जय श्री कृष्णा 🙏🙏🙏

https://youtu.be/jLBYR7DZV4w

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 13 शेयर
Harcharan Pahwa Aug 12, 2020

0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Swami Lokeshanand Aug 12, 2020

कर्म तीन से होता है, इच्छा, अनिच्छा और हरि इच्छा। इच्छा से कर्म हो तो नया प्रारब्ध निर्मित होता है, अनिच्छा से कर्म करना पड़े तो प्रारब्ध कटता है, हरि इच्छा से कर्म होने लगे तो कर्मबंधन से मुक्ति मिलती है। आएँ विचार करें- हनुमानजी को अभी तक तीन संकेत मिले हैं, जामवंतजी ने कहा- *एतना* करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥" सुरसा ने कहा- "राम काजु *सब* करिहहु" लंकिनी बोली- "प्रबिसि नगर किजे *सब* काजा" तो संशय है कि कितना करें? सीमित या संपूर्ण? यहाँ रावण की प्रताड़ना से त्रस्त सीता माँ आग माँगने लगीं। हनुमानजी को बड़ा रोष आया। विचार करने लगे, कि माँ! तूं आग माँग रही है, मैं ऐसी आग लाकर दूंगा कि लंका ही जल कर राख हो जाएगी। "अपनी जठर आग, बड़ आग सागर की, बन की दावाग्नि को, आग में मिलाई दूँ। यहरउँ से आग रहे, वहरउँ से आग रहे, आग बन अग्नि में, अग्नि लगाई दूँ। कहत पवनसुत आग जो मिली ना तो, सूरज को तोड़फोड़ लंका पे गिराई दूँ॥" सोचा "राम" में तीन अक्षर हैं, र-अ-म। र सूर्य है, अ अग्नि है, म चन्द्र है। माँ विरह में जल रही हैं, मैं चन्द्रमा माँ को दे दूंगा, उसकी शीतलता से उनके विरह की जलन मिट जाएगी। सूर्य भी माँ को दे दूंगा, निराशा का अंधेरा मिट जाएगा। अग्नि मैं रख लूंगा, लंका जलाने के काम आएगी। इस प्रकार रामनाम का संपूर्ण उपयोग हो जाएगा। विचार तो आ गया, पर जामवंतजी की आज्ञा नहीं है, तब क्या करें? प्रतीक्षा करें। सुबह त्रिजटा आई, कहती है- "सपनें वानर लंका जारी" हनुमानजी को लगा मानो अंतर्यामी रामजी ने, उनके मन का विचार जानकर, त्रिजटा के स्वप्न के माध्यम से, उन्हें संदेश दे दिया, कि हनुमानजी बहुत सुंदर विचार है, लगे हाथ यह कार्य भी करते ही आना। पर यह प्रसंग अभी अधूरा है, आगे सविस्तार इस पर चर्चा करेंगे, क्योंकि किसी भी इच्छित कार्य को, अपने मन की इच्छा को, हरि इच्छा के नाम पर लादकर नहीं करना चाहिए। कारण कि यह नियम है कि यदि हरि की ही इच्छा होती है, तो कार्य भी हरि ही कराते हैं। विडियो- हनुमानजी ने लंका नहीं जलाई https://youtu.be/mMri4UzHt-8

+11 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 16 शेयर
Deepak Aug 12, 2020

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 6 शेयर

ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भर छाछ पे नाच नचावै,, कृष्ण जन्मोत्सव की अनेकानेक शुभकामनाएं.... अद्भुत है श्रीकृष्ण-चरित्र...... जिनको मुनियों के मनन में नहिं आते देखा। गोकुल में उन्हें गाय चराते देखा। हद नहीं पाते हैं अनहद में भी योगी जिनकी। तीर यमुना के उन्हें वंशी बजाते देखा। जिनकी माया ने चराचर को नचा रखा है गोपियों में उन्हें खुद नाचते गाते देखा। जो रमा के हैं रमण, विश्व के पति ‘राधेश्याम’। ब्रज में आके उन्हैं माखन को चुराते देखा। श्रीकृष्ण चरित्र में अद्भुत विरोधाभास:- भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला में विलक्षणता दिखाई देती है। वह अजन्मा होकर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं, सर्वशक्तिमान होने पर भी कंस के कारागार में जन्म लेते हैं। माता पिता हैं देवकी और वसुदेव; किन्तु नन्दबाबा और यशोदा द्वारा पालन किए जाने के कारण उनके पुत्र ‘नंदनन्दन’ और ‘यशोदानन्दन’ कहलाते हैं। राक्षसी पूतना ने अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से स्तनपान कराया किन्तु दयामय कृष्ण ने मातावेष धारण करने वाली पूतना को माता के समान सद्गति दे दी, ऐसा अद्भुत और दयालु चरित्र किसी और देवता का नहीं है। योगमाया के स्वामी होने से श्रीकृष्ण समस्त सृष्टि को बंधन में रखने की क्षमता रखते हैं, फिर भी स्वयं माता के द्वारा ऊखल से बांधे जाते हैं और ‘दामोदर’ कहलाते हैं। तीन पग भूमि मांग कर जिसने राजा बलि को छला वे नन्दभवन की चौखट नहीं लांघ पाते:- तीन पैंड़ भूमि मांगि बलि लियौ छलि, चौखट न लांघी जाय रहयौ सो मचलि। नन्दरायजी नौ लाख गायों के स्वामी और व्रजराज हैं, फिर भी श्रीकृष्ण स्वयं गाय चराने जाते हैं। श्रीकृष्ण माता यशोदा से कहते हैं:- मैया री! मैं गाय चरावन जैहों। तूं कहि, महरि! नंदबाबा सौं, बड़ौ भयौ, न डरैहों॥ जो ‘सहस्त्राक्ष’ हैं, सारे संसार पर जिनकी नजर रहती है, उन श्रीकृष्ण को यशोदामाता डिठौना लगाकर नजर उतारती हैं। आसुरीमाया से श्रीकृष्ण की रक्षा के लिए रक्षामन्त्रों से जल अभिमन्त्रित कर उन्हें पिलाती हैं; इतना ही नहीं:- देखौ री जसुमति बौरानी, घर-घर हाथ दिखावति डोलति, गोद लियें गोपाल बिनानी।। जगत के पालनहार व पोषणकर्ता होने पर भी श्रीकृष्ण व्रजगोपिकाओं के यहां दधि-माखन की चोरी करते हैं। स्वयं के घर में दूध, दही माखन का भंडार होने पर भी गोपियों से एक छोटा पात्र छाछ की याचना करते हैं और उसके लिए गोपिकाओं के सामने नाचने को तैयार हो जाते हैं:- ब्रज में नाचत आज कन्हैया मैया तनक दही के कारण। तनक दही के कारण कान्हां नाचत नाच हजारन।। नन्दराय की गौशाला में बंधी हैं गैया लाखन। तुम्हें पराई मटुकी को ही लागत है प्रिय माखन।। गोपी टेरत कृष्ण ललाकूँ इतै आओ मेरे लालन। तनक नाच दे लाला मेरे, मैं तोय दऊँगी माखन।। (रसिया) प्रेम की झिड़कियाँ भी मीठी होती हैं–मार भी मीठी लगती है। सलोना श्यामसुन्दर व्रजमण्डल के प्रेमसाम्राज्य में छाछ की ओट से इसी रस के पीछे अहीर की छोकरियों के इशारों पर तरह-तरह के नाच नाचता-फिरता है–‘ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभरि छाछपै नाच नचावैं’ (रसखान) और श्रीकृष्ण एक होकर ही असंख्य गोपियों के साथ असंख्य रूपों में रासक्रीडा करते हैं। परब्रह्म श्रीकृष्ण की लीला से दुर्वासा ऋषि भी हुए भ्रमित:- दुर्वासा ऋषि गोकुल में परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के दर्शनों की अभिलाषा से आते हैं, किन्तु उन्होंने परब्रह्म को किस रूप में देखा–सारे अंग धूलधूसरित हो रहे हैं, केश बिखरे हुए, श्रीअंग पर कोई वस्त्र नहीं, दिगम्बर वेष है, और सखाओं के साथ दौड़े जा रहे हैं। मुनि ने सोचा–’क्या ये ईश्वर हैं? अगर भगवान हैं तो फिर बालकों की भांति पृथ्वी पर क्यों लोट रहे हैं? दुर्वासा ऋषि भगवान की योगमाया से भ्रमित होकर कहने लगे ’नहीं, ये ईश्वर नहीं ये तो नन्द का पुत्रमात्र है।’ प्रकृति की पाठशाला से पढ़ा जीवन का पाठ:- यह एक विलक्षण बात थी कि राज-परिवार के स्नेह-सत्कार को छोड़कर गोपों के बीच जन्म से ही संघर्ष का पाठ पढ़ने के लिए भगवान कृष्ण मथुरा से गोकुल आ गए। जिस व्यक्ति को आगे चलकर राजनीति की दृढ़ स्थापना और एक उच्च जीवनदर्शन स्थापित करना था; उन्होंने अपना आरम्भिक जीवन बिताने के लिए गो-पालकों का नैसर्गिक जीवन और प्रकृति का सुन्दर वातावरण चुना क्योंकि उन्हें पहले पृथ्वी से सहज रस लेना था। अत: वन उनकी पहली पाठशाला थी और उनके शिक्षक मुक्त और निर्भीक गो-पालक थे। सांदीपनि ऋषि की पाठशाला में दाखिल होने से पहले ही वे जीवन की पाठशाला से स्नातक हो चुके थे। वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।। मुरली का माधुर्य और पांचजन्य-शंख का घोर निनाद:- श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में हृदय को विमुग्ध करने वाली बांसुरी और शौर्य के प्रतीक सुदर्शन चक्र का अद्भुत समन्वय हुआ है। कहां तो यमुनातट और निकुंज में मुरली के मधुरनाद से व्रजबालाओं को आकुल करना और कहां पांचजन्य-शंख के भीषण निनाद से युद्धक्षेत्र को प्रकम्पित करना। अपने मुरलीनाद से जहां उन्होंने धरती के सोये हुए भाव जगाये; वहीं पांचजन्य के शंखनाद से, कौमोदकी गदा के भीषण प्रहार से, शांर्गधनुष के बाणों के आघात से, धूमकेतु के समान कृपाण से और अनन्त शक्तिशाली सुदर्शन चक्र से भारतभूमि को अत्याचारी, अधर्मी व लोलुप राजाओं से विहीन कर दिया। अतुल नेतृत्व-शक्ति रखते हुए भी दूत और सारथि का काम किया और युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में अग्रपूजा के योग्य माने जाने पर भी जूठी पत्तलें उठाने का कार्य किया। चरित्र की ऐसी विलक्षणता और कहीं देखने को नहीं मिलती। श्रीकृष्ण का अद्भुत अनासक्ति योग:- श्रीकृष्ण की जीवन को तटस्थ (सम) भाव से देखने की प्रवृति की शुरुआत तो जन्मकाल से ही हो गयी थी। जन्म से ही माता-पिता की ममता छोड़ नन्द-यशोदा के घर रहे। सहज स्नेह रखने वाली गोपियों से नाता जोड़ा और उन्हें तड़पता छोड़ मथुरा चले गए। फिर मथुरा को छोड़ द्वारका चले आए परन्तु यदुकुल में कभी आसक्त नहीं रहे। कोई भी स्नेह उन्हें बांध न सका। पाण्डवों का साथ हुआ पर पाण्डवों को महाभारत का युद्ध जिताकर उन्हें छोड़कर चले गए। पृथ्वी का उद्धार किया और पृथ्वी पर प्रेमयोग व गीता द्वारा ज्ञानयोग की स्थापना की; पर पृथ्वी को भी चुपचाप, निर्मोही होकर छोड़कर चले गये। ममता के जितने भी प्रतीक हैं, उन सबको उन्होंने तोड़ा। गोरस (दूध, दही, माखन) की मटकी को फोड़ने से शुरु हुआ यह खेल, कौरवों की अठारह अक्षौहिणी सेना के विनाश से लेकर यदुकुल के सर्वनाश पर जाकर खत्म हुआ। द्वारकालीला में सोलह हजार एक सौ आठ रानियां, उनके एक-एक के दस-दस बेटे, असंख्य पुत्र-पौत्र और यदुवंशियों का लीला में एक ही दिन में संहार करवा दिया, हंसते रहे और यह सोचकर संतोष की सांस ली कि पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतर गया। क्या किसी ने ऐसा आज तक किया है? वही श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा उद्धवजी को व्रज में भेजते समय कहते हैं–’उद्धव! तुम व्रज में जाओ, मेरे विरह में गोपिकाएं मृतवत् पड़ी हुईं हैं, मेरी बात सुनाकर उन्हें सांन्त्वना दो।’ भगवान की सारी लीला में एक बात दिखती है कि उनकी कहीं पर भी आसक्ति नहीं है। इसीलिए महर्षि व्यास ने उन्हें प्रकृतिरूपी नटी को नचाने वाला सूत्रधार और ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ कहा है। यही कारण है कि प्रत्येक भारतीय माता अपनी गोद श्रीकृष्ण के बालरूप (गोपालजी) से ही भरना चाहती है और प्रत्येक स्त्री अपने प्रेम में उसी निर्मोही के मोहनरूप की कामना करती है। रम रहे विश्व में, फिर भी रहते हो न्यारे-न्यारे। पर सुना प्रेम के पीछे फिरते हो मारे-मारे,, जय श्री कृष्ण राधे राधे ( प्रेषक अज्ञात )

+17 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 13 शेयर
Rajiv Mishra Aug 11, 2020

*हरी ॐ भाव " क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं ? यदि खाते हैं , तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती और यदि नहीं खाते हैं , तो भोग लगाने का क्या लाभ ?" - एक लड़के ने पाठ के बीच में अपने गुरु से प्रश्न किया । गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया । वे पूर्ववत् पाठ पढ़ाते रहे । उस दिन उन्होंने पाठ के अन्त में एक श्लोक पढ़ाया -* *पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।* *पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥* *पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने सभी शिष्यों से कहा कि वे पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ कर लें ।* *एक घंटे बाद गुरु ने प्रश्न करने वाले शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं । उस शिष्य ने पूरा श्लोक शुद्ध-शुद्ध गुरु को सुना दिया । फिर भी गुरु ने सिर 'नहीं' में हिलाया , तो शिष्य ने कहा कि - " वे चाहें , तो पुस्तक देख लें ; श्लोक बिल्कुल शुद्ध है ।” गुरु ने पुस्तक दिखाते हुए कहा - “ श्लोक तो पुस्तक में ही है , तो तुम्हें कैसे याद हो गया ?” शिष्य कुछ नहीं कह पाया ।* *गुरु ने कहा - “ पुस्तक में जो श्लोक है , वह स्थूल रूप में है । तुमने जब श्लोक पढ़ा , तो वह सूक्ष्म रूप में तुम्हारे अंदर प्रवेश कर गया । उसी सूक्ष्म रूप में वह तुम्हारे मन में रहता है । इतना ही नहीं , जब तुमने इसको पढ़कर कंठस्थ कर लिया , तब भी पुस्तक के स्थूल रूप के श्लोक में कोई कमी नहीं आई । इसी प्रकार पूरे विश्व में व्याप्त परमात्मा हमारे द्वारा चढ़ाए गए निवेदन को सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं और इससे स्थूल रूप के वस्तु में कोई कमी नहीं होती । उसी को हम प्रसाद के रूप में स्वीकार करते हैं ।* *शिष्य को उसके प्रश्न का उत्तर मिल चुका था ।यह केवल उस शिष्य की ही जिज्ञासा नहीं , हम सर्वसाधारण जनों की भी यही स्थिति है । यदि भोग को प्रसाद के भाव से ग्रहण करें तो उस भोज्य पदार्थ का प्रभाव उस रुप में ही प्राप्त होता है ।* *श्लोक या पाठ शब्द ही हैं पर भाव द्वारा वह पूजा का रूप ले लेते हैं । भाव की पवित्रता और समर्पण आवश्यक है ।* *🙏शुभ की कामना सहित🙏* ‌‌ *🕉️🙏ऊं श्री गुरूवे नमः🙏🕉️*

+7 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 23 शेयर
Anita sharma Aug 11, 2020

*🌹जन्माष्टमी का शुभ मुहूर्त कब मनाएं* 🌹 भाद्रपद महीने की अष्टमी तिथि ,रोहिणी नक्षत्र ,चंद्र वृषभ राशि पर होने पर अति विशेष जयंती नाम शुभ मुहूर्त मैं हमारे तारणहार प्रभु कृष्ण का जन्म हुआ था। यह बहुत ही महत्वपूर्ण शुभ महा संयोग माना जाता है ।लेकिन इस साल जन्माष्टमी की तारीख को लेकर दो मत हैं। पंचांगों में 11 और 12 अगस्त को जन्माष्टमी बताई गई है। भारतवर्ष के अनेक विद्वानों ने परस्पर विचार विमर्श कर सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया है कि 12 अगस्त को ही जन्मोत्सव ,जन्माष्टमी मनाना उत्तम और श्रेष्ठ है। मथुरा- वृंदावन- गोकुल और द्वारिका में 12 अगस्त को जन्मोत्सव मनाया जाएगा। जबकि जगन्नाथ पुरी, काशी और उज्जैन में 11 अगस्त को ऋषिकेश हरिद्वार में रोहिणी नक्षत्र युक्त 13 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जाएगी। *🌹जन्माष्टमी पूजन का समय व शुभ मुहूर्त*🌹 💐 11 अगस्त 2020 मंगलवार को प्रातः 9 बज के:07 पर अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी इस दिन कृतिका नक्षत्र, चंद्रमा मेष राशि में, सूर्य कर्क राशि में,और वृद्धि योग है। अत सभी ( स्मार्त) गृहस्थी कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत इसी दिन रखेंगे। रात्रि में पूजा का समय 11 अगस्त की रात्रि 12 अगस्त की सुबह 12:05 से लेकर 12:47 तक शुभ पूजा का समय है।राहुकाल दिन में 3:00 बजे से लेकर 4:30 बजे तक रहेगा।और 12 अगस्त 2020 बुधवार को उदय कालीन अष्टमी है 11 बज के 17 मिनट तक रहेगी कृतिका नक्षत्र, वृष राशि के चंद्रमा मैं नवमी युक्त वैष्णवों को जन्माष्टमी एवं जन्मोत्सव मनाना श्रेष्ठ एवं उत्तम रहेगा राहु कॉल 12:00 बजे से लेकर 1:30 बजे तक रहेगा। श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत तथा श्री कृष्ण जन्मोत्सव यह दोनों अलग-अलग स्थितियां है, अतः जन्मोत्सव 12 अगस्त बुधवार को ही मनाया जाएगा। *💐🌹स्मार्त और वैष्णव में भेद*🌹💐 स्मार्त — श्रुति- स्मृति, पुराण, वेद, आदि शास्त्रों को मानने वाले धर्मानुलम्बी, धर्मपरायण समस्त गृहस्थी लोग स्मार्त कहलाते हैं। वैष्णव— वह धर्म परायण जो वैष्णव संप्रदाय से दीक्षित हो गले में कंठी व चंदन धारण किया हो मस्तक पर ऊर्द्धपुण्ड त्रिपुंड चंदन लगाया हो किसी विशिष्ट संप्रदाय के साधु सन्यासी तथा विदुषी एवं विधवाओं ने सन्यास धारण कर लिया हो वह सभी भक्तजन वैष्णव कहलाते हैं। धर्म सिंधु के अनुसार– एकादशी एवं अष्टमी के व्रत- उपवास सभी स्मार्त एवं गृहस्ती जन तिथि के प्रारंभ को ग्रहण कर व्रता व्रतादि करते हैं। लेकिन विधवा एवं वैष्णव संप्रदाय से संबंधित परवर्ती तिथि को ग्रहण कर उपवास व्रत आदि कर्म करते हैं। "स्मार्तानां ग्रहाणां पूर्वो पोष्या। यतिर्भि : निष्काम गृहिभि:" वनस्थौ:विधवाभि वैष्णवैश्च परैवोपोष्या।। *💐🌹 जयंती नाम योग में प्रभु का जन्म*🌹💐 श्री कृष्ण जी का जन्म विष्णु जी के आठवें अवतार के रूप में हुआ, पापी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र के महा सयोग से जयंती नाम योग में, आज से 5126 वर्ष पूर्व रात्रि के 12:00 बजे शून्यकाल में”अवतरण हुआ। *💐🌹 लड्डू गोपाल जी का श्रृंगार करें*🌹💐 लड्डू गोपाल जी के सिंगार में, सिर पर मुकुट ,उनके कानों में बाली, कलाई में कड़ा, हाथों में बांसुरी, पारिजात एवं वैजयंती के फूल अति प्रिय हैं,सुगंधित गोपी चंदन से तिलक करें पूजा में राखी रखें ,मोर पंख अवश्य होना चाहिए। *🌹 लड्डू गोपाल जी को भोग में प्रिय सामग्री*🌹 💐 कान्हा को माखन चोर के नाम से जाना जाता है इसलिए माखन, मिश्री, तुलसी, एवं धनिया की पंजीरी पंचमेवा मिश्रित , का भोग लगाएं। उससे पूर्व पंचामृत से स्नान कराकर , वह चरणामृत प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। *💐🌹व्रत परायण के बाद दान करें* 🌹💐 व्रत का पारण करने के पश्चात वस्तुओं का दान करने से दीर्घायु, सुख, शांति, समृद्धि,भगवान कृष्ण की कृपा से मनोकामना पूर्ति ,मन इच्छित वरदान,के साथ-साथ लक्ष्मी जी की अपार कृपा बरसती है। श्री कृष्ण जी पीतांबर धारी है अत: पीला वस्त्र,पीला अन्न स्वर्ण रजत, दान ब्राह्मण को करना श्रेयस्कर श्रेष्ठ उत्तम है।। *💐💥 मतभेद का कारण💥💐* इसका कारणः कृष्ण जन्म की तिथि और नक्षत्र का एक साथ नहीं मिल रहे। 11 अगस्त को अष्टमी तिथि सूर्योदय के बाद लगेगी, लेकिन पूरे दिन और रात में रहेगी। किंतु चंद्रमा वृष राशि पर एवं उदय कालीन अष्टमी तिथि 12 अगस्त को है किंतु रात्रि में अष्टमी नहीं है भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस साल जन्माष्टमी पर्व पर श्रीकृष्ण की तिथि और जन्म नक्षत्र का संयोग नहीं बन रहा है। सभी धर्म प्रेमी एवं कृष्ण भक्त शास्त्र सम्मत मूर्धन्य विद्वानों के परामर्श अनुसार भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव श्रद्धा भक्ति पूर्वक 12 अगस्त को ही मनाएंगे जय श्री राधे 💐🌹*“हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की”💐🌹 💐 “नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की “💐

+20 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 82 शेयर
Swami Lokeshanand Aug 11, 2020

एक नियम है, जहाँ आपका मन लगा है वहीं आपकी भक्ति है। आपका मन स्त्री में लगा हुआ है तो आप स्त्री भक्त हैं, धन में लगा हुआ है तो धन के भक्त हैं। यहाँ सीताजी की स्थिति देखें, हिरन पर आँख गई तो भगवान दूर चले गए, रावण पर गई तो हरण ही हो गया। पर अब- "निजपद नयन, दिए मन राम पदकमल लीन" दृष्टि अपने चरणों पर, मन रामजी के चरणों में। आँख उठाती ही नहीं, माने बहिर्मुखता रही ही नहीं, और- "कृस तन, शीश जटा एक बेनी। जपति हृदँय रघुपति गुण श्रेणी॥" तन कृशकाय है, माने देह में मैं-पन का भाव अति क्षीण है। जटा एक पतली सी चोटी मात्र रह गई है, माने एक ही विचार रहता है, भगवान और उनके गुणों का निरंतर चिंतन करती हैं। "नाम पहारू दिवस निसि" जिव्हा पर दिन रात भगवान का नाम है। बस यही साधक की रहनी है। तन संसार में, मन परमात्मा में। नियम से, अन्तर्मुख होकर, नामजप करते हुए, एकमात्र भगवान के चरणों और गुणों का ध्यान। इधर हनुमानजी पहुँचे ही हैं, कि उधर से रावण आ गया, सीताजी ने विचार किया कि पहले जब यह आया था, तब मैं अकेली थी, आज भी अकेली हूँ, ऐसा करूं किसी को साथ ले लूं। सीताजी ने एक तिनका उठा लिया- "तृन धरि ओट कहति बैदेही" भाव यह है कि देखने की इच्छा हो तो बंद आँख से भी जगत देखा जा सकता है, और देखने की इच्छा न हो तो तिनके की ओट भी बहुत है। तिनका दिखा कर रावण को संकेत दे दिया, कि मैं उनकी पुत्रवधु हूँ जिन्होंने भगवान के वियोग में जीवन तिनके की तरह त्याग दिया, उनकी पत्नी हूँ जिन्होंने राजपद तिनके की त्याग दिया। यदि तूं बल-वैभव की बात करता है तो तेरा बल-वैभव भगवान के सामने तिनके के समान है। तेरे पाप के लिए एक दिन तुझे तिनका तिनका धिक्कारेगा। भगवान के रोष की आँधी तुझे ऐसे उड़ा ले जाएगी जैसे किसी तिनके को उड़ा ले जाती है। तिनका दिखाकर मानो रावण को उस तिनके का ध्यान दिलाना चाहती हैं, जो भगवान ने जयन्त के पीछे लगाया था। फिर यह तिनका भी सीताजी की ही तरह धरती का पुत्र है, सीताजी को यह अपना भाई सा लगता है। या तिन-का, माने उनका, रामजी का, मुझे अकेली मत समझना। "मत समझ अकेली सीता को, उसका राघव है साथ सदा। इस रोम रोम में नस नस में, बस रहा राम रघुनाथ सदा॥" राम रूपी सूर्य के सामने तूं, तेरा बल और तेरा वैभव, जुगनू के समान है। लोकेशानन्द के विचार से, ऐसी रहनी, ऐसा विचार, ऐसा विश्वास और ऐसा साहस, सच्चे साधक की पहचान है।

+8 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 10 शेयर

+10 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 20 शेयर

+11 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 37 शेयर

. ""आध्यात्म एवं ज्योतिष में अष्टमी तिथि का महत्त्व"" 🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸 हिंदू पंचाग की आठवी तिथि अष्टमी कहलाती है। इस तिथि का विशेष नाम कलावती है क्योंकि इस तिथि में कई तरह की कलाएं और विधाएं सीखना लाभकारी होता है। इसे हिंदी में अष्टमी, अठमी और आठें भी कहते हैं। यह तिथि चंद्रमा की आठवी कला है, इस कला में अमृत का पान अजेकपात नाम के देवता करते हैं। अष्टमी तिथि का निर्माण शुक्ल पक्ष में तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा का अंतर 85 डिग्री से 96 डिग्री अंश तक होता है। वहीं कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि का निर्माण सूर्य और चंद्रमा का अंतर 265 से 276 डिग्री अंश तक होता है। अष्टमी तिथि के स्वामी भगवान शिव माने गए हैं लेकिन अष्टमी तिथि देवी दुर्गा की शक्ति के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। जीवन जीने की शक्ति और परेशानियों से लड़ने के लिए इस तिथि में जन्मे जातकों को भगवान शिव और मां दुर्गा की पूजा अवश्य करनी चाहिए। अष्टमी तिथि का ज्योतिष में महत्त्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यदि अष्टमी तिथि बुधवार को पड़ती है तो मृत्युदा योग बनाती है। इस योग में शुभ कार्य करना वर्जित है। इसके अलावा अष्टमी तिथि मंगलवार को होती है तो सिद्धा कहलाती है। ऐसे समय कार्य सिद्धि की प्राप्ति होती है। बता दें कि अष्टमी तिथि जया तिथियों की श्रेणी में आती है। वहीं शुक्ल पक्ष की अष्टमी में भगवान शिव का पूजन करना वर्जित है लेकिन कृष्ण पक्ष की अष्टमी में शिव का पूजन करना उत्तम माना गया है। चैत्र महीने के दोनों पक्षों में पड़ने वाली अष्टमी तिथि शून्य कही गई है। अष्टमी तिथि में जन्मे जातक धार्मिक कार्यों में निपुण और दयावान भी होते हैं। इन्हें सदैव सत्य बोलना पसंद होता है। ये भौतिक सुख-सुविधाओं में विशेष रुचि लेते हैं। इस तिथि में जन्म लेने वाले लोग कई चीजों में विद्वान होते हैं। इनके मन में हमेशा समाज के कल्याण की इच्छा जागती रहती है। ये लोग किसी भी कार्य को करने के लिए मेहनत मे कमी नहीं छोड़ते हैं। इनको घूमना बहुत पसंद होता है। ये लोग उन कार्यों में भाग लेना ज्यादा पसंद करते हैं जिनमें बल का इस्तेमाल करना पड़ता हो। ये लोग मनमौजी स्वभाव के होते हैं अपनी मर्जी से नियम बनाते हैं और खुद ही पालन भी करते हैं। अष्टमी तिथि के शुभ कार्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अष्टमी तिथि में युद्ध, राजप्रमोद, लेखन, स्त्रियों को आभूषण, नये वस्त्र खरीदने जैसे कार्य करने चाहिए। मान्यता है कि इस तिथि में अभिनय, नृत्य, गायन कला सीखने के लिए प्रवेश लेना भी शुभ है। इस तिथि में आप वास्तुकर्म, घर बनवाना, शस्त्र बनवाने जैसे कार्य प्रारंभ कर सकते हैं। इसके अलावा किसी भी पक्ष की अष्टमी तिथि में नारियल नहीं खाना चाहिए। अष्टमी तिथि के प्रमुख हिन्दू त्यौहार एवं व्रत व उपवास 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी👉 जन्माष्टमी का त्यौहार श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। मथुरा नगरी में असुरराज कंस के कारागृह में देवकी की आठवीं संतान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण भाद्रपद कृष्णपक्ष की अष्टमी को पैदा हुए। उनके जन्म के समय अर्धरात्रि (आधी रात) थी, चन्द्रमा उदय हो रहा था और उस समय रोहिणी नक्षत्र भी था। इसलिए इस दिन को प्रतिवर्ष कृष्ण जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। अहोई अष्टमी 👉 अहोई अष्टमी व्रत कार्तिक मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी को आता है| इस दिन अहोई माता के पूजन का विधान है। इस तिथि पर महिलाएं पुत्र प्राप्ति और संतान सुख के लिए व्रत रखती हैं और शाम के वक्त तारे देखकर उपवास तोड़ा जाता है। शीतला अष्टमी 👉 चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी मनाई जाती है। इस तिथि पर शीतला माता की पूजा की जाती है, जिससे चिकन पॉक्स या चेचक जैसे रोग दूर रहें। इस दिन बासी भोजन खाया जाता है। दुर्गाष्टमी 👉 नवरात्र में अष्टमी के दिन देवी दुर्गा की आठवी शक्ति माता महागौरी का पूजन किया जाता है। इस दिन घरों में कन्याभोज भी कराया जाता है। सीता अष्टमी 👉 फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को सीता अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन धरती पर माता सीता का जन्म हुआ था। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए और अविवाहित कन्याओं मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं। राधा अष्टमी 👉 भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन राधा जी का जन्म हुआ था। इस तिथि पर राधारानी की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत करने से आपको राधारानी के साथ भगवान कृष्ण की कृपा भी मिल जाती है। 🔥""""गजेन्द्र प्रताप राजभर"""" 🔥 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

+7 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 6 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB