्पर्श से चेतन हुई तो कह सकती थी कि महाराज! आप बड़े सज्जन हैं, मेरे पति तो बड़े क्रोधी हैं। क्योंकि एक छोटे से अपराध पर उन्होंने मुझे इतना बड़ा शाप दे दिया। अगर ऐसी बात अहल्या कहती तो गौतम के व्यवहार की दृष्टि से कोई अटपटी बात नहीं होती। लेकिन अहल्या की दृष्टि कितनी सुन्दर है ! अहल्या को उस समय महर्षि गौतम की याद आई और तुरत उसने भगवान राम के चरणों में प्रणाम करके कहा -- प्रभु ! मैं आपकी कृतज्ञ तो हूँ ही लेकिन अपने पतिदेव की और भी अधिक कृतज्ञ हूँ। क्योंकि --
*मुनि साप जो दीन्हा अति भल कीन्हा*
*परम अनुग्रह मैं माना।*
*देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन*
*इहइ लाभ संकर जाना।।* १/२११
-- महाराज ! वरदान का लक्ष्य अन्त में भगवान की प्राप्ति ही तो है। तो *जो ईश्वर, वरदान से मिलता है अगर शाप से मिल जाय, तब तो वरदान की अपेक्षा शाप ही अच्छा है।* मेरे पतिदेव ने बड़ी कृपा की जो मुझे शाप दे दिया। और जब भगवान राम अहल्या को इस प्रकार की वाणी को सुनते हैं तो समझ लेते हैं कि इसकी दृष्टि दोष-दर्शन पर नहीं है बल्कि गुण-दर्शन पर है।
         ☯️ जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

+5 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 5 शेयर

कामेंट्स

sn vyas May 15, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *जिसके जीवन में धर्म के प्रति द्वन्द्व है, वहाँ तो* *विधि-निषेध सम्बन्धी विचार की आवश्यकता है।* *लेकिन जहाँ पर शुद्ध प्रेम का उदय हो गया है* *वहाँ विधि-निषेध की कोई आवश्यकता नहीं है।* °"" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" ""° _"ईश्वर के होते हुए भी प्रेम जब तक नहीं आएगा, तब तक हमारे जीवन में परिवर्तन नहीं होगा।"_ चित्रकूट का मार्ग विशुद्ध प्रेम का मार्ग है। श्री रामचरितमानस में कहा गया कि श्री भरतजी को देखकर ऐसा लगता है कि मानो भगवान् राम का प्रेम ही मूर्तिमान शरीर धारण करके आ गया हो -- *भरतहि कहहिं सराही सराही।* *राम प्रेम मूरति तनु आही।।* २/१८३/४ -- इसलिए अयोध्या काण्ड में एक बड़ा अनोखा प्रसंग आता है। चित्रकूट से लौटकर श्री भरत अयोध्या आए और गुरु वशिष्ठ के चरणों में प्रणाम करके बोले -- गुरुदेव! मेरे मन में एक संकल्प है अगर वह शास्त्र के विरुद्ध न हो, तो मैं उसका पालन करूँ। और महाराज! शास्त्र की व्याख्या और निर्णय तो आप ही करेंगे। गुरु वशिष्ठ ने पूछा -- क्या चाहते हो ? श्री भरत ने कहा कि मैं सोचता हूँ कि अयोध्या के राज्यसिंहासन पर प्रभु की पादुकाओं को बैठा दूँ, और मैं नन्दीग्राम में रहकर वहीं से प्रभु के राज्य की सेवा करूँ। उस समय गुरु वशिष्ठ ने कोई ग्रन्थ खोलकर उसमें नहीं देखा कि श्री भरत का यह संकल्प शास्त्र अथवा वेद के अनुकूल है या नहीं। अपितु उन्होंने तुरत कहा -- भरत ! मैं अब धर्म का निर्णय किसी शास्त्र या किसी ग्रन्थ से नहीं करूँगा, बल्कि मैंने तो धर्म का निर्णय करने के लिए एक सूत्र पा लिया है। इसलिए अब जो भी निर्णय करना होगा, उसी सूत्र के अनुसार करूँगा। श्री भरत ने कहा -- महाराज ! कौन सा सूत्र आपको मिल गया ? गुरु जी ने कहा कि -- *समुझब कहब करब तुम्ह जोई।* *धरम सारु जग होइहि सोई।।* २/३२२/ -- भरत ! तुम जो समझोगे, तुम जो कहोगे और तुम जो करोगे, मैं समझ जाऊँगा कि बस वही धर्म का सार है। इसका अभिप्राय है कि *जिसके जीवन में धर्म के प्रति द्वन्द्व है, वहाँ तो विधि-निषेध सम्बन्धी विचार की आवश्यकता है। लेकिन जहाँ पर शुद्ध प्रेम का उदय हो गया है वहाँ वाह्य नियंत्रण अथवा विधि-निषेध की कोई आवश्यकता नहीं है।* इसलिए निषादराज अगर प्रभु को यह उलाहना दें कि महाराज ! आप महर्षि भारद्वाज द्वारा आपके मार्गदर्शक के रुप में भेजे चारों विद्यार्थियों (वेद रुप) को यमुना के किनारे से लौटा रहे हैं यह तो ठीक है पर मुझे भी क्यों लौटा रहे हैं ? किन्तु भगवान का तात्पर्य था कि मित्र! घबराओ नहीं, मैं तो तुम्हें इसलिए लौटा रहा हूँ क्योंकि तुम्हें मार्ग-दर्शक बनाने वाला एक महापुरुष आने वाला है। इसलिए जब श्री भरत आए तो उन्होंने निषाद को ही अपना मार्गदर्शक बनाया। *श्री राम वेदानुगमन करते हैं, और श्री भरत उस निषाद को अपना मार्गदर्शक बनाते हैं जिसे शास्त्रीय परम्परा से वेद पढ़ने का भी अधिकार नहीं है। श्री भरत ने उन्हीं निषाद का हाथ पकड़ कर कहा -- मित्र! आप ही मुझे प्रभु से मिलने का मार्ग दिखाएंगे।* और श्री भरत का वाक्य सुनकर निषादराज को बड़ा आनन्द आया। वे सोचने लगे कि कोई बात नहीं, जो प्रभु ने मुझे मार्गदर्शक नहीं बनाया, पर जब भरतजी ने बना लिया इससे तो मेरा गौरव और भी अधिक बढ़ गया। लेकिन प्रभु ने सोचा कि अब जरा निषादराज का भ्रम दूर कर दिया जाय। इसीलिए वर्णन आता है कि चित्रकूट के पास तक निषादराज आगे-आगे चल रहे थे और भरतजी उनके साथ चल रहे थे। पर जिस समय वे चित्रकूट के निकट पहुंचे और श्री भरत की आँखों से अश्रुधारा उमड़ी तथा गदगद कण्ठ से जब उन्होंने भगवान का नाम लेना प्रारम्भ किया, तब ऐसा दिव्य प्रेम उमड़ा कि -- *जबहि राम कहि लेहिं उसासा।* *उमगत प्रेमु मनहुँ चहुँ पासा।।* *द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना।* *पुरजन प्रेमु न जाई बखाना।।* २/२१९/७ -- ज्योंही भरत जी के मुख से *'राम'* शब्द निकला,गोस्वामीजी ने कहा कि बस, उस शब्द को सुनकर निषादराज की यह दशा हो गई कि -- *सखहिं सनेह बिबस मग भूला।* २/२३७/६ -- निषादराज जी बेचारे मार्ग भूल गए। इसके द्वारा भगवान ने मानो कहा कि भरत जैसे प्रेमी को मार्ग दिखाने में यही डर है कि मार्ग दिखाने वाला ही कहीं मार्ग न भूल जाय। *किसी भक्त ने भगवान से पूछा -- महाराज ! अगर मार्ग भूल जाएगा तब तो भटक जाएगा ? किन्तु भगवान ने कहा -- नहीं भई ! यही तो अन्तर है, कि संसार में अगर कोई मार्ग भूल जाए तो भटक कर दूर चला जाएगा पर अगर प्रेमी मार्ग भूल जाय, तो वह भटक कर जिधर जाता है, मैं भी उधर ही चला जाता हूँ। प्रेमी के लिए कोई मार्ग निर्धारित नहीं होता, बल्कि प्रेमी जिधर चला जाता है वही मार्ग बन जाता है। और श्री भरतजी तो मूर्तिमान प्रेम ही हैं।* इसीलिए शास्त्रों में भक्ति के दो भेद करते हुए कहा गया है कि एक तो भक्ति वह है जो कि शास्त्रानुकूल है जिसे 'बैधी भक्ति' कहा जाता है। और दूसरी भक्ति का नाम दिया गया -- *'रागानुगा भक्ति'* जो प्रेम की अनुगामिनी है, प्रेम के पीछे चलने वाली है। चित्रकूट की यात्रा प्रेम के माध्यम से ही पूरी होती है। 👏 💞 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर
sn vyas May 14, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *वेदों के द्वारा सतोगुण, रजोगुज* *तथा तमोगुण का सदुपयोग करें* *और इसके पश्चात् इन तीनों से* *ऊपर उठने की चेष्टा हो।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा व्याख्याता क्यों न हो, लेकिन तात्त्विक दृष्टि से उसमें कुछ-न-कुछ कमी होना, और कमी निकालना भी स्वाभाविक है। परन्तु वेदों को सबसे अधिक महत्त्व इसलिए दिया गया क्योंकि इनकी वाणी में व्यक्ति का स्वयं अपना प्रयत्न नहीं है। *वेद अपौरुषेय हैं। इसलिए व्यक्ति और अन्यान्य ग्रन्थों की तुलना में वेद परम प्रमाण हैं।* इस सन्दर्भ में गीता तथा रामायण दोनों में बड़ा सुन्दर संकेत आता है। भगवान् कृष्ण भी शास्त्र को प्रमाण मानते हुए कहते हैं -- *तस्मच्छात्रं प्रमाणन्ते*-- और भगवान् कृष्ण ने जो बात कही, भगवान् राम के रूप में इन्होंने चरितार्थ करके दिखाया। क्योंकि भगवान् श्री राघवेन्द्र वनगमन पर महर्षि भारद्वाज द्वारा मार्गदर्शक के रुप में भेजे जब चारों विद्यार्थियों को आगे करके चले तो हम यह कह सकते हैं कि विद्यार्थियों के रूप में चारों वेद ही भगवान के आगे चल रहे हैं। वेदों के लिए एक वाक्य कहा गया है कि *यस्य निश्वसितं वेदाः* -- ये वेद जो हैं वे भगवान के निश्वास हैं। और भई ! जब हम और आप चलते हैं तो साँस हमारे आगे-आगे चलती है। और *अगर यह प्रश्न किया जाय कि, भगवान के आगे कौन चलेगा ? तो इसका उत्तर यही दिया जाएगा कि वेद चलेंगे।* इसलिए ये चारों विद्यार्थी आगे चलते हैं और भगवान उनके पीछे चलते हैं। पर इन चारों विद्यार्थियों को भगवान् राम ने यमुना के किनारे से ही लौटा दिया। *बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।* *उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।* -- और केवल विद्यार्थियों को ही नहीं लौटाया अपितु सांकेतिक भाषा यह भी आती है कि भगवान् श्री राघवेन्द्र ने निषादराज को भी यहीं से लौटा दिया। यद्यपि निषादराज ने भी दावा किया था कि मैं मार्ग दिखाऊँगा। परन्तु भगवान् राम ने सारे मार्ग-दर्शक यहीं से लौटा दिये। लेकिन क्यों लौटा दिये ? आइए जरा इस पर भी विचार करें। *भगवान् कृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन ! वेदों की अतुलित गरिमा होते हुए भी तुम्हें वेदों से ऊपर उठना है। क्योंकि वेद सत्त्व, रज तथा तम गुणों से व्याप्त हैं।*-- *त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रगुण्यो भवार्जुन।* *निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।।* गीता २/४५ -- भगवान ने कहा कि अन्त में वेद-ज्ञान की भी एक सीमा है इसलिए व्यक्ति को उस वेद-ज्ञान से ऊपर उठना चाहिए। इससे वेद की सीमा का कोई हनन नहीं होता। क्योंकि जैसे कोई सीढ़ी लगी हुई है, तो यद्यपि सीढ़ी की बड़ी महिमा है, क्योंकि अगर सीढ़ी न हो तो व्यक्ति ऊपर नहीं उठेगा, लेकिन प्रश्न यह है कि व्यक्ति छत पर पहुँचने के पश्चात् सीढ़ी का परित्याग कर देगा कि सीढ़ी पर ही खड़ा रहेगा ? इसका सीधा सा अर्थ है कि *सीढ़ी चाहे कितनी ही बढ़िया क्यों न हो, किन्तु छत पर पहुँच जाने पर आपको सीढ़ी को छोड़ना ही पड़ेगा।* भगवान का अभिप्राय है कि वेदों के द्वारा तुम सतोगुण, रजोगुज तथा तमोगुण का सदुपयोग करो और इसके पश्चात् इन तीनों से ऊपर उठने की चेष्टा करो। और दूसरे श्लोक में भी भगवान संकेत करते हैं कि -- *यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।* *तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ।।* गीता २/४६ -- जैसे किसी व्यक्ति को जल की आवश्यकता है तो उसे जल का सेवन करना अनिवार्य है। क्योंकि जल के बिना प्यास नहीं बुझेगी, तृप्ति नहीं होगी। लेकिन जैसे तृप्ति का अनुभव कर लेने के बाद तत्काल उसे जल की अपेक्षा नहीं रह जाती है, ठीक उसी प्रकार से वेद व्यक्ति को क्रमशः ऊपर उठाते हैं। *वेद और शास्त्र बताते हैं कि व्यक्ति कैसे तमोगुण से उठकर रजोगुण में जाय, और रजोगुण से सतोगुण में जाय। इसका विस्तृत वर्णन हमारे धर्म-ग्रन्थों में किया गया है। लेकिन उसके बाद इन तीनों से ऊपर उठकर इनके भी परे हो जाने की आवश्यकता है।* इसी का संकेत-सूत्र रामचरितमानस में प्राप्त होता है । भगवान् राम ने महर्षि भरद्वाज से प्रार्थना की कि मुझे मार्ग दिखाने वाला दीजिए। तो इसका सीधा-सा तात्पर्य है कि *जब हम जीवन-पथ का चुनाव करें तो अपनी ही बुद्धि से न करें। क्योंकि अपनी बुद्धि और अपने अहंकार से यदि करेंगे तो पता नहीं जो मार्ग चुनेंगे वह उच्छृंखलता और पतन की ओर हमें ले जायेगा कि उत्थान की ओर, इसकी चिन्ता बनी रहेगी। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम वेदानुगामी जीवन व्यतीत करें। अपने जीवन को वेद और शास्त्रों के अनुरूप चलाने की चेष्टा करें।* पर भगवान कहते हैं कि इनकी भी एक सीमा है। और सीमा भगवती यमुना हैं। इसलिए यमुना के इस पार से महर्षि भारद्वाज के आश्रम के विद्यार्थियों को बिदा कर देते हैं। भगवान कहते हैं कि शास्त्र और वेद की मर्यादा के अनुकूल कर्म कीजिए, कर्म-मार्ग पर चलिए, पर चलने के पश्चात् मार्ग में यदि कहीं तापस जी मिल जायँ, प्रेम मिल जाय, श्री भरतजी अथवा निषादराज मिल जायँ, या सुतीक्ष्ण जी मिल जायँ - इन पात्रों के समान प्रेम की दिव्य उन्मत्तता की अवस्था आ जाय, तो फिर उसके पश्चात् किसी मार्गदर्शक की आवश्यकता नहीं है। फिर तो वह व्यक्ति बिना किसी मार्ग-दर्शक के भी चित्रकूट की दिव्य प्रेम-भूमि में पहुँच कर भगवान् राम से दिव्य मिलन का उसी प्रकार आनन्द प्राप्त करता है जैसा कि श्री भरत इस प्रेम-पथ से चलकर प्राप्त करते हैं। भगवान की यात्रा कर्म-पथ से प्रारम्भ हुई। यमुना कर्म की नदी है -- *करम कथा रविनंदिनि बरनी।* -- यमुना के किनारे प्रभु ने वेदों को लौटा दिया। इसका अभिप्राय है कि जहाँ तक कर्म की सीमा है, वहाँ तक तो वेद के मार्ग निर्देशन की आवश्यकता है। पर जब कर्म की सीमा समाप्त होकर प्रेम का दिव्य राज्य प्रारम्भ हो गया, जब परम प्रेम का उदय हो गया तब किसी से यह पुछने की आवश्यकता नहीं है कि यह मार्ग ठीक है या नहीं ! भगवान् श्री राघवेन्द्र महर्षि वाल्मीकि से मिलते हैं और अन्त में प्रभु चित्रकूट में निवास करते हैं। चित्रकूट का मार्ग विशुद्ध प्रेम का मार्ग है। 👏 🌳 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

+10 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 9 शेयर
sn vyas May 13, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *समाज में दीन व्यक्ति के दुःख को* *देखकर अगर यदि हमारी आँखों में* *आँसू आता है। तो यही संतत्त्व है तथा* *रामराज्य की स्थापना का मूल स्रोत है।* °"" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" ""° गीध भगवान राम के कौन है ? जटायु जी से उनका क्या नाता है ? गीध तो मनुष्य जाति का भी नहीं है। वह तो पक्षियों में भी सबसे निम्न जाति का पक्षी माना जाता है। परन्तु भगवान् राम ने जब जटायु जी को देखा तो प्रभु की क्या स्थिति हो गयी ? तुलसीदास जी कहते हैं कि यद्यपि प्रभु आए तो थे श्री सीताजी का पता लगाने, लेकिन गीध की दशा देखते ही -- *तुलसी रामहि प्रिया बिसरि गई* -- बिल्कुल भूल गए कि श्री सीताजी का हरण हो गया है, और मैं उन्हें खोजने के लिए आया हुआ हूँ। जटायु जी की ओर देख कर प्रभु रोने लगते हैं। भगवान् राम ने जब जटायु जी से कहा कि -- *"राम कहा तनु राखहु ताता"* -- गीधराज जी! आप जीवित रहिए। तो गोस्वामीजी ने लिखा है कि प्रभु का वाक्य सुनकर *"मुखु मुसुकाइ"*-- गीधराज जी मुस्कुराने लगे। यहाँ पर एक सांकेतिक भाषा यह है कि भगवान् राम तो आनन्दमय हैं -- *"जो आनन्द सिंधु सुखरासी।"* और जीव बेचारा आँसू बहाता रहता है । पर आज श्रीराम की आँखों में आँसू हैं और गीध के होठों पर मुस्कुराहट है। मानो दोनों ने एक दूसरे की वस्तु का परस्पर परिवर्तन कर लिया। श्रीराम ने अपना आनन्द जीव को देकर उसके आँसू स्वयं अपनी आँखों में ले लिए। उसकी पीड़ा को स्वयं ले लिया। समस्याओं के सन्दर्भ में एक नई परिभाषा करते हुए गोस्वामीजी ने मानो बताया कि *हम मार्ग में आने वाली अपनी समस्याओं से, अपनी परिस्थिति से भले ही विचलित न हों पर हमारा प्रिय, हमारा आश्रित या समाज में दीन से दीन माना जाने वाला व्यक्ति भी यदि दुःखी दिखाई देता है और उसके दुःख को देखकर अगर हमारी आँखों में आँसू आ जाना स्वाभाविक ही है। वस्तुतः यही संतत्त्व है तथा यही रामराज्य की स्थापना का मूल स्रोत है।* 👏 🔯 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर
keshu Singh Chauhan May 15, 2021

+2 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 5 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB