Madev patel
Madev patel Aug 18, 2017

श्री राम भक्त हनुमान

#हनुमान

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Shankaranand Hakare Anekal Aug 18, 2017
Om Namo Manojavam Maruth Tulyavegam Jeethendriyam Buddimatham varistam vathatmajam vanaryuth mukyam Sriram dootam sirasanamami 🚩🇮🇳

Pandurang khot Feb 25, 2020

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Pandurang khot Feb 25, 2020

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ashok singh sikarwar Feb 25, 2020

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sanjeev Runthala Feb 25, 2020

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K. Rajan Feb 25, 2020

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Neha Sharma, Haryana Feb 25, 2020

*होली स्पैशल भजन* *जय श्री राधेकृष्णा* लठमार होली की शुरूआत बरसाना के राधा रानी मंदिर से होती है और रंग रंगीली गली में पहुंचकर खत्म होती है। क्‍या है लट्ठमार होली का महत्व बरसाना फाल्‍गुन की नवमी को लट्ठ महिलाओं के हाथ में रहता है और नन्दगांव के पुरुषों (गोप) जो राधा के मन्दिर लाड़लीजी पर झंडा फहराने की कोशिश करते हैं, उन्हें महिलाओं के लट्ठ से बचना होता है। कहते हैं इस दिन सभी महिलाओं में राधा की आत्मा बसती है और पुरुष भी हंस-हंस कर लाठियां खाते हैं। आपसी वार्तालाप के लिए होरी गाई जाती है, जो श्रीकृष्ण और राधा के बीच वार्तालाप पर आधारित होती है। महिलाएं पुरुषों को लट्ठ मारती हैं, लेकिन गोपों को किसी भी तरह का प्रतिरोध करने की इजाजत नहीं होती है। उन्हें सिर्फ गुलाल छिड़क कर इन महिलाओं को चकमा देना होता है। अगर वे पकड़े जाते हैं तो उनकी जमकर पिटाई होती है या महिलाओं के कपड़े पहनाकर, श्रृंगार इत्यादि करके उन्‍हें नचाया जाता है। माना जाता है कि पौराणिक काल में श्रीकृष्ण को बरसाना की गोपियों ने नचाया था। दो सप्ताह तक चलने वाली इस होली का माहौल बहुत मस्ती भरा होता है। एक बात और यहां पर जिस रंग-गुलाल का प्रयोग किया जाता है वो नेचुरल होता है, जिससे माहौल बहुत ही सुगन्धित रहता है। अगले दिन यही प्रक्रिया दोहराई जाती है, लेकिन इस बार नन्दगांव में, वहां की गोपियां, बरसाना के गोपों की जमकर धुलाई करती हैं। जय श्री राधे राधे।। [ भाव के भूखे होते हैं भगवान! भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन। तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन॥ भावार्थ: सुख के भंडार, करुणाधाम भगवा्‌न भाव (प्रेम) के वश हैं। (अतएव) ममता, मद और मान को छोड़कर सदा श्री जानकीनाथजी का ही भजन करना चाहिए॥ सभी शास्त्रों तथा धर्माचार्यों के प्रवचनों का यही सार है कि भगवान केवल भाव के भूखे हैं। वे हमसे किसी वस्तु अथवा पदार्थ की कामना नहीं रखते और न ही किसी फल-फूल की अपेक्षा रखते हैं। ईश्र्वर तो बस कोमल भाव और प्रेम चाहते हैं, निर्मल मन चाहते हैं। उनको तो भक्त का सच्चा प्रेम चाहिए, बस। जिस भक्त का स्वभाव निर्मल है, हृदय निर्मल है तथा जो छल-कपट से दूर है, उन्हें तो भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। संतों का भी मत है कि हम जन्म से पूर्ण और निर्मल ही थे, स्वभाव भी सरल ही था, एक नवजात शिशु की तरह, किंतु जैसे-जैसे हम बड़े होते चले गये, हमारे सरल स्वभाव तथा पवित्र हृदय में विकार प्रवेश करते चले गये। इन विकारों का आना भी स्वाभाविक है। हमारे लाख प्रयत्न करने के बाद भी पवित्र हृदय में विकारों का समावेश हो ही जाता है। जिस प्रकार एक बंद कमरे में धूल के कण पहुँच ही जाते हैं और उसे गंदा कर देते हैं, उसी प्रकार विकारों का हमारे अंदर प्रवेश होना एक स्वाभाविक प्रिाया है। इसके लिए हम नियमित रूप से सत्संग और संतों की वाणी का पान करें तो सभी प्रकार के विकारों से बचा जा सकता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष आदि विकार बाह्य स्थूल स्वरूप के नहीं हैं। अंतः इन विकारों को बाह्य साधनों से शुद्ध नहीं किया जा सकता है। ये विकार तो अंतःकरण पर सूक्ष्म रूप में छाये रहते हैं, इसलिए इसके लिए सूक्ष्म साधनों की आवश्यकता होती है। जैसे, सूर्य की किरणें जो सूक्ष्म हैं, गंध को पवित्र कर देती हैं, उसी प्रकार ये विकार भी स्वच्छ होते हैं, लेकिन परमात्मा और संतों के प्रकाश को अपने अंदर धारण करने पर। सत्संग से यह विकार जो सत्, रज और तम गुणों से प्रभावित रहते हैं, अपनी विषमता को त्यागकर समता में आ जाते हैं। आत्मा का प्रकाश प्रस्फुटित होकर उसी प्रकार दिखने लगता है, जिस प्रकार काई को हटाने पर निर्मल जल दिखाई देने लगता है। ऐसा निर्मल मन ही परमात्मा से साक्षात्कार का अधिकारी बन सकता है। अपने भक्तों की भावनाओं का प्रभु ने सदैव ख्याल रखा है। हर युग में अपने भक्तों की भावनाओं का प्रभु ने प्रतिफल दिया है। शबरी मतंग ऋषि के आश्रम में रहती थी। वह नित्य प्रतिदिन ऋषि का सत्संग सुनती तथा उनकी सेवा में रत रहती। परमधाम सिधारने से पूर्व ऋषि ने शबरी से कहा कि एक दिन भगवान राम तेरी कुटिया पर आयेंगे, तब तुम उनकी प्रतीक्षा करना। उस दिन से शबरी रोज अपनी कुटिया में भगवान के आने की प्रतीक्षा करती रही। वह कुटिया की साफ-सफाई, पेड़-पौधों का सिंचन तथा प्रभु का ध्यान करती रहती। एक दिन वह शुभ घड़ी भी आ ही गयी, जब भगवान राम अपने अनुज सहित शबरी की कुटिया में पधारे और शबरी का सत्कार स्वीकार किया। शबरी ने बड़े भाव से चख-चख कर बेर खिलाये ताकि कोई खट्टा बेर प्रभु को न खाना पड़े। प्रभु ने शबरी के जूठे बेर और उनकी सेवा को प्रसन्नता से स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उनको अपना आशीर्वाद भी दिया- कंद मूल फल खाये बारंबार बखान। भगवान कृष्ण जब कौरवों-पांडवों के बीच सुलह कराने हेतु समझौता प्रस्ताव लेकर राजा धृतराष्ट्र के दरबार में पहुँचे तो दुर्योधन ने पांडवों को पॉंच गॉंव देने के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया। सभा के बाद जब दुर्योधन ने भगवान कृष्ण को भोजन के लिए आमंत्रित किया, तो भगवान ने निमंत्रण को अस्वीकार करते हुए कहा कि भोजन वहॉं किया जाता है, जहॉं भोजन का अभाव हो अथवा भोजन कराने वाले का आमंत्रित व्यक्ति पर कोई प्रभाव हो या भोजन कराने वाले का निर्मल भाव हो। चूंकि इस समय इन तीनों में से एक भी परिस्थिति ऐसी नहीं है, अतः आपके यहॉं मेरा भोजन करना अभीष्ट नहीं है। ऐसा कहकर श्रीकृष्ण महात्मा विदुर के घर चले गये और वहॉं भोजन को स्वीकार किया। ऐसी लीलाओं से भगवान ने यह संदेश दिया कि वे तो भाव के भूखे हैं, भोजन के नहीं। संत-महात्मा कहते हैं कि प्रभु का दर्शन सर्वव्याप्त है। प्रकृति के कण-कण में ईश्र्वर का दर्शन होता है। जिस साधना में प्रेम की मिठास न हो, वह व्यर्थ का शारीरिक परिश्रम है। भक्ति, ज्ञान, योग, साधना ये सभी प्रभु की कृपा-प्राप्ति की सीढ़ियॉं हैं, जिन्हें संसार के प्राणियों से प्रेम नहीं, जिन्हें भगवान की वस्तुओं से प्रेम नहीं, ऐसे कठोर हृदय को ईश्र्वर दर्शन नहीं देते। निर्मल मन जन सो मोहि पावा,मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। इसलिए पूजा में प्रेम का भाव सर्वोपरि होना चाहिए। हमारी पूजा में निष्काम भाव का रस होना चाहिए तभी हमें प्रसाद की कामना करनी चाहिए। - डॉ0 विजय शंकर मिश्र

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