Krishna Singh
Krishna Singh Nov 27, 2017

बुड्ढा अमरनाथ दर्शन के बिना अधूरी है अमरनाथ यात्रा?

बुड्ढा अमरनाथ दर्शन के बिना अधूरी है अमरनाथ यात्रा?

कितनी आश्चर्य की बात है कि बुड्ढा अमरनाथ का मंदिर हिन्दुओं का धार्मिक स्थल होने के बावजूद भी इसके आसपास कोई हिन्दू घर नहीं है और इस मंदिर की देखभाल आसपास रहने वाले मुस्लिम परिवार तथा सीमा सुरक्षाबल के जवान ही करते हैं।

पाकिस्तानी क्षेत्र से तीन ओर से घिरी सीमावर्ती पुंछ घाटी के उत्तरी भाग में पुंछ कस्बे से 23 किमी की दूरी पर स्थित बुड्ढा अमरनाथ का मंदिर सांप्रदायिक सौहार्द की कथा भी सुनाता है जो इस क्षेत्र में है। वैसे यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव ने कश्मीर में स्थित अमरनाथ की गुफा में माता पार्वती को जो अमरता की कथा सुनाई थी, उसकी शुरुआत बुड्ढा अमरनाथ के स्थान से ही हुई थी और अब यह मान्यता है कि इस मंदिर के दर्शनों के बिना अमरनाथ की कथा ही नहीं बल्कि अमरनाथ यात्रा भी अधूरी है।

मंदिरों की नगरी जम्मू से 246 किमी की दूरी पर स्थित पुंछ घाटी के राजपुरा मंडी क्षेत्र तक पहुंचने के लिए किसी प्रकार की पैदल यात्रा नहीं करनी पड़ती है और जिसके साथ ही कश्मीर का क्षेत्र तथा बहुत ही खूबसूरत लोरन घाटी लगती है, में स्थित बुड्ढा अमरनाथ का मंदिर चकमक पत्थर से बना हुआ है, जबकि इस मंदिर में भगवान शिव एक लिंग के रूप में विद्यमान हैं जो चकमक पत्थर से बना हुआ है।

अन्य शिव मंदिरों से यह पूरी तरह से भिन्न है। मंदिर की चारदीवारी पर लकड़ी के काम की नक्काशी की गई है, जो सदियों पुरानी बताई जाती है। कहा जाता है कि भगवान शिव द्वारा सुनाई जाने वाली अमरता की कथा की शुरुआत भी यहीं से हुई थी।

पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के कदमों में ही स्थित मंदिर के आसपास के पहाड़ सालभर बर्फ की सफेद चादर से ढंके रहते हैं जो हमेशा ही एक अद्धभुत नजारा प्रस्तुत करते हैं। मंदिर के एक ओर लोरन दरिया भी बहता है जिसे ‘पुलस्तया’ दरिया भी कहा जाता है, जिसका पानी बर्फ से भी अधिक ठंडक लिए रहता है।

सनद रहे कि पुंछ कस्बे का पहला नाम पुलस्तय ही था। बर्फ से ढंके पहाड़, किनारे पर बहता शुद्ध जल का दरिया तथा चारों ओर से घिरे ऊंचे-ऊंचे पर्वतों के कारण यह रमणीक स्थल हिल स्टेशन से कम नहीं माना जाता है।

राजपुरा मंडी तक जाने के लिए चंडक से रास्ता जाता है जो जम्मू से 235 किमी की दूरी पर है तथा जम्मू-पुंछ राजमार्ग पर पुंछ कस्बे से 11 किमी पहले ही चंडक आता है। बुड्ढा अमरनाथ के दर्शनार्थ आने वाले किसी धर्म, मजहब, जाति या रंग का भेदभाव नहीं करते हैं। इसकी पुष्टि इससे भी होती है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्र में स्थित इस मंदिर की रखवाली मुस्लिम ही करते हैं।

सिर्फ राजौरी-पुंछ से ही नहीं बल्कि देशभर से लोग चकमक पत्थर के लिंग के रूप में विद्यमान भगवान शिव के दर्शनार्थ इस मंदिर में आते हैं जबकि विभाजन से पहले पाकिस्तान तथा पाक अधिकृत कश्मीर से आने वालों का तांता भी लगा रहता था, जो पुंछ कस्बे से मात्र तीन किमी की दूरी पर ही हैं।

जिस प्रकार कश्मीर में स्थित अमरनाथ गुफा में श्रावण पूर्णिमा के दिन जब रक्षाबंधन का त्योहार होता है प्रत्येक वर्ष मेला लगता है, ठीक उसी प्रकार इस पवित्र स्थल पर भी उसी दिन उसी प्रकार का एक विशाल मेला लगता है और अमरनाथ यात्रा की ही भांति यहां भी यात्रा की शुरुआत होती है और उसी प्रकार ‘छड़ी मुबारक’ रवाना की जाती है।

त्रयोदशी के दिन पुंछ कस्बे के दशनामी अखाड़े से इस धर्मस्थल के लिए छड़ी मुबारक की यात्रा आरंभ होती है। पुलिस की टुकड़ियां इस चांदी की पवित्र छड़ी को उसकी पूजा के उपरांत गार्ड ऑफ ऑनर देकर इसका आदर-सम्मान करती है और फिर अखाड़े के महंत द्वारा पुंछ से मंडी की ओर जुलूस के रूप में ले जाई जाती है। इस यात्रा में हजारों साधु तथा श्रद्धालु भी शामिल होते हैं, जो भगवान शिव के लिंग के दर्शन करने की इच्छा लिए होते हैं। हालांकि हजारों लोग पूर्णिमा से पहले भी सालभर लिंग के दर्शन करते रहते हैं।

भगवान के लिंग के रूप में दर्शन करने से पहले श्रद्धालु लोरन दरिया में स्नान करके अपने आप को शुद्ध करते हैं और फिर भगवान के दर्शन करके अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु वरदान मांगते हैं। मंदिर के भीतर भगवान शिव-पार्वती की मनमोहक मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं।

बताया जाता है कि जिस चकमक पत्थर से शिवलिंग बना हुआ है, उसकी ऊंचाई करीब साढ़े पांच फुट है मगर उसका कुछ ही भाग ऊपर दिखाई देता है। यह भी कहा जाता है कि मेहमूद गजनबी ने अपने लूटपाट अभियान के दौरान इस मंदिर को आग लगा दी थी, लेकिन यह लिंग उसी प्रकार बना रहा था और यह भी कथा प्रचलित है कि बुड्ढा अमरनाथ के दर्शनों के बिना कश्मीर के अमरनाथ के दर्शन अधूरे माने जाते हैं।

इस मंदिर तथा वार्षिक उत्सव के साथ कई कथाएं जुड़ी हुई हैं, जिनमें से एक यह भी है कि सदियों पहले जब कश्मीर में बहुत ही अशांति फैली हुई थी तो लोरन चंद्रिका की महारानी अमरनाथ की गुफा के दर्शनार्थ नहीं जा पाई। इस पर वह उदास रहने लगी तो वह बार-बार यही सोचती कि भगवान शिव की परमभक्त होने के बावजूद भी वे भगवान के दर्शनों के लिए न जा सकी तो उन्होंने खाना-पीना छोड़कर भगवान शिव की तपस्या में मग्न होना आरंभ कर दिया।

खाना-पीना छोड़ दिए जाने के कारण उनकी बिगड़ती हालत देख, जैसा की बताया जाता है, भगवान शिव ने बूढ़े साधु का रूप धारण किया और हाथों में चांदी की छड़ी ले महारानी के पास जा पहुंचे। महारानी के पास पहुंच उन्होंने उनसे कहा कि वे मंडी के पास एक खूबसूरत दरिया के किनारे भगवान शिव के दर्शन भी कर सकती हैं और अमरनाथ की गुफा तक जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

फिर क्या था, रक्षाबंधन वाले दिन उस बूढ़े साधु के नेतृत्व में महारानी ने मंडी तक की यात्रा की तो उन्हें चकमक पत्थर के रूप में भगवान शिव का लिंग नजर आया, लेकिन वह बूढ़ा साधु नजर नहीं आया। इतने में आकाशवाणी ने उन्हें यही बताया कि वे बूढ़े साधु तो भगवान शिव ही थे और उसी दिन से फिर मंडी स्थित इस लिंग का नाम बुड्ढा अमरनाथ डाल दिया गया।

एक अन्य पुरानी कथा के अनुसार, रावण के दादा श्री पुलस्तया जिन्होंने पुंछ शहर को बसाया था ने लोरन दरिया के किनारे भगवान शिव को पा लिया था, अतः तभी से यह स्थान बुड्ढा अमरनाथ तथा लोरन दरिया पुलस्तया दरिया के नाम से जाना जाता है। कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव अमरनाथ की पवित्र गुफा की ओर माता पार्वती के साथ बढ़ रहे थे तो थोड़ी देर के लिए वे मंडी के उस स्थान पर रूके थे जहां आज बुड्ढा अमरनाथजी का मंदिर है।

कथा के अनुसार, सर्दी के कारण उन्होंने चकमक पत्थर का निर्माण कर आग जलाई थी तथा जो कथा माता पार्वती को अमरनाथ की गुफा में अमरता के बारे में बताई थी उसकी शुरुआत इसी स्थान से की गई थी। इसलिए कहा जाता है कि इस स्थान को उतना ही पवित्र तथा धार्मिक माना जाता है जितना अमरनाथ गुफा को तथा इस धार्मिक स्थल की यात्रा के बिना अमरनाथ की यात्रा को अधूरा माना जाता है।

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कामेंट्स

Ahibaran Singh Nayak Nov 27, 2017
Ahibaran Singh Nayak Jay Shri Ram tan dhone se achcha man ko dhona jada achcha hoga

Gobindji Majumdar Nov 27, 2017
aum namah. shivaya panditji jyotishachsrya ( Gold. medalist) m. 09933116909. wb.

narinder kumar Nov 27, 2017
morning sir, main bhi yahi ka rahney Wala hu. Har Har Mahadev.

उमा सिंह Nov 28, 2017
बहुत ही सुन्दर कथा ,जय बुड्ढा अमरनाथ जी

Ganesh Prasad Feb 1, 2018
हर हर महादेव ॐ नमः शिवाय ।

Anita Sharma Dec 2, 2019

नारी का भी समान अधिकार है-- सप्तऋषियों में एक ऋषि भृगु थे, वो स्त्रियों को तुच्छ समझते थे। वो शिवजी को गुरुतुल्य मानते थे, किन्तु माँ पार्वती को वो अनदेखा करते थे।एक तरह से वो माँ को भी आम स्त्रियों की तरह साधारण और तुच्छ ही समझते थे। महादेव भृगु के इस स्वभाव से चिंतित और खिन्न थे। एक दिन शिव जी ने माता से कहा, आज ज्ञान सभा में आप भी चले। माँ शिव जी के इस प्रस्ताव को स्वीकार की और ज्ञान सभा में शिव जी के साथ विराजमान हो गई। सभी ऋषिगण और देवताओ ने माँ और परमपिता को नमन किया और उनकी प्रदक्षिणा की और अपना अपना स्थान ग्रहण किआ किन्तु भृगु माँ और शिव जी को साथ देख कर थोड़े चिंतित थे, उन्हें समझ नही आ रहा था कि वो शिव जी की प्रदक्षिणा कैसे करे। बहुत विचारने के बाद भृगु ने महादेव जी से कहा कि वो पृथक खड़े हो जाये। शिव जी जानते थे भृगु के मन की बात। वो माँ को देखे, माता उनके मन की बात पढ़ ली और वो शिव जी के आधे अंग से जुड़ गई और अर्धनारीश्वर रूप में विराजमान हो गई। अब तो भृगु और परेशान, कुछ पल सोचने के बाद भृगु ने एक राह निकाली। भवरें का रूप लेकर शिवजी के जटा की परिक्रमा की और अपने स्थान पर खड़े हो गए। माता को भृगु के ओछी सोच पे क्रोध आ गया। उन्होंने भृगु से कहा- भृगु तुम्हे स्त्रियों से इतना ही परहेज है तो क्यूँ न तुम्हारे में से स्त्री शक्ति को पृथक कर दिया जाये, और माँ ने भृगु से स्त्रीत्व को अलग कर दिया। अब भृगु न तो जीवितों में थे न मृत थे। उन्हें आपार पीड़ा हो रही थी, वो माँ से क्षमा याचना करने लगे, तब शिव जी ने माँ से भृगु को क्षमा करने को कहा। माँ ने उन्हें क्षमा किया और बोली - संसार में स्त्री शक्ति के बिना कुछ भी नही। बिना स्त्री के प्रकृति भी नही पुरुष भी नही। दोनों का होना अनिवार्य है और जो स्त्रियों को सम्मान नही देता वो जीने का अधिकारी नही। आज संसार में अनेकों ऐसे सोच वाले लोग हैं। उन्हें इस प्रसंग से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। वो स्त्रियों से उनका सम्मान न छीने। खुद जिए और स्त्रियों के लिए भी सुखद संसार की व्यवस्था बनाए रखने में योगदान दें।

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9911020152, 7982311549 👇🌼👇🌼👇🌼👇🌼👇🌼👇 सोते समय ध्यान रखें ये बातें, वरना हो सकते हैं कई नुकसान हमारे सोने का तरीका और हमारा बेड भी कई तरह की अच्छी और बुरी बातों का कारण बन सकता है। वास्तु में बेड पर सोने के लिए भी कुछ नियम बताए गए हैं, जिनका पालन न करने पर हमें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। उन सभी परेशानियों और बीमारियों के बचने के लिए ध्यान रखें ये 8 नियम। 1- बेड के बीचों-बीच कोई लैम्प, पंखा या इलैक्ट्रानिक उपकरण आदि नहीं होना चाहिए। ऐसे बेड पर सोने वाले का पाचन अधिकतर खराब रहता है। 2- घड़ी को कभी भी सिर के नीचे या बेड के पीछे रखकर नहीं सोना चाहिए। घड़ी को बेड के सामने भी नहीं लगाना चाहिए वरना उस बेड पर सोने वाला हमेशा चिन्ता या तनाव में रहता है। घड़ी को बेड के बाएं या दाएं ओर ही लगाना चाहिए। 3- जिस बेड पर आप सोते हैं, उस पर सिंपल डिजाइन वाले तकिए और चादर रखने चाहिए, ज्यादा डिजाइन वाले या रंग- बिरंगी तकिए और चादरों से बचें। 4- बेड रूम में मन्दिर या पूर्वजों की तस्वीरें नहीं लगानी चाहिए। 5- बेड रूम में युद्ध वाले, डरावने और हिंसक जानवरों के चित्र नहीं लगाने चाहिए। सादे और सुन्दर चित्र या पेंटिंग लगाना शुभ माना जाता है। 6- बेड रूम में हल्के गुलाबी रंग का प्रकाश होना चाहिए जिससे पति व पत्नी में अपसी प्रेम बना रहता है। 7- बेड रूम के दरवाजे के सामने पैर करके नहीं सोना चाहिए ऐसा करना अशुभ माना जाता है। 8- वास्तु के अनुसार, हमेशा दक्षिण दिशा में सिर और उत्तर दिशा में पैर करके सोना चाहिए, ऐसा करने से मनुष्य को गहरी नींद और लम्बी उम्र मिलती है

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Ramesh Agrawal Dec 3, 2019

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